नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती दशक : एक सिंहावलोकन (चौथी किस्त)

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती दशक : एक सिंहावलोकन (चौथी किस्त)

  • दीपायन बोस

मार्च 1971 में सुशीतल राय चौधरी का निधन हुआ और उसी महीने चारु मजुमदार की लाइन के प्रबलतम समर्थकों में से एक, सौरेन बसु भी गिरफ़्तार हो गये। उनके दूसरे निकटतम व्यक्त‍ि सरोज दत्त की हत्या पुलिस के हाथों कुछ माह बाद, 5 अगस्त 1971 को हुई। असीम चटर्जी 3 नवम्बर 1971 को गिरफ़्तार होने से पहले ही चारु की लाइन के विरुद्ध खड़े हो चुके थे, जिसकी चर्चा पहले आ चुकी है।

1971 का उत्तरार्द्ध आते-आते चारु मजुमदार के निकटतम माने जाने वाले चार लोगों में से अन्तिम व्यक्त‍ि – सुनीति कुमार घोष के साथ भी उनके मतभेद उठ खड़े हुए, जो गहराते चले गये। इसकी चर्चा आगे यथास्थान की जायेेगी। उसके पहले सौरेन बसु की बहुचर्चित चीन यात्रा और चीनी पार्टी के बिरादराना सुझावों की चर्चा ज़रूरी है, क्योंकि इन सुझावों में वास्तव में वाम दुस्साहसवादी लाइन की, सार रूप में, ऐसी आलोचना निहित थी जिसने एक-एक करके नेतृत्व के अन्य बचे हुए लोगों को भी चारु मजुमदार के विरुद्ध खड़ा कर देने में अहम भूमिका निभायी। लेकिन इसके पहले, नक्सलबाड़ी और भाकपा (माले) के प्रति चीन की पार्टी के रुख़ की संक्षेप में चर्चा ज़रूरी है, क्योंकि किसी-न-किसी रूप में, काफ़ी हद तक चीन की पार्टी के पुरज़ोर समर्थन ने 1967-70 के बीच चारु मजुमदार के नेतृत्व और उनकी लाइन को मज़बूत बनाने में मदद पहुँचायी थी।

नक्सलबाड़ी, भाकपा (माले) और चीन की कम्युनि‍स्ट पार्टी

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने नक्सलबाड़ी विद्रोह का उत्साहपूर्ण समर्थन किया था। नक्सलबाड़ी के बाद शुरू हुई कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों की एकता का भी चीनी प्रेस और रेडियो ने संशोधनवाद और नवसंशोधनवाद के साथ निर्णायक विच्छेद और एक नयी शुरुआत के रूप में गर्मजोशी भरा स्वागत किया। 28 जून 1967 को रेडियो पीकिङ ने पहली बार नक्सलबाड़ी संघर्ष का स्वागत किया और फिर 5 जुलाई को पार्टी मुखपत्र ‘पीपुल्स डेली’ में ‘भारत में बसन्त का वज्रनाद’ शीर्षक प्रसिद्ध लेख प्रकाशित हुआ। इसके बाद 1970 के शुरुआती महीनों तक चीनी मीडिया द्वारा कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी शिविर के घटना-क्रम-विकास और देश के विभिन्न हिस्सों में हो रहे ‘ऐक्शन्स’ के बारे में प्रसारण और मुद्रण का सिलसिला जारी रहा। 1967 में जुलाई के बाद के किसी महीने में कानू सान्याल, खोकन मजुमदार और कुछ अन्य लोग सीमा पार करके चीन भी गये। वहाँ कुछ नेताओं से बातचीत के अतिरिक्त उनकी माओ से भी संक्षिप्त मुलाक़ात हुई जिसमें माओ ने बस इतना कहा कि यहाँ देखी-सीखी गयी बातों को यहीं भूलकर आप लोगों को अपने देश वापस लौटकर वहाँ की ठोस परिस्थितियों का ठोस अध्यन करना चाहिए और उसके हिसाब से संघर्ष को आगे बढ़ाना चाहिए। जब ‘लिबरेशन’ का प्रकाशन शुरू हुआ तो उसके कई लेखों के अनुवाद भी चीनी प्रेस में छपे।

चीनी पार्टी के इस समर्थन से नक्सलबाड़ी के सन्देश को पूरे देश में पहुँचाने में और कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों को एकजुट करने की प्रक्रिया में निश्चय ही महत्वपूर्ण मदद मिली। लेकिन अगले चरण में इस समर्थन ने, ‘अखिल भारतीय तालमेल कमेटी’ के भीतर क्रान्तिकारी जनदिशा और वामपन्थी दुस्साहसवाद के बीच जारी दो लाइनों के संघर्ष को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया। चीनी प्रकाशनों और प्रसारणों से स्पष्ट संकेत मिलता है कि कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन का साहित्य (विशेषकर ‘लिबरेशन’) उन्हें नियमित प्राप्त होता था। तालमेल कमेटी के दौर में परिमल दासगुप्ता, असित सेन, प्रमोद सेनगुप्ता जैसे कई महत्वपूर्ण व्यक्तियों द्वारा और कई छोटे ग्रुपों द्वारा चारु की लाइन पर उठाये गये सवालों और उनके अलग हो जाने की यदि सटीक और विस्तृत जानकारी चीनी पार्टी तक न भी पहुँची हो, लेकिन डी.वी. राव-नागी रेड्डी के नेतृत्व वाली आन्ध्र प्रदेश तालमेल कमेटी और ‘दक्षिण देश ग्रुप’ के अलग होने की जानकारी उस तक न पहुँची हो, यह लगभग असम्भव है। इसके बाद भी पूरे मामले की विस्तृत पड़ताल करने के बजाय चीन की पार्टी चारु मजुमदार को नक्सलबाड़ी संघर्ष और भारतीय क्रान्ति के निर्विवाद नेता के रूप में प्रस्तुत करती रही, जबकि विशेषकर 1969 के प्रारम्भ से ‘लिबरेशन’ में प्रकाशित चारु मजुमदार के लेखों-टिप्पणियों से (और अन्य लेखों से भी) वामपन्थी दुस्साहसवाद की लाइन एकदम खुलकर सामने आने लगी थी। चीन की पार्टी से प्राप्त इस मान्यता ने चारु मजुमदार को अपनी लाइन आगे बढ़ाने में काफ़ी मदद पहुँचायी।

इस दौर में चीनी पार्टी के मीडिया का आचरण कई बार स्वयं माओ त्से-तुङ की शिक्षाओं के भी उलट नज़र आता है। मार्क्स से लेकर माओ तक, विश्व सर्वहारा के सभी महान शिक्षकों ने इस बात को बार-बार रेखांकित किया है कि प्रत्येक देश की कम्युनिस्ट पार्टी को अपने देश की ठोस परिस्थितियों का अध्ययन-विश्लेषण करने के बाद अपनी लाइन और नीतियाँ स्वतन्त्रतापूर्वक स्वयं निर्धारित करनी चाहिए। कोमिण्टर्न के दौर के कुछ नकारात्मक अनुभवों के बाद चीन की पार्टी इस बात पर हमेशा से बहुत बल देती आयी थी। 1957 में लातिन अमेरिकी देशों की कुछ कम्युनिस्ट पार्टियों के प्रतिनिधिमण्डल से बातचीत के दौरान माओ ने स्पष्ट कहा था : ”चीनी क्रान्ति का अनुभव, यानी देहाती आधार पर इलाक़े बनाने, गाँवों से शहरों को घेरने और अन्तत: शहरों को क़ब्ज़ा करने का रास्ता, आपके बहुतेरे देशों में पूरी तरह लागू नहीं हो सकता है, हालाँकि यह आपके लिए एक सन्दर्भ का काम कर सकता है। मैं आपको विनम्र सुझाव देता हूँ कि चीनी अनुभव को यान्त्रिक ढंग से ‘ट्रांसप्लाण्ट’ न करें। किसी बाहरी देश का अनुभव मात्र सन्दर्भ की तरह काम कर सकता है, और उसे एक जड़सूत्र के समान क़तई नहीं लिया जाना चाहिए। मार्क्सवाद-लेनिनवाद की सार्वभौमिक सच्चाई और आपके अपने देश की ठोस परिस्थितियाँ – इन दोनों को समेकित किया जाना चाहिए।” (‘सम एक्सपीरियेन्सेज़ इन अवर पार्टीज़ हिस्ट्री’, सेलेक्टेड वर्क्स, खण्ड 5, पृष्ठ. 326)। ग़ौरतलब है कि चीनी मीडिया में नक्सलबाड़ी और भारत के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन पर छपने वाले लेखों का अप्रोच प्राय: माओ के उपरोक्त अप्रोच से अलग होता था। ‘भारत में बसन्त का वज्रनाद’ लेख में ही इस बात पर बल दिया गया था कि भारतीय क्रान्ति का रास्ता चीन जैसा ही होगा। ‘सिन्हुआ समाचार एजेन्सी’ ने 27 दिसम्बर 1967 को एक लेख छापा : ‘भारतीय क्रान्ति अध्यक्ष माओ द्वारा प्रकाशित दीप्तिमान मार्ग पर अग्रसर है।’ थोड़े परिवर्तनों के साथ यही लेख ‘भारतीय क्रान्ति में ऐतिहासिक मोड़बिन्दु’ नाम से कुछ और पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ था। लेख के इन दोनों रूपों में ‘अखिल भारतीय तालमेल कमेटी’ की पहली घोषणा और उसके द्वारा घोषित कार्यभारों का हवाला दिया गया था। लेकिन तालमेल कमेटी के चार कार्यभारों में से जिस एक को ग़ायब कर दिया गया था, वह था : ‘मज़दूर वर्ग और अन्य उत्पीडि़त जनगण के जुझारू क्रान्तिकारी संघर्षों को विकसित करना…।’ यहाँ इस सम्भावना से इन्कार नहीं कि यह लोप जानबूझकर किया गया हो और यह कार्रवाई सुझावमूलक हो, क्योंकि चीनी टिप्पणीकार के दृष्टिकोण से यह कार्यभार ‘चीनी रास्ते’ की उनकी सोच के अनुकूल न हो। जो भी हो, यदि यह एक चूक भी थी तो गम्भीर थी और इसका पूरा लाभ वाम दुस्साहसवादी लाइन को ही मिलने वाला था। चीन की पार्टी लगातार इस आशय की बातें कर रही थी कि भारतीय क्रान्ति का रास्ता चीनी क्रान्ति का रास्ता होगा और साथ ही वह चारु मजुमदार को ही भारतीय क्रान्ति का नेता बता रही थी। यही कारण था कि जब चारु ने ‘चीन का रास्ता हमारा रास्ता’ का नारा दिया और फिर उसे आगे बढ़ाते हुए यहाँ तक कहा कि ‘चीन का चेयरमैन हमारा चेयरमैन’ तो तालमेल कमेटी के भीतर से कोई विरोध नहीं आया। जिनके द्वारा विरोध की सम्भावना हो सकती थी, उन्हें पहले ही किनारे लगाया जा चुका था। शेष लोगों की विचारधारात्मक समझ इतनी कमज़ोर थी कि चीन की पार्टी से प्राप्त मान्यता के बाद, कम-से-कम उस समय, उन्होंने इन नारों के औचित्य-अनौचित्य पर कुछ सोचने तक की ज़रूरत नहीं समझी।

जैसाकि इस निबन्ध में पहले उल्लेख आ चुका है, चारु मजुमदार के आठ दस्तावेज़ों में से शुरुआती छह में अतिवामपन्थी विचलन के सूत्र मौजूद थे, लेकिन नक्सलबाड़ी में क्रान्तिकारी जनदिशा पर अमल के बाद से लेकर 1969 के प्रारम्भ तक उन्होंने ‘कॉम्बैट यूनिट्स’ या वर्ग शत्रुओं के गुप्त सफ़ाये की कभी कोई चर्चा नहीं की। मई 1968 की अपनी दूसरी मीटिंग के बाद जारी अपनी घोषणा में तालमेल कमेटी ने स्पष्ट कहा था : ”यदि भारतीय जनता के शत्रुओं को उखाड़ फेंकना है, तो षड्यन्त्र के तौर-तरीक़ों को नहीं, बल्कि सिर्फ़ जनदिशा को अमल में लाना होगा।” यह चर्चा भी आ चुकी है कि श्रीकाकुलम के गिरिजन संघर्ष के नेतृत्व से सम्पर्क होने, फ़रवरी 1969 में आन्ध्र की यात्रा करने और श्रीकाकुलम के साथियों को लेकर आन्ध्र राज्य तालमेल कमेटी बनाने के बाद चारु मजुमदार ने फिर अपनी लाइन को तेज़ी से और खुले तौर पर आगे बढ़ाया। श्रीकाकुलम में शुरुआती दौर में सफ़ाये की लाइन बड़े पैमाने पर सफलता से लागू हुई और अपनी लाइन में चारु का विश्वास और अधिक पुख़्ता हुआ। ‘आठ दस्तावेज़ों’ के ‘कॉम्बैट यूनिट्स’ का स्थान अब ‘गुरिल्ला यूनिट्स’ ने ले लिया। चारु मजुमदार ने ‘छापामार कार्रवाइयों के बारे में कुछ बातें’ शीर्षक टिप्पणी में स्पष्ट किया कि छापामार इकाइयों का गठन षड्यन्त्रकारी तौर-तरीक़ों से होगा और वे जनसमुदाय से और पार्टी इकाइयों से भी गुप्त होंगी ‘जिन्होंने ग़ैर-क़ानूनी कामों के लिए ज़रूरी तौर-तरीक़ों और अनुशासन में अभी महारत नहीं हासिल की है।’ कहने की ज़रूरत नहीं कि चारु मजुमदार की छापामार युद्ध की सोच माओ और चीन की पार्टी से एकदम अलग थी। चीन में छापामार युद्ध लोकयुद्ध की एक मंजि़ल था जो व्यापक जनसमुदाय की सक्रिय सहायता से चलाया गया था और जिसने अपने से अधिक शक्तिशाली दुश्मन को भारी नुक़सान पहुँचाकर, उसकी कमज़ोर पकड़ और पहुँच वाले सुदूर देहाती क्षेत्रों में आधार इलाक़ों के निर्माण को अंजाम दिया। वर्ग-शक्ति-सन्तुलन में अधिक अनुकूल बदलाव होने के बाद लोकयुद्ध चलायमान युद्ध की उन्नततर अवस्था में और फिर अवस्थितियों के युद्ध (‘पोज़ीशनल वारफ़ेयर’) में प्रविष्ट हो गया।

चारु एक निश्चित सीमा तक जनता की लामबन्दी के बाद छापामार युद्ध की शुरुआत की जगह छापामार युद्ध को ही जनता को लामबन्द करने का एकमात्र रास्ता मानते थे और छापामार युद्ध का उनके लिए मतलब था, गुप्त दस्तों द्वारा वर्ग शत्रुओं का सफ़ाया। माओ ने दीर्घकालिक लोकयुद्ध के बारे में लिखते हुए यह स्पष्ट बताया था कि बुर्जुआ वर्ग के सफ़ाये (एनिहिलेशन) का मतलब यह नहीं है कि उसका शारीरिक तौर पर सफ़ाया कर दिया जायेेगा, बल्कि इसका मतलब यह है कि एक वर्ग के रूप में उसका सफ़ाया कर दिया जायेेगा। उन्होंने यह भी कहा था कि शत्रु को तबाह कर देने का मतलब है उसे निश्शस्त्र कर देना और प्रतिरोध करने की ताक़त से वंचित कर देना (सेलेक्टेड वर्क्स, खण्ड पाँच, पृ. 504, और सेलेक्टेड वर्क्स, खण्ड दो, पृ. 156)। माओ ने यह ज़रूर कहा था कि हर काउण्टी में किसानों और ग़रीबों पर बर्बर ज़ुल्म ढाने वाले कुछ भूस्वामी और प्रतिक्रियावादी होते हैं। शत्रुओं को दबाने के लिए इनमें से सर्वाधिक ज़ालिम कुछ लोगों को मृत्युदण्ड दिया जा सकता है, लेकिन अन्धाधुन्ध हत्या सख़्ती से वर्जित है, हत्याएँ जितनी कम हों उतना बेहतर (देखिए, रिपोर्ट ऑन ऐन इनवेस्टिगेशन ऑफ़ द पीज़ेण्ट मूवमेण्ट इन हुनान, सेलेक्टेड वर्क्स, खण्ड एक, और एसेंशियल प्वाइण्ट्स इन द लैण्ड रिफ़ॉर्म इन दि न्यू लिबरेटेड एरिया, सेलेक्टेड वर्क्स, खण्ड चार, पृ. 202)। चीन की पार्टी के पोलित ब्यूरो के एक महत्वपूर्ण सदस्य और भूमि सुधार के विशेषज्ञ जेन पी-शिह ने भी वर्ग शत्रुओं के दमन और हत्या के बारे में माओ के विचारों को ही अपने एक वक़्तव्य में विस्तार दिया है और मज़े की बात यह है कि उनका यह भाषण ‘लिबरेशन’ के मार्च 1968 के अंक (1, अंक 5) में प्रकाशित भी हुआ था (जेन पी-शिह, ‘इम्पॉर्टेण्ट क्वेश्चंस एराइजि़ंग ड्यूरिंग द एग्रेरियन रिफ़ॉर्म इन चाइना’, ‘स्पीच टु ऐन एनलार्ज्ड सेशन ऑफ़ दि नॉर्थ-वेस्ट पीपुल्स लिबरेशन आर्मी’ज़ फ़्रण्ट कमेटी, 12 जनवरी 1948, ‘लिबरेशन’, मार्च 1968, पृ. 34, 37, 38, 42, 43)।

उपरोक्त चर्चा हमने यहाँ चारु मजुमदार की लाइन के वाम दुस्साहसवादी चरित्र को स्पष्ट करने के लिए नहीं की है, यह तो निबन्ध में पहले ही किया जा चुका है। यहाँ यह चर्चा हम चीन की पार्टी के राजनीतिक व्यवहार में आये विचलन को समझने के लिए कर रहे हैं। माओ और चीनी पार्टी के लेखन में छापामार युद्ध की समझ पूरी तरह से क्रान्तिकारी जनदिशा पर आधारित है और वर्ग शत्रुओं की हत्या को संघर्ष का आम रूप बनाने के पक्ष में चीनी पार्टी क़तई नहीं थी। लेकिन उल्लेखनीय है कि जबसे (यानी 1969 के शुरू से) चारु मजुमदार ने अपनी वाम दुस्साहसवादी लाइन को एकदम खुलकर रखना और तेज़ी से आगे बढ़ाना शुरू किया था, उसी समय चीनी मीडिया दिन-रात चारु मजुमदार को उद्धृत कर रहा था और उन्हें भारतीय क्रान्ति के नेता के रूप में प्रस्तुत कर रहा था। सिर्फ़ एक उदाहरण यहाँ काफ़ी होगा। ‘सिनहुआ समाचार एजेन्सी’ ने 28 मार्च 1970 के अपने डिस्पैच में लिखा था : ”भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माले) के नेता चारु मजुमदार ने निर्दिष्ट किया है कि 1969 में संघर्ष के अमल ने सिद्ध कर दिया है कि : ग़रीब और भूमिहीन किसानों पर भरोसा करो। उन्हें माओ त्से-तुङ विचारधारा में शिक्षित करो; सशस्त्र संघर्ष के रास्ते पर दृढ़ता से डटे रहो, छापामार बलों का निर्माण करो और वर्ग शत्रुओं के सफ़ाये के रास्ते पर आगे बढ़ो, केवल तभी संघर्ष का ऊँचा ज्वार अप्रतिरोध्य रूप से आगे बढ़ सकता है” (‘सीपीआई (एमएल) लीड्स इण्डियन पीपुल ऑनवर्ड अलांग द पाथ ऑफ़ सीजिंग पावर बाइ आर्म्ड फ़ोर्स’, ‘लिबरेशन’ में पुनर्मुद्रित, III, अंक 6, अप्रैल 1970)। कहना न होगा कि इस तरह के महिमामण्डन और ”प्रमाण पत्र” ने चारु मजुमदार की वर्ग शत्रुओं के सफ़ाये की लाइन को स्थापित होने में विशेष मदद पहुँचायी। स्मरणीय है कि यही वह समय था जब चारु मजुमदार अपनी और तालमेल कमेटी की पूर्ववर्ती अवस्थिति को पलटते हुए जन संगठनों और जनान्दोलनों का खुलकर विरोध करने लगे थे और उन्हें क्रान्तिकारी संघर्षों के रास्ते की बाधा तथा संशोधनवादी प्रवृत्तियों को बढ़ावा देने वाला बताने लगे थे।

तालमेल कमेटी और फिर भाकपा (माले) विश्व परिस्थितियों का अपना आकलन भी आँख मूँदकर चीनी पार्टी के हिसाब से ही करती थीं। ऐसी स्थिति में यह स्वाभाविक था कि 1969-70 के दौर में चीनी पार्टी के विश्व-परिस्थितियों के मूल्यांकन में, दो अतिमहाशक्तियों के बीच गहराती प्रतिस्पर्द्धा, तीसरे विश्व युद्ध की सम्भावना और साम्राज्यवाद के ”अन्तिम ध्वंस” की सम्भावना के आधार पर, चन्द दशकों के भीतर विश्व सर्वहारा क्रान्ति की निर्णायक विजय की जो अतिआशावादी और अतिउत्साहवादी भविष्यवाणियाँ प्रस्तुत की जा रही थीं, उनका भारत के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन पर गम्भीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। ‘कन्फ़ेशन इन ऐन इम्पास : ए कमेण्ट ऑन निक्सन्स’ ”इनॉगरल एड्रेस” एण्ड द कण्टेम्प्टिबल एप्लॉज़ बाय द सोवियत रिवीज़निस्ट रीनिगेड क्लिक’, ‘पीकिङ रिव्यू’, अंक 5, 1969 में प्रकाशित हुआ (चीनी भाषा के पार्टी मुखपत्रों में यह पहले प्रकाशित हो चुका था)। इस लेख के अन्त में यह आश्चर्यजनक रूप से बेतुकी भविष्यवाणी की गयी थी कि तीसरी सहस्राब्दी की शुरुआत यानी वर्ष 2001 सर्वहारा क्रान्ति और मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओ विचारधारा की विश्वव्यापी विजय के शानदार उत्सव का समय होगा। यह लेख ‘लिबरेशन’ के मई 1969 अंक में भी पुनर्मुद्रित हुआ और फिर माकपा (माले) के भीतर इसी स्पिरिट और भाषा में क्रान्ति के भविष्य के बारे में बातें होने लगीं। बंगला मुखपत्र ‘घटना प्रवाह’ (दूसरा वर्ष, प्रथम अंक) ने भी अपने सम्पादकीय में लिखा कि क्रान्तिकारी चीन ने भविष्यवाणी कर दी है कि 2001 तक पूरी दुनिया में उत्पीड़ि‍त जन मुक्त हो जायेेंगे। 1969 में कलकत्ता में हुई मई दिवस रैली को सम्बोधित करते हुए कानू सान्याल ने भी इसी बात को दुहराया। ‘पीकिङ रिव्यू’ के उपरोक्त लेख का अनुवाद बंगला मुखपत्र ‘देशब्रती’ में 5 जून 1969 को प्रकाशित हुआ। इस आधार पर, एक तरह से अंकगणितीय गणना करते हुए और ठोस परिस्थितियों के ठोस विश्लेषण की मार्क्सवादी पद्धति को धता बताते हुए चारु मजुमदार ने 1970 के दशक को भारतीय जनता की मुक्ति का दशक बनाने का आह्वान कर डाला (‘लिबरेशन’, III, अंक 4, फ़रवरी 1970 में प्रकाशित लेख)। मई 1970 में पार्टी कांग्रेस में प्रस्तुत ‘राजनीतिक-सांगठनिक रिपोर्ट’ पर बोलते हुए भी उन्होंने इस बात को बल देकर दुहराया। फिर कुछ समय बाद 1975 को भारतीय क्रान्ति का वर्ष घोषित करते हुए उन्होंने चीनी भविष्यवाणी पर आधारित अपनी भविष्यवाणी के बेतुकेपन को चरम तक पहुँचा दिया। ‘लिबरेशन’, सितम्बर-दिसम्बर 1970 में प्रकाशित अपने लेख ‘मार्च ऑनवर्ड, डे ऑफ़ विक्ट्री इज़ नियर’ में उन्होंने लिखा : ”यदि यह डर (अमेरिका और सोवियत संघ द्वारा चीन पर हमले का डर) सच भी हो जायेे तो भी भारत 1975 तक मुक्त हो जायेेगा … चेयरमैन (माओ त्से-तुङ) ने भारत के 50 करोड़ लोगों के प्रचण्ड विस्फोट की सम्भावना जब देखी तभी उन्होंने घोषणा की कि मानव सभ्यता का इतिहास 2001 में एक नये युग में प्रवेश कर जायेेगा।” ज़ाहिर है यह एक अटकलबाज़ी से अधिक कुछ भी नहीं है और जो चीनी भविष्यवाणी इस अटकलबाज़ी का आधार है, वैसी कोई भी बात माओ त्से-तुङ की किसी भी टिप्पणी या वार्ता में कहीं पढ़ने को नहीं मिलती। बल्कि माओ की पहुँच इसके उलट होने के ढेरों प्रमाण मिलते हैं। ‘महान बहस’ के दस्तावेज़ ‘ख्रुश्चेव का नक़ली कम्युनिज़्म और दुनिया के लिए इसके सबक़’ में माओ के इस कथन का हवाला मिलता है कि समाजवाद की निर्णायक विजय होने में एक-दो नहीं बल्कि पाँच-दस पीढ़ि‍यों का या इससे भी अधिक समय लग सकता है। सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान, और अपने निधन के ऐन पहले तक माओ ने कई बार इस बात पर बल दिया कि चीन में और पूरी दुनिया के पैमाने पर समाजवाद की अन्तिम विजय सुनिश्चित होने में अभी काफ़ी समय लगेगा और इस दौरान लम्बे समय तक पूँजीवादी पुनर्स्थापना की सम्भावना बनी रहेगी। इसलिए तय है कि चीनी पार्टी की उपरोक्त बेतुकी भविष्यवाणी को माओ की भविष्यवाणी नहीं माना जा सकता।

1975 के वर्ष को क्रान्ति का वर्ष बनाने के उतावलेपन का नतीजा यह हुआ कि पहले से ही अधकचरे, विचारधारात्मक रूप से अपरिपक्व पार्टी नेतृत्व और क़तारों के दिमाग़ से यह बात ओझल हो गयी कि जनवादी क्रान्ति का रास्ता लोकयुद्ध का रास्ता होता है, जो दीर्घकालिक होता है। लोकयुद्ध के दौरों, चढ़ावों-उतारों और सामरिक रणनीतियों के बारे में माओ की सारी शिक्षा को ताक पर रखकर ही 1975 को क्रान्ति का वर्ष बनाया जा सकता था। इसकी एक तार्किक निष्पत्ति यह थी कि सफ़ाया अभियान को तेज़ गति से पूरे देश में चलाया जायेे, क्योंकि चारु के अनुसार, इसी के प्रभाव से जनता को उठ खड़ा होना था। इसकी जो दूसरी तार्किक निष्पत्ति थी, वह कलकत्ता में छात्रों-युवाओं के अतिवामपन्थी उभार के रूप में सामने आयी, जिसकी चर्चा पहले की जा चुकी है।

यह सही है कि चारु मजुमदार की वाम दुस्साहसवादी लाइन के पीछे यदि पूरे नेतृत्व का बड़ा हिस्सा खड़ा हो गया तो इसके बुनियादी कारण आन्तरिक ही हो सकते हैं और इसीलिए हमने निबन्ध के शुरू में ही भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन की विचारधारात्मक कमज़ोरी, उसके कारणों और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की चर्चा की है। लेकिन यह भी सही है कि चारु मजुमदार के नेतृत्व को, दो लाइनों के संघर्ष में (जिस हद तक भी उनकी लाइन का विरोध पार्टी के भीतर से और बाहर से उस समय हुआ) उनकी लाइन को आगे बढ़ाने में तथा स्थापित करने में 1969-70 के दौरान, भारतीय कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन के बारे में चीन की पार्टी के मनोगत एवं अपर्याप्त तथ्यों पर आधारित मूल्यांकनों की, भारतीय परिस्थितियों की उसकी ग़लत समझ की और तत्कालीन विश्व परिस्थितियों के आकलन में हुई कतिपय गम्भीर चूकों की एक भूमिका थी। चीनी पार्टी ने व्यवहार में, उस दौरान अपनी ही एक धारणा का किसी हद तक उल्लंघन किया कि किसी बड़ी और अनुभवी पार्टी को भी अन्तरराष्ट्रीय नेतृत्व की भूमिका निभाते हुए किसी अन्य देश की पार्टी को क्रान्ति की आम दिशा बतलाने का काम नहीं करना चाहिए। हालाँकि चीन की पार्टी के अप्रोच में इस मामले में एक क्षीण विच्युति ही थी, मुख्य ग़लती भारतीय नेतृत्व की थी, जो चीनी पार्टी के हर मूल्यांकन को अपने लिए दिशा-निर्देश समझता था।

बहरहाल, भारत के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन के सन्दर्भ में चीन की पार्टी से आकलन-मूल्यांकन सम्बन्धी उपरोक्त ऐसी गड़बडि़याँ कैसे हुईं जो स्वयं माओ द्वारा निर्दिष्ट पहुँच-पद्धति के प्रतिकूल थीं, इसके बारे में निश्चयात्मक भाषा में कोई बात करना विशुद्ध अटकलबाज़ी होगी। ज़्यादा-से-ज़्यादा, कुछ अनुमान लगाये जा सकते हैं और कुछ सम्भावनाओं की बात की जा सकती है। 1966 से 1969 तक, यानी चीनी पार्टी की नवीं कांग्रेस तक, चीन में महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति का प्रथम चक्र चला, जो एक तूफ़ानी दौर था। इस दौरान, जैसा कि किसी भी पथान्वेषी क्रान्ति के साथ होता है, अतिरेक, असन्तुलन और ग़लतियाँ भी हुईं। माओ के नेतृत्व में क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट पक्ष ने पूँजीवादी पथगामियों को शिकस्त तो दी, पर पार्टी और राज्य के भीतर हुए ध्रुवीकरण में माओ के पक्ष में कई अधकचरे वाम अतिरेकपन्थी भी आ खड़े हुए थे। और ऐसी स्थिति का लाभ कुछ करियरवादी भी उठाने की ताक में रहते ही हैं। जैसाकि बाद में पता चला, लिन प्याओ स्वयं एक वाम अतिरेकपन्थी और करियरवादी था। नवीं कांग्रेस के पहले ही उसके विरुद्ध अन्दरूनी संघर्ष की शुरुआत हो चुकी थी और 1970 के पूर्वार्द्ध तक पार्टी में उसका प्रभाव काफ़ी हद तक कम हो चुका था। इन्हीं जटिल परिस्थितियों में चीन की पार्टी के ये विचलन सामने आये थे। ग़ौरतलब है कि लिन प्याओ के लेखों में भी एक सैन्यवादी विचलन की निरन्तरता दीखती है। आश्चर्य नहीं कि उसके लेखों से चारु मजुमदार बहुत प्रभावित रहते थे।

ऐसा प्रतीत होता है कि चीन की पार्टी के नेतृत्व ने 1970 के शुरुआती महीनों से, अन्दरूनी तूफ़ान कुछ शान्त होने और चीज़ों के किसी हद तक व्यवस्थित होने के बाद भारत के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन की स्थिति का, उसके दस्तावेज़ों का और मुखपत्रों में प्रकाशित लेखों का व्यवस्थित ढंग से मूल्यांकन किया। वामपन्थी दुस्साहसवादी लाइन इस समय तक अपने बचकाने, नग्न और प्रहसनात्मक रूप में पूरे निखार पर थी और उसके बारे में नतीजे पर पहुँचना बहुत कठिन नहीं था।

सौरेन बसु की चीन यात्रा और चीनी पार्टी के बिरादराना सुझाव

मई 1970 में हुई भाकपा (माले) की पार्टी कांग्रेस के कुछ पहले से ही चीनी मीडिया में भारत के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन के बारे में आने वाली रिपोर्टों की संख्या काफ़ी कम हो गयी थी। 1970 के मध्य से ऐसी रिपोर्टों और ख़बरों का प्रसारण एवं प्रकाशन पूरी तरह से बन्द हो गया। पार्टी कांग्रेस के दस्तावेज़ भी सम्पर्क के ज़रिये चीनी पार्टी तक भेजे गये, लेकिन सन्नाटा फिर भी बरक़रार रहा। और पूछताछ करने पर यह सुझाव मिला कि पार्टी को विचार-विमर्श के लिए अपना एक प्रतिनिधिमण्डल चीन भेजना चाहिए। इसके बाद पार्टी की केन्द्रीय कमेटी ने अपना एक प्रतिनिधिमण्डल चीन भेजने का फ़ैसला लिया। प्रतिनिधिमण्डल में सौरेन बसु, सुनीति कुमार घोष और सरोज दत्त को जाना था, लेकिन कुछ अपरिहार्य तकनीकी कारणों से सुनीति कुमार घोष और सरोज दत्त का जाना सम्भव न हो सका और अकेले सौरेन बसु 25 अगस्त 1970 को पेरिस, लन्दन और अल्बानिया की राजधानी तिराना होते हुए पेइचिंग के लिए रवाना हुए।

लन्दन में 27 अगस्त से 12 सितम्बर तक रुकने के दौरान उनकी मुलाक़ात ग्रेट ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी (माले) के चेयरमैन रेज़बर्ग, वाइस-चेयरमैन बिल ऐश, पोलित ब्यूरो सदस्य रंजना ऐश और न्यूज़ीलैण्ड की कम्युनिस्ट पार्टी (माले) के चेयरमैन टेलर से हुई। इन नेताओं ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति भाकपा (माले) की निष्ठा को प्रश्नांकित करते हुए कहा कि किसी एक पार्टी की दूसरी बिरादराना पार्टी के प्रति निष्ठा नीति के तौर पर उचित नहीं है। उन्होंने शहरों में की जा रही कार्रवाइयों और सफ़ाये की लाइन की भी आलोचना की और कहा कि शहरी क्षेत्र के ‘ऐक्शन्स’ में काफ़ी क्रान्तिकारी ऊर्जा ज़ाया हो रही है। उन्होंने ‘चीन का चेयरमैन हमारा चेयरमैन’ नारे की भी कठोर आलोचना की और चारु के इस कथन के साथ भी असहमति ज़ाहिर की कि ‘जिसके हाथ वर्ग शत्रु के ख़ून से न रँगे हों, वह कम्युनिस्ट कहलाने के क़ाबिल नहीं है।’ उनका कहना था कि दुनिया की किसी भी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता के मुँह से ऐसी चलताऊ टिप्पणी नहीं सुनी गयी है। ब्रिटेन और न्यूज़ीलैण्ड के इन पार्टी नेताओं का विचार था कि भाकपा (माले) के पास देहाती इलाक़ों में किसानों के संघर्षों के अनुरूप कोई भूमि-नीति (एग्रेरियन पॉलिसी) नहीं है और क्रान्तिकारी जनता की सशस्त्र शक्तियों को ठीक से संगठित किये बिना, देहाती इलाक़ों में जो भी उपलब्धियाँ हैं, उन्हें बचाये नहीं रखा जा सकता। उन्होंने चारु मजुमदार के कुछ लेखन की विशेष तौर पर आलोचना की, जिनमें उन्होंने कहा था कि भारत में कम्युनिस्ट आन्दोलन द्वारा अब तक संघर्ष के जो भी तरीक़े विकसित किये गये हैं, वे वर्तमान युग में पूरी तरह अनुपयोगी हो चुके हैं (‘लिबरेशन’, सितम्बर 1969, पृ. 8-9) उनका कहना था कि प्रत्येक देश में जनता के संघर्षों के ज़रिये कार्यशैली का विकास होता है और भारतीय जनता ने अब तक जो कार्यशैली विकसित की है, उसे मात्र इस आधार पर सिरे से ख़ारिज नहीं किया जा सकता कि संघर्षों का नेतृत्व ग़लत नेताओं के हाथों में था। उन्होंने चारु मजुमदार की इस प्रस्थापना के साथ भी असहमति ज़ाहिर की कि पार्टी के भीतर के हर भटकाव को ‘संशोधनवाद’ माना जाना चाहिए। उनका कहना था कि भटकाव को ग़लतियों के रूप में देखा जाना चाहिए और ग़लतियाँ नेतृत्व के साथियों सहित किसी से भी हो सकती हैं। ग़लतियों को बातचीत और जाँच-पड़ताल के ज़रिये ठीक किया जा सकता है। इन नेताओं ने इस बात की भी आलोचना की कि भाकपा (माले) की नीतियों और व्यवहार में जनान्दोलन और ट्रेड यूनियन गतिविधि पूरी तरह से अनुपस्थित हैं।

बातचीत के दौरान ब्रिटेन और न्यूज़ीलैण्ड के पार्टी नेताओं ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि लगभग यही चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं के भी विचार हैं, लेकिन सौरेन बसु को इस बात पर पूरा विश्वास नहीं था। उनकी सारी शंकाओं का निवारण उस समय हो गया, जब पेइचिंग में उनकी बातचीत चाऊ एन-लाई और काङ शेङ से हुई। लन्दन से सौरेन बसु रोम और तिराना होते हुए पेइचिंग पहुँचे। तिराना में अल्बानियाई नेताओं से राजनीतिक मसलों पर उनकी कोई बात नहीं हुई और उन लोगों ने उनके पेइचिंग जाने का प्रबन्ध कर दिया। 24 सितम्बर ’70 को वह पेइचिंग पहुँचे और एक माह बाद, 29 अक्टूबर ’70 को उनकी चाऊ एन-लाई और काङ शेङ से मुलाक़ात और बातचीत हुई। बातचीत के बाद गेस्ट हाउस पहुँचकर सौरेन बसु ने मुख्य बिन्दुओं को कुछ पन्नों पर दर्ज कर लिया था (क्योंकि उन्हें पूरे नोट्स लेकर भारत वापस लौटने से मना किया गया था) और उसी आधार पर बाद में अपनी रिपोर्ट तैयार की। कुछ ही वर्षों बाद चीनी पार्टी के नेतृत्व की ओर से पूरी वार्ता का कार्यवृत्त जारी कर दिया गया, जो न केवल सौरेन बसु की रिपोर्ट की पुष्टि करता था, बल्कि उसमें पूरी बातचीत का अधिक विस्तृत ब्यौरा मौजूद था।

ढाई घण्टे की इस बातचीत की शुरुआत में चाऊ एन-लाई ने भाकपा (माले) की स्थापना, उसकी उपलब्धियों और पहली कांग्रेस के लिए बधाई दी और इसे भारतीय जनता के साथ ही अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के लिए भी एक विजय बताया। उन्होंने कहा कि चीनी जनता की पीठ पर क्रान्ति के पहले तीन पहाड़ लदे थे, जबकि भारतीय जनता की पीठ पर साम्राज्यवाद, सामन्तवाद और दलाल पूँजीवाद के साथ ही एक चौथा पहाड़ – आधुनिक संशोधनवाद भी लदा हुआ है। सोवियत संघ में जिस सामाजिक साम्राज्यवाद का उदय हुआ है, यह पुराने संशोधनवादियों से इस मायने में भिन्न है कि इसके पास राजनीतिक सत्ता और सशस्त्र बल है। इसके बाद उन्होंने भाकपा (माले) की शुरुआती सफलताओं के लिए बधाई देते हुए इसे दूसरे विश्वयुद्ध के बाद भारत में एक नयी विजय बताया।

इसके बाद चाऊ एन-लाई ने ‘चीन का चेयरमैन हमारा चेयरमैन’ नारे की गम्भीर आलोचना प्रस्तुत की और कहा कि यह एक महत्वपूर्ण उसूली सवाल है। किसी एक पार्टी के चेयरमैन को दूसरी पार्टी का नेता मानना माओ त्से-तुङ विचारधारा के विपरीत है। उन्होंने स्पष्ट  किया कि दो पार्टियों के बीच सम्बन्ध बिरादराना होते हैं और किसी एक पार्टी को अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन का नेता नहीं माना जा सकता। उन्होंने बताया कि वर्तमान परिस्थितियों में चीनी पार्टी तीसरे इण्टरनेशनल जैसे किसी अन्तरराष्ट्रीय संगठन के निर्माण के विचार का विरोध करती है। इतिहास के उदाहरणों से उन्होंने बताया कि इससे किस प्रकार ”बड़ा भार्इवाद” (”बिग ब्रदरिज़्म”) पैदा होता है, जिसे चीनी पार्टी सख़्ती से नापसन्द करती है। उनका यह भी कहना था कि किसी दूसरे देश की पार्टी के चेयरमैन को अपनी पार्टी का चेयरमैन बताना जनता की राष्ट्रीय भावनाओं को भी आहत करता है।

एक सच्ची सर्वहारा पार्टी के निर्माण की आवश्यकता के बारे में बात करते हुए चाऊ एन-लाई ने वामपन्थी दुससाहसवाद की परोक्ष आलोचना यह कहकर की कि कोई भी ऐसी पार्टी अनिवार्यत: जनदिशा का अनुपालन करती है और जनता से निकट सम्पर्क बनाये रखती है। देहातों में काम के अपने अनुभवों को बताते हुए चाऊ एन-लाई ने वर्ग-शत्रुओं की हत्या को संघर्ष की आम लाइन बनाने का विरोध किया और कहा कि ज़रूरत पड़ने पर जन समुदाय की गहरी घृणा के पात्र कुछ सामन्तों और ज़ालिमों को मारा जा सकता है, लेकिन यह जन समुदाय की माँग के आधार पर किया जाना चाहिए और इसके पहले उन पर सार्वजनिक तौर पर मुक़दमा चलाया जाना चाहिए। जब जन समुदाय पूरी तरह से लामबन्द हो जाता है और हम क्रान्ति की उपलब्धियों की हिफ़ाज़त के लिए हथियारबन्द ताक़त का इस्तेमाल करने लगते हैं तथा ज़मीन और अनाज बाँटने भी लगते हैं, तब ऐसी स्थिति में पहुँचकर किसान आबादी आपस में ज़मीन और अनाज ख़ुद बाँटने का साहस जुटा पाती है। खुले तौर पर जन समुदाय को लामबन्द करने के लिए किसी भूमि नीति (एग्रेरियन पॉलिसी) का होना ज़रूरी है, जिसे फिर पार्टी व्यवहार के ज़रिये एक भूमि कार्यक्रम (एग्रेरियन प्रोग्राम) के रूप में विकसित करती है।

अतिवामपन्थी भटकाव के अपने स्वयं के अनुभवों की चर्चा करते हुए चाऊ एन-लाई ने बताया कि पहली क्रान्ति की पराजय के बाद, चीन में भी ”वामपन्थी” भटकाव की लाइन कुछ समय के लिए पैदा हुई थी। थोड़े से लोग हथियार लेकर गाँवों में जाते थे और कुछ भूस्वामियों को मार देते थे। ऐसी कार्रवाई के पहले जनता के बीच प्रचार और लामबन्दी जैसा कोई काम नहीं होता था। कार्रवाई के बाद लोगों से उठ खड़ा होने की अपेक्षा की जाती थी और उनमें ज़ब्त अनाज बाँटने जैसे काम किये जाते थे। लेकिन जल्दी ही आसपास के गाँवों-शहरों का सैन्यबल घटना-स्थल पर पहुँच जाता था, और फिर हथियारबन्द उन्नत तत्वों को या तो भागता पड़ जाता था या फिर उन्हें गिरफ़्तार कर लिया जाता था अथवा हत्या कर दी जाती थी। ऐसे ”वामपन्थी” भटकाव के इलाक़ों में पार्टी को काफ़ी नुक़सान उठाना पड़ा। इसलिए, गाँवों में सशस्त्र संघर्ष को नेतृत्व देते समय सबसे बुनियादी मुद्दा पार्टी की राजनीतिक लाइन, उसूलों और नीतियों का होता है और यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि हमने व्यापक जनसमुदाय को लामबन्द किया है अथवा नहीं, उन पर भरोसा किया है या नहीं। इसके बिना हम अपने पैर क़तई नहीं जमा सकते।

कहने की ज़रूरत नहीं कि अपने अनुभवों की चर्चा करते हुए चाऊ एन-लाई ने वर्ग शत्रु के सफ़ाये और सभी प्रकार के जनान्दोलनों के निषेध की भाकपा (माले) की लाइन की एक स्पष्ट और दोटूक आलोचना रख दी थी। शहरी ‘ऐक्शन्स’ के बारे में भी चाऊ एन-लाई ने 1927 के अपने अनुभवों का हवाला दिया, जब वह स्वयं शंघाई में ऐसी कार्रवाइयों के इंचार्ज थे। कुछ पुलिस अधिकारियों की हत्या और ग़ैरक़ानूनी पर्चों के वितरण जैसी कार्रवाइयाँ की गयीं, लेकिन अन्ततोगत्वा नतीजा यह निकला कि यह सब कुछ विशुद्ध दुस्साहसवाद के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। उन्होंने दोटूक शब्दों में कहा कि खुले ट्रेड यूनियन कार्यों और खुले जनान्दोलनों को ”पुराना पड़ चुका” मानना और दस्ते बनाकर गुप्त तरीक़े से की जाने वाली हत्याओं को (”छापामार युद्ध” मानते हए) क्रान्ति को आगे बढ़ाने का एकमात्र रास्ता मानना ग़लत है और इस पर सोचने की ज़रूरत है। चारु मजुमदार के आत्मबलिदान के आह्वान पर परोक्ष टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि पहली बात, दुस्साहसवाद के लिए जान देना आत्म-बलिदान नहीं है, और दूसरी बात, आत्म-बलिदान के साथ-साथ यदि आत्म-परिरक्षण पर भी बराबर ध्यान न दिया जायेे, तो इससे क्रान्ति को ही नुक़सान पहुँचता है। चाऊ एन-लाई ने इस बात पर बल दिया कि जनदिशा लागू करने के साथ ही पार्टी को आलोचना-आत्मालोचना के ज़रिये अपने शुद्धीकरण की प्रक्रिया लगातार चलानी चाहिए। नेतृत्व और क़तारों के बीच इस प्रक्रिया को यदि न चलाया जायेे तो पार्टी का सही रास्ते से विचलन अवश्यम्भावी होता है।

चाऊ एन-लाई ने कहा कि शत्रु को परास्त करने के लिए पार्टी के बाद दूसरा प्रमुख अस्त्र सेना है, जनता की एक ऐसी संगठित सशस्त्र शक्ति, जो पार्टी के नेतृत्व में काम करती हो और सही नीतियों को लागू करती हो। क्रान्ति का तीसरा प्रमुख हथियार सभी क्रान्तिकारी वर्गों का संयुक्त मोर्चा है जिसका अगुवा सर्वहारा वर्ग हो तथा नेतृत्व पार्टी के हाथों में हो। चाऊ एन-लाई ने चारु मजुमदार द्वारा प्रस्तुत इस स्थापना को भी ग़लत बताया कि विभिन्न संश्रयकारी वर्गों का संयुक्त मोर्चा तभी बन सकता है जब कुछ इलाक़ों में सत्ता पर क़ब्ज़ा हो जायेे। उन्होंने बताया कि संयुक्त मोर्चे का निर्माण एक प्रक्रिया होता है। संघर्ष की विभिन्न मंजि़लों में, इसमें कुछ परिवर्तन होते रहते हैं। संयुक्त मोर्चे में उन सभी को शामिल किया जाना चाहिए जिन्हें अपने पक्ष में किया जा सके, और जिन्हें अपने पक्ष में करना सम्भव न हो उन्हें निष्क्रिय या निष्पक्ष बना दिया जाना चाहिए। इस सन्दर्भ में उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि बुर्जुआ वर्ग का ठीक से अध्ययन किया जाना चाहिए और साम्राज्यवाद से अन्तरविरोध रखने वाले राष्ट्रीय बुर्जुआ वर्ग के हिस्सों की सटीक शिनाख़्त की जानी चाहिए।

चारु एन-लाई के चले जाने के बाद काङ शेङ ने बातचीत के सिलसिले को आगे बढ़ाया। उन्होंने नक्सलबाड़ी संघर्ष की, उस संघर्ष के अन्य इलाक़ों में फैलाव की, क़तारों की बहादुरी की, भाकपा (माले) द्वारा साम्राज्यवाद और संशोधनवाद के विरुद्ध संघर्ष की, तथा सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति को दिये जाने वाले समर्थन और माओ विचारधारा के प्रति सम्मान की सराहना करते हुए कहा कि भाकपा (माले) और चीन की पार्टी बिरादर पार्टियाँ हैं, उनके रिश्ते बराबरी के हैं, इसलिए चीनी पार्टी के चेयरमैन को भारतीय पार्टी का चेयरमैन नहीं कहा जा सकता। उन्होंने कहा कि चूँकि भाकपा (माले) एक नयी पार्टी है, इसलिए इसमें कुछ कमज़ोरियों और ग़लतियों का होना स्वाभाविक है। संयुक्त मोर्चे के बारे में चारु मजुमदार की ग़लत सोच को उन्होंने भी रेखांकित किया।

‘लिबरेशन’ में प्रकाशित चारु मजुमदार के लेख ‘चाइना’ज़ चेयरमैन इज़ अवर चेयरमैन, चाइना’ज़ पाथ इज़ अवर पाथ’ को चीनी पार्टी के मुखपत्रों में प्रकाशित नहीं करने के पीछे के कारणों को स्पष्ट करते हुए उन्होंने बताया कि इस लेख में जो आपत्तिजनक है, वह इसके शीर्षक से ही स्पष्ट है। चारु मजुमदार के दूसरे लेख ‘मार्च ऑनवर्ड बाइ समिंग अप द एक्सपीरियेंस ऑफ़ द पीज़ेण्ट रिवोल्युशनरी स्ट्रगल ऑफ़ इण्डिया’ को प्रकाशित न करने का कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि इस लेख में जन संगठन, जनान्दोलन, ट्रेड यूनियन आदि के बारे में जो स्थापनाएँ दी गयी हैं, उन पर चीनी पार्टी को आपत्ति है। ‘छापामार युद्ध ही जन समुदाय को लामबन्द करने का एकमात्र रास्ता है’ – लिन प्याओ के इस उद्धरण को चारु ने अपनी लाइन के पक्ष में और जनकार्रवाइयों के निषेध के लिए एक तर्क के रूप में प्रस्तुत किया था। काङ शेङ ने स्पष्ट किया कि यह बात सामरिक सन्दर्भों में कही गयी है, युद्ध की उस मंजि़ल के सन्दर्भ में, जब दो सेनाओं की शक्ति असमान हो। उन्होंने कहा कि ‘वर्ग शत्रु के सफ़ाये’ का मतलब यदि जन समुदाय से कटे हुए गुप्त दस्तों द्वारा हत्या की कार्रवाई है, तो यह ख़तरनाक है।

काङ शेङ ने कहा कि भाकपा (माले) की आम दिशा सही है, लेकिन कुछ नीतियाँ ग़लत हैं। चीनी पार्टी के पास भूमि क्रान्ति का एक कार्यक्रम था, जिसके आधार पर उसने सत्ता-दख़ल के लिए किसानों को लामबन्द किया था। ऐसा प्रतीत होता है कि भारतीय पार्टी भूमि संघर्ष और छापामार युद्ध के बीच के सम्बन्ध के सवाल को अभी तक हल नहीं कर पायी है। उन्होंने इंगित किया कि यह सूत्रीकरण कि ‘किसान ज़मीन के लिए नहीं, बल्कि राजनीतिक सत्ता के लिए लड़ रहे हैं’ – ग़लत है, क्योंकि भूमि-क्रान्ति का सवाल और राजनीतिक सत्ता का सवाल एक-दूसरे के जुड़े हुए हैं और वे अलग नहीं किये जा सकते। जनान्दोलन और जनसंगठन छापामार युद्ध के लिए बाधा नहीं होते, बल्कि उनका न होना छापामार युद्ध के लिए बाधा होता है।

अन्त में काङ शेङ ने यह सुझाव दिया कि नीतिगत मामलों की इन सभी ग़लतियों को क़दम-ब-क़दम इस तरह ठीक किया जाना चाहिए कि पार्टी क़तारों और जन समुदाय के उत्साह को धक्का न लगे। हमें अपनी ग़लतियों को ठीक करने में अधैर्य से काम नहीं लेना चाहिए और बदलाव एक झटके से नहीं होना चाहिए।

इस बातचीत के बाद 31 अक्टूबर ’70 को सौरेन बसु पेइचिंग से रवाना हुए और शंघाई, कैण्टन, ढाका, कराची, रोम होते हुए तिराना पहुँचे। तिराना और लन्दन में कुछ दिन रुकने के बाद वह 27 नवम्बर को कलकत्ता पहुँचे। सुनीति कुमार घोष (चारु मजुमदार के गुप्त शेल्टर के प्रबन्धन की जि़म्मेदारी उन्हीं की थी) सौरेन बसु को चारु मजुमदार के शेल्टर पर ले गये। सौरेन बसु ने संक्षेप में बताया कि चीनी नेताओं ने पार्टी लाइन की क्या आलोचना रखी है! सुनीति कुमार घोष के अनुसार, बातचीत के दौरान चारु को बेहोशी का दौरा पड़ गया। फिर उन्हें कुछ दवाएँ दी गयीं और बातचीत अगली शाम के लिए टाल दी गयी। सौरेन बसु ने जब अपनी लिखित रिपोर्ट चारु मजुमदार को दी, उस समय सुनीति कुमार घोष वहाँ नहीं थे। वह पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम के हिसाब से, असीम चटर्जी से मिलने जा चुके थे।

सुनीति कुमार घोष के अनुसार, 1 या 2 दिसम्बर को वह चारु को एक शेल्टर का इन्तज़ाम करके पुरी ले गये। उस समय चारु अन्दर से इतने हिले हुए थे कि एक दिन रो भी पड़े। सुनीति कुमार घोष को विश्वास था कि चीनी पार्टी के सुझावों को चारु मजुमदार कम-से-कम पार्टी के कुछ नेतृत्वकारी कामरेडों के सामने विचार-विमर्श के लिए रखेंगे। लेकिन उन्होंने ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं रखा। 7 दिसम्बर को जब सुनीति घोष कलकत्ता लौट रहे थे तो चारु ने उन्हें एक टिप्पणी थमायी जिसमें पश्चिम बंगाल में जन मुक्ति सेना के गठन की घोषणा की गयी थी। टिप्पणी में लिखा गया था कि मागुरजान में राइफल छीनने की घटना ने स्पष्ट कर दिया है कि पश्चिम बंगाल के किसानों की जन-मुक्ति सेना का उदय हो गया है, अब से ग़रीब और भूमिहीन किसानों के सभी छापामार दस्ते पार्टी के नेतृत्व वाली जन मुक्ति सेना के ‘कण्टिन्जेण्ट्स’ होंगे और कमाण्डरों का चुनाव करने में ग़रीब और भूमिहीन किसानों को प्राथमिकता दी जायेेगी। शायद दुनिया में पहली बार इस प्रकार जन मुक्ति सेना का गठन हो रहा था। उल्लेखनीय है कि इस घोषणा के पहले चारु मजूमदार ने नेतृत्व के किसी भी साथी से बातचीत तक नहीं की थी। ‘लिबरेशन’ में इस नोट के प्रकाशन के बाद इस पर सुशीतल राय चौधुरी ने भी सवाल उठाया था, इसकी चर्चा पहले की जा चुकी है। चारु मजुमदार के बाद के निर्णयों और गतिविधियों से यह साफ़ हो गया कि चीनी सुझावों के सबके सामने आने के पहले वे अपनी लाइन को ठोस परिस्थितियों के हवाले से धीरे-धीरे बदल कर उसे ज़्यादा-से-ज़्यादा चीनी सुझावों के निकट ला देना चाह रहे थे ताकि चीनी पार्टी की आलोचनाओं से न क़तारों को अधिक झटका लगे, न ही उनके सम्मान को अधिक आँच आये। इसकी चर्चा आगे आयेगी।

सुनीति घोष के कलकत्ता लौटने के बाद सरोज दत्त ने 8 दिसम्बर ’70 की सुबह उनसे कहा कि चीनी नेता हमारी पार्टी लाइन के प्रति आलोचनात्मक रुख़ रखते हैं, यह किसी को बताना नहीं है। इसके बाद सरोज दत्त पुरी गये और उनके लौटने के बाद सौरेन बसु गये जो दिसम्बर के अन्त में चारु को कलकत्ता वापस लिवा लाये। सुनीति घोष के इम्प्रेशन के अनुसार, कलकत्ता में चारु को फिर उन्होंने उनके पुराने आत्मविश्वास के साथ पाया। सरोज दत्त और सौरेन बसु जैसे अपने और अपनी अतिवामपन्थी लाइन के उत्कट समर्थकों से बातचीत और कार्य योजना तय होने के बाद चारु अब द्वन्द्व-मुक्त हो गये थे और उनका खोया आत्मविश्वास वापस आ गया था।

इस तरह, जिस बात की सुनीति घोष को भी क़तई उम्मीद नहीं थी, चीनी पार्टी नेतृत्व के आलोचनात्मक सुझावों को चारु मजुमदार ने पार्टी के नेतृत्वकारी कामरेडों के सामने भी नहीं रखा और उसे एकदम से दबा दिया गया। यह चारु मजुमदार के राजनीतिक अवसरवाद के, एक मुक़ाम पर पहुँचकर, व्यक्तिगत अवसरवाद में परिणत हो जाने का सूचक था। इस मुक़ाम पर पहुँचकर ‘स्व’ का सवाल और आत्मप्रतिष्ठा का सवाल उनके लिए क्रान्ति और पार्टी के हित के ऊपर हो गया था।

निस्सन्देह, यदि चीनी सुझावों को तत्काल पार्टी नेतृत्व के सामने और फिर पूरी पार्टी के भीतर बहस के लिए खुला कर दिया जाता तो वाम दुस्साहसवादी भटकाव के चलते आगे के दौरों में भी, कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन को जो नुक़सान उठाने पड़े, उनसे काफ़ी हद तक बचा जा सकता था। फिर यदि जनदिशा की धारा मज़बूत होती, तो संशोधनवादी राजनीति को भी ज़्यादा सांघातिक चोट पहुँचायी जा सकती थी। पर चारु मजुमदार की एक अक्षम्य ऐतिहासिक ग़लती ने ऐसा नहीं होने दिया।

इस पूरे प्रसंग में सबसे दिलचस्प, और सवालों के घेरे में आने वाली भूमिका तो सौरेन बसु की थी। सौरेन बसु और सरोज दत्त ही वे दो व्यक्ति थे, जो इस बात की जीतोड़ कोशिश कांग्रेस के समय से ही करते आ रहे थे कि चारु को भारतीय पार्टी में ‘क्रान्तिकारी प्राधिकार’ का दर्जा दे दिया जायेे, जैसा चीनी पार्टी में माओ का था। इस बात की पीछे कुछ चर्चा आ चुकी है और आगे भी कुछ आयेगी। चीन में बातचीत के दौरान, जैसा कि सौरेन बसु ने स्वीकार किया था कि उनका सारा विश्वास जड़मूल से हिल गया था। भारत लौटकर एक ओर तो वह पूरी मुस्तैदी के साथ अपने को चारु मजुमदार के साथ खड़ा दिखा रहे थे और उन्हें यह मशविरा दे रहे थे कि चीनी सुझावों को अभी पार्टी में खुला करने की ज़रूरत नहीं है, दूसरी ओर वह ख़ुद ही इन सुझावों के बारे में पार्टी में यहाँ-वहाँ थोड़े-बहुत इशारे छोड़ते जा रहे थे।

असीम चटर्जी ने स्वयं बाद में लिखा था कि सौरेन बसु से चीनी सुझावों के बारे में जो थोड़ी-सी जानकारी मिली थी, उसने चारु मजुमदार की लाइन के विरुद्ध उनके विद्रोह में निर्णायक भूमिका निभायी थी। मार्च 1971 में गिरफ़्तारी के बाद सौरेन बसु ने जेल में मौजूद नेतृत्व के साथियों को चीनी सुझावों के बारे में तफ़सील से बताया और उन सुझावों को पूरी पार्टी के समक्ष रखकर उनके अनुरूप पार्टी लाइन में बदलाव करने की अपील करते हुए चारु को पत्र लिखने वाले आठ लोगों में भी शामिल हुए। यह चर्चा निबन्ध में आगे आयेगी।

अब यदि हम पश्चदृष्टि से देखते हुए चीनी पार्टी की आलोचना और सुझावों का मूल्यांकन करें, तो कुछ बातें ग़ौरतलब हैं। पहली बात तो वाम दुस्साहसवादी कार्यदिशा की यह आलोचना लगभग पूरी तरह सही, सटीक और सभी पक्षों को समेटने वाली थी। लेकिन उस दौर के सभी दस्तावेज़ों और इतिहास को देखने के बाद, चीनी पार्टी नेतृत्व का यह आकलन सही नहीं प्रतीत होता कि भाकपा (माले) की आम दिशा सही थी और केवल कुछ नीतियाँ ग़लत थीं। तथ्य तो यह बताते हैं कि पार्टी कांग्रेस के पहले ही, पार्टी में जनदिशा की बात करने वाली हर मुखर आवाज़ को किनारे किया जा चुका था और कांग्रेस की कार्यवाही तक से यही पता चलता है कि बचे-खुचे ढुलमुल और नरमपन्थी व्यक्तियों को ‘मैनेज’ करके पार्टी पर पूरी तरह वाम दुस्साहसवादी लाइन हावी हो चुकी थी। 1969 से ही तालमेल कमेटी और पार्टी अतिवामपन्थी लाइन को ही लागू कर रही थी। यह मार्क्सवाद से एक सुसंगत विचलन था और विचारधारात्मक-राजनीतिक लाइन का सवाल था, न कि सिर्फ़ नीतियों का सवाल था। चीनी पार्टी नेतृत्व ने इन ग़लतियों को क्रमश:, क़दम-ब-क़दम ठीक करने का सुझाव दिया, ताकि जनता और क़तारों में निराशा न फैले। इतिहास बताता है कि विचारधारात्मक ग़लतियाँ इंच-इंच करके क्रमिक प्रक्रिया में ठीक नहीं होतीं, बल्कि विचारधारात्मक रूप से ग़लत लाइन के विरुद्ध तत्क्षण संघर्ष छेड़कर, उस पर ‘फ़्रण्टल अटैक’ करके, एक झटके के साथ ही उसे परास्त या नेस्तनाबूद किया जा सकता है। विजा‍तीय प्रवृत्तियों के विरुद्ध संघर्ष में हमें लेनिन का यही अप्रोच देखने को मिलता है। ख़्रुश्चेवी संशोधनवाद के विरुद्ध एक बार संघर्ष खुला करने के बाद चीनी पार्टी ने ‘महान बहस’ के दौरान शानदार भूमिका निभायी थी, लेकिन यह भी सच है कि इस काम में उसने सात वर्षों की देरी की। इस दौरान द्विपक्षीय स्तर पर सोवियत पार्टी को समझाने का काम चलता रहा और ग़लत लाइन के साथ समझौते भी किये जाते रहे। चीनी पार्टी के भीतर के पूँजीवादी पथगामियों के विरुद्ध संघर्ष में भी कई बार यह अप्रोच दीखता है। स्थानाभाव के कारण हम इसकी तफ़सील से चर्चा नहीं कर सकते, लेकिन हमारा यह आकलन है कि चीन की पार्टी कई बार सांगठनिक हित और एकता को कमान में रखकर विचारधारात्मक और उसूली संघर्षों को भी क़दम-ब-क़दम करके लड़ने का या खुले संघर्ष में देरी करने का रुख़ अपनाती थी, जो ग़लत है। उपरोक्त सुझाव में भी इस बात की झलक दिखायी देती है।

तीसरी बात, अपने सुझावों में हालाँकि चीन की पार्टी बिरादराना थी और पार्टी लाइन विषयक निर्देश देने का उसका रवैया बिल्कुल नहीं था, लेकिन उसके कुछ मूल्यांकनों का वस्तुगत तौर पर ग़लत प्रभाव पड़ना ही था। चाऊ एन-लाई और काङ शेङ यह मानकर चल रहे थे कि भारत में चीन जैसी ही नवजनवादी क्रान्ति होनी है। सही परामर्श तो इस सम्बन्ध में यह होता कि वे भारत के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों को जनदिशा पर काम करने के साथ-साथ भारतीय समाज के उत्पादन-सम्बन्धों, वर्गीय संरचना और अधिरचना का स्वतन्त्र रूप से ठोस अध्ययन करके क्रान्ति की मंज़ि‍ल, प्रकृति और रणनीतिक वर्ग-संश्रय के बारे में नतीजे निकालने की राय देते, जैसा कि तालमेल कमेटी ने तय भी किया था। हालाँकि माओ इस बात पर विशेष बल देते थे कि हर देश के कम्युनिस्टों को अपने देश की विशिष्टताओं का अध्ययन करके क्रान्ति के स्वरूप और रास्ते के बारे में स्वयं तय करना होता है, लेकिन विशेषकर 1960 के दशक में चीन की पार्टी अक़सर इस प्रकार के अतिसामान्यीकरण का शिकार दीखती है कि एशिया-अफ़्रीका-लातिन अमेरिका के अधिकांश देशों की क्रान्ति का रास्ता चीनी क्रान्ति का ही रास्ता होगा। दुनिया-भर में 1960 और 1970 के दशक में गठित अधकचरी, अपरिपक्व माले पार्टियों ने इस बात को खींचकर वहाँ पहुँचा दिया कि क्रान्ति की मंज़ि‍ल और कार्यक्रम के सवाल को भी विचारधारा का अंग बना दिया और ऐसे हास्यास्पद सूत्रीकरण देने लगे कि जो कथित तीसरी दुनिया के देशों में नव-जनवादी क्रान्ति को नहीं मानता, वह माओ विचारधारा/माओवाद को ही नहीं मानता। बहरहाल, मूल विषय पर लौटने के लिए इस प्रसंग को भी हमें समेटकर यहीं छोड़ना होगा।

(अगले अंक में जारी)

 

दिशा सन्धान – अंक 5  (जनवरी-मार्च 2018) में प्रकाशित

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