भारतीय प्रगतिशील मनीषा के प्रतीक-पुरुष राहुल

भारतीय प्रगतिशील मनीषा के प्रतीक-पुरुष राहुल

आज हम इतिहास के जिस कठिन अँधेरे दौर से गुज़र रहे हैं, उसमें सामयिक तौर पर क्रान्ति एवं प्रगति की धारा पर विपर्यय एवं पुनरुत्थान की धारा हावी है। ऐसे समय में राहुल सांकृत्यायन जन्मशती वर्ष का आना मानो इतिहास द्वारा हमें हमारे कार्यभारों की याद दिला जाना है।

एक उत्सव-धर्म के औपचारिक निर्वाह या एक अनुष्ठान के रूप में राहुल की शत वार्षिकी मनाना आज जनता के साथ सीधे-सीधे एक विश्वासघात होगा। पुनरुत्थान और विपर्यय की काली शक्तियों से जूझने की तैयारी में यदि हम कुछ क़दम भी आगे बढ़ा सके तो यही आज राहुल के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। जनता के हितों-आकांक्षाओं के सजग प्रहरी केवल इसी रूप में अपने पुरखों को याद करते हैं और अपनी परम्परा की निरन्तरता को नूतन की सर्जना के रूप में आगे विस्तार देते हैं।

RAHULराहुल को, और उनके मिशन को चर्चा के केन्द्र में लाने की आज सर्वोपरि सार्थकता और प्रासंगिकता यही हो सकती है कि हम पूँजी की सत्ता की बर्बर होती जा रही निरंकुशता और फ़ासिज़्म की मानवद्रोही शक्तियों को जन्म देने वाली गतिरोध और जड़ता की स्थिति को एक प्रबल वेगवाही सामाजिक झंझावात द्वारा तहस-नहस कर देने की तैयारी एक नये पुनर्जागरण और अभिनव क्रान्तिकारी प्रबोधन के शंखनाद से करें। सामाजिक क्रान्तियों के एक नये चक्र के सूत्रपात के लिए जनता के वैचारिक-सांस्कृतिक सेनानियों-प्रहरियों को धार्मिक वैचारिक पुनरुत्थान, साम्प्रदायिकता, निरंकुशता और सर्वसत्तावाद से यथाशक्ति जूझने के अपने आसन्न दायित्वों को निबाहने के साथ ही वृहत्तर वैचारिक-सांस्कृतिक-सामाजिक सन्दर्भों में उनसे एक दीर्घकालिक, निर्णायक संघर्ष की मुहिम भी छेड़नी होगी। उन्हें अपनी विरासत सहेजनी होगी, अपनी परम्परा की धारा पहचाननी होगी और उसे आगे बढ़ाना होगा। राहुल यूँ तो समग्र रूप में हमारी परम्परा की एक सशक्त कड़ी हैं, पर पुनरुत्थानवाद और धार्मिक कट्टरपन्थी फ़ासिज़्म के उभार के इस दौर में वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि और भौतिकवाद के अनथक प्रचारक, तर्क और विज्ञान के उत्कट आग्रही तथा इतिहास के भौतिकवादी दृष्टिकोण के प्रबल पक्षधर के रूप में वे आज हमारे लिए विशेष तौर पर स्मरणीय हैं। राहुल के मिशन से सही मायने में अपने को जोड़ना आज जोखिम भरा रास्ता है और इस रास्ते पर निर्भीक होकर आगे बढ़ना भी हमें राहुल से ही सीखना होगा। तभी एक बार फिर “क्रान्ति की आत्मा को जागृत” किया जा सकता है।राहुल की परम्परा सतत प्रगति और प्रयोग, यथास्थिति-विरोध तथा सामाजिक-सांस्कृतिक क्रान्ति के अविरल प्रवाह एवं जनता से अटूट जुड़ाव की परम्परा है। निरन्तर गति और सतत प्रगति ही राहुल के जीवन का सारतत्त्व है। नकारात्मक परम्पराओं पर प्रचण्ड प्रहार और रूढ़िभंजन राहुल के चिन्तन का केन्द्रबिन्दु है। तर्क और विज्ञान में उनकी आस्था अटूट थी। हर तरह की शिथिलता, गतिरोध, कूपमण्डूकता, अन्धविश्वास, तर्कहीनता, यथास्थितिवाद, पुनरुत्थानवाद और अतीतोन्मुखता के वे कट्टर शत्रु थे। जन-संगऊष्मा से निरन्तर ऊर्जस्वी होते रहने की उनकी आकांक्षा उत्कट थी। शब्द और कर्म-सिद्धान्त और व्यवहार की एकता की वे प्रतिमूर्ति थे। वे एक सच्चे और निर्भीक क्रान्तिकारी बुद्धिजीवी थे। ‘भागो नहीं दुनिया को बदलो’ — यह उनके जीवन का सूत्र वाक्य था। दार्शनिक, विचारक, इतिहासकार, पुरातत्त्ववेत्ता, साहित्यकार, भाषाशास्त्री और मार्क्सवाद का प्रचारक होने के साथ ही राहुल एक लोकप्रिय जननेता भी थे। स्वाधीनता आन्दोलन और बिहार के किसानों के आन्दोलन में उन्होंने प्रत्यक्ष नेतृत्वकारी भूमिका निभायी।

वस्तुतः इस महाविद्रोही महापण्डित की ऐतिहासिक महत्ता और अर्थवत्ता के सही आकलन-मूल्यांकन का प्रश्न अभी भी अनसुलझा पड़ा हुआ है। एक सही द्वन्द्वात्मक नज़रिये के अभाव में अधिकांश प्रगतिशील आलोचकों और इतिहास के अध्येताओं ने अन्तरविरोधों-विसंगतियों और बीहड़ताओं के नाम पर या तो राहुल की पूरी तरह
उपेक्षा की या उनका निहायत एकांगी मूल्यांकन प्रस्तुत किया। इस स्थिति का लाभ उठाकर कुछ प्रतिगामी और पुरातनपन्थी शक्तियाँ भी राहुल के चिन्तन के कतिपय गौण विसंगतियों-अन्तरविरोधों से अपना उल्लू सीधा करने की चेष्टाएँ करती रही हैं।

जनता के सांस्कृतिक आन्दोलन को राहुल को हाशिये पर डाल देने की काफ़ी महँगी क़ीमत चुकानी पड़ी है।

इतिहास और भाषा विषयक राहुल की कुछ मान्यताएँ और स्थापनाएँ आज पुरानी हो सकती हैं, या उनसे हमारी असहमति हो सकती है, पर इन क्षेत्रों में उनके अवदानों और गहन, सार्थक शोध एवं गवेषणा के प्रति उनके मौलिक दृष्टिकोण एवं पद्धति की महत्ता आज भी असन्दिग्ध है। राहुल सम्भवतः पहले ऐसे भारतीय इतिहासकार थे जिन्होंने द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी दृष्टि से भारतीय इतिहास को देखने की कोशिश की।

इतिहास-लेखन उनके लिए एक अकादमिक मशक़्क़त नहीं बल्कि इतिहास को बनाने का एक साधन था। इसी दृष्टि से इतिहास-लेखन की औपनिवेशिक धारा और पाश्चात्य भारतशास्त्रियों (इण्डोलॉजिस्ट्स) के दृष्टिकोण और पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर उन्होंने इतिहास-लेखन के मौलिक ड्डोतों और भारतीय इतिहास एवं संस्कृति के जातीय आधारों की तलाश तथा सामाजिक-आर्थिक विश्लेषण के प्रयास जीवनपर्यन्त जारी रखे। इतिहास के प्रति उनका दृष्टिकोण बुर्जुआ राष्ट्रवादी धारा के इतिहासकारों से भी सर्वथा भिन्न था। प्राचीन और मध्यकालीन भारत की दार्शनिक-वैचारिक सम्पदा का ऐतिहासिक विवेचन उन्होंने अतीतोन्मुखी दृष्टि से नहीं बल्कि भौतिकवादी दृष्टि से प्रस्तुत किया और भारतीय चिन्तन-परम्म्परा की समृद्ध भौतिकवादी धारा से पूरी दुनिया को परिचित कराया।

‘जनता ही इतिहास का निर्माण करती है’ — अपनी इस एकनिष्ठ धारणा को राहुल ने साहित्य के इतिहास के क्षेत्र में भी सिद्ध किया और हिन्दी साहित्य के इतिहास में आठवीं शताब्दी से तेरहवीं शताब्दी तक के अपभ्रंश काव्य को शामिल करते हुए इसे सिद्ध-सामन्त युग का जन-साहित्य बताया। ‘हिन्दी काव्यधारा’ की भूमिका में उन्होंने यह कहकर कि कविता धरती की उपज है इसलिए उसे युग-विशेष की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में देखना होगा, आठवीं सदी से लेकर तेरहवीं सदी तक की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि प्रस्तुत की है।

अपने ऐतिहासिक उपन्यासों और कहानियों में राहुल ने “अतीत के प्रगतिशील प्रयत्नों को सामने लाकर पाठकों के हृदय में आदर्शों के प्रति प्रेरणा” पैदा करने की चेष्टा की है। ‘सिंह सेनापति’ और ‘जय यौधेय’ जैसे उपन्यासों में उन्होंने तत्कालीन उत्पादन-सम्बन्धों की बुनियाद पर खड़े सामाजिक जीवन के विविध पक्षों का चित्रण करते हुए ‘अतीत के प्रगतिशील प्रयत्नों की खोज’ ऐतिहासिक भौतिकवादी दृष्टि से की है। वाल्टर बेंजामिन ने यह सही ही कहा है कि अतीत को ऐतिहासिक ढंग से देखने का अर्थ ठीक उसी तरह देखना नहीं है जैसे वह था। राहुल की ऐतिहासिक कल्पना आलोचनात्मक विवेक से सर्वत्र आपूरित है।

‘वोल्गा से गंगा’ की कहानियाँ विश्व इतिहास की द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी समझ को साहित्य में ढालने का अनूठा प्रयास है, जिनमें आदिम कम्यूनों से लेकर पूँजीवाद के युग तक की सामाजिक-सांस्कृतिक-नैतिक-राजनीतिक विकास-प्रक्रिया की एक रूपरेखा प्रस्तुत की गयी है। इन कहानियों और राहुल की अन्य कथाकृतियों में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के मुक्त व्यवहार के चित्रण की रामविलास शर्मा ने कड़ी आलोचना की है और इसे विकृत अनैतिक इतिहास-विरोधी चित्रण बताया है। पर वास्तविकता यह है कि स्वयं रामविलास शर्मा आदिम समाज-व्यवस्था की वास्तविकता को मौजूदा युग के नैतिक मानदण्डों का अनैतिहासिक चश्मा लगाकर देखते हैं और अपनी आदत के मुताबिक़ राहुल के प्रति एक मनोविश्लेषणवादी चिकित्सक जैसा व्यवहार करते हैं।

एक ग़ौरतलब बात यह भी है कि भारतीय समाज की दुरवस्था का समाधान जब प्रेमचन्द आदर्शवादी-सुधारवादी दृष्टि से प्रस्तुत कर रहे थे, उस समय राहुल ‘बाईसवीं सदी’ का यूटोपिया रच रहे थे। भारत में यूटोपियाई उपन्यासों के लेखन के क्षेत्र में राहुल पायनियर थे। बाईसवीं सदी की उनकी कल्पना सामाजिक प्रगति सम्बन्धी उनकी विचारधारा और चिन्तन दिशा का स्पष्ट साक्ष्य है। उनके अनुसार “यह वह सदी होगी जब स्त्रियों को अधिक से अधिक अधिकार प्राप्त होंगे, प्रगतिविरोधी रूढ़िपोषक मज़हब दृश्य से ग़ायब होंगे, धनिकों के लिए जगह न होगी, भंगी जैसी जाति का कलंक मिट चुका होगा। और सबसे महत्त्वपूर्ण यह कि वस्तुओं का मूल्य राष्ट्रीय आवश्यकता की दृष्टि से आँका जायेगा। व्यक्तिगत स्वामित्व ख़त्म हो चुका होगा। न होंगे वकील, मुख्तार, बैरिस्टर, न होंगे भिखमंगे, पण्डे, वेश्याएँ। न होंगे खि़दमतगार या आका। तिलक-दहेज, नाच-तमाशा न होंगे। न होंगे देवताओं-वीरों के चमत्कार। न होगा जातिभेद या रंगभेद।”

ऐतिहासिक कथाओं के कल्पना-प्रधान संगठन में राहुल की केन्द्रीय चिन्ता यही है कि सदियों पुराने गतिरोध, कूपमण्डूकता और सामाजिक बुराइयों से मुक्त होकर भारतीय समाज प्रगति पथ पर किस प्रकार आगे बढ़ेगा। कला राहुल की पहली चिन्ता नहीं थी। साहित्य की सोद्देश्यता और विचारधारा को ढँकने के लिए उन्होंने कभी किसी आवरण की ज़रूरत नहीं महसूस की। उन्हीं के शब्दों में, “मेरे उपन्यासों या कहानियों में प्रोपेगेण्डा के तत्त्व को ढूँढ़ने के लिए बहुत प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उनके लिखने में मेरा उद्देश्य ही है — कुछ आदर्शों की ओर पाठकों को प्रेरित करना। अगर यह उद्देश्य मेरे सामने नहीं रहता तो मैं शायद कहानी या उपन्यास लिखता ही नहीं, इसलिए जिसे मेरे दोस्त प्रोपेगेण्डा कहते हैं उसे मैं अपनी मजबूरी मानता हूँ।”

राहुल साहित्य की ऐतिहासिक महत्ता को प्रस्तरीकृत एकायामी कलात्मक मानदण्डों से नहीं परखा जा सकता। यह ध्यान रखना होगा कि औपनिवेशिक भारत के जिस समाज में राहुल समाजवादी यथार्थवाद की दिशा में सतत यात्रा कर रहे थे, उस यात्रा की पूर्ववर्ती कड़ियों के रूप में यूरोप या उन्नीसवीं सदी के रूस के क्रान्तिकारी यथार्थवादी साहित्य जैसी कोई सशक्त परम्परा मौजूद नहीं थी। दूसरे, कलात्मक आग्रह पर राहुल का ज़ोर कभी भी नहीं था, पर फिर भी जीवन और संघर्ष के आन्तरिक सौन्दर्य का जो चित्रण उन्होंने प्रस्तुत किया, उन्हें वैज्ञानिक दृष्टि ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और नये लोकोन्मुख सौन्दर्यशास्त्र के बिना समझा नहीं जा सकता।
वस्तुतः कई मायनों में राहुल हिन्दी के पायनियर लेखक थे। उनकी आत्मकथा ‘मेरी जीवन यात्रा’ सोद्देश्यता, यथार्थवादी दृष्टि और आत्मावलोकन की निर्भीकता की दृष्टि से इस विधा को हिन्दी में रचनात्मक साहित्य के रूप में मान्यता दिलाने वाली सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कृति है। उनके द्वारा लिखी गयी मार्क्स, लेनिन, स्तालिन और माओ की जीवनियाँ इतिहास और साहित्य दोनों ही अनुशासनों की अनन्य कृतियाँ हैं, जिन्होंने सर्वहारा क्रान्तियों के आदर्श, विचारधारा और इतिहास से एक पूरी पीढ़ी को परिचित कराया। अपने कई समकालीन भारतीय क्रान्तिकारियों की जीवनियाँ भी उन्होंने इसी दृष्टिकोण से लिखीं।

राहुल की अन्वेषी वृत्ति सतत गतिशीलता से अविभाज्यतः जुड़ी थी।

कूपमण्डूकता के वे कट्टर शत्रु थे। हमारे यहाँ धार्मिक संकीर्णतावाद घुमक्कड़ वृत्ति का कट्टर विरोधी रहा है। राहुल की दृष्टि में घुमक्कड़ दुनिया की विभूति इसलिए है कि वह दुनिया को बनाने वाला, बदलने वाला और आगे ले जाना वाला है। उनके अनुसार, “घुमक्कड़ों के काफ़िले न आते-जाते तो सुस्त मानव जातियाँ सो जातीं और पशु से ऊपर नहीं उठ पातीं।”

भाषा के प्रति अपने विचारों में किंचित विसंगतियों के बावजूद, सर्वप्रमुख बात यह है कि राहुल जनता को भाषा की निर्मात्री शक्ति मानते थे। भोजपुरी, ब्रज, अवधी, मागधी, कौरवी, मैथिली आदि को उन्होंने लोकभाषा की संज्ञा दी और इनके विकास को हिन्दी के विकास के लिए बाधक नहीं बल्कि उसके लिए आवश्यक बताया।

अंग्रेज़ी की औपनिवेशिक विरासत के वे कट्टर विरोधी थे और इसे राष्ट्रभाषा बनाने की सोच को दासता के अभिशाप का अवशेष मानते थे। भारत की राष्ट्रभाषा और सम्पर्क भाषा की जटिल समस्या पर सोचते हुए बहुराष्ट्रीय बहुभाषी सोवियत समाज से सादृश्य-निरूपण करते हुए और हिन्दी को रूसी भाषा की जगह रखकर देखते हुए ही सम्भवतः राहुल हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की सोच पर और फिर संस्कृतनिष्ठ हिन्दी और देवनागरी लिपि के समर्थन की अवस्थिति तक पहुँचे थे। पर राहुल ने भाषा-समस्या के जल्दबाज़ी से हल ढूँढ़ने की प्रक्रिया में इन तथ्यों की अनदेखी की कि (एक) बहुभाषी बहुराष्ट्रीय देश में सम्पर्क भाषा या राष्ट्रभाषा की समस्या आनन-फानन में या ऊपर से हल नहीं की जा सकती, (दो) एक बहुभाषी बहुराष्ट्रीय देश में बुर्जुआ शासक वर्ग इस समस्या को क़तई नहीं हल कर सकता, अतः सोवियत समाजवादी समाज के उदाहरण को भारत में लागू नहीं किया जा सकता। भाषा के बारे में अपनी त्रुटिपूर्ण अवस्थिति के बावजूद राहुल भाषिक कट्टरता या हिन्दी उन्माद के शिकार नहीं थे। सभी भारतीय भाषाओं के विकास के प्रति उनका आग्रह प्रबल था तथा अल्पसंख्यकों की भाषा और संस्कृति की रक्षा के प्रति वे केवल सहमत ही नहीं थे, बल्कि इस दिशा में उनके विचार बहुत ही संयत और स्पष्ट थे।
दुनिया की सर्वाधिक उन्नत संस्कृतियों से परिचित राहुल आम भारतीय जन को कभी नहीं भूले। आम लोगों को अपनी जीवन-स्थितियों के विरुद्ध बग़ावत के लिए उठ खड़े होने को प्रेरित करने की दिशा में ही उनका रचना कर्म पूरी तरह निर्देशित था, जिसका एक आयाम यह था कि उन्होंने “लोक की भाखा” में ‘दिमाग़ी ग़ुलामी’ ‘तुम्हारी क्षय’, ‘भागो नहीं दुनिया को बदलो’ और ‘साम्यवाद ही क्यों’ जैसी कृतियाँ रचीं और भोजपुरी में भी कई नाटक लिखकर एकदम आम लोगों तक राजनीतिक सन्देश और नयी सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना के आलोक
को पहुँचाने की कोशिश की।

कुल मिलाकर, अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से राहुल सांकृत्यायन एक पथान्वेषी और प्रवृत्ति-निर्माता थे। उन्होंने इतना कुछ नया लिखा, इतने अधिक नये-नये क्षेत्रों में काम किया, इतना अधिक काम किया और इतनी अधिक रफ़्तार से काम किया कि उनके चिन्तन में कहीं एकांगीपन, अभिव्यक्ति में अनगढ़ता और सपाटता तथा पूरी
विचार-सरणि में कतिपय अन्तरविरोधों-विसंगतियों का होना सहज-स्वाभाविक प्रतीत होता है। राहुल का आवेगमय-उद्विग्न व्यक्तित्व तेज़ गति से आगे बढ़ता निरन्तर दो छोरों की अतियों की ओर झुकता और फिर सन्तुलन तलाशता प्रतीत होता है। वह उनके प्रयोगधर्म की अभिलाक्षणिकता है। आधिभौतिक ढंग से अपने नायकों-महापुरुषों को देवत्व की महिमा से मण्डित करने वाले जो आलोचक और इतिहास के अध्येता राहुल की इस सहजता को समझ और पचा नहीं पाते, वे प्रायः अकादमिक खण्डन-मण्डनात्मक आकलन करने लगते हैं और “महापुरुषों के कान का मैल” इकट्ठा करने में तल्लीन हो जाते हैं।

कतिपय विसंगतियों के नाम पर राहुल के ऐतिहासिक महत्त्व की उपेक्षा ख़ासतौर पर आज बहुत ही घातक है, क्योंकि जो राहुल के जीवन और कृतित्व का केन्द्रीय तत्त्व है — उसे आज के समय में आत्मसात करना एक नये क्रान्तिकारी बौद्धिक-सांस्कृतिक आन्दोलन के सूत्रपात की बुनियादी शर्त है। राहुल इतिहास के एक ऐसे संक्रमण-काल के साक्षी थे, जब राष्ट्रीय आन्दोलन की मुख्यधारा की सीमाएँ क्रमशः ज़्यादा से ज़्यादा स्पष्ट होती जा रही थीं। इस प्रक्रिया को राहुल ने समझा और राष्ट्रीय जागरण से आगे बढ़कर उन्होंने मेहनतकश अवाम की अगुवाई में एक नये सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन का स्वप्न देखा और एक नये तूफ़ान के आवाहन के गीत गाये। सर्वथा नये सन्दर्भों में उन्होंने एक नये जनवादी और आलोचनात्मक विवेक की पुनर्प्रतिष्ठा की।

आज जब सर्वग्रासी संकट से ग्रस्त हमारा समाज गहरी निराशा, गतिरोध और जड़ता के अँधेरे गर्त में पड़ा हुआ है, जहाँ पुरातनपन्थी मूल्यों-मान्यताओं और रूढ़ियों के कीड़े बिलबिला रहे हैं, तो हमें सर्वोपरि तौर पर राहुल के उग्र रूढ़िभंजक, साहसिक और आवेगमय प्रयोगधर्मा व्यक्तित्व से प्रेरणा लेने की ज़रूरत है। आज हमें राहुल की वैज्ञानिक-जीवनदृष्टि के अथक प्रचारक व्यक्तित्व से सीखने की ज़रूरत है, उनकी लोकोन्मुख तर्कपरकता से सीखने की ज़रूरत है, उनके जैसे सकर्मक इतिहास-बोध से लैस होने की ज़रूरत है और सिद्धान्त और व्यवहार में वैसी ही एकता क़ायम करने की ज़रूरत है। आज जिस नये क्रान्तिकारी पुनर्जागरण और प्रबोधन की ज़रूरत है, उसकी तैयारी करते हुए राहुल जैसे इतिहास-पुरुष का व्यक्तित्व हमारे मानस को सर्वाधिक आन्दोलित करता है।

वर्तमान कठिन चुनौतियों के जोखिम भरे पथ पर निष्कम्प-निर्भीक क़दमों से चलना भी हमें राहुल से ही सीखना होगा।

दायित्वबोध, वर्ष 2, अंक 6-7, मार्च-जून 1993

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