विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन : इतिहास, समस्याएं व चुनौतियां

सोवियत संघ में समाजवादी प्रयोगों के अनुभवः इतिहास और सिद्धान्त की समस्याएँ (पहली किस्त)

सोवियत समाजवादी प्रयोगों की नये सिरे से व्याख्या क्यों? बहुत से समकालीन विचारक, जैसे कि नववामपन्थी व उत्तर-मार्क्सवादी चिन्तक, सोवियत समाजवाद को इतिहास को हमेशा के लिए बन्द हो चुका अध्याय मानते हैं; कुछ अन्य सोवियत समाजवाद को एक दुर्गति/विपदा में समाप्त हुए प्रयोग के रूप में ख़ारिज कर देते हैं और 21वीं सदी में नये किस्म के समाजवाद/कम्युनिज़्म की बात कर रहे हैं। उनका मानना है कि सोवियत संघ के समाजवाद का ज़िक्र भर करने से नयी सदी की कम्युनिस्ट परियोजनाएँ दूषित हो जायेंगी! ऐसे सट्टेबाज़, नववामपन्थी और उत्तर-मार्क्सवादी विचारकों व दार्शनिकों को छोड़ भी दिया जाय, तो मज़दूर आन्दोलन और कम्युनिस्ट आन्दोलन के भीतर ही ऐसी प्रवृत्तियाँ मौजूद हैं, जो सोवियत समाजवाद के आलोचनात्मक विवेचन की ज़रूरत को नहीं मानती हैं, या फिर इसे एक हल हो चुका प्रश्न मानती हैं। जो सोवियत समाजवाद के प्रयोगों के विश्लेषण को एक हल हो चुका प्रश्न मानते हैं, उनमें दो किस्म के लोग हैं। read more

सर्वहारा अधिनायकत्व के बारे में चुने हुए उद्धरण / लेनिन

जो लोग केवल वर्ग संघर्ष को मानते हैं, वे अभी मार्क्सवादी नहीं है, वे सम्भवत: अभी बुर्जुआ चिन्तन और बुर्जुआ राजनीतिक के दायरे में ही चक्कर काट रहे हैं। मार्क्सवाद को वर्ग संघर्ष के सिद्धान्त तक ही सीमित करने के मानी हैं मार्क्सवाद की काट–छाँट करना, उसको तोड़ना–मरोड़ना, उसे एक ऐसी चीज़ बना देना, जो बुर्जुआ वर्ग को मान्य हो। मार्क्सवादी केवल वही है, जो वर्ग संघर्ष की मान्यता को सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व की मान्यता तक ले जाता है। मार्क्सवादी और एक साधारण छोटे (और बड़े) बुर्जुआ के बीच सबसे गम्भीर अन्तर यही है। यही वह कसौटी है जिस पर मार्क्सवाद की वास्तविक समझ और मान्यता की परीक्षा की जानी चाहिए।

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स्तालिन – बीसवीं शताब्दी के महानतम व्यक्तित्व / लूडो मार्टेन्स

‘‘स्तालिन बीसवीं शताब्दी के महानतम व्यक्तित्व थे, एक महानतम राजनीतिक प्रतिभा’’ ऐसा कहा था भूतपूर्व सोवियत विरोधी अलेक्सांद्र जिनोविएव ने। उसके शब्दों में, ‘‘मैं सत्रह वर्ष की आयु में ही पक्का स्तालिन विरोधी बन चुका था – स्तालिन की हत्या का विचार मेरी सोच और भावनाओं में घर कर चुका था…हमने हमले की तकनीकी संभावनाओं का अध्‍ययन किया और यहां तक कि उसका अभ्यास भी किया। यदि उन्होंने 1939 में ही मुझे मृत्युदण्ड दे दिया होता तो उनका निर्णय न्यायसंगत होता। जब स्तालिन जीवित थे तो मैं चीजों को भिन्न नजरिए से देखता था, परन्तु अब, जबकि मैं इस सदी को पीछे मुड़कर देखता हूं, मैं यह कह सकता हूं कि स्तालिन इस सदी के महानतम व्यक्तित्व थे, महानतम राजनीतिक प्रतिभा।’’

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Stalin- Greatest Individual of the Twentieth Century

“Stalin was the greatest individual of the Twentieth century, the greatest political genius” So spoke the ex-Soviet dissident, Alexander Zinoviev in 1993: “I was already a confirmed anti-Stalinist at the age of seventeen… The idea of killing Stalin filled my thoughts and feelings… We studied the ‘technical’ possibilities of an attack… We even practised. If they had condemned me to death in 1939, their decision would have been just…When Stalin was alive, I saw things differently, but as I look back over this century, I can state that Stalin was the greatest individual of this century, the greatest political genius.”

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आज के समय में कम्युनिस्ट घोषणापत्र: आज भी सही, आज भी खतरनाक, आज भी नाउम्मीदों की उम्मीद

कम्युनिस्ट घोषणापत्र ने इतिहास का एक विराट दृश्यपटल मेरे सामने उपस्थित किया और इसमें न केवल अतीत का विश्लेषण था वरन् यह उस भविष्य के बारे में भी बात करता था, समाज जिस दिशा में अग्रसर है। घोषणापत्र का यह दो टूक नजरिया बेहद प्रभावशाली था। यह वाक्यांश मेरी स्मृतियों में बैठा हुआ है – ‘‘परिवार और शिक्षा के बारे में बुर्जुआ वर्ग का गला फाड़कर चिल्लाना।’’ मैं उस समय 19 वर्ष का था और मुझे यह बहुत भाया। और मार्क्स उस समय सिर्फ 29 वर्ष के थे, जब उन्होंने इसे लिखा। read more

बच्चों की सामूहिक देखभाल ने औरतों को किस तरह आजाद किया

‘बच्चों की देखभाल कौन करे’ यह प्रश्न स्त्रियों और पुरुषों के बीच एक बड़ा मुद्दा बना रहता है। कुछ स्त्रियां चाहती हैं कि उनके पति घर के कामों और बच्चों की देखभाल में और अधिक से अधिक जिम्मेदारी उठायें। इस प्रकार एक अन्तहीन संघर्ष चलता रहता है। दुनिया भर की औरतें इस स्थिति से निपटने की राह ढूंढ़ रही हैं। गरीब स्त्रियां महसूस करती हैं कि न्यूनतम मजदूरी पर उन्हें कोई काम मिलता भी है तो बच्चों की देखभाल इस नौकरी की इजाजत उन्हें नहीं देती। और बहुत सी नौजवान औरतों को तो इसके लिए अपनी मां पर निर्भर रहना पड़ता है। मध्य वर्ग की औरतें अपने बच्चों की देखभाल के लिए ऐसी आयाओं की नियुक्ति करती हैं जो ज्यादातर आप्रवासी होती हैं और बहुत कम वेतन पर बिना किसी लाभ के काम करने को विवश होती हैं। और हम ज्यादा से ज्यादा यही सुनते आ रहे हैं कि कोई स्त्री, चाहे कितना ही जरूरी काम उसके पास क्यों न हो, ‘सबसे पहले वह एक मां होती है। यह परिस्थितियां वाकई पागल बना देने वाली होती हैं। read more

How Collective Childcare Liberated Women

This division of labor in society oppresses women. It keeps many women isolated in the home where housework and childcare numb the mind and exhaust the body. And it puts a lot of restrictions on what women can do with their lives and how much they can participate in the revolutionary struggle. A woman who has to spend a large part of her life raising and taking care of children isn’t free to fully contribute to society. And until this oppressive division of labor is gotten rid of, woman cannot be liberated. read more

माओकालीन चीन में मार्क्सवाद / जार्ज थामसन

माओ पूंजीवाद के समर्थकों और मार्क्सवाद के संशोधनकर्ताओं के विरुद्ध, जिस बात की जोरदार ढंग से हिमायत करते हैं वह मानवतावाद की भूमिका ही है जो सामाजिक विकास में अदा की जानी है – लेकिन यह उदार मानवतावाद नहीं है जो यह मानकर चलता है कि हरेक सवाल के दो पक्ष होते हैं, बल्कि यह क्रान्तिकारी मानवतवावाद है जो उत्पीड़ितों के पक्ष में खड़ा होकर, हमारे समय की महान ऐतिहासिक घटनाओं का स्वरूप निर्धारित कर रहा है। जहां कुछ लोग इस भ्रम में हैं कि गरीब देशों के आर्थिक विकास के लिए बाहर से भौतिक सहायता जरूरी है, वहीं माओ हमें बताते हैं कि देश की सम्पदा तो उसकी जनता होती है जो, एक बार साम्राज्यवादी प्रभुत्व के चंगुल से मुक्ति पा लेने के बाद, स्वयं अपनी गरीबी का अन्त कर सकती है। read more

कैसे पहुंची पेरिस कम्यून की चिंगारी चियापास की पहाड़ियों में

कम्यून के लाल झण्डे की तरह लाल कमरबन्द और लाल स्कार्फ़ पहने कम्यून की स्त्रियां बुर्जुआ हलकों में कुख्यात थीं। दुश्मन सैनिकों की बढ़त रोकने के लिए केरोसिन से लैस उनके दस्ते जगह-जगह आग लगा देते थे। जब वर्साय की सेनाओं ने पेरिस पर फि़र कब्जा कर लिया तो बड़ी तादाद में स्त्रियों को फ़ायरिंग स्क्वाड के सामने भेजा गया। शहरी गरीब वर्ग की कोई भी स्त्री टोकरी या बोतल लिए हुए दिख गयी तो उसे ‘फ़ूंक-ताप दस्ते’ की सदस्य मानकर फ़ौरन गोली मार दी जाती थी। read more