फासीवाद

राजसमन्द हत्याकाण्ड और भारतीय फ़ासीवाद का चरित्र

राजसमन्द हत्याकाण्ड और भारतीय फ़ासीवाद का चरित्र

  • शिवानी कौल

आज जबकि भारत के वामपन्थी, ख़ास तौर पर संसदीय वाम, अभी भी फ़ासीवाद के होने न होने या अपने “असली” रूप में आने न आने को लेकर बहस करने में व्यस्त हैं, उसी वक़्त फ़ासीवाद के आगमन की पुनःघोषणा करता हुआ एक राजसमन्द घटित होता है जो किसी सोये हुए इंसान की भी अन्तरात्मा को झकझोर देने के लिए काफ़ी है। राजसमन्द का जघन्य हत्याकाण्ड फ़ासीवाद के घिनौने चेहरे और फ़ासीवादी विचारधारा द्वारा रचे खेल की ही झलक मात्र है। जैसा कि अब सब जानते हैं, इस साल के दिसम्बर माह की शुरुआत में राजस्थान के राजसमन्द जि़ले में मोहम्मद अफराज़ुल नाम के पश्चिम बंगाल के मालदा जि़ले से आये अप्रवासी मज़दूर की शम्भूलाल रैगर द्वारा ‘लव जिहाद’ के नाम पर निर्मम तरीक़े से कुल्हाड़ी से हमले के बाद जि़न्दा जलाकर हत्या कर दी गयी थी। इतना ही नहीं, शम्भूलाल ने इस बर्बर हत्या की अपने 14 साल के भतीजे से बाकायदा रिकॉर्डिंग भी करवायी थी।

इसके बाद रैगर ने इस वीडियो को अन्य वीडियो के साथ, जिनमें कि वह खुलेआम मुसलमानों के ख़ि‍लाफ़ ज़हर उगलते हुए तथा ऐसे ही और हत्याकाण्डों को अंजाम देने की धमकी देते हुए नज़र आता है, इण्टरनेट पर अपलोड कर दिया। यह अनायास नहीं कि इस पूरे हत्याकाण्ड के लिए रैगर ने 6 दिसम्बर का दिन चुना, यानी बाबरी मस्जिद के ध्वंस की बरसी, जिसे भारत में फ़ासीवादी ताक़तें “शौर्य दिवस” के रूप में मनाती हैं। दिलचस्प बात तो यह है कि राजस्थान पुलिस ने शम्भूलाल को “दिमाग़ी तौर पर असन्तुलित”, “विक्षिप्त  हत्यारा” और “स्वनिर्मित हिन्दू-उन्मादी” आदि घोषित कर दिया जिसका अतीत में किसी भी तरह के हिन्दूवादी दक्षिणपन्थी संगठन से कोई सम्बन्ध नहीं रहा है। हालाँकि यह स्पष्ट है कि ऐसे जघन्य कांड किसी “मनोविकृत व्यक्तित्व”, या “विक्षिप्त-उन्मादी” के ख़ुद के दिमाग़ की उपज नहीं है बल्कि यह फ़ासीवादी ताक़तों द्वारा सामाजिक ताने-बाने के निरन्तर जारी फ़ासीवादीकरण की एक हिंसक अभिव्यक्ति है।

राजसमन्द हत्याकाण्ड कोई अकेली ऐसी घटना नहीं है और न ही “पागलपन” या “फ़ि‍तूर” क़रार देकर इसे खारिज किया जा सकता है। हाल की एक रिपोर्ट के अनुसार, मई 2014 से भाजपा और नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आने के बाद के साढ़े तीन सालों में घृणा-अपराधों, विशेषकर मुसलमानों के ख़िलाफ़, हिंसा की  वारदातों तथा आतंकी घटनाओं में, अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी देखी गयी है। हिन्दुत्व फ़ासीवाद के सत्ता में आने के बाद “गौ-रक्षा”, “गौ-मांस”, “लव-जिहाद”, “घर-वापसी” के नाम पर मॉब लिंचिंग (भीड़ द्वारा हत्या) और हिंसा की घटनाओं की जो बाढ़-सी आयी है, उन्हें निरन्तरता में ही देखा जाना चाहिए। अभी राजसमन्द की घटना को ज़्यादा वक़्त हुआ भी नहीं था कि साम्प्रदायिक फ़ासीवाद की एक और प्रयोगशाला, मध्य प्रदेश, में फ़ासीवादी हिंसा का दूसरा स्वांग रचा जाता है। सतना जि़ले में बजरंग दल के गुंडों ने क्रिसमस कैरोल गा रहे ईसाइयों पर हमला किया और एक पादरी की गाड़ी को भी जलाकर राख कर दिया। इसके बाद मध्य प्रदेश की पुलिस ने अपने असली चरित्र का प्रदर्शन करते हुए बजरंग दल के हमलावरों के ख़ि‍लाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की और उलटे कैरोल-गायकों के ख़ि‍लाफ़ ही केस बना डाला!

पुलिस के इस तर्क के यहाँ कोई मायने नहीं कि शम्भूलाल किसी दक्षिणपन्थी-हिन्दूवादी संगठन के सम्पर्क में नहीं था। हालाँकि ऐसे काफ़ी तथ्य मौजूद हैं जो स्पष्ट रूप से इंगित करते हैं कि रैगर सोशल मीडिया, ख़ास तौर पर व्हाट्सएप्प ग्रुपों, पर फैलाये जा रहे फासिस्ट कचरे से ही लगातार अपनी मानसिक खुराक ले रहा था। इन ग्रुपों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से संघ से जुड़े लोगों के तथा भाजपा नेताओं के भड़काऊ भाषण फैलाये गये थे जिन्हें स्वयं रैगर ने भी अपने वीडियो में दोहराया है। आज के दौर में फासिस्ट बनने के लिए सिर्फ़ ‘शाखा’ जाने की ज़रूरत नहीं है! आज शाखाएँ सुनियोजित तरीक़े से सोशल मीडिया पर चलायी जा रही हैं जहाँ पर शाखाओं का पाठ और भी व्यापक पैमाने पर पढ़ाया जा रहा है। भाजपा नेताओं का इन ग्रुपों में शामिल होना आख़िर और क्या साबित करता है? अलग-अलग मीडिया रिपोर्टों के अनुसार रैगर के द्वारा इस घिनौने अपराध को अंजाम देने से चन्द दिनों पहले इस इलाक़े में बजरंग दल द्वारा “लव जिहाद” पर एक पर्चा भी बाँटा गया था।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके अन्य अनुषंगी संगठनों, जो अनिवार्यतः संघ से न भी जुड़े हों, का नेटवर्क लम्बे अरसे से जनता के बीच फ़ासीवादी विचारधारा को निरन्तरता से फैलाने में और उसकी जड़ें गहरी करने में काफ़ी हद तक सफल रहा है। संघ अपने फ़ासीवादी प्रचार को अपने विशाल संस्थागत नेटवर्क के द्वारा न सिर्फ़ पिछले साढ़े तीन सालों से बल्कि 1925 से, यानी अपने जन्मकाल से ही, और ख़ास तौर पर 1980 के दशक से निरन्तरता के साथ अंजाम देता आ रहा है। फ़ासीवादी विचारधारा के लिए सबसे उपजाऊ ज़मीन समाज के टटपुँजिया वर्ग (पेटी-बुर्जुआ) और लम्पट तत्वों के बीच होती है जो आर्थिक मन्दी के दौर में सब कुछ छिन जाने के डर और अनिश्चितता के ख़तरे में जीते हैं। इसलिये यह कहा जा सकता है कि फ़ासीवादी सामाजिक आन्दोलन का उभार पेटी-बुर्जुआ तबके का “रूमानी उभार” है, जो अपनी वर्ग अवस्थिति के कारण स्वतःस्फूर्त ढंग से फ़ासीवादी प्रतिक्रियावाद की तरफ आकर्षित होता है। यह तथ्य भी ग़ौर करने लायक है कि शम्भूलाल रैगर पिछले एक साल से अपने धन्धे के पिट जाने के बाद से बेरोज़गार था। इसलिए, शम्भूलाल रैगर जैसे लोग फ़ासीवादी तन्त्र के लिए सबसे उपयुक्त पैदल सैनिक साबित होते हैं।

भारत में एक तबका, ख़ास कर वे जो बुर्जुआ लोकतन्त्र के बारे में उदार-बुर्जुआ भ्रम के शिकार हैं, सामाजिक क्षेत्र में हिंसा के सामान्यीकरण (‘नॉर्मलाइजे़शन’) से सकते में आ गये हैं। इतिहास का सबक़ है कि जहाँ कहीं भी फ़ासीवाद सत्ता में आया है, वहाँ पर सड़कों पर हिंसा उसका एक अनन्य हिस्सा रहा है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सड़कों पर हो रही हिंसा के साथ ही फ़ौज, पुलिस, नौकरशाही, न्यायतन्त्र आदि में भी फासिस्ट काडरों की घुसपैठ करायी जाती है। यही आज भारतीय फ़ासीवाद की भी सच्चाई है। आज भारत में खुलेआम ताण्डव मचा रहा फ़ासीवाद भी किसी “आदिमवाद” या “क़बीलावाद” (“ट्राइबलिज़्म”) का रूप नहीं है जैसा कि उदारतावादी सोचने की ग़लती करते हैं, बल्कि यही फ़ासीवाद की “आधुनिक” विचारधारा की काम करने की तकनीक है। पेटी-बुर्जुआ प्रतिक्रिया के विभिन्न रूपों को एकीकृत करने के लिए किसी ‘अन्य’ के रूप में काल्पनिक शत्रु की आकृति खड़ी की जाती है। भारत के साम्प्रदायिक फ़ासीवाद के लिए यह ‘अन्य’ मुसलमान हैं। हालाँकि, ज़ल्द ही फ़ासीवाद द्वारा ‘अन्य’ बनाने की इस प्रक्रिया में समग्र राजनीतिक विरोध को अपनी ज़द में ले लिया जाता है।

यहाँ इस बात का भी उल्लेख ज़रूरी है कि भारत में साम्प्रदायिक फ़ासीवादी काफ़ी हद तक दलितों और आदिवासियों के फ़ासीवादीकरण में तथा “हिन्दू” अस्मिता के इर्द-गिर्द विचारधारात्मक एकता के निर्माण में सफल रहे हैं। हिन्दुत्व-फासिस्टों की प्रयोगशाला गुजरात इसी का एक उदाहरण है जहाँ फ़ासीवादी ताक़तों द्वारा दलितों की एक बड़ी आबादी को सहयोजित कर लिया गया है। 2002 के गुजरात दंगों में दंगाइयों की भीड़ में दलित और आदिवासी बड़ी संख्या में शामिल थे। शम्भुलाल ख़ुद दलित समुदाय की ‘रैगर’ जाति से आता है। हिन्दुत्व-फ़ासीवादी कथानक में दलितों और आदिवासियों को हिन्दू-शूरवीरों, धार्मिक-योद्धाओं के रूप में महिमामण्डित किया जाता है, जिस रूप में शम्भूलाल भी ख़ुद को पेश कर रहा है। ऐतिहासिक तथ्यों का विकृतीकरण कर दलितों और आदिवासियों की पिछड़ी अवस्था के लिए मुसलमानों को जि़म्मेदार ठहराया जाता है। यहाँ यह बात रेखांकित किये जाने की ज़रूरत है कि यह फ़ासीवाद के विरुद्ध विभिन्न समुदायों तथा अस्मिताओं की योगात्मक एकता के उदारवादी-वामपन्थी प्रोजेक्ट की हास्यास्पद समझ को भी दिखाता है जैसे कि ये सारे समुदाय व अस्मिताएँ सजातीय और वर्ग-अविभाजित हैं और यह भी कि ऐसी कोई व्यवहारवादी एकता सम्भव भी है, इसके टिकने की बात तो अभी छोड़ ही दीजिये! फ़ासीवाद को फ़ैसलाकुन शिकस्त एक जुझारू वर्ग-आधारित जाति-विरोधी और साम्प्रदायिकता-विरोधी आन्दोलन ही दे सकता है.

रस्म-अदायगी के तौर पर राजसमन्द की इस नृशंस घटना के बाद कुछ घडि़याली आँसू भी बहाये गये। अफ़राजुल की हत्या पर शोक जताते हुए राजस्थान की मुख्यमन्त्री वसुन्धरा राजे ने “सख्त कार्रवाई” के आश्वासन भी दिये पर अब तक कोई ठोस कारवाई नहीं की गयी है। क्या अब तक भाजपा शासित राजस्थान में बिर्लोका (राजस्थान के नग़ौर जि़ले में स्थित) के ग़फूर ख़ान, नूह के पहलू ख़ान और प्रतापगढ़ के ज़फर ख़ान के लिए कोई “त्वरित कार्रवाई” की गयी थी? कौन नहीं जानता कि ऐसे जघन्य कृत्यों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर भाजपा सरकारों और संघ का संरक्षण प्राप्त है? ये किन्हीं “परिधिगत” तत्वों के द्वारा नहीं किये जा रहे हैं जिन पर लगाम लगाये जाने की ज़रूरत है। बल्कि यही भारतीय फ़ासीवाद का असली चेहरा है। संघ और उसका चुनावी निकाय भाजपा फ़ासीवादी मशीनरी द्वारा किये जा रहे इन कुकृत्यों से, जिनका वो काफ़ी कुशलता से संचालन कर रहे हैं, स्वयं को पाप-मुक्त नहीं कर सकते। अब, हिन्दुत्ववादी फ़ासीवाद की यह एक विशेषता बन गयी है कि जैसे ही कोई अखलाक या अफ़राजुल जैसी घटना होती है तो दोष इन “खर्च कर दिये जाने योग्य” “फ्रिंज” तत्वों पर डाल दिया जाता है। हालाँकि, ‘फ्रिंज’ और ‘मुख्यधारा’ के बीच की विभाजन रेखा स्वयं धुँधली है और यह धुँधलापन सोच-समझ कर निर्मित किया गया है। इसलिए, वडोदरा का पार्षद और गुजरात के दभोई विधानसभा क्षेत्र का भाजपा प्रत्याशी खुले-आम चुनावी रैलियों में भड़काऊ भाषण देता है। तेलंगाना का भाजपा विधायक, राजा सिंह, जिसका पिछला इतिहास ऊना की क्रूरता को “नीच दलितों को सिखाया गया सबक” के रूप में परिभाषित करने का रहा है, खुलेआम हिन्दुओं से “हिन्दू राष्ट्र” के निर्माण के लिए हथियार उठा लेने का आह्वान करता है। सूरत में हिन्दू युवा वाहिनी का अध्यक्ष, जिसके सरपरस्त ख़ुद उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ है, एक मुसलमान के क़त्ल के लिए शम्भूलाल की “हिम्मत” की दाद देता है और उसके पक्ष में लोगों से समर्थन की अपील करता है.

जब स्वयं राज्य मशीनरी का ही अपराधकर्ताओं के साथ गठजोड़ है, तो आप इससे उम्मीद ही क्या रख सकते हैं? अभी तक सबसे महत्वपूर्ण सवालों, जैसे कि उन वीडियो को फ़ैलाने के लिए कौन ज़िम्मेदार है जिन्हें देख कर रैगर ने इस घटना को अंजाम दिया, को जाँच के दायरे में लाया ही नहीं गया है। किन संगठनों और नेटवर्कों ने रैगर के वीडियो को फ़ैलाने का काम किया? वे लोग कौन हैं जो रैगर को महिमामण्डित कर नायक के तौर पर पेश कर रहे हैं और पुलिस द्वारा बैंक अकाउंट बन्द करने से पहले तक रैगर की पत्नी के नाम चन्दा इकठ्ठा कर 5 लाख तक जमा करने में सफल हो जाते हैं? क्या इस पूरे  हत्याकाण्ड में ये सब गुनहगार नहीं हैं? और क्या अगर इन लोगों में भाजपा के नेता भी शामिल हैं, तो उन्हें भी जाँच के दायरे में नहीं लाना चाहिए? बजरंग दल की अगुवाई में शम्भूलाल के समर्थन में उदयपुर की अदालत पर प्रदर्शन कर रही भीड़ ने जमकर उत्पात मचाया, पत्थरबाज़ी की और पुलिस के आला अधिकारियों तक को घायल कर दिया, लेकिन पुलिस ने न कोई बल-प्रयोग किया और न ही गिरफ़्तारी की। अगर इनकी जगह कोई मज़दूर संगठन किसी मज़दूर की ग़ैर-क़ानूनी बर्ख़ास्तगी के विरोध में या न्यूनतम वेतन लागू करवाने की संविधान-सम्मत माँग को लेकर प्रबन्धन के ख़ि‍लाफ़ विरोध-प्रदर्शन कर रहा होता तो क्या पुलिस और प्रशासन का यही रवैया होता? हम इसका जवाब जानते हैं। इतना ही नहीं, इस फ़ासीवादी भीड़ को क़ानून और सज़ा से ऊपर होने का इस क़दर यक़ीन था कि उदयपुर के न्यायिक परिसर में न्यायलय के गुम्बद पर चढ़कर भगवा झण्डा तक फहरा दिया गया और किसी को कुछ करने की हिम्मत नहीं हुई। यह पूरा घटनाक्रम बरबस उस मुहावरे की याद दिलाता है कि “जब सैय्याँ भये कोतवाल, तब डर काहे का”!

राजसमन्द हत्याकाण्ड फ़ासीवाद द्वारा समाज के पोर-पोर में घिनौने तरीक़ों से फैलाये जा रहे ज़हर की बस एक और ताक़ीद है। खुलेआम हिंसा और आतंक का इस्तेमाल फ़ासीवादी ताक़तों द्वारा हर तरह के प्रतिरोध को शांत कराने और आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करने के लिए किया जाता है। फ़ासीवाद सत्ता में हो या सत्ता से बाहर हो, हर-हमेशा ही यह बड़ी पूँजी के लिए ‘अनौपचारिक राज्य-सत्ता’ के तौर पर काम करता रहा है। जो उदारवादी-शान्तिवादी तर्क, संवैधानिक तन्त्र और जनवाद (असल में बुर्जुआ जनवाद) की विफलता पर विधवा-विलाप कर रहा है, और जो मौज़ूदा राजनीतिक-वैचारिक व्यवस्था की बर्बरता से सदमे में है, वह अपने आँसुओं की धारा में इस बर्बरता, यानी कि फ़ासीवाद, के उदय के पीछे के कारणों और सम्बन्धों को देख पाने में असमर्थ है।

अन्त में ब्रेष्ट का यह उद्धरण बिलकुल सटीक बैठता है, “जो लोग पूँजीवाद का विरोध किये बिना फ़ासीवाद का विरोध करते हैं, जो उस बर्बरता पर दुखी होते हैं जो बर्बरता के कारण पैदा होती है, वे ऐसे लोगों के समान हैं जो बछड़े को जिबह किये बिना ही मांस खाना चाहते हैं। वे बछड़े को खाने के इच्छुक हैं लेकिन उन्हें ख़ून देखना नापसन्द है। वे आसानी से सन्तुष्ट हो जाते हैं अगर कसाई मांस तौलने से पहले अपने हाथ थो लेता है। वे उन सम्पत्ति सम्बन्धों के ख़िलाफ़ नहीं हैं जो बर्बरता को जन्म देते हैं, वे केवल अपने आप में बर्बरता के ख़िलाफ़ हैं। वे बर्बरता के विरुद्ध आवाज़ उठाते हैं, और वे उन देशों में ऐसा करते हैं जहाँ ठीक ऐसे ही सम्पत्ति सम्बन्ध हावी हैं, लेकिन जहाँ कसाई मांस तौलने से पहले अपने हाथ धो लेता है।”

 

दिशा सन्धान – अंक 5  (जनवरी-मार्च 2018) में प्रकाशित

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