फासीवाद

फ़ि‍लीपींस में दुतेर्ते परिघटना और उसके निहितार्थ

फ़ि‍लीपींस में दुतेर्ते परिघटना और उसके निहितार्थ

  • तुहिन दास

पिछले साल दुनिया के विभिन्न हिस्सों में दक्षिणपन्थी लोकरंजकतावादी राजनीति का उभार देखने में आया। अमेरिका में ट्रम्प का उभार, ब्रिटेन में बहुमत का यूरोपीय संघ से बाहर निकलने के पक्ष में वोट करना, फ़्रांस में मैरीन ली पेन की बढ़ती लोकप्रियता व जर्मनी में धुर-दक्षिणपन्थी पार्टी एएफ़डी का उभार इसी की बानगी थी। ऐसी ही एक परिघटना फ़ि‍लीपींस में देखने में आयी जब पिछले साल 10 मई को फ़ि‍लीपींस के राष्ट्रपति चुनाव में रोड्रिगो दुतेर्ते ने भारी बहुमत से जीत हासिल की। दुतेर्ते के राष्ट्रपति बनने से न सिर्फ़ फ़ि‍लीपींस के राजनीतिक समीकरणों में बल्कि समूचे एशिया प्रशान्त क्षेत्र में अमेरिकी साम्राज्यवाद के दाँव-पेंच और दक्षिण चीन सागर के इलाक़े में अमेरिका व चीन के बीच चल रही अन्तर-साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा के पुराने सामरिक समीकरणों में बड़े बदलाव के आसार साफ़ नज़र आ रहे हैं। ऐसे में दुतेर्ते के उभार के सामाजिक-आर्थिक कारणों और साम्राज्यवादी समीकरणों में उसके निहितार्थों को समझना बेहद ज़रूरी हो जाता है।

कौन है रोड्रिगो दुतेर्ते?

पेशे से वकील रोड्रिगो दुतेर्ते राष्ट्रपति बनने से पहले फि़लीपींस के मिंडानाओ द्वीप के दक्षिण में स्थित दवाओ शहर के महापौर और उप महापौर का पद सँभाल चुका था। 1986 में फ़र्डीनांड मार्कोस की तानाशाही के पतन के बाद दुतेर्ते ने अपने राजनीतिक कॅरियर की शुरुआत दवाओ शहर से ही की थी। तब से लेकर अब तक अधिकांश समय में दवाओ शहर के प्रशासन की कमान दुतेर्ते और उसके परिवार के ही हाथों रही है। दवाओ में अपने कार्यकाल के दौरान दुतेर्ते अपने डेथ स्क्वाडों के ज़रिये नशीले पदार्थों की तस्करी करने वालों को निर्ममता से मरवाने के लिए कुख्यात था। राष्ट्रपति बनने के बाद उसने ये मुहिम पूरे फि़लीपींस में छेड़ रखी है और अब तक इस मुहिम में 6000 से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं। दुतेर्ते ने एक बेबाक, निर्णायक और सशक्त नेता के रूप में अपनी छवि बनायी है। हालाँकि नशीले पदार्थों की तस्करी के ख़िलाफ़ मुहिम में दुतेर्ते के अधिकांश शिकार ग़रीब व मेहनतकश पृष्ठभूमि के लोग रहे हैं, लेकिन मज़बूत नेता के रूप में उसकी छवि से उसे मध्यवर्ग और मज़दूर वर्ग के ए‍क हिस्से का ज़बरदस्त समर्थन भी प्राप्त है। राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका के ख़िलाफ़ अपने कई तीखे बयानों और चीन व रूस के प्रति नरम रवैया अपनाने की वजह से वह अक्सर अन्तरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्ख़ि‍यों में भी छाया रहता है। मीडिया के ज़रिये सनसनीखेज बयान देकर वह अपनी लोकप्रियता बढ़ाने में भी माहिर है। कभी वह ओबामा को भद्दी गाली देता है तो कभी यह आरोप लगाता है कि सीआईए उसकी हत्या करवाने की योजना बना रही है। वास्तव में वह फि़लीपींस के बुर्जुआ वर्ग का ही प्रतिनिधि है, हालाँकि हर दक्षिणपन्थी लोकरंजकतावादी की ही तरह तात्कालिक रूप से वह एक हद तक वर्ग से स्वायत्त प्रतीत होता है।

दुतेर्ते के राष्ट्रपति बनने के सामाजिक-आर्थिक कारण

दुतेर्ते जैसे दक्षिणपन्थी लोकरंजकतावादी व्यक्ति के फि़लीपींस का राष्ट्रपति बनने के पीछे के सामाजिक-आर्थिक कारणों को जानने के लिए हमें वहाँ के हालिया इतिहास पर एक नज़र दौड़ानी होगी। 1986 में जनान्दोलन के दबाव में मार्कोस की तानाशाही के पतन के बाद फि़लीपींस में बुर्जुआ लोकतन्त्र का औपचारिक ढाँचा तो पुनर्स्थापित हुआ लेकिन वहाँ की राजनीति और अर्थव्यवस्था में मुट्ठी भर प्रभुत्वशाली घरानों का दबदबा बना रहा। 1990 के दशक के बाद दुनिया के तमाम हिस्सों की तरह फि़लीपींस में भी नवउदारवादी नीतियाँ लागू की गयीं जिनका नतीजा फि़लीपींस में पहले से मौजूद आर्थिक असमानता की खाई के चौड़ा होने के रूप में देखने में आया। एक आँकड़े के अनुसार वर्ष 2011 में फि़लीपींस के कुल सकल घरेलू उत्पाद के लगभग तीन चौथाई हिस्से का मालिकाना हक़ वहाँ के 40 सबसे अमीर घरानों का क़ब्ज़ा था।1 इन घरानों का मालिकाना फि़लीपींस के प्रमुख उद्योगों और कृषि-योग्य भ‍ूमि तक विस्तृत है। वहाँ की राजनीति में भी इन्हीं घरानों की दख़ल रही है। इन घरानों की अपनी निजी सेनाएँ हैं। वहाँ के चुनावों में बाहुबल और धनबल का धड़ल्ले से इस्तेमाल होता है।
पिछले 30 सालों में नवउदारवादी आर्थिक नीतियों और राजनीति में शासक घरानों के वर्चस्व की वजह से फि़लीपींस की आम मेहनतकश आबादी ग़रीबी और बदहाली भरा जीवन बिताने मजबूर है। इन वर्षों में आर्थिक विकास की दर तो तेज़ रही लेकिन इस विकास का लाभ शासक घरानों तक ही सीमित रहा। जहाँ मुट्ठी भर रईसों की विलासिता विकसित देशों के धनकुबेरों की विलासिता को टक्कर देती है वहीं आम लोग बड़ी मुश्किल से अपना जीवन-यापन कर पाते हैं। फि़लीपींस के ‘सोशल वेदर स्टेशन्स’ के हालिया सर्वेक्षण के मुताबिक़ वहाँ ग़रीब परिवारों का अनुपात 46 प्रतिशत और कुपोषण के शिकार परिवारों का अनुपात 13 प्रतिशत है।2 फि़लीपींस के मेट्रो मनीला में दुनिया के सबसे ज़्यादा बेघर लोग रहते हैं। वहाँ का पूरा विकास राजधानी मनीला के कुछ समृद्ध इलाक़ों तक ही सीमित है। मनीला के विकसित इलाक़ों की तुलना में शेष फि़लीपींस के अत्यन्त पिछड़ेपन के मद्देनज़र वहाँ के लोग उन विकसित इलाक़ों को व्यंग्यात्मक रूप से ‘इम्पीरियल मनीला’ बोलते हैं। इस ‘इम्पीरियल मनीला’ में ही लुज़ोन द्वीप का कुलीन तबक़ा विलासिता भरी जि़न्दगी बिताता है।
भीषण आर्थिक असमानता और भयंकर क्षेत्रीय असन्तुलन और साथ ही साथ बढ़ते भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद एवं अपराध व तस्करी की वजह से फि़लीपींस के आम लोगों में बड़े शासक घरानों के ख़िलाफ़ गुस्सा लम्बे समय से पक रहा था जिसका लाभ उठाने में दुतेर्ते क़ामयाब रहा। हालाँकि दुर्तेते ख़ुद एक धनी व राजनीतिक परिवार से आता है और उसने भी मिंडानाओ द्वीप में वंशवाद की राजनीति को ही बढ़ावा दिया, लेकिन अपने चुनावी अभियान में वह ख़ुद को लुज़ोन द्वीप और ‘इम्पीरियल मनीला’ के बाहर का प्रस्तुत करके लोगों को यह यक़ीन दिलाया कि वह कुलीन घरानों की सत्ता को चुनौती देगा, बदलाव लाएगा और लूज़ॉन द्वीप और मनीला शहर के अलावा भी फि़लीपींस के अन्य इलाक़ों को विकसित करेगा। दुतेर्ते की लोकरंजक और बेबाक शैली ने मध्यवर्ग के बड़े हिस्से को उसकी ओर आ‍कर्षित किया जो कुलीन शासक घरानों की विलासिता और भ्रष्टाचार से तंग आ चुका था। ये वो परिस्थितियाँ थीं जिनमें दुतेर्ते को केन्द्रीय सत्ता तक पहुँचा।

दुतेर्ते के अब तक के कार्यकाल का लेखा-जोखा और भविष्य की सम्भावनाएँ

रोड्रिगो दुतेर्ते के फि़लीपींस के राष्ट्रपति पद का कार्यकाल सँभाले छह महीने से ज़्यादा का समय बीत चुका है। इन छह महीनों में उसके शासन की रूपरेखा समझी जा सकती है। हालाँकि वह ख़ुद को एक ”वामपन्थी” और फि़लीपींस का पहला ”समाजवादी” राष्ट्रपति कहता है और वह फि़लीपींस की कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक महासचिव होसे मारिया सिसों का छात्र भी रह चुका है, लेकिन उसकी कैबिनेट के संघटन और पिछले छह महीने में उसकी नीतियों से यह स्पष्ट हो जाता है कि ख़ुद का वामपन्थी कहना उसके लिए महज़ एक जुमला है जिसका इस्तेमाल वह आम मेहनतकशों का समर्थन हासिल करने के लिए करता है। ग़ौरतलब है कि फि़लीपींस में पूँजीवादी विकास के पर्याप्त प्रमाण होने के बावजूद फि़लीपींस की कम्युनिस्ट पार्टी 1963 की जनरल लाइन से अभी तक चिपकी हुई और और फि़लीपींस को अर्द्ध-सामन्ती अर्द्ध-औपनिवेशिक मानते हुए दुतेर्ते को राष्ट्रीय बुर्जुआ का प्रतिनिधि बताकर उसके साथ सहयोग की नीति अपना रही है। दुतेर्ते ने भी उसको तुष्ट करने के लिए अपने मन्त्रिमण्डल में तीन कैबनेट पद – श्रम, भूमि सुधार और समाज कल्याण – वामपन्थियों को दिये हैं और शान्ति वार्ता की प्रक्रिया भी शुरू की है। लेकिन ग़ौर करने वाली बात यह है कि दुतेर्ते ने प्रमुख आर्थिक मन्त्रालय घोर नवउदारवादियों को दिये हैं और अपने अब तक के कार्यकाल के दौरान उसने उन नवउदारवादी नीतियों का बदस्तूर जारी रखा है जिनकी वजह से फि़लीपींस में आम लोगों की जि़न्दगी नरक जैसी बन गयी है।
फि़लीपींस की कम्युनिस्ट पार्टी यह उम्मीद बाँधे बैठी थी कि दुतेर्ते स्टील जैसे बुनियादी उद्योगों का राष्ट्रीयकरण करके और छोटे व मंझोले उद्योगों को बढ़ावा देकर राष्ट्रीय उद्योगीकरण की दिशा में क़दम उठायेगा। लेकिन दुतेर्ते ने अब तक के अपने कार्यकाल में यह स्पष्ट कर दिया है कि उसका ऐसा कोई इरादा नहीं है और उसने फि़लीपिनो लोगों के सस्ते श्रम को निचोड़ने की खुली आज़ादी का लालच देते हुए विदेशी निवेश आकर्षिक करने की पुरानी सरकार की नीतियों का बदस्तूर जारी रखा है। ग़ौरतलब है कि फि़लीपींस भी भारत की ही तरह बिज़नेस प्रॉसेस आउटसोर्सिंग (बीपीओ) का एक गढ़ है जहाँ अमेरिकी और यूरोपीय कम्पनियाँ बड़े पैमाने पर अपने बिज़नेस के एक हिस्से (मिसाल के लिए कॉल सेंटर, ट्रांसक्रिप्‍शन आदि) को आउटसोर्स करती हैं।
दुतेर्ते सरकार मज़दूरों की मज़दूरी बढ़ाने और ठेकाकरण ख़त्म करने के अपने वायदे से भी पलटती नज़र आ रही है। इसके अतिरिक्त रियल एस्टेट और एग्रीबिज़नेस कम्पनियों के दबाव में सरकार कृषि-योग्य भूमि के किसी अन्य इस्तेमाल पर रोक की किसानों की माँग की भी अनदेखी कर रही है। अवरचनागत (इंफ्रास्ट्रक्चर) विकास के लिए दुतेर्ते सरकार ने भी अपने पूर्ववर्ती सरकारों की ही तरह पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप का रास्ता अपनाकर सार्वजनिक कोष से सब्सिडी देकर पूँजीपतियों का मुनाफ़़ा बढ़ाने की नीति को जारी रखा है। यही नहीं आयकर, एस्टेट कर, कैप‍िटल गेन्स कर, ट्रांजैक्शन कर जैसे प्रत्यक्ष करों को कम करने और वैट जैसे अप्रत्यक्ष कर को बढ़ाने की जो नवउदारवादी कर नीतियाँ दुनिया के विभिन्न हिस्सों में बुर्जुआ शासकों द्वारा लागू की जा रही हैं उन्हीं को दुतेर्ते सरकार भी लागू कर रही है।
विदेश नीति के मामले में हालाँकि दुतेर्तो ने अमेरिका के ख़िलाफ़ कुछ तीखे बयान ज़रूर दिये (उसने अमेरिका के साथ सैन्य समझौते को रद्द करने और दक्षिण चीन सागर में अमेरिका की सैन्य चौकी तक हटाने तक की धमकी दी) और चीन व रूस की ओर मित्रता का हाथ भी बढ़ाया, लेकिन समय बीतने के साथ ही साथ यह स्पष्ट होता जा रहा है कि दुतेर्ते का अमेरिका से सम्बन्ध-विच्छेद का कोई इरादा नहीं है। दरअसल दुतेर्ते दक्षिण चीन सागर में फि़लीपींस की भू-सामरि‍क स्थिति (फि़लीपींस ) और अन्तरसाम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा का लाभ उठाकर फि़लीपींस के आर्थिक और सामरिक विकल्पों को विस्तारित करने की फि़लीपींस के बुर्जुआ वर्ग की आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति दे रहा है। जहाँ एक ओर वह चीन से क़रीबी बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी ओर वह अमेरिका से पूरी तरह रिश्ता नहीं तोड़ रहा है। चीन अपनी महत्वाकांक्षी योजना ‘वन बेल्ट वन रोड’ के तहत यूरेशिया और अफ़्रीका के 60 देशों को सड़कों, तीब्र गति की रेलों, फ़ाइबर ऑप्टिक लाइनों, ट्रांसकॉन्टिनेंटल सबमरीन ऑप्टिकल केबल प्रोज़ेक्टों और सैटेलाइट इन्फ़ॉर्मेशन पासवेज़ के ज़रिये जोड़ना चाहता है। दुतेर्ते फि़लीपींस के विभिन्न द्वीपों और शहरों को जोड़ने के लिए इस योजना के तहत चीनी निवेश फि़लीपींस की ओर आकर्षित करना चाहता है। इसी मक़सद से उसने हाल ही में चीन की यात्रा भी की जिस दौरान वह फि़लीपींस में 24 अरब डॉलर का चीनी निवेश आकर्षित करने में सफल भी रहा। चीन के प्रति नरम रुख़ अख्‍़ति‍यार करते हुए दुतेर्ते ने दक्षिण चीन सागर में एक अन्तरराष्ट्रीय ट्राइब्यूनल के फ़ैसले को न मानने के चीन के फ़ैसले के ख़िलाफ़ कोई अपील नहीं करने का फ़ैसला किया। ग़ौरतलब है कि अन्तरराष्ट्रीय ट्राइब्यूनल में यह विवादित मामला फि़लीपींस की ही पुरानी सरकार ले गयी थी।
हालाँकि सैन्य मामलों में लेकिन साथ ही दुतेर्ते अमेरिका द्वारा प्रस्तावित ट्रांस-पैसिफि़क पार्टनरशिप (टीपीपी) नामक मुक्त व्यापार समझौते की ओर भी दिलचस्पी दिखा रहा है जिसमें चीन को छोड़कर एशिया-प्रशान्त क्षेत्र के सभी देश शामिल होंगे। इस समझौते की एक प्रमुख शर्त यह है कि इसमें शामिल सभी देशों को अपने यहाँ के उद्योगों में पूर्ण विदेशी स्वामित्व की मंजूरी देनी होगी। इसके लिए फि़लीपींस के संविधान में संशोधन करना होगा। दुतेर्ते ने हाल ही में इस संविधान संशोधन के लिए एक कमेटी का गठन किया है। अमेरिका का अलावा दुतेर्ते जापान से भी सम्बन्ध बरक़रार रखना चाहता है। इसी मक़सद से उसने चीन के बाद जापान की भी यात्रा की। यही नहीं वह यूरोप के देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों पर भी हस्ताक्षर करने की भी पहल की है।
स्पष्ट है कि दुतेर्ते बुर्जुआ वर्ग के हितों का ही प्रतिनिधित्व कर रहा है। नवउदारवादी नीतियों को लागू करने के लिए जिस निरंकुशता की ज़रूरत होती है वह दुतेर्ते में कूट-कूट कर भरी हुई है। उसकी कोशिशों के नतीजे के रूप में फि़लीपींस में भले ही विदेशी पूँजी निवेश को बढ़ावा मिलेगा, लेकिन उसका फ़ायदा वहाँ के रईसों को ही होने वाला है और फि़लीपींस की आम मेहनतकश जनता की ज़िन्दगी की मुश्किलें बरक़रार रहेंगी क्योंकि नवउदारवादी नीतियाँ रोज़गारविहीन विकास ही दे सकती हैं, जिसके फलस्वरूप असमानता की खाई का चौड़ा होना और जारी रहेगा। । हाँ यह ज़रूर है कि फि़लीपींस के इतिहास में पहली बार अमेरिकी साम्राज्यवादियों पर पूर्ण निर्भरता की बजाय फि़लीपींस के भू-सामरिक स्थिति का लाभ उठाकर वह अमेरिका और चीन दोनों से मोलतोल करने की दिशा में आगे बढ़ेगा। देखना यह है कि अमेरिका में ट्रम्प के सत्ता में आने के बाद एशिया-प्रशान्त क्षेत्र में आए इस बड़े बदलाव और से इस इलाक़े पर क्या प्रभाव पड़ेगा। इतना तो तय है कि दक्षिण चीन सागर में अमेरिकी व चीनी साम्राज्यवादियों के बीच जारी प्रतिस्पर्द्धा और तेज़ होगी जिससे वहाँ तनाव व अस्थिरता का माहौल भी पैदा होगा जिसका दुष्परिणाम फि़लीपींस की आम आबादी को ही झेलना होगा।

सन्दर्भ सूची
1. https://business.inquirer.net/110413/philippines-elite-swallow-countrys-new-wealth
2. http://www.bworldonline.com/content.php?section=TopStory&title=poverty-statistics-at-multi-year-lows&id=128159

 

दिशा सन्धान – अंक 4  (जनवरी-मार्च 2017) में प्रकाशित

More from फासीवाद

उन समझदारों के लिए सबक जो हमेशा हाशिये पर पड़े रहना चाहते हैं

हाशिये पर खड़े लोगों के अपने दुःख होते हैं तो अपने सुख भी होते हैं। सवाल देखने के नज़रिये और ज़ोर का होता है। हाल ही में, हाशिये पर खड़े वामपन्थी आन्दोलन से लम्बे समय से जुड़े रहे एक बुद्धिजीवी रवि सिन्हा ने हाशिये पर खड़े अपने अन्य बिरादरों के लिए भारत में साम्प्रदायिक फ़ासीवाद के उभार के बरक्स कुछ सबक पेश किये हैं। लेकिन इन सबकों को पढ़ने के बाद ऐसा लगता है कि ये सबक हमेशा हाशिये पर ही कैसे खड़े रहें, इसका ‘यूज़र मैनुअल’ है। यूँ भी कह सकते हैं कि यह आज के सबसे ज़रूरी कार्यभारों को अनिश्चितकाल तक के लिए स्थगित कर देने का प्रस्ताव है। read more

मोदी सरकार के कार्यकाल का एक साल: विकास का विद्रूप प्रहसन

जिस नग्न निरंकुश और परभक्षी वित्तीय पूँजी ने अपने प्रबंधन समिति के रूप में राजकाज चलाने के लिए मोदी सरकार पर दाँव लगाया है उसके अनुरूप परिस्थितियाँ तैयार करने में मोदी की तत्परता पिछले एक वर्ष में देखी जा सकती है। आर्थिक जर्जरता इतनी प्रत्यक्ष है कि उसके बारे में आम लोगों को भ्रम में नहीं रखा जा सकता है। इसलिए फासीवादी चरित्रवाली भाजपा सरकार बौद्धिक सांस्कृतिक शैक्षिक प्रणाली के ज़रिये चीज़ों को सत्ता पक्ष के नज़रिये से समझने के लिए जनता को एक व्याख्यात्मक चौखटा देने की कोशिशों में लगी है। मोदी ने जब भारत में वैदिक और महाभारत काल से ही चिकित्सा विज्ञान के अति विकसित अवस्था में मौजूदगी का प्रमाण गणेश के कटे सिर को प्लास्टिक सर्जरी द्वारा जोड़ने और माँ के गर्भ के बिना कर्ण का जेनेटिक साइंस की मदद से जन्म लेने के उदाहरणों से दिया तो यह उनकी मूर्खता नहीं थी जैसा कि समझा जाता है। या भारतीय विज्ञान कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में जब एक तथाकथित वैज्ञानिक द्वारा भारत में सात हज़ार वर्ष पहले विमान की तकनीक के अत्यन्त विकसित होने का दावा करता पर्चा बिना किसी बाधा के पढ़ा गया था तो यह केवल कूपमण्डूकता और रूढ़िवादिता ही नहीं थी। बल्कि इन जानकारियों को पिछड़ी चेतना वाली जनता के दिमागों में एक सामान्य बोध के रूप में स्थापित करने का सचेतन प्रयास था। read more

उद्धरण : दिशा सन्धान-3, अक्टूबर-दिसम्बर 2015

कम्युनिस्टों को जानना चाहिए कि भविष्य हर हाल में उनका है, इसलिए हम महान क्रान्तिकारी संघर्ष में उग्रतम उत्साह के साथ-साथ बहुत शान्ति और बहुत धीरज से बुर्जुआ वर्ग की पागलपनभरी भागदौड़ का मूल्यांकन कर सकते हैं, और हमें करना ही चाहिए। read more

नमो फासीवाद : नवउदारवादी पूँजीवाद की राजनीति और असाध्य संकटग्रस्त पूँजीवादी समाज में उभरा धुरप्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्दोलन

इस नवफासीवादी लहर का मुकाबला न तो कुछ पैस्सिव किस्म की बौद्धिक-सांस्कृतिक गतिविधियों से किया जा सकता है, न ही ‘सर्वधर्मसमभाव’ की अपीलों से। यह केवल संसदीय चुनाव के दायरे में जीत-हार का सवाल भी नहीं है। सत्ता में न रहते हुए भी ये फासीवादी जनता को बाँटने की साजिशें और दंगे भड़काने का खूनी खेल जारी रखेंगे। जो जेनुइन सेक्युलर बुद्धिजीवी हैं, उन्हें अपने आरामगाहों ओर अध्ययन कक्षों से बाहर आकर, प्रतिदिन, लगातार, पूरे समाज में और मेहनतकश तबकों में जाना होगा, तरह-तरह से उपक्रमों से धार्मिक कट्टरपन्‍थ के विरुद्ध प्रचार करना होगा, साथ ही जनता को उसकी जनवादी माँगों पर लड़ना सिखाना होगा, मजदूरों को नये सिरे से जुझारू संगठनों में संगठित होने की शिक्षा देनी होगी, पूँजीवाद और साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष के ऐतिहासिक मिशन से उन्हें परिचित कराना होगा, उन्हें भगतसिंह, राहुल और मजदूर संघर्षों की गौरवशाली विरासत से परिचित कराना होगा। मजदूर वर्ग के अग्रिम तत्वों और क्रान्तिकारी वाम की कतारों को तृणमूल स्तर पर जनता के बीच ये कार्रवाईयाँ चलाते हुए संघ परिवार के जमीनी तैयारी के कामों का प्रतिकार करना होगा। यह लड़ाई सिर्फ 2014 के चुनावों तक की ही नहीं है। यह एक लम्‍बी लड़ाई है।

read more

फ़ासीवाद की बुनियादी समझ नुक्तेवार कुछ बातें

‘फ़ासीवाद सड़ता हुआ पूँजीवाद है’ (लेनिन)। यह एक परिघटना है जो साम्राज्यवाद के दौर में पूँजीवाद के आम संकट के गहराने के साथ जन्मी थी। अब विश्व पूँजीवाद के असाध्य ढाँचागत संकट और उससे निजात पाने के ‘नवउदारवादी’ नुस्खों के दौर में फ़ासीवादी राजनीति सभी पूँजीवादी देशों में विविध रूपों में सिर उठा रही है और विशेषकर भारत जैसे पिछड़े पूँजीवादी देशों में धार्मिक कटटरपंथी फ़ासीवाद एक शक्तिशाली उभार के रूप में सामने आ रहा है read more