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सोवियत संघ में समाजवादी प्रयोगों के अनुभव : इतिहास और सिद्धान्त की समस्याएँ (चौथी किस्त)

सोवियत संघ में समाजवादी प्रयोगों के अनुभव : इतिहास और सिद्धान्त की समस्याएँ (चौथी किस्त)

  • अभिनव सिन्हा

अध्याय V.

दो क्रान्तियों के बीच

फ़रवरी क्रान्ति के बाद का दौर बेहद उथल-पुथल का दौर था। कहा जा सकता है कि इस दौर में कई वर्षों के परिवर्तन कुछ महीनों में हो गये, जैसा कि क्रान्तिकारी दौरों में हुआ करता है। पिछले अध्याय में हमने चर्चा की थी कि किस तरह सर्वहारा वर्ग ने राजनीतिक चेतना, संगठन और पहलक़दमी की कमी के चलते ज़ार का तख्ता पलटने के बाद सत्ता अपने हाथों में लेने की बजाय स्वेच्छा से उसे दूमा के हाथों सौंप दिया। लेनिन ने इस विषय में लिखा है कि लाखों की तादाद में मज़दूर वर्ग और आम मेहनतकश जनसमुदाय ज़ारशाही, साम्राज्यवादी युद्ध और आर्थिक विघटन के विरुद्ध उठ खड़ा हुआ था और वह राजनीतिक कार्रवाई में हिस्सा लेने लगा था। लेकिन रूस में आम मेहनतकश जनसमुदायों का बड़ा हिस्सा टटपुँजिया आबादी का था। 40 प्रतिशत मज़दूर मोर्चे पर भेज दिये गये थे और सैन्य भर्ती से बचने के लिए कई छोटे मालिक, दुकानदार और दस्तकार कारख़ानों में काम करने लगे थे और मज़दूर आबादी में शामिल हो गये थे। सर्वहारा चेतना इनके लिए एक परायी चीज़ थी। यही कारण था कि सर्वहारा वर्ग का संगठन और चेतना फ़रवरी क्रान्ति के वक़्त इस स्थिति में नहीं थे कि सत्ता अपने हाथों में ले सकें। उन पर निम्न-पूँजीवादी विचारों का वर्चस्व बना हुआ था। लेनिन लिखते हैं :

”एक विराट निम्न पूँजीवादी लहर हर चीज़ पर छा गयी है। और उसने न सिर्फ़ तादाद से बल्कि विचारधारा से भी वर्ग-चेतन सर्वहारा को मोह लिया है। उसने मज़दूरों के बहुत बड़े हिस्से को निम्न-पूँजीवादी राजनीतिक दृष्टिकोण की छूत लगा दी है और उसके मन में यह दृष्टिकोण बिठा दिया है।” (लेनिन, 2003, ‘बोल्शेविक पार्टी का इतिहास’ में उद्धृत, राहुल फ़ाउण्डेशन, लखनऊ, पृ. 182)

इस वस्तुगत कारक के अलावा, इसके लिए काफ़ी हद तक सोवियतों में मेंशेविकों और समाजवादी-क्रान्तिकारियों का हावी होना भी जि़म्मेदार था। बोल्शेविक उस समय तक सोवियतों में बहुमत में नहीं थे। फ़रवरी क्रान्ति में बुर्जुआ दूमा, मुख्यत: उस समय तक उदार, बुर्जुआ कैडेट पार्टी के हाथों में सत्ता जाने के बावजूद, फ़रवरी क्रान्ति ने एक ऐसी प्रक्रिया की शुरुआत कर दी थी, जिसे बुर्जुआ वर्ग भी अपने मनचाहे नियन्त्रण में नहीं रख सकता था। फ़रवरी क्रान्ति के दौरान जो सोवियतें अस्तित्व में आयीं, वे सोवियतें बुर्जुआ आरज़ी सरकार के गठन के बाद भंग नहीं हुईं  बल्कि क़ायम रहीं। पेत्रोग्राद सोवियत की मान्यता मज़दूरों और सैनिकों में फ़रवरी क्रान्ति के बाद बनी बुर्जुआ आरज़ी सरकार से ज़्यादा थी और वे उसके फ़ैसलों को ज़्यादा मानते थे। नतीजतन, एक ‘दोहरी सत्ता’ अस्तित्व में आ चुकी थी। इस ‘दोहरी सत्ता’ के दबाव में बुर्जुआ आरज़ी सरकार को तमाम राजनीतिक कैदियों को छोड़ना पड़ा, जिसमें अधिकांश बोल्शेविक थे और साथ ही कुछ अन्य जनवादी व नागरिक अधिकारों को भी लागू करना पड़ा। आरज़ी सरकार द्वारा राजतन्त्र से समझौते के सारे प्रयास सोवियतों की आंशिक सत्ता के कारण ही असफल हो गये। साथ ही, आरज़ी सरकार विद्रोही सैनिकों व मज़दूरों से शस्त्र भी नहीं रखवा सकी, जो कि उन्होंने फ़रवरी क्रान्ति के दौरान पुलिस व अन्य सशस्त्र बलों से हथिया लिये थे।

इस ‘दोहरी सत्ता’ की विशिष्ट स्थिति को लेनिन ने समझा और उसके अनुसार बोल्शेविक पार्टी की कार्यदिशा प्रस्तावित की। ऐसा नहीं था कि लेनिन के साहसिक प्रस्तावों को पार्टी ने सहजता से स्वीकार कर लिया। मार्च में ‘सुदूर से पत्र’ और फिर अप्रैल में लेनिन द्वारा प्रस्तावित ‘अप्रैल थीसीज़’ वे प्रमुख लेखन हैं जिनमें हम लेनिन द्वारा हर दिन बदलती परिस्थितियों के द्वन्द्वात्मक मूल्यांकन को देख सकते हैं। ये वे प्रमुख रचनाएँ हैं जिनमें लेनिन फ़रवरी क्रान्ति के बाद हुए परिवर्तनों के अनुसार रूस की विशिष्ट परिस्थितियों में सर्वहारा समाजवादी क्रान्ति की रणनीति और आम रणकौशल को प्रतिपादित करते हैं।

इन रचनाओं ने पार्टी दायरों में तीखी बहसों की शुरुआत की। लेकिन हम फ़रवरी क्रान्ति से ले‍कर अक्टूबर क्रान्ति के पहले तक पार्टी के भीतर जारी विचारधारात्मक और राजनीतिक संघर्ष की चर्चा से पहले इस दौर में रूस में हुए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तनों का एक ब्यौरा पेश करना ज़रूरी समझते हैं ताकि उन विचारधारात्मक व राजनीतिक कार्यदिशाओं के संघर्ष के सन्दर्भ को समझा जा सके।

  1. फ़रवरी से अक्टूबर तक की विशिष्ट सामाजिक-आर्थिक व राजनीतिक परिस्थितियाँ : अन्तरविरोधों का एक सन्धि-बिन्दु जिसने सर्वहारा वर्ग को इतिहास के रंगमंच के केन्द्र में ला खड़ा किया

रूस में युद्ध के कारण जो आर्थिक विघटन पैदा हुआ था वह ज़ारशाही के दौर से ही जारी था। मॉरिस डॉब ने अपनी पुस्तक ‘सोवियत इकोनॉमिक डेवलपमेण्ट सिंस 1917’ में इस आर्थिक विघटन का विस्तृत चित्र उपस्थित करते हुए यह दिखलाया कि बुर्जुआ आरज़ी सरकार बनने के बाद इस आर्थिक विघटन पर क़ाबू पाने के लिए ऐसे कई क़दम उठाये गये, जो कि अन्य युद्धरत पूँजीवादी देशों में उठाये जा रहे थे। इन क़दमों को राजकीय इज़ारेदार पूँजीवाद के क़दम कहा जा सकता है। मिसाल के तौर पर, एक राजकीय बैंक की स्थापना, फ़सलों में व्यापार की इज़ारेदारी सरकार को देना, आदि। लेकिन बुर्जुआ वर्ग और भूस्वामी वर्ग इन क़दमों को कामयाब नहीं होने दे रहा था और आरज़ी सरकार का जो वर्ग चरित्र था वह किसी भी सूरत में इन वर्गों के सीधे विपरीत नहीं जा सकती थी। नतीजतन, आरज़ी सरकार के बनने के बाद युद्ध में भागीदारी जारी रही और साथ ही आर्थिक विघटन की प्रक्रिया भी थमने की बजाय और ज़्यादा बढ़ी।

कई अनुभववादी व संशोधनवादी (सामाजिक-जनवादी के अर्थ में नहीं बल्कि संशोधनवादी इतिहास-लेखन के अर्थ में) इतिहासकारों ने ज़ार निकोलस द्वितीय की शासन के दौरान आर्थिक विघटन को रोकने के लिए उठाये गये क़दमों की विफलता के लिए कुछ अक्षम व्यक्तियों को जि़म्मेदार ठहराया है, जो कि उस समय प्रमुख पदों पर थे। यह उस समय रूसी बुर्जुआ वर्ग की एक वर्ग के तौर पर ऐतिहासिक असफलता को समझने की बजाय एक व्यक्तिवादी (individualist) मूल्यांकन पेश करता है। ऐसे मूल्यांकन विशेष तौर पर रूसी क्रान्ति के अमेरिकी इतिहासकारों की रचनाओं में देखे जा सकते हैं। इनमें अग्रणी हैं अलेक्ज़ैण्डर रैबिनोविच, जिनकी तीन रचनाएँ (‘प्रिल्यूड टू दि रिवोल्यूशन’, ‘दि बोल्शेविक्स कम टू पावर’ और ‘दि बोल्शेविक्स इन पावर’) अपने विस्तृत दस्तावेज़ीय विश्लेषण के लिए पढ़ने योग्य हैं, हालाँकि उनकी रचनाओं में कई गम्भीर तथ्यात्मक ग़लतियाँ हैं। लेकिन उनके विश्लेषण की विचारधारा-अन्धता के बारे में जितना कम कहा जाये उतना अच्छा है। आइये उनके लेखन से ज़ारकालीन आर्थिक विघटन और राजनीतिक अराजकता के विश्लेषण का एक नमूना देखते हैं : ”वेर्दुन में और सोमने नदी पर हुए व्यर्थ रक्तपात से ब्रिटिश और फ़्रांसीसी सेनाओं का मनोबल भी उतना ही टूटा हुआ था। रूसी स्थिति को जिस चीज़ ने ज़्यादा त्रासद बना दिया था वह यह था कि मोर्चे पर गिरते मनोबल के साथ देश के भीतर राजनीतिक पक्षाघात और आर्थिक विघटन का पहलू मिश्रित हो गया था। रूस में कोई लॉयड जॉर्ज या क्लेमेंशो नहीं पैदा हुए जो कि पराजयवाद की बढ़ती भावना का गला घोंट पाते और जनता को एक निर्णायक राष्ट्रीय प्रयास के लिए तैयार कर पाते। याद किया जा सकता है कि 1914 में युद्ध की शुरुआत के समय रूसी जन भावना के बड़े हिस्से ने राजनीतिक विरोध का निषेध किया था और सरकार का वफ़ादारी से समर्थन किया था…अगर ऐसा ही था तो यह एक अवसर था जिसकी शुरू से उपेक्षा की गयी। हर जन पहलक़दमी की अभिव्यक्ति को विद्रोह के रूप में देखने की प्रवृत्ति के साथ निर्बल और अत्यधिक सठियाये हुए आई. एल. गोरेमाइकिन के तहत रूसी सरकार ने कई बेशक़ीमती प्रयासों को कुचलने में कोई कसर नहीं छोड़ी जैसे कि अखिल रूसी जेम्स्त्वो यूनियन और अखिल रूसी नगर यूनियन जिनका लक्ष्य था उद्योगों, शरणार्थी राहत कार्य, और चिकित्सीय सेवाओं के पुनर्संगठन के ज़रिये युद्ध प्रयास को आगे बढ़ाना।” (अलेक्ज़ैण्डर रैबिनोविच, 1991, ‘प्रिल्यूड टू रिवोल्यूशन : दि पेत्रोग्राद बोल्शेविक्स एण्ड दि जुलाई 1917 अपराइजि़ंग’, इण्डियाना यूनिवर्सिटी प्रेस, ब्लूमिंगटन एण्ड इण्डियाना पोलिस, पृ. 20-21) हमने रैबिनोविच का यह लम्बा उद्धरण इसलिए प्रस्तु‍त किया ताकि इतिहास-लेखन की इस प्रवृत्ति को स्पष्ट रूप से चिन्हित किया जा सके, जिस पर बुर्जुआ प्रत्यक्षवाद, अनुभववाद और व्यक्तिवादी विश्लेषण का गहरा असर है। रैबिनोविच ढाँचागत कारकों को पकड़ने की बजाय 1916-17 के दौर को रूसी बुर्जुआ वर्ग के लिए एक ‘गँवा दिये गये’ मौक़े के तौर पर देखते हैं, विशेषकर युद्ध के मामले में। रैबिनोविच के अनुसार यदि कोई लॉयड जॉर्ज या क्लेमेंशो जैसा बुर्जुआजी का सक्षम प्रतिनिधि रूस में भी मौजूद होता तो शायद युद्ध का अच्छी तरह संचालन हो पाता, आर्थिक विघटन और राजनीतिक-सामाजिक अराजकता रोकी जा सकती और शायद क्रान्ति को भी रोका या कम-से-कम टाला जा सकता। लेकिन रूस के उदार बुर्जुआ वर्ग ने ऐसा कोई नायक ही नहीं पैदा किया! इस बारे में यही कहा जा सकता है कि रैबिनोविच नहीं समझते कि हर देश को वैसा ही बुर्जुआ वर्ग मिलता है, जिसका वह अधिकारी होता है! बहरहाल, हम रैबिनोविच के इतिहास-लेखन की एक विस्तृत आलोचना इस अध्याय के परिशिष्ट के रूप में देंगे। (देखें इस अध्याय का परिशिष्ट ‘अलेक्ज़ैण्डर रैबिनोविच का इतिहास-लेखन : अन्तर्दृष्टि की दृष्टिहीनता’ जो कि अगले अंक में प्रकाशित होगा) इसका कारण यह है‍ कि रैबिनोविच के संशोधनवादी, प्रत्यक्षवादी, अनुभववादी और व्यक्तिवादी विश्लेषण को न सिर्फ़ बुर्जुआ अकादमिक दायरों में सराहा गया है, बल्कि कई त्रात्स्कीपन्थी भी रैबिनोविच के दीवाने हो गये हैं। इसका एक कारण यह है कि रैबिनोविच का इतिहास-लेखन त्रात्स्की को लेकर हमदर्दी से भरा हुआ है। लेकिन इसका दूसरा कारण स्वयं त्रात्स्कीपन्थ का टटपुँजिया वामपन्थी और अवसरवादी चरित्र है। बहरहाल, हम फि़लहाल अपने ब्यौरे पर वापस लौटते हैं।

इस आर्थिक विघटन के कारण जनता पर जो असर पड़ रहा था, वह भयंकर था। खाद्य संकट पैदा हो चुका था और कई इलाक़ों में अकाल जैसी स्थिति थी। 1917 की गर्मियाँ आते-आते रोटी की क़ीमत युद्धपूर्व स्तर से तीन गुना ज़्यादा हो चुकी थी। दुग्ध उत्पादों की क़ीमतें पाँच गुना और मांसाहारी खाद्य पदार्थों की क़ीमतें सात गुना बढ़ चुकी थीं। औद्योगिक उत्पादों और ईंधन की क़ीमत में तो और भी ज़्यादा बढ़ोत्तरी हुई थी। मौद्रिक मज़दूरी में हुई बढ़ोत्तरी केवल रोटी की क़ीमतों में बढ़ोत्तरी का मुक़ाबला कर सकती थी, लेकिन अन्य सभी उत्पादों की क़ीमतें मौद्रिक मज़दूरी से कहीं तेज़ रफ़्तार से बढ़ रही थीं। आरज़ी सरकार ने इस स्थिति से निपटने के लिए खाद्यान्न की क़ीमतों को नियन्त्रित करने का प्रयास किया। लेकिन इसके जवाब में किसानों ने एक प्रकार की बिक्री हड़ताल शुरू कर दी क्योंकि युद्ध प्रयासों के कारण औद्योगिक उत्पादन भयंकर विघटन का शिकार था और गाँव और शहर के बीच का विनिमय बुरी तरह से प्रभावित हुआ था। इसका नतीजा यह हुआ कि खाद्यान्न की राजकीय प्राप्ति में भारी गिरावट आयी। खाद्यान्न के राजकीय वितरण में विशेष तौर पर पेत्रोग्राद में लगभग 50 फ़ीसदी की गिरावट आयी। ये सारे कारक मज़दूरों, सैनिकों और किसानों के जनसमुदायों में असन्तोष को बढ़ाते जा रहे थे।

अक्टूबर के ठीक पहले तक रूस में परिवहन व्यवस्था पूरी तरह ढह गयी थी। नतीजतन, गाँवों और शहरों के बीच जो थोड़ा बहुत विनिमय हो रहा था वह भी समाप्त होने लगा और साथ ही मोर्चे पर रसद, गोला-बारूद और बन्दूक़़ों आदि की आपूर्ति पर भी भयंकर असर पड़ा। मित्र देशों से जो हथियार मिल रहे थे उनका गोदियों पर ढेर लगता जा रहा था क्योंकि उनको मोर्चों तक पहुँचाने के लिए परिवहन के साधन ही नहीं थे। कोयला, लोहा जैसे बुनियादी औद्योगिक सामानों का उत्पादन 1917 में पिछले वर्ष के मुक़ाबले तेज़ी से घटा था। इनके आँकड़ों के लिए देखें मॉरिस डॉब की ऊपर उल्लिखित पुस्तक (मॉरिस डॉब, 1972, ‘सोवियत इकोनॉमिक डेवलपमेण्ट सिंस 1917’, रूटलेज एण्ड कीगनपॉल, लन्दन, पृ 73-74) सूती मिलें कच्चे माल के तुर्केस्तान से न आ पाने के कारण बन्द होने लगीं। उराल क्षेत्र में आधे कारख़ाने बन्द हो चुके थे। अक्टूबर आते-आते अपने मज़दूरों की माँगों के जवाब में उद्योगपति मॉस्को और पेत्रोग्राद में तालाबन्दी कर रहे थे। नतीजतन, मोर्चे पर आपूर्ति के लिए उत्पादन भी ज़रूरत की तुलना में मात्र 20 प्रतिशत रह गया था। इन स्थितियों में सैनिकों में भी असन्तोष बढ़ता जा रहा था क्योंकि उन्हें मोर्चे पर सारे साज़ो-सामान से लैस जर्मन सेना का मुक़ाबला बिना जूतों, बन्दूक़ों, तोपों और रसद के करना पड़ रहा था। स्पष्ट है, यह एक प्रकार से रूसी सैनिकों की साम्राज्यवादी युद्ध में बलि देने के समान था। उपरोक्त सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों ने वह सन्दर्भ पैदा किया था जिसमें बुर्जुआ आरज़ी सरकार के ख़ि‍लाफ़ मज़दूरों और किसानों के जनसमुदायों में असन्तोष बढ़ते हुए सितम्बर तक इस मुक़ाम पर पहुँच गया था कि एक आम बग़ावत की स्थितियाँ और शर्तें तैयार हो गयी थीं। फ़रवरी से अक्टूबर के बीच आर्थिक विघटन को समझने के लिए हमारे विचार में अब भी मॉरिस डॉब की उपरोक्त उद्धृत रचना सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में से एक है। इसके अलावा, ई.एच. कार का विवरण भी देखने योग्य है। अब हम इसी दौर में हो रहे कुछ राजनीतिक परिवर्तनों पर निगाह डालते हैं।

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फ़रवरी क्रान्ति के बाद रूस में जो परिस्थिति पैदा हुई, उसे लेनिन ने ‘दोहरी सत्ता’ का नाम दिया। एक ओर मार्च के पहले सप्ताह में ज़ारकालीन दूमा के विरोध पक्ष ने आरज़ी सरकार का गठन किया, वहीं दूसरी ओर पेत्रोग्राद में कारख़ाना मज़दूरों व सैनिकों के प्रतिनिधियों ने पेत्रोग्राद सोवियत को संगठित किया। अलेक्ज़ैण्डर रैबिनोविच ने इसका जीवन्त चित्रण पेश किया है। 26 फरवरी को दूमा की प्रमुख पार्टियों, विशेषकर कैडेट पार्टी, ने एक आरज़ी कमेटी का गठन किया जिसने ज़ार द्वारा दूमा को भंग किये जाने और विसर्जित होने के निर्देश को स्वीकार नहीं किया। इस अवहेलना का मुख्य कारण यह था कि मज़दूरों की बग़ावत और सैनिकों द्वारा उसके समर्थन ने पहले ही ज़ार की सत्ता को एक नाममात्र की सत्ता में तब्दील कर दिया था। 27 फरवरी को जेल से रिहा हुए समाजवादी मज़दूर नेताओं और दूमा में समाजवादी प्रतिनिधियों के नेतृत्व में तौरीद प्रासाद में पेत्रोग्राद सोवियत का गठन हुआ। (देखें, अलेक्ज़ैण्डर रैबिनोविच, 1991, पृ. 27) पेत्रोग्राद सोवियत के गठन के बाद पहले बड़े शहरों में मज़दूरों ने अपनी सोवियतों का गठन किया और फिर छोटे शहरों और गाँवों में सोवियतों का गठन हुआ। इन सोवियतों ने मार्च 1917 में अपनी पहली अखिल रूसी सोवियत कॉन्फ्रें़स की, जिसमें कि मेंशेविक व समाजवादी-क्रान्तिकारी पार्टी बहुमत में थे। यहाँ सोवियतों के उभार के आन्दोलन के बारे मे कुछ शब्द कहना ज़रूरी है।

चार्ल्स बेतेलहाइम ने सोवियत आन्दोलन के बारे में कुछ सन्तुलित प्रेक्षण रखे हैं। बेतेलहाइम का मानना है कि पेत्रोग्राद सोवियत में बोल्शेविकों का असर अप्रैल के बाद से ही बढ़ता जा रहा था। वास्तव में, समाजवादी-क्रान्तिकारियों और मेंशेविकों ने मार्च में अखिल रूसी सोवियत सम्मेलन और फिर जून में अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस इसलिए की थी ताकि पेत्रोग्राद सोवियत के बढ़ते प्राधिकार को प्रतिसन्तुलित किया जा सके, हालाँकि वे ऐसा कर नहीं सके। बहरहाल, अक्टूबर क्रान्ति के ठीक एक दिन बाद शुरू हुई द्वितीय अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस में भी बोल्शेविकों ने बहुमत हासिल कर लिया। पेत्रोग्राद और मॉस्को की सोवियतों में तो वे अगस्त के अन्त और सितम्बर के प्रारम्भ में ही बहुमत में आ चुके थे। कारख़ाना समितियों में वे शुरू से ही बहुमत में थे। बेतेलहाइम का किसान सोवियतों के बारे में मूल्यांकन भी सटीक है, हालाँकि किसान प्रश्न पर उनकी पूरी समझदारी से यह मूल्यांकन पूरी तरह मेल नहीं खाता है। बेतेलहाइम लिखते हैं कि किसान सोवियतों में राजनीतिक चेतना का स्तर बहुत निम्न था। इसका एक कारण इन सोवियतों का समाजवादी-क्रान्तिकारी नेतृत्व और गाँवों में किसानों की राजनीतिक चेतना को मीर (ग्राम समुदाय) की संरचना द्वारा कुन्द किया जाना था जो कि वास्तव में धनी किसानों का और कुलकों का एक उपकरण बन चुका था। लेकिन एक दूसरा बुनियादी कारण किसान वर्ग चरित्र भी था। यही कारण था कि मज़दूर सोवियतों ने न सिर्फ़ आर्थिक माँगों को पूरा करने का प्रश्न उठाया बल्कि उन्होंने सत्ता का राजनीतिक प्रश्न भी उठा दिया लेकिन किसान सोवियतें अन्त तक सत्ता के प्रश्न को नहीं उठा सकीं। वे भूमि के प्रश्न पर ही सीमित रहीं और उससे आगे कभी नहीं सोच सकीं। इसमें किसान वर्ग चरित्र के पहलू की भूमिका हमारे विचार में समाजवादी-क्रान्तिकारी विचारधारात्मक व राजनीतिक नेतृत्व के पहलू से भी ज़्यादा अहम है क्योंकि अप्रैल के बाद से किसान सोवियतें व भूमि समितियाँ समाजवादी-क्रान्तिकारी पार्टी के संविधान सभा का इन्तज़ार करने के निर्देशों को भी नहीं मान रही थीं और भूमि क़ब्ज़ा आन्दोलन को आगे बढ़ा रही थीं। लिहाज़ा, किसान सोवियतों का बर्ताव केवल इस बात से तय नहीं हो रहा था कि उनके नेतृत्व में कौन सी राजनीतिक शक्ति है, बल्कि किसानों के वर्ग चरित्र से भी तय हो रहा था। बेतेलहाइम का यह प्रेक्षण भी बिल्कुल सटीक है कि यदि सर्वहारा आन्दोलन ने किसानों के आन्दोलन को अपने साथ जोड़ा न होता तो किसानों का आन्दोलन कभी सफल नहीं होता और आरज़ी सरकार उसे कुचलने में कामयाब हो जाती। यह बोल्शेविकों की गाँवों में कमज़ोर राजनीतिक स्थिति और प्रभाव था जिसकी वजह से बोल्शेविक समाजवादी क्रान्ति भूमि के प्रश्न पर रैडिकल बुर्जुआ कार्यक्रम से आगे नहीं जा पायी। वस्तुगत तौर पर, किसानों के भूमि क़ब्ज़ा आन्दोलन ने बोल्शेविक क्रान्ति के लिए एक अनुकूल सन्दर्भ तैयार किया। इस रूप में, बेतेलहाइम आंशिक तौर पर सही हैं और वे किसान सोवियतों के टटपुँजिया वर्ग चरित्र की सही पहचान करते हैं, हालाँकि जब वे अक्टूबर क्रान्ति के बाद किसान प्रश्न और बोल्शेविक पार्टी द्वारा इस प्रश्न के समाधान के प्रयासों की बात करते हैं कि तो वे ही मँझोली व खाती-पीती किसान आबादी के नैसर्गिक टटपुँजिया वर्ग चरित्र की बात भूल जाते हैं और क्रान्तिकारी जनदिशा के नाम पर ‘किसानवादी’ अवस्थिति से बोल्शेविक पार्टी की आलोचना पेश करते हैं, जिसकी आलोचना हम बेतेलहाइम और उनके रचना कर्म का मूल्यांकन करते समय कर चुके हैं। (देखें, अध्याय 4 का परिशिष्ट ‘चार्ल्स बेतेलहाइम का मार्क्सवाद : माओ से ज़्यादा ”माओवादी” बनने के प्रयास में मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद को तिलां‍जलि’, दिशा सन्धान, अक्टूबर-दिसम्बर, 2015, अंक 3, पृ. 13-202)

बेतेलहाइम के मूल्यांकन में यहाँ एक त्रात्स्कीपन्थी प्रभाव को भी आंशिक तौर पर देखा जा सकता है। वह कहते हैं कि किसान आन्दोलन रूस में रैडिकल बुर्जुआ वर्ग की अनुपस्थिति या कमज़ोरी के कारण सर्वहारा वर्ग का अचेतन समर्थक बन गया। त्रात्स्की का लेनिन से इसी बात पर मतभेद था कि लेनिन का मानना था कि सर्वहारा आन्दोलन को किसानों के समर्थन को और मुख्यत: ग़रीब किसानों के समर्थन को सचेतन तौर पर जीतना होगा, जबकि त्रात्स्की का मानना था किसान आन्दोलन एक अज्ञात चर राशि है जो राजनीतिक अचेतनता के साथ क्रान्ति या प्रतिक्रान्ति के साथ जा सकता है। इतिहास ने दिखलाया कि किसान आन्दोलन राजनीतिक अचेतनता के साथ बोल्शेविकों के साथ नहीं आया बल्कि इस राजनीतिक चेतना से लैस होने के चलते ही बोल्शेविकों के साथ आया कि भूमि के प्रश्न को रैडिकल तरीक़े से बोल्शेविक ही हल करेंगे, हालाँकि वह भूमि कार्यक्रम समाजवादी-क्रान्तिकारी पार्टी का था जिसे वह स्वयं रैडिकल तरीक़े से अमल में लाने को तैयार नहीं थी।

बहरहाल, मेंशेविकों और समाजवादी-क्रान्तिकारियों के नेतृत्व में पेत्रोग्राद सोवियत ने स्वेच्छा से राजनीतिक सत्ता दूमा के विपक्ष को हस्तान्तरित कर दी। पहली आरज़ी सरकार में कैडेट पार्टी (संवैधानिक जनवादी पार्टी, जो कि 1905 की क्रान्ति के बाद अस्तित्व में आयी थी और मुख्यत: रूस के उदार बुर्जुआ वर्ग की प्रमुख पार्टी थी, हालाँकि 60 प्रतिशत कैडेट कुलीन घरानों से आते थे और क्रान्तिकारी जनज्वार के समक्ष यह पार्टी अधिक से अधिक प्रतिक्रियावादी बनती गयी) का प्रभुत्व था और पाँच प्रमुख मन्त्रालय उनके हाथों में थे। वहीं पेत्रोग्राद सोवियत में अभी प्रमुख नेतृत्वकारी शक्ति मेंशेविक थे। इसीलिए पेत्रोग्राद सोवियत के पहले अध्यक्ष के तौर पर मेंशेविक नेता चखीद्जे को चुना गया था। मेंशेविक व गौण रूप से समाजवादी-क्रान्तिकारी नेतृत्व के कारण ही पेत्रोग्राद सोवियत ने, लेनिन के शब्दों में, ”स्वेच्छा से राजनीतिक सत्ता को बुर्जुआ आरज़ी सरकार को सौंप दिया।” दूमा के बुर्जुआ नेतृत्व ने मूलत: ज़ार निकोलस द्वितीय को हटाकर उसके भाई माईकेल रोमानोव को सत्ता में बिठाने की योजना बनायी थी जो कि रूसी बुर्जुआ वर्ग से ज़्यादा नज़दीकी रखता था। लेकिन फ़रवरी के जनविद्रोह ने स्पष्ट कर दिया था कि उदार बुर्जुआ वर्ग का यह प्रयास सफल होना मुश्किल है।

अलेक्ज़ैण्डर रैबिनोविच इसे कैडेट पार्टी द्वारा निरन्तरता के तत्व को बनाये रखने का प्रयास बताते हैं, जो कि कैडेट पार्टी के रूढि़वाद को बेहतर रोशनी में पेश करने का प्रयास करता है। लेकिन वस्तुगत तौर पर वह एक सही प्रेक्षण पेश करते हैं, ”शुरुआत में कुछ दूमा के उदारवादी, जिसमें कि कैडेट नेता पॉल मिल्यूकोव शामिल थे, ने उम्मीद की कि अतीत से कुछ निरन्तरता बनाये रखी जाये और एक लो‍कप्रिय रूप से चुनी सरकार के साथ एक संवैधानिक राजतन्त्र की स्थापना की जाये, लेकिन क्रान्ति पहले ही इस मंजि़ल से आगे जा चुकी थी।” (रैबिनोविच,1991, ‘प्रिल्यूड टू रिवोल्यूशन’, पृ. 28)

युद्ध में लगातार पराजयों ने यह स्पष्ट कर दिया था कि ज़ारशाही रूसी बुर्जुआ वर्ग के हितों के मुताबिक़ युद्ध का संचालन नहीं कर सकती है। यही कारण था कि बुर्जुआ वर्ग भी ज़ार के ख़ि‍लाफ़ हो गया था। बुर्जुआ वर्ग रैडिकल तरीक़े से राजतन्त्र को ख़त्म करने की बजाय दूमा की शक्तियों को बढ़ाने और माईकेल रोमानोव को गद्दी पर बिठाना चाहता था। लेकिन बुर्जुआ वर्ग की योजनाएँ अमल में आ पातीं, इससे पहले ही एक जनविद्रोह ने ज़ार की सत्ता पलट दी और राजतन्त्र से किसी भी प्रकार के समझौते की सम्भावना को समाप्त कर दिया। लेकिन फ़रवरी क्रान्ति के दौरान अस्तित्व में आयी मज़दूरों व सैनिकों के प्रतिनिधियों की पेत्रोग्राद सोवियत ने मेंशेविक नेतृत्व के कारण सत्ता स्वयं अपने हाथों में नहीं ली बल्कि उसे बुर्जुआ आरज़ी सरकार के हाथों में सौंप दिया। रैबिनोविच का मूल्यांकन सही है कि मेंशेविक नेतृत्व में सोवियत ने क्रान्ति का नेतृत्व अपने हाथ में लेने की बजाय क्रान्ति का रखवाला बनने की भूमिका चुनी। इसका कारण जनवादी क्रान्ति के स्वरूप को लेकर मेंशेविकों और ”क़ानूनी मार्क्सवादियों” की पूरी समझदारी थी।

जैसा कि हमने पिछले अध्याय में रूसी सामाजिक-जनवादी आन्दोलन में जारी राजनीतिक संघर्ष पर चर्चा करते समय बताया था, जनवादी क्रान्ति के स्वरूप को लेकर मेंशेविकों और बोल्शेविकों में बुनियादी फ़र्क़ यह था कि मेंशेविकों का मानना था कि जनवादी क्रान्ति का नेतृत्व बुर्जुआ वर्ग के हाथों में रहेगा और सर्वहारा वर्ग की भूमिका एक ऐसे विपक्ष की होगी जो कि बुर्जुआ वर्ग पर जनवादी क्रान्ति के कार्यभार पूरे करने के लिए दबाव बनायेगा। सर्वहारा वर्ग जनवादी क्रान्ति के कार्यभार को अपने नेतृत्व में सम्पन्न नहीं कर सकता और ऐसा करना जनवादी क्रान्ति के चरण को लाँघने के समान होगा। बुर्जुआ वर्ग के नेतृत्व में सम्पन्न जनवादी क्रान्ति के बाद सर्वहारा वर्ग को दीर्घकाल तक पूँजीवादी व्यवस्था के तहत शिक्षित-प्रशिक्षित होना होगा और उसके बाद ही वह समाजवादी क्रान्ति को सम्पन्न करने के बारे में सोच सकता है क्योंकि तभी उसका आकार और उसकी चेतना इस लायक हो सकेगी।

चार्ल्स बेतेलहाइम ने अपनी पुस्तक ‘क्लास स्ट्रगल्स इन दि यूएसएसआर’ के पहले खण्ड में लिखा है कि मेंशेविक मानते थे कि सोवियतें सत्ता का निकाय नहीं बन सकतीं क्योंकि उसमें किसानों और बुर्जुआ वर्ग का एक हिस्सा शामिल नहीं था और उन्हें ”क्रान्तिकारी संघर्ष” और प्रचार के मंच की भूमिका निभानी चाहिए (चार्ल्स बेतेलहाइम, 1976, ‘क्लास स्ट्रगल्स इन दि यूएसएसआर, फ़र्स्ट पीरियड : 1917-23’, दि हार्वेस्टर प्रेस लि., ससेक्स, पृ. 73)। लेकिन यह बात पूरी तरह सही नहीं है। मेंशेविकों द्वारा सोवियतों को राज्यसत्ता का निकाय बनाने का मुख्य विरोध जनवादी क्रान्ति को लेकर उनकी समझदारी से पैदा होता था, जिसके अनुसार जनवादी क्रान्ति और फिर पूँजीवाद के दीर्घकालिक विकास की मंजि़ल में सर्वहारा वर्ग और ग़रीब किसान आबादी नेतृत्व की भूमिका में नहीं रह सकती और नेतृत्व बुर्जुआ वर्ग के हाथ में ही रहेगा। यही कारण था कि पेत्रोग्राद सोवियत और दूमा के विपक्ष के बीच समझौते के फलस्वरूप बुर्जुआ आरज़ी सरकार का गठन हुआ था और सोवियतों को क्रान्तिकारी विरोध की भूमिका तक सीमित कर दिया गया था, हालाँकि व्यवहारत: ऐसा हुआ नहीं और सोवियतें राज्यसत्ता के निकाय के रूप में उभरने लगीं।

फ़रवरी क्रान्ति के पहले लेनिन का भी मानना था कि रूस अभी जनवादी क्रान्ति की मंजि़ल में है लेकिन उनका मानना था कि रूसी बुर्जुआ वर्ग जनवादी क्रान्ति को रैडिकल तरीक़े से मुक़ाम पर नहीं पहुँचा सकता है। फ़रवरी क्रान्ति के साथ और बुर्जुआ आरज़ी सरकार के अस्तित्व में आने के साथ जनवादी क्रान्ति का कार्यभार मूल रूप से पूरा हो गया है क्योंकि राज्यसत्ता का प्रश्न मुख्यत: और मूलत: हल हो गया है, हालाँकि आरज़ी बुर्जुआ सरकार जनवादी क्रान्ति के समस्त कार्यभारों को, विशेष तौर पर भूमि सुधार के कार्यभारों को और साथ ही मज़दूर वर्ग के जनवादी अधिकारों को पूरा करने के कार्यभारों को रैडिकल तौर पर सम्पन्न नहीं कर सकती है; युद्ध और सोवियत सत्ता के रूप में मज़दूरों और किसानों की क्रान्तिकारी जनवादी तानाशाही के सम्भावना-सम्पन्न रूप में अस्तित्व में आने की विशिष्ट परिस्थितियों के कारण बुर्जुआ वर्ग और उसकी आरज़ी सरकार भयाक्रान्त होकर प्रतिक्रियावादी वर्गों की शरण लेगी और बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति का भी गला घोंट देगी। इसलिए लेनिन का मानना था कि फ़रवरी क्रान्ति में मज़दूर वर्ग को नेतृत्व अपने हाथों में लेना चाहिए था और पूरे किसान वर्ग को साथ लेकर बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के कार्यभारों को क्रान्तिकारी और रैडिकल तरीक़े से पूरा करना चाहिए था और उसके बाद, बिना रुके, गाँवों के मज़दूर वर्ग और ग़रीब किसान आबादी यानी कि अर्द्धसर्वहारा वर्ग को साथ लेकर समाजवादी क्रान्ति की ओर आगे बढ़ना चाहिए था। पहले ‘सुदूर से पत्र’ और ‘अप्रैल थीसीज़’ और उसके बाद अप्रैल से लेकर सितम्बर तक के लेनिन के लेखन में इन विचारों को मूर्त रूप ग्रहण करते हुए देखा जा सकता है। जनवादी क्रान्ति में सर्वहारा वर्ग और ग़रीब किसानों की नेतृत्वकारी भूमिका के बारे में वे बारह वर्ष पहले ही लिख चुके थे।

बहरहाल, ऐसा नहीं हो सका और सर्वहारा वर्ग जनवादी क्रान्ति में नेतृत्व में नहीं आ पाया, जिसके कई कारण थे। पहला कारण तो यह था कि पेत्रोग्राद सोवियत में बोल्शेविक पार्टी बहुमत में नहीं थी। पेत्रोग्राद सोवियत जो कि लगभग स्वत:स्फूर्त रूप से जनता की क्रान्तिकारी पहलक़दमी से अस्तित्व में आयी थी, मेंशेविकों के नियन्त्रण में थी, हालाँकि शहरी कारख़ाना मज़दूरों का एक अच्छा-ख़ासा हिस्सा बोल्शेविकों के पक्ष में भी था। साथ ही समाजवादी-क्रान्तिकारियों को भी सोवियतों में अच्छा-ख़ासा प्रति‍निधित्व मिला हुआ था। किसान सोवियतों में तो वे बहुमत में थे। लुब्बेलुबाब यह कि सोवियत सत्ता जो कि आरज़ी सरकार के समानान्तर सत्ता के तौर पर अस्तित्व में आयी थी, वह बोल्शेविकों के नेतृत्व में नहीं थी। दूसरे शब्दों में, सर्वहारा राजनीति और विचारधारा सोवियतों में अभी वर्चस्वकारी स्थिति में नहीं थे। यही कारण था कि पेत्रोग्राद सोवियत ने मेंशेविकों और समाजवादी-क्रान्तिकारियों के टटपुँजिया नेतृत्व में फ़रवरी क्रान्ति में सत्ता अपने हाथों में लेने की बजाय, स्वेच्छा से उसे कैडेट पार्टी-नीत बुर्जुआ आरज़ी सरकार के हाथों में सौंप दिया, जो कि मूलत: एक पूँजीपति वर्ग और कुलक व युंकर भूस्वामी वर्ग की नुमाइन्दगी करती थी।

पेत्रोग्राद सोवियत द्वारा राजनीतिक सत्ता को बुर्जुआ आरज़ी सरकार के हाथों सौंपे जाने के बावजूद मज़दूरों और सैनिकों के बीच पेत्रोग्राद सोवियत मान्य और वास्तविक सत्ता बनने लगी थी। रैबिनोविच इस विषय में लिखते हैं, ”हालाँकि 2 मार्च को स्थापित की गयी आरज़ी सरकार को सोवियत का औपचारिक समर्थन प्राप्त था, लेकिन वस्तुत: पेत्रोग्राद की ज़्यादा रैडिकल रुझान रखने वाली कार्यकारी समिति अपने संघटक तत्वों से सतत दबाव में आरज़ी सरकार के मसलों पर एक रखवाली करने वाले निकाय की भूमिका निभाती थी। यह व्यवस्था अस्थायी थी क्योंकि ल्वोव कैबीनेट को केवल औपचारिक सरकार के तौर पर मान्यता प्राप्त थी, जबकि सोवियत, हालाँकि वह स्वयं अपने हाथों में शक्ति लेने में झिझक रही थी, उस भरोसे के कारण कहीं ज़्यादा अन्तर से एक अधिक शक्तिशाली ताक़त थी जो कि उसमें औद्योगिक मज़दूरों और सशस्त्र बलों के राजनीतिक रूप में से सचेत हिस्सों ने जताया था।” (रैबिनोविच, 1991, पृ. 31) अधिक से अधिक मज़दूर और मोर्चे से लौटने वाले सैनिक आरज़ी सरकार के प्रति असन्तोष और गुस्से से भरते जा रहे थे और पेत्रोग्राद सोवियत को ही वे अपनी राजनीतिक सत्ता मान रहे थे। इसका कारण यह था कि कुछ शुरुआती जनवादी सुधार करने (जैसे कि सभी राजनीतिक बन्दियों को छोड़ना, मृत्युदण्ड का उन्मूलन करना, प्रेस व अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को औप‍चारिक तौर पर लागू करना, आदि) के अतिरिक्त बुर्जुआ आरज़ी सरकार ने मज़दूरों और किसानों की बुनियादी और सबसे अहम माँगों पर टाल-मटोल करने का रुख़ अपनाया था। ये माँगें थीं शान्ति, रोटी और ज़मीन की माँग। साथ ही, जो जनवादी सुधार उसे तत्काल करने पड़े उसका भी असली कारण मज़दूर और सैनिकों की सोवियतों का दबाव था। फ़रवरी क्रान्ति के बाद मज़दूरों और सैनिकों को आरज़ी सरकार निरस्त्र नहीं कर सकी थी और जनसमुदाय अभी भी हथियारबन्द थे। इसके कारण पेत्रोग्राद सोवियत की समानान्तर सत्ता केवल औपचारिक नहीं थी, बल्कि वास्तविक थी। उसके द्वारा डाले गये दबाव के कारण ही आरज़ी सरकार को कुछ जनवादी व नागरिक अधिकारों को पूरा करना पड़ा। लेकिन जनता की मूल माँग थी – युद्ध का ख़ात्मा और शान्ति, रोटी और ज़मीन। आरज़ी सरकार ने सत्ता में आने के बाद साम्राज्यवादी युद्ध से रूस की भागीदारी समाप्त नहीं की और कुछ हफ़्तों बाद ही मित्र शक्तियों से किये गये वायदों को पूरा करने की बात करने लगी। उसने जनता के बीच भी ”राष्ट्रीय रक्षा” की कार्यदिशा को हावी कराने का प्रयास किया। फ़रवरी क्रान्ति के ठीक बाद के दौर में कुछ समय तक किसानों, मध्य वर्ग और मज़दूरों के भी एक हिस्से में इसी ”राष्ट्रीय रक्षा” की सोच का असर भी था।

भूमि के प्रश्न पर आरज़ी सरकार ने यह कहकर टाल-मटोल शुरू किया कि यह एक ऐसा अहम मसला है जिस पर संविधान सभा बुलाये जाने के बाद ही फ़ैसला हो सकता है। तात्कालिक तौर पर, कैडेट पार्टी-नीत सरकार ने गाँवों में भूमि समितियों के गठन का निर्णय लिया। लेकिन इन भूमि समितियों के पास करने को कुछ ख़ास नहीं था और उन पर कुलकों का नियन्त्रण ज़्यादा था। वास्तव में मूलत: इनका मुख्य कार्य था कि बढ़ते किसान असन्तोष और छिटपुट विद्रोहों पर क़ाबू पाया जाये। मोर्चे पर मिल रही लगातार हार के कारण साम्राज्यवादी युद्ध को ख़त्म करने की माँग ज़ोर पकड़ती जा रही थी। जो सैनिक मोर्चे से लौट रहे थे, वे वास्तव में किसानों के ही बेटे थे। उनके लौटने के साथ गाँवों में ज़मीन और शान्ति की माँग विकराल रूप में भड़कने लगी थी। कैडेट पार्टी-नीत सरकार द्वारा गठित भूमि समितियों पर समाजवादी-क्रान्तिकारियों ने क़ब्ज़ा कर लिया। उनकी माँग ज़मीन के राष्ट्रीकरण और बँटवारे की थी। लेकिन वे केवल भूस्वामियों की ज़मीन की ज़ब्ती की बात कर रहे थे और धनी व खाते-पीते किसानों की ज़मीन की ज़ब्ती और बँटवारे की बात नहीं कर रहे थे। कैडेट पार्टी का भूमि कार्यक्रम और भी प्रतिक्रियावादी था। यह बड़े युंकरों की ज़मीन ज़ब्ती के बदले उन्हें मुआवज़ा देने की बात करता था। किसान इसके ख़िलाफ़ थे। बोल्शेविक बड़ी जागीरों को ज़ब्त करने के साथ-साथ धनी किसानों की ज़मीनों को भी ज़ब्त करने और फिर जनवादी बँटवारे की माँग कर रहे थे। आगे बोल्शेविकों ने समाजवादी-क्रान्तिकारियों के भूमि कार्यक्रम को क्रान्ति के ठीक पहले ज्यों का त्यों अपना लिया। इसके कई कारण थे।

एक कारण तो यह था कि किसान आबादी में पूँजीवादी विकास के तौर पर आर्थिक तौर पर वर्ग विभाजन काफ़ी आगे बढ़ चुका था लेकिन राजनीतिक तौर पर अभी गाँवों में ग़रीब, निम्न मँझोले, मँझोले और धनी किसानों के बीच विभाजन नहीं हुआ था। दूसरा कारण जो कि पहले कारण से जुड़ा हुआ है वह यह था कि गाँवों में बोल्शेविक पार्टी का राजनीतिक आधार केवल नाममात्र का ही था। गाँवों में समाजवादी-क्रान्तिकारी पार्टी का आधार सबसे ज़्यादा था और यही कारण था कि किसान आबादी में आर्थिक विभाजन के काफ़ी आगे बढ़ने के बावजूद राजनीतिक विभाजन अभी बेहद आदिम और पिछड़ा हुआ था। किसान आबादी के आर्थिक विभेदीकरण और राजनीतिक विभेदीकरण के फ़र्क़ पर हम पिछले अध्याय के परिशिष्ट में थोड़ी चर्चा कर चुके हैं, जब हम चार्ल्स बेतेलहाइम की आलोचना रख रहे थे।

गाँवों में इन राजनीतिक स्थितियों के मद्देनज़र बोल्शेविक पार्टी ने फ़रवरी क्रान्ति के बाद किसानों के बीच अपने आ‍धार को विस्तारित करने पर सबसे ज्यादा ज़ोर दिया। बोल्शेविकों ने निरन्तरता के साथ किसानों की भूमि समितियों द्वारा ज़मीन पर क़ब्ज़े के आन्दोलन का समर्थन किया। जैसा कि हमने जि़क्र किया है, ये भूमि समितियाँ वास्तव में पहली आरज़ी सरकार के कैडेट कृषि मन्त्री द्वारा ही बनायी गयीं थीं ताकि बढ़ते किसान असन्तोष पर क़ाबू पाया जा सके। लेकिन इन किसान समितियों पर समाजवादी-क्रान्तिकारियों ने क़ब्ज़ा कर लिया था, जो कि भूमि के राष्ट्रीकरण का समर्थन तो करते थे, मगर भूमि समितियों द्वारा स्वत:स्फूर्त रूप से ज़मीन क़ब्ज़े के आन्दोलन का समर्थन नहीं करते थे। वे किसानों से कह रहे थे कि संविधान सभा तक इन्तज़ार किया जाना चाहिए। बोल्शेविक भी भूमि के राष्ट्रीकरण और बँटवारे की बात कर रहे थे, मगर वे भूमि समितियों द्वारा ज़मीन क़ब्ज़े की मुहिम का खुलकर समर्थन कर रहे थे। लेनिन का मानना था कि ज़मीन क़ब्ज़े की मुहिम के साथ रूसी जनवादी क्रान्ति अपने अगले चरण में प्रवेश कर गयी है। उनका कहना था कि एक मार्क्सवादी के लिए कार्रवाई (action) उसकी वैधिकता (legality) के पैदा होने से पहले आती है। बोल्शेविकों ने कहा कि हम संविधान सभा के इन्तज़ार के तर्क को ग़लत मानते हैं और किसानों द्वारा ज़मीन क़ब्ज़े की कार्रवाई का समर्थन करते हैं। लेनिन स्पष्टत: इस बात को समझ रहे थे कि समाजवादी-क्रान्तिकारी और मेंशेविक बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति को रैडिकल तरीक़े से मुक़ाम तक पहुँचाने की बजाय क्रान्ति को बुर्जुआ वैधिकता के दायरे में रखना चाहते हैं। इस रूप में जनवादी क्रान्ति कभी पूर्णता तक नहीं पहुँच सकती है। लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविक पार्टी ने किसानों के भूमि पर क़ब्ज़े के आन्दोलन को लगातार पूर्ण समर्थन देना जारी रखा।

मॉरिस डॉब बताते हैं कि अप्रैल में ही किसानों ने ज़मीन पर क़ब्ज़े की मुहिम को शुरू कर दिया था। अभी ये कार्य कई जगहों पर स्थानीय सोवियतें कर रही थीं। जैसा कि हमने ऊपर उल्लेख किया है, 3 मई को आरज़ी सरकार की एक आज्ञप्ति द्वारा भूमि समितियाँ स्थापित की गयीं जिनका कार्य था संविधान सभा के बैठने तक भूमि सुधारों के लिए ”तैयारी” करना और इसके लिए ”कुछ आरज़ी क़दम उठाने का मसौदा” तैयार करना। ज़ाहिर है, ये भूमि समितियाँ सरकार ने केवल दिखावे के लिए बनायी थीं ताकि किसानों के बढ़ते असन्तोष पर कुछ पानी के छींटे डाले जा सकें और उन्हें तुष्ट किया जा सके। लेकिन 15 दिनों के भीतर ही इन भूमि समितियों पर
समाजवादी-क्रान्तिकारियों का क़ब्ज़ा हो गया। इसके बाद समाजवादी-क्रान्तिकारी पार्टी के भी निर्देशों की अवहेलना करते हुए और सरकार से स्वायत्त तौर पर इन समितियों ने भूमि क़ब्ज़े के आन्दोलन को व्यवस्थित तौर पर आगे बढ़ाया। मई में 175 जि़लों में भूमि क़ब्ज़े़ की रपटें आयीं। जून में क़रीब 300 जि़लों से भूमि क़ब्ज़े की ख़बरें आयीं। जैसा कि मॉरिस डॉब बताते हैं, कैडेट पार्टी के अधिक से अधिक प्रतिक्रान्ति और प्रतिक्रिया के पक्ष में जाने के अलावा, जुलाई में प्रिंस ल्वोव के इस्तीफ़े का एक प्रमुख कारण यह भी था कि उनका समाजवादी-क्रान्तिकारी कृषि मन्त्री इन भूमि क़ब्ज़ों को वैध बता रहा था और इसके कारण संविधान सभा की प्रासंगिकता समाप्त होती जा रही थी।

अक्टूबर की शुरुआत आते-आते ज़मीनों पर क़ब्ज़े की घटनाएँ अप्रैल के स्तर से क़रीब 20 गुना बढ़ चुकी थी और केरेंस्की सरकार मोर्चे से कई सैन्य दस्तों को किसानों को कुचलने के लिए बुलाने पर विचार कर रही थी। मॉरिस डॉब बताते हैं कि इन आन्दोलन में एक पैटर्न को देखा जा सकता था। शुरुआती दौर में ये जागीरों को आग लगा देने और उन्हें लूट लेने जैसी अराजक घटनाओं से शुरू हुआ और आगे चलकर इसने व्यवस्थित और संगठित तौर पर ज़मीनों पर क़ब्ज़े का स्वरूप धारण कर लिया। दूसरी ग़ौर करने वाली बात यह थी कि इस आन्दोलन में अपवादस्वरूप कुछ जगहों पर ज़मींदारों के कारिन्दों को मारा गया, अन्यथा, यह आन्दोलन ज़्यादातर शान्तिपूर्ण तरीक़े से क़ब्ज़े के रूप में विकसित हुआ। मॉरिस डॉब ने भूमि समितियों के आन्दोलनों का समाहार करते हुए लिखा है, ”भूदास प्रथा के दिनों में किसानों के बीच एक कहावत प्रचलित थी : ”हम ज़मींदारों के हैं, लेकिन जिस ज़मीन पर हम काम करते हैं, वह हमारी है।” अब किसानों ने इसे नये दौर के मिजाज़ के मुताबिक़ बदल लिया था : ”ज़मींदार हमारा ज़मींदार है : हम उसके लिए काम करते थे और उसकी सम्पत्ति हमारी है।” ” (मॉरिस डॉब,1972, ‘सोवियत इकोनॉमिक डेवेलपमेण्ट सिंस 1917’, पृ. 76)

इसी बीच एक ऐसा परिवर्तन भी हुआ था जिसके कारण भूमि प्रश्न पर किसानों का समर्थन जीतने का सुनहरा अवसर बोल्शेविकों को मिल गया था। अप्रैल 1917 में पहली आरज़ी सरकार के विदेश मन्त्री मिल्युकोव ने मित्र शक्तियों को प्रथ‍म विश्व युद्ध में ”गौरवपूर्ण लक्ष्य की प्राप्ति” तक रूस का पूर्ण सैन्य सहयोग देने की घोषणा की। इसके कारण, आरज़ी सरकार के विरुद्ध ज़बरदस्त माहौल तैयार हुआ और उसके ख़िलाफ़ प्रदर्शनों का दौर शुरू हो गया। आरज़ी सरकार के भीतर, जिसके मुखिया इस समय कैडेट पार्टी के ज्यॉर्जी ल्वोव थे, एक संकट की शुरुआत हो गयी। इस संकट का नतीजा यह हुआ कि विदेश मन्त्री मिल्युकोव और युद्ध व नौसेना मन्त्री गुचकोव को इस्तीफ़ा देना पड़ा। इस इस्तीफ़े के बाद, सरकार में सोवियतों में प्रभावी प्रमुख पार्टियों को शामिल करके नयी संयुक्त सरकार का गठन किया गया। इस नयी सरकार में बोल्शेविक पार्टी को छोड़कर सभी समाजवादी पार्टियों ने हिस्सेदारी की। मेंशेविकों और समाजवादी-पार्टी के आरज़ी सरकार में शामिल होने के साथ, उनके बेनक़ाब होने की ज़मीन तैयार हो गयी। मेंशेविक अब तक यह दावा करते रहे थे कि वे आरज़ी सरकार में शामिल नहीं होंगे और ”विपक्ष” की पार्टी बने रहेंगे। इस नयी स्थिति को बोल्शेविक पूरी तरह समझ रहे थे और उन्होंने इस अवसर का पूरा लाभ उठाया। कृषि मन्त्रालय अब एक समाजवादी-क्रान्तिकारी पार्टी के मन्त्री के हाथों में था और भूमि सुधारों को तत्काल लागू करने की जि़म्मेदारी अब सीधे उसके सिर थी। समाजवादी-क्रान्तिकारी अभी भी किसानों की भूमि समितियों को संविधान सभा का इन्तज़ार करने की नसीहतें दे रहे थे और ज़मीन क़ब्ज़ा करने की मुहिम को रोकने के लिए कह रहे थे। युद्ध के कारण जो आर्थिक संकट पैदा हुआ था उसने शहरों में आम ग़रीब आबादी और साथ ही गाँवों में किसानों के लिए भयंकर स्थिति पैदा कर दी थी। शहरों में खाद्य सामग्री की कमी वस्तुत: अकाल जैसी स्थिति पैदा कर रही थी। आरज़ी सरकार द्वारा युद्ध में हिस्सेदारी को ख़त्म न करने के फ़ैसले के कारण उत्पादक आबादी के एक अच्छे-ख़ासे हिस्से को मोर्चे पर भेज दिया गया था। कारख़ाने बन्द हो रहे थे और गाँवों और शहरों के बीच विनिमय टूट चुका था। किसान आबादी युद्ध के विरुद्ध और ज़मीन के लिए एक प्रकार का असहयोग छेड़ चुकी थी। इनकी चर्चा हम ऊपर सा‍माजिक-आर्थिक विघटन का विवरण पेश करते समय कर चुके हैं। मोर्चे से सैनिकों के गाँवों में लौटने से भूमि के लिए हो रहे आन्दोलन ने और भी ज़्यादा आक्रामक रुख़ अख्तियार कर लिया था। ऐसी स्थिति में, समाजवादी-क्रान्तिकारी पार्टी के समझौतापरस्त रुख़ के कारण उसका किसानों के बीच दबदबा धीरे-धीरे घटने लगा।

अप्रैल से ही सभी सोवियत कांग्रेसों में समाजवादी-क्रान्तिकारी पार्टी की स्थिति ख़राब होनी शुरू हो गयी थी। उनका नारा तो भूमि के राष्ट्रीकरण और भूमि समितियों द्वारा भूमि के पुनर्वितरण का ही था, मगर उनके अनुसार इस सारे कार्य को संविधान सभा के फ़ैसले तक रोके रखा जाना चाहिए। दूसरी ओर बोल्शेविकों ने किसान सोवियतों में भी अपनी अवस्थिति को निरन्तरतापूर्ण तरीक़े से रखा और सितम्बर आते-आते क्रमिक प्रक्रिया में भूमि क़ब्ज़े के प्रश्न पर अपने कार्यक्रम पर किसानों के समर्थन को जीता।

अगस्त 1917 में अखिल रूसी किसान सोवियत कांग्रेस हुई। कांग्रेस पर समाजवादी-क्रान्तिकारियों का वर्चस्व स्पष्ट रूप से देखा जा सकता था। इस कांग्रेस में समाजवादी-क्रान्तिकारियों ने एक ”आदर्श आज्ञप्ति” पारित की जिसमें भूमि के राष्ट्रीकरण और भूमि समितियों द्वारा पुनर्वितरण के एजेण्डे को दुहराया गया लेकिन इसके लिए संविधान सभा का इन्तज़ार करने का प्रावधान किया गया। लेनिन ने इस आज्ञप्ति के कार्यक्रम का समर्थन किया लेकिन साथ ही यह कहा कि यह कार्य अब बिना समाजवादी क्रान्ति के सम्भव नहीं है। इसका एक कारण तो यह है कि आरज़ी सरकार संविधान सभा के नाम पर इस कार्यभार को टालती रहेगी और युद्ध में रूसी भागीदारी को समाप्त नहीं करेगी, लेकिन इसका दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण यह है कि अधिकांश बड़े भूस्वामियों ने अपनी जागीरों को बैंकों को गिरवी रख दिया है और अब भूमि के राष्ट्रीकरण का प्रश्न बैंकों के राष्ट्रीकरण के साथ जुड़ गया है। यह कार्य अब केवल मज़दूर क्रान्ति द्वारा ही पूरा हो सकता है और उसके बाद ही ज़मीन का राष्ट्रीकरण और पुनर्वितरण किया जा सकता है। यहाँ लेनिन स्पष्ट रूप से यह सम्प्रेषित कर रहे थे कि अब बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति की जारी प्रक्रिया को बुर्जुआ वर्ग की आरज़ी सरकार मुक़ाम पर नहीं पहुँचायेगी और वह ज़्यादा से ज़्यादा प्रतिक्रियावादी होती जायेेगी। लेनिन इस बात को भी समझ रहे थे कि इस सूरत में समाजवादी मज़दूर क्रान्ति बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के कार्यभारों को पूरा करते हुए समाजवाद की ओर ‘कुछ आरम्भिक क़दम’ बढ़ायेगी। निश्चित तौर पर, यह समाजवादी क्रान्ति तुरन्त ‘समाजवाद की शुरुआत’ (immediate introduction of socialism) कर दे यह सम्भव नहीं होगा और इसके एजेण्डे पर तात्कालिक तौर पर यह प्रश्न होगा कि यह बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के अधूरे कार्यभारों को सर्वाधिक क्रान्तिकारी तरीक़े से पूर्ण करे और समाजवादी व्यवस्था की ओर कुछ पहले क़दम बढ़ाये।

लेनिन पर समाजवादी-क्रान्तिकारियों और साथ ही कुछ बोल्शेविकों ने भी यह आरोप लगाया कि उन्होंने समाजवादी-क्रान्तिकारी पार्टी के भूमि कार्यक्रम को शब्दश: अपना लिया। लेनिन ने इस आलोचना का जवाब देते हुए कहा कि रणकौशलात्मक तौर पर यह ज़रूरी था क्योंकि यह व्यापक किसान आबादी की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता था। चूँकि किसान आर्थिक तौर पर विभाजित होने के बावजूद राजनीतिक तौर पर बोल्शेविक पार्टी के मूल भूमि कार्यक्रम पर सहमत नहीं थे, चूँकि समाजवादी-क्रान्तिकारी पार्टी अपने रैडिकल जनवादी भूमि कार्यक्रम पर अमल नहीं कर रही थी और चूँकि युद्ध और सोवियत सत्ता के तौर पर समानान्तर सत्ता के उभार ने एक विशिष्ट स्थिति पैदा कर दी थी, इसलिए बोल्शेविक पार्टी को समाजवादी-क्रान्तिकारी पार्टी के रैडिकल भूमि कार्यक्रम को अपनाना चाहिए और उसे क्रान्तिकारी तरीक़े से मुक़ाम तक पहुँचाना चाहिए, जिसके लिए कोई भी बुर्जुआ या टटपुँजिया पार्टी तैयार नहीं थी। लेनिन ने स्पष्ट किया कि समाजवादी भूमि कार्यक्रम को लागू करते हुए भी मज़दूर सत्ता उजरती श्रम का शोषण न करने वाले मँझोले व ग़रीब किसानों की ज़मीनों को ज़बरन नहीं छीनती बल्कि उन्हें लम्बी प्रक्रिया में समझाने-बुझाने और मॉडल व सामूहिक फ़ार्मों की मिसाल पेश करने के रास्ते सामूहिकीकरण के कार्यक्रम पर राजी करती। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना होता कि समाजवादी भूमि कार्यक्रम लागू करते हुए बड़ी जागीरों और बड़े किसानों की ज़मीनों को तत्काल राजकीय व सामूहिक फ़ार्मों में तब्दील किया जाता। लेकिन रूस की विशिष्ट परिस्थितियों में समाजवादी सत्ता तत्काल यह काम नहीं कर सकती है। लेनिन ने बड़ी जागीरों को तत्काल मॉडल समाजवादी फ़ार्मों में तब्दील करने के प्रस्ताव को भी छोड़ा नहीं था, लेकिन फि़लहाल वे उस पर ज़्यादा ज़ोर नहीं दे रहे थे। लेनिन का मानना था कि समाजवादी क्रान्ति के बाद व्यापक किसान आबादी को उनके अनुभवों से यह समझने का अवसर दिया जाना चाहिए कि छोटे पैमाने की खेती उन्हें ग़रीबी और भुखमरी से निजात नहीं दिला सकती है। समाजवादी क्रान्ति के बाद बोल्शेविक पार्टी को सचेतन और निरन्तर राजनीतिक कार्य से भी यह चेतना उन किसानों के बीच पैदा करनी होगी जो उजरती श्रम का शोषण नहीं करते हैं। बहरहाल, अक्टूबर क्रान्ति की विशिष्टता के बारे में लेनिन के विचारों पर आगे हम विस्तार से चर्चा करेंगे।

अन्तत: लेनिन किसानों का समाजवादी क्रान्ति पर समर्थन जीतने में सफल रहे क्योंकि किसान आबादी को समाजवादी-क्रान्तिकारी पार्टी की समझौतापरस्ती दिख रही थी और उन्हें पता था कि लेनिन जिस मज़दूर क्रान्ति की बात कर रहे हैं, केवल वही उन्हें भूस्वामियों के जुए से मुक्ति दिला सकती है और ज़मीन की उनकी माँग को पूरा कर सकती है और साथ ही उन्हें साम्राज्यवादी युद्ध से भी मुक्ति दिला सकती है। चार्ल्स बेतेलहाइम का यह प्रेक्षण सही है कि बोल्शेविकों ने क्रान्ति से पहले किसान आबादी में अपने राजनीतिक नेतृत्व को स्थापित किया था और इसे विचारधारात्मक नेतृत्व के साथ गड्डमड्ड नहीं किया जाना चाहिए। किसानों का समर्थन भूमि के प्रश्न पर बोल्शेविकों के साथ था। लेकिन इससे आगे के सभी प्रश्नों पर अभी भी वे समाजवादी-क्रान्तिकारी पार्टी की अवस्थिति पर ही खड़े थे। यही कारण था कि जिस पार्टी का सर्वाधिक प्रभाव अक्टूबर क्रान्ति के बाद भी कुछ वर्षों तक किसान सोवियतों में बना हुआ था वह समाजवादी-क्रान्तिकारी पार्टी ही थी। लेकिन क्रान्ति से पूर्व बोल्शेविकों द्वारा किसानों के विद्रोह के निरन्तरता के साथ समर्थन के फलस्वरूप अक्टूबर क्रान्ति से ठीक पहले किसानों और किसान सोवियतों का समर्थन बोल्शेविकों के पक्ष में आ चुका था। इस पहलू ने सत्ता पर क़ब्ज़ा करने के लेनिन के निर्णय में प्रमुख भूमिका निभायी।

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जिस प्रकार से कृषि क्षेत्र में किसानों का स्वत:स्फूर्त विद्रोह जारी था, उसी के समानान्तर उद्योग के क्षेत्र में मज़दूरों का भी एक विद्रोह जारी था। मज़दूरों की कारख़ाना समितियों ने श्रम अधिकारों को लागू न करने पर कारख़ानों पर क़ब्ज़ा शुरू कर दिया था। मॉरिस डॉब कारख़ाना समितियों के इस आन्दोलन का एक जीवन्त चित्रण पेश करते हैं। डॉब बताते हैं कि पेत्रोग्राद और मॉस्को में कई बार सोवियत के प्राधिकार के नाम पर कार्रवाई करते हुए कई कारख़ानों के मज़दूरों ने उन कारख़ानों पर क़ब्ज़ा कर लिया, या उनके प्रबन्धकों, मालिकों व फोरमैनों को निकाल दिया जिन्होंने 8 घण्टे के कार्यदिवस व अन्य श्रम अधिकारों को लागू करने के पेत्रोग्राद सोवियत के साथ हुए समझौते को लागू करने से इंकार कर दिया। 1 जून को सोवियतों की कार्यकारी समिति ने सभी कारख़ानों के मज़दूरों को कारख़ानों में कारख़ाना समिति या परिषद् बनाने का निर्देश दिया था। इसके बाद इन कारख़ाना समितियों ने तमाम औद्योगिक केन्द्रों व शहरों में कारख़ानों पर क़ब्ज़ा किया और उनके अकाउंटों को अपने नियन्त्रण में ले लिया। पेत्रोग्राद और मॉस्को की मज़दूर सोवियतों ने इन क़दमों का समर्थन किया लेकिन उनकी इसमें कोई प्रत्यक्ष व सीधी भूमिका नहीं थी। यह मूलत: कारख़ाना समितियों ने अपनी पहलक़दमी पर किया। अक्टूबर आते-आते तमाम खानों-खदानों को भी मज़दूरों की समितियों ने अपने नियन्त्रण में ले लिया था। मॉरिस डॉब ने आगे चलकर प्रतिक्रान्ति के एक प्रमुख नेता बनने वाले जनरल कालेदिन का एक उद्धरण दिया है जो स्थिति को स्पष्ट करता है, ”फि़लहाल, समस्त सत्ता विभिन्न स्वयंभू संगठनों द्वारा हथिया ली गयी है जो कि अपने अलावा और किसी के प्राधिकार को नहीं मानती हैं।” (डॉब, 1972, ‘सोवियत इकोनॉमिक डेवेलपमेण्ट सिंस 1917’, पृ. 78)

ई. एच. कार का मानना है कि इस मामले में बोल्शेविकों को थोड़ी शर्मिन्दगी का सामना करना पड़ा क्योंकि उनका मानना था कि क्रान्ति के तुरन्त बाद समाजवादी राज्यसत्ता तुरन्त ही पूँजीवादी सिण्डिकेटों व उद्योगों पर सीधा नियन्त्रण क़ायम कर लेगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं और जिस प्रकार ज़मीनों पर किसानों ने स्वत:स्फूर्त तरीक़े से क़ब्ज़ा करना शुरू कर दिया था, उसी प्रकार मज़दूरों ने उनके जनवादी अधिकारों को न लागू किये जाने के विरोध में कारख़ानों से मालिकों व प्रबन्धकों को निकाल कर उस पर ज़बरन क़ब्ज़े की मुहिम की शुरुआत कर दी थी। इस प्रक्रिया में कार ज़मीन पर किसानों द्वारा स्वत:स्फूर्त रूप से क़ब्ज़े को बोल्शेविकों के आकलन के विपरीत जाने वाली घटना बताते हैं। इन दोनों ही मुद्दों पर कार की अवस्थिति एक बार फिर से प्रत्यक्षवादी और अनुभववादी है। इसमें कोई दो राय नहीं थी कि कारख़ाना क़ब्ज़ा की मुहिम में कारख़ाना समितियों की भूमिका प्रमुख थी और ये मुहिम मूलत: और मुख्यत: स्वत:स्फूर्त थी। लेकिन बोल्शेविकों ने शुरू से ही क्रान्ति की एक तात्विक शक्ति (elemental force) के रूप में इनका समर्थन किया था और इसे मज़दूर वर्ग की क्रान्तिकारी पहलक़दमी के रूप में देखा था। उस समय अधिकांश ट्रेड यूनियनें मेंशेविकों के क़ब्ज़े में थीं और वे इस आन्दोलन का विरोध कर रहीं थीं क्योंकि उनका मानना था कि यह समूची उत्पादन व्यवस्था को अराजकता में डाल देगी। उत्पादन की कार्रवाई को सुगम रूप से चलाने के लिए उद्योगों पर एक केन्द्रीकृत नियन्त्रण की आवश्यकता होती है और अलग-अलग कारख़ानों पर उनके मज़दूरों के क़ब्ज़े का अर्थ होगा ऐसे नियन्त्रण का भंग होना। लेनिन इस बात को समझते थे कि कम्युनिस्ट समूचे उद्योग पर समूचे मज़दूर वर्ग के नियन्त्रण के हामी हैं न कि अलग-अलग कारख़ानों पर उनके मज़दूरों के नियन्त्रण के। लेकिन यह व्यवस्था समाजवादी सत्ता के अन्तर्गत हो सकती है। एक बुर्जुआ सरकार के विरोध में यदि क्रान्तिकारी परिस्थिति में मज़दूर कारख़ानों पर क़ब्ज़ा करते हैं, तो कम्युनिस्टों को उसका स्वागत और समर्थन करना चाहिए। मेंशेविक इस पूरी प्रक्रिया में अपने अर्थवाद को उजागर कर रहे थे और इस प्रक्रिया में तत्कालीन राज्यसत्ता के चरित्र की अवहेलना कर रहे थे। इस तौर पर, लेनिन और बोल्शेविकों ने किसी बाध्यता के कारण कारख़ाना क़ब्ज़ा की मुहिम का और ज़मीन क़ब्ज़ा की मुहिम का समर्थन नहीं किया, जैसा कि कार कहते हैं। उन्होंने एक प्रतिक्रियावादी आरज़ी बुर्जुआ सरकार के विरुद्ध क्रान्ति की तात्विक शक्तियों के रूप में इन आन्दोलनों का स्वागत और समर्थन किया। ठीक इसी तर्क से क्रान्ति के बाद बोल्शेविकों ने कारख़ाना समिति के आन्दोलन में निहित अराजकतावादी-संघाधिपत्यवादी प्रवृत्तियों के विरुद्ध संघर्ष करते हुए उन्हें ट्रेड यूनियन कांग्रेस के मातहत लाया और साथ ही ट्रेड यूनियनों और सर्वहारा राज्यसत्ता के बीच एक निश्चित सम्बन्ध स्थापित किया। (इस बिन्दु की विस्तार से व्याख्या के लिए तीसरा अध्याय देखें जिसमें ‘मार्क्सिस्ट इण्टलेक्शन’ के अराजकतावादी-संघाधिपत्यवादियों की आलोचना रखी गयी है।)

ई. एच. कार का यह मूल्यांकन भी ग़लत है कि कारख़ाना क़ब्ज़ा आन्दोलन ने त्रात्स्की की उस भविष्यवाणी को सही साबित किया जो कि उन्होंने 1905 की क्रान्ति के दौरान की थी कि मज़दूर बुर्जुआ क्रान्ति पर रुकेंगे नहीं और सीधे समाजवादी क्रान्ति की ओर बढ़ेंगे और इसलिए दो चरणों में क्रान्ति का लेनिन का सिद्धान्त ग़लत है। त्रात्स्की और साथ ही उनका अनुसरण करने वाले यह बताने में असफल रहते हैं कि फ़रवरी क्रान्ति में क्या हुआ था? लेनिन स्पष्ट करते हैं कि फ़रवरी क्रान्ति के साथ बुर्जुआ आरज़ी सरकार और सोवियत सत्ता के तौर पर जो ‘दोहरी सत्ता’ अस्तित्व में आयी, उसने राज्य के प्रश्न को हल किया और इस तौर पर जनवादी क्रान्ति का चरण पूर्ण हो गया, हालाँकि कई जनवादी कार्यभार अभी पूरे करने बाक़ी थे। रूसी बुर्जुआ वर्ग के बारे में लेनिन का शुरू से यह मूल्यांकन था कि वह जनवादी क्रान्ति के कार्यभारों को क्रान्तिकारी रूप में पूरा नहीं कर सकता है। यह कार्य मज़दूरों व किसानों की जनवादी तानाशाही द्वारा ही पूरा हो सकता है। सोवियत सत्ता के रूप में मज़दूरों और किसानों की जनवादी तानाशाही सम्भावना-सम्पन्न रूप में अस्तित्व में तो आयी, मगर सही राजनीतिक नेतृत्व व संगठन न होने के कारण उसने राजनीतिक सत्ता अपने हाथों से बुर्जुआ वर्ग के हाथों में सौंप दी, हालाँकि मज़दूरों और किसानों की आबादी में सोवियत की सत्ता के रूप में स्वीकार्यता बढ़ती गयी। अन्तरविरोधों के इस विशिष्ट सन्धि-बिन्दु के कारण ही ‘दोहरी सत्ता’ अस्तित्व में आयी। फ़रवरी क्रान्ति के बाद युद्ध, आर्थिक विघटन और मज़दूरों व किसानों के आन्दोलनों ने वह स्थिति पैदा कर दी जिसने सर्वहारा वर्ग और उसकी पार्टी को तत्कालीन रूस में इतिहास के रंगमंच के केन्द्र में रख दिया। इसके बाद यदि सर्वहारा वर्ग बोल्शेविक पार्टी के नेतृत्व में राजनीतिक सत्ता अपने हाथों में लेकर अपनी भूमिका का निर्वाह नहीं करता तो न सिर्फ़ जनवादी क्रान्ति की असमय मृत्यु हो जाती बल्कि समाजवादी क्रान्ति भी लम्बे समय के लिए प्रति‍क्रिया के लम्बे दौर द्वारा नेपथ्य में धकेल दी जाती। लेकिन त्रात्स्की, त्रात्स्कीपन्थी और त्रात्स्की से प्रभावित बुद्धिजीवी कई बार यह जताने का प्रयास करते हैं या इस भ्रम में फँस जाते हैं कि अप्रैल थीसीज़ के बाद लेनिन स्वयं त्रात्स्की की अवस्थिति पर आ गये थे। इस पूरे तर्क के विस्तार से खण्डन के लिए पिछले अध्याय को सन्दर्भित करें, जिसमें त्रात्स्की और त्रात्स्कीपन्थ की लेनिनवादी आलोचना पर चर्चा की गयी है। इसके अलावा, मज़दूरों द्वारा कारख़ानों पर नियन्त्रण भी लेनिन के अनुसार रैडिकल बुर्जुआ कार्यक्रम से आगे नहीं जाता था। यह केवल उत्पादन और वितरण पर नियन्त्रण रखने के समान होता। इससे सम्पत्ति सम्बन्धों में कोई बुनियादी अन्तर नहीं आता। इसलिए कारख़ाना क़ब्ज़ा आन्दोलन अपने आप में समाजवादी क्रान्ति की विशिष्ट चारित्रिक आभिलाक्षणिकता नहीं मानी जा सकती है। इस रूप में भी कार का तर्क सही नहीं ठहरता।

बेतेलहाइम ऐसा नतीजा तो नहीं निकालते कि लेनिन अक्टूबर में त्रात्स्की की अवस्थिति पर आ गये थे, लेकिन वे स्वयं जो नतीजा निकालते हैं उस पर स्पष्ट त्रात्स्कीपन्थी प्रभाव है। इसमें वे बुर्जुआ जनवादी व समाजवादी क्रान्तियों के अन्तर्गुंथन और गाँवों में बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति और शहरों में समाजवादी क्रान्ति की बात करते हैं। यह मूल्यांकन बेहद विशिष्ट परिस्थितियों में रूस में समाजवादी क्रान्ति की स्थितियाँ पैदा होने के कारक को नहीं समझता है और गाँवों में समाजवादी क्रान्ति के रैडिकल बुर्जुआ कार्यक्रम से आगे न जाने को गाँवों में बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति का नाम दे देता है। बोल्शेविक क्रान्ति की ”द्वैतता” का सिद्धान्त वास्तव में स्वयं त्रात्स्कीपन्थी सिद्धान्त नहीं तो त्रात्स्कीपन्थ को सांस लेने के लिए काफ़ी जगह मुहैया ज़रूर करा देता है। हम पहले ही किसानों के आर्थिक विभेदीकरण और राजनीतिक विभेदीकरण के बीच अन्तर की बात कर चुके हैं। रूस में समाजवादी क्रान्ति युद्ध और सोवियत सत्ता के रूप में ‘दोहरी सत्ता’ के पैदा होने की विशिष्टता के कारण अक्टूबर में आसन्न हो गयी। जैसा कि हमने ऊपर जि़क्र किया, अगर उस समय सर्वहारा वर्ग आगे आकर सत्ता स्थापित नहीं करता तो ”उसे इतिहास के रंगमंच से काफ़ी समय के लिए बाहर फेंक दिया जाता”। हमने बेतेलहाइम के बोल्शेविक क्रान्ति की द्वैतता/दो क्रान्तियों के अन्तर्गुंथन के सिद्धान्त का पिछले अध्याय के परिशिष्ट में विस्तार से आलोचनात्मक विवेचन किया है जिसे पाठक सन्दर्भित कर सकते हैं। अभी हम इतना ही कहेंगे कि यह एक समाजवादी क्रान्ति थी जो अपवादस्वरूप स्थितियों में हुई और उसे जनवादी क्रान्ति के कार्यभारों को रैडिकल तरीक़े से पूरा करना पड़ा, अन्यथा रूसी जनवादी क्रान्ति भी प्रतिक्रिया और दक्षिणपन्थी प्रतिक्रान्ति के गड्ढे में जा गिरती। इसी वजह से वह किसान प्रश्न पर मूलत: रैडिकल बुर्जुआ कार्यक्रम से आगे नहीं गयी।

ई. एच. कार के इतिहास-लेखन में एक और जगह एक त्रुटि दिखती है। वह यह नहीं बताते कि कारख़ाना समितियों का आन्दोलन पूर्णत: स्वत:स्फूर्त नहीं था और उसमें बोल्शेविकों की एक अहम भूमिका थी। वह बस इतना कहते हैं कि कारख़ाना समितियों के क़ब्ज़ा आन्दोलन को बढ़ावा देने के लिए बोल्शेविकों ने हर सम्भव प्रयास किया क्योंकि बढ़ती अराजकता उनके लक्ष्यों के लिए बेहतर थी। यहाँ बता दें कि यह बात कार किसी नकारात्मक रूप में नहीं कह रहे हैं और इस बात के ज़रिये वे बोल्शेविकों की परिस्थिति की समझ और बेहतर रणकौशल की सराहना ही करना चाहते हैं। लेकिन एक वफ़ादार प्रत्यक्षवादी और अनुभववादी के तौर पर वे विचारधारात्मक और राजनीतिक तौर पर बोल्शेविक रणनीति व आम रणकौशल को नहीं देखते, बल्कि आनुभविक और तथ्यवादी तौर पर देखते हैं। इसीलिए वह नतीजा निकालते हैं कि परिस्थितियों ने एक प्रकार से बोल्शेविकों को बाध्य किया कि कारख़ाना समितियों के संघाधिपत्यवाद और अराजकतावाद का समर्थन करें। एक बार फिर से कार यह नहीं समझ पा रहे हैं कि समाजवादी क्रान्ति के पहले मज़दूरों द्वारा कारख़ाना क़ब्ज़ा के आन्दोलन और क्रान्ति के बाद कारख़ाना समितियों द्वारा किसी भी व्यापक और केन्द्रीय सर्वहारा विनियमन के अन्तर्गत आने से बचने के संघाधिपत्यवाद और अराजकतावाद में फ़र्क़ करने की आवश्यकता है। ज़ाहिर है, किसी भी अनुभववादी व प्रत्यक्षवादी के लिए इस बात को समझना मुश्किल है और वह इसे इस रूप में व्याख्यायित करता है कि पहले तो बोल्शेविक ही इस कारख़ाना क़ब्ज़ा के कारख़ाना समितियों के आन्दोलन का समर्थन कर रहे थे क्योंकि वह उनके हितों को पूरा कर रहा था और बाद में (यानी क्रान्ति के बाद) वे ही अलग-अलग कारख़ानों पर प्रत्यक्ष उत्पादक के प्रत्यक्ष नियन्त्रण का विरोध करने लगे! दूसरी बात यह है कि कारख़ाना समितियाँ सचेतन और विचारधारात्मक तौर पर पार्टी नेतृत्व का विरोध नहीं कर रही थीं, न ही वे आमतौर पर सचेतन विचारधारात्मक तौर पर किसी केन्द्रीय विनियमन का विरोध कर रही थीं; वे एक बुर्जुआ सत्ता द्वारा और पूँजीपति वर्ग द्वारा उनके जनवादी अधिकारों के हनन और उन्हें लागू न किये जाने के विरोध में कारख़ानों पर क़ब्ज़ा कर रही थीं। निश्चित तौर पर, इनमें सुषुप्त व सम्भावना-सम्पन्न तौर पर अराजकतावादी-संघाधिपत्यवादी मोड़ लेने की गुंजाइश मौजूद थी। लेकिन क्रान्ति से पहले कारख़ाना समितियों के आन्दोलन को अराजकतावादी व संघाधिपत्यवादी क़रार देना कार के विश्लेषण की विचारधारा-अन्धता है। कार का यह कहना सही है कि लेनिन समेत सभी कम्युनिस्टों ने ”मज़दूर नियन्त्रण” और ”राजकीय नियन्त्रण” में हमेशा फ़र्क़ किया था। लेनिन के लिए समाजवाद की शुरुआती मंजि़ल का अर्थ था सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व के अन्तर्गत समूची अर्थव्यवस्था पर राजकीय नियन्त्रण जिसे लेनिन ने ”सर्वहारा अधिनायकत्व के तहत राजकीय पूँजीवाद” की संज्ञा भी दी थी। आरज़ी सरकार ने भी प्रमुख व कुंजीभूत उद्योगों के राष्ट्रीकरण का प्रयास किया था ताकि युद्ध की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए आर्थिक विसंगठन से निपटा जाये। लेनिन ने कारख़ाना समितियों के आन्दोलन का समर्थन किया क्योंकि कार के अनुसार लेनिन सोवियतों और कारख़ाना समितियों के आन्दोलन के प्रति अपने उत्साह में अपने इस समर्थन के सारे निहितार्थों को समझ नहीं पाये। हम देख सकते हैं कि कार यह नहीं समझ पाते कि लेनिन किसी भी ”राजकीय नियन्त्रण” का बिना शर्त समर्थन नहीं कर रहे थे और न ही कम्युनिस्टों ने कभी ऐसा किया था। वे सर्वहारा राज्य द्वारा उद्योगों के राजकीय नियन्त्रण की बात कर रहे थे। एक बुर्जुआ राज्य द्वारा उद्योगों के राजकीय नियन्त्रण का बिना शर्त समर्थन लेनिन क्यों करते? लेनिन अर्थव्यवस्था के राजकीय नियन्त्रण की ऐतिहासिक रूप से प्रगतिशील भूमिका को मानते थे क्योंकि यह टटपुँजिया उत्पादन को कम कर देता है। लेकिन वह इसका बिना शर्त राजनीतिक समर्थन नहीं करते थे। लार्स टी. ली का यह दृष्टिकोण मोटा-मोटी सही है, ”लेनिन बुर्जुआ राज्य उपकरण को चकनाचूर करना चाहते थे, लेकिन बुर्जुआ आर्थिक उपकरण के बारे में उनकी काफ़ी अलग सोच थी। युद्धकालीन राज्य द्वारा इस उपकरण को पूर्ण किया गया था और इसे अपरिमित शक्तियाँ दी गयी थीं और इसे सावधानी से बचाया जाना चाहिए और क्रान्तिकारी वर्ग द्वारा इसे पहले से मौजूद एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए। जर्मनी का Waffen-und Munitionsbeschaffungsamt (Weapons and Ammunitions Supply Department-WUMBA in German) साम्राज्यवादी आर्थिक उपकरण का उत्कृष्ट प्रतीक था। समाजवादी क्रान्ति के लेनिन के दृष्टिकोण को इस रूप में पेश किया जा सकता है ‘WUMBA जनता के लिए’…” (लार्स टी. ली, 2011, ‘लेनिन’, रीएक्शन बुक्स लि., लन्दन)

स्पष्ट रूप में देखा जा सकता है कि कार के पूरे विश्लेषण में सत्ता के वर्ग चरित्र का मूल्यांकन अनुपस्थि‍त रहता है, जो कि अनुभववाद और प्रत्यक्षवाद की विशेषता है। इसे अनुभववादी प्रत्यक्षवादी अन्तर्दृष्टि की दृष्टिहीनता ही कहा जा सकता है, जो एक मायने में अलेक्ज़ैण्डर रैबिनोविच के इतिहास-लेखन पर भी लागू होती है। साथ ही कार मज़दूर समितियों द्वारा कारख़ाना क़ब्ज़ा बनाम ”राजकीय नियन्त्रण” और किसानों के बीच भूमि के पुनर्वितरण बनाम राजकीय फ़ार्मों के प्रश्न को एक दूसरे के सामने खड़ा कर देते हैं। वे समझ नहीं पाते कि इन दोनों प्रश्नों की तुलना सम्भव ही नहीं है। यह मार्क्सवाद बनाम अराजकतावाद और मार्क्सवाद बनाम नरोदवाद के बहस की अनैतिहासिक तुलना के समान होगा। बहरहाल, अन्त में कार स्वयं यह स्वीकार करते हैं कि लेनिन ने एक ओर कारख़ाना समितियों के रूप में मज़दूरों की क्रान्तिकारी पहलक़दमी का स्वागत किया वहीं पेत्रोग्राद क्षेत्र की कारख़ाना समितियों के पहले सम्मेलन में उन्होंने जो मसौदा प्रस्ताव तैयार किया उसमें उन्होंने समूचे उद्योग के ”मज़दूर नियन्त्रण” के अपने अर्थ को भी स्पष्ट किया। कार स्वयं लेनिन को उद्धृत करते हैं :

”इस विपदा से बचने का रास्ता है वस्तुओं के उत्पादन और वितरण पर वास्तविक मज़दूर नियन्त्रण स्थापित करना। ऐसे नियन्त्रण को स्थापित करने के लिए यह ज़रूरी है कि पहले यह निश्चित किया जाये कि सभी बुनियादी संस्थाओं में मज़दूरों की बहुसंख्या है, यानी कुल वोटों के तीन-चौथाई से कम नहीं, और यह भी कि सभी मालिक जो अपने व्यवसाय को छोड़कर भागे नहीं हैं उन्हें और साथ ही वैज्ञानिक और तकनीकी रूप से प्रशिक्षित कर्मचारियों को भागीदारी करने के लिए बाध्य किया जाये; दूसरी ज़रूरी चीज़ है कि सभी कार्यशाला व कारख़ाना समितियों, मज़दूरों, सैनिकों व किसानों के प्रतिनिधियों की केन्द्रीय व स्थानीय सोवियतों और साथ ही ट्रेड यूनियनों को ऐसे नियन्त्रण में हिस्सेदारी करने का अधिकार मिले, और यह कि सभी वाणिज्यिक व बैंक खातों को उनके द्वारा जाँच के लिए खोल दिया जाये, और यह कि प्रबन्धन को सभी आँकड़ों को देने के लिए बाध्य किया जाये; तीसरी अहम चीज़ यह कि सभी ज़्यादा अहम जनवादी व समाजवादी पाटिर्यों के प्रतिनिधियों को भी ये सारे अधिकार दिये जायेें।

”मज़दूर नियन्त्रण, जिसे कि विवाद के मसले उपस्थिति होने पर कई पूँजीपतियों ने भी मान्यता दी है, को तत्काल सावधानी से सुविचारित और क्रमिक लेकिन तात्कालिक तौर पर अमल में लाये जाने वाले क़दमों की श्रृंखला के ज़रिये वस्तुओं के उत्पादन व वितरण पर मज़दूरों के पूर्ण नियन्त्रण के रूप में विकसित किया जायेे।” (ई.एच. कार, 1980, ‘दि बोल्शेविक रिवोल्यूशन’, खण्ड-2, डब्ल्यू. डब्ल्यू. नॉर्टन एण्ड कम्पनी, लन्दन, पृ. 60-61 पर उद्धृत)

कारख़ाना समितियों के क़रीब 400 प्रतिनिधियों का यह सम्मेलन 30 मई 1917 को हुआ और इसमें लेनिन के इस मसौदा प्रस्ताव को जि़नोवियेव ने पेश किया। यह प्रस्ताव 21 के मुक़ाबले 297 वोटों से विजयी हुआ जबकि 44 प्रतिनिधियों ने वोट नहीं दिया। कारख़ाना समितियों का सम्मेलन उन शुरुआती सम्मेलनों में से था, जिसमें बोल्शेविक बहुमत के रूप में उभरे। स्पष्ट है कि कारख़ाना समितियों के आन्दोलन में बोल्शेविक एक वर्चस्वकारी शक्ति बनकर उभर चुके थे। क्रान्तिकारी परिस्थिति में कारख़ाना समितियों का आन्दोलन आम मज़दूरों की व्यापक बहुसंख्या की नुमाइन्दगी करता था, जबकि ट्रेड यूनियनों ने क्रान्तिकारी परिस्थिति में कोई विशेष भूमिका नहीं निभायी थी और उनका नेतृत्व एक हद तक आम मज़दूरों की व्यापक आबादी से कटा हुआ था।

जून 1917 में पहली अखिल रूसी ट्रेड यूनियन कांग्रेस हुई। इस कांग्रेस में मेंशेविक व समाजवादी-क्रान्तिकारी बहुमत में थे। कार का यह प्रेक्षण सही है कि ट्रेड यूनियन कांग्रेस में बोल्शेविकों का अल्पमत में होना और कारख़ाना समितियों के सम्मेलन में उनका बहुमत में होना यह दिखलाता था कि मज़दूर वर्ग के ऊपरी और अपेक्षाकृत बेहतर वेतन पाने वाले ”कुलीन” तबक़ों में मेंशेविकों व समाजवादी-क्रान्तिकारियों का बहुमत था जबकि आम व्यापक मज़दूर आबादी में बोल्शेविकों का प्रभाव ज़्यादा था। यही कारण था कि ट्रेड यूनियनों ने अक्टूबर क्रान्ति में कोई विशेष भूमिका नहीं निभायी और कई ट्रेड यूनियनों ने तो उसका विरोध भी किया था। इसका कारण यही था कि उनमें मेंशेविक बहुमत में थे और उनकी राजनीति का चरित्र इसी से निर्धारित हो रहा था। इस ट्रेड यूनियन कांग्रेस ने एक अखिल रूसी ट्रेड यूनियन काउंसिल का चुनाव किया जिसमें आनुपातिक रूप से विभिन्न पार्टियों को प्रतिनिधित्व मिला। इस काउंसिल में बोल्शेविक प्रतिनिधि थे रियाज़ानोव व श्ल्याप्निकोव। इसके अध्यक्ष के तौर पर मेज़राओन्त्सी ग्रुप के लोज़ोव्स्की को चुना गया। त्रात्स्की भी शुरुआत में इसी ग्रुप के सदस्य थे। इस ग्रुप का कुछ हफ़्तों बाद बोल्शेविकों में विलय हो गया था। ट्रेड यूनियन कारख़ाना समितियों को मान्यता तो दे रहे थे, मगर उनके द्वारा कारख़ाना क़ब्ज़ा की मुहिम और उनके द्वारा मज़दूर नियन्त्रण का विरोध कर रहे थे। उनके अनुसार मज़दूर नियन्त्रण का कार्य कोई केन्द्रीय संगठन ही कर सकता था। लेकिन उनके अनुसार यह केन्द्रीय संगठन राज्यसत्ता की भूमिका अदा करने वाले निकाय, यानी कि सोवियत, नहीं हो सकते थे। और न ही यह कार्य कारख़ाना समितियाँ कर सकती थीं। इस अवस्थिति में हम भावी ट्रेड यूनियन विरोध के बीज देख सकते हैं। वास्तव में, संघाधिपत्यवादी भटकाव का सबसे ज़्यादा शिकार उस समय ट्रेड यूनियनवादी ही थे। वे समूची अर्थव्यवस्था के विनियमन के कार्य को राज्यसत्ता से स्वतन्त्र और स्वायत्त रूप में ट्रेड यूनियनों को देने की वकालत कर रहे थे। समाजवादी-क्रान्तिकारी और अराजकतावादी कारख़ाना समितियों द्वारा उत्पादन व वितरण के स्वायत्त नियन्त्रण की वकालत कर रहे थे। लेनिन की अवस्थिति इनसे अलग थी। उनका मानना था कि कारख़ाना समितियों के आन्दोलन का पुरज़ोर समर्थन किया जाना चाहिए क्योंकि ये आरज़ी सरकार के विरुद्ध विद्रोह की तात्विक शक्तियों में से एक है। साथ ही, वे कारख़ाना समितियों द्वारा मज़दूर नियन्त्रण को अलग-अलग कारख़ानों के अलग-अलग कारख़ाना समितियों द्वारा नियन्त्रण के रूप में नहीं देख रहे थे, बल्कि कारख़ाना समितियों के एक अखिल रूसी केन्द्रीय संगठन, ट्रेड यूनियनों और सोवियतों द्वारा समन्वित नियन्त्रण के रूप में देख रहे थे। साथ ही, उनका मानना था कि यह समन्वित नियन्त्रण मज़दूर राज्यसत्ता के नेतृत्व में होगा। कारख़ाना समितियों ने अक्टूबर क्रान्ति के पहले कहीं ज़्यादा सक्रिय भूमिका निभायी और अक्टूबर तक चार सम्मेलन किये। अपने आख़िरी सम्मेलन को उन्होंने अखिल रूसी कारख़ाना समिति कांग्रेस के रूप में मान्यता दी। इस कांग्रेस ने कई प्रस्ताव पारित किये जिसमें उत्पादन के मज़दूर नियन्त्रण को राष्ट्रीय पैमाने पर संगठित करने का समर्थन किया गया और कारख़ाना समितियों के एक केन्द्रीय प्रातिनिधिक संगठन को खड़ा करने का संकल्प लिया गया।

कारख़ाना समितियों और ट्रेड यूनियन के बीच के अन्तरविरोधों का विशेष तौर पर अगस्त के बाद के दौर में कोई विशेष अर्थ नहीं रह गया था। मज़दूरों की कारख़ाना समितियाँ कारख़ानों पर क़ब्ज़ा कर रही थीं और दूसरी ओर भूमि समितियाँ ज़मीनों पर तेज़ी से क़ब्ज़ा कर रही थीं। सेना का ज़्यादा से ज़्यादा हिस्सा लगातार पेत्रोग्राद सोवियत के पक्ष में आता जा रहा था। अगस्त के आख़िरी सप्ताह से लेकर सितम्बर के पहले सप्ताह के बीच बोल्शेविक पार्टी पेत्रोग्राद सोवियत और मॉस्को सोवियत में पहली बार बहुमत में आ चुकी थी। मज़दूरों और सैनिकों की मॉस्को व पेत्रोग्राद सोवियतों में बोल्शेविक पार्टी अब वर्चस्वकारी स्थिति में थी। सितम्बर मध्य में लेनिन ने अपनी रचना ‘बोल्शेविकों को सत्ता हासिल करनी ही होगी’ में लिखा कि अब सत्ता पर क़ब्ज़ा करने का समय आ गया है। केन्द्रीय कमेटी कुछ समय तक लेनिन के सन्देश पर कोई निर्णय नहीं ले पा रही थी। इसके बाद लेनिन ने कई पत्रों और सन्देशों को पार्टी की केन्द्रीय कमेटी को भेजा। अन्तत: लेनिन के स्वयं केन्द्रीय कमेटी की एक बैठक में आने के साथ यह असमंजस की स्थिति टूटी और अन्तत: सशस्त्र विद्रोह के ज़रिये सत्ता हाथ में लेने का निर्णय लिया गया। इस पूरे प्रकरण पर हम अगले शीर्षक में आयेंगे।

इस दौर में लेनिन के विचारों के विकास को हम उनकी दो रचनाओं में देख सकते हैं। पहली रचना सितम्बर 1917 में लिखी गयी थी – ‘आसन्न आपदा और उससे निपटने के रास्ते’। दूसरी रचना थी ‘क्या बोल्शेविक राज्यसत्ता पर काबिज़ रह पायेंगे’ जो कि अक्टूबर में लिखी गयी थी। पहली रचना में लेनिन ने पहली बार बुर्जुआ क्रान्ति के दायरे में अपने आर्थिक कार्यक्रम की रूपरेखा स्पष्ट की। इस रचना का मुख्य उद्देश्य वास्तव में यह था कि छह माह में पहले कैडेट-नीत बुर्जुआ आरज़ी सरकार और फिर समाजवादी पार्टियों के नेतृत्व में बनी बुर्जुआ आरज़ी सरकार की समझौतापरस्ती, बुर्जुआ क्रान्ति के कार्यभारों को पूरा करने में इसकी अक्षमता और इसके प्रतिक्रिया की ओर खिसकते जाने की हरकत को बेनक़ाब किया जा सके। इसमें लेनिन ने उन क़दमों के बारे में बताया जो कि मज़दूरों व किसानों की जनवादी तानाशाही को उठाने चाहिए थे और चूँकि फ़रवरी क्रान्ति के बाद अस्तित्व में आयी आरज़ी सरकार ने ये क़दम नहीं उठाये इसलिए उसे और उस पर काबिज़ पार्टियों यानी समाजवादी-क्रान्तिकारी पार्टी और मेंशेविक पार्टी को क्रान्तिकारी जनवादी तानाशाही का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता; बल्कि फ़रवरी से सितम्बर के सात महीने ये दिखला रहे हैं कि वे बुर्जुआ वर्ग और भूस्वामी वर्ग के सामने आत्मसमर्पण करने वाली टटपुँजिया पार्टियाँ बन चुकी हैं और धुर प्रतिक्रियावादी बुर्जुआ पार्टी की भूमिका अब कैडेट पार्टी निभा रही है, जो कि पहले उदार बुर्जुआ वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रही थी। इस लेख में लेनिन ने बताया कि शुद्ध रूप से समाजवादी कार्यक्रम को लागू किये बिना, एक क्रान्तिकारी जनवादी सरकार बैंकों का राष्ट्रीकरण, उद्योगों का सिण्डि‍केटीकरण, उपभोग का विनियमन, सभी छोटे उद्योगों व व्यवसायों का बलात सिण्डि‍केटीकरण, समूचे उत्पादन व वितरण का मज़दूर सत्ता द्वारा राजकीय नियन्त्रण व निरीक्षण, और नियोक्ताओं व प्रबन्धकीय कर्मचारियों को इस व्यवस्था के तहत कार्य करने के लिए बाध्य करना जैसे क़दमों को लागू कर सकती है। यह सम्पत्ति सम्बन्धों में कोई परिवर्तन नहीं लाता लेकिन समूची अर्थव्यवस्था को ज़्यादा वैज्ञानिक तौर पर संगठित करता और उसे राजकीय इज़ारेदार पूँजीवाद की ओर ले जाता। एक मज़दूरों व किसानों की जनवादी तानाशाही के मातहत ऐसी व्यवस्था न केवल बुर्जुआ जनवादी कार्यभारों को रैडिकल तरीक़े से पूर्ण करती बल्कि वह ‘समाजवाद की ओर कुछ प्रारम्भिक क़दम’ भी होती। लेनिन का इस रचना में मुख्य उद्देश्य यह प्रदर्शित करना था कि बुर्जुआ आरज़ी सरकार ये कार्य पूरे करने में अक्षम है और इस तौर पर वह इतिहास की प्रतिक्रियावादी शक्ति बन चुकी है। यह अब बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति का भी गला घोंट देगी और अब जनवादी क्रान्ति को पूर्ण करने के लिए समाजवाद की ओर कुछ प्रारम्भिक क़दम उठाना ऐतिहासिक अनिवार्यता बन गया है। लेनिन लिखते हैं :

”आमतौर पर इतिहास में स्थिर रहना असम्भव होता है, और युद्धकाल में तो विशेष तौर पर। बीसवीं सदी के रूस में, जिसने एक क्रान्तिकारी तरीक़े से गणतन्त्र और जनवाद हासिल किया है, समाजवाद की ओर आगे बढ़े बग़ैर, बिना इसकी ओर क़दम बढ़ाये, आगे बढ़ पाना असम्भव है (जो क़दम तकनोलॉजी व संस्कृति के स्तर से निर्धारित होंगे: किसान खेती में बड़े पैमाने का मशीन उत्पादन ”लाया” नहीं जा सकता और न ही इसे चीनी उद्योग में हटाया जा सकता है)

”लेकिन आगे बढ़ने से डरने का अर्थ होगा पीछे हटना – जो कि केरेंस्की जैसे तमाम लोग त्सेरेत्लियों और चेर्नोवों की मूर्खतापूर्ण मदद से कर रहे हैं, और जिस पर मिल्युकोव व प्लेखानोव जैसे तमाम लोग तालियाँ पीट रहे हैं।

”इतिहास का द्वन्द्व ऐसा है कि इज़ारेदार पूँजीवाद के राजकीय इज़ारेदार पूँजीवाद में रूपान्तरण की गति को बढ़ाकर इसने ठीक इसी के ज़रिये मानव जाति को असाधारण रूप में समाजवाद की ओर आगे बढ़ा दिया है।

”साम्राज्यवादी युद्ध समाजवादी क्रान्ति की पूर्वसन्ध्या है। और ऐसा केवल इ‍सलिए नहीं है कि युद्ध की भयंकरता ने सर्वहारा विद्रोह को बढ़ावा दे दिया है – कोई भी विद्रोह तब तक समाजवाद नहीं ला सकता है जब तक कि समाजवाद के लिए आर्थिक स्थितियाँ तैयार न हो गयी हों – बल्कि इसलिए कि राजकीय इज़ारेदार पूँजीवाद समाजवाद के लिए भौतिक तैयारी की पूर्णता तक पहुँचना है, समाजवाद की दहलीज़ है। इतिहास की सीढ़ी में समाजवाद के सोपान और राजकीय इज़ारेदार पूँजीवाद के सोपान के बीच और कोई मध्यवर्ती सोपान नहीं हैं।” (वी.आई. लेनिन, 1974, दि इम्पेण्डिंग कैटास्ट्रॉफी एण्ड हाउ टू कॉम्बैट इट, कलेक्‍टेड वर्क्स, खण्‍ड-25, चौथा अंग्रेज़ी संस्करण, प्रोग्रेस पब्लिशर्स, मॉस्को, पृ. 362-363)

सितम्बर के अन्त व अक्टूबर के प्रथम सप्ताहों में लेनिन ने दूसरा अहम लेख ‘क्या बोल्शेविक राज्यसत्ता पर क़ाबिज़ रह पायेंगे’ लिखा। इसमें लेनिन ने रूस में मज़दूर समाजवादी क्रान्ति के बाद मज़दूर सत्ता की आरम्भिक आर्थिक नीतियों के बारे में पहली बार स्पष्ट तौर पर लिखा। क्रान्ति के बाद बैंकों के राष्ट्रीकरण, उद्योगों के सिण्डिकेटीकरण, छोटे उद्यमों के बलात एकीकरण, और मुख्यत: राज्य और अन्य सर्वहारा संस्थाओं के ज़रिये समूची अर्थव्यवस्था के विनियमन व नियन्त्रण को क़ायम किया जायेेगा। सभी उद्योगों में मज़दूर नियन्त्रण स्थापित किया जायेेगा। लेकिन लेनिन ने संघाधिपत्यवाद के आरोप का खण्डन करते हुए स्पष्ट किया कि यह आरोप तभी सही हो सकता था जब बोल्शेविक बिना सर्वहारा अधिनायकत्व के मज़दूर नियन्त्रण की बात करते। लेनिन इसी लेख में लिखते हैं :

”जब नोवाया जीज्न के लेखक कहते हैं कि ”मज़दूर नियन्त्रण” के नारे को बुलन्द करके हम संघाधिपत्यवाद के गड्ढे में गिर रहे हैं तो उनका यह तर्क ”मार्क्सवाद” को बिना पढ़े उसे लागू करने, उसे स्त्रूवे के समान रटकर सीखने के मूर्ख स्कूली बच्चे वाली पद्धति का एक उदाहरण मात्र बनकर रह गया। संघाधिपत्यवाद या तो सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व को ख़ारिज़ करता है, या फिर इसे पीछे की सीट की ओर धकेल देता है, जिस प्रकार यह आमतौर पर राजनीतिक सत्ता के प्रश्न के साथ करता है। लेकिन हम इस प्रश्न को सबसे आगे रखते हैं। अगर हम केवल नोवाया जीज्न के लेखकों के साथ सहमति जताते हुए यह कहें : मज़दूर नियन्त्रण नहीं बल्कि राजकीय नियन्त्रण, तो यह केवल एक बुर्जुआ सुधारवादी जुमला बन जायेेगा, यह सारत: एक शुद्ध रूप से कैडेट फ़ार्मुला बन जायेेगा क्योंकि कैडेटों को ”राजकीय” नियन्त्रण में मज़दूरों की भागीदारी पर कोई आपत्ति नहीं है। कोर्निलोवाइट कैडेटों को अच्छी तरह से पता है कि ऐसी भागीदारी बुर्जुआ वर्ग को मज़दूरों को वेवक़ूफ़ बनाने का सर्वश्रेष्ठ तरीक़ा देती है…

”जब हम कहते हैं : ”मज़दूर नियन्त्रण”, तो हम इस नारे को हमेशा सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के बरक्स रखते हैं, हमेशा इसे सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के ठीक बाद में रखते हैं, और इसके ज़रिये हम बताते हैं कि हम किस प्रकार के राज्य के बारे में बात कर रहे हैं…अगर यह  (राज्य) सर्वहारा वर्ग का है, अगर हम सर्वहारा राज्य की, यानी, सर्वहारा वर्ग की तानाशाही की बात कर रहे हैं, तो मज़दूर नियन्त्रण एक देशव्यापी, सर्वसमावेशी, सर्वत्र उपस्थित, वस्तुओं के उत्पादन और वितरण का सबसे सटीक और सबसे सचेतन लेखांकन बन सकता है।” (लेनिन, 1977, सेलेक्टेड वर्क्स, खण्ड-2, प्रोग्रेस पब्लिशर्स, मॉस्को, पृ 364-65)

इस उद्धरण में लेनिन वे सभी भ्रम दूर कर देते हैं जिनका शिकार एक ओर ई.एच. कार जैसे अनुभववादी अध्येता हो जाते हैं, जो इस बात को बोल्शेविकों की चाणक्य-बुद्धि का प्रतीक मानते हैं कि पहले बोल्शेविक ही कारख़ाना समितियों द्वारा कारख़ानों पर क़ब्ज़े की मुहिम का समर्थन कर रहे थे क्योंकि वह आरज़ी सरकार के विरुद्ध माहौल बनाने में उनकी सहायता कर रहा था और सत्ता में आने के बाद उन्होंने ही कारख़ाना समितियों को ट्रेड यूनियनों के केन्द्रीय और उनके ज़रिये राजकीय नियन्त्रण में ला दिया और इस प्रकार ”प्रत्यक्ष मज़दूर नियन्त्रण” को समाप्त कर दिया; और साथ ही, ‘मार्क्सिस्ट इण्टलेक्शन’ के सुजीत दास जैसे राजनीतिक नौदौलतियों के अराजकतावादी-संघाधिपत्यवादी विभ्रम को भी साफ़ कर देते हैं कि मज़दूर नियन्त्रण से उनका क्या अर्थ था।

क्रान्ति के पहले ही कई लेखों में लेनिन ने स्पष्ट किया था कि मज़दूर नियन्त्रण से उनका अर्थ है समूचे मज़दूर वर्ग द्वारा समूचे उद्योग व अर्थव्यवस्था पर नियन्त्रण न कि एक-एक कारख़ाने के मज़दूरों द्वारा अपने-अपने कारख़ाने पर नियन्त्रण। यही कारण था कि बोल्शेविकों ने कारख़ाना समितियों के भी एक केन्द्रीकृत संगठन को खड़ा किया और आगे चलकर (जब ट्रेड यूनियनों में बोल्शेविक बहुमत में आ गये) तो उन्हें ट्रेड यूनियनों के केन्द्रीय संगठन के मातहत किया।

इस प्रसंगान्तर के बाद हम घटनाओं के ब्यौरे पर वापस आ सकते हैं। मई के बाद के दो-तीन महीनों के दौरान कई अहम परिवर्तन हुए। जैसा कि हमने पहले बताया, बोल्शेविक पार्टी ने तेज़ी से किसान सोवियतों और भूमि समितियों में संगठित किसानों का समर्थन जीता। वहीं दूसरी ओर मज़दूरों के बीच कारख़ाना समितियों में वे जून तक वर्चस्वकारी राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित हो चुके थे। ट्रेड यूनियन कांग्रेस में अभी भी मेंशेविक बहुमत में थे, लेकिन चूँकि ट्रेड यूनियनों के आम सदस्यों का समर्थन बोल्शेविकों के पक्ष में जा चुका था इसलिए जून से अक्टूबर क्रान्ति तक ट्रेड यूनियन काउंसिल, जो कि जून की ट्रेड यूनियन कांग्रेस में चुनी गयी थी, उसकी कोई विशेष भूमिका नहीं थी। ई.एच. कार भी इस बात का जि़क्र करते हैं और एक मेंशेविक ट्रेड यूनियन नेता के हवाले से बताते हैं कि इन चार महीनों के दौरान यह काउंसिल निष्क्रिय ही रही और इस निष्क्रियता के एकमात्र अपवाद लोज़ोव्स्की थे, जो कि काउंसिल के अध्यक्ष थे और जिन्होंने कुछ ही हफ़्तों बाद बोल्शेविकों के साथ हाथ मिला लिया था, क्योंकि उनका ग्रुप मेज़राओन्त्सी बोल्शेविक पार्टी में शामिल हो गया था। इस प्रकार मज़दूरों में भी जो आन्दोलन की सक्रिय शक्ति थी वह बोल्शेविकों के हाथों में आ चुकी थी।

जून के बाद से बोल्शेविकों का सितारा तेज़ी से बुलन्द होने लगा। मोर्चे पर लगातार हार, बड़े पैमाने पर रूसी सैनिकों के नरसंहार से सेना में युद्ध के ख़ि‍लाफ़ माहौल बनता जा रहा था। किसान आबादी समाजवादी-क्रान्तिकारियों के संविधान सभा के बुलाये जाने तक इन्तज़ार करने के आश्वासनों से ऊब चुकी थी और भूमि समितियों द्वारा ज़मीनों पर क़ब्ज़े की मुहिम और रफ़्तार पकड़ चुकी थी। मज़दूरों का व्यापक हिस्सा पहले से ही बोल्शेविकों के साथ था। अप्रैल में मिल्युकोव और गुचकोव के इस्तीफ़े के बाद यह साफ़ हो गया था कि आरज़ी सरकार का संकट शुरू हो चुका है। उनके इस्तीफ़े के बाद पहली संयुक्त सरकार बनी जिसमें कैडेट पार्टी के साथ समाजवादी पार्टियों (मेंशेविकों और समाजवादी-क्रान्तिकारी पार्टी) के छह मन्त्रियों को शामिल किया गया था। ग़ौर करने की बात है कि ये ही मेंशेविक पहले किसी भी आरज़ी बुर्जुआ सरकार में न शामिल होने की वकालत करते थे और मानते थे कि उनकी पार्टी को आरज़ी बुर्जुआ सरकार पर दबाव डालने वाले ”मज़दूर विपक्ष” की भूमिका निभानी चाहिए। लेकिन बुर्जुआ सरकार के संकट का समाधान करने के लिए वे बेशर्मी से आरज़ी सरकार में शामिल हो गये, ताकि आरज़ी सरकार के प्रति लगातार बढ़ रहे असन्तोष और मोहभंग पर क़ाबू पाया जा सके। इसी बीच अप्रैल की बोल्शेविक पार्टी की सातवीं अखिल रूसी काॅन्फ्रें़स में पार्टी ने लेनिन की अप्रैल थीसीज़ को मूलत: और मुख्यत: अपना लिया और ‘सारी सत्ता सोवियतों को’ का नारा अपनाया। पार्टी ने योजनाबद्ध तरीक़े से सोवियतों, ट्रेड यूनियनों और अन्य जनसंगठनों में मेंशेविकों और समाजवादी-क्रान्तिकारियों को बेनकाब करने का काम शुरू किया और जनता के सामने यह स्पष्ट करना शुरू किया कि नयी संयुक्त आरज़ी सरकार भी पूँजीपतियों, साम्राज्यवादियों और भू‍स्वामियों की नुमाइन्दगी करती है। यह सरकार न तो जनता को रोटी दे सकती है, न किसानों को ज़मीन, न साम्राज्यवादी युद्ध से मुक्ति और न ही मज़दूरों को उनके जायज़ जनवादी अधिकार। वास्तव में, अब यह बुर्जुआ सरकार बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के कार्यभारों को पूरा करने की बजाय जनवादी क्रान्ति का ही गला घोंटने का काम कर रही है और बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति को बचाने के लिए अब मज़दूर वर्ग को सत्ता अपने हाथों में ले‍नी होगी और समाजवादी क्रान्ति को अंजाम देना होगा। हम ऊपर बतला चुके हैं कि बोल्शेविक कारख़ाना समितियों के सम्मेलन में बहुमत में आ चुके थे। जून में हुई ट्रेड यूनियन कांग्रेस में वे अभी भी बहुमत में नहीं थे, लेकिन क्रान्तिकारी प्रक्रियाओं में ट्रेड यूनियनों की भूमिका ही वस्तुत: बेहद कम थी और उनके भी आम सदस्य बोल्शेविकों के पक्ष में आ चुके थे।

जून में सोवियतों की पहली अखिल रूसी कांग्रेस हुई। इसमें बोल्शेविक अभी भी अल्पसंख्या में थे। बोल्शेविक उस दौर में 10 जून को पेत्रोग्राद में एक प्रदर्शन आयोजित करने और सोवियतों की कांग्रेस में अपनी माँगें व्यवस्थि‍त रूप में पेश करने के लिए अभियान चला रहे थे। सोवियतों की कांग्रेस में मेंशेविक व समाजवादी-क्रान्तिकारियों के नेतृत्व को यह डर था कि मज़दूर सोवियतों की इजाज़त के बिना ही प्रदर्शन कर देंगे। इसलिए अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस ने पहले बोल्शेविक पार्टी को 10 जून के प्रदर्शन को रद्द करने के लिए कहा और फिर उसने ही 18 जून को प्रदर्शन करने का आह्वान कर दिया। लेकिन बेहतर पार्टी संगठन और योजना के बूते और साथ ही साथ सही कार्यदिशा से लैस होने के चलते बोल्शेविक इस प्रदर्शन पर छा गये। अधिकांश बैनरों पर बोल्शेविकों के नारे थे, जो युद्ध समाप्त करने और सारी सत्ता सोवियतों को देने की माँग कर रहे थे और साथ ही आरज़ी सरकार के विरुद्ध असन्तोष जताते बैनरों की भरमार थी। अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस ने अभी आरज़ी सरकार को समर्थन जारी रखने का ही प्रस्ताव पारित किया था, लेकिन तृणमूल धरातल पर हो रहे परिवर्तन समय की बदलती धारा को दिखला रहे थे।

18 जून को ही आरज़ी सरकार ने इस उम्मीद में विश्व युद्ध में एक बड़े रूसी आक्रमण की शुरुआत का निर्णय लिया और 19 जून को उसकी घोषणा की, कि राष्ट्रवाद और देश की रक्षा की भावना को भड़काकर फिर से अपनी वरीयता स्थापित की जाये। उसे उम्मीद थी कि आक्रमण सफल होने पर सोवियतों का प्राधिकार समाप्त हो जायेेगा और पूरी सत्ता वह अपने हाथों में ले लेगी। और अगर हमला असफल होता है तो उसका दोष बोल्शेविकों के सिर मढ़ दिया जायेेगा कि उन्होंने अपने नकारात्मक प्रचार से सेना के मनोबल को गिरा दिया था। आक्रमण असफल होना ही था और वह हुआ भी। इसके बाद आरज़ी सरकार की उम्मीदों के विपरीत जनता के बीच गुस्सा भयंकर तरीक़े से बढ़ा। मज़दूरों और सैनिकों में पेत्रोग्राद सोवियत की केन्द्रीय कार्यकारिणी समिति के प्रति भी गुस्सा बढ़ रहा था, क्योंकि यह स्पष्ट तौर पर दिखायी दे रहा था कि मेंशेविकों और समाजवादी-क्रान्तिकारियों के नेतृत्व में केन्द्रीय कार्यकारिणी समिति मौखिक तौर पर शान्ति और ज़मीन की बात करते हुए बुर्जुआ आरज़ी सरकार के पीछे घिसट रही है। इन सभी कारकों के चलते 3 जुलाई को पेत्रोग्राद में मज़दूरों और सैनिकों का एक जुझारू प्रदर्शन शुरू हुआ जो जल्द ही एक स्वत:स्फूर्त बग़ावत में तब्दील हो गया। बोल्शेविक पार्टी का नेतृत्व इस बात को समझता था कि जब तक सोवियतों, विशेषकर पेत्रोग्राद सोवियत और मॉस्को सोवियत और साथ ही किसान सोवियतों का समर्थन निर्णायक तौर पर साथ नहीं आता, जब तक अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस में बोल्शेविकों का बहुमत अर्जित नहीं होता, तब तक आम बग़ावत एक अपरिपक्व क़दम होगा और उसे आरज़ी सरकार कुचल देगी। बोल्शेविकों ने इन उग्र प्रदर्शनों को भरसक सीमा में रखने का और शान्तिपूर्ण बनाये रखने का प्रयास किया और वे उसमें काफ़ी हद तक कामयाब भी हुए। लेकिन इसके बावजूद आरज़ी सरकार ने सबसे प्रतिक्रियावादी और राजनीतिक चेतना से रिक्त सैन्य दस्तों के ज़रिये इन प्रदर्शनों को बर्बरता से कुचलवा दिया। लेकिन फिर भी बुर्जुआ शासक वर्ग बुरी तरह घबरा गया था। नतीजतन, संयुक्त आरज़ी सरकार ने, जिसमें कि समाजवादी-क्रान्तिकारी और मेंशेविक शामिल थे, बोल्शेविक पार्टी के विरुद्ध दमन का एक चक्र चलाया। प्राव्दा का दमन सबसे पहले किया गया क्योंकि यह बोल्शेविकों के प्रभावी राजनीतिक प्रचार का ज़बरदस्त माध्यम था। इसके बाद 7 जुलाई को लेनिन की गिरफ़्तारी का वारण्ट जारी हुआ। लेनिन और उनके साथ जि़नोवियेव भूमिगत हो गये। लेकिन बोल्शेविक पार्टी के कई अन्य प्रमुख नेताओं को गिरफ़्तार कर लिया गया, जैसे कि कामेनेव व कोलोन्ताई। त्रात्स्की भी गिरफ्तार हो गये जो अभी-अभी बोल्शेविक पार्टी में अपने समूचे समूह मेज़राओन्त्सी के साथ शामिल हुए थे। जुलाई में कुछ दिनों के लिए एक प्रतिक्रिया का दौर हावी हुआ और बोल्शेविकों के विरुद्ध सरकार द्वारा जर्मन एजेण्ट होने के कुत्साप्रचार का थोड़ा असर भी हुआ। लेकिन यह स्थिति गैलीशिया में रूसी सेना के आक्रमण के बुरी तरह असफल होने के साथ बदलती गयी।

सोवियत सत्ता फि़लहाल निष्प्रभावी और संयुक्त आरज़ी सरकार की टट्टू बन गयी थी और फि़लहाली तौर पर ‘दोहरी सत्ता’ समाप्त हो गयी थी। अब शान्तिपूर्ण तरीक़े से क्रान्तिकारी मज़दूरों, सैनिकों व किसानों की सोवियतों के हाथ में सत्ता आने का दौर बीत चुका था। बोल्शेविक पार्टी भूमिगत हो गयी। छठी पार्टी कांग्रेस में पार्टी के कार्यक्रम में बदलाव किया गया और पूँजीपतियों व भूस्वामियों की आरज़ी सरकार का बलपूर्वक तख्तापलट करने को कार्यक्रम के तौर पर स्वीकार किया गया। छठी कांग्रेस बोल्शेविकों के लिए एक महत्वपूर्ण पार्टी कांग्रेस थी।

पार्टी ने भूमिगत रहते हुए अपनी छठी कांग्रेस की जो कि पाँचवीं लन्दन कांग्रेस के दस वर्ष बाद हुई थी। बोल्शेविकों के प्राग सम्मेलन के भी पाँच वर्ष बाद यह कांग्रेस हो रही थी। इसमें कई अहम निर्णय लिये गये और कई बेहद महत्वपूर्ण बहसें हुईं  जिन पर हम आगे चर्चा करेंगे, लेकिन इस कांग्रेस ने समाजवादी क्रान्ति के कार्यक्रम को पारित किया और सशस्त्र विद्रोह की तैयारी करने का निर्णय लिया। ‘सारी सत्ता सोवियतों को’ के नारे को फि़लहाल वापस ले लिया गया। जैसा कि चार्ल्स बेतेलहाइम ने लिखा है, सोवियतों को सत्ता देने का नारा बोल्शेविकों के लिए कोई अमूर्त विचारधारात्मक नारा नहीं था और इस नारे को अपनाना उनके लिए हमेशा सोवियतों के राजनीतिक वर्ग चरित्र पर निर्भर करता था। सोवियतों की सत्ता को एक ‘फे़टिश’ में तब्दील करने की प्रवृत्ति बाद में सोवियत समाजवाद की आलोचना करने वाले तमाम अराजकतावादी-संघाधिपत्यवादी, ”वामपन्थी” आलोचकों द्वारा पैदा की गयी। बोल्शेविकों के लिए समानान्तर सत्ता के निकाय के रूप में सोवियतों की मान्यता सोवियतों के विचारधारात्मक व राजनीतिक नेतृत्व पर निर्भर करती थी। बहरहाल, कांग्रेस में तात्कालिक आर्थिक कार्यक्रम के तौर पर बैंकों व उद्योगों का राष्ट्रीकरण, समूचे उत्पादन व वितरण पर मज़दूर वर्ग की राज्यसत्ता के ज़रिये नियन्त्रण स्थापित करने, युद्ध का जनवादी शान्ति के साथ समापन करने और किसानों को ज़मीन देने का निर्णय पारित हुआ।

इस बीच आरज़ी बुर्जुआ सरकार ने 12 अगस्त को एक राज्य परिषद् गठित कर उसकी बैठक बुलायी जिसमें तमाम बुर्जुआ मन्त्रियों के साथ ही साथ सोवियतों के मेंशेविक व समाजवादी-क्रान्तिकारी नेता भी शामिल हुए। इस बैठक का मूल उद्देश्य था सोवियतों की बची-खुची सत्ता को पूरी तरह समाप्त कर आरज़ी सरकार के रास्ते के हरेक रोड़े को हटा दिया जाये। सेना के भीतर सत्ता-विरोधी सैनिकों को मौक़े पर सज़ा दी जाने लगी; कई बार तो सैनिकों के पूरे के पूरे समूहों को गोली मार दी गयी। कोर्निलोव ने तो मोर्चे के बाहर आमतौर पर भी मृत्युदण्ड को बहाल करने की वकालत की। बोल्शेविकों पर दमन और तेज़ कर दिया गया। केरेंस्की ने भूमि समितियों द्वारा ज़मींदारों की ज़मीन पर क़ब्ज़े की हर कोशिश को बलपूर्वक दबाने का एेलान किया। बोल्शेविकों ने मॉस्को में आम हड़ताल का एेलान किया जिसमें बड़ी तादाद में मज़दूरों ने हिस्सा लिया। कई अन्य शहरों में भी इस आह्वान के जवाब में मज़दूरों ने हड़तालें कीं।

सेना के दक्षिणपन्थी प्रतिक्रान्तिकारी जनरल कोर्निलोव ने इसी बीच सोवियतों और कारख़ाना समितियों व भूमि समितियों को पूरी तरह कुचल देने की माँग की। रूस का बड़ा पूँजीपति वर्ग और युंकर वर्ग क्रान्तिकारी आन्दोलन के बढ़ते ज्वार से भयाक्रान्त था और उसने तुरन्त इस दक्षिणपन्थी प्रतिक्रिया की शरण ली। जुलाई के जनउभार के बाद बुर्जुआ वर्ग का अधिक से अधिक दक्षिणपन्थी रुख़ लेना और ज़्यादा साफ़ तौर पर देखा जा सकता था। इस दक्षिणपन्थी बुर्जुआ वर्ग को एक बोनापार्तवादी शख्सियत की ज़रूरत थी। यह शख्सियत उन्हें जनरल कोर्निलोव के रूप में मिली। रैबिनोविच ने अपनी पुस्तक ‘दि बोल्शेविक्स कम टू पावर’ में कोर्निलोव के उभार की विस्तृत चर्चा की है। रैबिनोविच बताते हैं कि कोर्निलोव वास्तव में कोई बहुत सक्षम व दूरदर्शी जनरल नहीं था। वह युद्ध में दुश्मनों द्वारा गिरफ़्तार हुआ था और फिर उनकी जेल से भाग निकला था। शुरू से ही कोर्निलोव सेना में तानाशाहाना नियन्त्रण के पक्ष में था और आरज़ी सरकार की उदारता और प्रभावहीनता से घृणा करता था। उसका मानना था कि सोवियतों को और साथ ही बोल्शेविकों को बलपूर्वक कुचल दिया जाना चाहिए। वास्तव में, वह सोवियत सत्ता और बोल्शेविकों में ज़्यादा फ़र्क़ ही नहीं कर पाता था। कोर्निलोव के दुश्मनों के क़ब्ज़े से भाग निकलने के बाद रूस में दक्षिणपन्थी मीडिया ने उसे नायक बना दिया। इसी बीच कैडेट पार्टी जो जुलाई के पहले सप्ताह में सरकार से बाहर निकल गयी थी, दक्षिणपन्थी प्रतिक्रिया के ज़्यादा से ज़्यादा क़रीब जाने लगी। सेना के अन्दर एक स्पष्ट वर्ग विभाजन था जिसमें अधिकारी वर्ग सेना में फैलती अराजकता के लिए क्रान्ति को जि़म्मेदार मानता था और पुराने ज़ारकालीन व्यवस्था को फिर से सेना में लागू करना चाहता था। इन जनरलों में देनीकिन भी एक प्रमुख व्यक्ति था, जो कि आगे चलकर प्रतिक्रान्ति के प्रमुख नेताओं में से एक बना। इस प्रतिक्रिया के उभार में कई दक्षिणपन्थी समूहों की भूमिका थी। इसमें एक समूह का नेता था ज़ावॉइको जो कि आगे चलकर कोर्निलोव का मार्गदर्शक और सहयोगी बना। इसके अलावा, कुछ पुराने दक्षिणपन्थी समाजवादी-क्रान्तिकारियों ने भी केरेंस्की के शुरुआती दौर में कोर्निलोव के प्रति झुकाव को पैदा करने में विशेष भूमिका निभायी थी। इनमें साविंकोव और मैक्सिमिलियन फिलोनेंको प्रमुख थे। केरेंस्की सेना में मौजूद अराजकता पर क़ाबू पाने में अक्षम था और साथ ही बोल्शेविकों की बढ़ती ताक़त का भय उसे लगातार सता रहा था। नतीजतन, आरज़ी सरकार ने केरेंस्की के नेतृत्व में कोर्निलोव की दक्षिणपन्थी प्रतिक्रिया को प्रश्रय देने और उसे बोल्शेविक क्रान्तिकारी उभार के प्रतिभार के तौर पर इस्तेमाल करने की योजना बनायी। केरेंस्की साविंकोव और फिलोनेंको के सुझावों के प्रभाव में यह मानता था कि वह इस कोर्निलोव कारक को नियन्त्रण में रख पायेगा। लेकिन कोर्निलोव की प्रतिक्रिया जल्द ही केरेंस्की के नियन्त्रण से बाहर निकल गयी। केरेंस्की ने अपने आपको कोर्निलोव से अन्तिम मौक़े पर अलग कर लिया लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और कोर्निलोव ने राजधानी पर चढ़ाई का एेलान कर दिया था।

कोर्निलोव ने फ़ौज को जुटाकर पेत्रोग्राद पर चढ़ाई की तैयारी शुरू कर दी। ये तैयारियाँ खुलेआम हो रही थीं। 25 अगस्त को कोर्निलोव की सेना का पेत्रोग्राद की ओर कूच हुआ। बोल्शेविकों के नेतृत्व में मज़दूरों और सैनिकों ने इस प्रतिक्रान्ति का हथियारबन्द जवाब देने की तैयारी शुरू कर दी। पेत्रोग्राद के चारों ओर खन्दकें खोद दी गयीं और बैरीकेड्स खड़े कर दिये गये। कई हज़ार सैनिक क्रोंस्तात से पेत्रोग्राद की रक्षा के लिए आये। कोर्निलोव की आगे बढ़ रही सेना के पास कई प्रतिनिधि भेजे गये, जिन्होंने सैनिकों को कोर्निलोव की प्रतिक्रान्ति की असलियत समझाने का प्रयास किया। नतीजतन, कई प्रमुख दस्ते पहले ही कोर्निलोव के इस प्रयास से अलग हो गये। अन्तत: कोर्निलोव का प्रतिक्रान्तिकारी विद्रोह ठीक से शुरू हो पाने से पहले ही कुचल दिया गया। इस बीच आरज़ी सरकार के मन्त्री और केरेंस्की भयाक्रान्त थे और इस उम्मीद में बैठे हुए थे कि कोर्निलोव को बोल्शेविक हरा दें। इस विद्रोह को कुचलने के लिए तकनीकी और सैन्य धरातल पर बोल्शेविकों ने अन्य समाजवादी ताक़तों के साथ सहयोग और तालमेल किया। कोर्निलोव विद्रोह ने मेंशेविकों और समाजवादी-क्रान्तिकारियों के भी एक हिस्से के सामने स्पष्ट कर दिया था कि क्रान्ति एक स्थान पर खड़ी नहीं रहेगी; या तो वह मज़दूर क्रान्ति की ओर आगे बढ़ेगी या फिर दक्षिणपन्थी प्रति‍क्रान्ति की ओर।

लेनिन ने इसी उम्मीद में सितम्बर के शुरुआती दिनों में कुछ लेख लिखे जिसमें उन्होंने यह उम्मीद की कि मेंशेविकों और समाजवादी-क्रान्तिकारियों के नेतृत्व वाली सोवियत सत्ता को आरज़ी सरकार से छीन पूरी तरह अपने हाथों में ले लेगी और इस तौर पर जनवादी क्रान्ति अपने मुक़ाम तक पहुँचेगी और वहाँ तक क्रान्ति का शान्तिपूर्ण विकास हो पायेगा। इस पूरे प्रकरण को रैबिनोविच ने ग़लत रूप में व्याख्यायित किया है। लेनिन के उन लेखों को जिसमें वे मेंशेविकों और समाजवादी-क्रान्तिकारियों से जनवादी क्रान्ति को मुक़ाम तक पहुँचाने की प्रक्रिया में सहयोग और समझौते की बात कर रहे हैं, उसे रैबिनोविच लेनिन के उन विचारों में बदलाव के रूप में चित्रित करने का प्रयास करते हैं जो कि लेनिन ने कुछ ही समय पहले रखे थे। लेनिन ने कुछ समय पहले यह कहा था कि सत्ता पर क़ब्ज़ा करने का वक़्त क़रीब आ रहा है। कोर्निलोव के विद्रोह के बाद एक विशिष्ट स्थिति पैदा हुई थी जिसमें लेनिन लघुकालिक रणकौशलात्मक समझौतों की बात कर रहे थे। उस समय लेनिन की ऐसी सोच थी कि सोवियतों द्वारा सत्ता अपने हाथों में लिये जाने के साथ ही मज़दूर वर्ग अपने अधिनायकत्व को स्थापित करने की लड़ाई शुरू कर देता। लेकिन जल्द ही जनवादी राज्य सम्मेलन ने दिखला दिया था कि कोर्निलोव के विद्रोह के बावजूद मेंशेविकों और समाजवादी-क्रान्तिकारियों से यह उम्मीद करना व्यर्थ है कि वे जनता की जनवादी क्रान्ति के कार्यभारों को रैडिकल तरीक़े से पूरा करने में कोई भूमिका निभायेंगे और उन्होंने सितम्बर के मध्य में ही इस जनवादी सम्मेलन और उसके द्वारा स्थापित प्रहसन प्री-पार्लियामेण्ट के बहिष्कार और सत्ता पर क़ब्ज़ा करने के लिए बोल्शेविकों का आह्वान किया। रैबिनोविच यह भी नहीं समझ पाते कि कोर्निलोव के हमले के दौरान पेत्रोग्राद में बोल्शेविकों ने अन्य समाजवादी ताक़तों के साथ जो तकनीकी और सैन्य तालमेल और सहयोग किया वह कोई राजनीतिक समझौता या सहयोग नहीं था।

बहरहाल, कोर्निलोव के विद्रोह के परिणाम ने निर्णायक रूप से दिखला दिया कि बोल्शेविक पार्टी मज़दूरों और सैनिकों में एक ऐसे नेतृत्व के रूप में उभर चुकी है जो प्रश्नों से परे है। इसने दिखला दिया कि क्रान्ति की सामरिक और राजनीतिक शक्ति अब प्रतिक्रान्ति से कहीं ज़्यादा है। मेंशेविक और समाजवादी-क्रान्तिकारियों का चरित्र भी इस प्रक्रिया में जनता के सामने साफ़ हो गया था। कोर्निलोव की हार ने यह भी दिखला दिया कि अब अन्तरविरोधों का वह सन्धि-बिन्दु निर्मित हो चुका है जिसमें रूस या तो मज़दूर क्रान्ति की ओर जायेेगा या फिर दक्षिणपन्थी प्रतिक्रिया और प्रतिक्रान्ति की ओर। कोर्निलोव से संघर्ष और फिर कोर्निलोव की हार ने सोवियतों को एक बार फिर से जागृत कर दिया। और ये नयी जागृत सोवियतें स्पष्ट तौर पर बोल्शेविकों के पक्ष में जा खड़ी हुई थीं। यहाँ तक कि किसान सोवियतों में भी बोल्शेविकों का असर काफ़ी तेज़ी से बढ़ा।

31 अगस्त को पेत्रोग्राद सोवियत और 5 सितम्बर को मॉस्को सोवियत बोल्शेविकों के पक्ष में आ गयीं क्योंकि कारख़ानों, मिलों और सैन्य दस्तों ने जो नये प्रतिनिधि चुनकर भेजे थे, वे अधिकांशत: बोल्शेविक थे। इन दोनों प्रमुख सोवियतों के बोल्शेविकों के बहुमत में आने के साथ सशस्त्र विद्रोह की तैयारियों का रास्ता साफ़ हो गया और ‘सारी सत्ता सोवियतों को’ के नारे को फिर से पुनर्जीवित कर दिया गया।

इसी बीच समाजवादी-क्रान्तिकारियों ने आसन्न क्रान्ति को टालने या रोकने की मंशा से एक नया प्रयास किया। उन्होंने एक जनवादी सम्मेलन बुलाया और उसे प्रेद पार्लियामेण्ट (प्री-पार्लियामेण्ट) का नाम दिया। बोल्शेविक पार्टी में भी कामेनेव, जि़नोवियेव और तियोदोरोविच जैसे लोगों ने इसमें हिस्सा लेने की वकालत की क्योंकि वे सशस्त्र विद्रोह के पक्ष में नहीं थे। लेकिन लेनिन ने इसे जनता के बीच भ्रम पैदा करने और आरज़ी सरकार के वर्चस्व को बचाने का उपकरण बताया और इसमें हिस्सेदारी का पुरज़ोर विरोध किया। अन्तत: बोल्शेविकों ने इस तमाशे से अपने आपको अलग कर लिया और अपनी तैयारियों में लगे रहे। लेनिन ने सितम्बर से केन्द्रीय कमेटी और पार्टी को लिखे अपने पत्रों, सन्देशों और लेखों में यह दलील पेश करनी शुरू कर दी कि सशस्त्र विद्रोह का वक़्त आ चुका है, बोल्शेविक सत्ता अपने हाथों में ले सकते हैं क्योंकि दोनों प्रमुख प्रातिनिधिक सोवियतों यानी पेत्रोग्राद सोवियत और मॉस्को सोवियत में उनका बहुमत स्थापित हो चुका है। इस मसले में देर करना बुर्जुआ वर्ग को अपनी शक्ति को फिर से जुटाने और संगठित करने का मौक़ा देना होगा और साथ ही साम्राज्यवादियों को भी यह मौक़ा देना होगा कि वे रूसी क्रान्ति को कुचल दें। लेनिन के कई पत्रों और सन्देशों के बावजूद केन्द्रीय कमेटी निर्णय नहीं ले पा रही थी। अन्तत: लेनिन अक्टूबर के पहले सप्ताह के अन्त में गुप्त रूप से फि़नलैण्ड से वापस पेत्रोग्राद आये और 10 अक्टूबर की केन्द्रीय कमेटी बैठक में हिस्सा लिया। केन्द्रीय कमेटी ने बहुमत से सशस्त्र विद्रोह करने का निर्णय लिया। जि़नोवियेव और कामेनेव ने इसके ख़ि‍लाफ़ वोट किया और त्रात्स्की अनिर्णय की स्थिति में बने रहे और एक ऐसा प्रस्ताव पेश किया जिसका अर्थ था सशस्त्र विद्रोह को टालना। त्रात्स्की ने कहा कि दूसरी अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस के पहले सशस्त्र विद्रोह नहीं करना चाहिए। लेकिन लेनिन के अनुसार तब तक सशस्त्र विद्रोह की घड़ी निकल जाने का ख़तरा है और जब मज़दूरों और सैनिकों के जनसमुदाय बोल्शेविकों के साथ हैं, तो अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस का इन्तज़ार करना एक बुर्जुआ वैधिकता के भ्रम में फँसने के समान है। लेनिन ने तर्कों के साथ दिखलाया कि सशस्त्र विद्रोह के लिए जो सारी शर्तें पूरी होनी चाहिए, वे सभी पूरी हो चुकी हैं और अब इस काम को न करना बोल्शेविकों का ऐतिहासिक अपराध होगा।

पार्टी ने अन्तत: सशस्त्र विद्रोह की सक्रिय तैयारी शुरू कर दी। केन्द्रीय कमेटी के निर्णय के अनुसार पेत्रोग्राद सोवियत ने एक क्रान्तिकारी सैन्य कमेटी बनायी। केरेंस्की भी इसी बीच अपनी तैयारियाँ शुरू करने लगा और प्रतिक्रान्तिकारी फ़ौजी दस्तों को संगठित करने लगा। इसके अलावा, केरेंस्की की यह योजना भी थी कि पेत्रोग्राद को आगे बढ़ती जर्मन सेना को सौंप दिया जायेेगा और राजधानी को मॉस्को स्थानान्तरित कर दिया जाये ताकि जर्मन सेना वह काम कर दे जो कि आरज़ी सरकार नहीं कर पा रही थी – बोल्शेविकों का दमन। साथ ही, इस बात के भी संकेत मिल रहे थे कि रूसी क्रान्ति के चढ़ते ज्वार को दबाने के लिए ब्रिटिश और जर्मन साम्राज्यवादियों में भी एक अनकहा समझौता हो गया था क्योंकि ब्रिटिश फ्लीट ने पेत्रोग्राद की तरफ़़ जर्मन सेना के कूच के रास्ते में कोई बाधा नहीं डाली।

16 अक्टूबर को केन्द्रीय कमेटी की एक और बैठक हुई। इसमें विद्रोह का संचालन करने के लिए एक पार्टी सैन्य केन्द्र स्थापित किया गया। जि़नोवियेव और कामेनेव ने फिर से सशस्त्र विद्रोह के निर्णय का विरोध किया। लेकिन बहुमत ने उनकी आपत्ति को ख़ारिज़ कर दिया। उन्हें भी सशस्त्र विद्रोह की तैयारी में भूमिकाएँ सौंपी गयीं। लेकिन कामेनेव ने 18 अक्टूबर को एक ग़ैर पार्टी अख़बार नोवाया जीज्न  में इस फ़ैसले को अनावृत्त कर दिया और जि़नोवियेव और अपनी ओर से एक लेख प्रकाशित किया। यह आपराधिक ग़लती थी जिसका ख़ामियाज़ा समूची पार्टी और मज़दूर वर्ग को ख़ून देकर भुगतना पड़ सकता था। लेकिन चूँकि आरज़ी सरकार स्वयं कोई त्वरित क़दम उठाने की स्थिति में नहीं थी इसलिए ऐसा नहीं हो सका। फिर भी, उन्हें बोल्शेविकों की इस योजना का पता तो चल ही गया था। केरेंस्की सरकार ने बोल्शेविकों के हेडक्वार्टर यानी स्मोल्नी संस्थान पर हमला करने की योजना बनायी जो कि सफल नहीं हो पायी। इसके बाद उसने 24 अक्टूबर को बोल्शेविकों के केन्द्रीय मुखपत्र राबोची पुत को कुचलने का प्रयास किया जिसे सैनिकों और मज़दूरों के सशस्त्र जवाबी हमले ने नाकाम कर दिया। 24 अक्टूबर के राबोची पुत में सशस्त्र विद्रोह का आह्वान किया गया था। विद्रोह शुरू हो चुका था। 20 अक्टूबर से ही सभी सैन्य दस्तों, कारख़ानों और मिलों में विद्रोह की तैयारी शुरू हो चुकी थी और सभी सैन्य दस्तों व कारख़ानों में पार्टी ने क्रान्तिकारी सैन्य समिति की ओर से कमिसार भेजे थे। नौसेना के दस्तों को भी तैयारियों के निर्देश भेजे जा चुके थे। 24 अक्टूबर की रात लेनिन विद्रोह के संचालन के लिए बोल्शेविक हेडक्वार्टर स्मोल्नी आ गये थे। उसी रात फ़ौज के क्रान्तिकारी दस्ते और रेड गार्डों के दस्ते स्मोल्नी पहुँचने लगे, जिन्हें बाद में राजधानी के केन्द्र की तरफ़़ भेज दिया गया ताकि वे शीत प्रासाद पर घेरा डाल सकें। पेत्रोग्राद ग़ैरीसन और पीटर्स एण्ड पॉल कि़ले के सैनिकों को विद्रोह के पक्ष में लाने में त्रात्स्की ने अहम भूमिका निभायी।

25 अक्टूबर को रेड गार्ड्स ने रेलवे स्टेशनों, डाकघरों, टेलीग्राफ़ कार्यालयों, सचिवालयों व मन्त्रालयों और अन्य सत्ता प्रतिष्ठानों पर क़ब्ज़ा कर लिया। मेंशेविकों व समाजवादी-क्रान्तिकारियों की नौटंकी – प्रेद पार्लियामेण्ट भंग कर दी गयी। बोल्शेविक पार्टी के निर्देशन में पेत्रोग्राद सोवियत की सैन्य कमेटी के आदेश स्मोल्नी से जारी हो रहे थे और मज़दूरों व सैनिकों ने बड़े अनुशासन के साथ इन आदेशों का पालन किया। क्रोन्स्तात पहले से ही बोल्शेविकों का गढ़ था। नौसेना ने भी इस विद्रोह में महती भूमिका निभायी। अव्रोरा जलपोत ने 25 अक्टूबर को शीत प्रासाद पर गोला दागा और उसके साथ समाजवादी क्रान्ति के नये युग का सूत्रपात हुआ। आरज़ी सरकार गिर गयी। उसके मन्त्रियों को गिरफ़्तार कर लिया गया। पेत्रोग्राद में नाममात्र के प्रतिरोध के बाद आरज़ी सरकार के प्रति वफ़ादार दस्तों ने आत्मसमर्पण कर दिया। बोल्शेविकों ने ”रूस के नागरिकों के नाम” नामक एक घोषणापत्र निकाला जिसमें आरज़ी सरकार के पतन और सोवियत सत्ता की स्थापना की घोषणा थी। मॉस्को में सशस्त्र संघर्ष आने वाले कुछ दिनों तक जारी रहा, लेकिन तब तक समाजवादी क्रान्ति की विजय सुनिश्चित हो चुकी थी।

रात में लगभग ग्यारह बजे दूसरी अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस हुई। इसमें बोल्शेविकों को भारी बहुमत मिला और मेंशेविक, दक्षिणपन्थी समाजवादी-क्रान्तिकारी व अन्य प्रतिक्रान्तिकारी गुट सोवियत से उठकर चले गये। मज़दूरों, किसानों व सैनिकों के प्रतिनि‍धियों के सोवियतों की कांग्रेस अब एक क्रान्तिकारी स्वरूप ग्रहण कर चुकी थी। कांग्रेस ने घोषणा की कि पेत्रोग्राद के मज़दूर विद्रोह के समर्थन से सारी सत्ता अब सोवियतों के हाथों में आ चुकी है।

सोवियत समाजवादी क्रान्ति हो चुकी थी और रूस में पहली मज़दूर सत्ता स्थापित हो चुकी थी। क्रान्ति के बाद के पहले आठ माह सोवियत सत्ता के सुदृढ़ीकरण के चुनौतीपूर्ण माह थे, जिन पर हम अगले अध्याय में चर्चा करेंगे। उससे पहले हम थोड़ा पीछे लौटेंगे और फ़रवरी से लेकर अक्टूबर तक रूस के सामाजिक-जनवादी आन्दोलन में और विशेष तौर पर बोल्शेविक पार्टी के भीतर चले प्रमुख विचारधारात्मक व राजनीतिक संघर्षों पर चर्चा करेंगे और साथ ही इस संघर्ष के विषय में प्रमुख इतिहासलेखन का एक आलोचनात्मक विवेचन करेंगे।

  1. फ़रवरी क्रान्ति से अक्टूबर क्रान्ति के बीच रूसी सामाजिक-जनवादी आन्दोलन में और बोल्शेविक पार्टी में दो लाइनों का संघर्ष

फ़रवरी से अक्टूबर के बीच रूस के सामाजिक-जनवादियों में सतत् बहसें जारी रहीं, जिसमें कि बोल्शेविक पार्टी ने लेनिन के नेतृत्व में क्रान्ति के स्वरूप के प्रश्न पर, भूमि प्रश्न पर, क्रान्ति के बाद के आर्थिक कार्यक्रम के प्रश्न पर, सांगठनिक कार्यदिशा के प्रश्न पर सामाजिक-जनवादियों (मेंशेविकों व अन्य मध्यमार्गी समूहों), त्रात्स्कीपन्थियों और समाजवादी-क्रान्तिकारियों से अहम बहसें चलायीं। फ़रवरी से नवम्बर के बीच के घटनाक्रम ने लगातार बोल्शेविकों की विचारधारात्मक, राजनीतिक व कार्यक्रम-सम्बन्धी अवस्थिति को सही ठहराया। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं था कि बोल्शेविक पार्टी इन सही अवस्थितियों पर एकाश्मी रूप से पहुँची थी। स्वयं बोल्शेविक पार्टी के भीतर दो लाइनों का तीखा संघर्ष लगातार जारी था। यह संघर्ष न सिर्फ़ अक्टूबर क्रान्ति की पूर्वसन्ध्या तक जारी रहा बल्कि उसके बाद भी जारी रहा। हम यहाँ अक्टूबर तक बोल्शेविक पार्टी व अन्य राजनीतिक धाराओं के बीच बहसों और साथ ही बोल्शेविक पार्टी के भीतर चली बहसों का विवेचन करेंगे और यह भी दिखलाने का प्रयास करेंगे कि इन बहसों का न सिर्फ़ ऐतिहासिक सामान्य महत्व है, बल्कि समकालीन विशिष्ट महत्व है। इन बहसों की रोशनी में हम मौजूदा भारत में सर्वहारा आन्दोलन के भीतर मौजूद विजातीय प्रवृत्तियों पर भी जहाँ सम्भव हो अपनी आलोचनात्मक टिप्पणियाँ करेंगे।

हमने पहले भी इस बात का उल्लेख किया था कि ई.एच. कार का मानना है कि फ़रवरी क्रान्ति के अचानक होने से सभी राजनीतिक दल चौंक गये थे और उनमें बोल्शेविक पार्टी और लेनिन भी शामिल थे। साथ ही, कार समेत कई इतिहासकार यह सिद्ध करने के लिए यह दावा करते हैं कि वास्तव में लेनिन फ़रवरी क्रान्ति के ठीक पहले रूस में क्रान्ति की आसन्नता को लेकर उम्मीद खो चुके थे। इसका आधार लेनिन की यह उक्ति है : ”हम जो कि पिछली उम्रदराज़ पीढ़ी के हैं, शायद आने वाली क्रान्ति की निर्णायक लड़ाइयों को देखने के लिए जीवित न बचें।” (22 जनवरी 1917 को स्विस मज़दूरों को 1905 की रूसी क्रान्ति पर दिये गये एक व्याख्यान से)। लेकिन हालिया शोध ने दिखलाया है कि यह सही नहीं है। लार्स टी. ली ने अपनी पुस्तक ‘लेनिन’ (2011, रीएक्शन बुक्स, लन्दन) में दिखलाया है कि 1916-17 की सर्दियों से ही सुदूर स्विट्ज़रलैण्ड में लेनिन और उनके बोल्शेविक साथियों को रूस में लगातार क़रीब आती क्रान्ति का अहसास था। दिसम्बर 1916 में लेनिन ने लिखा था, ”…बढ़ता जन असन्तोष, बढ़ती हड़तालें और प्रदर्शन रूसी बुर्जुआजी को स्पष्ट रूप से यह स्वीकार करने को बाध्य कर रहे हैं कि रूसी क्रान्ति आगे बढ़ रही है।” (लेनिन,1964, थीसीज़ फ़ॉर ऐन अपील टू दि इण्टरनेशनल सो‍शलिस्ट कमिटी एण्ड ऑल सोशलिस्ट पार्टीज़, कलेक्टेड वर्क्स, खण्ड-23, प्रोग्रेस पब्लिशर्स, मॉस्को)। 10 फ़रवरी 1917 को इनेस्सा आर्मां को लिखे एक पत्र में लेनिन बताते हैं कि मॉस्को में उनके सूत्र उन्हें बता रहे हैं कि मज़दूरों में क्रान्तिकारी माहौल बना हुआ है और आगे वे लिखते हैं, ”हमारी गली में जल्द ही छुट्टी का दिन आने वाला है।” (रूसी में एक कहावत जिसका अर्थ है हमारा दिन आने वाला है)। आगे लार्स ली ने यह भी दिखलाया है कि उस समय लेनिन के क़रीबी साथी जि़नोवियेव ने भी रूस में क्रान्तिकारी स्थिति के परिपक्व होने का जि़क्र किया था। इसलिए यह कहना कि फ़रवरी क्रान्ति के बारे में लेनिन व बोल्शेविक पार्टी का कोई पूर्वानुमान नहीं था और इसने उन्हें पूरी तरह चौंका दिया, सही नहीं होगा। निश्चित तौर पर, कोई भी क्रान्तिकारी पार्टी फ़रवरी क्रान्ति जैसी घटना के दिन का निर्धारण नहीं कर सकती थी, लेकिन रूस में क्रान्तिकारी परिस्थिति के एक नयी दहलीज़ पर पहुँचने का आकलन लेनिन समेत कई बोल्शेविक क्रान्तिकारियों का था। हाँ, यह ज़रूर है कि फ़रवरी क्रान्ति ने उन ताक़तों को ज़रूर एक हद तक चौंका दिया था जो कि रूस में जनवादी क्रान्ति को पूरी तरह वैधिकता के दायरे में रखना चाहते थे और राजतन्त्र के साथ सहयोग-समझौते की रणनीति अपना रहे थे।

ई. एच. कार ने लिखा है कि फ़रवरी क्रान्ति के बाद मज़दूरों व सैनिकों के प्रतिनिधियों की पेत्रोग्राद सोवियत में मेंशेविकों के हावी होने का एक कारण यह था कि फ़रवरी क्रान्ति के तत्काल बाद की घटनाएँ मेंशेविक स्कीमा के अनुसार घटित होती हुई लग रही थीं और यही कारण था कि पेत्रोग्राद सोवियत में वे बहुसंख्या में आ गये और मेंशेविक नेता चखीद्ज़े को उसका पहला अध्यक्ष चुना गया। लेकिन यह दलील पूरी तरह सही नहीं लगती और ऐसा लगता है कि इसमें कारण को कार्य और कार्य को कारण की भूमिका दे दी गयी है। मेंशेविक स्कीमा यह था कि जनवादी क्रान्ति में बुर्जुआ वर्ग नेतृत्व करेगा और सर्वहारा वर्ग केवल एक आलोचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभायेगा और पूँजीवाद के परिपक्व होने तक सभी सही मार्क्सवादी लोग बुर्जुआ वर्ग को एक आलोचनात्मक समर्थन देना जारी रखेंगे। लेकिन फ़रवरी क्रान्ति में मेंशेविक स्कीमा तात्कालिक तौर पर इसलिए सफल होता नज़र आया क्योंकि सोवियत ने नेतृत्व को अपने हाथों से बुर्जुआ हाथों में सौंप दिया। सोवियतों ने नेतृत्व को बुर्जुआ वर्ग के हाथों में इसलिए सौंप दिया क्योंकि सोवियत में मेंशेविक व समाजवादी-क्रान्तिकारी पार्टी नेतृत्व में थी। यानी कि क्रान्ति का नेतृत्व बुर्जुआ हाथों में आ गया और मेंशेविक स्कीमा सही साबित हो गया इसलिए सोवियत में मेंशेविक नेतृत्व में आ गये ऐसा नहीं था, बल्कि सोवियत में मेंशेविक नेतृत्व में आ गये थे इसीलिए जनवादी क्रान्ति का नेतृत्व सर्वहारा वर्ग के हाथों में नहीं आ सका और तात्कालिक तौर पर यह प्रतीतिगत यथार्थ उपस्थि‍त हुआ कि चीज़ें मेंशेविक स्कीमा के अनुसार हो रही हैं।

फ़रवरी क्रान्ति के तुरन्त बाद, जब ज़ार का तख्तापलट हो चुका था लेकिन अभी आरज़ी सरकार का गठन नहीं हुआ था तभी बोल्शेविक पार्टी की केन्द्रीय कमेटी के रूसी ब्यूरो ने अपना काम शुरू कर दिया। हम पिछले अध्याय में बता चुके हैं कि सभी प्रमुख केन्द्रीय कमेटी नेता या तो विदेश में थे या फिर साईबेरिया में निर्वासन में थे। ऐसे में, रूसी ब्यूरो को संगठित करने वाले प्रमुख बोल्शेविकों, यानी श्ल्याप्निकोव, मोलोतोव और ज़ालुत्स्की ने पार्टी की रणनीति को संचालित किया। उन्हें लेनिन, जि़नोवियेव, कामेनेव या स्तालिन जैसे अधिक अनुभवी केन्द्रीय कमेटी सदस्यों से कोई निर्देश प्राप्त नहीं हो रहा था और उनके पास 1914 में लेनिन द्वारा प्रस्तुत युद्ध के समय सामाजिक-जनवादियों के कार्यभार सम्बन्धी थीसीज़, 1915 में पेश की गयी थीसीज़ (जिन्हें लार्स टी. ली ने अक्टूबर थीसीज़ कहा है) और युद्ध और क्रान्ति के प्रश्न पर 1914 से 1916 के बीच लेनिन के छिटपुट लेखन के अलावा मार्गदर्शन के लिए और कोई स्रोत या सामग्री नहीं थी। ई. एच. कार का यह कहना बिल्कुल दुरुस्त है कि इन हालात के मद्देनज़र युवा बोल्शेविकों के इस रूसी ब्यूरो ने क़ाबिले-तारीफ़ काम किया। इसने 26 फ़रवरी को इज़्वेस्तिया में, जो कि पेत्रोग्राद सोवियत का मुखपत्र था, परिशिष्ट के रूप में बोल्शेविक पार्टी का एक पार्टी घोषणापत्र प्रकाशित किया। इसमें आरज़ी सरकार से सम्बन्ध के प्रश्न में कुछ नहीं कहा गया था क्योंकि तब तक आरज़ी सरकार बनी ही नहीं थी। आरज़ी सरकार का गठन 2 मार्च को हुआ। यह घोषणापत्र सर्वहारा वर्ग और क्रान्तिकारी सेना का आह्वान कर रहा था कि वह एक क्रान्तिकारी आरज़ी सरकार स्थापित करे जो कि एक गणराज्य की स्थापना करे और जनवादी सुधार लागू करे, जैसे कि 8 घण्टे का कार्यदिवस, सभी जागीरों की ज़ब्ती, सार्वभौमिक मताधिकार और गुप्त वोट के ज़रिये एक संविधान सभा का निर्माण, खाद्यान्न भण्डार की ज़ब्ती और उसका वितरण, और सभी युद्धरत देशों के सर्वहारा वर्ग के साथ वार्ता की शुरुआत करके सभी देशों में दमनकारी सत्ताओं के विरुद्ध क्रान्तिकारी संघर्ष की शुरुआत की जायेे और नरसंहार के साम्राज्यवादी युद्ध का समापन किया जायेे । घोषणापत्र के अन्त में सभी सैनिकों और मज़दूरों से इस क्रान्तिकारी आरज़ी सरकार के लिए अपने प्रतिनिधियों को चुनने का आह्वान किया गया था और ”क्रान्ति के लाल झण्डे”, ”जनवादी गणराज्य”, ”क्रान्तिकारी मज़दूर वर्ग” के नारों के साथ समापन किया गया था। लेनिन ने इस घोषणापत्र के लिए ब्यूरो की प्रशंसा की थी, विशेषकर, सभी युद्धरत देशों के सर्वहारा वर्ग से अन्तरराष्ट्रीयतावादी एकता स्थापित करने के बिन्दु पर। ग़ौरतलब है कि लेनिन ने इस घोषणापत्र के केवल कुछ हिस्से पढ़े थे जो कि जर्मन अख़बारों में छपे थे।

इसी दौरान लेनिन ने अपने प्रसिद्ध ‘सुदूर से पत्र’ लिखे जिसने रूस के सामाजिक-जनवादी आन्दोलन में एक तीखी बहस की शुरुआत कर दी। ‘सुदूर से पत्र’ लिखने की शुरुआत लेनिन ने 7 मार्च को की और उनका आख़िरी और पाँचवाँ पत्र 12 मार्च को लिखा गया। पहले पत्र में उन्होंने स्पष्ट किया कि आरज़ी सरकार भूस्वामी वर्ग और बुर्जुआ वर्ग की सरकार है और यह मेहनतकश वर्गों को धोखा देकर राजतन्त्र से समझौते करने का प्रयास करेगी; यह शान्ति, रोटी और ज़मीन नहीं दे सकती क्योंकि यह युद्ध में भागीदारी के पक्ष में है। लेनिन ने बताया कि उदार बुर्जुआ वर्ग और संशोधनवादी हमें बार-बार याद दिला रहे हैं कि अभी बुर्जुआ क्रान्ति की मंजि़ल है इसलिए हमें बुर्जुआ वर्ग के पीछे चलना चाहिए। ऐसे में, कम्युनिस्टों को याद दिलाना चाहिए कि हर बुर्जुआ क्रान्ति में बुर्जुआ वर्ग ने थोथे वायदों से जनता को मूर्ख बनाया है और इस बार भी वह यही करेगा। ऐसे में, हमें मेहनतकश जनता को जनवादी क्रान्ति को मुक़ाम तक पहुँचाने के लिए क्रान्ति का नेतृत्व अपने हाथों में लेने को कहना चाहिए। लेनिन ने पहले पत्र के अन्त में यह भी कहा कि हम जनवादी क्रान्ति की मंजि़ल से समाजवादी क्रान्ति की मंजि़ल में संक्रमण कर रहे हैं।

दूसरे पत्र में, जो कि लेनिन ने 9 मार्च को लिखा था, लेनिन आरज़ी सरकार के वर्ग चरित्र को और स्पष्ट करते हैं और बताते हैं कि सोवियत सत्ता वास्तविक क्रान्तिकारी जनवादी सत्ता है। इस सत्ता ने आरज़ी सरकार पर नियन्त्रण स्थापित करने के लिए कुछ क़दम उठाये थे। लेनिन ने इन क़दमों का स्वागत किया लेकिन साथ ही यह भी कहा ये क़दम सिर्फ़ एक शुरुआत होने चाहिए। लेनिन ने आगे कहा कि समाजवादी गणराज्य की स्थापना की दिशा का अगला क़दम यह होना चाहिए कि सोवियत सत्ता को मज़दूर मिलिशिया खड़ा करने की ओर क़दम बढ़ाने चाहिए। ऐसी मज़दूर मिलिशिया के बल पर ही मज़दूर सत्ता खड़ी की जा सकती है, जो कि समूचे उत्पादन और वितरण के तन्त्र पर अपना नियन्त्रण स्थापित कर सके।

तीसरे पत्र में लेनिन ने सर्वहारा के मिलिशिया और साथ ही आमतौर पर क्रान्ति के दूसरे चरण में संक्रमण के दौर में सर्वहारा वर्ग के संगठन की आवश्यकता पर बल दिया। लेनिन का मानना था कि पहले चरण में मिल्युकोव और गुचकोव जैसे कैडेटों और अक्टूबरवादियों ने सत्ता हासिल कर ली, हालाँकि ज़ारशाही का पतन मज़दूरों और सैनिकों के एक स्वत:स्फूर्त उभार के कारण हुआ था; इसका मूल कारण था रूसी बुर्जुआ वर्ग के संगठन का सर्वहारा वर्ग के संगठन से कहीं बेहतर स्थिति में होना। क्रान्ति जब दूसरे चरण में प्रवेश कर रही है, तो इसकी नियति इस बात पर निर्भर करती है कि सर्वहारा वर्ग किस हद तक अपने आपको संगठित कर पाता है। पहले चरण में सर्वहारा वर्ग ने बहादुरी और नायकत्व का प्रदर्शन कर ज़ारशाही को उखाड़ फेंका था। लेनिन ने लिखा, ”कमोबेश निकट भविष्य में (शायद ये पंक्तियाँ लिखे जाने के समय ही) आपको नायकत्व के वही चमत्कार फिर से करने होंगे ताकि आप भूस्वामियों और पूँजीपतियों के शासन को उखाड़ फेंकें जो साम्राज्यवादी युद्ध छेड़े हुए हैं। इस ”अगली” वास्तविक क्रान्ति में आप टिकाऊ जीत नहीं हासिल कर पायेंगे अगर आप सर्वहारा संगठन के चमत्कार करके नहीं दिखाते।” (लेनिन, 1964, कलेक्टेड वर्क्स, खण्ड-23, प्रोग्रेस पब्लिशर्स, मॉस्को, पृ. 323) आगे इसी पत्र में लेनिन ने स्पष्ट किया कि मज़दूर सोवियतें आने वाले समय में क्रान्तिकारी सत्ता के निकाय की भूमिका अदा करेंगी। ये वैसे ही निकाय हैं, जैसे कि पेरिस कम्यून। लेनिन ने कहा कि पूरे रूस में सर्वहारा वर्ग को अपनी सोवियतें खड़ी करनी होंगी और उन्होंने विशेष ज़ोर देकर कहा कि क्रान्ति के दूसरे चरण में बोल्शेविक पार्टी को खेतिहर मज़दूरों और ग़रीब किसानों (जो कि अनाज बेचते नहीं) की अलग सोवियतें बनानी चाहिए ताकि धनी किसानों के राजनीतिक वर्चस्व को तोड़ा जा सके। यह एक बहुत महत्वपूर्ण बिन्दु था। लेनिन ने यह भी स्पष्ट किया कि क्रान्ति के बाद एक संक्रमणकालीन दौर होगा जिसमें राज्यसत्ता की आवश्यकता होगी, लेकिन यह राज्यसत्ता बुर्जुआ राज्यसत्ता से अलग होगी जो कि नौकरशाहाना दमन का उपकरण होती है और जिसमें विधायिका और कार्यपालिका के बीच विभाजन होता है। समस्त सशस्त्र उत्पादक वर्ग ही विधान रचेंगे भी और उन्हें लागू भी करेंगे। सर्वहारा राज्यसत्ता इस रूप में अस्तित्वमान रहेगी। कहने की आवयश्कता नहीं है कि संक्रमणकालीन सर्वहारा राज्यसत्ता के बारे में लेनिन की अवधारणा क्रान्ति के बाद के दो-तीन वर्षों में और विकसित हुई और साथ ही संक्रमण के चरित्र, प्रकृति और इसके दीर्घकालिक चरित्र को लेकर भी लेनिन की सोच में कई बदलाव आये थे। लेकिन मूलत: लेनिन की अवधारणा वही थी, जो इस पत्र में प्रस्तुत की गयी थी। 11 मार्च को लिखे गये इस तीसरे पत्र का अन्त लेनिन इस उम्मीद से करते हैं कि रूसी सर्वहारा वर्ग तात्कालिक कार्यभार यानी सर्वहारा संगठन खड़ा करना, को पूरा करता है तो समाजवादी क्रान्ति के युग की शुरुआत रूस में होगी और उन्नत यूरोप में समाजवादी क्रान्तियाँ इसकी अन्तिम विजय को सुनिश्चित करेंगी।

12 मार्च को लिखे चौथे पत्र में लेनिन ने मक्सिम गोर्की के ”क्रान्तिकारी रक्षावाद” के तर्क पर तीखी चोट की और स्पष्ट किया कि फ़रवरी क्रान्ति और मिल्युकोव-गुचकोव की सरकार के सत्ता में आने के बाद युद्ध को न्यायपूर्ण युद्ध और क्रान्ति की रक्षा में लड़ा जा रहा युद्ध समझना टटपुँजिया मूर्खता है। मूलत: यह सरकार बुर्जुआ और भूस्वामी वर्ग की सरकार है जो कि फ़्रांसीसी और ब्रिटिश वित्तीय पूँजी से नाभिनालबद्ध है। यह सरकार अपने साम्राज्यवादी मंसूबों और अपने साम्राज्यवादी मित्र देशों के हितों के लिए युद्ध में रूसी सैनिकों का क़त्लेआम करवा रही है। यही कारण है कि मिल्युकोव-गुचकोव ने साम्राज्यवादी गुप्त सन्धियाँ सबके सामने खोलकर नहीं रखी हैं। जो भी न्यायपूर्ण और जनवादी शान्ति चाहता है, उसे यह समझ लेना चाहिए कि कोई भी बुर्जुआ सरकार साम्राज्यवाद के दौर में यह न्यायपूर्ण व जनवादी शान्ति मुहैया नहीं करा सकती है। केवल और केवल सर्वहारा सरकार ही न्यायपूर्ण और जनवादी शान्ति स्थापित कर सकती है। ऐसी सरकार सत्ता में आते ही सारे युद्धरत देशों से तत्काल युद्ध-विराम की माँग करेगी, समस्त गुप्त सन्धियों को प्रकाशित कर देगी, शान्ति की शर्त के तौर पर सभी उपनिवेशों और दमित राष्ट्रीयताओं की मुक्ति की माँग करेगी, सभी देशों के सर्वहारा वर्ग से अपने देश की पूँजीपति वर्ग की सत्ता उखाड़ फेंकने और मज़दूर प्रतिनिधियों की सोवियतों के शासन को स्थापित करने का आह्वान करेगी और केवल ऐसी सत्ता के अस्तित्व में आने पर ही न्यायपूर्ण और जनवादी शान्ति की उम्मीद की जा सकती है। इन शर्तों के न माने जाने की सूरत में सोवियत सरकार कुछ या सभी बुर्जुआ देशों के ख़ि‍लाफ़ युद्ध लड़ सकती है और जीत सकती है और यह एक न्यायपूर्ण युद्ध होगा जो कि क्रान्ति की ज्वाला को इन देशों में भी भड़का देगा।

26 मार्च को लिखे आख़िरी पत्र में लेनिन ने पिछले चार पत्रों में पेश अवस्थितियों का सार-संक्षेप करने के बाद स्पष्ट किया कि युद्ध ने वह स्थिति पैदा कर दी है जिसमें कि सर्वहारा वर्ग इतिहास के रंगमंच के केन्द्र में आ गया है। सर्वहारा वर्ग को क्रान्ति के दूसरे चरण को पूर्ण करने के लिए अपनी सत्ता स्थापित करनी होगी और शान्ति और ज़मीन की माँग केवल और केवल तभी पूरी हो सकती है। लेनिन स्पष्ट करते हैं कि किसानों की माँग यदि अभी भी यही है जो कि 1906 में त्रुदोविकों ने रखी थी, तो वह माँग भी सर्वहारा क्रान्ति ही पूरा कर सकती है, यानी भूमि का राष्ट्रीकरण और उसका भोगाधिकार के आधार पर उन किसानों में वितरण जो कि अपनी मेहनत से खेती करते हैं। इसके लिए खेतिहर मज़दूरों और ग़रीब किसानों की अलग सोवियतें स्थापित करने का काम तत्काल शुरू किया जाना चाहिए। किसानों के आन्दोलन की मदद से ही सर्वहारा वर्ग सत्ता हासिल कर सकता है। सत्ता हासिल करने के बाद भी सर्वहारा वर्ग रूस जैसे देश में पहले चरण में समाजवाद की ओर कुछ संक्रमणात्मक क़दम उठायेगा, जैसे कि समूचे सामाजिक उत्पादन तथा वितरण पर नियन्त्रण स्थापित करना, सार्वभौमिक श्रमदान की व्यवस्था करना, आदि। हम देख सकते हैं कि ‘समाजवाद की ओर पहले क़दमों’ के बारे में लेनिन के विचार अभी रूप ले रहे थे। अप्रैल थीसीज़ में लेनिन ने इन विचारों को ज़्यादा पूर्ण रूप में रखा।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि ‘सुदूर से पत्र’ अप्रैल थीसीज़ के तार्किक पूर्वज हैं और अगर अप्रैल थीसीज़ को इन पाँच पत्रों के साथ पढ़ा जाये तो लेनिन के विचारों के विकसित होने की प्रक्रिया को ज़्यादा बेहतर तरीक़े से समझा जा सकता है। अप्रैल थीसीज़ पर हम थोड़ा आगे और विस्तार से चर्चा करेंगे। अभी हम इतना बता दें कि जब ‘सुदूर से पत्र’ लिखे गये उस समय लेनिन, जो कि ज्यूरिख में थे, और रूस के पार्टी संगठनों के बीच सम्पर्क बहुत ही नाममात्र का था। जैसा कि अलेक्ज़ैण्डर रैबिनोविच ने लिखा है, ”लेकिन मार्च, 1917 में ज्यूरिख में लेनिन और रूस में पार्टी संगठनों के बीच सीधा संवाद लगभग था ही नहीं, और किसी भी सूरत में पार्टी की नीतियों के लिए कोई प्रभावी तालमेल होने का प्रश्न ही नहीं उठता था। युद्ध के प्रश्न पर राजधानी में मौजूद बोल्शेविक नेतृत्व पूरी तरह लेनिन के साथ था। केन्द्रीय कमेटी के रूसी ब्यूरो की 7 मार्च को हुई बैठक में अन्त में यह कहा गया, ”(युद्ध के प्रति) हमारा रवैया नहीं बदला है क्योंकि यह युद्ध एक साम्राज्यवादी युद्ध है”…पीटर्सबर्ग पार्टी कमेटी भी उसी दिन मिली और उसने भी युद्ध पर इसी से मिलता-जुलता प्रस्ताव पारित किया।” (अलेक्ज़ैण्डर रैबिनोविच, 1991, ‘प्रिल्यूड टू रिवोल्यूशन : दि पेत्रोग्राद बोल्शेविक्स एण्ड दि जुलाई 1917 अपराइजि़ंग’, इण्डियाना यूनीवर्सिटी प्रेस, ब्लूमिंगटन एण्ड इण्ड‍ियानापोलिस, पृ. 34)

रैबिनोविच आगे बताते हैं कि पार्टी के दायरों में एक बहस जारी हो गयी थी। आरज़ी सरकार के प्रश्न पर पेत्रोग्राद पार्टी कमेटी ने लेनिन की कार्यदिशा का विरोध किया, वहीं वाइबोर्ग जि़ला कमेटी ने ”वामपन्थी” अवस्थिति अपनाते हुए तत्काल बुर्जुआ व भूस्वामी वर्ग की सरकार का तख्तापलट करने और सत्ता पर क़ब्ज़ा करने की बात की। 13 मार्च को स्तालिन, मुरानोव और कामेनेव के निर्वासन से लौटने के बाद पार्टी दायरों में बहस और बढ़ गयी। युद्ध के प्रश्न पर भी कुछेक बोल्शेविकों ने दक्षिणपन्थी अवस्थिति अपनायी जैसे कि कामेनेव। आरज़ी सरकार के प्रश्न पर शर्तों समेत समर्थन या उसके प्रति अविश्वासपूर्ण रवैया रखने वाली बीच की स्थिति रखने वाले बोल्शेविक भी मौजूद थे, जैसे कि स्तालिन। लेकिन स्तालिन का रवैया लेनिन के रूस आगमन के ठीक पहले काफ़ी हद तक आरज़ी सरकार के प्रति काफ़ी शत्रुतापूर्ण बन चुका था, हालाँकि अभी भी वे लेनिन की अवस्थिति पर नहीं पहुँचे थे।

फ़रवरी क्रान्ति के बाद आरज़ी सरकार को पेत्रोग्राद सोवियत के दबाव में जो जनवादी सुधार लागू करने पड़े थे, जिनमें प्रेस व अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता भी शामिल था, उनके कारण बोल्शेविक पार्टी के लिए आसान हो गया कि वह अपने मुखपत्र प्राव्दा की फिर से शुरुआत कर सके। इसका पहला अंक 5 मार्च 1917 को प्रकाशित हुआ जिसे मुफ्त में वितरित किया गया। दूसरे अंक की क़रीब एक लाख प्रतियाँ बिकीं। पहले सात अंकों में ब्यूरो द्वारा इज़्वेस्तिया में प्रकाशित पार्टी घोषणापत्र के ही विभिन्न पहलुओं को विस्तार से समझाने का काम किया गया था। इसमें बुर्जुआ आरज़ी सरकार को, जो कि अब तक गठित हो चुकी थी, रूसी पूँजीपति वर्ग और भूस्वामी वर्ग की सरकार बताया गया था और पेत्रोग्राद सोवियत का आह्वान किया गया था‍ कि वह सत्ता अपने हाथों में लेकर एक संविधान सभा बुलाये। युद्ध के प्रश्न पर इसमें कहा गया था कि यह साम्राज्यवादी युद्ध है जिसमें पूँजीपतियों के मुनाफ़़े के लिए सभी देशों के मज़दूरों से एक-दूसरे का क़त्ले-आम करवाया जा रहा है और इसे गृहयुद्ध में तब्दील कर देना चाहिए जिससे कि सभी देशों के सर्वहारा वर्ग को पूँजीवाद के जुए से मुक्ति मिल सके। लेकिन अभी भी, जैसा कि ई.एच. कार ने लिखा है, अख़बार में लेनिन के शब्दों में साम्राज्यवादी युद्ध को क्रान्तिकारी गृहयुद्ध में बदल देने और ‘अपनी सरकार को हराने’ के क्रान्तिकारी पराजयवाद की कार्यदिशा को खुलकर नहीं लिखा जा रहा था। कुछ अंकों में तो कुछ ऐसे लेख भी प्रकाशित हुए जो कि क्रान्तिकारी रक्षावाद की मेंशेविक कार्यदिशा की तरफ़़ झुकाव रखते थे। जैसे कि 10 मार्च 1917 के अंक में ओल्मिंस्की का एक लेख प्रकाशित हुआ जिसमें यह लिखा था, ”(बुर्जुआ) क्रान्ति अभी पूरी नहीं हुई है। हम अभी भी ”एक साथ हमला करने” के नारे के तहत ही हैं। पार्टी के मामलों में, हर पार्टी अपने अनुसार काम करे; लेकिन साझा उद्देश्य के लिए सभी एक हों।” (ई.एच. कार, 1978, ‘दि बोल्शेविक रिवोल्यूशन 1917-1923’, खण्ड 1, डब्ल्यू. डब्ल्यू. नॉर्टन एण्ड कम्पनी, लन्दन, में उद्धृत , पृ. 74)

युद्ध पर अवस्थिति को लेकर प्राव्दा में जो भ्रमित बातें आ रही थीं, उनमें एक और जटिलता भी जुड़ गयी। पेत्रोग्राद पार्टी कमेटी फ़रवरी क्रान्ति के बाद पुनर्जीवित हो गयी थी। इसने यह अवस्थिति अपनायी कि जब तक बुर्जुआ आरज़ी सरकार सर्वहारा वर्ग और व्यापक जनसमुदायों के हितों का उल्लंघन नहीं करती तब तक उसका समर्थन किया जाना चाहिए। मोलोतोव ने हर सम्भव प्रयास किया कि पेत्रोग्राद पार्टी कमेटी को इस ग़लत अवस्थिति से अलग करें, लेकिन वे सफल नहीं हो पाये। 13 मार्च को इसी भ्रम की स्थिति में साईबेरिया में निर्वासन से तीन केन्द्रीय कमेटी सदस्य वापस लौट आये – स्तालिन, कामेनेव और मुरानोव। स्तालिन 1912 के बोल्शेविक पार्टी के प्राग सम्मेलन (जिसमें बोल्शेविक पार्टी एक अलग पार्टी के रूप में संगठित हुई थी) से ही केन्द्रीय कमेटी सदस्य थे। कामेनेव भी अनुभवी पार्टी लेखक और पार्टी मुखपत्र राबोचाया गज़ेटा के नियमित लेखकों में से एक थे। मुरानोव पार्टी के दूमा धड़े के सदस्य, एक उम्दा संगठनकर्ता और पार्टी की ओर से चौथी दूमा में चुने भी गये थे। इन सभी ने एक साथ 1912 के पुराने प्राव्दा पर काम भी किया था। प्राव्दा और केन्द्रीय कमेटी के रूसी ब्यूरो का नेतृत्व अब इन लोगों ने अपने हाथों में ले लिया। स्तालिन पेत्रोग्राद के प्रमुख पार्टी संगठनकर्ता बन गये, मुरानोव प्राव्दा के सम्पादक बन गये और स्तालिन व कामेनेव सम्पादक मण्डल में शामिल हो गये। ई.एच. कार यह क़यास लगाते हैं कि इससे श्ल्याप्निकोव और मोलोतोव अवश्य नाख़ुश हुए होंगे लेकिन उन्होंने कुछ बोला नहीं क्योंकि एक बेहद जटिल सामाजिक-आर्थिक व राजनीतिक परिस्थिति में जि़म्मेदारी उनके सिर से हट गयी थी। आगे कार कहते हैं कि इस दौर के लिए श्ल्याप्निकोव के संस्मरण उनके एकमात्र स्रोत हैं, जिसमें श्ल्याप्निकोव नाख़ुश होने के बारे में कुछ नहीं कहते। मोलोतोव ऐसे मसलों पर कभी ज़्यादा नहीं बोलते थे और वे भी चुप रहे। ऐसे में सवाल यह उठता है कि कार इस प्रकार की अटकल लगा ही क्यों रहे हैं? ऐसी अटकल का कोई आधार नहीं है। कार भी मानते हैं कि केन्द्रीय कमेटी के मुख्य तीन सदस्यों के वापस आने के बाद कामों का उनके द्वारा हाथ में लिया जाना नैसर्गिक है। ऐसे में, हम यह क़यास लगा सकते हैं कि अपनी प्रशंसनीय वस्तुपरकता के बावजूद कई बार कार अपने प्रेक्षणों में इज़ाक डॉइशर व त्रॉत्स्की के मूल्यांकनों के प्रभाव को आने से रोक नहीं पाते हैं।

स्तालिन ने 14 मार्च के प्राव्दा में एक लेख लिखा। इस लेख में उन्होंने पार्टी में युद्ध और आरज़ी सरकार के प्रति रवैये को लेकर हावी इस भ्रम की स्थिति के कारण एक ऐसी अवस्थिति रखी जिसमें युद्ध और आरज़ी सरकार के प्रश्न पर ज़्यादा कुछ नहीं कहा गया था। इसमें एक सामान्य बात कही गयी थी कि फ़रवरी क्रान्ति में जो कुछ जीता गया है, उसे सुरक्षित किया जाना चाहिए और रूसी क्रान्ति को आगे ले जाने और पुरानी शक्तियों को प‍राजित करने के लिए जो सम्भव हो वह करना चाहिए। स्पष्ट है, पूरी पार्टी में अभी स्पष्टता की कमी थी। ‘बोल्शेविक पार्टी के इतिहास’ में इस पहलू का जि़क्र नहीं आता कि शुरुआत में स्तालिन भी पूरी तरह इस मसले पर स्पष्ट नहीं थे कि युद्ध और आरज़ी सरकार के प्रति क्या रवैया अपनाया जाना चाहिए। बस इस आंशिक सत्य का जि़क्र है कि स्तालिन ने इस लेख के तुरन्त बाद ही आरज़ी सरकार के प्रति एक अविश्वास की नीति अपना ली थी। 15 मार्च को कामेनेव ने प्राव्दा में एक लेख लिखा जो कि पूरी तरह से बोल्शेविक नीति और युद्ध और क्रान्ति पर लेनिन की सोच के विरुद्ध था। इसमें कामेनेव ने क्रान्तिकारी रक्षावाद की कार्यदिशा का समर्थन किया। कामेनेव ने लिखा, ”जब सेना सेना के सामने खड़ी होती है तो यह सुझाव देना सबसे बेहूदा नीति होगी कि एक सेना अपने हथियार डाले और घर लौट जायेे। यह शान्ति नहीं बल्कि दासता की नीति होगी, जो किसी भी स्वतन्त्र जनता द्वारा घृणा के साथ अस्वीकार कर दी जायेेगी।” (कार, 1978, में उद्धृत, पृ. 75) इतिहास ने दिखलाया कि इस उद्धरण में कामेनेव लेनिन की नीति को ग़लत तरीक़े से पेश कर रहे थे और लेनिन की जो नीति थी उसे जनता ने घृणा से ठुकराया नहीं बल्कि जून आते-आते उसी के पक्ष में खड़ी हो गयी। लेनिन ने हमेशा इस बात का विरोध किया था कि जनता की स्वत:स्फूर्त और बुर्जुआ राष्ट्रवाद से प्रेरित भावनाओं के अनुसार कम्युनिस्ट अपनी नीति तय करें। हिरावल का काम आम मेहनतकश जनसमुदायों की स्वत:स्फूर्त व टटपुँजिया भावनाओं व चेतनाओं के पीछ घिसटना नहीं होता, बल्कि सर्वहारा दृष्टिकोण से उसे नेतृत्व देना होता है। लेनिन को राष्ट्रीय पराजयवाद की नीति के सहीपन पर पूरा भरोसा था। जि़म्मरवॉल्ड कॉन्फ्रे़ंस में लेनिन ने युद्ध-विरोध पर एकजुट सामाजिक-जनवादियों के बीच उन लोगों का विरोध किया था जो कि युद्ध का विरोध करते हुए शान्तिवाद का समर्थन कर रहे थे और उन्होंने इस बात की वकालत की थी कि साम्राज्यवादी युद्ध को गृहयुद्ध में बदला जाना चाहिए, जो कि पूँजीपतियों के शासन के विरुद्ध एक न्यायपूर्ण युद्ध होगा। लेनिन के साथ जो छोटी सी अल्पसंख्यक आबादी खड़ी हुई उन्हें वामपन्थी जि़म्मरवॉल्डियन कहा गया। लार्स टी. ली ने इन्हें ठीक ही ‘अल्पसंख्या के भीतर अल्पसंख्या’ नाम दिया है क्योंकि समूचे यूरोपीय सामाजिक-जनवादी आन्दोलन में जि़म्मरवॉल्ड कॉन्फ्रे़ंस में शिरकत करने वाले सामाजिक-जनवादी ही एक अल्पसंख्या थे। एक छोटी-सी संख्या के समर्थन के बावजूद लेनिन में अपनी कार्यदिशा के सर्वहारा सहीपन को लेकर पूरा आत्मविश्वास था। 1915 कार्ल रादेक को लिखे गये पत्र में इस आत्मविश्वास को देखा जा सकता है। लेनिन अपने समर्थन में खड़े लोगों को जोड़ते हुए लिखते हैं, ”डच प्लस हम लोग प्लस वामपन्थी जर्मन प्लस शून्य – लेकिन इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता क्योंकि बाद में यह शून्य नहीं बल्कि हर व्यक्ति होगा।” (लार्स टी. ली, 2011, ‘लेनिन’, रीएक्शन प्रेस, लन्दन में उद्धृत)

अब अगर लेनिन के इस अप्रोच से कामेनेव के अप्रोच की तुलना की जायेे, तो एक सर्वहारा हिरावल के रुख़ और एक टटपुँजिया वामपन्थी लोकरंजक रुख़ का फ़र्क़ समझा जा सकता है। यहाँ पर यह भी जि़क्र करना प्रासंगिक होगा कि अलेक्ज़ैण्डर रैबिनोविच ने क्रान्तिकारी पराजयवाद की लेनिन की नीति को एकदम ग़लत तरीक़े से समझा है। रैबिनोविच लिखते हैं, ”अब, अगस्त 1914 के आख़िरी दिनों में, बर्न, स्विट्ज़रलैण्ड से लेनिन ने ”युद्ध पर थीसीज़” में ”समाजवाद से ग़द्दारी” करने के लिए द्वितीय इण्टरनेशनल के नेताओं की निन्दा की और तात्कालिक सामाजिक जनवादी नारे के तौर पर सभी देशों में सामाजिक क्रान्ति को मज़बूत बनाने का प्रस्ताव रखा। इसके अलावा, उन्होंने अपने आप को सभी दूसरे रूसी अन्तरराष्ट्रीयतावादी समूहों से एकदम अलग करते हुए तर्क दिया कि जर्मनी के हाथों रूस की पराजय वांछनीय है क्योंकि इसके ज़रिये राजतन्त्र कमज़ोर होगा। द्वितीय इण्टरनेशनल के तीखे खण्डन में, शान्ति की बजाय गृहयुद्ध पर अपने ज़ोर में और रूस के लिए पराजयवाद के अपने समर्थन में, लेनिन का कार्यक्रम अचम्भित कर देने की हद तक अतिरेकपूर्ण था।” (रैबिनोविच, 1991, ‘प्रिल्यूड टू रिवोल्यूशन’, इण्डियाना यूनीवर्सिटी प्रेस, ब्लूमिंगटन एण्ड इण्डियाना, पृ. 17, ज़ोर हमारा है) स्पष्ट है कि रैबिनोविच एक बुनियादी बात नहीं समझते कि लेनिन ने यह कार्यदिशा 1914 में अ‍न्तरराष्ट्रीय सामाजिक-जनवादी आन्दोलन के लिए पेश की थी, न कि सिर्फ़ रूस के सामाजिक-जनवादियों के लिए। लेनिन केवल रूस के मज़दूर वर्ग का आह्वान नहीं कर रहे थे कि वह अपनी सरकार को हराये, बल्कि सभी युद्धरत देशों के मज़दूर वर्ग का आह्वान कर रहे थे कि वे साम्राज्यवादी युद्ध में पूँजी‍पतियों के मुनाफ़े के लिए नहीं, बल्कि अपने असल दुश्मन यानी अपने देश के पूँजीपति वर्ग से लड़ें, उसे उखाड़ फेंकें और सर्वहारा सत्ता क़ायम करें। लेकिन रैबिनोविच ने लेनिन की कार्यदिशा को यहाँ इस तरह से प्रस्तुत किया है, मानो वे केवल रूस के लिए पराजयवाद की वकालत कर रहे हों। 1917 में भी लेनिन की और अधिकांश बोल्शेविकों की युद्ध पर यही अवस्थिति थी। कामेनेव की अवस्थिति इसके विपरीत थी।

स्तालिन ने कामेनेव के रुख़ का कड़ाई से विरोध किया और साथ ही जि़म्मरवॉल्ड के बहुमत के बरक्स लेनिन के वामपन्थी जि़म्मरवाॅल्डियन रुख़ का समर्थन किया। लेकिन तमाम अकादमिक लेखकों की तरह, जो कि स्तालिन के प्रति पूर्वाग्रहित होते हैं और कई बार जानबूझकर तथ्यों के साथ दुराचार करते हैं, अलेक्ज़ैण्डर रैबिनोविच ने भी स्तालिन की अवस्थिति को जानबूझकर ग़लत रूप में पेश किया है। रैबिनोविच दावा करते हैं कि स्तालिन की अवस्थिति युद्ध पर वही थी जो कि कामेनेव की थी और उन्होंने कामेनेव के लेख के एक दिन बाद यानी 16 मार्च को प्राव्दा में एक लेख लिखा जिसमें उन्होंने लिखा कि ”युद्ध मुर्दाबाद का नारा बेकार है।” हम पहले रैबिनोविच को उद्धृत करेंगे और फिर स्तालिन के उस लेख से उद्धरण पेश करके दिखलायेंगे कि किस तरह रैबिनोविच ने (निश्चित तौर पर) जानबूझकर स्तालिन के कथन को सन्दर्भ से काटकर पेश किया ताकि स्तालिन को मेंशेविक और कामेनेव की अवस्थिति पर खड़ा हुआ दिखलाया जा सके। रैबिनोविच लिखते हैं, ”इस तरह इसके बाद कामेनेव और स्तालिन के लेखों ने आरज़ी सरकार के लिए सीमित समर्थन की वकालत की, ”युद्ध मुर्दाबाद” के नारे को ठुकराया और मोर्चे पर विसंगठनकारी गतिविधियों को समाप्त करने की वकालत की। कामेनेव ने प्राव्दा में 15 मार्च को लिखा, ”जब शान्ति नहीं है तो लोगों को अपने पदों पर बने रहना चाहिए, और तोप के गोलों का तोप के गोलों से गोलियों का गोलियों से जवाब देना चाहिए।” अगले दिन स्तालिन ने इसी को दुहराया, ‘ ‘युद्ध मुर्दाबाद’ एक बेकार नारा है।’ ” (रैबिनोविच, 1991, ‘प्रिल्यूड टू रिवोल्यूशन’, इण्डियाना यूनीवर्सिटी प्रेस, ब्लूमिंगटन एण्ड इण्डियाना, पृ. 36) यह तथ्यों का कितना भयंकर और आपराधिक विकृतिकरण है इसको प्रदर्शित करने के लिए हम स्तालिन के 16 मार्च के प्राव्दा में छपे लेख का उद्धरण पेश करेंगे। स्तालिन लिखते हैं :

”मौजूदा युद्ध एक साम्राज्यवादी युद्ध है। इसका मुख्य लक्ष्य है पूँजीवादी रूप से उन्नत राज्यों द्वारा विदेशी, मुख्य रूप से कृषि, क्षेत्रों को हड़पना (क़ब्ज़ा करना)। उन्हें नये बाज़ार, इन बाज़ारों से सुविधाजनक संचार, कच्चे माल और खनिज भण्डार चाहिए और वे हर जगह उसे हासिल करने के लिए प्रयास करते हैं…और यही कारण है कि रूस में मौजूदा स्थिति इस बात का शोर मचाने और घोषणा करने का कोई कारण नहीं देती कि, ”स्वतन्त्रता खतरे में है! युद्ध जि़न्दाबाद!”

”और जिस तरह उस समय (1914 में) फ़्रांस में कई समाजवादियों (गुएस्दे, सेम्बात, आदि) के बीच यह खलबली मच गयी थी, उसी तरह रूस में भी कई समाजवादी ”क्रान्तिकारी रक्षावाद” की घण्टी बजाने वाले बुर्जुआ कारिन्दों के पदचिन्हों पर चल रहे हैं।

”फ़्रांस में आगे के घटनाक्रम ने दिखलाया कि इस बात को लेकर ख़तरे की घण्टी बजाना एक झूठ है और स्वतन्त्रता और गणराज्य के बारे में चीख़-पुकार वास्तव में इस तथ्य को छिपाने का एक आवरण था कि फ़्रांसीसी साम्राज्यवादी आल्सेस-लॉरेन और वेस्टफ़ालिया के लिए ललचाये हुए हैं।

”हम पूरी तरह विश्वस्त है कि रूस में मौजूदा घटनाक्रम अन्तत: दिखलायेगा कि ”स्वतन्त्रता ख़तरे में है” की उन्मादी चीख़़ें किस क़दर झूठी हैं : ”देशभक्तिपूर्ण” धूम्रावरण छँट जायेेगा और लोग ख़ुद ही देखेंगे कि रूसी साम्राज्यवादी आख़िर किसी चीज़ के पीछे भाग रहे थे – जलडमरूमध्य और ईरान।

”गुएस्दे, सेम्बात और उस जैसों का जि़म्मरवॉल्ड और कियेंथॉल समाजवादी कांग्रेसों में सही ही मूल्यांकन किया गया था।

”आगे की घटनाओं ने जि़म्मरवॉल्ड और कियेंथॉल की थीसीज़ के सहीपन और उपयोगीपन को पूरी तरह सिद्ध किया है।…

हमारा, एक पार्टी के तौर पर मौजूदा युद्ध पर क्या रुख़ होना चाहिए?…

पहली बात तो यह, कि यह प्रश्नेतर है कि यह कोरा नारा, ”युद्ध मुर्दाबाद!” व्यावहारिक कार्यों के लिए एकदम अनुपयुक्त है, क्योंकि, यह शान्ति के विचार के आमतौर पर प्रचार से आगे नहीं जाता, यह युद्धरत शक्तियों पर युद्ध को रोकने के लिए बाध्य करने के लिए व्यावहारिक दबाव बनाने के लिए कुछ भी मुहैया कराने में सक्षम नहीं है और न ही हो सकता है।” (स्तालिन, 1954, ‘युद्ध’, (16 मार्च 1917), वर्क्स, खण्ड-3, फ़ॉरेल लैंगुएजेज़ पब्लिशिंग हाउस, मॉस्को)

आगे स्तालिन बताते हैं कि युद्ध ख़त्म करने का एक ही रास्ता हो सकता है और वह यह है कि तमाम युद्धरत देशों का मज़दूर वर्ग अपने शासक वर्गों पर युद्ध ख़त्म करने के लिए क्रान्तिकारी दबाव बनाये। साफ़ है कि स्तालिन अभी लेनिन की ”क्रान्तिकारी पराजयवाद” की कार्यदिशा तक नहीं पहुँचे थे। लेकिन रूस में लेनिन की इस रैडिकल कार्यदिशा के सबसे क़रीब स्तालिन ही थे। हमने स्तालिन का यह लम्बा उद्धरण इसलिए पेश किया ताकि अलेक्ज़ैण्डर रैबिनोविच जैसे अमेरिकी (वैसे रैबिनोविच मूलत: रूसी हैं। रैबिनोविच के पिता क्रान्ति के बाद 1918 में रूस से भाग गये थे) इतिहासकारों द्वारा स्तालिन के विषय में फैलाये जाने वाले झूठ के स्तर को समझ सकें। इसके अलावा लेनिन के आने से पहले ही स्तालिन पुख्ता तरीक़े से युद्ध का विरोध कर रहे थे (हालाँकि, वे जि़म्मरवॉल्ड-कियेंथॉल लाइन पर सभी युद्ध विरोधियों की एकता स्थापित करने का प्रयास कर रहे थे, जिस लाइन पर मेंशेविक प्रभाव से इंकार नहीं किया जा सकता है), इसे जानने के लिए स्तालिन के कुछ अहम लेख देखे जा सकते हैं, जैसे कि 18 मार्च 1917 का लेख ‘रूसी क्रान्ति के विजय की शर्तें’ और 16 मार्च 1917 का लेख ‘बिडिंग फ़ॉर मिनिस्टीरियल पोर्टफ़ोलियोज़’। इन लेखों को देखने से भी रैबिनोविच जैसे इतिहासकारों का यह आरोप निराधार सिद्ध हो जाता है कि स्तालिन ने युद्ध में भागीदारी का समर्थन किया था। ध्यान देने योग्य बात है कि त्रात्स्की ने भी स्तालिन पर यही आरोप लगाया है। हमने थोड़ा विस्तार से इस आरोप का खण्डन करना ज़रूरी समझा क्योंकि यद्यपि स्तालिन लेनिन की अवस्थिति पर नहीं पहुँचे थे, मगर वे कामेनेव की अवस्थिति पर भी नहीं थे। ग़ौरतलब है, ई.एच. कार के बाद अगर पश्चिमी अकादमिक जगत में किसी इतिहासकार के काम की सबसे ज़्यादा चर्चा हुई है तो वह अलेक्ज़ैण्डर रैबिनोविच हैं और उनके काम का यह स्तर है कि वे स्तालिन के बारे में ऐसी आधारहीन टिप्पणी करते हैं। यहाँ यह भी बताना ज़रूरी है कि आरज़ी सरकार के बारे में भी स्तालिन का ठीक वही रुख़ नहीं था जो कि पेत्रोग्राद पार्टी कमेटी का था। स्तालिन का रुख़ अगर मोलोतोव के समान आरज़ी सरकार की सीधी मुख़ालफ़त का नहीं था, तो स्पष्ट समर्थन का भी नहीं था। स्तालिन का रुख़ मूलत: और मुख्यत: आरज़ी सरकार के प्रति अविश्वास का था। इसे भी रैबिनोविच ग़लत तरीक़े से पेश करते हैं।

बहरहाल, कामेनेव के 15 मार्च के इस लेख के प्रकाशन पर पेत्रोग्राद के कारख़ाना मज़दूरों और अन्य बोल्शेविकों की तीखी प्रतिक्रिया आयी। स्तालिन और मुरानोव ने एक बैठक में इस रुख़ की कड़ी आलोचना की। इस बैठक में पेत्रोग्राद पार्टी कमेटी, रूसी ब्यूरो के सदस्य, और साईबेरिया में निर्वासन से लौटे बोल्शेविक शामिल थे। बहुमत ने आरज़ी सरकार के प्रति एक तटस्थ नीति अपनाने का निर्णय किया जबकि युद्ध के मामले में मेंशेविकों की क्रान्तिकारी रक्षावाद की नीति का विरोध करने का निर्णय किया गया। स्तालिन ने आरज़ी सरकार के प्रति ज़्यादा पुख्ता तरीक़े से अविश्वास प्रकट किया हालाँकि उन्होंने क्रान्ति के दूसरी मंजि़ल में प्रवेश और नेतृत्व को सर्वहारा हाथों में लेने की वकालत नहीं की। स्तालिन ने भी अभी आरज़ी सरकार के खुले विरोध की नीति नहीं अपनायी थी। स्तालिन का ऐसा कहना नहीं था कि बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के पूरा होने तक और पूँजीवाद के परिपक्व होने तक आरज़ी सरकार का समर्थन किया जाये जैसा कि मेंशेविक कह रहे थे। लेकिन स्तालिन बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के पूरा होने की प्रक्रिया में ही सर्वहारा वर्ग द्वारा नेतृत्व अपने हाथों में लेने की बात भी नहीं कर रहे थे। आगे चलकर स्तालिन ने त्रात्स्की के साथ अपनी बहस के दौरान अपनी इस ग़लती को स्वीकार किया था, हालाँकि ‘बोल्शेविक पार्टी का इतिहास’ में इसका स्पष्टता से जि़क्र नहीं मिलता।

बहरहाल, इस अनिर्णय का कारण यह था कि क्रान्ति की मंजि़ल को लेकर बोल्शेविक पार्टी में भी अभी एक विभ्रम की स्थिति बनी हुई थी। एक ओर यह आम राय बनी हुई थी कि क्रान्ति बुर्जुआ जनवादी मंजि़ल में है, वहीं दूसरी ओर यह भी स्पष्ट था कि आरज़ी सरकार जनवादी क्रान्ति के मूल कार्यभारों को पूरा करने में आनाकानी और टालमटोल कर रही है। ऐसे में, जिस निर्णायकता के साथ क्रान्ति के नेतृत्व को अपने हाथों में लिये जाने का आह्वान करने की आवश्यकता थी, वह पार्टी के भीतर कोई भी नहीं कर पा रहा था। न ही कोई उन चिन्हों को देख पा रहा था जो बता रहे थे कि युद्ध, ‘दोहरी सत्ता’ के पैदा होने, और किसानों के बढ़ते आन्दोलन के कारण पैदा हुई विशिष्ट परिस्थितियों में बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के सारे कार्यभारों के पूरा हुए बग़ैर ही, क्रान्ति समाजवादी चरण में प्रवेश कर चुकी है; लिहाज़ा, सर्वहारा वर्ग को सत्ता अपने हाथों में लेनी चाहिए, जनवादी क्रान्ति को रैडिकल रूप में पूर्णता तक पहुँचाना चाहिए और ‘समाजवाद की ओर कुछ पहले क़दम’ उठाने चाहिए। स्थिति की जटिलता और तरलता के चलते पार्टी में इस स्पष्ट सोच का अभाव था। लेनिन के आगमन के साथ विभ्रम का धुँआ छँटा और लेनिन ने अपने रैडिकल प्रस्तावों से न सिर्फ़ मेंशेविकों व अन्य सामाजिक-जनवादियों को चौंका दिया, बल्कि बोल्शेविक पार्टी में भी कई लोग लेनिन के प्रस्तावों पर आश्चर्यचकित हो गये थे। ‘सुदूर से पत्र’ के बाद लेनिन ने अपने विचारों को प्रसिद्ध अप्रैल थीसीज़ में विकसित किया और ठोस नतीजों तक पहुँचाया। जो बातें मार्च के पत्रों में आम विश्लेषण, संकेतों और आरज़ी निष्कर्षों तक पहुँची थी, अब वह ठोस, मूर्त और पुख्ता नतीजों, नारों और पार्टी के कार्यक्रम तक पहुँच गयी थी।

लेनिन 3 अप्रैल 1917 को पेत्रोग्राद के फि़नलैण्ड रेलवे स्टेशन पर उतरे जहाँ कामेनेव, और कोलोन्ताई प्रमुख नेताओं में थे जो कि उनकी अगुवाई के लिए आये थे। श्ल्याप्निकोव एक स्टेशन पहले बेलूस्त्रोव से ही लेनिन के साथ हो गये थे। उनके साथ रूसी ब्यूरो के कुछ अन्य कॉमरेड भी थे। लेनिन ने पेत्रोग्राद पहुँचने से पहले ही ट्रेन में श्ल्याप्निकोव पर अपने सवालों की बारिश कर दी। लेनिन को पेत्रोग्राद में पार्टी के भीतर मौजूद स्थिति के बारे में जल्द से जल्द जानना था। साथ ही, उन्होंने मज़दूरों के बीच के माहौल और पेत्रोग्राद सोवियत के रवैये के बारे में भी कई सवाल पूछे। पेत्रोग्राद में उतरते ही उन्होंने मज़ाकि़या अन्दाज़ में कामेनेव से पूछा कि आजकल प्राव्दा में वे क्या ऊल-जुलूल लिख रहे हैं।

पेत्रोग्राद सोवियत की ओर से चखीद्ज़े भी लेनिन का स्वागत करने आये थे। चखीद्ज़े ने लेनिन के स्वागत में बात रखते हुए उन्हें मेंशेविक कार्यदिशा को अपनाने का न्यौता दिया। उन्होंने कहा कि रूस में सभी जनवादी शक्तियों को अपनी ताक़तों को एकजुट कर देना चाहिए। ज़ाहिर है, लेनिन ने इन बातों पर ज़्यादा ग़ौर नहीं किया और वे बोल्शेविक काडर व आम जनता के बीच अपने विचारों को जल्द से जल्द रखना चाहते थे। फि़नलैण्ड स्टेशन पर लेनिन का ज़बरदस्त स्वागत हुआ। क्रोंस्टाट के नाविकों ने उनके सम्मान में ‘गार्ड ऑफ़ ऑनर’ दिया। उन्हें फूलों का गुलदस्ता पेश किया गया और पेत्रोग्राद सोवियत के अन्य प्रतिनिधियों ने भी स्वागत भाषण दिये। इसके बाद लेनिन ने स्टेशन के बाहर एकत्र भीड़ को सम्बोधित किया। इस भाषण में लेनिन ने साम्राज्यवादी युद्ध को गृहयुद्ध में तब्दील करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि यूरोपीय साम्राज्यवाद बुरी तरह से संकटग्रस्त है और उसने एक विश्व समाजवादी क्रान्ति की स्थितियाँ पैदा कर दी हैं। लेनिन ने उनके स्वागत में निकाली गयी बोल्शेविक रैली में आयी बख्तरबन्द गाड़ी पर चढ़कर स्टेशन के बाहर के प्रमुख चौराहे पर दोबारा भाषण दिया। इस गाड़ी पर बोल्शेविक पार्टी का झण्डा लगा हुआ था। इसके बाद उसी दिन शाम को लेनिन ने पार्टी के मुख्यालय पर पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच भाषण दिया। स्टेशन के बाहर दिये गये पहले भाषण में ही लेनिन ने कहा, ”अगर आज या कल नहीं, तो अब किसी भी दिन, समूचे यूरोपीय साम्राज्यवाद का पतन हो सकता है। आपके द्वारा सम्पन्न की गयी रूसी क्रान्ति ने इसकी शुरुआत की है, और इसने एक नये युग का सूत्रपात कर दिया है। विश्वव्यापी समाजवादी क्रान्ति की विजय हो।”

लेनिन की बातों ने तत्काल अधिकांश लोगों को अचम्भे में डाल दिया था। कई पार्टी कार्यकर्ताओं को लग रहा था कि जो लोग अपेक्षाकृत ज़्यादा दृढ़ता से आरज़ी सरकार के विरोध की बात कर रहे थे, लेनिन उनकी आलोचना करेंगे (जैसे कि मोलोतोव) लेकिन एक पार्टी कार्यकर्ता के अनुसार लोग यह देखकर चकित थे कि मॉस्को व पेत्रोग्राद में मौजूद सभी पार्टी नेताओं में मोलोतोव ही लेनिन के सबसे क़रीब पड़ते थे। अगले दिन यानी 4 अप्रैल को लेनिन ने अपनी बहन के घर पर और फिर प्राव्दा के सम्पादकीय कार्यालय पर भी कई पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं के सामने अपनी अवस्थिति रखी। इसके बाद उन्होंने तौरीद प्रासाद में सामाजिक-जनवादी नेताओं व कार्यकर्ताओं की एक मिश्रित बैठक के समक्ष अपने विचार रखे। इनमें मेंशेविक व अन्य समाजवादी भी शामिल थे। लेनिन के भाषण के दौरान कई मेंशेविकों ने बीच-बीच में टोका-टाकी की। एक भूतपूर्व बोल्शेविक गोल्डेनबर्ग ने कहा कि यूरोप में एक ताज कई दशकों से ख़ाली है, उसे उसका नया उम्मीदवार मिल गया है और यह ताज है बाकुनिन का। यानी, लेनिन पर गोल्डेनबर्ग ने अराजकतावाद का आरोप लगाया। बोग्दानोव ने बीच में टोकते हुए लेनिन की बातों को ”एक पागल का प्रलाप” कहा। वहीं स्टेकलोव ने, जो जल्दी ही बोल्शेविक पार्टी में शामिल होने वाले थे, लेनिन की बातों को अमूर्त निर्मितियों का समुच्चय कहा। लेकिन लेनिन ने इन सभी आक्षेपों और आपत्तियों के बावजूद पूरे आत्मविश्वास के साथ अपनी थीसीज़ पेश कीं। यही थीसीज़ आगे ‘अप्रैल थीसीज़’ के नाम से प्रसिद्ध हुईं और पहली बार ये 7 अप्रैल के प्राव्दा में ‘वर्तमान क्रान्ति में सर्वहारा वर्ग के कार्यभारों के बारे में’ के नाम से प्रकाशित हुईं।

अलेक्ज़ैण्डर रैबिनोविच का इस बैठक के बारे में विवरण बिल्कुल भिन्न है। उनका मानना है कि बोल्शेविक लेनिन के आने के पहले युद्ध और आरज़ी सरकार पर मेंशेविकों की अवस्थिति के इतने क़रीब जा चुके थे कि वे एकीकरण के लिए एक बैठक करने वाले थे। वास्तव में आमतौर पर बोल्शेविक पार्टी और मेंशेविक पार्टी में सामान्य एकता उस समय एजेण्डे पर नहीं थी, वरन् सोवियत के भीतर एक एकीकृत अवस्थिति बनाने का प्रश्न था। रैबिनोविच के अनुसार, उस बैठक में शामिल होने वाले बोल्शेविकों के सामने लेनिन ने अप्रैल थीसीज़ पेश की और बाद में उसकी प्रतिलिपियाँ मेंशेविक नेताओं को दी गयीं, जिसके बाद बोग्दानोव, गोल्डेनबर्ग व स्टेकलोव ने उपरोक्त टिप्पणियाँ कीं। पहली बात तो यह है कि एकीकरण की बात को इस तरह पेश किया जा रहा है मानो बोल्शेविक पार्टी अपने सांगठनिक उसूलों का परित्याग कर मेंशेविकों से एकता की बात कर रही थी। इसका कोई प्रमाण कहीं नहीं मिलता, सिवाय संशोधनवादी और
स्तालिन-विरोधी इतिहासकार बर्दज़ालोव के। ई.एच. कार के अनुसार, यह सामाजिक-जनवादियों की साझा बैठक थी जिसमें मेंशेविक और बोल्शेविक दोनों ही शामिल थे। युद्ध और आरज़ी सरकार से रिश्ते के प्रश्न पर तमाम बोल्शेविक यदि अभी लेनिन की अवस्थिति तक नहीं आये थे, तो वे मेंशेविक अवस्थिति पर भी नहीं थे। स्तालिन ने स्वयं रैबिनोविच के अनुसार लेनिन द्वारा इन बैठकों में बोलने के पहले ही एक प्रस्ताव पारित कराया था जिसमें ”आरज़ी सरकार की गतिविधियों पर चौकसीपूर्ण नियन्त्रण” और ”एक क्रान्तिकारी सत्ता की शुरुआत के रूप में” पेत्रोग्राद सोवियत का समर्थन करने की बात कही गयी थी (रैबिनोविच, वही, पृ. 38)। ज़ाहिर है कि यह अवस्थिति मेंशेविक अवस्थिति से कुछ अहम मायनों में भिन्न है। इसके बाद रैबिनोविच यह दावा करते हैं कि बोल्शेविक इस हद तक मेंशेविकों की अवस्थिति पर चले गये थे कि वे एकीकरण के बारे में सो‍च रहे थे! यह अन्तरविरोधी बात है।

दूसरी बात यह है कि रैबिनोविच दावा करते हैं कि अप्रैल थीसीज़ में लेनिन ने एकीकरण का विरोध किया था। लेकिन यदि आप अप्रैल थीसीज़ को पढ़ें तो आपको एकीकरण या एकीकरण के विरोध की कोई चर्चा नहीं मिलेगी क्योंकि ऐसी कोई चर्चा वास्तव में बोल्शेविकों के बीच हो ही नहीं रही थी। यहाँ तक कि कामेनेव ने भी, जिन्होंने मेंशेविक ”क्रान्तिकारी रक्षावाद” की अवस्थिति अपनायी थी, मेंशेविकों से एकीकरण का प्रस्ताव नहीं रखा था। एकीकरण की बात की चर्चा लेनिन के लेख ‘लेटर्स ऑन टैक्टिक्स’ में मिलती है। इस लेख में लेनिन स्वयं इस बात का जि़क्र करते हैं कि उन्होंने अप्रैल थीसीज़ एकीकरण हेतु होने वाली वार्ता में जाने वाले बोल्शेविकों के समक्ष नहीं बल्कि बोल्शेविकों और मेंशेविकों की संयुक्त बैठक में की थी। लेनिन लिखते हैं :

”4 अप्रैल 1917 को शीर्षक में बताये गये विषय पर रिपोर्ट पेश करने का अवसर मुझे मिला था, पहले पेत्रोग्राद में बोल्शेविकों की एक बैठक में। ये मज़दूर व सैनिक प्रतिनिधियों के अखिल रूसी सम्मेलन में जाने वाले प्रतिनिधि थे, जिन्हें अपने घरों को वापस लौटना था और इसलिए मुझे इस काम को टालने की आज्ञा नहीं थी। इस बैठक के बाद, अध्यक्ष कॉमरेड जि़नोवियेव ने पूरी सभा की ओर से मुझसे इस रिपोर्ट को तत्काल बोल्शेविक और मेंशेविक प्रतिनिधियों की एक संयुक्त बैठक के समक्ष दुहराने के लिए कहा, जो कि रूसी सामाजिक-जनवादी मज़दूर पार्टी के एकीकरण के सवाल पर चर्चा करना चाहते थे।

”हालाँकि अपनी रिपोर्ट को तत्काल दुहराना मेरे लिए मुश्किल था, लेकिन मुझे लगा कि एक बार विचारों-में-मेरे-साथियों और साथ ही मेंशेविकों द्वारा माँग किये जाने के बाद मुझे मना करने का कोई अधिकार नहीं था, क्येांकि मेंशेविक मुझे अपने आसन्न प्रस्थान के कारण और देर करने की आज्ञा नहीं दे सकते थे।” (वी.आई. लेनिन, 1964, ‘लेटर्स ऑन टैक्टिक्स’, कलेक्टेड वर्क्स, खण्ड-24, चौथा अंग्रेज़ी संस्करण, प्रोग्रेस पब्लिशर्स, मॉस्को, पृ.42)

यहाँ ग़ौर करने वाली बात है कि लेनिन ने जिस संयुक्त बैठक को सम्बोधित किया था वह बोल्शेविकों और मेंशेविकों की कोई सामान्य बैठक नहीं थी, बल्कि उन बोल्शेविक व मेंशेविक प्रतिनिधियों की बैठक थी जिन्हें मज़दूर व सैनिक प्रतिनिधियों के अखिल रूसी सम्मेलन में भाग लेने जाना था। दूसरी बात यह कि इस बैठक में युद्ध के प्रश्न पर एक एकीकृत अवस्थिति को लेकर बहस होनी थी। इसलिए जिस एकीकरण की बात की जा रही थी, वह आमतौर पर बोल्शेविक पार्टी और मेंशेविकों के बीच सामान्य राजनीतिक-विचारधारात्मक एकता की बात नहीं थी, बल्कि एक विशिष्ट प्रश्न पर एक विशिष्ट मंच पर एकीकृत अ‍वस्थिति बनाने की बात थी। अगर यह विवरण स्पष्ट न किया जाये, तो भ्रम की स्थिति पैदा होती है।

रैबिनोविच यह भी दावा करते हैं कि 6 अप्रैल को केन्द्रीय कमेटी के ब्यूरो की कोई बैठक हुई जिसमें कामेनेव ने लेनिन की अप्रैल थीसीज़ पर हमला किया और स्तालिन ने कामेनेव का समर्थन किया। इसका कोई विवरण ई.एच. कार, बेतेलहाइम, डॉब जैसे इतिहासकारों की पुस्तकों में नहीं मिलता है। न ही 6 अप्रैल की किसी बैठक का ब्यौरा लेनिन के लेखन में या स्तालिन के लेखन में मिलता है। और अगर ऐसी बैठक हुई भी थी तो स्तालिन ने किसी भी बिन्दु पर कामेनेव का साथ देते हुए लेनिन पर हमला किया हो, इसका कोई विवरण नहीं मिलता है, सिवाय बर्दज़ालोव जैसे संशोधनवादी इतिहासकार या त्रात्स्की के लेखन/त्रात्स्कीपन्थी ब्यौरों में।

इस प्रसंगान्तर के बाद हम अप्रैल थीसीज़ की अन्तर्वस्तु पर थोड़ी चर्चा करते हैं। ‘अप्रैल थीसीज़’ के प्रमुख तर्क इस प्रकार थे। पहला बिन्दु यह था कि जारी युद्ध एक साम्राज्यवादी युद्ध है और इसलिए तथाकथित क्रान्तिकारी रक्षावाद की कार्यदिशा का दृढ़ता से विरोध किया जाना चाहिए। क्रान्तिकारी रक्षावाद का समर्थन एक ही सूरत में किया जा सकता था यदि सर्वहारा वर्ग और ग़रीब किसान सत्ता में होते, सभी क़ब्ज़ों को कथनी नहीं बल्कि करनी के स्तर पर समाप्त कर दिया जाता और पूँजीवादी हितों से निर्णायक तौर पर विच्छेद हो गया होता। लेकिन ये तीनों ही शर्तें पूरी नहीं हो रही हैं और इसलिए इस युद्ध में हमें सेना के बीच दुश्मन सेना में लड़ रहे वर्दीधारी मज़दूर और किसान भाइयों से भाईचारा स्थापित करने की मुहिम चलानी चाहिए।

दूसरा बिन्दु सबसे महत्वपूर्ण था जिसमें लेनिन ने बताया कि वर्तमान में हमारे देश में क्रान्ति की ख़ासियत यह है कि यह पहले चरण (बुर्जुआ जनवादी) से दूसरे चरण (समाजवादी) में प्रवेश कर रही है। पहले चरण में अपर्याप्त संगठन और चेतना के कारण मज़दूर वर्ग ने सत्ता स्वेच्छा से बुर्जुआ वर्ग को हस्ता‍न्तरित कर दी थी। इस संक्रमण की ख़ासियत यह है कि हमारा देश फ़रवरी क्रान्ति की वजह से राजनीतिक तौर पर यूरोप के सभी देशों से आगे निकल गया है, क्योंकि मज़दूरों व किसानों के दबाव ने आरज़ी पूँजीवादी सरकार को सबसे उदार जनवादी अधिकार देने को बाध्य किया है। वहीं दूसरी ख़ासियत यह है कि यह सरकार पूँजीपतियों और भूस्वामियों की सरकार है जो रोटी, शान्ति और ज़मीन की माँगों को पूरा नहीं कर सकती है। ऐसे में, हमें दूसरे चरण में संक्रमण के अनुसार अपने पार्टी कार्यभारों को सुनिश्चित करना होगा।

तीसरा बिन्दु यह था कि आरज़ी सरकार को किसी भी किस्म का बाशर्त या बेशर्त समर्थन देने का भी कोई प्रश्न नहीं उठता है। यह पूँजीपतियों और भूस्वामियों की सरकार है और इससे यह उम्मीद करना कि यह साम्राज्यवादी बर्ताव न करे और जनवादी और न्यायपूर्ण शान्ति दे, मूर्खतापूर्ण है।

चौथा बिन्दु भी राजनीतिक तौर पर बेहद महत्वपूर्ण था। इसमें लेनिन एक ओर यह बताते हैं कि सोवियतें ही वे निकाय हैं जो कि समाजवादी सत्ता के कार्यभारों को सँभाल सकती हैं। लेकिन लेनिन यहाँ इन निकायों की सम्भावना-सम्पन्नता की बात कर रहे हैं। कारण यह है कि सोवियतों में अभी भी तमाम टटपुँजिया व बुर्जुआ ताक़तों का वर्चस्व था। इसमें मेंशेविक व समाजवादी-क्रान्तिकारी नेतृत्वकारी स्थिति में थे। आगे वे स्पष्ट करते हैं कि बोल्शेविक पार्टी को सोवियतों के बीच अपने राजनीतिक कार्य को निरन्तरता के साथ चलाना होगा और उसमें अपने राजनीतिक वर्चस्व को स्थापित करना होगा। जब तक ऐसा नहीं होता तब तक यह सम्भावना-सम्पन्नता एक सुषुप्त सम्भावना-सम्पन्नता ही बनी रहेगी।

पाँचवें बिन्दु में लेनिन स्पष्ट रूप में किसी संसदीय सरकार की सम्भावना को नकारते हैं। उनका मानना है कि अब जब कि सोवियतें एक नयी प्रकार की सत्ता, यानी मज़दूर वर्ग और ग़रीब किसानों की सत्ता, के रूप में अस्तित्व में आ चुकी हैं, जो कि किसी भी बुर्जुआ संसदीय जनवाद से कहीं ज़्यादा वास्तविक रूप में जनवादी है, तो वापस संसदीय जनवाद को स्थापित करने की बात करना एक पीछे की ओर उठाया हुआ क़दम होगा। इसके बाद वे सेना, पुलिस व नौकरशाही को ख़त्म करने की बात करते हैं, जो कि बुर्जुआ राज्यसत्ता के असली कार्यकारिणी की भूमिका निभाते हैं। साथ ही, लेनिन यह भी कहते हैं कि सोवियतों के भावी गणराज्य में सभी राजकीय कर्मचारियों का वेतन एक योग्य कुशल मज़दूर से ज़्यादा नहीं होगा।

छठें बिन्दु में लेनिन भूमि के प्रश्न को उठाते हैं। यह छठाँ बिन्दु भी राजनीतिक रूप में महत्वपूर्ण है और क्रान्ति के नये चरण में भूमि के प्रश्न पर लेनिन के नज़रिये को दिखलाता है। लेनिन कहते हैं कि ज़मीन के प्रश्न के हल के लिए भूमि कार्यक्रम में पार्टी को अपना ज़ोर अब खेतिहर मज़दूरों और निर्धनतम किसानों की सोवियत पर बढ़ा देना चाहिए। वे जागीरों को तत्काल ज़ब्त करने की बात करते हैं और सारे भूमि के राष्ट्रीकरण को कार्यक्रम में शामिल करते हैं। लेनिन के अनुसार राष्ट्रीकरण के बाद ज़मीन के निपटारे का कार्य किसानों व भूमिहीन मज़दूरों की सोवियतों को सौंप दिया जायेेगा। ग़रीब किसानों की सोवियतों को अलग से संगठित किया जाना चाहिए। और सार्वजनिक उत्पादन के लिए बड़ी जागीरों पर मॉडल फ़ार्म बनाये जायेें जो कि खेतिहर मज़दूरों की सोवियतों के मातहत होंगे। ज़ाहिर है, कि लेनिन भूमि प्रश्न पर सावधानी के साथ समाजवादी कार्यक्रम की ओर आगे बढ़ने की बात कर रहे हैं। एक तरफ़़ उन्होंने राष्ट्रीकृत भूमि के निपटारे का काम किसान सोवियतों और खेतिहर मज़दूरों की सोवियत पर छोड़ा है और साथ ही बड़ी जागीरों पर तत्काल राजकीय/सामूहिक खेती शुरू करने का भी प्रस्ताव रखा है। भूमि कार्यक्रम में वास्तव में क्या लागू हो पायेगा और क्या नहीं, इसके बारे में पहले से इससे ज़्यादा पुख्ता प्रस्ताव रखा ही नहीं जा सकता था और कहीं-न-कहीं लेनिन को इस बात का पूर्वानुमान था कि किसान आबादी में राजनीतिक विभेदीकरण अभी अल्पविकसित है और इस बात की प्रबल सम्भावना है कि किसानों की अच्छी-ख़ासी आबादी अभी पुनर्वितरण पर ही राजी हो। इसीलिए पार्टी की भूमिका में उन्होंने दो चीज़ों पर बल दिया है : पहला, खेतिहर मज़दूरों की अलग सोवियतें संगठित करना और दूसरा, ग़रीब किसानों की अलग सोवियतें संगठित करना। केवल तभी क्रान्ति के उपरान्त समाजवादी भूमि कार्यक्रम को लागू करने के लिए आगे बढ़ा जा सकता था। यह बात दीगर है कि बाद में लेनिन ने समाजवादी-क्रान्तिकारियों के भूमि कार्यक्रम को अपनाया जो कि रैडिकल बुर्जुआ जनवादी चौहद्दियों से आगे नहीं जाता था और क्रान्ति के बाद केवल 3 से 4 प्रतिशत भूमि पर ही मॉडल फ़ार्म बन पाये। लेनिन इस बात को समझते थे कि बहुसंख्यक आबादी के साथ ज़ोर-ज़बरदस्ती कर उन्हें समाजवादी कार्यक्रम पर नहीं लाया जा सकता और उन्हें अपने अनुभव से और साथ ही बोल्शेविक राजनीति प्रचार व शिक्षण के ज़रिये लम्बी अवधि में सहकारी, सामूहिक व राजकीय खेती पर राजी करना होगा।

सातवें बिन्दु में लेनिन सभी बैंकों के राष्ट्रीकरण और एक राजकीय बैंक की स्थापना की बात करते हैं, जो कि सोवियत सत्ता के मातहत होगा।

आठवें बिन्दु में लेनिन स्पष्ट करते हैं कि सर्वहारा सत्ता का तात्कालिक कार्य समाजवादी आर्थिक कार्यक्रम को तुरन्त लागू करना नहीं होगा, बल्कि समाजवाद की ओर कुछ पहले क़दम बढ़ाना होगा। इस बिन्दु को लेनिन थीसीज़ में ज़्यादा विस्तारित नहीं करते हैं, लेकिन बाद में उन्होंने अपने लेखन में इस बिन्दु को विशेष तौर पर विस्तृत रूप में व्याख्यायित किया। लेनिन स्पष्ट थे कि देश में जब तक टटपुँजिया उत्पादन का बोलबाला रहेगा तब तक समाजवादी आर्थिक कार्यक्रम को लागू करना सम्भव नहीं होगा। ऐसे में, सबसे पहले समूचे उत्पादन व वितरण को मज़दूर राज्यसत्ता के नियन्त्रण में लाना होगा, जिसके लिए उद्योगों का सिण्डिकेटीकरण करना होगा, पहले चरण में बुर्जुआ वर्ग के विशेषज्ञों को सर्वहारा सत्ता के लिए काम करने के लिए बाध्य करना होगा, और सर्वहारा वर्ग को इन तमाम कामों को स्वयं सीधे अपने हाथों में लेने के लिए शिक्षित-प्रशिक्षित करना होगा। हम इस बिन्दु पर आगे आयेंगे, जब हम अगस्त, सितम्बर और अक्टूबर में लेनिन के महत्वपूर्ण लेखों पर चर्चा करेंगे। थीसीज़ का यह आठवाँ बिन्दु इसलिए भी अहम है क्योंकि यह रूसी समाजवादी क्रान्ति के एक विशिष्ट स्थिति में होने की सच्चाई को समझता है। लेनिन जानते थे कि युद्ध, आर्थिक विघटन, अकाल और साथ ही सोवियतों के रूप में समानान्तर सत्ता के उदय ने वे विशिष्ट स्थितियाँ पैदा कर दी हैं, जिसमें कि बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के सम्पन्न होने के बाद, मगर बुर्जुआ जनवादी कार्यभारों के पूरा हुए बग़ैर, सर्वहारा वर्ग इतिहास के रंगमंच के केन्द्र में आ गया है। युद्ध और जनता के क्रान्तिकारी आन्दोलन ने रूसी बुर्जुआ वर्ग को लगातार प्रतिक्रिया और प्रतिक्रान्ति की शरण में जाने को बाध्य किया है और वह जनवादी क्रान्ति को पूरा करना तो दूर जनवादी क्रान्ति को अवर्धित (abort) करने की साजि़श करेगा। ऐसे में, रूस में बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति को भी बचाने और उसे रैडिकल तरीक़े से मुक़ाम पर पहुँचाने के लिए समाजवादी क्रान्ति सम्पन्न करना आवश्यक हो गया है।

नौवें बिन्दु में लेनिन पार्टी कार्यक्रम में बदली स्थितियों के मुताबिक़ बदलाव के प्रस्ताव रखते हैं, जिसमें कि पार्टी के न्यूनतम कार्यक्रम को बदलने की बात शामिल थी। साथ ही, लेनिन प्रस्ताव रखते हैं कि पार्टी का नाम सामाजिक-जनवादी मज़दूर पार्टी से बदलकर कम्युनिस्ट पार्टी कर दिया जाना चाहिए। इसके कारण के तौर पर लेनिन यह बताते हैं कि यह नाम यूरोपीय सामाजिक-जनवाद की ग़द्दारी के साथ कलंकित हो गया है। आगे ‘राज्य और क्रान्ति’ में लेनिन ने लिखा था कि वैसे भी सामाजिक-जनवादी नाम कभी भी मार्क्स व एंगेल्स की पहली पसन्द नहीं था और उनके लिए पार्टी के लिए सबसे उपयुक्त नाम कम्युनिस्ट पार्टी ही था।

थीसीज़ के अन्त में यानी दसवें बिन्दु में लेनिन द्वितीय इण्टरनेशनल के संशोधनवादी और सामाजिक कट्टरवादी हो जाने के साथ एक नये इण्टरनेशनल के गठन की ज़रूरत पर प्रस्ताव रखते हैं।

अप्रैल थी‍सीज़ के बारे में कार का यह कहना सही है कि लेनिन ने जानबूझकर और सावधानीपूर्वक एक विशेष किस्म की व्यावहारिक अस्पष्टता को बनाये रखा था, विशेष तौर पर इस बारे में कि ”समाजवाद में संक्रमण” या सर्वहारा वर्ग की तानाशाही को स्थापित कर देने का सही क्षण कब आयेगा। लेकिन इतना तय था कि अब इतिहास ने जो सवाल एजेण्डे पर उपस्थित कर दिया है वह है समाजवादी क्रान्ति।

अप्रैल थीसीज़ 7 अप्रैल के प्राव्दा में प्रकाशित हुई और 8 अप्रैल को ही कामेनेव की ओर से टिप्पणी प्रकाशित हुई कि थीसीज़ में रखे गये विचार लेनिन के अपने विचार हैं, न कि प्राव्दा के पूरे सम्पादक मण्डल के। 9 अप्रैल को पेत्रोग्राद पार्टी कमेटी में लेनिन की थीसीज़ 2 के मुक़ाबले 13 वोटों से पराजित हो गयी। ग़ौरतलब है, पेत्रोग्राद पार्टी कमेटी में पहले से ही आरज़ी सरकार के समर्थन की ग़लत लाइन हावी थी। इसके बाद थीसीज़ को पेत्रोग्राद शहर के पार्टी सम्मेलन में पेश किया जाना था, जो कि 14 अप्रैल को होना था और इसके बाद उसे 24 अप्रैल को अखिल रूसी पार्टी सम्मेलन में भी पेश किया जाना था। लेनिन ने 24 अप्रैल से पहले दो अन्य लेखों ‘हमारी क्रान्ति में सर्वहारा वर्ग के कार्यभार’ और ‘दोहरी सत्ता’ में अपने विचारों को और विस्तार दिया। इसमें ख़ासतौर पर पहला लेख बेहद महत्वपूर्ण है और इसे अप्रैल थीसीज़ का विस्तृत रूप माना जा सकता है। इस लेख में लेनिन ने लिखा :

”रूस में राज्यसत्ता एक नये वर्ग के हाथों में हस्ता‍न्तरित हो चुकी है, यानी, बुर्जुआ वर्ग और वे भूस्वामी जो बुर्जुआ बन गये हैं। इस हद तक रूस में बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति सम्पन्न हो चुकी है।” (वी.आई. लेनिन, 1977, ‘टास्क्स ऑफ़ दि प्रोलेतैरियत इन अवर रिवोल्यूशन’, सेलेक्टेड वर्क्स, खण्ड-2, प्रोग्रेस पब्लिशर्स, मॉस्को, पृ. 37) लेनिन ने इसी लेख में आगे लिखा कि मज़दूरों और सैनिकों (वर्दी में किसान) की सोवियत ने फि़लहाल टटपुँजिया राजनीतिक चेतना और मेंशेविकों और समाजवादी-क्रान्तिकारियों के टटपुँजिया नेतृत्व के कारण सत्ता स्वेच्छा से बुर्जुआ वर्ग की आरज़ी सरकार को सौंप दी है। इसका एक कारण यह भी है कि रूस में टटपुँजिया आबादी बहुसंख्या में है और यह विश्व दृष्टिकोण से बुर्जुआ वर्ग के साथ खड़ी होती है। लेकिन युद्ध और आर्थिक विघटन ने वह स्थिति पैदा कर दी है जिसके कारण बुर्जुआ आरज़ी सरकार का वर्चस्व ख़त्म होता जायेेगा और बोल्शेविकों का यह कार्यभार है कि इस सन्दर्भ में वे लगातार मज़दूर आबादी और ग़रीब किसान व सैनिक आबादी के बीच क्रान्तिकारी राजनीतिक प्रचार करते हुए बुर्जुआ आरज़ी सरकार के असली वर्ग चरित्र का पर्दाफ़ाश करें। मेंशेविक और समाजवादी-क्रान्तिकारी लगातार इसके विपरीत कार्य करेंगे और मज़दूरों और ग़रीब किसान आबादी को बुर्जुआ वर्ग का पिछलग्गू बनाने का प्रयास करेंगे। लेनिन लिखते हैं, ”निम्न पूँजीपति वर्ग के नेता जनता को पूँजीपति वर्ग पर भरोसा करना ”अवश्य” सिखायेंगे। सर्वहाराओं को जनता को पूँजीपति वर्ग पर अविश्वास करना सिखाना ही होगा।” (वही, पृ. 43) आगे लेनिन ने स्पष्ट किया कि साम्राज्यवादी युद्ध शान्तिवादी प्रार्थनाओं से ख़त्म नहीं हो सकता है और किसी एक पक्ष के हथियार रख देने से भी समाप्त नहीं हो सकता है। कारण यह है कि साम्राज्यवादी युद्ध साम्राज्यवादियों की शै‍तानी इच्छाओं का परिणाम नहीं है, बल्कि विश्व पूँजीवादी व्यवस्था की गति‍की से पैदा होने वाला नै‍सर्गिक परिणाम है। इसलिए इसका ख़ात्मा पूँजीपति वर्ग के हाथों से सत्ता छीनने और सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व को स्थापित करके ही हो सकता है। इसलिए रूस में भी शान्ति का प्रश्न अब पूरी तरह से समाजवादी क्रान्ति के प्रश्न से जुड़ चुका है। आगे लेनिन ने स्पष्ट किया कि सोवियतों के रूप में रूस में एक ऐसी संस्था अस्तित्व में आ चुकी है जो भविष्य में कम्यून जैसी राज्यसत्ता का स्वरूप ले सकती है, जो कि कुछ अर्थों में ‘अराज्य’ में तब्दील हो जाता है। इन अर्थों में कि एक अलग से विशेषीकृत शासक जमात की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। जो विधायिका की भूमिका अदा करते हैं वही कार्यपालिका की भूमिका भी अदा करते हैं। ये लोग होते हैं उत्पादक वर्गों के लोग जो अब सशस्त्र हो चुके होते हैं। इस रूप में एक अलग से दमनकारी निकाय के रूप में पुलिस, फ़ौज और नौकरशाही की ज़रूरत ख़त्म हो जाती है। (लेनिन इस समय तक इस संक्रमण की अवधि बेहद छोटी समझ रहे थे, जिसमें कि राज्य अधिक से अधिक अराज्य में तब्दील होता जायेेगा और सर्वहारा वर्ग न सिर्फ़ उत्पादन और वितरण के बल्कि शासन-प्रशासन के सारे कार्य भी अपने हाथों में लेता जायेेगा। आगे लेनिन ने 1919 में यह स्पष्ट किया कि समाजवादी संक्रमण की अवधि कहीं ज़्यादा दीर्घकालिक होगी, और ख़ासकर रूस जैसे देशों में। इस पहलू पर हम आगे के अध्यायों में आयेंगे। इसके कुछ नुक्तों पर हमने तीसरे अध्याय में चर्चा की है, जिसे पाठक सन्दर्भित कर सकते हैं)। इसके बावजूद, इसमें कोई शक नहीं था कि सोवियत सत्ता एक नयी प्रकार की सत्ता की नुमाइन्दगी करती थी।

लेनिन ने बोल्शेविकों या आमतौर पर कम्युनिस्टों का अराजकतावादियों और सामाजिक-जनवादियों से फ़र्क़ भी स्पष्ट किया। पहले वाले मानते हैं कि राज्य की कोई आवश्यकता नहीं है और क्रान्ति के दौर में और वे पूँजीवाद से कम्युनिज़्म में संक्रमण के दौर में राज्यसत्ता की आवश्यकता नहीं समझते। दूसरे, यानी सामाजिक-जनवादी (संशोधनवादी) मानते हैं कि पूँजीवादी राज्य अपने समूचे दमनकारी उपकरण के साथ समाजवादी व्यवस्था में तब्दील हो सकता है। बोल्शेविक मानते हैं कि सर्वहारा वर्ग पूँजीवादी राज्यसत्ता का ध्वंस कर एक नयी प्रकार की राज्यसत्ता क़ायम करता है, जिसकी चारित्रिक आभिलाक्षणिकता होती है, सर्वहारा वर्ग का अधिनायकत्व। लेनिन ने स्पष्ट किया कि सोवियत सत्ता में वह सम्भावना अन्तर्निहित है। कृषि प्रश्न पर लेनिन ने अप्रैल थीसीज़ में रखी कार्यदिशा को और विस्तार से व्याख्यायित किया जो कि बेहद महत्वपूर्ण है। हम इसे पूरा उद्धृत नहीं कर सकते मगर हम इसे पढ़े जाने की सलाह देंगे (वही, पृ 49-50)।

लेनिन ने अप्रैल थीसीज़ से लेकर ‘दोहरी सत्ता’ नामक अपने लेखों में फ़रवरी क्रान्ति के बाद रूस में राजनीतिक स्थिति के अपने मूल्यांकन को स्पष्ट कर दिया था। लेनिन का मानना था कि फ़रवरी क्रान्ति के साथ एक ‘दोहरी सत्ता’ अस्तित्व में आयी है – आरज़ी सरकार के रूप में बुर्जुआ वर्ग की सत्ता और सोवियत के रूप में मज़दूरों और किसानों की सत्ता। इसके साथ, बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति की मंजि़ल पूरी हो गयी है, हालाँकि, कई बुर्जुआ जनवादी कार्यभारों को पूरा करना अभी बाक़ी रहता है। इस स्थिति की ख़ासियत थी बुर्जुआ जनवादी सत्ता और सम्भावना-सम्पन्न रूप में मज़दूरों और किसानों की जनवादी तानाशाही का अन्तर्गुंथन (interweaving)। भविष्य में जो संघर्ष होना था वह था किसान जनसमुदायों के समर्थन के लिए सर्वहारा वर्ग और बुर्जुआ वर्ग के बीच का संघर्ष। लेनिन ने लिखा कि पिछले बीस वर्षों से ”रूस के पूरे राजनीतिक इतिहास में जो एक चीज़ लगातार देखी जा सकती है वह है यह प्रश्न कि सर्वहारा वर्ग किसानों का नेतृत्व कर उन्हें समाजवाद की तरफ़़ ले जायेेगा या फिर बुर्जुआ वर्ग उन्हें पीछे घसीटकर पूँजीवाद के साथ समझौते की ओर ले लायेगा।” (ई. एच. कार, 1950, ‘दि बोल्शेविक रिवोल्यूशन’, खण्ड-1, डब्ल्यू. डब्ल्यू. नॉर्टन एण्ड कम्पनी, लन्दन, में उद्धृत, पृ. 81)।

लेनिन के अनुसार अप्रैल तक बुर्जुआ वर्ग का पलड़ा किसान आबादी और व्यापक मेहनतकश आबादी पर प्रभाव रखने के मामले में हावी था। यही कारण था कि मेंशेविक और समाजवादी-क्रान्तिकारी सोवियतों को आरज़ी सरकार का पिछलग्गू बनाने में फि़लहाल सफल हुए थे। लेकिन हालात जिस तरह से विकसित हो रहे थे, उनमें ऐसी स्थिति बनी नहीं रह सकती थी। जैसे ही किसानों के सब्र का प्याला छलकेगा और वे ज़मीनों पर क़ब्ज़ा शुरू करेंगे, जनवादी क्रान्ति एक नयी मंजि़ल में प्रवेश करेगी, किसान वर्ग का बुर्जुआ वर्ग के साथ संश्रय टूटेगा और सोवियतें बुर्जुआ वर्ग के राजनीतिक नेतृत्व से स्वतन्त्र हो सर्वहारा नेतृत्व के मातहत आ जायेेंगी। इसके साथ ही सर्वहारा वर्ग समाजवादी क्रान्ति के ज़रिये जनवादी क्रान्ति को रैडिकल तरीक़े से मुक़ाम तक पहुँचाने और फिर समाजवाद की ओर कुछ पहले क़दम बढ़ाने की स्थिति में आ जायेेगा। ‘दोहरी सत्ता’ केवल एक संक्रमणकालीन और लघुकालिक स्थिति हो सकती है। या तो यह स्थिति प्रतिक्रिया और प्रतिक्रान्ति की ओर जायेेगी या फिर सर्वहारा क्रान्ति की ओर। लेनिन ने बताया कि दो शत्रुतापूर्ण वर्ग शक्तियाँ राज्यसत्ता में सहअस्तित्व में नहीं रह सकती हैं।

लार्स टी. ली ने लेनिन की अपनी जीवनी ‘लेनिन’ में यह दावा किया है कि ‘अप्रैल थीसीज़’ के पेश किये जाने पर रूस में न सिर्फ़ सामाजिक-जनवादी दायरों में बल्कि बोल्शेविकों के भी एक हिस्से में जो आश्चर्य की लहर दौड़ गयी थी, उसका कोई विशेष कारण नज़र नहीं आता क्योंकि लेनिन ने जो बातें अप्रैल थीसीज़ में कहीं थीं, वे सभी बातें वे अक्टूबर 1915 में पेश अपनी थीसीज़ (जिसे ली ‘अक्टूबर थीसीज़’ का नाम देते हैं) में कहीं थीं। लेकिन यह दावा सही और सटीक प्रतीत नहीं होता है। अक्टूबर थीसीज़ में क्रान्ति के पहले चरण से दूसरे चरण में संक्रमण और किसानों के बीच राजनीतिक विभेदीकरण करने के बारे में कुछ नहीं कहा गया था। हमारे विचार में ये दो बिन्दु विशेष तौर पर अप्रैल थीसीज़ को युगान्तरकारी बनाते हैं। कारण यह कि अक्टूबर 1915 में लेनिन अभी भी जनता की जनवादी क्रान्ति को ही कार्यभार मान रहे थे, जबकि अप्रैल थीसीज़ में लेनिन मानते हैं कि यह चरण आदर्श (ideal) या अमूर्त (abstract) रूप में नहीं बल्कि वास्तविक (real) और मूर्त (concrete) रूप में पूरा हो चुका है। यह सच है कि सत्ता बुर्जुआ वर्ग और बुर्जुआ बन चुके भूस्वामियों के हाथों में आ गयी है, लेकिन जनवादी कार्यभारों को वे क्रान्तिकारी तरीक़े से पूरा नहीं करेंगे। अब इन कार्यभारों को पूरा करने के लिए भी समाजवादी मज़दूर क्रान्ति अपरिहार्य हो गयी है। अप्रैल थीसीज़ का सबसे केन्द्रीय प्रस्ताव यही था जो कि उन्होंने अक्टूबर 1915 में पेश अपनी थीसीज़ में नहीं रखा था। अगर इस प्रकार का तर्क (यानी लार्स टी. ली जैसा तर्क) पेश किया जाये तो यह भी मानना पड़ेगा कि लेनिन अप्रैल थीसीज़ में एक त्रात्स्कीपन्थी कार्यदिशा रख रहे थे। लेकिन ऐसा नहीं था। क्योंकि ऐसे किसी तर्क के लिए यह समझाना मुश्किल हो जाता है कि फ़रवरी 1917 में क्या हुआ था। लार्स टी. ली का यह तर्क तथ्यत: भी सही नहीं ठहरता और इसी बात को आप दोनों थीसीज़ (यानी अक्टूबर 1915 की थीसीज़ और अप्रैल थीसीज़) पढ़कर स्वयं समझ सकते हैं।

बहरहाल, पेत्रोग्राद नगर पार्टी सम्मेलन में लेनिन का प्रस्ताव 6 के मुक़ाबले 20 वोटों से विजयी हुआ। लेनिन का प्रस्ताव था कि सोवियतों को आरज़ी सरकार का तख्तापलट करने के लिए तैयार करने का। कामेनेव का प्रस्ताव पराजित हुआ जो कि यह था कि आरज़ी सरकार पर क़रीबी नज़र रखी जाये और उसका तख्तापलट करने के किसी भी उकसावे से बचा जायेे। लेनिन ने अपनी दूरदृष्टि और तर्कों से समूचे सम्मेलन की राय में परिवर्तन ला दिया था। साथ ही, अप्रैल का हर बीतता दिन लेनिन की भविष्यवाणियों को सही सिद्ध कर रहा था। इसके बाद आया ऐतिहासिक सातवाँ अखिल रूसी पार्टी सम्मेलन जिसे ‘बोल्शेविक पार्टी के इतिहास’ ने एक पार्टी कांग्रेस जितना महत्वपूर्ण बताया है। इस सम्मेलन में लेनिन का प्रस्ताव और भी ज़्यादा बहुमत से विजयी हुआ और क्योंकि 24 अप्रैल तक, जब यह सम्मेलन शुरू हुआ, लेनिन की भविष्यवाणियाँ और भी सटीकता से सही सिद्ध होती नज़र आ रही थीं। मिल्युकोव और गुचकोव को युद्ध के समर्थन के कारण हुए जनविरोध के कारण इस्तीफ़ा देना पड़ा था और नयी संयुक्त सरकार में बोल्शेविकों को छोड़कर सभी समाजवादी पार्टियाँ शामिल हो गयी थीं। बोल्शेविक पार्टी के लिए यह एक स्वर्णिम अवसर था। कामेनेव अभी भी अपनी अवस्थिति पर अड़े हुए थे। स्तालिन और जि़नोवियेव ने कामेनेव पर तीखा हमला किया। लेनिन ने कामेनेव को समझाने का प्रयास किया। लेकिन अन्तत: वोटिंग हुई और लेनिन का प्रस्ताव भारी बहुमत से विजयी हुआ।

ई.एच. कार का कहना है कि इन सम्मेलनों में सोवियतों को सत्ता देने के प्रश्न पर तो भारी बहुमत लेनिन के पक्ष में था, मगर समाजवादी क्रान्ति की मंजि़ल के आने के प्रश्न पर वह उतना स्पष्ट नहीं था। समाजवादी क्रान्ति की मंजि़ल के प्रश्न पर 71 वोट पक्ष में पड़े, 38 विरोध में और 8 प्रतिनिधियों ने वोट नहीं डाला। कई लोगों का यह मानना था कि सर्वहारा वर्ग सत्ता को अपने हाथों में लेकर बुर्जुआ क्रान्ति को मुक़ाम तक पहुँचा सकता है लेकिन रूस ”युद्ध द्वारा पैदा हुई स्थितियों में सर्वहारा क्रान्ति की पहली मंजि़ल में है” और इसकी विजय इस बात पर निर्भर करती है कि यूरोप के कई देशों का सर्वहारा वर्ग अपने-अपने पूँजीपति वर्ग के विरुद्ध उठ खड़ा होता है या नहीं। यह बात सही है कि सम्मेलन में समाजवादी क्रान्ति को लेकर अभी कई दुविधाएँ और भ्रम थे। अभी लोग लेनिन की पूरी थीसीज़ को भी पूरी तरह समझ नहीं पाये थे जिसमें उन्होंने विशिष्ट सन्धि-बिन्दु के उपस्थि‍त होने के कारण रूस में सर्वहारा समाजवादी क्रान्ति की स्थिति पैदा होने और इस क्रान्ति के बाद तत्काल ‘समाजवाद ला देने’ की बजाय ‘समाजवाद की ओर पहले क़दम बढ़ाने’ की बात कही थी।

लेकिन कार स्वयं लेनिन की पूरी थीसीज़ को नहीं समझ पाये हैं। वे कहते हैं कि एक ओर सोवियतों को सत्ता देने का नारा देना और दूसरी ओर संविधान सभा बुलाने का नारा देना एक अन्तरविरोधी बात थी। मसला यह था कि रूस में समाजवादी क्रान्ति करना इसलिए अनिवार्य हो गया था क्योंकि उसके बिना जनवादी क्रान्ति भी बाधित हो जाती और अपूर्ण रह जाती। संविधान सभा का मसला कोई विचारधारा का मसला नहीं था। यही कारण था कि क्रान्ति के तत्काल बाद भी संविधान सभा भंग नहीं की गयी। वह तब भंग की गयी जब वह सर्वहारा अधिनायकत्व के बुर्जुआ व निम्न-बुर्जुआ विरोध का मंच बन गयी। लेनिन ने बाद में स्पष्ट किया कि सोवियत सत्ता क़ायम होने के बाद संविधान सभा में बोल्शेविकों द्वारा हिस्सेदारी और संविधान सभा का क्रान्तिकारी सत्ता के विरोध में वोट करना बहुत फ़ायदेमन्द रहा क्योंकि इसके ज़रिये जनता के समक्ष बुर्जुआ जनवादी संस्थाओं का बचा-खुचा विभ्रम भी टूट गया। यह विभ्रम केवल बोल्शेविक प्रचारकों के भाषणों और लेखों से नहीं दूर हा सकता था। यह समझने के लिए कि सोवियत सत्ता किसी भी बुर्जुआ जनवादी सत्ता से कहीं ज़्यादा जनवादी है, क्रान्तिकारी व्यवहार की आवश्यकता थी। इसीलिए, संविधान सभा को सोवियत सत्ता स्थापित होते ही भंग करने की बजाय लेनिन ने उदाहरण और व्यवहार से जनसमुदायों को शिक्षित करने का रास्ता अख्तियार किया। कार रणनीति और आम रणकौशल के मसले को विचारधारा का मसला बना देते हैं और इसलिए उन्हें अन्तरविरोध नज़र आता है।

इस सम्मेलन ने नयी केन्द्रीय कमेटी का चुनाव किया जिसमें लेनिन, जि़नोवियेव, स्तालिन, कामेनेव, मिल्युतिन, नोगिन, स्वेर्दलोव, स्मिल्गा, फे़देरोव थे।

ई.एच. कार मानते हैं कि लेनिन का रुख़ सोवियतों के प्रति 1905 की असफल क्रान्ति के तत्काल बाद संशय का था, लेकिन 1906 में वह बदला और लेनिन सोवियतों को क्रान्तिकारी सत्ता का निकाय मानने लगे। कार लेनिन का यह उद्धरण पेश करते हैं, ”ये निकाय पूरी तरह से जनता के क्रान्तिकारी संस्तर द्वारा स्थापित किये गये थे, वे सभी क़ानूनों और विनियमनों के दायरे के बाहर पूरी तरह से क्रान्तिकारी तरीक़े से आदिम जन रचनात्मकता के रूप में, जनता के स्वतन्त्र कार्रवाई के प्रदर्शन के रूप में स्थापित किये गये थे।” (कार, 1950, वही, पृ. 84) कार का मानना है कि लेनिन बाद में सोवियतों को क्रान्तिकारी सत्ता के निकाय के रूप में स्वीकारने लगे क्योंकि जनवादी क्रान्ति और मज़दूरों व किसानों की जनवादी तानाशाही की लेनिन के फ्रे़मवर्क में सोवियतें बिल्कुल सटीक फिट बैठती थीं। फिर कार कहते हैं कि जनवरी 1917 में भी लेनिन पहले सोवियतों की भूमिका को लेकर सशंकित थे और केवल बाद में, जब सोवियतें 1917 के बसन्त तक क्रान्तिकारी सत्ता का सबसे अहम मंच बन गयीं तब, लेनिन ने उन्हें क्रान्तिकारी सत्ता के निकाय की मान्यता दी। कार के अनुसार लेनिन द्वारा शुरुआत में सोवियतों को मान्यता न देने का एक कारण यह भी था कि वे एक ग़ैर-पार्टी निकाय थीं और साथ ही उससे भी बुरी बात यह थी कि उन पर मेंशेविकों का नियन्त्रण था। कार सोवियतों के प्रति लेनिन के सशंकित रहने की तुलना मार्क्स के शुरुआत में पेरिस कम्यून के प्रति संशय से करते हैं। कार की सोवियतों के प्रति लेनिन के दृष्टिकोण के प्रति यह अवस्थिति सन्तुलित नहीं लगती है।

पहली बात तो यह कि स्वयं कार बताते हैं कि लुनाचार्स्की के अनुसार लेनिन ने 1905 के अन्त में ही पेत्रोग्राद सोवियत में पेरिस कम्यून जैसी राज्यसत्ता के भ्रूण को देखा था। साथ ही, जुलाई 1905 के प्रोलेतारी में बिना लेखक के नाम के एक लेख छपा था जिसमें यह तुलना की गयी थी। ज्ञात हो कि प्रोलेतारी अप्रैल 1905 में बोल्शेविक धड़े द्वारा निकाला जाने वाला अख़बार था जिसके मुख्य सम्पादक लेनिन थे और सम्पादक मण्डल में लुनाचार्स्की भी थे। इस पृष्ठभूमि के बावजूद कार इस बात पर शक करते हैं कि लेनिन ने 1905 में सोवियतों में नयी क्रान्तिकारी सत्ता के निकाय को देखा था। इस संशय का कोई कारण नहीं समझ आता। दूसरी बात यह है कि 1917 की शुरुआत में लेनिन अगर सोवियतों को लेकर इसलिए संशयग्रस्त थे क्योंकि वे ग़ैर-पार्टी निकाय थीं और उन पर मेंशेविकों का प्रभुत्व था तो फिर सिर्फ़ इस वजह से 1917 के बसन्त में लेनिन का संशय दूर हो जाना कि सोवियतें क्रान्तिकारी सत्ता का केन्द्र बन गयी थीं, तर्कसंगत बात नहीं लगती है क्योंकि तब भी सोवियतों में मेंशेविक व समाजवादी-क्रान्तिकारी ही बहुमत में थे। 1905 के नवम्बर में ही लेनिन ने ‘मज़दूर प्रतिनिधियों की सोवियत और हमारे कार्यभार’ में इस तर्क का विरोध किया था कि सोवियतों को पार्टी निकाय बन जाना चाहिए और पार्टी के नेतृत्व और सोवियतों के बीच ‘बराबर’ का चिन्ह रखने का विरोध किया था। इसी लेख में उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि सोवियत को अपने आप को क्रान्तिकारी आरज़ी सरकार का केन्द्र घोषित कर देना चाहिए। (देखें, वी. आई. लेनिन, 1972, ‘कलेक्टेड वर्क्स’, खण्ड-10, प्रोग्रेस पब्लिशर्स, मॉस्को, पृ. 17-28) यह सच है कि लेनिन की सोवियतों के बारे में सोच अभी विकसित होने की प्रक्रिया में थी और ऐसे सन्दर्भ भी मौजूद हैं, जिनमें लेनिन ने सोवियतों को कुछ निश्चित लक्ष्यों की पूर्ति के लिए बनाया गया निकाय क़रार दिया है। लेकिन कार के सामान्यीकरण फिर भी सटीक नहीं हैं।

मूल बात यह है कि लेनिन के लिए सोवियतों की भूमिका का प्रश्न कोई सामान्य रूप में हल प्रश्न नहीं था। सोवियतों की भूमिका क्या होगी यह कई कारकों और पूर्वस्थितियों पर निर्भर करता था। इस प्रश्न पर बेतेलहाइम ने अपेक्षाकृत सही प्रेक्षण रखा है। बेतेलहाइम लिखते हैं, ”सोवियतों के विषय में लेनिन की अवधारणा कभी भी ”‍फे़टिशिस्ट” नहीं थी। 1917 के दौरान जब बोल्शेविक-विरोधी नीति पर अमल करने को तैयार निम्न पूँजीवादी कट्टरपन्थी पार्टियों द्वारा सोवियतों पर प्रभुत्व सुदृढ़ होने का ख़तरा मँडरा रहा था, तो लेनिन ने ”सारी सत्ता सोवियतों को” का नारा वापस ले‍ लिया था – और यह स्पष्ट किया था कि सोवियतें ”प्रतिक्रान्ति को छिपाने का उपकरण मात्र” बन सकती हैं।” (चार्ल्स बेतेलहाइम, 1976, ‘क्लास स्ट्रगल्स इन दि यूएसएसआर, फ़र्स्ट पीरियड : 1917-1923’, हार्वेस्टर प्रेस, ससेक्स, पृ. 105) कारण यह था कि सोवियतें उस समय विशेषकर जुलाई विद्रोह के कुचले जाने के बाद और कोर्निलोव विद्रोह तक निष्क्रिय हो चुकी थीं और बुर्जुआ आरज़ी सरकार की पिछलग्गू बन चुकी थीं।

बहरहाल, अप्रैल थीसीज़ सातवें पार्टी सम्मेलन में बहुमत से पारित हुई। लेनिन ने इसमें और आगे के अपने दो लेखों में स्पष्ट कर दिया था कि क्रान्ति पहले चरण से दूसरे चरण में प्रवेश कर रही है और अब जनवादी क्रान्ति को मुक़ाम तक पहुँचाने के लिए समाजवादी क्रान्ति का प्रश्न इतिहास ने सर्वहारा वर्ग के सामने प्रस्तुत कर दिया है। यदि सर्वहारा वर्ग इस जि़म्मेदारी को नहीं उठाता तो फिर न सिर्फ़ जनवादी क्रान्ति एक थर्मिडोर में समाप्त होगी बल्कि समाजवादी क्रान्ति का सवाल भी लम्बे समय के लिए इतिहास के एजेण्डे पर नहीं आ सकेगा।

अप्रैल के बाद का पूरा घटनाक्रम भी लगातार लेनिन के मूल्यांकनों को सही साबित करता जा रहा था। पहले मिल्यूकोव की सरकार का पतन और संयुक्त आरज़ी सरकार का गठन, युद्ध में पराजयों का लगातार जारी सिलसिला, किसान आन्दोलन का उठता ज्वार और आर्थिक विघटन, अकाल की स्थिति और साथ ही बुर्जुआ वर्ग और टटपुँजिया पार्टियों का नंगा होता चरित्र, जुलाई में मज़दूरों का स्वत:स्फूर्त विद्रोह, उसे कुचला जाना, बोल्शेविक पार्टी का केरेंस्की-नीत सरकार द्वारा दमन, कैडेट पार्टी का सरकार को छोड़ना और नंगी दक्षिणपन्थी प्रतिक्रिया यानी कोर्निलोव के पक्ष में खड़ा होना, पूर्ण रूप से समाजवादी पार्टियों (मेंशेविकों, समाजवादी-क्रान्तिकारी पार्टी, आदि) की संयुक्त सरकार बनना, कोर्निलोव द्वारा तख्तापलट की कोशिश और मज़दूरों द्वारा उसे नाकामयाब किया जाना: ये सारा घटनाक्रम लेनिन के विचारों की पुष्टि कर रहा था। इस पूरे घटनाक्रम की संक्षिप्त चर्चा हम ऊपर कर चुके हैं। इसी बीच एक अन्य राजनीतिक विकास भी हुआ जिसका जि़क्र करके हम आगे बढ़ सकते हैं। मई में त्रात्स्की भी रूस लौट आये थे। वापस आने पर उन्होंने एक अर्द्ध-मेंशेविक ग्रुप मेज़राओन्त्सी में शामिल होने का फ़ैसला किया था। मेज़राओन्त्सी अपने आपको गुट-विरोधी सामाजिक जनवादी समूह क़रार देता था। यह त्रात्स्की के पुराने बर्ताव से भी मेल खाता था जिसमें सांग‍ठनिक प्रश्न पर बोल्शेविकों से अलग खड़े होने के कारण उनकी स्थिति मेंशेविकों के क़रीब बनती थी, जबकि क्रान्ति की मंजि़ल के प्रश्न पर बोल्शेविक पार्टी और मेंशेविकों दोनों से ही अलग समझदारी रखने के कारण वे अपने आपको ”गुटविरोधी गुट” (anti-factionalist faction) के रूप में देखते थे। यद्यपि ज़्यादातार विवादास्पद मसलों में उनकी एकता अक्सर मेंशेविकों के साथ बनती थी। लेकिन यह एकता कभी स्थायी नहीं रहती थी। लिहाज़ा, कहा जा सकता है कि मेजराओन्त्सी वह ग्रुप था जो कि मेंशेविकों से असहमत था और बोल्शेविकों से भी सारे मसलों पर सहमत नहीं था। मई में रूस वापस आने पर त्रात्स्की को लेनिन की समाजवादी क्रान्ति की मंजि़ल आने वाली बात आकृष्ट कर रही थी और लेनिन की इस बात का विरोध करने वाले या इस पर ठोस प्रतिक्रिया न देने वालों की वह आलोचना कर रहे थे। मेज़राओन्त्सी ग्रुप ने मई के बाद से जुलाई तक तमाम सोवियत सम्मेलनों व अन्य जन मंचों पर बोल्शेविकों का समर्थन किया। मई में लेनिन मेज़राओन्त्सी की एक बैठक में गये थे और वहाँ उन्होंने इस समूह को बोल्शेविकों में शामिल होने का मौक़ा दिया था और साथ ही उन्होने यह भी प्रस्ताव रखा था कि कार्यदिशा की एकता की सूरत में उन्हें प्राव्दा के सम्पादक मण्डल में भी जगह दी जायेेगी। त्रात्स्की ने सांग‍ठनिक सिद्धान्तों पर अपने मेंशेविक आग्रहों के कारण ज़ोर दिया कि नयी पार्टी का नया नाम होना चाहिए और उन्होंने बोल्शेविक सांगठनिक उसूलों में भी समझौते की माँग की। लेनिन ने इस माँग को ठुकरा दिया और मई में मेज़राओन्त्सी बोल्शेविक पार्टी में शामिल नहीं हो सका। आगे जुलाई में यह ग्रुप पूरा का पूरा और बिना किसी शर्त बोल्शेविक पार्टी में शामिल हुआ और सभी बोल्शेविक उसूलों पर इसने सहमति जतायी।

1917 की गर्मियों ने लेनिन के सारे पूर्वानुमानों को कमोबेश सही साबित किया। मई में किसान सोवियतों की कांग्रेस हुई जिसमें समाजवादी-क्रान्तिकारी पार्टी हावी थी। इसने आरज़ी सरकार के पक्ष में प्रस्ताव पारित किया। मई के अन्त में पेत्रोग्राद के कारख़ाना मज़दूरों का सम्मेलन हुआ जिसमें बोल्शेविक बहुमत में थे। इसके बाद जून में पहली अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस हुई। इसमें 285 समाजवादी-क्रान्तिकारी, 248 मेंशेविक, 103 बोल्शेविक और 150 स्वतन्त्र प्रतिनिधि थे। त्रात्स्की और लुनाचार्स्की मेज़राओन्त्सी के दस प्रतिनिधियों में से थे और उन्होंने इस कांग्रेस में बोल्शेविकों का समर्थन किया था। सम्मेलन के दूसरे दिन मेंशेविक नेता त्सेरेतली जो कि आरज़ी सरकार में पोस्ट व टेलीग्राफ़ मन्त्री भी था, ने दावा किया कि रूस में अभी कोई एक पार्टी ऐसी नहीं है जो यह दावा कर सके वह सत्ता हाथ में लेकर उसे सँभाल सकती है। लेनिन ने अपनी सीट से कहा, ”ऐसी पार्टी है।” लेनिन अल्पसंख्या में होने के बावजूद अपनी कार्यदिशा के सहीपन को लेकर पूरी तरह आत्मविश्वास से भरे हुए थे। उनका यह आत्मविश्वास आने वाले समय में पूरी तरह सही साबित होने वाला था। इस कांग्रेस में लेनिन का यह हस्तक्षेप एक प्रतीक कथन था जिसमें लेनिन ने यह स्पष्ट रूप से सम्प्रेषित कर दिया था कि बोल्शेविकों की ओर से बुर्जुआ आरज़ी सरकार के विरुद्ध एक राजनीतिक युद्ध का ऐलान कर दिया गया है। बहरहाल, जैसा कि होना था, कांग्रेस ने आरज़ी सरकार को समर्थन देते हुए एक प्रस्ताव पारित किया। इसी कांग्रेस में सोवियत ने तत्काल कार्रवाई हेतु एक कार्यकारी परिषद बनायी जिसका नाम वीटीएसआई (अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस की कार्यकारी परिषद) था। यह दो सोवियत कांग्रेसों के बीच, जो कि हर तीन माह पर होनी थीं, कांग्रेस की शक्तियों से लैस एक कार्यकारी निकाय था। इसमें कुल 250 प्रतिनिधि थे और समानुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर इसमें 35 बोल्शेविक थे।

आरज़ी सरकार की स्वीकार्यता और मान्यता में जारी युद्ध और आर्थिक विघटन के कारण लगातार गिरावट आ रही थी। इसी बीच बोल्शेविकों ने अपनी शक्ति आँकने के लिए और साथ ही जनता के मिजाज़ को मापने के लिए 9 जून को एक प्रदर्शन का एेलान किया था, जो कि 10 जून को होना था। सोवियतों की अखिल रूसी कांग्रेस की आपत्ति पर पार्टी ने इस प्रदर्शन को रद्द कर दिया। यह एक बेहद दिलचस्प प्रकरण था। इस प्रकरण पर अलेक्ज़ैण्डर रैबिनोविच ने विस्तार से लिखा है। रैबिनोविच ने दस्तावेज़ी प्रमाणों के आधार पर दिखलाया है कि युद्ध के विरुद्ध बढ़ते असन्तोष के कारण पेत्रोग्राद ग़ैरीसन में और साथ ही अन्य सैन्य टुकडि़यों में ज़बरदस्त असन्तोष था। बोल्शेविक पार्टी का सैन्य संगठन पेत्रोग्राद में काफ़ी सक्रिय था और उसका सैनिकों में काफ़ी प्रभाव था। इस सैन्य संगठन की जि़म्मेदारी मुख्य तौर पॉड्वॉइस्की और नेव्स्की के हाथों में थी। ये दोनों असाधारण क्षमता वाले संगठनकर्ता थे और पुराने बोल्शेविक थे। सैन्य संगठन ने केन्द्रीय कमेटी को सूचित किया कि सैनिक युद्ध के विरुद्ध एक सशस्त्र प्रदर्शन करना चाहते हैं। पेत्रोग्राद पार्टी कमेटी भी इस प्रदर्शन के समर्थन में थी। केन्द्रीय कमेटी में जि़नोवियेव, कामेनेव व नोगिन इस प्रदर्शन के विरोध में थे क्योंकि उनका यह मूल्यांकन था कि यह प्रदर्शन हिंस्र हो सकता है क्योंकि सैनिक सशस्त्र होंगे। लेकिन केन्द्रीय कमेटी ने प्रदर्शन करने का फ़ैसला किया। इसका एक कारण यह भी था कि इस बात की स्पष्ट रपटें सैन्य संगठन की ओर से आ रही थीं कि यदि बोल्शेविक पार्टी इस प्रदर्शन का नेतृत्व अपने हाथों में नहीं लेती है तो भी सैनिक प्रदर्शन करेंगे और उस सूरत में उसका नेतृत्व पेत्रोग्राद के अराजकतावादी-कम्युनिस्ट संगठन के हाथों में आ जायेेगा जो कि इस प्रदर्शन को अपरिपक्व आम बग़ावत की ओर ले जा सकते हैं। यदि ऐसा होता तो क्रान्ति को भारी नुक़सान पहुँचने की सम्भावना थी। नतीजतन, केन्द्रीय कमेटी ने फ़ैसला किया कि वह इस प्रदर्शन की बागडोर अपने हाथों में सँभालेगी और अधिकतम संख्या में मज़दूरों को इससे जोड़ने का प्रयास करेगी। मज़दूरों को इस प्रदर्शन से जोड़ने के शुरुआती प्रयासों को काफ़ी सफलता भी मिल रही थी। इस प्रश्न पर भी पार्टी में बहस थी कि सैनिकों को बिना शस्त्रों के प्रदर्शन करने के लिए राजी किया जाये। लेकिन सैन्य संगठन का मूल्यांकन था कि यदि पार्टी निर्देश भी दे तो भी सैनिक सशस्त्र प्रदर्शन ही करेंगे। नतीजतन, सशस्त्र प्रदर्शन का फ़ैसला 8 जून की शाम को केन्द्रीय कमेटी, सैन्य संगठन और पेत्रोग्राद पार्टी कमेटी की संयुक्त बैठक में बहुमत से पारित हो गया। इस समय तक जि़नोवियेव भी इस फ़ैसले के पक्ष में आ गये थे। लेनिन शुरू से ही इस फ़ैसले के पक्ष में थे। साथ ही, स्तालिन और स्मिल्गा भी मज़बूती से इस फ़ैसले के पक्ष में थे।

9 जून को पहली बार स्तालिन द्वारा लिखित एक पर्चा प्रदर्शन के लिए आह्वान करते हुए कारख़ानों और बैरकों में बँटना शुरू हुआ। लेकिन इसी बीच अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस के मेंशेविक और समाजवादी-क्रान्तिकारी नेतृत्व ने इस प्रदर्शन पर रोक लगा दी और इसके ख़ि‍लाफ़ एक अपील जारी कर दी। बोल्शेविक पार्टी पहले ही जानती थी कि ऐसा ही होगा। लेकिन जो अप्रत्याशित बात हुई वह यह थी कि अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस में बोल्शेविक प्रतिनिधियों के ग्रुप ने इस फ़ैसले का विरोध किया। इस विरोध का कारण यह था कि इस ग्रुप को प्रदर्शन के फ़ैसले के बारे में सूचित ही नहीं किया गया था। बाद में हुई बहस से ज़ाहिर हुआ कि यह एक तकनीकी ग़लती थी जिसमें संवाद के अभाव और प्रदर्शन की गोपनीयता के कारण इस बात को लेकर अस्पष्टता रह गयी कि इस ग्रुप को कौन सूचित करेगा। जि़नोवियेव के वक्तव्य से पता चलता है कि केन्द्रीय कमेटी यह मानकर चल रही थी कि पेत्रोग्राद पार्टी कमेटी सोवियत कांग्रेस में बोल्शेविक धड़े को सूचित करेगी, जबकि पेत्रोग्राद पार्टी कमेटी को यह बात स्पष्ट ही नहीं थी कि यह काम उसे करना है। जो भी हो, अन्त में बोल्शेविक धड़े ने इसका विरोध किया और कहा कि अगर हम अभी भी प्रदर्शन की योजना को लागू करने का फ़ैसला करते हैं तो हमें सोवियत से बाहर जाना पड़ सकता है। वहीं दूसरी ओर अराजकतावादी-कम्युनिस्टों के ग़ैर-जि़म्मेदाराना प्रचार और साथ ही वाईबोर्ग जि़ला पार्टी कमेटी व कुछ अन्य ”वाम” भटकावग्रस्त बोल्शेविकों के रवैये के कारण यह सम्भावना बन गयी थी कि प्रदर्शन हिंस्र होगा और उसमें सत्ता क़ब्ज़ा करने का प्रयास किया जा सकता है। ऐसे में, 10 जून की भोर में एक आपात बैठक हुई जिसमें केन्द्रीय कमेटी ने प्रदर्शन को रद्द करने का फ़ैसला किया और इस सन्देश को पेत्रोग्राद पार्टी कमेटी और सैन्य संगठन को तत्काल भिजवाया। प्रदर्शन रद्द हो गया। लेकिन इसके बाद इस पूरे घटनाक्रम की समीक्षा के लिए जो बैठक हुई उसमें पेत्रोग्राद पार्टी कमेटी के बहुमत ने और साथ ही सैन्य संगठन के कई कॉमरेडों ने केन्द्रीय कमेटी के ग़ैर-जि़म्मेदाराना रवैये की आलोचना की और कहा कि इससे सैनिकों और मज़दूरों के बीच बोल्शेविक पार्टी की मान्यता पर नकारात्मक असर पड़ेगा। जि़नोवियेव को ख़ास तौर पर आलोचना का निशाना बनाया गया जिन्होंने इस फ़ैसले के लिये जाने की प्रक्रिया में कई बार अपना वोट बदला था। आख़िरी वोटिंग जिसमें कि इस फ़ैसले को रद्द किया था, उसमें लेनिन ने वोट नहीं डाला था। लेकिन उनकी राय भी अब प्रदर्शन को फि़लहाल रद्द करने पर बन रही थी। सितम्बर में लेनिन ने अपने एक लेख में स्पष्ट किया था कि जुलाई में आम बग़ावत के लिए न तो पार्टी तैयार थी और न ही समूचा मज़दूर वर्ग; ज़ाहिर है, जैसे-जैसे यह स्पष्ट होता गया कि यह प्रदर्शन सत्ता पर क़ब्ज़ा करने के अपरिपक्व प्रयास में तब्दील हो सकता है, वैसे-वैसे लेनिन इसके प्रति संशयग्रस्त होते गये। पेत्रोग्राद पार्टी कमेटी के कई बोल्शेविकों ने केन्द्रीय कमेटी की सोवियत में बोल्शेविक प्रतिनिधियों के धड़े के दबाव में आने के लिए भी आलोचना की।

लेनिन ने बैठक में माना कि पेत्रोग्राद पार्टी कमेटी व अन्य कॉमरेडों को केन्द्रीय कमेटी की आलोचना करने का पूरा अधिकार है लेकिन इस मसले में आख़िरी वक़्त पर फ़ैसला लिया जाना अनिवार्य हो गया था। लेनिन ने कहा कि अभी हम इस बात को लेकर सुनिश्चित नहीं हो सकते कि इस प्रदर्शन के बाद सोवियत से बाहर जाने का आगामी योजना पर क्या असर पड़ सकता था। साथ ही, प्रदर्शन के हिंस्र रुख़ लेने की सम्भावना बढ़ती जा रही थी। रैबिनोविच मानते हैं कि इस प्रकरण ने दिखलाया कि बोल्शेविक पार्टी कोई लेनिनवादी सांगठनिक उसूलों पर कसी ”एकाश्मी” पार्टी नहीं थी जो कि आँख मूँदकर लेनिन के निर्देशों पर चलती थी। आगे रैबिनोविच ”विभाजित पार्टी” (divided party) की अपनी अवधारणा पेश करते हुए कहते हैं कि बोल्शेविक पार्टी का एक ”विभाजित पार्टी” होना एक सकारात्मक था और इसी सकारात्मक ने पार्टी को सत्ता तक पहुँचाया और उस पर बने रहने के क़ाबिल बनाया। बाद में, बोल्शेविक पार्टी को (लेनिन के ही दौर में, मगर, विशेषकर स्तालिन के दौर में) एक प्रश्नेतर प्राधिकार से सम्पन्न एकाश्मी पार्टी बना दिया गया जो कि उसकी भावी कमज़ोरी साबित हुई।

रैबिनोविच का यह पूरा सिद्धान्त कई स्तरों पर ग़लत है। पहली बात तो यह है कि लेनिनवादी पार्टी की अवधारणा कोई एकाश्मी पार्टी की अवधारणा नहीं है। यह जनवादी केन्द्रीयता के उसूलों को मानती है जिसके अनुसार फ़ैसला लिये जाने से पहले पूर्ण जनवाद और फ़ैसला लिये जाने के बाद पूर्ण अनुशासन, अल्पमत के बहुमत के मातहत होने, दो पार्टी कांग्रेसों के बीच केन्द्रीय कमेटी के सर्वोच्च निकाय होने और नीचे की कमेटियों के ऊपर की कमेटियों के अधीन होने के सिद्धान्त को लागू किया जाता है। लेनिनवादी उसूलों का अर्थ बहस और आलोचना के अधिकार को ख़त्म करना नहीं है। रैबिनोविच पहले लेनिनवादी सिद्धान्तों का एक हास्यास्पद पुतला खड़ा करते हैं और फिर उसे ध्वस्त कर देते हैं। दिक़्क़त बस यह है कि इस पुतले का वास्तविक लेनिनवादी सांगठनिक सिद्धान्तों से कोई लेना-देना नहीं है। इस पूरे प्रकरण में भी मूल बात यह थी कि असहमतियों और आपसी अन्तरविरोध के बावजूद केन्द्रीय कमेटी के फ़ैसले को अन्तत: पेत्रोग्राद पार्टी कमेटी और सैन्य संगठन ने हूबहू लागू किया। इस बात को स्मिल्गा ने, जो कि 10 जून के प्रदर्शन को वापस लिये जाने के सख्त ख़ि‍लाफ़ थे, स्पष्ट रूप में इस प्रकार से अभिव्यक्त किया, ”यह प्रश्न हर मज़दूर और सैनिक के सामने खड़ा है; यह शब्दों नहीं बल्कि कार्रवाई की माँग करता है…क्रोंस्तात में हम सभी के लिए यह बेहद कड़वा और दुखद अनुभव था कि प्रदर्शन को रद्द कर दिया गया था, लेकिन हमें अपनी शक्ति पर गर्व होना चाहिए और इसके प्रति सचेत होना चाहिए, हमें सचेत होना चाहिए कि हमने क्रान्तिकारी अनुशासन की आवश्यकताओं का पालन किया, जो कि क्रोंस्तात स्वत:स्फूर्त तौर पर नहीं कर पाता।” (रैबिनोविच, 1991, वही, में उद्धृत, पृ. 85-86) स्वयं रैबिनोविच ने स्मिल्गा के इस कथन को उद्धृत किया है जिसमें स्मिल्गा ने लेनिनवादी सांगठनिक उसूलों की ताक़त को बयान किया है। बोल्शेविक पार्टी का सांगठनिक उसूल उसकी बहुत बड़ी शक्ति था। इसमें अल्पमत असहमत होने के बावजूद बहुमत की नीतियों पर अमल करता था। जिन बोल्शेविकों से इसमें चूक हुई (मसलन, आम बग़ावत का फ़ैसला लिये जाने के बाद जि़नोवियेव व कामेनेव), उन्हें कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा। पार्टी में सतत् बहस और दो लाइनों के संघर्ष को, संवाद के अभाव में या तकनीकी कमियों के कारण ‘निर्देश की श्रृंखला’ के टूटने को, केन्द्रीय कमेटी व लेनिन से असहमति को रैबिनोविच ‘विभाजित पार्टी’ के अपने सिद्धान्त को सही ठहराने के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। रैबिनोविच यह दावा करते प्रतीत होते हैं कि कई बार लेनिन का अल्पमत में आ जाना, केन्द्रीय कमेटी व अन्य कमेटियों के बीच मतभेद होना, कई बार अलग-अलग कमेटियों का एक ही विषय पर अलग-अलग अवधारणाएँ रखना उनके शोध की खोज है। लेकिन अगर हम रैबिनोविच से काफ़ी पहले लिखी गयी रचनाओं, जैसे कि ई.एच. कार, चार्ल्स बेतेलहाइम (रैबिनोविच की बाद की दो रचनाएँ बेतेलहाइम की पुस्तक के प्रकाशित होने के बाद आयीं) और मॉरिस डॉब द्वारा लिखित इतिहास को देखें, तो हम पाते हैं कि इन इतिहासकारों ने पहले ही दिखलाया है कि पार्टी के भीतर न सिर्फ़ लेनिन के जीवनकाल में बल्कि उसके बाद भी तीखा विचारधारात्मक और राजनीतिक संघर्ष चलता रहा और वह रैबिनोविच के कल्पित ”लेनिनवादी सिद्धान्तों” पर अमल करने वाली पार्टी कभी नहीं थी! रैबिनोविच के इस दावे में कुछ सत्यांश है कि बाद के दौर के सोवियत इतिहासकारों (विशेषकर, संशोधनवाद के दौर के) की रचनाओं में इस तरह की तस्वीर पेश की गयी थी कि पार्टी प्रश्नेतर रूप से लेनिन के प्राधिकार को मानती थी। एक हद तक यह आलोचना ‘बोल्शेविक पार्टी के इतिहास’ पर भी लागू होती है। लेकिन रैबिनोविच इस आंशिक रूप से सही आलोचना के आधार पर लेनिनवादी सांगठनिक उसूलों काे ग़लत रूप से विनियोजन करते हैं और साथ ही समूची बोल्शेविक पार्टी का एक उदार बुर्जुआ विनियोजन करते हैं। हम इस अध्याय के परिशिष्ट में रैबिनोविच की तीनों रचनाओं यानी ‘प्रिल्यूड टू रिवोल्यूशन : दि पेत्रोग्राद बोल्शेविक्स एण्ड दि जुलाई 1917 अपराइजि़ंग’, ‘दि बोल्शेविक्स कम टू पावर’ और ‘बोल्शेविक्स इन पावर’ की विस्तृत आलोचना पेश करेंगे। अभी हमारा मक़सद केवल 10 जून के रद्द किये गये प्रदर्शन के विषय में रैबिनोविच के विश्लेषण की कमियों को इंगित करना था।

10 जून के प्रदर्शन को रद्द करवाने के बाद अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस ने स्वयं ही 18 जून को एक प्रदर्शन का एेलान किया, जिसका मक़सद मेंशेविक नीतियों के अनुरूप आरज़ी सरकार से माँग करना और उसे अर्जी देना मात्र था। साथ ही, मेंशेविक और समाजवादी-क्रान्तिकारी पार्टी का नेतृत्व समझ रहा था कि जनता के बीच भरते गुस्से और असन्तोष को अभिव्यक्ति का मंच मिलना अपरिहार्य है, अन्यथा उनका नेतृत्व ही संकट में आ जायेेगा। लेकिन, जैसा कि हम पहले जि़क्र कर चुके हैं, इस प्रदर्शन में बोल्शेविक पार्टी, उसके नारे और बैनर छा गये। यह मेंशेविकों और समाजवादी-क्रान्तिकारियों की एक निर्णायक हार थी।

इस प्रदर्शन के समय से ही बोल्शेविक सैन्य संगठन के कई लोगों में लगातार तत्काल सशस्त्र विद्रोह करने का माहौल बन रहा था। इसका प्रमाण हमें 16 जून को शुरू हुई अखिल रूसी बोल्शेविक सैन्य संगठन सम्मेलन की कार्रवाइयों में मिलता है। यह सम्मेलन 23 जून को समाप्त हुआ। 18 जून के प्रदर्शन में भागीदारी को ध्यान में रखते हुए सम्मेलन की कार्रवाई को 17 जून को जल्दी स्थगित कर दिया गया था और सम्मेलन दोबारा 18 जून की शाम को प्रदर्शन के समाप्त होने के बाद शुरू हुआ था। इस सम्मेलन में बोल्शेविक सैन्य संगठन के अधिकांश संगठनकर्ता इस बात की वकालत कर रहे थे कि सशस्त्र विद्रोह को ज़्यादा देर तक नहीं टाला जाना चाहिए। 19 जून को केरेंस्की सरकार ने गैलीशिया में नये आक्रमण की शुरुआत की घोषणा की। इसके बाद, सम्मेलन में सैन्य संगठन के अधिकांश संगठनकर्ता और पुख्ता तरीक़े से इस प्रस्ताव के समर्थन में आ गये कि निर्णायक सशस्त्र संघर्ष की तैयारी की जानी चाहिए और आरज़ी सरकार से बलपूर्वक सत्ता अपने हाथों में ले लेनी चाहिए। कई रेजिमेण्टों में पहले से ही ”वामपन्थी” जल्दबाज़ी की कार्यदिशा का प्रभाव मौजूद था। विशेष तौर पर, फ़र्स्ट मशीनगन रेजिमेण्ट और रिज़र्व इनफै़ण्ट्री रेजिमेण्ट में। 17 जून को जि़नोवियेव ने एक ऐसा भाषण दिया जिसका इरादा तो इस अधैर्य की आग को भड़काना नहीं था, लेकिन वस्तुगत तौर पर इस भाषण की ऐसी व्याख्या सम्भव थी कि तत्काल प्रत्यक्ष कार्रवाई की ओर आगे बढ़ना होगा। चूँकि सम्मेलन में तमाम सैनिक प्रतिनिधियों के बीच पहले से ही यह माहौल हावी था, इसलिए इस अधैर्य के माहौल को बल मिला। वहीं 18 जून के प्रदर्शन के बाद सम्मेलन में बोल्शेविकों के लिए समर्थन को लेकर आत्मविश्वास और भी बढ़ गया था और सैनिक प्रतिनिधियों और बोल्शेविक सैनिक संगठनकर्ताओं के बीच भी ”वामपन्थी” कार्यदिशा को लेकर झुकाव और ज़्यादा बढ़ा था। बोल्शेविक सैन्य संगठन के प्रमुख संगठनकर्ता पॉड्वॉइस्की ने इस माहौल के बारे में 18 जून को केन्द्रीय कमेटी के साथ एक अनौ‍पचारिक बैठक में सलाह-मशविरा किया। पॉड्वॉइस्की ने अपने संस्मरण में लिखा है कि लेनिन ने स्पष्ट शब्दों में बताया कि अभी तत्काल सशस्त्र विद्रोह करना सत्ता पर क़ब्ज़ा करने का अपरिपक्व प्रयास होगा और अभी हमें पूरा ज़ोर इस बात पर रखना चाहिए कि अपने सतत् राजनीतिक प्रचार द्वारा पेत्रोग्राद सोवियत और मॉस्को सोवियत में बहुमत हासिल किया जाये और साथ ही अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस में भी बहुमत प्राप्त किया जाये। लेनिन ने यह भी स्पष्ट किया कि वह दौर अब बीत चुका है जिसमें सत्ता का शान्तिपूर्ण तरीक़े से सोवियतों को हस्तान्तरण हो सकता था। अब सत्ता बलपूर्वक ही हासिल करनी होगी। लेकिन आम बग़ावत कोई खेल नहीं है और इसकी तैयारी के लिए सभी पहलुओं पर ध्यान देना होगा।

पॉड्वॉइस्की ने सम्मेलन में लौटकर लेनिन की कार्यदिशा के आधार पर अपना वक्तव्य रखा। उन्होंने सेना के उन हिस्सों में सतत् प्रचार पर बल दिया जिसमें अभी बोल्शेविक समर्थन पर्याप्त नहीं है। साथ ही, सेना के भीतर बिना तालमेल के वैयक्तिक विद्रोह की कार्रवाइयों को रोकने की भी पॉड्वॉइस्की ने अपील की। इसके बाद, बोल्शेविक सैन्य संगठन के दूसरे प्रमुख संगठनकर्ता नेव्स्की ने, जो कि अपने मृदुल व्यवहार और सहज पहुँच रखने के कारण लोकप्रिय थे, बोल्शेविक सैन्य संगठन में पार्टी अनुशासन को बनाये रखने, केन्द्रीय कमेटी के निर्देशों पर सख्ती से अमल करने और अपने संगठन को और ज़्यादा बेहतर बनाने पर बल दिया। अलेक्ज़ैण्डर रैबिनोविच को यह लगता है कि नेव्स्की की अपीलों का ज़्यादा असर नहीं हुआ। उन्हें यह भी लगता है कि स्वयं लेनिन ने जो भाषण आगे इस सम्मेलन में दिया, उसका भी ज़्यादा असर नहीं हुआ और वामपन्थी अधैर्य की लहर मौजूद रही। यह दावा रैबिनोविच इसलिए कर रहे हैं ताकि वे अपनी ”विभाजित पार्टी” की अवधारणा को सिद्ध कर सकें। क्योंकि रैबिनोविच स्वयं मानते हैं कि इस सम्मेलन ने जो प्रस्ताव पारित किये वे मूलत: और मुख्यत: लेनिन द्वारा प्रस्तावित कार्यदिशा का समर्थन करते थे। यह सच है कि इसके बाद भी सम्मेलन में एक वामपन्थी धड़ा बना हुआ था, लेकिन इसके अलावा रैबिनोविच और क्या उम्मीद करते हैं? क्या किसी सम्मेलन द्वारा कोई प्रस्ताव पारित होने का यह अर्थ निकाला जा सकता है कि सम्मेलन में उपस्थित हर व्यक्ति उस प्रस्ताव पर सहमत था? नहीं! निश्चित तौर पर, ऐसे किसी भी राजनीतिक सम्मेलन में पारित प्रस्ताव से असहमत एक विपक्षी धड़ा (संगठित या असंगठित) होगा। लेकिन इससे यह अर्थ निकालना कि यह बोल्शेविक पार्टी के ”विभाजित पार्टी” होने की निशानी है, कहाँ तक सही है?

जैसा कि हमने जि़क्र किया इसी सम्मेलन के दौरान एक और घटना घटी। 19 जून को केरेंस्की द्वारा गैलीशिया आक्रमण के ऐलान की ख़बर पेत्रोग्राद पहुँच चुकी थी। आरज़ी सरकार ने फ़र्स्ट मशीनगन रेजीमेण्ट से 500 मशीनगनों और मोर्चे पर तैनाती के निर्देशों के पालन की माँग की थी। इससे इस रेजीमेण्ट में असन्तोष की एक लहर दौड़ गयी। सैनिक अपने हथियार देने को तैयार नहीं थे क्योंकि केरेंस्की सरकार ने वायदा किया था कि फ़रवरी क्रान्ति के दौरान सशस्त्र हुए बलों का निरस्त्रीकरण नहीं किया जायेेगा। ज़ाहिर है, केरेंस्की अपना वायदा तोड़ रहा था। नतीजतन, रेजीमेण्ट ने एक सशस्त्र प्रदर्शन की तैयारी शुरू कर दी। इस रेजीमेण्ट के बोल्शेविक सैनिकों ने भी इसका साथ दिया क्योंकि इन सैनिकों ने सारे बोल्शेविक नारों को स्वीकार करके अपना लिया था। रेजीमेण्ट ने अन्य सैन्य बलों के पास इस प्रदर्शन में भागीदारी करने के लिए अपील करते हुए प्रतिनिधि भेजने शुरू कर दिये। यह ख़बर पेत्रोग्राद सोवियत की कार्यकारी समिति तक पहुँची और उसने इसके ख़ि‍लाफ़ सन्देश जारी कर दिया। पेत्रोग्राद के बोल्शेविक नेतृत्व ने आगे आकर फ़र्स्ट मशीनगन रेजीमेण्ट को राज़ी किया कि वह अभी सशस्त्र प्रदर्शन न करे। बोल्शेविक जानते थे कि पेत्रोग्राद में जैसे विस्फोटक हालात हैं, उनमें कोई भी सशस्त्र प्रदर्शन पहले सशस्त्र टकराव और फिर सत्ता पर क़ब्ज़ा करने के अपरिपक्व प्रयास में बदल जायेेगा। ऐसे में, या तो यह प्रयास हज़ारों मज़दूरों और सैनिकों के हत्याकाण्ड में समाप्त होगा या फिर यदि सत्ता पर क़ब्ज़ा हो भी गया तो बोल्शेविक उस पर बने रहने में कामयाब नहीं होंगे। बोल्शेविक पार्टी ने बड़ी मुश्किल से सैनिकों को प्रदर्शन न करने पर राज़ी कर लिया।

लेनिन का पूरा ज़ोर इस समय ऐसे सभी प्रयासों को रोकने पर था जो कि तत्काल सशस्त्र विद्रोह की बात कर रहे थे। रैबिनोविच का यह कहना उचित है कि यह महज़ इत्तेफाक नहीं है कि जून के आख़िरी सप्ताह में ही छठीं पार्टी कांग्रेस की घोषणा की गयी क्योंकि इस समय में पार्टी नेतृत्व को वर्तमान स्थिति का एक मूल्यांकन बनाने, पेत्रोग्राद व मॉस्को सोवियतों में बहुमत हासिल करने और किसान जनसमुदायों में अपने समर्थन को पुख्ता करने के लिए ठोस क़दम उठाने की आवश्यकता थी। छठी कांग्रेस के लिए ठीक यही बिन्दु एजेण्डे के लिए प्रस्तावित भी किये गये। कांग्रेस तक बोल्शेविक नेतृत्व ने पेत्रोग्राद में विद्रोह के लिए तैयार होते माहौल को नियन्त्रण में रखने का प्रयास करने का निर्णय किया था। लेनिन 20 जून को अखिल रूसी बोल्शेविक सैन्य संगठन सम्मेलन में गये। वहाँ पर उन्होंने एक लम्बा वक्तव्य रखा जिसमें उन्होंने तत्काल विद्रोह का आह्वान करने वालों की आलोचना की। रैबिनोविच ने कई समकालीन स्रोतों को उद्धृत करते हुए बताया है कि सम्मेलन में कई बोल्शेविक प्रतिनिधि इससे अचम्भे में आ गये थे क्योंकि वे मानकर चल रहे थे कि लेनिन तत्काल आम बग़ावत के आह्वान का समर्थन करेंगे। इसका कारण यह था कि अप्रैल से लेकर जून तक के दौर में पार्टी के भीतर कामेनेव, नोगिन और जि़नोवियेव के ख़ि‍लाफ़ लेनिन यह दलील पेश करते आये थे कि समाजवादी क्रान्ति की मंजि़ल आ चुकी है और बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के ”पूर्ण” होने का इन्तज़ार करने का तर्क एक अनैतिहासिक और अवैज्ञानिक तर्क है। लेकिन लेनिन ने अप्रैल थीसीज़ में भी आम बग़ावत की कोई समय सारणी पेश नहीं की थी। जैसा कि कार का कहना है, लेनिन ने जानबूझकर ऐसा नहीं किया था क्योंकि यह कहना कि अब देश समाजवादी क्रान्ति की मंजि़ल में है और यह कहना कि तत्काल आम बग़ावत कर दी जानी चाहिए, दो अलग चीज़ें हैं। इस भ्रम का एक और कारण यह भी था कि 10 जून के प्रस्तावित सशस्त्र प्रदर्शन का लेनिन ने शुरुआत में समर्थन किया था, जैसा कि हम ऊपर उल्लेख कर चुके हैं। इन सभी कारकों ने बोल्शेविक सैन्य संगठन और आमतौर पर बोल्शेविकों का समर्थन करने वाले सैनिकों में लेनिन के प्रति यह राय बनायी थी कि लेनिन जल्द से जल्द, सम्भव हो तो तत्काल सशस्त्र विद्रोह कर आरज़ी सरकार का तख्ता पलट करने के पक्ष में हैं। लेकिन लेनिन ने सम्मेलन में बोलते हुए तत्काल आम बग़ावत न करने के पक्ष में अपने मज़बूत तर्क रखे। लेनिन का कहना था कि जब तक पेत्रोग्राद और मॉस्को सोवियत में बोल्शेविक बहुमत में नहीं आते हैं तब तक अगर हम आम बग़ावत में कामयाब हो भी गये तो हम सत्ता पर बने नहीं रह पायेंगे। क्योंकि व्यापक टटपुँजिया आबादी और साथ ही मज़दूर और सैनिकों की आबादी का भी एक हिस्सा मेंशेविकों और समाजवादी-क्रान्तिकारियों के पक्ष में खड़ा है। यह सच है कि अप्रैल से लेकर जून तक उनका एक अच्छा-ख़ासा हिस्सा बोल्शेविकों के पक्ष में आया है, लेकिन अभी भी उनका बहुमत या तो हमारे पक्ष में नहीं है या फिर दोलन कर रहा है। ऐसे में, हम तत्काल आम बग़ावत का नारा दें, तो यह एक अपरिपक्व और असमय दिया गया नारा होगा।

लेनिन के वक्तव्य के बाद सम्मेलन में आम राय लेनिन के पक्ष में बन चुकी थी, हालाँकि एक विपक्षी धड़ा मौजूद था जो कि अभी भी वामपन्थी कार्यदिशा पेश कर रहा था। इसी को रैबिनोविच अपनी ”विभाजित पार्टी” की अवधारणा को सिद्ध करने के लिए इस्तेमाल करते हैं, जिसका हम ऊपर खण्डन कर चुके हैं।

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इसके बाद 3 जुलाई का‍ विद्रोह हुआ। जैसा कि हमने बताया है, 19 जून को आरज़ी सरकार ने मित्र देशों के दबाव में गैलीशिया में एक नया हमला शुरू करने का एेलान किया था। इसको लेकर तमाम सैनिक दस्तों में भयंकर असन्तोष था। साथ ही, पेत्रोग्राद और पूरे देश में आर्थिक संकट चरम पर था। खाद्यान्न संकट, ईंधन संकट और महँगाई भयंकर स्तरों पर थे। मज़दूरों के बीच भी इसको लेकर गुस्सा भरा हुआ था। विद्रोह की शुरुआत फ़र्स्ट मशीनगन रेजीमेण्ट में हुई। फ़र्स्ट मशीनगन रेजीमेण्ट के विद्रोही सैनिक कुछ अन्य सैनिक टुकडि़यों के समर्थन के साथ हज़ारों की संख्या में 3 जुलाई की शाम बोल्शेविक मुख्यालय पहुँचे और प्रदर्शन का नेतृत्व करने के लिए बोल्शेविक नेतृत्व का आह्वान करने लगे। पेत्रोग्राद पार्टी कमेटी और सैन्य संगठन के नेताओं ने विचार-विमर्श के बाद यह तय किया कि वे प्रदर्शन का नेतृत्व करेंगे। बोल्शेविक नेताओं के सामने यह स्पष्ट था कि यदि वे इसका नेतृत्व नहीं भी करेंगे, तो सैनिक अपना सशस्त्र प्रदर्शन करेंगे और उस सूरत में पार्टी का प्राधिकार भी उनके बीच कम होगा। बेहतर विकल्प यह है कि पार्टी प्रदर्शन का नेतृत्व अपने हाथों में ले और उसे अधिक से अधिक शान्तिपूर्ण रखने का प्रयास करे। कारण यह था कि पार्टी को अभी भी प्रान्तों में किसानों के समर्थन की कमी और मज़दूरों व सैनिकों के एक हिस्से में मेंशेविकों व समाजवादी-क्रान्तिकारियों के प्रति समर्थन का अहसास था। कई सैन्य टुकडि़याँ भी अभी या तो तटस्थ थीं या फिर आरज़ी सरकार के पक्ष में थीं। ऐसे में, यदि पार्टी एक ऐसे सशस्त्र प्रदर्शन को शामिल हो कर नियन्त्रित न करती, तो यह एक अपरिपक्व आम बग़ावत का रूप ले सकता था। इसमें हार क्रान्ति को काफ़ी पीछे धकेल देती। ऐसे में, कामेनेव ने सोवियत की कार्यकारी समिति की बैठक में 3 जुलाई को ही स्पष्ट किया कि बोल्शेविकों ने इस प्रदर्शन का आह्वान नहीं किया था; लेकिन अब जबकि सैनिक और मज़दूर सड़कों पर हैं तो उन्हें उनके बीच में होना चाहिए और प्रदर्शन को हिंस्र होने से रोकना चाहिए। जि़नोवियेव और त्रात्स्की ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया।

अलेक्ज़ैण्डर रैबिनोविच जिन्हें कि रूसी क्रान्ति के सबसे क़ाबिल इतिहासकारों में से माना जाता है, इस बैठक के बारे में बुरी तरह से भ्रमित हैं। वे लिखते हैं कि 3 जुलाई को केन्द्रीय कमेटी की बैठक में कामेनेव ने यह प्रस्ताव रखा था और जि़नोवियेव और त्रात्स्की ने उसका समर्थन किया था। लेकिन 3 जुलाई को तो त्रात्स्की बोल्शेविक पार्टी की केन्द्रीय कमेटी में थे ही नहीं। त्रात्स्की छठीं पार्टी कांग्रेस में केन्द्रीय कमेटी में चुने गये थे और 3 जुलाई के विद्रोह के समय ही वे अपने ग्रुप मेज़राओन्त्सी के साथ बोल्शेविक पार्टी में शामिल हुए थे। लेकिन केन्द्रीय कमेटी में उनका चुनाव छठी पार्टी कांग्रेस में हुआ था। 3 जुलाई को किसी केन्द्रीय कमेटी बैठक में त्रात्स्की के होने का ई.एच. कार या मॉरिस डॉब या बेतेलहाइम भी कोई जि़क्र नहीं करते। वास्तव में, स्वयं त्रात्स्की ने अपने ‘रूसी क्रान्ति का इतिहास’ में ऐसी किसी बैठक का जि़क्र नहीं किया है। उन्होंने भी सोवियत की कार्यकारी समिति की बैठक में कामेनेव के प्रस्ताव का अपने द्वारा समर्थन का जि़क्र किया है। स्पष्टत: ऐसा लगता है कि रैबिनोविच यहाँ तथ्यों में गड़बड़ कर गये हैं (अलेक्ज़ैण्डर रैबिनोविच, 1976, ‘दि बोल्शेविक्स कम टू पावर’, डब्ल्यू. डब्ल्यू. नॉर्टन एण्ड कं., न्यूयॉर्क, पृ.12)। सम्भवत: त्रात्स्की की भूमिका को अतिरंजित करने के प्रयास में ऐसा हो गया हो।

बहरहाल, 4 जुलाई को लेनिन भी बोल्शेविक मुख्यालय पहुँच चुके थे और वहाँ उन्होंने क़रीब दस हज़ार सैनिकों और मज़दूरों की भीड़ को सम्बोधित किया। इस भाषण में लेनिन ने स्पष्ट किया कि इस समय संयम और धैर्य की सख्त ज़रूरत है। अभी बोल्शेविक सोवियतों में बहुमत में नहीं हैं। सोवियतें सत्ता लेने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में, हम ज़बरन सत्ता छीनकर सोवियतों को नहीं दे सकते हैं। पहले सोवियतों में बहुमत अर्जित करना होगा। उससे पहले हमें किसी भी ऐसे प्रदर्शन को शान्तिपूर्ण बनाये रखना होगा। लेनिन समझ रहे थे कि अभी सारी सैन्य टुकडि़यों में भी आरज़ी सरकार के ख़ि‍लाफ़ विद्रोह का माहौल नहीं है। मोर्चे पर कई ऐसी टुकडि़याँ थीं जिनमें मेंशेविक या समाजवादी-क्रान्तिकारी नेतृत्व में थे। ऐसे में, उन्हें पेत्रोग्राद में किसी भी अपरिपक्व विद्रोह को कुचलने के लिए बुलाया जा सकता है। ऐसा हुआ भी। 4 जुलाई की शाम को यह ख़बर मिली कि अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस ने आरज़ी सरकार के साथ अपनी पक्षधरता जताई और मोर्चे से उन टुकडि़यों को पेत्रोग्राद बुलाने की तैयारी शुरू कर दी। साथ ही, आरज़ी सरकार के ख़ुफि़या विभाग ने लेनिन के ख़ि‍लाफ़ जर्मन एजेण्ट होने का पूरा मामला तैयार किया और झूठे प्रमाणों को कई ग़ैरीसनों में फैलाया। इस प्रक्रिया में जो तटस्थ ग़ैरीसनें थीं वे आरज़ी सरकार के पक्ष में खड़ी हो गयीं। लेनिन और बोल्शेविक नेतृत्व समझ रहा था कि अगर स्थिति हाथ से निकली तो पेत्रोग्राद में सैनिक और मज़दूर ही एक दूसरे का ख़ून बहायेंगे। नतीजतन, 5 जुलाई को प्राव्दा ने अपने पिछले पृष्ठ पर घोषणा छापी कि प्रदर्शन वापस ले लिया गया है। जिन जगहों पर प्रदर्शन हुए उन्हें आरज़ी सरकार के प्रति वफ़ादार सैन्य टुकडि़यों ने कुचल दिया।

लेकिन इसके बाद भी छिटपुट टकराव व प्रदर्शन की घटनाएँ अगले 2 दिनों तक जारी रहीं। बोल्शेविकों ने प्रदर्शन को नियन्त्रित किया और उसे भरसक शान्तिपूर्ण बनाये रखने का प्रयास किया। इसका प्रमुख कारण यही था कि अभी बोल्शेविक पार्टी प्रमुख सोवियतों यानी पेत्रोग्राद सोवियत और मॉस्को सोवियत में बहुमत में नहीं थी और न ही वह कई अन्य निकायों में अपने प्रभाव को निर्णायक रूप से स्थापित कर पायी थी। साथ ही, किसानों का समर्थन भी बोल्शेविक अभी पूरी तरह से नहीं जीत पाये थे। यही कारण था कि लेनिन का मानना था कि आम बग़ावत का वक़्त अभी नहीं आया है। लेनिन ने कहा कि अभी सत्ता पर क़ब्ज़ा करना और उस पर क़ायम रह पाना सम्भव नहीं है क्योंकि बहुसंख्यक आबादी अभी भी ”समाजवादी-क्रान्तिकारियों और मेंशेविकों द्वारा नियन्त्रित निम्न पूँजीवादी नीतियों में यक़ीन करती है।” जुलाई का स्वत:स्फूर्त उभार आरज़ी सरकार के बर्बर दमन द्वारा कुचल दिया गया। लेकिन अब स्वयं बुर्जुआ वर्ग डर गया था और उसने बोल्शेविक पार्टी के दमन की शुरुआत की।

लेनिन और जि़नोवियेव भूमिगत हो गये और कामेनेव व कोलोन्ताई को गिरफ़्तार कर लिया गया। त्रात्स्की भी गिरफ़्तार हो गये। प्राव्दा का दमन कर दिया गया। बोल्शेविकों के ख़ि‍लाफ़ हर जगह छापे, गिरफ़्तारियाँ आदि शुरू हो गयीं। जुलाई भर बोल्शेविकों के ख़ि‍लाफ़ प्रचार का कुछ असर मज़दूरों और सैनिकों के भी कुछ हिस्सों पर हुआ। इसमें बोल्शेविकों और विशेषकर लेनिन के जर्मन एजेण्ट होने का कुत्सा-प्रचार प्रमुख था। इसके आधार पर जो माहौल पैदा हुआ, उसका लाभ उठाते हुए पूरे पेत्रोग्राद में बोल्शेविकों पर सड़कों पर हमले हुए, कई बोल्शेविकों की हत्या भी की गयी। तमाम बोल्शेविक नेताओं को गिरफ़्तार कर लिया गया। यह बोल्शेविक पार्टी के सांगठनिक ढाँचे की ताक़त थी कि वह हर प्रकार के दमन को झेलकर भी अपने गोपनीय संगठन को क़ायम रखती थी और फिर से उबरने की शक्ति रखती थी। जल्द ही स्पष्ट हो गया कि इस प्रकार के दमन से बोल्शेविकों की राजनीतिक व सांगठनिक शक्तियों को नष्ट नहीं किया जा सकता है।

धीरे-धीरे बोल्शेविक-विरोधी कुत्सा-प्रचार का असर जनता के बीच कम होने लगा। इसमें बोल्शेविकों के सतत प्रचार की भी एक भूमिका थी। दूसरी ओर, गैलीशियाई आक्रमण के बुरी तरह असफल होने की ख़बरें जैसे-जैसे पहुँच रही थीं, वैसे-वैसे पेत्रोग्राद में बोल्शेविकों के प्रति समर्थन बढ़ता जा रहा था। बोल्शेविकों का दमन पूरे जुलाई और अगस्त जारी रहा। लेकिन इस दमन ने बोल्शेविकों का रुतबा लोगों के बीच में और ज़्यादा बढ़ाया। तमाम क्रान्तिकारी मज़दूर और सैनिक जो अभी भी मेंशेविक प्रभाव में थे, उन्होंने मेंशेविक पार्टी सदस्यता के कार्ड फाड़कर बोल्शेविक पार्टी में शामिल होना शुरू कर दिया। जैसा‍ कि हमने ऊपर जि़क्र किया, गैलीशिया में शुरू किया गया हमला बुरी तरह नाकामयाब हुआ था और बड़ी संख्या में रूसी सैनिक मारे गये या हताहत हुए थे। नतीजतन, प्रधानमन्त्री ल्वोव ने इस्तीफ़ा दे दिया और कैडेट पार्टी सरकार से बाहर हो गयी थी। अब केरेंस्की प्रधानमन्त्री बना और सरकार में समाजवादी-पार्टी और मेंशेविक ही प्रमुख ताक़त रह गये। ऐसी सरकार द्वारा बोल्शेविकों के ख़ि‍लाफ़ भयाक्रान्तता में उठाये गये क़दमों और 3 से 5 जुलाई के बीच मज़दूरों और सैनिकों के बर्बर दमन ने पेत्रोग्राद और मॉस्को के मज़दूरों और सैनिकों के बीच मेंशेविकों और समाजवादी-क्रान्तिकारियों को लेकर बचे रहे-सहे भ्रम को भी समाप्त कर दिया था। त्रात्स्की की गिरफ़्तारी के ठीक पहले उनकी अगुवाई में मेज़राओन्त्सी ग्रुप बोल्शेविक पार्टी में शामिल हो गया था। यही माहौल था जब 26 जुलाई को पेत्रोग्राद में गुप्त रूप से बोल्शेविक पार्टी की छठीं कांग्रेस का आयोजन हुआ।

लेनिन द्वारा भेजे गये एक पर्चे (‘नारों के बारे में’) में दी गयी कार्यदिशा की रोशनी में बोल्शेविक पार्टी की 1907 की लन्दन की कांग्रेस के बाद पहली कांग्रेस हुई। यह छठीं पार्टी कांग्रेस गुप्त रूप से 26 जुलाई से 3 अगस्त 1917 को हुई। इसमें स्वेर्दलोव ने अध्यक्षता की और स्तालिन व बुखारिन ने प्रमुख रपटें पेश कीं। ई.एच. कार व अलेक्ज़ैण्डर रैबिनोविच के अनुसार त्रात्स्की की गिरफ़्तारी से पूर्व वर्तमान राजनीतिक स्थिति पर प्रमुख रिपोर्ट त्रात्स्की को पेश करनी थी। लेकिन त्रात्स्की की गिरफ़्तारी के बाद कार के अनुसार यह रिपोर्ट बुखारिन ने पेश की और स्तालिन ने एक दूसरी अहम रपट पेश की। रैबिनोविच के अनुसार त्रात्स्की द्वारा पेश की जाने वाली रिपोर्ट को पेश करने के लिए आनन-फ़ानन में स्तालिन को चुना गया, जोकि मौजूदा राजनीतिक स्थिति के विषय पर थी। यहाँ भी इस बयान के स्वर से रैबिनोविच के उदार बुर्जुआ पूर्वाग्रह प्रकट हो जाते हैं। ऐसी ”आनन-फ़ानन” का कोई प्रमाण नहीं मिलता है।

ख़ैर, जुलाई में बुर्जुआ वर्ग द्वारा नग्न रूप में प्रतिक्रान्ति के साथ खड़े होने और साथ ही मेंशेविक व समाजवादी-क्रान्तिकारी नेतृत्व वाली सोवियतों के आरज़ी सरकार के पिछलग्गू बन जाने की स्थिति में कांग्रेस ने ”सारी सत्ता सोवियतों” का नारा वापस ले लिया। यह लेनिन की राय के अनुसार ही किया गया था। यहाँ यह भी स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि सोवियतों को सत्ता देने के नारे को वापस लेने का यह अर्थ नहीं था कि अब पार्टी सोवियत सत्ता की हामी नहीं थी। यह केवल यह दिखला रहा था कि क्रान्ति के शान्तिपूर्ण विकास की सम्भावनाओं का दौर अब बीत चुका है और अब आरज़ी सरकार के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह को पार्टी को संगठित करना होगा। कांग्रेस ने आरज़ी सरकार को उखाड़ फेंकने और मज़दूर सत्ता क़ायम करने का प्रस्ताव पारित किया। नोगिन ने यह प्रश्न उठाया कि पिछले दो महीनों में ऐसा क्या बदला है, कि हम ऐसा निर्णय ले रहे हैं। स्तालिन ने इसका तीखा जवाब देते हुए कहा, ”यह पूछना बेकार का पाण्डित्य-प्रदर्शन होगा कि रूस को अपने समाजवादी रूपान्तरण के लिए तब तक इन्तज़ार करना चाहिए, जब तक कि यूरोप ‘शुरुआत’ नहीं कर देता।” आगे उन्होंने कहा कि, ”इस सम्भावना को ख़ारिज़ नहीं किया गया है कि रूस वह देश हो सकता है, जो समाजवाद की ओर जाने वाले पथ को प्रदर्शित करे।” (कार, 1950, वही, पृ. 92) आगे स्तालिन ने यह कहा कि ”हमें यह घिसा-पिटा विचार छोड़ देना चाहिए कि यूरोप ही हमें रास्ता दिखा सकता है। एक कठमुल्लेपन का मार्क्सवाद होता है और दूसरा रचनात्मक मार्क्सवाद। मैं दूसरे का समर्थक हूं।” (बोल्शेविक पार्टी का इतिहास, 2003, राहुल फ़ाउण्डेशन, लखनऊ में उद्धृत, पृ. 199)

कार स्तालिन के इस कथन को पूरी तरह ग़लत रूप में व्याख्यायित करते हैं और कहते हैं कि त्रात्स्की 1906 में यही बात कह रहे थे। वास्तव में, लेनिन भी इस बात को मानते थे कि समाजवाद की ओर पथ प्रदर्शित करने का काम रूस कर सकता है। लेनिन समेत अधिकांश बोल्शेविक इस बात पर सहमत थे कि रूस में समाजवादी व्यवस्था को टिकाये रखने के लिए दो कारकों की आवश्यकता है: पहला, यूरोप में सर्वहारा क्रान्ति का फूट पड़ना और दूसरा, ग़रीब किसान आबादी का समर्थन। लेकिन त्रात्स्की का मानना था कि किसान आबादी की क्रान्तिकारी सम्भावना पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। मज़दूर वर्ग एकमात्र क्रान्तिकारी वर्ग है। 1906 में त्रात्स्की ने नारा दिया, ”ज़ारशाही नहीं, मज़दूर सरकार”। लेनिन ने इसे वामपन्थी मूर्खता बताया और कहा कि तात्कालिक लक्ष्य मज़दूरों और किसानों की जनवादी तानाशाही होगी और उसके बाद ही सर्वहारा वर्ग ग़रीब किसानों व खेतिहर सर्वहारा को लेकर समाजवादी क्रान्ति की ओर आगे बढ़ सकता है। पहला चरण 1917 की फ़रवरी क्रान्ति में मूलत: और मुख्यत: पूरा हो चुका था क्योंकि राज्यसत्ता का प्रश्न हल हो चुका था और किसानों का विभेदीकरण व खेती में पूँजीवादी विकास भी कई दशकों से जारी थे। इस चरण के पूरा होने के बाद लेनिन समाजवादी क्रान्ति के चरण की बात कर रहे थे। स्तालिन ने छठी पार्टी कांग्रेस में इसी बात को दुहराया था। बोल्शेविक पार्टी के भी कई नेता यह समझ रहे थे कि जब तक जनवादी क्रान्ति पूरी नहीं हो जाती यानी जब तक उसके सभी कार्यभार पूरे नहीं कर लिये जाते तब तक समाजवादी क्रान्ति की बात करना दुस्साहसवाद होगा। लेनिन के सतत संघर्ष से पार्टी इस अवस्थिति पर आ सकी कि रूस में युद्ध और ‘दोहरी सत्ता’ की विशिष्ट स्थिति के चलते अब यह अनिवार्य हो गया है कि सर्वहारा वर्ग समाजवादी क्रान्ति के कार्यभार को हाथों में ले और पूरा करे, अन्यथा जनवादी क्रान्ति भी बाधित हो जायेेगी और अपूर्ण ही रह जायेेगी। लेकिन ई.एच. कार इस पूरे तर्क को नहीं समझ पाते और यहाँ पर उन पर त्रात्स्की का असर स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है।

रैबिनोविच समाजवादी क्रान्ति के कार्यक्रम को अपनाने और यूरोप द्वारा समाजवादी क्रान्ति का इन्तज़ार न करने के स्तालिन के कथन के बारे में कहते हैं कि स्तालिन के प्रस्ताव पर काफ़ी लम्बी बहस चली जिसमें त्रात्स्की के साथ मेज़राओन्त्सी ग्रुप में रह चुके यूरेनोव, पुराने बोल्शेविक वोलोदार्स्की, मानुइल्स्की  ने ”सारी सत्ता सोवियतों को” के नारे को छोड़ने के प्रश्न पर स्तालिन का विरोध किया। बुखारिन ने बीच-बीच की स्थिति अपनायी। सोकोलनिकोव, स्मिल्गा और बुब्नोव जैसे प्रमुख बोल्शेविक नेताओं ने स्तालिन के प्रस्ताव का समर्थन किया। रैबिनोविच अन्त में यह दिखलाने का प्रयास करते हैं कि कांग्रेस ने इस विषय पर जो प्रस्ताव पारित किया वह दोनों धड़ों की अवस्थितियों का मिश्रण है। लेकिन जब वे बताते हैं कि यह मिश्रण क्या है, तो आप पाते हैं कि स्तालिन का प्रस्ताव बेहद छोटे-मोटे मामूली संशोधनों के साथ हूबहू पारित हो गया था। (देखें, रैबिनोविच, 1976, ‘दि बोल्शेविक्स कम टू पावर’, डब्ल्यू. डब्ल्यू. नॉर्टन एण्ड कं., न्यूयॉर्क, पृ. 85-89) उदार बुर्जुआ अकादमिकों की स्तालिन के प्रति एलर्जी को समझना कोई मुश्किल काम नहीं है। रैबिनोविच भी अन्य बुर्जुआ इतिहासकारों की तरह किसी न किसी तरह यह यक़ीन दिलाने का प्रयास करने का अवसर निकाल लेते हैं कि स्तालिन कोई बड़े सिद्धान्तकार नहीं थे, वे पार्टी नेतृत्व में जि़नोवियेव, कामेनेव व त्रात्स्की के जितना क़द भी नहीं रखते थे, वग़ैरह। लेकिन अगर आप स्वयं लेनिन के लेखन को पढ़ें, पार्टी कांग्रेसों और केन्द्रीय कमेटी के कार्यवृत्त पर ग़ौर करें तो आपके सामने दूसरी तस्वीर निकलकर आती है।

बहरहाल, छठीं कांग्रेस में और कई अहम फ़ैसले हुए। मसलन, पार्टी ने पहली बार औपचारिक तौर पर जनवादी केन्द्रीयता के उसूलों को अपनी नियमावली में बाध्यताकारी नियम के रूप में शामिल किया। यह सच है कि इस सिद्धान्त पर बोल्शेविक पिछले एक दशक से भी ज़्यादा समय से अमल कर रहे थे। लेकिन इसे पार्टी कार्यक्रम में औपचारिक तौर पर अभी तक शामिल नहीं किया था। इसके अनुसार, निर्णय लिये जाने से पहले पूर्ण जनवाद और निर्णय लिये जाने के बाद पूर्ण अनुशासन होगा, दो कांग्रेसों के बीच केन्द्रीय कमेटी सर्वोच्च निकाय होगी, अल्पमत बहुमत के मातहत होगा, सभी कमेटियाँ केन्द्रीय कमेटी के मातहत होंगी और नीचे की कमेटियाँ ऊपर की कमेटियों के मातहत होंगी। नियमावली में यह संशोधन पार्टी इतिहास में एक अहम मील का पत्थर था।

कांग्रेस में एक और अहम बहस हुई। कांग्रेस से पहले ही त्रात्स्की, नोगिन, लूनाचार्स्की और कामेनेव का मानना था कि लेनिन को, जो कि इस समय भूमिगत थे, अपने आपको क़ानून के हवाले कर देना चाहिए। लेकिन स्तालिन, जि़नोवियेव व अन्य बोल्शेविक नेताओं का मानना था कि यह लेनिन की जान लेने के लिए बिछाया गया जाल है। छठीं कांग्रेस में भी इस बात को लेकर बहस उठी कि लेनिन को आत्मसमर्पण करना चाहिए या नहीं। कांग्रेस ने फ़ैसला किया कि किसी भी क़ीमत पर लेनिन की जान को ख़तरे में नहीं डाला जाना चाहिए। जिन मेंशेविक नेताओं ने लेनिन की सुरक्षा की गारण्टी की बात की है, उन्हीं ने जुलाई में बोल्शेविक पार्टी के दमन में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी। ऐसे में, ऐसी किसी गारण्टी पर भरोसा करने की आवश्यकता नहीं है। वास्तव में, त्रात्स्की मेंशेविकों पर पर्याप्त सन्देह न करने के कारण ही गिरफ़्तार हुए थे। उन्होंने मेंशेविक नेता व मन्त्री को ही बता दिया था कि वे लारिन के घर पर हैं। लारिन के घर से ही उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया था।

अगस्त माह में कई ऐसी महत्वपूर्ण घटनाएँ हुईं जिन्होंने लेनिन की मूल्यांकनों को सटीकता से सही ठहराया और साथ ही लेनिन को सितम्बर के दूसरे सप्ताह में इस नतीजे पर पहुँचाने में भी भूमिका निभायी कि अब सशस्त्र बग़ावत (armed insurrection) का समय आ गया है। केरेंस्की ने अगस्त के शुरुआत में एक राज्य समिति की बैठक बुलायी। इस बैठक में बुर्जुआ वर्ग, भूस्वामी वर्ग के प्रतिनिधि, मन्त्री और सेना के अधिकारी बैठे। यह बैठक क्रान्ति के बढ़ते ज्वार पर क़ाबू पाने की रणनीति पर विचार-विमर्श के लिए बुलायी गयी थी। बोल्शेविकों ने इसके विरोध में प्रदर्शन का आह्वान किया। यह बैठक असफलता में समाप्त हुई क्योंकि शासक वर्ग तेज़ी से प्रतिक्रिया के पक्ष में जा रहा था। इसी समय कोर्निलोव मृत्युदण्ड को पुनर्स्थापित करने और सोवियतों, भूमि समितियों व कारख़ाना समितियों को बर्बरता से कुचल देने की वकालत कर रहा था। शासक वर्ग को क्रान्तिकारी आन्दोलन के विरुद्ध इसी प्रकार की प्रतिक्रियावादी निर्णायकता की ज़रूरत थी। बुर्जुआ वर्ग और भूस्वामी वर्ग तेज़ी से कोर्निलोव के पक्ष में चला गया। केरेंस्की शुरू में कोर्निलोव से समझौते कर रहा था लेकिन किसी भी प्रकार के सैन्य तख्तापलट को लेकर वह आत्मविश्वस्त नहीं था। नतीजतन, उसने कोर्निलोव के तख्तापलट के प्रयास से ख़ुद को अलग कर लिया। कोर्निलोव के विद्रोह का प्रयास शुरू होने से पहले ही विशेष तौर पर बोल्शेविकों के नेतृत्व में और आमतौर पर सभी सामाजिक-जनवादियों के नेतृत्व में, मज़दूरों और सैनिकों के प्रयासों से कुचल दिया गया। इसका विस्तृत ब्यौरा हम ऊपर पेश कर चुके हैं। इसके बाद क्रान्ति और प्रतिक्रान्ति की सापेक्षिक ताक़त की एक तस्वीर जनता के सामने भी उपस्थित हो गयी थी और अगुवा मज़दूरों व सैनिक भी इस बात को समझने लगे थे कि अगर वे समाजवादी क्रान्ति की तरफ़़ आगे नहीं जाते हैं, तो प्रतिक्रान्ति की ताक़तें फिर से एकजुट होकर प्रयास करेंगी और जारी क्रान्ति को कुचल डालेंगी।

इसी बीच मेंशेविकों और समाजवादी-क्रान्तिकारियों ने मज़दूरों, सैनिकों और किसानों के क्रान्तिकारी मिजाज़ को सहयोजित करने के लिए एक जनवादी राज्य सम्मेलन बुलाया और उसमें ”गणराज्य की परिषद” का चुनाव किया। इस परिषद को ”संसद पूर्व निकाय” (प्रेद पार्लियामेण्ट या pre-parliament) की भूमिका अदा करनी थी, जब तक कि संविधान सभा नहीं बुला ली जाती है। ज़ाहिर है, यह मेहनतकश जनसमुदायों की क्रान्तिकारी चेतना और पहलक़दमी को कुन्द करने के लिए उठाया गया क़दम था और इसका मक़सद था क्रान्ति को बुर्जुआ वैधानिकता के दायरे से बाहर न जाने देना। बोल्शेविक पार्टी की केन्द्रीय कमेटी ने अन्तत: इस फ़र्ज़ीवाड़े का बहिष्कार करने का निर्णय किया। लेकिन पार्टी के भीतर ही कामेनेव व तियोदोरोविच जैसे लोग प्रेद पार्लियामेण्ट में भाग लेने के हामी थे। कामेनेव शुरू से ही सशस्त्र विद्रोह का विरोध कर रहे थे और प्रेद पार्लियामेण्ट में हिस्सा लेने की दलील वे इसीलिए दे रहे थे ताकि सशस्त्र विद्रोह का कार्यक्रम टाला जा सके। लेकिन लेनिन इसका निरन्तरता से विरोध कर रहे थे। स्तालिन ने भी अखिल रूसी जनवादी सम्मेलन के बोल्शेविक धड़े की बैठक में इसका पुरज़ोर विरोध किया। त्रात्स्की ने भी प्रेद पार्लियामेण्ट के बहिष्कार का नारा दिया, जिसके लिए लेनिन ने उनकी प्रशंसा की। प्रेद पार्लियामेण्ट में भाग लेना लोगों में झूठी आशा पैदा कर सकता था और क्रान्ति के ज्वार पर नकारात्मक असर डाल सकता था। प्रेद पार्लियामेण्ट के नाटक से अलग बोल्शेविकों ने सोवियतों की दूसरी अखिल रूसी कांग्रेस बुलाने का आह्वान किया। तय था कि इस कांग्रेस में बोल्शेविकों को बहुमत मिलेगा, जैसा कि अगस्त के आख़िरी सप्ताह के घटनाक्रम से तय हो गया था। बोल्शेविकों ने पेत्रोग्राद और मॉस्को सोवियतों में बहुमत जीत लिया था। किसान सोवियतों में और वीटीएसआईके में अभी भी बोल्शेविक अल्पमत में थे, लेकिन सितम्बर से भूमि क़ब्ज़ा आन्दोलन ने जैसा आक्रामक रूप धारण किया उससे तय हो गया था किसानों की आबादी का समर्थन उसी राजनीतिक शक्ति को मिलेगा जो कि भूमि क़ब्ज़ों का बिना शर्त समर्थन करेगी। और बोल्शेविक पार्टी शुरू से ऐसी एकमात्र पार्टी थी।

इस बीच समाजवादी-क्रान्तिकारी पार्टी में भी फूट पड़ गयी और वामपन्थी समाजवादी-क्रान्तिकारी धड़ा, जो कि बहुमत था, अलग हो गया और बोल्शेविकों के पक्ष में आ गया। इसके साथ, लेनिन की मज़दूर-किसान संश्रय के ज़रिये समाजवादी क्रान्ति को सम्पन्न करने की अवधारणा का एक अधूरा हिस्सा भी पूरा हो गया। समाजवादी-क्रान्तिकारियों में फूट के बारे में मॉरिस डॉब ने सही टिप्पणी की है, ”जैसा कि कृषि-प्रधान देशों में किसान पार्टियों के साथ अक्सर होता है, दक्षिणपन्थी धड़े में अपनी नीतियों को ज़्यादा समृद्ध किसानों के हितों के अनुसार अनुकूलित करने और ग्रामीण पूँजीपति वर्ग की पार्टी बनने की प्रवृत्ति होती है। लेकिन जैसे-जैसे गर्मी और फिर शरद में किसानों में वा‍स्तविक धाराएँ आगे बढ़ीं, जिनका विवरण हम दे चुके हैं, यह भूमि प्रश्न के क्रान्तिकारी समाधान का पक्ष लेने वाला वामपन्थी धड़ा था जिसने ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे ज़्यादा समर्थक जीते और ग्रामीण सोवियतों व अन्य स्थानीय निकायों में किसानों के जनसमुदायों का प्रमुख प्रवक्ता बन गया।” (मॉरिस डॉब, 1948, ‘सोवियत इकोनॉमिक डेवलपमेण्ट सिंस 1917’, रूटलेट एण्ड कीगनपॉल लि., लन्दन, पृ. 79) ये वे स्थितियाँ थीं जिन्होंने अगस्त से लेकर सितम्बर के मध्य तक लेनिन के विचारों को विकसित करने में मुख्य भूमिका निभायी।

लेनिन के विचारों के विकसित होने के दौरान ही पार्टी के भीतर जनवादी राज्य सम्मेलन और उसके द्वारा गठित प्रेद पार्लियामेण्ट में हिस्सेदारी को लेकर तीखी बहस चल रही थी। लेनिन ने शुरू से ही जनवादी राज्य सम्मेलन को व्यर्थ और जनता की विद्रोही भावनाओं को बुर्जुआ वैधिकता के दायरे में रखने का उपकरण बताया था। कोर्निलोव के हमले को नाकाम करने के बाद पेत्रोग्राद, मॉस्को और तमाम प्रान्तों में मेहनतकश जनता तेज़ी से इस पक्ष में आ गयी थी कि सारी सत्ता सोवियतों को दे दी जानी चाहिए। लेनिन भी कोर्निलोव प्रकरण के बाद ही सोवियतों को सत्ता देने के नारे को पुनर्जीवित करते हैं। अगस्त अन्त और सितम्बर के प्रथम सप्ताह के बीच बोल्शेविक पेत्रोग्राद व मॉस्को सोवियतों में बहुमत में आ गये थे। लेकिन अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस की कार्यकारी परिषद में वे अभी भी अल्पमत में थे। कामेनेव ने 31 अगस्त से 2 सितम्बर तक चली इसकी बैठक में बोल्शेविकों की ओर से प्रस्ताव रखा कि नयी सरकार बनाये जाने की ज़रूरत है जिसमें प्रतिक्रियावादी कैडेट पार्टी और अन्य प्रतिक्रियावादी तत्वों को क़तई शामिल नहीं किया जाना चाहिए; इसमें क्रान्तिकारी मज़दूर वर्ग और किसान वर्ग के प्रतिनिधि होने चाहिए जिन्हें रूस को एक जनवादी गणराज्य घोषित करना चाहिए। स्पष्ट है कि कामेनेव ने प्रस्ताव को अपनी समझदारी के अनुसार बनाया था और इसीलिए वे अभी भी जनवादी गणराज्य की बात कर रहे थे और बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति को पूर्णता तक पहुँचाये बग़ैर किसी भी आम बग़ावत और समाजवादी क्रान्ति के प्रस्ताव का शुरू से ही विरोध कर रहे थे। लेकिन उनके प्रस्ताव में एक अस्पष्टता है कि वे इस क़दम को एक संक्रमणात्मक क़दम के तौर पर पेश कर रहे हैं या फिर एक दीर्घकालिक समाधान के रूप में। बहरहाल, बोल्शेविकों का यह प्रस्ताव इसी समय जारी पेत्रोग्राद सोवियत की बैठक में बहुमत से पारित हो गया जो कि पेत्रोग्राद सोवियत में बोल्शेविकों के बहुमत में आने का प्रतीक था। लेकिन अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस के कार्यकारी परिषद में यह प्रस्ताव पारित नहीं हो सका।

रैबिनोविच का मानना है कि कोर्निलोव प्रकरण के होने के बाद सितम्बर के प्रथम सप्ताह के दौरान लेनिन के चिन्तन में कुछ बदलाव आया और कुछ समय के लिए वे मेंशेविकों और समाजवादी-क्रान्तिकारी पार्टी से समझौते के बारे में सोचने लगे थे। कोर्निलोव के हमले ने तकनीकी और सैन्य मसलों में तालमेल करने के लिए सभी समाजवादी पार्टियों को बाध्य कर दिया था और इस सहयोग से लेनिन ने क्रान्ति के शान्तिपूर्ण विकास के रास्ते को फिर से पुनर्जीवित किया। रैबिनोविच कहते हैं कि लेनिन सोवियतों के ”मृत” हो जाने और सीधे पार्टी के नेतृत्व में मज़दूर वर्ग द्वारा सत्ता पर क़ब्ज़ा करने की कार्यदिशा से पीछे चले गये थे। रैबिनोविच लेनिन के लेख ”समझौतों के बारे में” को समूचे ऐतिहासिक सन्दर्भों से काटकर ये नतीजे निकालते हैं। वास्तव में लेनिन ने कोर्निलोव प्रकरण के बाद पैदा हुई विशिष्ट परिस्थितियों में इस सम्भावना को टटोलने का प्रयास किया था कि क्या मेंशेविकों और समाजवादी-क्रान्तिकारियों को इस बात के लिए राज़ी किया जा सकता है कि सोवियत कांग्रेस सारी सत्ता को अपने हाथों में ले ले। 3 सितम्बर को जब लेनिन इस लेख को छपने के लिए पेत्रोग्राद भेजने वाले थे, तभी मिली नयी सूचनाओं के आधार पर उन्होंने एक पश्चलेख जोड़ दिया जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया कि इस समझौते का दौर भी बीत चुका है। लेकिन यदि ऐसा न भी होता तो लेनिन का अर्थ यह क़तई नहीं था कि यह समझौता कोई दीर्घकालिक मिश्रित समाजवादी सरकार बनायेगा या अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस मेंशेविकों व समाजवादी-क्रान्तिकारियों के नेतृत्व में कोई दीर्घकालिक सरकार चलायेगी। लेनिन उस सूरत में भी यह मानते थे कि सोवियतों के हाथों में सत्ता आने के बाद तत्काल समाजवादी क्रान्ति के कार्यक्रम के लिए संघर्ष शुरू कर दिया जायेेगा और अन्तत: बल प्रयोग के साथ ही सर्वहारा वर्ग की तानाशाही को स्थापित किया जायेेगा। लेनिन ”समझौतों के बारे में” लेख में मेंशेविकों और समाजवादी-क्रान्तिकारियों के समक्ष इस प्रकार के समझौते का प्रस्ताव रखते हुए भी स्पष्ट करते हैं कि बोल्शेविक पार्टी प्रचार और उद्वेलन की अपनी स्वतन्त्रता को क़ायम रखेगी। लेनिन कहते हैं कि यदि मेंशेविक और समाजवादी-क्रान्तिकारी पार्टी बुर्जुआ वर्ग से रिश्ता तोड़ ले और मिलकर सत्ता सोवियतों के हवाले कर दें, तो बोल्शेविक सरकार के बाहर रहेंगे और उन्हें प्रचार व उद्वेलन की पूरी आज़ादी मिलनी चाहिए। स्पष्ट है कि लेनिन जिस समझौते की बात कर रहे थे, वह केवल कुछ समय के लिए क्रान्ति के शान्तिपूर्ण विकास की वकालत कर रहा था और अन्तत: पार्टी समाजवादी क्रान्ति की ओर बढ़ने की अपनी स्वतन्त्रता को किसी भी रूप में गिरवी नहीं रख रही थी। यहाँ दो बातें और भी हैं। लेनिन इस क़दम के ज़रिये कोर्निलोव प्रकरण जैसे किसी प्रकरण की पुनरावृत्ति की सम्भावनाओं को भी न्यूनातिन्यून बनाने का प्रयास कर रहे थे। दूसरी बात यह कि लेनिन सोवियतों को सत्ता देने और सशस्त्र विद्रोह के आह्वान को तात्कालिक तौर पर छोड़ देने के बदले जिस स्वतन्त्रता की माँग कर रहे थे, वह मेंशेविक और समाजवादी-क्रान्तिकारी पार्टी नहीं मानने वाली थी और कहीं न कहीं लेनिन को भी इस बात का आभास था। लेकिन फिर भी लेनिन बुर्जुआ वर्ग से निर्णायक विच्छेद करने और अपनी क्रान्तिकारी जनवादी विश्वसनीयता को फिर से अर्जित करने का एक अवसर टटपुँजिया व संशोधनवादी बुर्जुआ पार्टियों को दे रहे थे। रैबिनोविच लेनिन के इस दौर के तीन लेखों ”क्रान्ति के कार्यभार”, ”रूसी क्रान्ति और गृहयुद्ध” और ”क्रान्ति का एक बुनियादी प्रश्न” के कुछ उद्धरण पेश करके ऐसी तस्वीर पेश करने की कोशिश करते हैं कि लेनिन भी अब कामेनेव जैसे बोल्शेविकों की कार्यदिशा पर आ गये थे। लेकिन अगर आप स्वयं इन लेखों को पढ़ें तो आप पाते हैं कि लेनिन इन समझौतों की बात केवल एक लघुकालिक मध्यवर्ती मंजि़ल के तौर पर कर रहे थे, जिससे कि बुर्जुआ प्रतिक्रिया के भावी हमलों की सम्भावना को न्यूनातिन्यून किया जा सके और फिर ज़्यादा विश्वस्त और सशक्त क़दमों के साथ समाजवादी क्रान्ति की ओर आगे बढ़ा जाये। अगर ऐसा न होता तो वे मिश्रित सरकार में बोल्शेविक पार्टी को भी शामिल करने की बात करते और उसके लिए प्रचार और उद्वेलन की पूर्ण स्वतन्त्रता को सुरक्षित रखने की माँग नहीं करते। ‘सारी सत्ता सोवियतों को’ के नारे पर इस समझौते का प्रस्ताव रखने के पीछे लेनिन का एक अन्य कारण यह भी था कि बोल्शेविक तब तक पेत्रोग्राद और मॉस्को सोवियतों में बहुमत में आ गये थे और इस बात के भी स्पष्ट संकेत मिल रहे थे कि अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस में भी वे बहुमत में आ सकते हैं क्योंकि भूमि के प्रश्न पर समाजवादी-क्रान्तिकारी पार्टी अपने ही कार्यक्रम को लागू करने से मुकर चुकी थी। एक अन्य कारण यह भी था कि टटपुँजिया पार्टियों के दोलन के कारण उनमें भी फूट पड़ने के संकेत मिल रहे थे और इस बात की पूरी उम्मीद थी कि उनसे अलग होने वाले ”वाम” धड़े बोल्शेविक कार्यक्रम पर राजी हो जायेेंगे। लेनिन ने यहाँ एक बेहद युक्तिपूर्ण रणकौशल अपनाया था, जिसे रैबिनोविच कामेनेव जैसे समझौते की अवस्थिति पर जाना समझ बैठे हैं। (देखें, रैबिनोविच, 1976, ‘दि बोल्शेविक्स कम टू पावर’, डब्ल्यू. डब्ल्यू. नॉर्टन एण्ड कं., न्यूयॉर्क, पृ. 169-174) लेकिन अन्त में रैबिनोविच ख़ुद ही इस बात को स्वीकार कर बैठे हैं। वे लिखते हैं, ”चाहे जो भी हो, जैसा कि जुलाई-पूर्व के दौर में था, (उसी प्रकार सितम्बर की शुरुआत में भी) कामेनेव जैसे दक्षिणपन्थी बोल्शेविकों के कार्यक्रम सम्बन्धी विचारों – जो कि रूस को समाजवादी क्रान्ति के लिए अपरिपक्व मानते थे, और मानते थे कि अभी एक व्यापक आधार वाली, विशिष्ट रूप से समाजवादी गठबन्धन सरकार बनाने से आगे नहीं देखा जा सकता जिसमें कि बोल्शेविक भी शामिल हों, एक जनवादी गणराज्य की स्थापना की जाये, और संविधान सभा को बुलाया जाये – और लेनिन, त्रात्स्की जैसे लोगों, और पेत्रोग्राद के स्थानीय बोल्शेविक नेताओं के विचारों में – जो कि मानते थे कि सत्ता सोवियतों को हस्तान्तरित करना और एक मेंशेविक व समाजवादी-क्रान्तिकारियों की मिश्रित सरकार समाजवादी क्रान्ति के विकास में महज़ एक संक्रमणात्मक मंजि़ल है, जिसके तुरन्त बाद सर्वहारा वर्ग और निर्धनतम किसानों की तानाशाही स्थापित कर दी जायेेगी – छोटी दूरी में यह सहमति थी कि एक शान्तिपूर्ण रास्ता सम्भव है।” (रैबिनोविच, 1976, वही, पृ. 173-174) रैबिनोविच की इस बात से ही स्पष्ट है कि लेनिन इस दौर में भी कामेनेव की अवस्थिति पर नहीं गये थे और समझौतों की उनकी समझदारी पूरी तरह से समाजवादी क्रान्ति के विकास के रणकौशल में परिस्थितियों के कारण आया एक परिवर्तन था, जिसे आगे भी बदला जा सकता था और वास्तव में लेनिन ने आगे इसे बदला भी।

बहरहाल, हम रैबिनोविच को ज़्यादा दोष नहीं देंगे क्योंकि जब एक बेहद छोटे से दौर में लेनिन ने इन रणकौशलात्मक समझौतों की बात की (सितम्बर के पहले दो सप्ताह) तो स्वयं पीटर्सबर्ग पार्टी कमेटी और वाइबोर्ग जि़ला कमेटी ने इसे नहीं समझा था और इसके विरोध में राय प्रकट की थी। उनका मानना था कि लेनिन की पुरानी कार्यदिशा ही सही थी, जिसके अनुसार सशस्त्र विद्रोह के ज़रिये आरज़ी सरकार को उखाड़ फेंकने की वकालत की गयी थी।

लेनिन के इसी दौर के लेखन के आधार पर बोल्शेविक केन्द्रीय कमेटी ने अपना नीति निर्धारण शुरू किया। जनवादी राज्य सम्मेलन में हिस्सेदारी करने का निर्णय किया गया जिसका घोषित लक्ष्य था कोर्निलोव प्रकरण के बाद एक नयी संयुक्त सरकार का गठन करना। बहस के मुद्दों में यह भी शामिल था कि कैडेटों को नयी सरकार में कोई जगह मिलनी चाहिए या नहीं। इस सम्मेलन का प्रस्ताव मेंशेविकों और समाजवादी-क्रान्तिकारियों का था और उन्होंने बेहद सोच-समझकर इस सम्मेलन का संघटन तय किया था। इसका ढाँचा ऐसे बनाया गया था कि बोल्शेविक किसी भी रूप में इसमें बहुमत में न आ सकें। सभी मज़दूर निकायों, जैसे कि ट्रेड यूनियन व कारख़ाना समितियों में बोल्शेविक कार्यक्रम हावी था। लेकिन मेंशेविकों ने प्रान्तों से जेम्स्त्वो प्रतिनिधियों, ग्रामीण किसान पंचायतों, सहकारी संघों आदि के प्रतिनिधियों को प्रमुख स्थान दिया था जिसमें कि मध्यमार्गियों की भरमार थी और टटपुँजिया राजनीति का असर ज़्यादा था। बोल्शेविक पार्टी के सामने यह असलियत पहली बैठक में ही साफ़ हो गयी जिसमें 532 समाजवादी क्रान्तिकारी प्रतिनिधि (इनमें से मात्र 71 ”वाम” धड़े के थे जो कि बाद में बोल्शेविकों के समर्थन में आ गये थे, हालाँकि देश भर में किसानों में वाम धड़े का प्रभाव ज़्यादा था), 530 मेंशेविक थे (इनमें से 56 अन्तरराष्ट्रीयतावादी मेंशेविक थे, जो बोल्शेविकों के क़रीब आ गये थे) और 134 बोल्शेविक थे। मज़दूरों और किसानों में बोल्शेविक भारी बहुमत में थे। लेकिन एक विचित्र मिश्रण तैयार करके मेंशेविकों और समाजवादी-क्रान्तिकारियों ने उन्हें अल्पमत में ला दिया था। पार्टी की केन्द्रीय कमेटी को तभी समझ लेना चाहिए था कि यह सम्मेलन एक प्रहसन है जिसका मक़सद है क्रान्ति को बुर्जुआ वैधिकता के दायरे में सीमित करना। लेकिन ऐसा हो नहीं सका।

14 सितम्बर को जनवादी राज्य सम्मेलन में पार्टी ने हिस्सेदारी की और इस सम्मेलन में लेनिन के ”समझौतों के बारे में” पेश कार्यदिशा को कामेनेव अपनी दक्षिणपन्थी समझदारी से लागू कर रहे थे और त्रात्स्की अपनी समझदारी से लागू कर रहे थे। कामेनेव एक जनवादी गणराज्य, मिश्रित समाजवादी सरकार और उस सरकार में बोल्शेविकों की सम्भावित भागीदारी की बात करते हुए जनवादी क्रान्ति के पूर्णता तक पहुँचने के विचार से संचालित थे, जबकि त्रात्स्की लेनिन की इस अवधारणा के ज़्यादा क़रीब थे कि ऐसी कोई भी सरकार और सोवियत सत्ता समाजवादी क्रान्ति के विकास में एक लघुकालिक संक्रमणात्मक क़दम होगी। इस सम्मेलन में ही प्रेद पार्लियामेण्ट का निर्माण हुआ जिसमें शुरुआत में बोल्शेविकों ने भी कामेनेव के प्रभाव के चलते हिस्सेदारी की।

लेकिन लेनिन ने इस कार्यदिशा पर तीखा प्रहार किया और 12 से 14 सितम्बर के बीच में लेनिन ने दो पत्र केन्द्रीय कमेटी को लिखे। ये पत्र कमेटी को 15 सितम्बर को प्राप्त हुए। लेनिन ने स्पष्ट किया कि कई कारणों से अब पार्टी को तत्काल सशस्त्र विद्रोह करने की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए और वैसे भी किसी भी सूरत में जनवादी राज्य सम्मेलन और फिर प्रेद पार्लियामेण्ट जैसे किसी प्रहसन में हिस्सेदारी करना बेकार था क्योंकि उसके संघटन से ही स्पष्ट था कि उसका मक़सद क्रान्तिकारी जनज्वार को बुर्जुआ वैधिकता में सहयोजित करना है। लेनिन ने कहा कि अब हमें सशस्त्र विद्रोह की तैयारी निम्न कारणों से करनी चाहिए: दो प्रमुख शहरी सोवियतों यानी पेत्रोग्राद सोवियत और मॉस्को सोवियत में हम बहुमत में आ चुके हैं, कुछ अन्य क्षेत्रीय सोवियतों में भी हम बहुमत में आ गये हैं, गाँवों में भूमि क़ब्ज़ा आन्दोलन ने अभूतपूर्व रफ़्तार पकड़ ली है और उनके समर्थन में केवल बोल्शेविक पार्टी है, सेना मोर्चे पर पूरी तरह विघटन का शिकार है और शान्ति की माँग अपने चरम पर है, जर्मन नौसेना में बग़ावत जर्मनी में बदलती स्थितियों की ओर भी संकेत कर रहे हैं। लेनिन ने यह भी कहा कि इस बात के भी प्रमाण मिल रहे हैं कि ब्रिटिश, जर्मन साम्राज्यवादियों में अलग से कोई समझौता हो जायेे और फिर रूसी बुर्जुआजी से तालमेल करके रूसी क्रान्ति को कुचलने के लिए ये ताक़तें एक हो जायेें। इसके लिए केरेंस्की पेत्रोग्राद का जर्मनी के सामने आत्मसमर्पण भी कर सकता है। ये सारी स्थितियाँ दिखला रही हैं कि हमें तत्काल आम बग़ावत का कार्यभार अपना लेना चाहिए। इन दोनों पत्रों (‘बोल्शेविकों को सत्ता पर क़ब्ज़ा करना ही होगा’ और ‘मार्क्सवाद और आम बग़ावत’) को लेनिन की तीक्ष्ण दृष्टि को समझने के लिए और मार्क्सवाद और आम बग़ावत के नियमों के रिश्ते को समझने के लिए ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए। दूसरे पत्र में लेनिन ने जुलाई और सितम्बर की स्थितियों में फ़र्क़ बताते हुए यह भी स्पष्ट किया कि जुलाई में आम बग़ावत क्यों अपरिपक्व होती और अब आम बग़ावत का वक़्त किस प्रकार आ चुका है। दूसरे पत्र में अन्त में लेनिन ने केन्द्रीय कमेटी को ठोस सुझाव दिये जिसमें एक सैन्य केन्द्र स्थापित करना, अपनी सारी शक्ति को कारख़ानों, ग़ैरीसनों में आम बग़ावत की तैयारी के लिए भेज देना, आम बग़ावत के संचालन के लिए एक पार्टी मुख्यालय स्थापित करना आदि शामिल थे।

जब ये पत्र केन्द्रीय कमेटी को 15 सितम्बर को प्राप्त हुए तो उसमें एक बहस शुरू हो गयी। केवल स्तालिन का यह मानना था इन पत्रों को पार्टी दायरों में ले जाना चाहिए। अन्य सभी ने, जिसमें कि त्रात्स्की, कामेनेव, जि़नोवियेव, स्वेर्दलोव, बुब्नोव, द्ज़र्जेंस्की आदि शामिल थे, यह निर्णय लिया कि इन पत्रों की एक प्रतिलिपि सुरक्षित करके इसे जला दिया जाना चाहिए। लोमोव ने बाद में बताया कि केन्द्रीय कमेटी के सदस्यों को यह भय था कि इस पत्र के पार्टी की अन्य कमेटियों व इकाइयों तक पहुँचते ही एक अपरिपक्व आम बग़ावत की तैयारी शुरू हो जायेेगी। रैबिनोविच के अनुसार त्रात्स्की के रवैये में लेनिन के इन पत्रों के बाद इतना बदलाव ज़रूर आया कि उन्होंने जनवादी राज्य सम्मेलन में पार्टी भागीदारी को विशेष महत्व देना बन्द कर दिया और सीधे सोवियतों को सत्ता हस्तान्तरित करने की बात करने लगे। लेकिन पार्टी ने अभी भी जनवादी सम्मेलन में भागीदारी जारी रखी और एक व्यापक समाजवादी सरकार के लिए दबाव डालने का प्रयास किया। लेनिन को इस समय तक यह बात सम्प्रेषित हो चुकी थी कि केन्द्रीय कमेटी उनकी सलाह को दरकिनार कर रही है। इसी बीच केन्द्रीय कमेटी ने 16 सितम्बर को लेनिन के पुराने लेख ”रूसी क्रान्ति और गृहयुद्ध” को राबोची पुत में छाप दिया जिसमें लेनिन अभी क्रान्ति के शान्तिपूर्ण विकास और समझौतों की बात कर रहे थे। इस मौक़े पर लेनिन का धैर्य जवाब दे गया और उन्होंने स्वेर्दलोव और क्रुप्सकाया को सूचित किया कि वे पेत्रोग्राद लौट रहे हैं।

इसी बीच जनवादी राज्य सम्मेलन और प्रेद पार्लियामेण्ट के बारे में लेनिन की भविष्यवाणियाँ सही साबित हुईं क्योंकि इसमें टटपुँजिया पार्टियों ने अन्तत: बुर्जुआ वर्ग के प्रतिक्रियावादी तत्वों से समझौता करने और केरेंस्की से सौदेबाज़ी करने का फ़ैसला किया। अभी भी कामेनेव जनवादी सम्मेलन व प्रेद पार्लियामेण्ट में भागीदारी की वकालत कर रहे थे। त्रात्स्की और स्तालिन ने प्रेद पार्लियामेण्ट के बहिष्कार का नारा दिया। शुरू में कामेनेव का प्रस्ताव वोटिंग में विजयी हुआ। इस पर लेनिन ने गहरा क्षोभ व्यक्त किया और त्रात्स्की और स्तालिन के बहिष्कार के नारे का समर्थन किया। इसके बावजूद जनवादी सम्मेलन में मौजूद बोल्शेविक धड़े और केन्द्रीय कमेटी की संयुक्त बैठक में कामेनेव का प्रस्ताव विजयी हुआ। इसके बाद 22 सितम्बर को लेनिन का एक लेख ”धोखाधड़ी के नायक और बोल्शेविकों की ग़लती” राबोची पुत के लिए लिखा जिसका एक सम्पादित संस्करण 24 सितम्बर को राबोची पुत में प्रकाशित हुआ। बोल्शेविकों की आलोचना वाले हिस्से को सम्पादक मण्डल ने सम्पादित कर दिया था। इस सम्पादक मण्डल में कामेनेव, सोकोलनिकोव, त्रात्स्की, स्तालिन और वोलोदार्स्की थे। इसके बाद 22 से 24 सितम्बर तक लेनिन ने एक लम्बा निबन्ध लिखा जो डायरी लेखन के रूप में था। यह प्रसिद्ध लेख था ”एक प्रचारकर्ता की डायरी से” जो काफ़ी बाद में प्रकाशित हो सका। लेनिन ने इसे प्रकाशन के लिए भेजा लेकिन इसे सम्पादक मण्डल ने छापा नहीं। किन लोगों ने इसके विरुद्ध वोट किया इसका विवरण नहीं मिलता, लेकिन अन्तत: यह निबन्ध नहीं छपा। उल्टे लेनिन के पिछले मूल्यांकन को पेश करने वाला एक लेख ”क्रान्ति के कार्यभार” को 26 सितम्बर को छापना शुरू किया गया। इससे क्षुब्ध होकर लेनिन ने केन्द्रीय कमेटी के एक सदस्य स्मिल्गा को 27 सितम्बर को पत्र लिखा कि वह पहल लें और केन्द्रीय कमेटी में इस बात को लेकर राय बनायें कि सशस्त्र विद्रोह की तैयारी शुरू की जाये। 1 अक्टूबर को उन्होंने एक अन्य लेख ”संकट पक चुका है” लिखा जिसमें उन्होंने लिखा कि तमाम युद्धरत देशों में युद्ध के प्रति जनअसन्तोष बढ़ रहा है और वे सामाजिक उथल-पुथल की ओर बढ़ रहे हैं। जर्मन नौसेना में बग़ावत जर्मनी में भी क्रान्तिकारी स्थिति के निर्माण की ओर एक क़दम है। ऐसे में, विश्व सर्वहारा क्रान्ति के चक्र का उद्घाटन करने की जि़म्मेदारी बोल्शेविकों पर आ पड़ी है। रूस में क्रान्तिकारी संकट पक चुका है और मज़दूर वर्ग को तत्काल सत्ता अपने हाथों में लेने की तैयारी करनी होगी। लेनिन ने अपने तर्कों को दुहराते हुए कहा कि इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है कि अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस में अभी बोल्शेविकों का बहुमत नहीं है क्योंकि यह बहुमत अर्जित करना अब केवल एक औप‍चारिकता है; दूसरी बात यह कि क्रान्ति की अगुवाई करने वाली दो प्रमुख सोवियतों यानी पेत्रोग्राद सोवियत और मॉस्को सोवियत में बोल्शेविक पहले ही बहुमत में आ चुके हैं; तीसरी बात, केरेंस्की पेत्रोग्राद से मॉस्को राजधानी स्थानान्तरित करने का प्रयास कर रहा था जिसका कारण यह था कि केरेंस्की पेत्रोग्राद का जर्मन सेना के समक्ष आत्मसमर्पण कर रहा था; जर्मन साम्राज्यवादियों और ब्रिटिश साम्राज्यवादियों में एक अनकही समझदारी बन गयी है और इसलिए पेत्रोग्राद की ओर बढ़ने से ब्रिटिश सेना जर्मनी को रोक नहीं रही है; स्पष्ट है कि ब्रिटिश, जर्मन और रूसी साम्राज्यवादी रूसी क्रान्ति का गला घोंटने की तैयारी कर रहे हैं। प्रतिक्रान्तिकारी शक्तियाँ सोवियत में बहुमत प्राप्त करने जैसी औपचारिकताओं की परवाह नहीं कर रही हैं; ऐसे में, यदि बोल्शेविक इसकी परवाह करेंगे तो उनकी हार होगी। शासक वर्ग रूस में असमंजस में है; टटपुँजिया शक्तियाँ भी असमंजस में हैं और बिखरी हुई हैं; सर्वहारा वर्ग बोल्शेविकों के नेतृत्व में संगठित है; देश भर में किसान उभार अभूतपूर्व स्तर पर है और प्रान्तों में कई जगहों पर स्थानीय सोवियतों ने शासन अपने हाथों में ले लिया है; ऐसे में, मार्क्स ने सशस्त्र विद्रोह की जो पूर्वशर्तें बतायी थीं, वे सभी पूरी हो चुकी हैं। लिहाज़ा, बुर्जुआ वैधानिकता के विभ्रम में फँसने का अर्थ होगा क्रान्ति की हार।

इस लेख का एक हिस्सा प्रकाशन के लिए नहीं था। वह केन्द्रीय कमेटी को पत्र था जिसमें लेनिन ने स्पष्ट किया कि बोल्शेविकों के दोलन के कारण क्रान्ति की घड़ी निकल जायेेगी और इतिहास उन्हें क्रान्ति का ग़द्दार क़रार देगा। द्वितीय अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस तक इन्तज़ार करने की बात व्यर्थ है और तत्काल सशस्त्र विद्रोह कर सत्ता अपने हाथों में ली जानी चाहिए। यह इन्तज़ार बुर्जुआ वैधिकता का भ्रम है क्योंकि पेत्रोग्राद, मॉस्को व अन्य शहरों में जनता बोल्शेविकों के साथ है, भूमि के प्रश्न पर किसान बोल्शेविकों के साथ हैं और मज़दूरों, सैनिकों और किसानों के जनसमुदाय इस समय बोल्शेविकों से प्रस्तावों, नारों और शब्दों की माँग नहीं कर रहे हैं, बल्कि कार्रवाई की माँग कर रहे हैं। इसके बाद लेनिन ने कहा कि चूँकि केन्द्रीय कमेटी उनकी राय पर ध्यान नहीं दे रही है और रूसी क्रान्ति के लिए उपयुक्त घड़ी निकली जा रही है इसलिए वे केन्द्रीय कमेटी से अपना इस्तीफ़ा दे रहे हैं ताकि पार्टी काडर में सीधे अपनी बात ले जाने की स्वतन्त्रता हासिल कर सकें। ई.एच. कार के मुताबिक़ लेनिन के द्वारा इस्तीफ़े की पेशकश से केन्द्रीय कमेटी की बैठक में सन्नाटा छा गया था और अन्त में द्ज़र्जेंस्की ने कहा था कि पार्टी इतनी बड़ी क़ीमत नहीं चुका सकती है। लेकिन केन्द्रीय कमेटी ने कोई औपचारिक जवाब दिया हो इसका कोई रिकॉर्ड नहीं मिलता।

1 अक्टूबर को लेनिन ने केन्द्रीय कमेटी, मॉस्को व पीटर्सबर्ग की पार्टी कमेटियों और मॉस्को और पीटर्सबर्ग सोवियत के बोल्शेविक सदस्यों को एक पत्र जारी कर अपनी कार्यदिशा स्पष्ट की। इसी समय लेनिन ने एक अपील भी लिखी जिसका नाम था – ”मज़दूरों, किसानों और सैनिकों के नाम” जो व्यापक वितरण के लिए तैयार की गयी थी। इसमें लेनिन ने स्पष्ट कर दिया कि सत्ता पर क़ब्ज़ा करने का वक़्त आ चुका है। कुछ ही दिनों के भीतर पेत्रोग्राद पार्टी कमेटी, मॉस्को पार्टी कमेटी, वाईबोर्ग जि़ला कमेटी व अन्य स्थानीय कमेटियाँ लेनिन के पक्ष में आ गयीं। साथ ही, पेत्रोग्राद नगर कमेटी ने इस बात पर सख्त आपत्ति ज़ाहिर की कि लेनिन की राय को इतने समय तक केन्द्रीय कमेटी ने दबाकर रखा। 5 अक्टूबर को केन्द्रीय कमेटी में यह चर्चा हुई कि प्री-पार्लियामेण्ट से बाहर आ जाया जाये या नहीं। अन्तत: प्रेद पार्लियामेण्ट से निकलने का निर्णय लिया गया और बोल्शेविक उससे बाहर आ गये। इसी बीच पीटर्सबर्ग पार्टी कमेटी ने केन्द्रीय कमेटी के निर्देशों के बिना ही सैन्य तैयारियाँ करने की शुरुआत कर दी थी। 7 अक्टूबर को केन्द्रीय कमेटी ने बैठक करके एक ब्यूरो गठित किया जिसको यह कार्य सौंपा गया कि वे सशस्त्र विद्रोह के लिए स्थितियों और जनता के मिजाज़ की जाँच करें। इसमें त्रात्स्की, स्वेर्दलोव और बुबनोव थे। बाद में इसमें बोल्शेविक सैन्य संगठन से पॉड्वॉइस्की और नेव्स्की को शामिल किया गया और पीटर्सबर्ग पार्टी कमेटी की ओर से लैटसिस और मॉ‍सक्विन को शामिल किया गया। 7 अक्टूबर की शाम हो ही त्रात्स्की के एक भाषण के साथ बोल्शेविक प्री-पार्लियामेण्ट से निकल गये। इससे जनता के बीच यह सन्देश चला गया था कि बोल्शेविक अब सशस्त्र विद्रोह की तैयारी कर रहे हैं।

केन्द्रीय कमेटी के भीतर त्रात्स्की व कई अन्य लोगों का यह मत था कि द्वितीय अखिल रूसी सोवियत तक इन्तज़ार किया जाना चाहिए, जो कि 20 अक्टूबर को होने वाली थी और जिसे बाद में टालकर 25 अक्टूबर के लिए निर्धारित कर दिया गया था। लेनिन का स्पष्ट मानना था कि यह एक बुर्जुआ वै‍धानिकता के भ्रम में फँसना है। लेकिन इसके बावजूद केन्द्रीय कमेटी में क़दम उठा देने का आत्मविश्वास संचित नहीं हो पा रहा था। अन्त में लेनिन 10 अक्टूबर की केन्द्रीय कमेटी की बैठक में स्वयं पहुँच गये, जो कि पेत्रोग्राद में हुई थी। दिलचस्प बात यह है कि यह बैठक सुखानोव नामक एक अन्तरराष्ट्रीयतावादी मेंशेविक के फ्लैट पर बेहद गोपनीयता के साथ आयोजित हुई थी। सुखानोव की पत्नी एक बोल्शेविक थीं। स्वयं सुखानोव को इस बैठक के बारे में पता नहीं था। इस बैठक को आयोजित करने के लिए लेनिन ने स्वेर्दलोव को प्रस्ताव भिजवाया था। बहरहाल, इस बैठक में लेनिन ने अपनी दलीलों को विस्तार से रखा और केन्द्रीय कमेटी को इस बात के लिए राजी किया कि वह सशस्त्र विद्रोह की तैयारी करे और उसके संचालन के लिए पोलित ब्यूरो नियुक्त करे। कार का मानना है कि पोलित ब्यूरो की संस्था का अस्तित्व में आना इसी घटना से शुरू हुआ और वह इसकी तुलना क्रान्ति के बाद पोलित ब्यूरो के निर्माण से करते हैं। यह तुलना सही नहीं है क्योंकि सशस्त्र विद्रोह के लिए गठित पोलित ब्यूरो एक विशिष्ट कार्यभार के लिए बनाया गया निकाय था, जिसके बाद उसे भंग हो जाना था। लेकिन क्रान्ति के बाद पोलित ब्यूरो बनाने के कारण अलग थे और वह पोलित ब्यूरो दो केन्द्रीय कमेटी की बैठकों के बीच सामान्य तौर पर राजनीतिक कार्यों के दिशा-निर्देशन व संचालन के लिए था।

बहरहाल, लेनिन का प्रस्ताव 2 के मुक़ाबले 10 वोटों से विजयी रहा। स्तालिन, त्रात्स्की, स्वेर्दलोव, उरित्स्की, द्ज़र्जेंस्की, लोमोव, कोलोन्ताई, बुबनोव ने लेनिन के पक्ष में वोट किया। जि़नोवियेव व कामेनेव ने इसके विरोध में वोट किया। त्रात्स्की ने सशस्त्र विद्रोह के पक्ष में वोट करते हुए दूसरी अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस तक इन्तज़ार करने की वकालत की। अन्तत: इस मुद्दे पर लेनिन की बात से सहमति बनी जिसके अनुसार सोवियतों की कांग्रेस तक इन्तज़ार करने का अर्थ होगा बुर्जुआ वर्ग को मौक़ा देना। पोलित ब्यूरो में लेनिन, स्तालिन, त्रात्स्की, जि़नोवियेव, कामेनेव, सोकोलनिकोव, व बुबनोव को चुना गया। जि़नोवियेव और कामेनेव को उनके विरोध के बावजूद सशस्त्र विद्रोह के संचालन हेतु बनाये गये पोलित ब्यूरो में चुना गया। यह बोल्शेविक पार्टी के और लेनिनवादी सांगठनिक उसूलों की विलक्षणता को दिखलाता है और जनवादी केन्द्रीयता के सिद्धान्त के कार्यान्वयन का एक असाधारण उदाहरण है। 16 अक्टूबर को पेत्रोग्राद सोवियत ने क्रान्तिकारी सैन्य कमेटी का निर्माण किया। त्रात्स्की दावा करते हैं कि पेत्रोग्राद सोवियत ने केन्द्रीय कमेटी के सशस्त्र विद्रोह के फ़ैसले से पहले ही यह कमेटी बना ली थी, लेकिन तब उसका उद्देश्य सशस्त्र विद्रोह का संचालन नहीं था। बाद में, पार्टी ने इसे अपनी योजना के अनुसार सहयोजित कर लिया। ई.एच. कार त्रात्स्की के इस ब्यौरे को सही मानते हैं। बहरहाल, इस कमेटी ने पार्टी द्वारा बनाये गये क्रान्तिकारी सैन्य केन्द्र के नेतृत्व में 20 अक्टूबर को अपना काम शुरू कर दिया।

11 अक्टूबर को जि़नोवियेव व कामेनेव ने पार्टी दायरों में केन्द्रीय कमेटी के फ़ैसले के ख़ि‍लाफ़ एक पत्र वितरित किया। 16 अक्टूबर को लेनिन ने केन्द्रीय कमेटी की बैठक में फिर से सशस्त्र विद्रोह के फ़ैसले को सही ठहराया। इस बैठक में पेत्रोग्राद पार्टी कमेटी, क्रान्तिकारी सैन्य समिति और ट्रेड यूनियनों व कारख़ाना समितियों के चुने हुए सदस्य भी उपस्थि‍त थे। लेनिन ने कहा, ”स्थिति स्पष्ट है। या तो कोर्निलोव की तानाशाही या फिर सर्वहारा वर्ग और सबसे ग़रीब किसानों के वर्ग की तानाशाही। हम जनसमुदायों के मिजाज़ के अनुसार दिशा-निर्देशित नहीं हो सकते हैं : वह परिवर्तनीय है और अबोध्य है। हमें क्रान्ति के एक वस्तुपरक विश्लेषण और आकलन से दिशा-निर्देशित होना चाहिए। जनसमुदायों ने बोल्शेविकों में अपना भरोसा जताया है और वे हमसे कार्रवाई की माँग कर रहे हैं, शब्दों की नहीं।” (कार, 1978, ‘दि बोल्शेविक रिवोल्यूशन 1917-23’ खण्ड-1, डब्ल्यू. डब्ल्यू. नॉर्टन एण्ड कम्पनी, लन्दन, पृ. 95) लेनिन ने बैठक में बहुमत हासिल किया, हालाँकि, कार के अनुसार कुछ ऐसे लोग थे जिनमें कामेनेव व जि़नोवियेव के समान कुछ असमंजस था। स्तालिन ने लेनिन के पक्ष में वक्तव्य रखते हुए कहा, ”यहाँ दो कार्यदिशाएँ हैं : एक क्रान्ति की विजय की ओर ले जाती है और यूरोप की ओर झुकाव रखती है; दूसरी वह है जो क्रान्ति में भरोसा नहीं करती और विपक्ष बने रहने के भरोसे बैठी रहती है। पेत्रोग्राद सोवियत ने सेनाओं को हटाने को आज्ञा देने से इंकार करके आम बग़ावत के रास्ते पर पहले ही अपनी अवस्थिति जता दी है।” (कार, 1978, पृ. 96) अन्तत: बैठक ने 2 के मुक़ाबले 19 वोटों से लेनिन की कार्यदिशा का समर्थन किया। कार अटकल लगाते हैं कि त्रात्स्की अगर इस बैठक में थे, तो वे बोले नहीं क्योंकि ऐसी बैठक में सैन्य तैयारियों के बारे में बात नहीं की जा सकती है। ऐसी अटकल की कोई आवश्यकता नहीं है और यह त्रात्स्की के प्रति हमदर्दी रखने की वजह से लगायी गयी अटकल ही मानी जायेेगी। इस बैठक के बाद केन्द्रीय कमेटी सदस्य अलग से मिले और कमेटी ने पार्टी का क्रान्तिकारी सैन्य केन्द्र स्थापित किया जिसके सदस्य थे स्तालिन, स्वेर्दलोव, बुबनोव, उरित्स्की, द्ज़र्जेंस्की। इसी क्रान्तिकारी सैन्य केन्द्र ने आगे पेत्रोग्राद सोवियत के क्रान्तिकारी सैन्य समिति की कार्रवाइयों को निर्देशित किया।

18 अक्टूबर को कामेनेव ने अपने और जि़नोवियेव के नाम से एक पत्र ग़ैर-पार्टी अख़बार नोवाया जीज्न में प्रकाशित कर सशस्त्र विद्रोह के फ़ैसले को अनावृत्त करते हुए उसका विरोध किया। उस समय आरज़ी सरकार ऐसी विघटन और लकवे जैसी स्थिति का शिकार थी कि इस जानकारी के खुलने के बाद भी वह तत्काल बोल्शेविक नेताओं के ख़ि‍लाफ़ कोई कार्रवाई नहीं कर पायी। लेकिन जि़नोवियेव और कामेनेव की इस हरक़त पर लेनिन बुरी तरह नाराज़ हुए और उन्होंने पार्टी काडरों के नाम पत्र लिखकर उन्हें ”हड़ताल तोड़ने वालों” की संज्ञा दी और कहा कि वे अब उन्हें कॉमरेड नहीं मानते। केन्द्रीय कमेटी के नाम पत्र में लेनिन इन दोनों को कमेटी से निकाले जाने की माँग की। त्रात्स्की ने पेत्रोग्राद सोवियत में दावा किया कि पार्टी की सशस्त्र विद्रोह जैसी अभी कोई योजना नहीं है, ताकि कामेनेव की ग़लती से हुए नुक़सान की क्षतिपूर्ति की जा सके। लेकिन कामेनेव को लगा कि त्रात्स्की उनके पक्ष में आ गये हैं। जि़नोवियेव ने इसी आशय का एक पत्र राबोची पुत में लिखा जो कि 20 अक्टूबर को छपा। इसी अंक में लेनिन का कामेनेव व जि़नोवियेव की हरक़त का विरोध करते हुए लिखा गया पत्र भी छपा। स्तालिन ने इस विवाद पर कुछ पर्दा डालते हुए एक सम्पादकीय नोट लगाया और पार्टी में एकता बने रहने का दावा किया। 20 अक्टूबर को हुई केन्द्रीय कमेटी बैठक में कामेनेव की सभी ने कड़ी आलोचना की। कामेनेव ने अपना इस्तीफ़ा सौंपा जिसे स्वीकार कर लिया गया। कामेनेव और जि़नोवियेव को विशेष निर्देश दिया गया कि वे केन्द्रीय कमेटी के किसी फ़ैसले के विरुद्ध बाहर कुछ नहीं बोलेंगे। त्रात्स्की ने स्तालिन के सम्पादकीय नोट के लिए उनकी आलोचना की। कार का दावा है कि स्तालिन ने इस्तीफ़े की पेशकश की जिसे केन्द्रीय कमेटी ने स्वीकार नहीं किया। यह तय किया गया कि 25 अक्टूबर की द्वितीय अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस के पहले सशस्त्र विद्रोह किया जायेेगा। लेनिन ने आगे इसके कारणों को स्पष्ट किया जिसका ब्यौरा पॉड्वॉइस्की अपने संस्मरण में देते हैं। 20 से 23 अक्टूबर के बीच किसी दिन लेनिन ने पॉड्वॉइस्की, नेव्स्की और अन्तोनियेव को मिलने के लिए वाइबोर्ग में बुलाया था, जो कि बोल्शेविक सैन्य संगठन के प्रमुख नेता थे। इस बैठक में लेनिन ने स्पष्ट किया कि समय का पहलू आरज़ी सरकार के पक्ष में खड़ा है। वह मोर्चे से अपने प्रति वफ़ादार सैन्य टुकडि़यों को पेत्रोग्राद बुला रही है। उससे पहले यदि सत्ता पर क़ब्ज़ा कर लिया जायेेगा तो ये सैन्य टुकडि़याँ भी क्रान्ति के पक्ष में खड़ी हो जायेेंगी। दूसरी बात यह है कि सोवियत कांग्रेस से पहले सत्ता पर क़ब्ज़ा करना इसलिए आवश्यक है क्योंकि तब मज़दूर क्रान्ति और मज़दूर सत्ता अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस के लिए एक जीता-जागता सत्य होगा, न कि एक क्षीण सम्भावना। इस कांग्रेस में टटपुँजिया वर्गों के प्रतिनिधियों की प्रधानता है। ऐसे में, यदि इनके मिलने के पहले इनके सामने मज़दूरों की सत्ता पहले ही एक जीवन्त तथ्य के तौर पर उपस्थित होगी जो कि तत्काल शान्ति, ज़मीन और रोटी की माँगों को पूरा करेगी, तो वे उसका समर्थन करेंगे और वहाँ भी बोल्शेविक बहुमत में आ जायेेंगे। अगर बोल्शेविक अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस से पहले सत्ता पर क़ब्ज़ा नहीं करते तो सोवियत कांग्रेस का रवैया टटपुँजिया राजनीति के पक्ष में भी खड़ा हो सकता है। एक और कारक यह भी था कि पेत्रोग्राद सोवियत वास्तविक सोवियत प्राधिकार थी और जैसा कि बेतेलहाइम ने दलील पेश की है, अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस मेंशेविकों और समाजवादी-क्रान्तिकारी पार्टी ने पेत्रोग्राद सोवियत के प्राधिकार के प्रतिभार के रूप में खड़ी की थी। इस दलील में निश्चित तौर पर आंशिक सच्चाई है। यही वे कारण थे जिनकी वजह से लेनिन त्रात्स्की की इस दलील को बुर्जुआ वैधानिकता के भ्रम में फँसने की संज्ञा दे रहे थे कि अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस तक सत्ता क़ब्ज़ा करने को स्थगित किया जाना चाहिए। अन्तत: यही तय हुआ कि द्वितीय अखिल रूसी कांग्रेस के शुरू होने से ठीक पहले सत्ता पर क़ब्ज़ा कर लिया जायेेगा।

24 अक्टूबर को केन्द्रीय कमेटी की बैठक हुई जिसमें सभी को सशस्त्र विद्रोह को संचालित करने सम्बन्धी अलग-अलग कार्य सौंपे गये। इस बैठक में कामेनेव और जि़नोवियेव भी बैठे जिससे यह प्रतीत होता है कि 20 से 24 अक्टूबर के बीच कामेनेव और जि़नोवियेव ने अपनी हरक़त के लिए माफ़ी माँग ली थी और उनके प्रति उदारता बरती गयी थी। बहरहाल, द्ज़र्जेंस्की को रेलवे, बुबनोव को पोस्ट व टेलीग्राफ़, स्वेर्दलोव को आरज़ी सरकार की कार्रवाइयों पर निगाह रखने, मिल्युतिन को खाद्य आपूर्ति का काम सौंपा गया।

24 अक्टूबर की रात लेनिन स्वयं स्मोल्नी आ गये ताकि सशस्त्र विद्रोह का संचालन कर सकें और केन्द्रीय कमेटी और क्रान्तिकारी सैन्य कमेटी के उन नेताओं पर ज़ोर डाल सकें जिनके दिमाग़ में यह सवाल मँडरा रहा था कि कहीं वे ज़रूरत से ज़्यादा तेज़ रफ़्तार से तो नहीं चल रहे हैं। निश्चित तौर पर, लेनिन के स्मोल्नी में आगमन से आम बग़ावत के काम को और तेज़ी से किया जाने लगा। 25 अक्टूबर की भोर बोल्शेविकों की टुकडि़याँ हरकत में आ गयीं। शहर के केन्द्रीय बिन्दुओं पर क़ब्ज़ा कर लिया गया। आरज़ी सरकार के सदस्यों को गिरफ़्तार कर लिया गया, जबकि केरेंस्की भाग निकला। दोपहर में पेत्रोग्राद सोवियत की बैठक में ”मज़दूरों व किसानों के विद्रोह” की जीत की घोषणा की गयी। शा‍म को दूसरी अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस ने घोषणा की कि रूस में सारी सत्ता मज़दूरों, सैनिकों व किसानों के प्रतिनिधियों की सोवियतों को हस्तान्तरित कर दी गयी है। 26 अक्टूबर को कांग्रेस की दूसरी और आख़िरी बैठक में शान्ति और भूमि पर आज्ञाप्तियाँ पारित हुईं और जनकमिसार परिषद (सो‍वनार्कोम) को नियुक्त किया गया, जोकि मज़दूरों व ग़रीब किसानों की पहली सरकार बनी। इस परिषद के अध्यक्ष के तौर पर लेनिन को नियुक्त किया गया।

कार अपने पूरे विवरण में सशस्त्र विद्रोह में त्रात्स्की की भूमिका की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। त्रात्स्की के नेतृत्व की क्षमता को उन्होंने अद्भुत बताया है और पेत्रोग्राद सोवियत में उनकी भूमिका को एक मिसाल क़रार दिया है। अक्टूबर क्रान्ति की रक्तहीन विजय का श्रेय त्रात्स्की को दिया गया है, क्योंकि पेत्रोग्राद की ग़ैरीसन को जीतने में उनकी महती भूमिका थी। लेकिन बाद में कार जोड़ते हैं कि इन सबके बावजूद अक्टूबर क्रान्ति की विजय मूलत: लेनिन और बोल्शेविक पार्टी की विजय थी। अप्रैल के बाद हर घटना ने लेनिन को सही साबित किया था और उनकी निर्णायकता के कारण ही पार्टी सशस्त्र विद्रोह के निर्णय पर पहुँची थी। इसमें कोई दो राय नहीं है कि पेत्रोग्राद में सशस्त्र विद्रोह को संगठित करने में त्रात्स्की की महत्वपूर्ण भूमिका था। लेकिन ई.एच. कार निश्चित तौर पर इसे बढा-चढ़ाकर पेश करते हैं। एलेक्ज़ैण्डर रैबिनोविच भी मानते हैं कि अक्टूबर विद्रोह को संगठित करने में त्रात्स्की की अहम भूमिका थी। लेकिन साथ ही रैबिनोविच ने यह भी स्वीकार किया है कि 24 अक्टूबर की रात को लेनिन के स्मोल्नी पहुँचने से पहले क्रान्तिकारी सैन्य समिति में, जिसमें त्रात्स्की की अहम भूमिका थी, इस बात को लेकर बेचैनी थी कि कहीं पार्टी कुछ ज़्यादा ही लम्बी दूरी कुछ ज़्यादा ही कम समय में तो नहीं तय कर रही है। उनमें इस बात का रुझान था कि द्वितीय अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस के शुरू होने तक इन्तज़ार किया जाये। ‘बोल्शेविक पार्टी के इतिहास’ में बताया गया है कि अक्टूबर क्रान्ति के पहले की आख़िरी अहम केन्द्रीय कमेटी बैठक में त्रात्स्की आम बग़ावत को द्वितीय अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस तक टालना चाहते थे, जबकि लेनिन इसके सख्त ख़ि‍लाफ़ थे। अन्तत: बहुमत ने लेनिन का साथ दिया था। रैबिनोविच दावा करते हैं त्रात्स्की ने आम बग़ावत को द्वितीय अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस तक टालने का प्रस्ताव नहीं रखा था। लेकिन अगर हम त्रात्स्की की पुस्तक ‘अक्टूबर के सबक़’ (1924) के प्रकाशित होने के बाद बोल्शेविक पार्टी में शुरू हुई बहस और उसके बाद प्रकाशित हुए एक सिम्पोजि़यम में जि़नोवियेव, कामेनेव और स्तालिन के जवाबों पर निगाह डालें तो स्पष्ट हो जाता है कि त्रात्स्की का वास्तव में ऐसा प्रस्ताव था और वह यहाँ तक सिद्ध करने का प्रयास करते हैं कि 24 अक्टूबर तक इन्तज़ार करने से ही आम बग़ावत सफल हो पायी। इसके अलावा, त्रात्स्की अपनी उन सारी पुरानी बातों को सही सिद्ध करने का प्रयास करते हैं जो कि उन्होंने बोल्शेविक पार्टी में शामिल होने से पहले कहीं थीं। मिसाल के तौर पर, वे अपने ‘स्थायी क्रान्ति’ के सिद्धान्त को भी पीछे के दरवाज़े से वापस लाने का प्रयास करते हैं। लेकिन रैबिनोविच से लेकर तमाम अन्य संशोधनवादी इतिहासकार मई 1925 में प्रकाशित इस सिम्पोजि़यम (दि एरर्स ऑफ़ ट्रॉट्स्कीज़्म : ए सिम्पोजि़यम) का कोई सन्दर्भ नहीं देते। इसका कारण यह है कि वे इसे यह कहकर ख़ारिज़ नहीं कर सकते कि यह स्तालिनवादी इतिहासकारों द्वारा किया गया इतिहास का विकृतिकरण है। कारण यह है कि इसमें त्रात्स्की के दावों का खण्डन करने वालों में बुखारिन, जि़नोवियेव, कामेनेव, क्रुप्सकाया, सोकोलनिकोव जैसे लोग शामिल थे। यह कहना कि 1925 ये सभी स्तालिनवादी हो गये थे और झूठ बोल रहे थे, किसी उदार बुर्जुआ इतिहासकार के लिए भी मुश्किल होगा। हम पाठकों को इस सिम्पोजि़यम को सन्दर्भित करने की विशेष तौर पर सलाह देंगे। इस सिम्पोजि़यम को ‘कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ ग्रेट ब्रिटेन’ ने प्रकाशित किया था। हम आगे के अध्यायों में इस सिम्पोजि़यम में पेश विचारों का भी विवेचन करेंगे। वास्तव में त्रात्स्की ने बाद में ख़ुद इस बात को माना था कि आम बग़ावत को द्वितीय सोवियत कांग्रेस तक विलम्बित करने का उनका विचार था। चूँकि व्यवहारत: आम बग़ावत इस कांग्रेस के ठीक पहले आधी रात को शुरू हुई, इसलिए त्रात्स्की यह सिद्ध करने की कोशिश करते हैं यह उन्हीं की राय के कारण हुआ और इससे फ़ायदा हुआ। वह दावा करते हैं कि अगर लेनिन की सलाह मानकर विद्रोह पहले शुरू किया गया होता या फिर पेत्रोग्राद में न शुरू करके मॉस्को में शुरू किया गया होता तो उसमें हार भी मिल सकती थी। यह इतिहास का त्रात्स्की द्वारा मिथकीकरण है क्योंकि लेनिन का यह आग्रह नहीं था कि मॉस्को से बग़ावत शुरू की जाये। लेनिन इसे पूर्ण रूप से रणकौशलात्मक मसला मानते थे और इसे उन्होंने स्थानीय संगठनकर्ताओं और उन नेताओं के ऊपर छोड़ा था जो लगातार ठोस परिस्थितियों से प्रत्यक्ष सम्पर्क में थे। उनका कहना था कि जहाँ भी शुरुआत जल्दी और निर्णायक रूप से की जा सके वहाँ से शुरुआत की जा सकती है, चाहे वह जगह पेत्रोग्राद हो या मॉस्को। मूल बात यह है कि विद्रोह की शुरुआत सोवियत कांग्रेस से पहले होनी चाहिए। रैबिनोविच भी इस बात को स्वीकार करते हैं। जो भी हो, यह स्पष्ट है कि त्रात्स्की का मूल प्रस्ताव सोवियत कांग्रेस तक इन्तज़ार करने का था, जिसे स्वीकार नहीं किया गया और कांग्रेस के पहले ही सत्ता पर क़ब्ज़ा कर लिया गया।

लेकिन यहाँ यह जि़क्र करना भी ज़रूरी है कि अक्टूबर में आम बग़ावत के समय तमाम सैन्य दस्तों, विशेषकर पेत्रोग्राद ग़ैरीसन और पीटर एण्ड पॉल किले की टुकड़ी को आम बग़ावत और पार्टी के पक्ष में लाने में त्रात्स्की की अहम भूमिका थी। यह भी सच है कि ‘बोल्शेविक पार्टी का इतिहास’ में इस भूमिका का कहीं जि़क्र नहीं आता है। इस रूप में, सोवियत संघ में विशेष तौर पर 1935-36 के बाद लिखे गये ऐतिहासिक विवरणों में त्रात्स्की की भूमिका को नज़रन्दाज़ किया गया है। यह कहना कि इसके लिए व्यक्तिगत तौर पर स्तालिन जि़म्मेदार थे, सही नहीं होगा क्योंकि इस बात के पर्याप्त प्रमाण मौजूद नहीं हैं। लेकिन पार्टी के भीतर मज़बूत हो रही नौकरशाहाना बुर्जुआ प्रवृत्तियाँ निश्चित तौर पर इसका कारक थीं, जो कि स्तालिन के नाम पर कला, साहित्य, संस्कृति, फिल्म से लेकर अकादमिक जगत तक में एक प्रकार का नौकरशाहाना नियन्त्रण स्थापित कर रही थीं और अपनी फ़रमानशाही को स्तालिन के नाम का प्राधिकार इस्तेमाल करके थोप रही थीं। और बहुत से सांस्कृतिक, अकादमिक कार्य इसी नौकरशाही के संचालन में हो रहे थे।

‘बोल्शेविक पार्टी का इतिहास’ में आम बग़ावत में त्रात्स्की की भूमिका की चर्चा न मिलने का एक कारण यह भी हो सकता है कि तब तक त्रात्स्की की सोवियत संघ-विरोधी भूमिका, साम्राज्यवादियों से उनके रिश्ते और सोवियत संघ में पार्टी के विरुद्ध विद्रोह के उनके षड्यन्त्र काफ़ी हद तक सामने आ चुके थे। साथ ही, 1936 के मुक़दमों में कई ऐसे तथ्य सामने आये थे, जिन्होंने त्रात्स्की और कई भूतपूर्व बोल्शेविक नेताओं को कठघरे में खड़ा कर दिया था। लेकिन अगर इन सारे कारकों को ध्यान में रखा जाये तो भी कम्युनिस्ट पार्टी आधिकारिक तौर पर जो इतिहास-लेखन करेगी उसे वस्तुपरक होना चाहिए, चयनात्मक नहीं। साथ ही, व्यक्तियों के विकास के विषय में उनकी समझदारी द्वन्द्वात्मक होनी चाहिए न कि अनैतिहासिक। मसलन, किसी प्रतिक्रान्तिकारी बन गये व्यक्ति का भी ऐसा अतीत हो सकता है, जिसमें उसने क्रान्ति के लिए योगदान किये हों। ऐसे में, उस व्यक्ति के राजनीतिक पतन को ऐतिहासिक और द्वन्द्वात्मक तौर पर पेश किया जाना चाहिए न कि उसके नैसर्गिक गुण के रूप में। मिसाल के तौर पर, ‘बोल्शेविक पार्टी का इतिहास’ में यह दावा करना कि त्रात्स्की बोल्शेविक पार्टी में योजनाबद्ध तरीक़े से उसे विघटित करने और नुक़सान पहुँचाने के लिए शामिल हुए थे, ऐतिहासिक तौर पर सही नहीं ठहरता है। ऐतिहासिक लेखन की यह कमी हम 1930 के दशक के सोवियत संघ के आधिकारिक इतिहास लेखन में देख सकते हैं। हालाँकि, 1920 के पूरे दशक के बारे में यह बात नहीं कही जा सकती है। चीनी पार्टी के इतिहास-लेखन में यह चीज़ और भी ज़्यादा प्रत्यक्ष रूप में दिखलायी पड़ती है। यह सच है कि इन दोनों पार्टियों ने बेहद तीखे वर्ग संघर्ष के दौर में समाजवादी प्रयोगों का संचालन किया और इस वजह से भी बहुत सी विकृतियाँ इन प्रयोगों के दौरान पैदा हुईं, विशेषकर कला, साहित्य, संस्कृ‍ति, इतिहास-लेखन आदि के क्षेत्रों में। लेकिन आज खड़े होकर पीछे मुड़कर देखा जाये तो इस प्रकार के इतिहास-लेखन से सर्वहारा वर्ग को तत्कालीन वर्ग संघर्ष में कोई टिकाऊ बढ़त मिल गयी हो, यह नहीं कहा जा सकता है। यह ज़रूर कहा जा सकता है कि ऐतिहासिक तौर पर इस प्रकार के इतिहास-लेखन ने एक नकारात्मक कारक की ही भूमिका निभायी। लेकिन सम्भवत: यह बात हम आज सिंहावलोकन करते हुए ही कह सकते हैं और उस समय अस्तित्व का संकट झेल रही या फिर तीखे आन्तरिक और बाह्य वर्ग संघर्ष में संलग्न समाजवादी सत्ताओं का संचालन करने वाली कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए उसी समय इस बात को समझ लेना शायद इतना आसान नहीं था।

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इसमें कोई दो राय नहीं है कि बोल्शेविक क्रान्ति ने मानव इतिहास में एक नये युग का सूत्रपात किया। क्रान्ति का नेतृत्व बोल्शेविक पार्टी के निर्देशन में पेत्रोग्राद सोवियत और उसकी क्रान्तिकारी सैन्य समिति ने किया था। जैसा कि बाद में कई बोल्शेविक नेताओं ने कहा था बोल्शेविक पार्टी के नेतृत्व में मज़दूर वर्ग ने आम विद्रोह के ज़रिये सत्ता हासिल करके उसे द्वितीय अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस को सौंपा था। पेत्रोग्राद के मज़दूरों और सैनिकों ने पार्टी के नेतृत्व में क्रान्ति सम्पन्न की थी। जैसा कि बेतेलहाइम ने कहा था, यह कोई दीर्घकालिक युद्ध नहीं था, न ही यह कोई षड्यन्त्र या साधारण विद्रोह था, बल्कि यह एक सुनियोजित आम बग़ावत (armed insurrection) थी। इसमें अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस की कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं थी और पेत्रोग्राद सोवियत की भूमिका भी ठीक इसीलिए थी क्योंकि उसमें बोल्शेविक सितम्बर में बहुमत में आ गये थे। अक्टूबर का पूरा घटनाक्रम बेहद रोमांचक और दिलचस्प था। हम इस पूरे घटनाक्रम का विस्तार से वर्णन नहीं कर पाये हैं क्योंकि इसके लिए आप तमाम पुस्तकों को सन्दर्भित कर सकते हैं। त्रात्स्की के प्रति हमदर्दी रखने के बावजूद ई. एच. कार और उदार बुर्जुआ पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होने के बावजूद अलेक्ज़ैण्डर रैबिनोविच द्वारा लिखित इतिहास अक्टूबर में बोल्शेविकों द्वारा सत्ता क़ब्ज़ा करने की प्रक्रिया का जीवन्त चित्र पेश करता है। साथ ही अभी भी जॉन रीड की पुस्तक ‘‍दस दिन जब दुनिया हिल उठी’ को क्रान्ति की पूरी प्रक्रिया का चित्रण करने वाली सबसे अच्छी रचनाओं में से एक माना जाना चाहिए। इसके अलावा, तमाम बोल्शेविकों द्वारा लिखे गये संस्मरण भी इस दौर के घटनाक्रम पर अलग-अलग कोणों से प्रकाश डालते हैं। इस पूरी प्रक्रिया को दुबारा लिखने का कोई अर्थ नहीं था। इसलिए हमने केवल विवादास्पद मुद्दों पर प्रमुख इतिहासकारों के प्रेक्षणों पर आलोचनात्मक टिप्पणियाँ करने या उन घटनाओं का अपना विश्लेषण पेश करने तक ख़ुद को सीमित रखा है, जिनकी व्याख्या पेश करना हमें समकालीन चिन्ताओं के कारण उपयोगी लगा।

सही मायनों में अक्टूबर क्रान्ति बोल्शेविक पार्टी और लेनिन की युगान्तरकारी जीत थी। ‘मार्क्सिस्ट इण्टलेक्शन’ जैसे अराजकतावादी-संघाधिपत्यवादी ही इसके युगान्तरकारी महत्व को नहीं समझ पाते और दावा करते हैं कि अतीत की सभी क्रान्तियों की तरह अक्टूबर क्रान्ति में भी एक छोटे-से गुट ने सत्ता पर जनता के नाम पर क़ब्ज़ा किया और फिर उसे हथिया लिया। ईमानदार बुर्जुआ इतिहासकार भी अक्टूबर क्रान्ति को एक युगान्तरकारी घटना मानते हैं, हालाँकि उनकी अपनी आलोचनाएँ हैं, जिन पर हम अभी तक टिप्पणी करते आये हैं और आगे भी उनका आलोचनात्मक मूल्यांकन जारी रखेंगे। सुजीत दास और उनके जैसे तमाम अराजकतावादी-संघाधिपत्यवादी, जिन्हें अपनी नैसर्गिक टटपुँजिया भावना से पार्टी और पार्टी अनुशासन जैसे शब्दों से एलर्जी होती है, जनवाद की बुर्जुआ अवधारणाओं से प्रेरित होते हैं। उनके लिए यह समझना मुश्किल है कि सोवियत राज्यसत्ता एक राज्यसत्ता थी और इस तौर पर वह दमन का एक उपकरण ही थी। लेकिन ‘किसके द्वारा किसका दमन’ इस प्रश्न को ही भूल जाना वर्ग विश्लेषण और मार्क्सवादी विश्लेषण का ‘क ख ग’ भूलने के समान है। बोल्शेविक क्रान्ति ने इतिहास में पहली बार एक ऐसी राज्यसत्ता को जन्म दिया जिसकी चारित्रिक अभिलाक्षणिकता थी, शोषकों की अल्पसंख्या पर शोषितों की बहुसंख्या का अधिनायकत्व। इस अधिनायकत्व के विषय में भी एक मार्क्सवादी-लेनिनवादी की सोच वास्तविक, मूर्त और ऐतिहासिक होनी चाहिए, न कि आदर्श, अमूर्त और अनैतिहासिक।

अक्टूबर क्रान्ति ने सत्ता मज़दूर वर्ग के हाथों में सौंपी। लेकिन यह बोल्शेविक पार्टी और रूसी मज़दूर वर्ग के समक्ष मौजूद चुनौतियों की समाप्ति नहीं था, बल्कि और भी ज़्यादा विशाल चुनौतियों की शुरुआत था। आने वाले चार वर्ष बोल्शेविक सोवियत सत्ता के लिए अस्तित्व के संकट के वर्ष थे, जब देश के भीतर प्रतिक्रियावादी प्रतिक्रान्तिकारियों ने सोवियत सत्ता के ख़ि‍लाफ़ बग़ावत शुरू कर दी थी और साथ ही चौदह साम्राज्यवादी देशों ने सोवियत रूस की घेराबन्दी और घुसपैठ शुरू कर दी थी। 1921 तक बोल्शेविक सत्ता को समाजवादी रूपान्तरण के कार्य को सुचारू और स्वस्थ रूप से चलाने का कभी अवसर ही नहीं प्राप्त हुआ। पहले क़रीब आठ माह तो सोवियत सत्ता के सुदृढ़ीकरण और सुदूरवर्ती प्रान्तों में बोल्शेविक क्रान्ति के फैलने में लगे। इस दौर में, सोवियत सत्ता बुर्जुआ क्रान्ति के अधूरे कार्यभारों को पूरा करती रही और साथ ही ‘समाजवाद की ओर आरम्भिक क़दम’ उठाने की शुरुआत मात्र कर पायी। इसी दौरान गृहयुद्ध की शुरुआत हो गयी। गृहयुद्ध के दौरान पार्टी को तमाम आपात क़दम उठाने पड़े। इस दौर की नीतियों को ‘युद्ध कम्युनिज़्म’ की नीतियों के रूप में जाना जाता है। इन नीतियों ने जहाँ सोवियत सत्ता को अपना अस्तित्व बचाने में सक्षम बनाया वहीं समाजवादी रूपान्तरण के कार्यों में तमाम विकृतियाँ भी पैदा कर दीं। इसी दौर में पार्टी के भीतर भी कई महत्वपूर्ण विचारधारात्मक और राजनीतिक बहसें शुरू हो गयीं, जिन बहसों को जानना-समझना वास्तव में मार्क्सवाद-लेनिनवाद के बुनियादी उसूलों में एक कोर्स करने के समान है। इस पूरे दौर पर हम सातवें अध्याय में विस्तार से लिखेंगे और उसकी रोशनी में मौजूदा राजनीतिक बहसों का भी विवेचन करेंगे। लेकिन सबसे पहले हमें बोल्शेविक क्रान्ति के चरित्र, सोवियत सत्ता के पहले आठ माह और सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व की व्यवस्था के निर्माण और उसके सुदृ‍ढ़ीकरण की प्रक्रिया को देखना होगा। अगले यानी छठे अध्याय में हम पहले आठ महीनों में हुए इन परिवर्तनों का विवेचन करेंगे।

(अगले अंक में इस अध्याय का परिशिष्ट प्रकाशित होगा : ‘अलेक्ज़ैण्डर रैबिनोविच का इतिहास-लेखन: अन्तर्दृष्टि की दृष्टिहीनता’)

 

दिशा सन्धान – अंक 4  (जनवरी-मार्च 2017) में प्रकाशित

उन समझदारों के लिए सबक जो हमेशा हाशिये पर पड़े रहना चाहते हैं

हाशिये पर खड़े लोगों के अपने दुःख होते हैं तो अपने सुख भी होते हैं। सवाल देखने के नज़रिये और ज़ोर का होता है। हाल ही में, हाशिये पर खड़े वामपन्थी आन्दोलन से लम्बे समय से जुड़े रहे एक बुद्धिजीवी रवि सिन्हा ने हाशिये पर खड़े अपने अन्य बिरादरों के लिए भारत में साम्प्रदायिक फ़ासीवाद के उभार के बरक्स कुछ सबक पेश किये हैं। लेकिन इन सबकों को पढ़ने के बाद ऐसा लगता है कि ये सबक हमेशा हाशिये पर ही कैसे खड़े रहें, इसका ‘यूज़र मैनुअल’ है। यूँ भी कह सकते हैं कि यह आज के सबसे ज़रूरी कार्यभारों को अनिश्चितकाल तक के लिए स्थगित कर देने का प्रस्ताव है। read more

सोवियत संघ में समाजवादी प्रयोगों के अनुभवः इतिहास और सिद्धान्त की समस्याएँ (तीसरी किस्त)

अलग-अलग दौरों में बेतेलहाइम ने सोवियत संघ के समाजवादी प्रयोग पर जो रचनाएँ लिखी हैं, उन पर अलग-अलग किस्म के विजातीय प्रभाव स्पष्ट तौर पर देखे जा सकते हैं। त्रात्स्कीपन्थ, ख्रुश्चेवी संशोधनवाद, अल्थूसरवादी उत्तर-संरचनावाद, अराजकतावादी-संघाधिपत्यवाद, कीन्सीय “मार्क्सवाद”, बुखारिनपन्थ और साथ ही उनके उत्तरवर्ती दौर की रचनाओं पर एक प्रकार के छद्म-माओवाद का प्रभाव देखा जा सकता है। लेकिन अगर चार्ल्स बेतेलहाइम के पूरे अप्रोच और उनकी पद्धति पर सम्पूर्णता में किसी चीज़ का असर है तो वह है हेगेलीय भाववाद, अधिभूतवाद, यान्त्रिकतावाद और मनोगतवाद का। दार्शनिक धरातल पर बेतेलहाइम पर भाववाद और अधिभूतवाद के असर के कारण ही उन्हें 1930 के दशक के उत्तरार्द्ध से लेकर 1980 के दशक तक कभी हम त्रात्स्कीपन्थ, ख्रुश्चेवी संशोधनवाद और कीन्सीय “मार्क्सवाद” के छोर पर खड़ा देख सकते हैं तो कभी बुखारिनपन्थ और छद्म-माओवाद के छोर पर। read more

भारत में पूँजीवादी कृषि का विकास और मौजूदा अर्द्ध-सामन्ती सैद्धान्तिकीकरण की भ्रान्ति के बौद्धिक मूल

अगर भारतीय मार्क्‍सवादी-लेनिनवादी आन्‍दोलन को प्रगति करनी है तो उसे अर्द्धसामन्‍ती अर्द्ध-औपनिवेशिक सैद्धान्तिकीकरण की बेडि़यों को तोड़ना होगा। हमारे विचार में अधिकांश माले पार्टियों और बुद्धिजीवियों को अर्द्ध-सामन्‍ती अर्द्ध-औपनिवेशिक सैद्धान्तिकीकरणों की वर्तमान भारतीय परिस्थिति और साथ ही भारतीय इतिहास पर भी इसकी प्रयोज्यता पर दोबारा सोचने की जरूरत है। कार्यक्रम के सवाल को विचारधारा के सवाल में नहीं बदल दिया जाना चाहिए, जैसा कि भारत में कठमुल्लावादी वाम ने किया है। अगर कोई पूँजीवादी विकास या समाजवादी क्रान्ति की मंजिल की बात करता है तो उन्हें अक्सर त्रात्स्कीपन्‍थी कह दिया जाता है क्योंकि यह लगभग एक आकाशवाणी या स्वयंसिद्ध तथ्य जैसा बन चुका है कि ऐसा कहना ही लेनिन के दो चरणों में क्रान्ति के सिद्धान्‍त को खारिज करने के समान है! यह एक विडम्बना की, बल्कि त्रासदी की, स्थिति है, जिससे जितनी जल्दी हो सके छुटकारा पा लिया जाना चाहिए। read more

सोवियत संघ में समाजवादी प्रयोगों के अनुभवः इतिहास और सिद्धान्त की समस्याएँ (दूसरी किस्त)

पार्टी निर्माण और गठन के पहले नरोदवाद, ‘‘कानूनी’’ मार्क्‍सवाद और अर्थवाद से चले संघर्ष और पार्टी गठन के बाद मेंशेविकों और त्रात्स्कीपन्थियों से चले संघर्ष वे प्रमुख राजनीतिक संघर्ष थे, जिन्होंने एक ओर शुरुआती दौर में रूस में क्रान्तिकारी सामाजिक-जनवादी आन्‍दोलन के आकार और आकृति को निर्धारित किया, वहीं पार्टी गठन के बाद पार्टी के निर्माण की पूरी प्रक्रिया को निर्धारित किया। इस पूरे संघर्ष में लेनिन की भूमिका कम-से-कम 1898-99 से निर्धारक की बन चुकी थी। लेकिन यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि करीब दो से ढाई दशक तक चले इस राजनीतिक संघर्ष को महज लेनिन के योगदानों की श्रृंखला के तौर देखा जा सकता है। लेनिन के नेतृत्व में समूचे बोल्शेविक नेतृत्व ने यह संघर्ष चलाया। निश्चित तौर पर, कई मौकों पर इस नेतृत्व में लेनिन स्वयं अकेले पड़ जाते थे, लेकिन अन्‍ततः यह बोल्शेविक नेताओं की कोर कुल मिलाकर लेनिन की अवस्थिति को अपनाती थी और अन्य विजातीय विचारधारात्मक प्रवृत्तियों से संघर्ष में लेनिन के साथ खड़ी होती थी। कोई भी कम्युनिस्ट एकता इसी प्रकार कार्य करती है। वह किसी भी सूरत में एकाश्मी नहीं हो सकती और द्वन्‍द्वात्मक गति से आगे बढ़ती है। लेनिन की महानता इस पूरे राजनीतिक संघर्ष को अपनी विचारधारात्मक व राजनीतिक समझदारी और नेतृत्व में सही दिशा में आगे ले जाने में निहित थी। read more

स्लावोय ज़िज़ेक की पुस्तक ‘दि इयर ऑफ ड्रीमिंग डेंजरसली’ की आलोचना

ज़िज़ेक का पूरा विश्लेषण एक सट्टेबाज़ मनोवैज्ञानिक-राजनीतिक खेल बन जाता है, जिसका आखि़री मकसद कुछ भी नहीं सिर्फ बौद्धिक विलास है। उनका लेखन आम तौर पर आज के मनोरंजन उद्योग के समान है, जो वास्तव में अनुत्पादक है। ज़िज़ेक के लेखन में आपको लगातार यौनिक और स्कैटोग्राफिकल वक्रोक्तियाँ मिलती हैं। गम्भीर दार्शनिक और राजनीतिक विमर्श की गरिमा को और गम्भीरता को भी ज़िज़ेक देर तक बर्दाश्त नहीं कर पाते और थोड़ी ही देर में ऐसी वक्रोक्तियों के प्रयोग के गड्ढे में गिर पड़ते हैं। यह पाठक को एक ‘कॉमिक रिलीफ’ और एक प्रकार का टिटिलेशन देता है, और इसलिए ऊबने नहीं देता। लेकिन इस क्षणिक सुख के अलावा इसमें समृद्ध करने वाली कोई चीज़ बिरले ही मिलती है। जब कोई उपयोगी बात या अन्तर्दृष्टि मिलती भी है, तो उसमें ज़िज़ेक का कुछ भी मौलिक नहीं होता। यानी, एक तरीके से कहा जा सकता है कि ज़िज़ेक के लेखन में जो कुछ भी काम का है, वह आम तौर पर उनका मौलिक नहीं है, और बाकी जो बचता है वह अक्सर सट्टेबाज़ बहेतू दर्शन का कचरा होता है। read more

सोवियत संघ में समाजवादी प्रयोगों के अनुभवः इतिहास और सिद्धान्त की समस्याएँ (पहली किस्त)

सोवियत समाजवादी प्रयोगों की नये सिरे से व्याख्या क्यों? बहुत से समकालीन विचारक, जैसे कि नववामपन्थी व उत्तर-मार्क्सवादी चिन्तक, सोवियत समाजवाद को इतिहास को हमेशा के लिए बन्द हो चुका अध्याय मानते हैं; कुछ अन्य सोवियत समाजवाद को एक दुर्गति/विपदा में समाप्त हुए प्रयोग के रूप में ख़ारिज कर देते हैं और 21वीं सदी में नये किस्म के समाजवाद/कम्युनिज़्म की बात कर रहे हैं। उनका मानना है कि सोवियत संघ के समाजवाद का ज़िक्र भर करने से नयी सदी की कम्युनिस्ट परियोजनाएँ दूषित हो जायेंगी! ऐसे सट्टेबाज़, नववामपन्थी और उत्तर-मार्क्सवादी विचारकों व दार्शनिकों को छोड़ भी दिया जाय, तो मज़दूर आन्दोलन और कम्युनिस्ट आन्दोलन के भीतर ही ऐसी प्रवृत्तियाँ मौजूद हैं, जो सोवियत समाजवाद के आलोचनात्मक विवेचन की ज़रूरत को नहीं मानती हैं, या फिर इसे एक हल हो चुका प्रश्न मानती हैं। जो सोवियत समाजवाद के प्रयोगों के विश्लेषण को एक हल हो चुका प्रश्न मानते हैं, उनमें दो किस्म के लोग हैं। read more