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नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती दशक : एक सिंहावलोकन (तीसरी किस्त)

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती दशक : एक सिंहावलोकन (तीसरी किस्त)

  • दीपायन बोस

निबन्ध के पहले भाग में हमने भारत में कम्युनिस्ट आन्दोलन के इतिहास और पार्टी के संशोधनवादी विपथगमन की संक्षिप्त पृष्ठभूमि के साथ नक्सलबाड़ी किसान-उभार, ‘कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों की अखिल भारतीय तालमेल कमेटी’ के गठन, कमेटी के जीवनकाल के दौरान क्रान्तिकारी जनदिशा की हर पहुँच, सोच और लाइन को नौकरशाहाना ढंग से ठिकाने लगाकर ”वाम” दुस्साहसवादी लाइन के उत्तरोत्तर मज़बूत होते जाने की प्रक्रिया और फिर मुख्यतः इसी लाइन पर मई 1970 में आठवीं कांग्रेस के आयोजन तथा भाकपा (मा-ले) के गठन तक की चर्चा की थी। दूसरे हिस्से में श्रीकाकुलम में ”वाम” दुस्साहसवादी लाइन की विफलता के उल्लेख के साथ इन अल्पज्ञात तथ्यों की चर्चा की गयी थी कि नक्सलबाड़ी के क्रान्तिकारी उभार ने देश के छात्रों-युवाओं के साथ ही औद्योगिक मज़दूर वर्ग को भी कितनी गहराई से प्रभावित किया था लेकिन चारु मजुमदार और पार्टी नेतृत्व के मुख्य हिस्से द्वारा क्रान्तिकारी जनदिशा के पूर्ण निषेध के कारण पार्टी इस ऐतिहासिक अवसर का कोई लाभ नहीं उठा सकी।

अब निबन्ध के प्रस्तुत हिस्से में हम उन परिस्थितियों और घटना-क्रम की चर्चा करेंगे जो पार्टी-कांग्रेस के बाद पार्टी के भीतर उत्पन्न और गतिमान हुई थीं। कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों के बीच एकता के साथ ही फूट का जो सिलसिला तालमेल कमेटी के कार्यकाल में ही शुरू हो गया था, वह कांग्रेस के बाद भी बदस्तूर जारी रहा।

कांग्रेस के बाद : सत्यनारायण सिंह से मतभेद, पार्टी में पहली फूट और फिर बिखराव के सिलसिले की शुरुआत

पार्टी की स्थापना कांग्रेस के ठीक बाद केन्द्रीय कमेटी की जो पहली बैठक हुई, वह अन्तिम बैठक सिद्ध हुई। केन्द्रीय कमेटी ने एक ग्यारह सदस्यीय पोलित ब्यूरो का गठन किया जिसके नौ सदस्य थे : चारु मजुमदार, सुशीतल राय चौधुरी, शिव कुमार मिश्र, कानू सान्याल, सरोज दत्त, सत्यनारायण सिंह, रामप्यारे सर्राफ़, एल. अप्पू और सौरेन बसु। दो स्थान रिक्त रखे गये। इसके अतिरिक्त चार ज़ोनल ब्यूरो बनाये गये : दक्षिण, उत्तर-पश्चिम, उत्तर-केन्द्रीय और उत्तर-पूर्व क्षेत्रों के ब्यूरो। सरोज़ दत्त और सुनीति कुमार घोष को पार्टी-मुखपत्रों का प्रभारी बनाया गया। इन ज़ोनल ब्यूरो की भी आगे कोई बैठक नहीं हुई। कांग्रेस और केन्द्रीय कमेटी की बैठक में चारु मजुमदार को ‘क्रान्तिकारी प्राधिकार’ मानने का प्रस्ताव ख़ारिज़ हो चुका था और यह तय हुआ था कि चारु मजुमदार केन्द्रीय कमेटी के अन्य सदस्यों के राय-मशविरे से काम करेंगे, लेकिन व्यवहारतः चारु मजुमदार ने अधिकांश फ़ैसले अकेले अपनी मर्ज़ी से ही लिये। इनमें ‘जन मुक्ति सेना’ के गठन की घोषणा जैसा अहम फ़ैसला भी शामिल था। सुशीतल राय चौधुरी जैसे जो पोलित ब्यूरो सदस्य राय-मशविरे के लिए उपलब्ध होते थे, उनसे भी वे कोई विचार-विमर्श नहीं करते थे। इस तरह, व्यवहारतः चारु ने कांग्रेस के बाद ‘क्रान्तिकारी प्राधिकार’ जैसा ही आचरण किया, बल्कि उससे भी कहीं आगे एकछत्र नेतृत्व जैसा व्यवहार किया। पार्टी कांग्रेस के पहले की बची-खुची जनवादी कार्यप्रणाली भी कांग्रेस के बाद समाप्त हो गयी।

 पार्टी कांग्रेस के ठीक चार महीने बाद सितम्बर 1970 में बिहार राज्य कमेटी ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसका शीर्षक था : ‘नया उभार और वामपन्थी अवसरवाद के विरुद्ध संघर्ष।’ इसके पहले, कांग्रेस के ठीक बाद, सत्यनारायण सिंह ने चारु मजुमदार को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने चारु से कांग्रेस में सर्वसम्मति से पारित ‘राजनीतिक-सांगठनिक रिपोर्ट’ और उस पर दिये गये चारु के भाषण से वह अंश निकाल देने के लिए कहा था जिसमें यह उल्लेख था कि कम्बोडिया पर अमेरिकी आक्रमण तीसरे विश्वयुद्ध की शुरुआत है। सत्यनारायण सिंह का तर्क था कि चूँकि रिपोर्ट और भाषण अभी प्रकाशित नहीं हुए हैं, अतः उक्त अंशों को निकाल देने से ये दस्तावेज़ माओ त्से-तुंग के 20 मई 1970 के उस वक्तव्य के अनुरूप हो जायेेंगे, जिसमें उन्होंने कहा था : ”एक नये विश्वयुद्ध का ख़तरा अभी भी मौजूद है, और सभी देशों के जन समुदाय को इसके लिए तैयार होना चाहिए, लेकिन क्रान्ति ही आज की दुनिया की मुख्य प्रवृत्ति है।” हालाँकि आठवीं कांग्रेस की रिपोर्ट में प्रस्तुत आकलन ग़लत था, लेकिन किसी कांग्रेस के पारित दस्तावेज़ों को किसी व्यक्ति, या केन्द्रीय कमेटी द्वार भी, मनमाने ढंग से बदला नहीं जा सकता। यह जनवादी कार्यप्रणाली का निपट निषेध होता। सत्यनारायण सिंह का सुझाव अपने आप में उनकी अनौपचारिकतावादी, ग़ैरजनवादी, अवसरवादी कार्यपद्धति का परिचायक था। चारु मजुमदार ने उनके इस सुझाव को स्वीकार नहीं किया। यहाँ, राजनीति ग़लत होते हुए भी वे सही कार्य-प्रणाली के पक्ष में खड़े थे।

बिहार राज्य कमेटी द्वारा पारित प्रस्ताव वाम अवसरवाद का विरोध करते हुए, वस्तुतः स्वयं वाम अवसरवादी भटकाव से मुक्त नहीं था। इसमें चारु मजुमदार की प्रशंसा के पुल बाँधते हुए ”शत्रुवध को… वर्ग संघर्ष का उच्चतर रूप और छापामार युद्ध की शुरुआत” बताया गया था और यह दावा किया गया था कि बारह राज्यों में अस्तित्व में आ चुके छापामार इलाक़े लगातार फैलते और मज़बूत होते जा रहे हैं। यह विवरण न सिर्फ़ अत्युक्ति था बल्कि तथ्यों से एकदम परे था। इसमें यह दावा किया गया था कि दुश्मन की घेरेबन्दी और दमन की मुहिम पूर्णतः विफल हो चुकी है और नागी रेड्डी-असित सेन जैसे ”प्रतिक्रिया के भाड़े के टट्टुओं” के सभी विघटनकारी विचारधारात्मक आक्रमण नाकाम हो चुके हैं। पहली बात, श्रीकाकुलम और अन्य जगहों पर राजकीय दमन की धुँआधार मुहिम पार्टी-कांग्रेस के पहले ही छापामार युद्ध के नाम पर जारी शत्रुवध मुहिम को पीछे धकेल चुकी थी। दूसरी बात, सत्यनारायण सिंह अभी भी नागी रेड्डी और असित सेन को ”प्रतिक्रिया का भाड़े का टट्टू” कहने जैसी गालियाँ दे रहे थे, जो लोग निष्कलंक-अकुण्ठ क्रान्तिकारी चरित्र के नेता थे और जिन्होंने साहसपूर्वक, तालमेल कमेटी के दौर में ”वाम” दुस्साहसवादी भटकाव के विरुद्ध संघर्ष किया था। सत्यनारायण सिंह के अवसरवादी चरित्र को समझने के लिए एक घटना का उल्लेख पर्याप्त होगा। पार्टी से अलग होने के बाद वे असित सेन को अपने साथ लेने के लिए उनके घर पहुँच गये थे। तब असित सेन ने उन्हें दुत्कार दिया था। मज़दूरों के सन्दर्भ में बिहार राज्य कमेटी के प्रस्ताव में कहा गया था कि वे आर्थिक संघर्ष की सीमाओं को ज़्यादा से ज़्यादा समझते जा रहे हैं, उन्होंने अब अपनी रोज़मर्रे की समस्याओं, माँगों और मुद्दों के बजाय आत्मसम्मान और स्वाभिमान के मसलों पर संघर्ष की शुरुआत कर दी है, तथा, उनका संघर्ष ज़्यादा से ज़्यादा दीर्घकालिक होता जा रहा है और हिंसक टकरावों में तब्दील होता जा रहा है। कहने की ज़रूरत नहीं कि यह आकलन भी शहरी मज़दूर वर्ग के बीच काम के बारे में और उसके कार्यभारों के बारे में चारु मजुमदार की ”वाम” दुस्साहसवादी लाइन से पूरी तरह मेल खाता है। यही नहीं, चारु मजुमदार के आह्वान के ही सुर में सुर मिलाते हुए प्रस्ताव में यह आह्वान किया गया था कि पार्टी शहरों में जारी सशस्त्र क्रान्तिकारी संघर्षों को गाँवों में जारी संघर्षों से जोड़कर लोक जनवादी क्रान्ति करके 1970 के दशक को साम्राज्यवाद और सामन्तवाद की जकड़ से मुक्ति का दशक बना दे।

तब फिर सहज ही यह सवाल उठता है कि बिहार राज्य कमेटी का प्रस्ताव आख़िरकार किन मुद्दों पर ”वाम” प्रवृत्तियों का विरोध कर रहा था? मुद्दा केवल एक था, और वह था धनी किसानों का सवाल। प्रस्ताव का कहना था कि भूस्वामियों और धनी किसानों के बीच का अन्तर मिटाकर ”वाम” अवसरवाद क्रान्तिकारी मोर्चे का दायरा संकीर्ण बना रहा है और प्रतिक्रान्तिकारी मोर्चे को मज़बूत बना रहा है। केवल वे थोड़े से धनी किसान ही हमारे शत्रु हैं जो सामन्ती प्रवृत्ति के हैं या सामन्ती भूस्वामियों के साथ हैं। सिद्धान्ततः देखें तो नवजनवादी क्रान्ति के चार वर्गों के रणनीतिक संश्रय के हिसाब से यह बात ठीक थी कि धनी किसान भी क्रान्ति के (ढुलमुल) दोस्त होते हैं। लेकिन इस मसले पर पार्टी की आधिकारिक अवस्थिति भी यही थी। समस्या ठोस परिस्थितियों के आकलन की ग़लती से पैदा हो रही थी। 1970 तक पुराने सामन्ती भूस्वामी भी अब लगानजीवी नहीं रह गये थे और बाज़ार के लिए पैदा करने की प्रवृत्ति उनके भीतर भी मज़बूत हो रही थी। दूसरी ओर, पुराने धनी और ख़ुशहाल मध्यम किसानों में से भी धनी मालिक किसानों का वह वर्ग पैदा हो चुका था जो गाँव के ग़रीबों-भूमिहीनों का शोषण-उत्पीड़न करता था और मुनाफ़़े के लिए खेती करता था। इन नये-पुराने भूस्वामियों के बीच प्रायः जातिगत आधार पर टकराव भी होते थे। एक और तथ्य यह था कि पूँजीवादी खेती में अधिक माहिर नये भूस्वामी पुराने भूस्वामियों को पीछे छोड़ते जा रहे थे। पार्टी सामन्ती भूस्वामी और धनी किसान में नवजनवादी क्रान्ति के कार्यक्रम के अनुरूप भेद करने के लिए उत्पादन-सम्बन्धों की जगह इस पारिवारिक इतिहास को मानक बनाती थी कि कौन पहले ज़मींदार था और कौन काश्तकार। एक दूसरा अनुभवसंगत मानक जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न था, क्योंकि सामन्ती पृष्ठभूमि वाले भूस्वामी प्रायः सवर्ण जातियों के थे, जबकि धनी किसान प्रायः मध्यजातियों से आते थे। गाँवों में जहाँ धनी किसान भी भूमिहीनों का उत्पीड़न करते थे, वहाँ उनके ख़िलाफ़ भी ग़रीबों में गहरा आक्रोश था और शत्रुवध को अंजाम देने वाली छापामार टुकड़ियाँ इन्हीं ग़रीबों के बीच संगठित हुई थीं। नतीजतन, छापामार टुकड़ियों की कार्रवाइयों का निशाना धनी किसान भी बनते रहते थे। इस स्थिति के बुनियादी कारण की तलाश उत्पादन-सम्बन्धों में आ रहे बदलावों में करने की जगह सत्यनारायण सिंह ने इसे पार्टी में ”वाम” विचलन के प्रभाव के रूप में देखा। उत्तरवर्ती घटनाक्रम-विकास से ऐसा मानने के पर्याप्त आधार मिलते हैं कि सत्यनारायण सिंह ने इस मसले को अपनी राजनीतिक कैरियरवादी सोच के तहत उठाया था। यही उनका अवसरवाद था जिसके चलते ”वाम” दुस्साहसवाद का धुरन्धर पैरोकार होने की स्थिति से खिसकते हुए और पैंतरापलट करते हुए कालान्तर में वे गम्भीर दक्षिणपन्थी भटकाव की अवस्थिति तक जा पहुँचे।

लेकिन बिहार कमेटी के प्रस्ताव ने कुछ सापेक्षतः सही अवस्थितियाँ भी अपनायी थीं और कुछ विचारणीय मुद्दे भी उठाये थे। भारतीय लोक जनवादी क्रान्ति के असमान और दीर्घकालिक चरित्र को देखते हुए दस्तावेज़ में गाँवों और शहरों में संघर्ष की प्रकृति में भेद न करने की आलोचना की गयी थी और इस बात पर बल दिया गया था कि वर्गयुद्ध की देशव्यापी उच्चतर अवस्था से पहले शहरों में छापामार कार्रवाइयों की प्रकृति प्रतिरक्षात्मक होनी चाहिए। यह वही समय था जब चारु गुट कलकत्ता के छात्र-युवा उभार के दिनों में कलकत्ता को मुक्त क्षेत्र बना देने के नारे देते हुए पुरानी अवस्थिति को छोड़ चुका था। बिहार कमेटी के दस्तावेज़ ने प्रकारान्तर से इस अवस्थिति का विरोध किया। नवजनवादी क्रान्ति की सोच के फ़्रेमवर्क में उसकी अवस्थिति इस मुद्दे पर सापेक्षतः सही थी। बिहार कमेटी के दस्तावेज़ में तत्कालीन समय को चारु मजुमदार द्वारा ‘आत्म-बलिदान का युग’ कहे जाने की भी सही आलोचना की गयी थी और कहा गया था कि ऐसा अलग से कोई युग नहीं होता, संघर्ष के हर दौर में आत्म-बलिदान और आत्म-परिरक्षण – दोनों एक ही चीज़ के दो पहलू होते हैं। सत्यनारायण सिंह के अवसरवादी प्रस्थान-बिन्दु के बावजूद, दस्तावेज़ में, पार्टी में बढ़ती प्राधिकारवादी प्रवृत्ति की और सामूहिक कार्य-प्रणाली के अभाव की सही आलोचना की गयी थी, पर इसके लिए अकेले ‘केन्द्रीय नेतृत्व’ (यानी चारु) को ज़िम्मेदार ठहराया गया था। सत्यनारायण सिंह वास्तव में प्राधिकारवाद और अतिकेन्द्रीयता के कितने ‘जेनुइन’ विरोधी थे, इसे उस घटना से भी समझा जा सकता है, जिसका उल्लेख सौरेन बसु और सुनीति कुमार घोष ने अलग-अलग जगहों पर किया है। कांग्रेस के पहले, फ़रवरी 1970 में सत्यनारायण सिंह जब चारु मजुमदार की बिहार यात्रा का इन्तज़ाम करने कलकत्ता गये थे तो सुनीति कुमार घोष ने चारु मजुमदार को ‘क्रान्तिकारी प्राधिकार’ घोषित करने के पक्ष में सौरेन बसु द्वारा लिखे गये लेख के बारे में उनकी राय पूछी। सत्यनारायण सिंह का कहना था कि यह ठीक है लेकिन लेख की कमी यह है कि ‘क्रान्तिकारी प्राधिकार’ के तौर पर चारु मजुमदार के उत्तराधिकारी के बारे में इसमें कुछ नहीं कहा गया है। ज़ाहिर है कि वे स्वयं को ही उस उत्तराधिकारी के रूप में देखने की आकांक्षा रखते थे। यह भी एक कारण था कि सुनीति कुमार घोष, सौरेन बसु, सरोज़ दत्त और असीम चटर्जी के चारु के निकटवर्ती ”बंगाली गुट” को ”चारु चौकड़ी” कहते हुए वे उसकी निन्दा-भर्त्सना तक करने लगे थे।

अक्टूबर 1970 में कलकत्ता में केन्द्रीय कमेटी के पोलित ब्यूरो की एक बैठक हुई जिसमें बिहार राज्य कमेटी के प्रस्ताव पर विचार किया जाना था। यह पोलित ब्यूरो की पहली और आख़िरी बैठक थी। इसमें ब्यूरो के नौ सदस्यों में से चार सदस्य ही शामिल हो सके। वे थे : चारु मजुमदार, शिव कुमार मिश्र, सत्यनारायण सिंह और सरोज़ दत्त। बैठक में शामिल होने के लिए आते समय ही तमिलनाडु में एक भूस्वामी गिरोह ने अप्पू की हत्या कर दी जिसकी जानकारी नेतृत्व को बाद में मिली। बैठक से पहले ही सत्यनारायण सिंह और शिव कुमार मिश्र की मुलाक़ात संयोगवश हुई और सत्यनारायण सिंह ने शिव कुमार मिश्र को अपना दस्तावेज़ दिखाया। सरसरी तौर पर दस्तावेज़ देखने के बाद शिव कुमार मिश्र ने उन्हें अपने समर्थन का वायदा किया। शिव कुमार मिश्र एक निहायत निश्छल कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी थे। उनकी धारणा बनी कि बिहार कमेटी का दस्तावेज़ ”वाम” भटकाव विरोधी संघर्ष की उसी कड़ी को आगे बढ़ा रहा है, जो सवाल पार्टी कांग्रेस के पहले से ही उत्तर प्रदेश राज्य कमेटी में भी उठ चुके हैं (इनमें शिव कुमार मिश्र से भी आगे की भूमिका श्री नारायण तिवारी और रामनयन उपाध्याय की थी)। बैठक में सत्यनारायण सिंह ने दस्तावेज़ रखते हुए अपना वक्तव्य रखा। फिर शिव कुमार मिश्र ने भी वक्तव्य रखा। चारु और सरोज़ दत्त स्पष्टतः ही इसके विरुद्ध थे। चारु की आकस्मिक अस्वस्थता के कारण बैठक लम्बी नहीं चली। सदस्य भी नौ में से मात्र चार ही उपस्थित थे। अतः फ़ैसला लिया गया कि बिहार कमेटी के दस्तावेज़ को केन्द्रीय कमेटी के समक्ष रखा जायेेगा। लेकिन इसके बाद केन्द्रीय कमेटी की कोई बैठक नहीं बुलायी गयी। बिहार कमेटी के दस्तावेज़ को जनवरी 1971 में आहूत पश्चिम बंगाल राज्य कमेटी की बैठक के समक्ष विचार के लिए रखा गया। इस समय तक सुशीतल राय चौधुरी भी ”वाम” दुस्साहसवादी लाइन के विरुद्ध लेखों की अपनी प्रसिद्ध श्रृंखला की शुरुआत कर चुके थे (इसकी चर्चा निबन्ध में आगे की जायेेगी) और कमेटी की इसी बैठक में उनके एक लेख पर भी बहस होनी थी। बहरहाल, बंगाल राज्य कमेटी ने बिहार कमेटी के प्रस्ताव को संशोधनवादी और प्रतिक्रान्तिकारी बताते हुए ख़ारिज़ कर दिया और केन्द्रीय कमेटी से माँग की कि प्रस्ताव तैयार करने वाले लोगों को पार्टी से निकाल बाहर किया जायेे। इसके पूर्व ही, चारु मजुमदार ‘देशव्रती’ में बिहार प्रस्ताव के विरुद्ध विस्तार से लिख चुके थे। बहरहाल, इसके ठीक बाद, सत्यनारायण सिंह और उनके साथियों को पार्टी से निकाल दिया गया। इसके पूर्व न तो केन्द्रीय कमेटी की कोई बैठक हुई, न ही बाद में कोई बैठक करके इस निर्णय का अनुमोदन कराया गया। चारु और उनके विशेष समर्थकों का एक ‘कॉकस’ इस समय तक वस्तुतः एक ‘डी फ़ैक्टो’ केन्द्रीय कमेटी के रूप में काम करने लगा था। बिहार राज्य कमेटी भंग कर दी गयी और उसकी जगह एक तदर्थ (एडहॉक) कमेटी बैठा दी गयी।

तत्काल जवाबी कार्रवाई करते हुए सत्यनारायण सिंह ने बिहार राज्य कमेटी का पूर्णाधिवेशन (प्लेनम) बुलाया और उसमें ‘भारतीय क्रान्ति की समस्याएँ और नवत्रात्स्कीपन्थी भटकाव’ शीर्षक वाली 110 पृष्ठों की विस्तृत रिपोर्ट पेश की। संक्षेप में, उक्त रिपोर्ट के निष्कर्ष इस प्रकार थे : (1) नवत्रात्स्कीपन्थी चारु चौकड़ी जनवादी, समाजवादी और सांस्कृतिक क्रान्तियों का घालमेल करके सारी क्रान्तियों की सम्भावनाओं को नष्ट कर रही है। (2) वह विश्व परिस्थितियों के माओ के मूल्यांकन को नहीं मानती, जनता की जगह साम्राज्यवाद को निर्णायक शक्ति मानती है तथा क्रान्ति की जगह युद्ध को आज की दुनिया की मुख्य प्रवृत्ति मानती है। (3) वह दीर्घकालिक लोकयुद्ध की रणनीति एवं रणकौशल को स्वीकार नहीं करती, उसकी जगह द्रुत विजय, आम उभार और सर्वत्र खुली मुठभेड़ों की फेरी लगाती है तथा निरुद्देश्य कार्रवाइयों (ऐक्शंस) को बढ़ावा देती है और इस तरह क्रान्ति की विजय को सुनिश्चित मार्ग से भटकाती है। (4) क्रान्ति को नष्ट करने के लिए देहातों में आधार-इलाक़े बनाने की लाइन छोड़कर वह शहरों को गुरुत्वाकर्षण का मुख्य केन्द्र बना रही है। (5) मज़दूरों, किसानों, निम्न बुर्जुआ वर्ग और जनता के अन्य हिस्सों के आर्थिक एवं आंशिक संघर्षों का विरोध करके वह क्रान्ति के जनचरित्र को नष्ट कर रही है। (6) वह मार्क्सवाद में संशोधनवादी तोड़-मरोड़ करके उसे विकृत करना चाहती है जिसके उदाहरण हैं : जनवादी और समाजवादी क्रान्तियों, युद्ध और क्रान्ति तथा सशस्त्र संघर्ष और वर्ग संघर्ष के अन्य रूपों का समन्वय, लोकयुद्ध की रणनीति, रणकौशलों और राजनीतिक संघर्षों के साथ आर्थिक और आंशिक संघर्षों का समन्वय, तथा, पार्टी निर्माण और पार्टी कार्यशैली के बारे में उसकी ग़लत धारणाएँ। (7) यह चारु चौकड़ी माओ विचारधारा की जगह चारु विचारधारा को पार्टी का मार्गदर्शक सिद्धान्त बनाना चाहती है। रिपोर्ट में चारु मजुमदार द्वारा तीसरे महायुद्ध के आरम्भ के आकलन को माओ के आकलन के विपरीत बताते हुए इसकी खिल्ली उड़ायी गयी थी और अन्त में यह नतीजा पेश किया गया था कि चारु चौकड़ी अब भाकपा (मा-ले) का एक हिस्सा नहीं रह गया है, यह पतित होकर प्रतिक्रान्तिकारी वर्गों का अग्रिम दस्ता बन गया है जो भारतीय क्रान्ति, पार्टी और विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन के नेतृत्व को क्षति पहुँचाने की जीतोड़ कोशिशें कर रहा है। इस प्लेनम में फूट की प्रक्रिया मुक़म्मिल हो गयी और सत्यनारायण सिंह ग्रुप एक समान्तर पार्टी-केन्द्र के रूप में काम करने लगा।

बिहार राज्य कमेटी के पूर्णाधिवेशन के समय तक शिव कुमार मिश्र गिरफ़्तार किये जा चुके थे। पार्टी के पोलित ब्यूरो की बैठक में उन्होंने बिहार कमेटी के प्रस्ताव का समर्थन किया था। वे ”वामपन्थी” भटकाव को एक गम्भीर रणकौशलात्मक ग़लती मानते थे लेकिन चारु मजुमदार के नेतृत्व में उनकी अगाध आस्था थी (जो जीवनपर्यन्त बनी रही) और उन्हें पूरा विश्वास था कि चारु इस भटकाव को समय रहते ठीक कर लेंगे। पूर्णाधिवेशन में प्रस्तुत सत्यनारायण सिंह का दस्तावेज़ ‘भारतीय क्रान्ति की समस्याएँ और नवत्रात्स्कीपन्थी भटकाव’ उन्हें जेल में मिला। दस्तावेज़ से उनकी सख़्त असहमति थी। वे चारु के ऊपर त्रात्स्कीपन्थी का ठप्पा लगाने के सख़्त विरोधी थे। उनकी यह धारणा बनी कि सत्यनारायण सिंह की मंशा शुरू से ही चारु को किनारे लगाने की थी और यहाँ तक कि उत्तर प्रदेश कमेटी के कुछ साथी भी ऐसा ही चाहते थे। उनका मानना था कि सत्यनारायण सिंह ने फूटपरस्ती के उद्देश्य से किये गये छल-नियोजन के तहत, उनके विश्वास का लाभ उठाकर उन्हें इस्तेमाल किया (उनकी यह धारणा उनके जीवनपर्यन्त बनी रही)। इसके बाद उ.प्र. कमेटी ने सत्यनारायण सिंह के सांगठनिक प्रयासों से अपने को अलग कर लिया, लेकिन बिहार कमेटी के प्रस्ताव के समर्थन का ख़ामियाज़ा उन्हें भी भुगतना पड़ा। चारु मजुमदार ने उ.प्र. राज्य कमेटी को भंग कर दिया और शिव कुमार मिश्र और उनके साथी भी संगठन से निकाल दिये गये।

चारु मजुमदार के साथ अगले महत्वपूर्ण मतभेद और अलगाव की प्रक्रिया असीम चटर्जी के साथ घटित हुई। सत्यनारायण सिंह ने चारु मजुमदार पर सरोज़ दत्त, सौरेन बसु, सुनीति कुमार घोष और असीम चटर्जी की चौकड़ी से घिरे होने का आरोप लगाया था, लेकिन दरहक़ीक़त जब बिहार राज्य कमेटी का पूर्णाधिवेशन हो रहा था, उस समय तक चारु और असीम के बीच मतभेद पैदा हो चुके थे। जून 1971 में असीम चटर्जी के नेतृत्व में काम करने वाली ‘बंगाल-बिहार-उड़ीसा सीमा क्षेत्रीय कमेटी’ ने एक दस्तावेज़ जारी करके पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांगला देश) में जारी संघर्ष में पाकिस्तान के प्रति अपनायी जा रही आधिकारिक पार्टी-अवस्थिति की सख़्त आलोचना करते हुए इसे चीनी पार्टी की अवस्थिति के विरुद्ध बताया था। असीम चटर्जी का विचार था कि पाकिस्तान अपनी राष्ट्रीय स्वाधीनता, भौगोलिक अखण्डता और सम्प्रभुता की हिफ़ाज़त के लिए संघर्ष कर रहा है और चीन उसका समर्थन कर रहा है जबकि सोवियत सामाजिक साम्राज्यवाद और भारतीय विस्तारवादी अपने निहित स्वार्थों के लिए पाकिस्तान को बाँट देना चाहते हैं और पाकिस्तान की जनता के विरुद्ध हैं। यह सही है कि चीन दो अतिमहाशक्तियों में सोवियत साम्राज्यवाद को ज़्यादा आक्रामक और ज़्यादा ख़तरनाक (सामाजिक फ़ासीवादी) मानता था और भारतीय बुर्जुआ सत्ता को उसका विश्वस्त सहयोगी मानता था। इस दृष्टि से वह पाकिस्तान के अन्दरूनी मामले में सोवियत समर्थित भारतीय हस्तक्षेप के ख़िलाफ़ था, लेकिन साथ ही उसका यह भी मानना था कि पूर्वी पाकिस्तान के सवाल को वहाँ की जनता की इच्छा के हिसाब से हल किया जाना चाहिए (एस. निहाल सिंह : ‘द योगी एण्ड द बियर’, पृ. 92, 172)। चीन पाकिस्तान का समर्थन करने और पूर्वी पाकिस्तान की जनता की राष्ट्रीय स्वतन्त्रता की लड़ाई के बीच दुविधा का शिकार था और पाकिस्तानी तानाशाह याह्या ख़ान को पूर्वी पाकिस्तान के मसले पर चीनी समर्थन न मिलने पर आश्चर्य था (सुल्तान एम. ख़ान की पुस्तक ‘मेमोरीज़ एण्ड रिफ़्लेक्शंस ऑफ़ ए पाकिस्तानी डिप्लोमैट’ की ‘स्टेट्समैन’, कलकत्ता संस्करण में प्रकाशित ए. जी. नूरानी की समीक्षा, 16 नवम्बर 1998)। निश्चय ही, इन सबके बावजूद उस दौर की चीनी विदेश नीति पर कुछ सवाल उठते हैं जो इस आकलन पर आधारित थी कि अधिक ख़तरनाक सोवियत साम्राज्यवाद की आक्रामकता के कारण तीसरे विश्वयुद्ध का ख़तरा बना हुआ है और इस स्थिति में तीसरी दुनिया के देशों की बुर्जुआ सत्ताओं और पश्चिमी देशों के साथ भी संयुक्त मोर्चा बनाया जा सकता है। यह मूल्यांकन ही बुनियादी तौर पर ग़लत था, समय ने इसे सिद्ध किया, पर इस विश्लेषण के लिए यह उपयुक्त स्थान नहीं है। असीम चटर्जी की मूल ग़लती यह थी कि वह देश-विशेष की पार्टी की नीति पूरी तरह एक समाजवादी देश की विदेश नीति और कूटनीति के आधार पर तय कर रहे थे। यह सही है कि क्षेत्रीय स्तर पर भारत और विश्व स्तर पर सोवियत संघ पूर्वी पाकिस्तान की स्थिति का अपने हित में लाभ उठाने के लिए हस्तक्षेपकारी और विस्तारवादी नीति अपना रहे थे, लेकिन मूल अन्तरविरोध पाकिस्तानी समाज का अपना अन्दरूनी अन्तरविरोध था। पूर्वी पाकिस्तान की बंगाली राष्ट्रीयता पाकिस्तान की केन्द्रीय सत्ता (जिस पर पंजाबी राष्ट्र का बुर्जुआ वर्ग हावी था) के विरुद्ध अपनी मुक्ति की बहादुराना लड़ाई लड़ रही थी और बर्बर दमन का सामना कर रही थी। ऐसी स्थिति में आत्मनिर्णय और आज़ादी की इस लड़ाई का समर्थन ही किसी कम्युनिस्ट पार्टी की नीति होनी चाहिए थी। ग़ौरतलब है कि अपनी कम ताक़त के बावजूद मुहम्मद तोहा के नेतृत्व वाली ‘पूर्वी पाकिस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी (मा-ले)’ उस समय पाकिस्तान की तानाशाह हुकूमत के विरुद्ध कुछ क्षेत्रों में छापामार संघर्ष चलाने के साथ ही सोवियत और भारतीय हस्तक्षेप का तथा इनके प्रति घुटनाटेकू रवैया अपनाने वाले अवामी लीग के बुर्जुआ नेतृत्व (शेख़ मुजीबुर्रहमान) का भी विरोध कर रही थी। लेकिन तथ्यों के प्रति एकांगी नज़रिया अपनाते हुए असीम चटर्जी उस सीमा तक चले गये थे कि जुल्फि़कार अली भुट्टो और उसकी पार्टी को पाकिस्तान के राष्ट्रीय बुर्जुआ वर्ग का प्रतिनिधि मानने लगे थे। इस प्रश्न पर, कुल मिलाकर, चारु मजुमदार की अवस्थिति सही थी। उनका कहना था कि सोवियत साम्राज्यवाद और भारतीय विस्तारवाद की नीतियों का विरोध करते हुए भी पार्टी का यह कर्तव्य है कि वह पूर्वी पाकिस्तान की जनता के आत्मनिर्णय के अधिकार और उसके मुक्ति संघर्ष का पुरज़ोर समर्थन करे।

जल्दी ही, असीम चटर्जी ने ‘बंगाल-बिहार-उड़ीसा क्षेत्रीय कमेटी’ की ओर से ‘वर्तमान पार्टी लाइन के सम्बन्ध में’ शीर्षक वाला एक और दस्तावेज़ जारी किया। असीम चटर्जी ने बाद में एक लघु पत्रिका में प्रकाशित लेख में स्वीकार किया था कि सौरेन बसु के जेल जाने के पहले उन्हें उनसे यह संक्षिप्त जानकारी मिल चुकी थी कि चीनी पार्टी के नेताओं ने भाकपा (मा-ले) की राजनीतिक लाइन के कुछ पहलुओं की गम्भीर आलोचना करते हुए कुछ सुझाव दिये हैं (‘चीनी सुझावों’ के प्रसंग की आगे विस्तार से चर्चा की जायेेगी)। असीम चटर्जी के नये दस्तावेज़ के पीछे यही जानकारी निर्णायक उपादान के रूप में काम कर रही थी। इसी आलोक में अपने व्यावहारिक अनुभवों का समाहार करते हुए उन्होंने अपने नये दस्तावेज़ में पार्टी लाइन के विरुद्ध विद्रोह का परचम लहराया। यह दस्तावेज़ लिखने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करते हुए सौरेन बसु ने उन्हें अलीपुर जेल से पत्र भी लिखा था (तब तक वे गिरफ़्तार हो चुके थे)। असीम ने अपने इस दूसरे दस्तावेज़ में मिदनापुर (प. बंगाल), सिंहभूम (तत्कालीन बिहार, आज का झारखण्ड) और मयूरभंज (ओडिशा) में 120 लोगों के सफाये और कई थानों पर हमले के बाद भी आधार क्षेत्र और जन मुक्ति सेना नहीं बन पाने पर सवाल उठाया था और इसके लिए चारु मजुमदार के उपेक्षात्मक रवैये और ग़लत सोच को ज़िम्मेदार ठहराया था। दस्तावेज़ में कहा गया था कि पार्टी के नेतृत्व में जारी सशस्त्र संघर्ष के अनुभवों का समाहार करके रणकौशलात्मक लाइन में परिवर्तन किया जाना चाहिए। दस्तावेज़ में भारतीय क्रान्ति के असमान विकास को सही रूप में इंगित किया गया था और एक हद तक ”वाम” विचलन को सुधारते हुए यह सवाल भी उठाया गया था कि सशस्त्र संघर्ष को जनान्दोलनों और जन संगठनों के निर्माण से जोड़ा जाना चाहिए। हालाँकि सशस्त्र संघर्ष से यहाँ तात्पर्य वर्ग शत्रुओं के गुप्त सफाये से ही था और ऐसी कार्रवाइयाँ शहरी क्षेत्रों में भी करने की हिमायत की गयी थी। दस्तावेज़ में चीनी पार्टी के सुझावों को रोके रखने के लिए पार्टी नेतृत्व की कड़ी आलोचना की गयी थी। इसमें यह विचार रखा गया था कि देहात में आधार-क्षेत्र की स्थापना सशस्त्र भूमि संघर्ष का उच्चतम रूप है जिसके बिना हर सफाया निरर्थक है और लोकसत्ता, जन मुक्ति सेना और राज्य सत्ता पर अधिकार जैसी बातों का कोई मतलब नहीं है। इस तरह, जनदिशा की लाइन को खण्डित रूप में स्वीकार करते हुए भी यह दस्तावेज़ अपने अन्तिम निष्कर्ष में स्वयं ”वाम” अवसरवाद का शिकार था क्योंकि शत्रुवध की लाइन और ‘क्रान्तिकारी प्राधिकार’ को यह ज़रूरी मानता था। इस विचलन का एक घटिया रूप यह था कि इसमें, एक ऐसे समय में अपने नेतृत्व में एक शक्तिशाली जन मुक्ति सेना की मौजूदगी का दावा किया गया था, और आधार इलाक़े के निर्माण का आह्वान किया गया था, जबकि वास्तव में उक्त कमेटी के इलाक़े में संघर्ष बिखर चुका था और कमेटी के नेतृत्वकारी सदस्यों ने सुरक्षित शेल्टरों के लिए वह इलाक़ा ही छोड़ दिया था। असीम चटर्जी और उनके साथियों ने इस दस्तावेज़ में ही यह चेतावनी भी दी थी कि पार्टी के भीतर विचारधारात्मक-राजनीतिक बहस वे आगे नहीं चलायेंगे और स्वतन्त्र रूप से अपनी लाइन को अमल में लायेंगे। व्यवहारतः इसका मतलब पार्टी से अलग हो जाना ही था। इस तरह चारु मजुमदार के अन्धभक्त से अन्धविरोधी बन जाने तक की असीम चटर्जी की यात्रा सम्पन्न हुई।

असीम चटर्जी अपने कुछ युवा साथियों के साथ पार्टी में 1969 में, उस समय शामिल हुए थे जब चीन की पार्टी लगातार भारत के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन और चारु मजुमदार के पक्ष में लेख, टिप्पणी और वक्तव्य जारी कर रही थी। तब चारु उन्हें ‘क्रान्तिकारी प्राधिकार’ नज़र आने लगे थे। जैसे ही उन्हें चीनी पार्टी द्वारा आलोचना की जानकारी मिली, चारु की लाइन का धुर-विरोधी होते और पार्टी छोड़ते उन्हें देर न लगी।

पार्टी से अलग होते ही असीम चटर्जी का सत्यनारायण सिंह से सम्पर्क स्थापित हो गया जो बिहार राज्य कमेटी के पूर्णाधिवेशन के बाद नयी पार्टी बनाने के लिए नवम्बर 1971 में एक बैठक करने जा रहे थे। दोनों के बीच चारु-विरोध पर सहमति की और नाटकीय पैंतरापलट की साझा ज़मीन मौजूद थी, अतः एक राय होते देर न लगी। नवम्बर 1971 की उस बैठक के लिए जाते समय ही 3 नवम्बर को देवघर (बिहार) में असीम चटर्जी गिरफ़्तार हो गये। कुछ समय बाद ही उनके अन्य दो साथी सन्तोष राणा और मिहिर राणा भी गिरफ़्तार हो गये, लेकिन एक अन्य साथी उक्त बैठक में शामिल हो पाने में सफल रहा। बैठक में एक नयी केन्द्रीय कमेटी का गठन किया गया और सत्यनारायण सिंह को पार्टी का महासचिव चुना गया। सन्तोष राणा और मिहिर राणा भी आगे चलकर सत्यनारायण सिंह की पार्टी में शामिल हो गये। सत्यनारायण सिंह ने भारत का ‘वांग मिंग’ बताते हुए चारु मजुमदार को और उनके साथ सुनीति कुमार घोष को पार्टी से निकालने की घोषणा की। असीम चटर्जी ने अपने कारावास की लम्बी अवधि के दौरान अलग राह पकड़ी और 1980 में जेल से बाहर आने के बाद, सत्यनारायण सिंह के साथ जाने के बजाय कानू सान्याल के साथ राजनीति की नयी पारी शुरू की। यह साथ कुछ समय का ही रहा। फिर उन्होंने एक अलग राह पकड़ी जो संशोधनवाद के घृणित पंककुण्ड तक जाती थी। इस यात्रा की चर्चा आगे यथास्थान आयेगी।

असीम चटर्जी के कार्यक्षेत्र में जो उनके साथी कार्यरत थे वे 1972 के मध्य तक अपने तरीक़े से काम खड़ा करने की कुछ कोशिश करते रहे। फिर वे बिखर गये और उनमें से भी कुछ सत्यनारायण सिंह के साथ हो गये।

सुशीतल राय चौधुरी के साथ चारु मजुमदार और उनके समर्थकों का मतभेद पार्टी कांग्रेस के बाद के एक वर्ष के दौरान का एक अन्य महत्वपूर्ण घटनाक्रम था। सुशीतल राय चौधुरी एक पुराने कम्युनिस्ट नेता और सम्मानित सिद्धान्तवेत्ता थे जो ‘अखिल भारतीय तालमेल कमेटी’ के महासचिव रह चुके थे और भाकपा (मा-ले) की केन्द्रीय कमेटी और पोलित ब्यूरो के सदस्य तथा प. बंगाल राज्य कमेटी के सचिव थे। जैसा कि पहले उल्लेख हो चुका है, पार्टी कांग्रेस के ठीक बाद हुई केन्द्रीय कमेटी की पहली और आख़िरी बैठक में सौरेन बसु, असीम चटर्जी और सरोज़ दत्त जब चारु मजुमदार को ‘क्रान्तिकारी प्राधिकार’ घोषित किये जाने के पक्ष में दलीलें दे रहे थे, उस समय पार्टी कमेटी के सुदृढ़ीकरण के बारे में माओ का उद्धरण पढ़कर सुशीतल राय चौधुरी ने उनका परोक्ष प्रतिवाद किया था। ”वाम” दुस्साहसवाद के विरुद्ध, तालमेल कमेटी के दौर में डी वी राव-नागी रेड्डी, परिमल दासगुप्ता, असित सेन, प्रमोद सेनगुप्त आदि ने अलग-अलग समय में जब संघर्ष किया था, उस समय सुशीतल राय चौधुरी चारु की लाइन के साथ खड़े थे। उन्हें तथा उन जैसे बहुतेरे अन्य नेताओं ने ”वाम दुस्साहसवाद” के विरोधियों के तर्कों पर उस समय ध्यान ही नहीं दिया और बाद में, एक-एक करके, धीरे-धीरे वे स्वयं ”वाम” भटकाव के विरोधी होते गये। पश्चदृष्टि से देखते हुए कहा जा सकता है कि इसका बुनियादी कारण यह था कि इन लोगों की विचारधारात्मक समझ काफ़ी हद तक कमज़ोर थी (जो भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन की ऐतिहासिक विरासत थी)। इसी कमजोरी के चलते अन्तरराष्ट्रीय नेतृत्व और बड़ी एवं अनुभवी पार्टी के प्रति इनमें अनालोचनात्मक अनुकरण का रवैया मौजूद था। इसीलिए, जब तक चीन की पार्टी के मुखपत्रों और चीनी मीडिया में तालमेल कमेटी, भाकपा (मा-ले) और चारु मजुमदार के समर्थन और प्रशंसा का शोर था, तब तक इन लोगों ने चारु की लाइन के किसी विरोधी तर्क या उस लाइन की व्यवहार में सामने आ रही विफलता पर कोई ध्यान ही नहीं दिया। लेकिन हालात बदलते ही जिन लोगों ने आलोचनात्मक विवेक के साथ सोचना शुरू किया और क्रमशः सही अवस्थिति पर पहुँचते चले गये, उनमें सुशीतल राय चौधुरी का नाम प्रमुखता के साथ शामिल है।

कलकत्ता के छात्र-युवा उभार की चर्चा हम निबन्ध में पहले ही कर चुके हैं। पार्टी कांग्रेस (मई 1970) के बाद छात्रों-युवाओं के ‘ऐक्शन-स्क्वाडों’ ने जब स्कूलों-कॉलेजों-पुस्तकालयों पर हमलों का तथा बुर्जुआ राष्ट्रीय नेताओं की मूर्तियाँ तोड़ने का सिलसिला शुरू किया, तो इस दौर में चारु और उनके सहयोगियों के साथ सुशीतल राय चौधुरी के मतभेद तेज़ी से बढ़े। अक्टूबर 1970 में (यानी बिहार राज्य कमेटी द्वारा चारु लाइन के विरोध में प्रस्ताव पारित किये जाने की उपरोल्लिखित घटना के ठीक एक माह बाद) सुशीतल राय चौधुरी ने स्वास्थ्यगत कारणों से राज्य सचिव की ज़िम्मेदारी से एक माह की छुट्टी ली। इसी दौरान उन्होंने ‘पूर्ण’ छद्म नाम से एक दस्तावेज़ लिखा और उसे पार्टी के समक्ष प्रस्तुत किया। दस्तावेज़ में उन्होंने कलकत्ता के छात्र-युवा उभार के दौरान कलकत्ता और प. बंगाल के कुछ और शहरों में शैक्षिक संस्थानों पर हमले करने, परीक्षाओं को बाधित करने, पुस्तकालयों-प्रयोगशालाओं में तोड़फोड़ मचाने जैसी कार्रवाइयों की आलोचना करते हुए इन्हें ‘लुड्डाइट टाइप ऐक्शंस’ की संज्ञा दी थी। ज्ञातव्य है कि ‘नेपोलियॉनिक युद्धों’ की समाप्ति के बाद इंग्लैण्ड जब गम्भीर आर्थिक संकट, बेरोज़गारी और भूख की चपेट में था तो बहुतेरे औद्योगिक मज़दूर यह सोचकर अपना गुस्सा मशीनों पर उतार रहे थे और उन्हें तोड़ रहे थे कि मशीनें ही वह शैतानी बला हैं जो उनकी ज़िन्दगी को कुचल रही हैं। इन्हीं कार्रवाइयों को ‘लुड्डाइट’ नाम दिया गया था। सुशीतल राय चौधुरी का यह सही तर्क था कि छात्रों का शिक्षा संस्थानों को निशाना बनाना ‘लुड्डाइट ऐक्शन’ जैसा ही है क्योंकि शिक्षा संस्थान शोषकों-उत्पीड़कों के हाथों में मात्र ऐसे उपकरण हैं जो प्रतिक्रान्तिकारी शिक्षा व्यवस्था को बनाये रखने और संचालित करने का काम करते हैं।

सुशीतल राय चौधुरी ने मूर्तिभंजन की कार्रवाई की भी एक ”वाम” अतिरेकी कार्रवाई के रूप में आलोचना की थी, लेकिन इस सन्दर्भ में उनकी तर्कप्रणाली विसंगतिपूर्ण थी। उनका कहना था कि राममोहन राय, विद्यासागर और टैगोर जैसों की मूर्तियाँ तोड़ना ग़लत है क्योंकि ये लोग देश की पुरानी बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के ज़माने के बुद्धिजीवी थे। हाँ, गाँधी जैसे भारतीय बुर्जुआ वर्ग के प्रतिनिधियों की मूर्तियाँ अवश्य तोड़ी जानी चाहिए, ताकि लोगों के मानस से ऐसे लोगों की स्थापित छवि हटायी जा सके। इस तर्क-प्रणाली की पहली विसंगति यह थी कि राजा राममोहन राय और विद्यासागर जैसे लोग किसी भी प्रकार की बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के ज़माने के बुद्धिजीवी नहीं थे। वे ब्रिटिश औपनिवेशिक सामाजिक-आर्थिक संरचना के गर्भ से जन्मे मध्यवर्ग के प्रतिनिधि थे जिनका अस्तित्व औपनिवेशिक सत्ता पर निर्भर था। इस विसंगति को चारु मजुमदार ने अपने प्रत्युत्तर में बख़ूबी पकड़ा था और यह सवाल उठाया था कि क्या मूर्तियाँ चुनकर तोड़ी जायेें? बुनियादी मुद्दा यह था कि मूर्तिभंजन किसी भी सूरत में ग़लत था क्योंकि मूर्तियाँ तोड़ने और तस्वीरें जलाने से जनमानस में अंकित किसी व्यक्ति की छवि को क़तई नहीं मिटाया जा सकता। इसके लिए विचारधारात्मक कार्य की लम्बी प्रक्रिया अनिवार्य होती है। माओ त्से-तुंग ने ‘हुनान किसान आन्दोलन की जाँच-पड़ताल रिपोर्ट’ में यह स्पष्ट कहा था कि जो किसान आने हाथों से मूर्तियाँ बनाते हैं, वे ही समय आने पर अपने ही हाथों से उन्हें किनारे हटा देंगे, अतः वक़्त से पहले किसी को यह काम करने की ज़रूरत नहीं है। कम्युनिस्ट पार्टी जन समुदाय की राजनीतिक चेतना को ऊपर उठाने का काम करती है, और मूर्तिपूजा, अन्य अन्धविश्वासों और मिथ्या धारणाओं से छुटकारा पाने की ज़िम्मेदारी लोगों पर छोड़ देती है। ज़ाहिर है कि लोगों की राजनीतिक चेतना का स्तर उठाये बिना और पर्याप्त विचारधारात्मक कार्य किये बिना ऐसे लोगों की मूर्तियाँ तोड़ना, जो घर-घर के जाने-पहचाने नाम थे, एक अतिवादी कार्रवाई थी। यह उस शहरी निम्न बुर्जुआ वर्ग को नाराज़ करके उसे शत्रु के शिविर में धकेल देने जैसी कार्रवाई भी थी, जो भारतीय क्रान्ति में मेहनतकश वर्गों का रणनीतिक मित्र था। सुशीतल राय चौधुरी ने इस मुद्दे पर अपनी आपत्ति तो रखी, लेकिन उनके तर्क खण्डित और विसंगतिपूर्ण थे।

सुशीतल राय चौधुरी अपने दस्तावेज़ की प्रस्तुति के साथ ही अलग-थलग पड़ गये। बंगाल राज्य कमेटी और बंगाल के केन्द्रीय कमेटी सदस्यों में से किसी ने उनका साथ नहीं दिया। जनवरी 1971 की राज्य कमेटी की बैठक में स्थिति यह थी कि बेहद आक्रामक सौरेन बसु और असीम चटर्जी जैसे कुछ सदस्य सुशीतल राय चौधुरी को पार्टी से निकाल देने का प्रस्ताव रख रहे थे। सरोज़ दत्त और सुनीति कुमार घोष ने मौन धारण कर रखने का रास्ता चुना था। लेकिन चूँकि चारु मजुमदार जानते थे कि सुशीतल राय चौधुरी जैसे बुजुर्ग, लोकप्रिय और सम्मानित नेता के निष्कासन का बंगाल में कितना प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, इसलिए बीच-बचाव करते हुए उन्होंने कहा कि सुशीतल बाबू को कोई पार्टी से नहीं निकाल सकता और उनकी इच्छा के हिसाब से राज्य कमेटी पार्टी इकाइयों की बैठक बुलायेगी जिसमें अपने विचार प्रस्तुत करने के लिए वे स्वतन्त्र होंगे। लेकिन व्यवहार में जो हुआ वह यह कि सुशीतल राय चौधुरी को पार्टी में रहते हुए ही पूरी तरह अलग-थलग कर दिया गया। इन्हीं स्थितियों में मार्च 1971 में उनका निधन हो गया।

निधन से पूर्व बांग्ला भाषा में उन्होंने एक दस्तावेज़ लिखा था : ‘भारतीय क्रान्ति की समस्याएँ और संकट’। इसे निधनोपरान्त उनके कुछ समर्थकों ने प्रकाशित कराया। इसमें दस्तावेज़ पर नवम्बर 1970 का लेखन-समय दिया गया है, लेकिन सुनीति कुमार घोष (‘नक्सलबाड़ी : बिफ़ोर एण्ड आफ़्टर’, पृ. 264) के अनुसार, यह ग़लत है क्योंकि दस्तावेज़ में चारु मजुमदार द्वारा जन मुक्ति सेना के गठन की घोषणा का उल्लेख है। यह घोषणा 7 दिसम्बर 1970 को हुई थी। यानी यह दस्तावेज़ इस तिथि के बाद ही कभी लिखा गया था। बहुत मुमकिन है कि यह दस्तावेज़ सुशीतल राय चौधुरी ने जनवरी 1971 की राज्य कमेटी की उपरोक्त बैठक के बाद तैयार किया हो।

इस निबन्ध में सुशीतल राय चौधुरी ने चारु मजुमदार की राजनीतिक लाइन की अधिक सांगोपांग और मुखर आलोचना करते हुए उसे ‘अति दुस्साहसवादी’ क़रार दिया था। उन्होंने लिखा था कि पहले पार्टी की सोच थी कि भारतीय क्रान्ति का रास्ता श्रमसाध्य और दीर्घकालिक होगा। फिर चारु मजुमदार ने लाइन को बदल दिया और यह ज्योतिषीनुमा भविष्यवाणी कर दी गयी कि 1975 तक क्रान्ति विजयी हो जायेेगी। इससे काम के तौर-तरीक़े बदल गये और ‘द्रुतवाद’ चतुर्दिक हावी हो गया। ‘सफाये’ या ‘ख़ात्मे’ (एनिहिलेशन) शब्द की चारु मजुमदार की व्याख्या को माओ विचारधारा विरोधी बताते हुए निबन्ध में लिखा गया था कि माओ के लिए इस शब्द का मतलब था शत्रु वर्ग को उसकी ‘प्रतिरोध करने की शक्ति’ से वंचित कर देना जबकि चारु मजुमदार के लिए इसका अर्थ शत्रु वर्ग के व्यक्तियों की हत्या करना था और इस कार्रवाई को गुप्त तौर पर गुप्त दस्ते अंजाम देते थे। सुशीतल राय चौधुरी के अनुसार, शहरी कार्रवाइयों के दौरान बाद के दौर में ‘ऐक्शंस’ को अत्यधिक महत्व दिया गया और राजनीतिक प्रोपेगैण्डा के महत्व को नकार दिया गया जो संशोधनवादी सोच की अभिव्यक्ति था। निबन्ध में यह आलोचना रखी गयी थी कि चारु मजुमदार की लाइन के हावी होने के बाद क्रान्ति के दौरान वर्ग संघर्ष के ज़रिये जनता को जागृत और लामबन्द करने के कार्यभार की उपेक्षा की गयी, पूर्व अवस्थिति को छोड़ते हुए आर्थिक संघर्षों को तिलांजलि दे दी गयी और मित्र वर्गों के साथ संयुक्त मोर्चा बनाने की प्रक्रिया को हाथ में ही नहीं लिया गया, बल्कि इसके विपरीत, शहरी इलाक़ों में ‘सफाया अभियान’ के दौरान छोटे दुकानदारों और ऐसे ही लोगों को निशाना बनाया गया जो क्रान्ति में मज़दूर वर्ग के सम्भावित संश्रयकारी थे।

सुशीतल राय चौधुरी का कहना था कि पार्टी के सर्वहारा आधार का निर्माण, सभी न्यायसंगत और लाभकारी जन संघर्षों का निर्माण और उन संघर्षों को धैर्य एवं सूझबूझ के साथ चलाते हुए अपनी ताक़त बचाये रखना तथा इन्तज़ार करना – माओ के अनुसार शहरी क्षेत्रों में पार्टी का यही कार्यभार था, जिसे चारु और पार्टी नेतृत्व ने हाथ में ही नहीं लिया। चारु की नौकरशाहाना कार्यशैली की आलोचना करते हुए उन्होंने लिखा था कि प्राधिकारवाद अपनी उन ऊँचाइयों तक जा पहुँचा था कि पार्टी कमेटियाँ काम ही नहीं करती थीं और सारी शक्तियाँ चारु ने अपने हाथों में केन्द्रित कर ली थीं। यहाँ तक कि मागुरजान की घटना के बाद बिना किसी से राय-मशविरा किये ही उन्होंने जन मुक्ति सेना की घोषणा कर दी। चारु की घोषणा के विपरीत सुशीतल राय चौधुरी ने अपना यह विचार भी निबन्ध में रखा था कि कोई भी युग अपने आप में ‘आत्म-बलिदान का युग’ नहीं होता। जैसा कि माओ ने कहा था कि युद्ध का लक्ष्य हमेशा स्वयं को बचाना और शत्रु को नष्ट करना होता है, पर ज़ाहिर है कि युद्ध में क़ुर्बानी भी देनी पड़ती है।

सुशीतल राय चौधुरी के अन्तिम लेखन में ”वाम” दुस्साहसवादी लाइन की सांगोपांग और कुशाग्र आलोचना प्रस्तुत की गयी थी लेकिन अफ़सोसनाक बात यह थी कि निधनोपरान्त प्रकाशन के बावजूद पार्टी के भीतर की नौकरशाहाना कार्यशैली के वर्चस्व और अपारदर्शिता के कारण यह दस्तावेज़ उस समय पूरा देश तो दूर, पश्चिम बंगाल की पार्टी क़तारों तक भी नहीं पहुँच पाया। वर्षों बाद धीरे-धीरे लोग किसी हद तक सुशीतल राय चौधुरी के विचारों के विकास और उनके वैचारिक संघर्ष से परिचित हो पाये।

जनदिशा की अवस्थिति से चारु की लाइन की आलोचना रखने वालों में सुशीतल राय चौधुरी अन्तिम नहीं थे। इसके बाद, एक के बाद एक, चारु के बचे हुए विश्वसनीय साथी भी उनका साथ छोड़ते गये और ”वाम” दुस्साहसवादी लाइन के कटु आलोचक बनते चले गये। इसकी चर्चा हम आगे करेंगे।

(अगले अंक में जारी…)

 

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती दशकः एक सिंहावलोकन (दूसरी किस्त)

1967-71 के दौरान भारतीय बुर्जुआ व्यवस्था और संशोधनवादियों की घृणित अर्थवादी-ट्रेड यूनियनवादी राजनीति के विरुद्ध भारतीय मज़दूर वर्ग के सामूहिक मानस में विद्रोह की जो प्रलयंकारी भावना उमड़-घुमड़ रही थी और स्वतःस्फूर्त उग्र संघर्षों के रूप में फूटकर सामने आ रही थी, उसे भारत का कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन यदि अपने प्रभाव में न ले सका और एक ऐतिहासिक अवसर का लाभ उठाने से चूक गया तो इसका बुनियादी कारण “वाम” दुस्साहसवादी भटकाव था, जिसके सूत्रधार और नेता चारु मजुमदार थे। read more

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक: एक सिंहावलोकन (पहली किस्त)

नक्सलबाड़ी का क्रान्तिकारी जन-उभार एक ऐतिहासिक विस्फोट की तरह घटित हुआ ज़िसने भारतीय शासक वर्ग के प्रतिक्रियावादी चरित्र और नीतियों को एक झटके के साथ नंगा करने के साथ ही भारत की कम्युनिस्ट पार्टी और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) सहित संशोधनवाद और संसदमार्गी वामपन्थ के विश्वासघाती जन-विरोधी चरित्र को उजागर करते हुए भारत के श्रमजीवी जनसमुदाय को यह सन्देश दिया कि सर्वहारा क्रान्ति के हरावल दस्ते के निर्माण एवं गठन के काम को नये सिरे से हाथ में लेना होगा। नक्सलबाड़ी के तत्काल बाद, सर्वहारा वर्ग की एक अखिल भारतीय पार्टी के गठन की दिशा में तूफ़ानी सरगर्मियों के साथ एक नयी शुरुआत हुई, लेकिन जल्दी ही यह नयी शुरुआत “वामपन्थी” आतंकवाद के भँवर में जा फँसी। तमाम घोषणाओं और दावों के बावजूद, कड़वा ऐतिहासिक तथ्य यह है कि देश स्तर पर सर्वहारा वर्ग की एक एकीकृत क्रान्तिकारी पार्टी नक्सलबाड़ी के उत्तरवर्ती प्रयासों के परिणामस्वरूप वस्तुतः अस्तित्व में आ ही नहीं सकी। 1969 में ज़िस भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मा-ले) की घोषणा हुई, वह पिछले सैंतीस वर्षों से कई ग्रुपों और संगठनों में बँटी हुई, एकता और फूट के अनवरत सिलसिले से गुजरती रही है। नक्सलबाड़ी की मूल प्रेरणा से गठित जो कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी संगठन भाकपा (मा-ले) में शामिल नहीं हुए थे, उनकी भी यही स्थिति रही है। इन सभी कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी संगठनों के जिस समूह को कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी शिविर कहा जाता रहा है, उनमें से कुछ आज भी “वामपन्थी” दुस्साहसवादी निम्न-पूँजीवादी लाइन के संशोधित एवं परिवर्धित संस्करण को अमल में ला रहे हैं, कुछ दक्षिणपन्थी सिरे की ओर विपथगमन की प्रक्रिया में हैं तो कुछ सीधे संसदमार्गी वामपन्थियों की पंगत में जा बैठे है, कुछ का अस्तित्व बस नाम को ही बचा हुआ है तो कुछ बाक़ायदा विसर्जित हो चुके हैं और कुछ ऐसे भी हैं जो नववामपन्थी “मुक्त चिन्तन” की राह पकड़ कर चिन्तन कक्षों में मुक्ति के नये सूत्र ईजाद कर रहे हैं। read more

अनश्वर हैं सर्वहारा संघर्षों की अग्निशिखाएँ

सर्वहारा क्रान्ति की फ़िलहाली हार, पूँजीवादी पुनर्स्थापना, विपर्यय और गतिरोध के वर्तमान विश्व ऐतिहासिक दौर का विश्लेषण करते हुए इसमें विश्व सर्वहारा आन्दोलन की इतिहास-विकास यात्रा पर एक विहंगम दृष्टि डाली गयी है और इसके समाहार के आधार पर क्रान्तियों के भविष्य के बारे में कुछ सम्भावनाएँ, कुछ विचार प्रस्तुत किये गये हैं। इसे लिखे जाने के समय से दुनिया में बहुत से बदलाव आ चुके हैं लेकिन इसमें सर्वहारा की मुक्ति के लिए विश्व-ऐतिहासिक वर्ग महासमर के पहले चक्र का जो समाहार प्रस्तुत किया गया है और जो भविष्यवाणियाँ की गयी हैं, वे मूलतः आज भी सही हैं। वस्तुतः, आज दुनिया की परिस्थितियाँ विश्व ऐतिहासिक वर्ग महासमर के दूसरे चक्र के बारे में इसके कथनों को सही साबित कर रही हैं। हम समझते हैं कि सर्वहारा क्रान्तिकारियों और वामपन्थी बुद्धिजीवियों के साथ ही उन सबके लिए यह उल्लेखनीय और विचारोत्तेजक सामग्री है जो मार्क्सवादी विज्ञान के विकास के बारे में जानने में दिलचस्पी रखते हैं। ।

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