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माओकालीन चीन में मार्क्सवाद / जार्ज थामसन

माओ त्से-तुङ के जन्मदिवस (25 दिसम्बर) के अवसर पर
माओकालीन चीन में मार्क्सवाद

  • जार्ज थामसन

पचास वर्ष पहले लेनिन ने लिखा था:

मार्क्स ही वह प्रतिभाशाली व्यक्ति थे जिन्होंने उन्नीसवीं सदी में मानवता का प्रतिनिधित्व करने वाले तीन सबसे विकसित देशों के तीन प्रमुख विचारधारात्मक प्रवाहों – क्लासिकीय जर्मन दर्शन, क्लासिकीय अंग्रेजी राजनीतिक अर्थशास्त्र, फ्रांसीसी क्रान्तिकारी सिद्धान्तों से युक्त फ्रांसीसी समाजवाद – का सिलसिला आगे बढ़ाया और उसे पूर्णता तक पहुंचाया।

इस व्याख्यान में मैं आपको बताना चाहूंगा कि जिस समय लेनिन ने तीन विचारधारात्मक प्रवाहों का जिक्र किया उसके बाद उनमें एक चौथा अर्थात चीनी क्लासिकीय दर्शन भी आ जुड़ा है; और कि यह चौथा प्रवाह, जिसे आज चीन के मजदूर और किसान अमल में ला रहे हैं, माओ द्वारा विकसित मार्क्सवादी सिद्धान्त की कुछ स्पष्ट विशिष्टताओं का स्रोत है।

विचारधारात्मक वातावरण

ल्यू शाओ-ची ने 1945 में नये पार्टी संविधान के बारे में अपनी रिपोर्ट में लिखा:

‘‘मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन और स्तालिन के एक शिष्य के रूप में कामरेड माओ त्से-तुङ ने यह किया है कि मार्क्सवाद के सिद्धान्तों को चीनी क्रान्ति के वास्तविक व्यवहार से जोड़ दिया है, और इस प्रकार, चीनी साम्यवाद – माओ त्से-तुङ विचारधारा – का अवदान दिया है, जिसने पूर्ण मुक्ति हासिल करने के लिए चीनी जनता का मार्गदर्शन किया है, और कर रहा है। यह सभी लोगों, और खास तौर से पूर्व के लोगों की मुक्ति के संघर्ष में एक महान योगदान करने वाला है।

‘‘माओ त्से-तुङ की विचारधारा, उनकी कार्यशैली के विश्व-दृष्टिकोण के हिसाब से, चीन में विकास और प्रवीणीकरण की प्रक्रिया में इस्तेमाल किया गया मार्क्सवाद है …। इसमें वर्तमान विश्व-परिस्थिति और चीन की विशिष्ट परिस्थितियों के बारे में उनका विश्लेषण समाहित है। यह नये जनवाद, किसानों की मुक्ति, क्रान्तिकारी संयुक्त मोर्चा, क्रान्तिकारी युद्ध, क्रान्तिकारी आधार, नये जनवाद के गणतंत्र की स्थापना, पार्टी-निर्माण, और संस्कृति के बारे में उनके सिद्धान्तों और उनकी नीतियों का समुच्चय है। ये सारे के सारे सिद्धान्त और ये सारी की सारी नीतियां एकदम मार्क्सवादी भी हैं और चीनी भी, तथा ये चीनी जनता की प्रतिभा की सर्वोच्च सैद्धान्तिक उपलब्धि भी हैं।’’

mao-1बात को दूसरे ढंग से रखते हुए, कहा जा सकता है कि मार्क्स और एंगेल्स जिस विचारधारात्मक वातावरण में पैदा हुए थे वह पूंजीवादी और प्रभावी तौर पर ईसाई वातावरण था। अपनी युवावस्था में वे महान बुर्जुआ दार्शनिक, हेगेल के शिष्य थे, जिनके रचना-कर्म के स्रोत यूरोपीय दार्शनिक परम्परा के संस्थापक, प्लेटो और अरस्तू से लेकर हेराक्लीतस और पाइथागोरस तक में देखे जा सकते हैं।

लेकिन माओ त्से-तुङ जिस वातावरण में पैदा हुए थे वह प्रभावी तौर पर सामन्ती और कनफ्यूशियाई था। अपनी युवावस्था में उन्होंने कनफ्यूशियस की रचनाओं एवं चीनी दर्शन के अन्य क्लासिकीय ग्रन्थों का अध्ययन किया, जिनका इतिहास उतना ही पुराना था जितना कि यूरोपीय दर्शन का, और कनफ्यूशियस तो पाइथागोरस का समकालीन ही था, लेकिन इन दोनों दर्शनों के इतिहासों में बहुत अन्तर था, और यह अन्तर यूरोपीय और चीनी समाजों के ऐतिहासिक विकास के अन्तरों की वजह से था। माओ त्से-तुङ जब बीस-एक वर्ष की आयु में ही थे, तभी उन्होंने चीनी भाषा में अनूदित होने वाली पहली मार्क्सवादी क्लासिकी रचना, कम्युनिस्ट घोषणापत्र पढ़ी, और उस समय तक वह चीनी क्लासिकी दर्शन में भी पारंगत हो चुके थे।

यूनानी दर्शन में भौतिकवाद और भाववाद

मार्क्सवाद में, माओ त्से-तुङ का, दार्शनिक दृष्टि से, सबसे उल्लेखनीय योगदान द्वंद्ववाद के बारे में उनके निरूपण में निहित है: और द्वंद्ववाद निश्चय ही मार्क्सवाद के सारतत्व से सम्बन्धित है, जो इसी नाते, एक तरफ, फ्रांसिसी बुर्जुआ दर्शन के यांत्रिक भौतिकवाद से, तथा दूसरी तरफ, हेगेल के द्वंद्वात्मक भाववाद से फर्क करने के लिए द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के रूप में भी जाना जाता है। इसीलिए मेरे लिए जरूरी हो जाता है कि मैं हेराक्लीतस से लेकर हेगेल तक के यूरोपीय दर्शन में द्वंद्ववाद के इतिहास के बारे में तथा साथ ही क्लासिकीय चीनी दर्शन में इसके द्वारा ग्रहण किये गये स्थान के बारे में भी कुछ कहूं।

शुरुआत के यूनानी दार्शनिकों की अवस्थिति को आदिम भौतिकवाद या आद्य भौतिकवाद कहा जा सकता है। यह परवर्ती कालों के भौतिकवाद से इस मायने में भिन्न है कि यह भाववाद का सचेत रूप से विरोधी नहीं है, जो कि अभी एक दार्शनिक सिद्धान्त के रूप में उद्भूत ही नहीं हुआ था, और जो अन्तर्निहित तौर पर द्वंद्वात्मक था। हेराक्लीतस के शब्दों में इसका समाहार इस प्रकार किया जा सकता है: ‘‘यह है और यह नहीं है।’’ सारी की सारी चीजें निरन्तर अपनी विरोधी चीजों में तब्दील होती रहती हैं, और इसीलिए प्रत्येक चीज के बारे में कहा जा सकता है कि ‘‘यह है और यह नहीं है।’’

प्राचीन यूनान में दास-समाज के सुदृढ़ीकरण के साथ ही, शासक वर्ग उत्पादन के श्रम से कट गया, और उसने एक ऐसा दृष्टिकोण विकसित किया जो प्रभावी तौर पर भाववादी और आधिभौतिक था: अर्थात इसमें पदार्थ के ऊपर चेतना की प्राथमिकता का दावा किया गया और परिवर्तन की वास्तविकता को नकार दिया गया। यह नयी प्रवृत्ति प्लेटो और अरस्तू में अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंची, जिनकी रचनाओं ने यूरोपीय चिन्तन के परवर्ती इतिहास पर एक दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ा। प्लेटो दार्शनिक भाववाद का जनक था, और अरस्तू औपचारिक तर्क का।

अरस्तू के अनुसार, एक चीज ‘‘या तो अ है, या अ नहीं है’’, अर्थात यह अ और अ नहीं दोनों नहीं हो सकती। यह हेराक्लीतस द्वारा सूत्रित सिद्धान्त, अर्थात ‘‘यह है और यह नहीं है’’, से प्रत्यक्ष इंकार था।

प्लेटो के विचार-सिद्धान्त और अरस्तूवादी तर्क ने ईसाई धर्मशास्त्र का दार्शनिक आधार निर्मित किया, जो हाल तक यूरोपीय चिन्तन पर हावी रहा। फिर, आधुनिक बुर्जुआ वर्ग के उदय के साथ, भौतिकवाद और भाववाद के बीच, द्वंद्ववाद और आधिभौतिकता के बीच, नये सिरे से मतभेद उठ खड़ा हुआ। इसका चरम विकास महान जर्मन दार्शनिकों, काण्ट और हेगेल की रचनाओं में हुआ, और जब सर्वहारा वर्ग का उदय हुआ, तब इसका समाधान नये द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के सिद्धान्त मार्क्सवाद के रूप में हुआ, जो भविष्य में साम्यवाद की दिशा का संकेत करता है।

इस प्रकार, मार्क्सवाद को, उस दृष्टिकोण की एक अपरिमित रूप से उन्नत धरातल पर पुनर्पुष्टि माना जा सकता है जिसे शुरुआती यूनानी दार्शनिक आदिम साम्यवाद की विरासत के रूप में प्राप्त किये हुए थे, जो परवर्ती दौर में, जैसा कि मार्क्स ने कहा है, वर्ग-समाज के ‘रहस्यावरण’ में धुंधला दिया गया था।

प्राचीन चीन में द्वंद्ववाद का अभिप्राय

जब हम चीन की ओर रुख करते हैं, तो वहां भी हमें, आरंभिक दार्शनिकों में एक ऐसा ही दृष्टिकोण देखने को मिलता है जिसे एक सशक्त द्वंद्वात्मक अभिप्राय वाला आदिम भौतिकवादी (दृष्टिकोण – अनु.) कहा जा सकता है, जिसका कारण भी वही था (जो यूनान में ऐसे आरम्भिक दृष्टिकोण का था – अनु.): अर्थात, जैसे यूनान में, वैसे ही चीन में भी, दर्शन की शुरुआत वर्ग-पूर्व समाज से विरासत में मिले विचारों के सूत्रीकरण के साथ हुई। लेकिन चीन में दर्शन का परवर्ती इतिहास भिन्न हो गया। वहां, दासता उतनी नहीं विकसित हुई जितनी कि यूनान में: इसीलिए (चीन में – अनु.) चिन्तन की आदिम पद्धतियों से विच्छेद कम मुकम्मल रहा।

यह सच है कि, कनफ्यूशियस के समय से लेकर बाद तक, भाववाद प्रचलन में रहा, परन्तु चीनी दार्शनिकों का दृष्टिकोण आधिभौतिक के बजाय आनुभविक ही बना रहा, और उन्होंने औपचारिक तर्क की एक प्रणाली कभी नहीं विकसित की। इसमें लाभ और हानि दोनों सम्मिलित थे। खास तौर पर, द्वंद्ववाद का अभिप्राय अक्ष्क्षुण बना रहा। इसके लिए, उदाहरण के तौर पर, चीन के सबसे बड़े क्लासिकीय रचनाकारों में से एक, ताओ ते चिङ का यह अवतरण दृष्टव्य है:

‘‘अस्तित्व अनस्तित्व को और अनस्तित्व अस्तित्व को जन्म देता है, कठिन आसान को और आसान कठिन को पूरा करता है, दीर्घ लघु को और लघु दीर्घ को प्रदर्शित करता है, ऊंच नीच को और नीच ऊंच को प्रकट करता है, पूर्ववर्ती परवर्ती का और परवर्ती पूर्ववर्ती का अनुसरण करता है।’’

इसमें मुझे अरस्तूवादी तर्क पर डॉ. जोसेफ नीडहैम की टिप्पणी भी जोड़ देने दें। उसका कहना है कि अरस्तूवादी तर्क ने

‘‘प्राकृतिक विज्ञानों को प्रकृति के उस महानतम तथ्य – परिवर्तन – को समझने का एक अपर्याप्त उपकरण ही प्रदान किया, जिसको इतने अच्छे ढंग से ताओवादियों ने निरूपित कर रखा था। एकता, अन्तरविरोध और बहिष्कृत मध्य के तथाकथित नियम, जिनके अनुसार य या तो अ होगा या अ नहीं होगा और या तो ब होगा या ब नहीं होगा, निरन्तर हास्यास्पद बनते रहे…। प्राकृतिक विज्ञान तो हमेशा यही कहने की स्थिति में रहे कि ‘यह है और यह नहीं भी है।’ इसीलिए आगे चलकर उत्तर-हेगेलियाई विश्व के द्वंद्वात्मक और विविध मान वाले तर्क अस्तित्व में आये। इसीलिए प्राचीन चीनी चिन्तकों के द्वंद्वात्मक या गत्यात्मक तर्क के संकेतों के प्रति असाधारण दिलचस्पी पैदा हुई…।’’ (साइन्स एण्ड सिविलाइजेशन इन चाइना, खण्ड II पृ. 201)।

माओ त्से-तुङ का उल्लेखनीय योगदान

यही वह पृष्ठभूमि है जिसके मद्देनजर हमें मार्क्सवादी दर्शन में माओ त्से-तुङ के योगदान का मूल्यांकन करना चाहिए, जो मुख्य रूप से अन्तरविरोधों के बारे में उनके निरूपण तथा सिद्धान्त और व्यवहार के बीच सम्बन्ध के बारे में उनके द्वंद्वात्मक सिद्धान्त में निहित है। हेगेल पर टिप्पणी करते हुए, लेनिन ने लिखा:

‘‘विरोधों की एकता…- मन और समाज समेत, प्रकृति की सभी परिघटनाओं एवं प्रक्रियाओं की अन्तरविरोधी, परस्पर बहिष्कृत करने वाली, विरोधी प्रवृत्तियों की स्वीकृति है, खोज है। विश्व की सभी प्रक्रियाओं की ‘स्वतःर्स्फूत गति’, उनके स्वतःस्फूर्त विकास, और उनकी यथार्थ प्राणवत्ता का ज्ञान उनकी विरोधों की एकता का ही ज्ञान है। विकास विरोधों का ही ‘संघर्ष’ है…।’’

दर्शन के ऐसे पश्चिमी छात्रों के लिए, जो मार्क्सवाद के ज्ञान के बगैर ही प्रशिक्षित हुए हैं, जैसा कि आज भी बहुतेरे ऐसे ही हैं, यह कथन लगभग अर्थहीन ही लगेगा; परन्तु इसको समझने में पुराने चीन के छात्रों को कोई कठिनाई नहीं हुई, कारण कि वे सभी के सभी प्राचीन चीनी क्लासिकी साहित्य के साथ पले-बढ़े थे।

क्लासिकी चीनी दर्शन के इस विषय को छोड़कर आगे बढ़ने से पहले, मैं कुछेक शब्द कनफ्यूशियसवाद पर भी कहना जरूरी समझता हूं, कारण कि यह हान राजवंश से लेकर वर्तमान सदी तक, या यों कह लें कि पूरे चीनी साम्राज्य-काल का एक स्थापित धर्म रहा है। कनफ्यूशियसवाद प्रकृति के साथ मनुष्य के आचरण तथा समाज के साथ व्यक्ति के आचरण से सम्बन्धित है: यह ईसाइयत के विपरीत, मानवतावादी और इहलौकिक है। पश्चिमी नीतिशास्त्र का व्यक्तिवाद – चाहे वह कैथोलिक रहस्यवाद का आत्म-विस्मृत कर देने वाला व्यक्तिवाद हो या काल्विनवाद का आत्म-प्रस्तुति करने वाला व्यक्तिवाद हो – कनफ्यूशियाई नीतिशास्त्र के लिए विजातीय ही रहा है। कनफ्यूशियसवाद अनिवार्यतः युद्ध-विरक्त होने के नाते भी ईसाइयत से भिन्न रहा है।

स्तालिन और माओ के प्रतिपादनों की तुलना

आइए अब हम द्वंद्ववाद के बारे में माओ त्से-तुङ के प्रतिपादन की तुलना स्तालिन के प्रतिपादन से करें। यह तुलना, कुल मिलाकर, बहुत शिक्षाप्रद है क्योंकि इन दोनों से सम्बन्धित दो शोध-प्रबन्धात्मक कृतियां – अन्तरविरोध के बारे में, और द्वंद्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवाद – करीब-करीब एक ही समय में, 1937-38 के वर्षों में, प्रकाशित हुईं, और यह भी कि दोनों एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप से लिखी गयी थीं।

स्तालिन द्वारा प्रतिपादित द्वंद्ववाद के चार सिद्धान्तों को इस प्रकार सारांशित किया जा सकता हैः 1. सभी चीजें एक दूसरे से अन्तर्सम्बन्धित हैं; 2. सारी चीजें सतत परिवर्तनशील हैं; 3. विकास मात्रत्मक परिवर्तनों से गुणात्मक परिवर्तनों में रूपान्तरण के जरिए होता है; 4. विकास विरोधों की एकता के जरिए, आन्तरिक अन्तरविरोधों की वृद्धि के जरिए होता है।

स्तालिन का चार सिद्धान्तों वाला सूत्रीकरण समग्र रूपेण इस प्रकार उद्द्धृत किया जा सकता है: ‘‘आन्तरिक अन्तरविरोध प्रकृति की सभी चीजों और परिघटनाओं में अन्तर्निहित हैं क्योंकि इन सभी में इनके नकारात्मक और सकारात्मक पक्ष होते हैं, एक अतीत होता है और एक भविष्य, कोई चीज खत्म हो रही होती है और कोई चीज विकसित हो रही होती है: और इन विरोधों के बीच का संघर्ष, पुराने और नये के बीच का संघर्ष, खत्म हो रही चीज और विकसित हो रही चीज के बीच का संघर्ष ही विकास-प्रक्रिया की आन्तरिक अन्तर्वस्तु, मात्रत्मक परिवर्तनों से गुणात्मक परिवर्तनों के रूप में रूपान्तरण की अन्तर्वस्तु निर्मित करता है।’’

माओ द्वारा अन्तरविरोधों का निरूपण अपेक्षाकृत अधिक सूक्ष्म और अधिक गहन है। इसे उन्हीं के शब्दों में इस प्रकार सारांशित किया जा सकता है:

‘‘अन्तरविरोध वस्तुगत तौर पर अस्तित्वमान सभी चीजों और व्यक्तिगत चिंतन की सभी प्रक्रियाओं में मौजूद होता है और शुरू से लेकर आखिर तक इन सभी प्रक्रियाओं में व्याप्त रहता है; यही अन्तरविरोध की सार्वभौमिकता और निरपेक्षता है। प्रत्येक अन्तरविरोध की और उसके प्रत्येक पहलू की अपनी-अपनी अभिलाक्षणिकताएं होती हैं; यही अन्तरविरोध की विशिष्टता और सापेक्षता है। दी गयी दशाओं में, विरोधों में एकता होती है, और इसी नाते वे एक ही अस्तित्व में साथ-साथ रह सकते हैं और अपनेआप को एक दूसरे में रूपान्तरित कर सकते हैं; यह भी अन्तरविरोध की विशिष्टता और सापेक्षता ही है। लेकिन विरोधों का संघर्ष अविराम होता है: यह तब भी चलता रहता है जब दोनों साथ-साथ रहते हैं और तब भी चलता है जब वे अपनेआप को एक दूसरे में रूपान्तरित कर रहे होते हैं: यह पुनः अन्तरविरोध की सार्वभौमिकता और निरपेक्षता है। अन्तरविरोध की विशिष्टता और सापेक्षता के अध्ययन में, हमें निश्चय ही प्रधान और गैर-प्रधान अन्तरविरोधों के बीच के फर्क पर तथा अन्तरविरोध के प्रधान पहलू और गैर प्रधान पहलू के बीच के फर्क पर ध्यान देना चाहिए; अन्तरविरोध की सार्वभौमिकता और अन्तरविरोध में विरोधों के संघर्ष के अध्ययन में, निश्चित तौर पर, हमें संघर्ष के विविध रूपों के बीच के फर्क पर ध्यान देना चाहिए।’’

इतने कसे हुए रूप में प्रस्तुत होने के कारण, इसका तर्क अमूर्त बन गया है और इसीलिए समझने में कठिन लगता है; लेकिन इसके विस्तारपूर्वक किये जाने वाले प्रतिपादन में, जिसके बारे में यह निष्कर्षात्मक सारांश भर ही है, इस तर्क का प्रत्येक चरण सरल और ठोस उदाहरणों द्वारा विवेचित किया गया है।

मैं माओ द्वारा संघर्ष के विविध रूपों पर दिये गये जोर की तरफ विशेष ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा। यह शत्रुतापूर्ण और गैर-शत्रुतापूर्ण अन्तरविरोधों के बीच के फर्क पर – एक ऐसे फर्क पर आधारित है जिस पर इस विषय से सम्बन्धित चर्चा स्तालिन की शोध-प्रबन्धात्मक कृति में नहीं की गयी है, हालांकि यह (फर्क-अनु.) लेनिन पहले ही कर चुके थे। माओ सिर्फ इतना ही नहीं करते कि इस फर्क पर ध्यान आकृष्ट करते हैं, बल्कि वह एकाधिक बार वह इस बात को भी इंगित करते हैं कि किसी चीज के विकास में, शत्रुतापूर्ण अन्तरविरोध यदि सही ढंग से संचालित किये जायें तो, गैर-शत्रुतापूर्ण बन सकते हैं, और इसके विपरीत, गैर-शत्रुतापूर्ण अन्तरविरोध यदि गलत ढंग से संचालित किये जाये तो, शत्रुतापूर्ण भी बन सकते हैं।

‘‘अन्तरविरोधों को सही ढंग से संचालित करने के बारे में’’

इस बात को उन्होंने आगे चलकर अपनी शोध-प्रबन्धात्मक कृति, जनता के बीच अन्तरविरोधों को सही ढंग से संचालित करने के बारे में में विकसित किया, जो 1957 में प्रकाशित हुई। मेरा विश्वास है कि यह मार्क्सवाद के प्रति उनके सबसे महत्वपूर्ण अवदानों में से एक है, जिस पर पश्चिम के मार्क्सवादियों द्वारा अब तक जितना ध्यान दिया गया है उससे कहीं अधिक निकटता के साथ ध्यान देने की जरूरत है।

इससे मैं समझता हूं कि एक तरफ, यह स्पष्ट हो जायेगा कि स्तालिन की गलतियां ज्यादातर शत्रुतापूर्ण और गैर-शत्रुतापूर्ण अन्तरविरोधों को सही ढंग से न समझ पाने के कारण हुईं, और दूसरी तरफ, यह भी कि द्वंद्ववाद के इस पहलू का माओ त्से-तुङ द्वारा किया गया विकास अक्टूबर क्रान्ति और सोवियत संघ में समाजवादी निर्माण के ऐतिहासिक अनुभव के बगैर सम्भव ही नहीं हुआ होता: दूसरे शब्दों में, वह मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन और स्तालिन द्वारा किये गये काम को ही और आगे बढ़ा रहे थे।

इसके साथ ही, मेरे विचार से, यह कोई आकस्मिक घटना नहीं थी कि मार्क्सवादी द्वंद्ववाद का यह विकास एक ऐसी प्राचीन दार्शनिक परम्परा वाले देश में हुआ जो यूरोपीय परम्परा से इस मायने में भिन्न थी कि इसने चिन्तन की द्वंद्वात्मक पद्धति को कभी नहीं छोड़ा। संक्षेप में, यह मार्क्सवादी सिद्धान्त के समृद्ध होने का उदाहरण है जिसके बारे में आशा की जा सकती है कि मार्क्सवाद की सार्वभौमिक सच्चाइयों को एक पिछड़े हुए देश की ठोस परिस्थितियों में सफलतापूर्वक लागू करके उसे और भी समृद्ध किया जा सकता है।

अब यह देखने के लिए कि कैसे मार्क्सवादी द्वंद्ववाद को चीन की राजनीतिक समस्याओं के समाधान हेतु लागू किया जा रहा है, आइए हम माओ त्से-तुङ द्वारा साम्राज्यवाद का कागजी शेर के रूप में किये गये बहुचर्चित चरित्र-चित्रण पर गौर करें।

लेनिन ने साम्राज्यवाद को ‘मिट्टी के पैर वाली एक विशालकाय मूर्ति’ के रूप में वर्णित किया था। एक विशालकाय भारी-भरकम मूर्ति पत्थर की बनी होने के कारण बहुत मजबूत होती है, परन्तु इस मूर्ति के पैर मिट्टी के हैं और इसीलिए यह धराशायी हो सकती है। यह मजबूत और कमजोर दोनों ही है। यही विरोधों की एकता है। विशालकाय मूर्ति की यह धारणा प्राचीन यूनानियों से ली गयी है। इसीलिए इसका सम्बन्ध भी यूरोपीय परम्परा से ही है।

परन्तु चीनी लोग एक दूसरी धारणा इस्तेमाल करते हैं, जो उनकी अपनी परम्परा से ली गयी है। वे कहते हैं कि साम्राज्यवाद एक ‘कागजी शेर’ है, लेकिन यह भी कि इसके साथ ही वह असली शेर भी है; यह शेर है और शेर नहीं भी है। इसी ढंग से माओ त्से-तुङ ने इस विषय को स्पष्ट किया है:

‘‘जिस तरह दुनिया में एक भी ऐसी चीज नहीं है जिसकी उभयधर्मी प्रकृति न हो (यही तो विरोधों की एकता का नियम है), ठीक उसी तरह साम्राज्यवाद और सारे के सारे प्रतिक्रियावादियों की भी उभयधर्मी प्रकृति है – वे एक ही साथ असली शेर भी हैं और कागजी शेर भी। विगत इतिहास में, दास-स्वामी वर्ग, सामन्ती भूस्वामी वर्ग और बुर्जुआ वर्ग, राज्यसत्ता पर विजय हासिल करने से पहले और उसके कुछ समय बाद तक, ओजस्वी, क्रान्तिकारी और प्रगतिशील रहे; तब वे असली शेर रहे। लेकिन समय गुजरने के साथ-साथ, जब उनके विरोधीकृदास वर्ग, किसान वर्ग और सर्वहारा वर्ग – कदम-ब-कदम ताकतवर होते गये, उनके विरुद्ध संघर्ष करने लगे और ज्यादा से ज्यादा दुर्जेय होते गये, तब वे सत्ताधारी वर्ग पिछड़े लोगों में तब्दील हो गये, कागजी शेर बन गये, और अन्ततोगत्वा जनता द्वारा उखाड़ फेंके गये या उखाड़ फेंके ही जायेंगे। इस तरह, वे पहले तो, असली शेर थे, जो जनता को खाते थे, लाखों-लाख जनता को खा जाते थे…-। तब फिर क्या ये जिन्दा शेर, लोहे के शेर, असली शेर नहीं थे? लेकिन अन्त में वे कागजी शेर, मुर्दा शेर, नुमाइशी शेर में तब्दील हो गये…। इसीलिए साम्राज्यवाद और सभी प्रतिक्रियावादियों के सारतत्व पर एक दीर्घकालिक दृष्टि से, एक रणनीतिक दृष्टि से, गौर करते हुए, यह जानना जरूरी है कि वे कागजी शेर हैं। इस आधार पर हमें अपनी रणनीतिक सोच बनानी चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ यह भी है कि वे जिन्दा शेर, लोहे के शेर, असली शेर भी हैं जो लोगों को खा सकते हैं। और इस आधार पर हमें अपनी रणकौशलात्मक सोच बनानी चाहिए।’’

ज्ञान का सिद्धान्त

आइए अब हम ज्ञान के उस मार्क्सवादी सिद्धान्त पर चर्चा करें जिसका प्रतिपादन माओ ने किया है और देखें कि कैसे यह ‘जन-दिशा’ (‘मास लाइन’) सम्बन्धी चीनी सिद्धान्त और व्यवहार का आधार बनता है।

मानव-ज्ञान सामाजिक व्यवहार से अर्थात बाहरी दुनिया से, और खासतौर से, उत्पादक-श्रम से भौतिक सम्पर्क के जरिए पैदा होता है। अपनी आरम्भिक अवस्था में यह इन्द्रियबोधी ज्ञान होता है, यानी ऐसा ज्ञान होता है जो सीधे इन्द्रियों द्वारा ग्रहीत छापों या प्रभावों पर आधारित होता है; लेकिन मनन-चिन्तन और विचार-विमर्श के जरिए, तथा और व्यावहारिक कार्यकलापों के जरिए, यह एक उच्चतर धरातल पर, तर्कसंगत ज्ञान के धरातल पर विकसित हो जाता है और सिद्धान्तों को जन्म देता है। फिर इस तर्कसंगत ज्ञान को बाह्य दुनिया को बदलने के उद्देश्य से व्यवहार में लागू किया जाता है और ऐसा करने के दौरान यह ज्ञान अपनेआप में और गहरा और समृद्ध बनता जाता है।

बाह्य दुनिया में समाज और प्रकृति दोनों शामिल हैं, और मानवीय अभिकर्ता जो इसे बदलते और स्वयं इसके द्वारा बदले जाते हैं, कोई पृथक-पृथक व्यक्ति नहीं बल्कि एक समूह या समुदाय या सामाजिक वर्ग में साथ-साथ जीने और काम करने वाले व्यक्ति होते हैं; अतः उनके ज्ञान में सिर्फ उतनी ही बातें नहीं शामिल होती जिन्हें वे स्वयं अपने व्यवहार से अर्जित करते हैं; बल्कि वे बातें भी शामिल होती हैं जिन्हें उन्होंने बोल-चाल और लिखने-पढ़ने से विरासत में प्राप्त किया होता हैं। इस प्रकार यह समूची प्रक्रिया ज्ञान और व्यवहार के बीच एक चक्रीय अन्तःक्रिया है।

स्वयं माओ के ही शब्दों में:

‘‘सच्चाई को व्यवहार से खोजो, और फिर व्यवहार से ही उस सच्चाई को जांचो और विकसित करो, इन्द्रियबोधी ज्ञान से शुरुआत करो और सक्रिय रूप से उसे तर्कसंगत ज्ञान में विकसित करो, तब फिर तर्कसंगत ज्ञान से शुरुआत करो तथा मनोगत और वस्तुगत दुनिया को बदलने के लिए सक्रिय रूप से क्रान्तिकारी व्यवहार का मार्गदर्शन करो। व्यवहार, ज्ञान, फिर व्यवहार और फिर ज्ञान। इस ढंग से यह क्रिया-विधान अन्तहीन चक्रों में दुहराया जाता रहता है, तथा प्रत्येक चक्र के साथ व्यवहार और ज्ञान की अन्तर्वस्तु एक उच्चतर धरातल पर उठती जाती है। यही है ज्ञान का समूचा द्वंद्वात्मक भौतिकवादी सिद्धान्त, और यही है ज्ञान और कर्म की एकता का द्वंद्वात्मक भौतिकवादी सिद्धान्त।’’

व्यावहारिक इस्तेमाल

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने जन-दिशा (मास लाइन) के सिद्धान्त के अनुसार जनसमुदायों को सही नेतृत्व प्रदान करने के उद्देश्य से अपनी व्यावहारिक कार्यवाही में ज्ञान के इस सिद्धान्त को व्यवस्थित ढंग से इस्तेमाल किया है।

फिर माओ को उद्धृत करें:

‘‘हमारी पार्टी की समूची व्यावहारिक कार्यवाही में, सही नेतृत्व सिर्फ ‘जनसमुदायों से, जनसमुदायों को’ के सिद्धान्त पर ही विकसित किया जा सकता है। इसका मतलब है जनसमुदायों के दृष्टिकोणों (अर्थात बिखरे और अव्यवस्थित दृष्टिकोणों) का समाहार (अर्थात सतर्क अध्ययन के पश्चात संयोजन और व्यवस्थापन) करना, फिर निष्कर्षित विचारों को लेकर जनसमुदायों तक पहुंचाना, उन्हें तब तक स्पष्ट और प्रचारित करते रहना जब तक कि जनसमुदाय स्वयं उन्हें अपने विचार समझ कर अपने दिलों में न रचा-बसा लें, फिर उनको लेकर उठ खड़े होना और उनके सहीपन की जांच करते हुए पुनः उन्हें कार्रवाई में उतार देना। तब एक बार फिर जनसमुदायों के दृष्टिकोणों का समाहार करना जरूरी हो जाता है ताकि जनसमुदाय तहे-दिल से अपना समर्थन दे सकें…। यही क्रम बार-बार दुहराना होगा, ताकि हर बार ये विचार और अधिक सहीपन के साथ निखरते जायें तथा अधिकाधिक जीवन्त और सार्थक बनते जायें। ज्ञान का मार्क्सवादी सिद्धान्त हमें यही शिक्षा देता है।’’

साथ ही, पार्टी जन-दिशा (मास लाइन) को प्रभावी ढंग से लागू कर सके, इसके लिए जरूरी है कि उन अन्तरविरोधों पर भी ध्यान दिया जाये जो स्वयं पार्टी के भीतर मौजूद हैं, जनता के समुदायों के भीतर मौजूद हैं, तथा जनता और पहले के शासक वर्गों, जैसे भूस्वामियों एवं पूंजीपतियों के अवशेषों के बीच मौजूद हैं।

अन्तरविरोधों को हल करना

पार्टी के भीतर नेतृत्व और कतारों के बीच एक अन्तरविरोध होता है। इसे जनवादी केन्द्रीयता के सिद्धान्त पर हल किया जाता है, जो कि उसी किस्म की एक चक्रीय अन्तःक्रिया है जो पार्टी और जनसमुदायों के बीच चलती रहती है, सिवाय इस अपवाद के कि पार्टी के भीतर यह एक उच्चतर धरातल पर चलती है।

एक और भी अन्तरविरोध है जो नेतृत्व और कतारों दोनों ही के भीतर, अधिक विकसित सदस्यों और कम विकसित सदस्यों के बीच होता है। इसे आलोचना और आत्मालोचना के सिद्धान्त पर हल किया जाता है।

लेनिन ने इस बात पर जोर दिया था कि अपनी कतारों के भीतर उनकी गलतियों को चिन्हित करने और उनसे जरूरी सबक निकालने की दृष्टि से आलोचना की कार्यवाही चलाये बगैर यह सम्भव ही नहीं है कि पार्टी जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को पूरा कर सके। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी में आलोचना और आत्मालोचना का व्यवस्थित व्यवहार अन्य कहीं की अपेक्षा एक उच्चतर धरातल पर विकसित हो चुका है। और निश्चय ही यह पार्टी की कतारों से बाहर भी फैल चुका है, जिसे मजदूर समुदायों, किसानों, सैनिकों और बुद्धिजीवियों तक ने भी अपना लिया है, जो इसे एक आदत की भांति अपनी रोजमर्रा की गतिविधियों में इतना अधिक इस्तेमाल कर रहे हैं कि पश्चिम से आने वाले पर्यटक देखकर अक्सर दंग रह जाते हैं।

इस मामले में भी, चीनी मार्क्सवादी समुदाय की सेवा के लिए व्यक्ति के आत्म-परिष्कार की प्राचीन कन्फ्युशियाई परम्परा का लाभ उठाते रहे हैं।

जनसमुदायों में एक अन्तरविरोध औद्योगिक मजदूरों और किसानों के बीच है, जिसे अब कृषि के यंत्रीकरण और जनता के कम्यूनों के विकास के जरिए हल किया जा रहा है। औद्योगिक सर्वहारा वर्ग और किसान समुदाय के बीच एक संश्रय कायम किये बगैर क्रान्ति सम्भव ही नहीं हुई होती।

संश्रयों के भीतर अन्तरविरोध

मैं औद्योगिक सर्वहारा वर्ग और किसान समुदाय के बीच अन्तरविरोध की चर्चा करते हुए, औद्योगिक सर्वहारा वर्ग और किसान समुदाय के बीच संश्रय में मौजूद अन्तरविरोध की भी चर्चा करना चाहूंगा। संश्रय की प्रकृति में भी अन्तरविरोध निहित है। मजदूर और किसान अपने मुश्तरका दुश्मन से लड़ने और इस प्रकार प्रधान अन्तरविरोध को हल करने के लिए आपस में संश्रय कायम करते हैं, लेकिन इसी में उनके बीच एक गैर-प्रधान अन्तरविरोध भी मौजूद होता है, जिसे विचारधारात्मक संघर्ष के जरिए हल किया जाता है, जिसकी बदौलत अधिक पिछड़ा वर्ग अधिक विकसित वर्ग के धरातल पर उठ जाता है।

सर्वहारा वर्ग और किसान समुदाय के बीच संश्रय का यह मसला सामाजिक क्रान्ति में एक निर्णायक कारक है। अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि कैसे समाजवादी क्रान्ति एक ऐसे देश में (यानी रूस में -अनु.) सफल हो गयी जहां औद्योगिक सर्वहारा वर्ग आबादी की उतनी ही छोटी अल्पसंख्या में था जितनी कि वह मुक्ति से पूर्व चीन में था?

इसके जवाब में दो महत्वपूर्ण बातों पर विचार करना आवश्यक है: पहली बात वस्तुगत परिस्थिति में मौजूद अन्तरविरोधों और उनके द्वारा पैदा की जाने वाली क्रान्ति की सम्भावना से सम्बन्धित है, और दूसरी बात सर्वहारा वर्ग द्वारा प्रदान किये जाने वाले नेतृत्व की प्रकृति से सम्बन्धित है – दूसरे शब्दों में, सवाल सर्वहारा वर्ग के संख्या बल का नहीं बल्कि राजनीतिक-बल का है। इसका नेतृत्व इस बात पर निर्भर करता है कि यह वस्तुगत अन्तरविरोधों, यानी जनता और दुश्मन के बीच के अन्तरविरोधों और जनता के भीतर मौजूद अन्तरविरोधों – इन दोनों को ही सही ढंग से इस्तेमाल कर पाने में कितना और कैसे समर्थ होता है।

जब मार्क्स और एंगेल्स ने कम्युनिस्ट घोषणापत्र लिखा तो उनका विश्वास था कि जर्मनी एक बुर्जुआ क्रान्ति के कगार पर था, जिसके तुरन्त बाद ही एक सर्वहारा क्रान्ति होती। लेकिन घटनाक्रम ने अलग ही मोड़ लिया, फिर भी, यह गौरतलब है कि, उनके विचार से पहली सर्वहारा क्रान्ति इंग्लैण्ड में नहीं ही होने वाली थी, भले ही वह सबसे विकसित और सबसे अधिक संख्या में सर्वहारा वर्ग रखने वाला देश क्यों न था, बल्कि उनके विचार से, यह पहली सर्वहारा क्रान्ति जर्मनी में ही होने वाली थी, जो कि अभी भी एक सामन्ती देश था, जहां किसान समुदाय और सामन्ती कुलीन तंत्र के बीच के पुराने अन्तरविरोध सामन्ती कुलीन तंत्र और बुजुर्आ वर्ग के बीच एवं बुर्जुआ वर्ग और सर्वहारा वर्ग के बीच के बढ़ते अन्तरविरोध के साथ-साथ मौजूद थे।

एक बुर्जुआ क्रान्ति और उसके तत्काल बाद एक सर्वहारा क्रान्ति अन्ततः हुई जरूर – परन्तु जर्मनी में नहीं, न ही अन्य किसी भी विकसित पूंजीवादी देश में बल्कि पिछड़े हुए देश रूस में हुई, जहां संख्या में छोटा लेकिन राजनीतिक रूप से विकसित सर्वहारा वर्ग लेनिन के नेतृत्व में किसान समुदाय के साथ संश्रय कायम करने में, जारशाही कुलीन तंत्र को उखाड़ फेंकने में, और बुर्जुआ क्रान्ति को सर्वहारा क्रान्ति में तब्दील कर देने में समर्थ हुआ।

एकता को संघर्ष के साथ जोड़ना

जैसा कि माओ त्से-तुङ ने कहा है, यह अक्टूबर क्रान्ति की लहर ही थी जिसने मार्क्सवाद को चीन में प्रवाहित किया। उस वक्त चीन जारशाही रूस से भी कहीं अधिक पिछड़ा हुआ था – जो सिर्फ सामन्ती ही नहीं, बल्कि अर्द्ध-औपनिवेशिक भी था। इसमें सर्वहारा वर्ग भी संख्या की दृष्टि से नगण्य ही था; लेकिन इसे एक ऐसी पार्टी का नेतृत्व मिला जो सिर्फ मार्क्सवाद से ही नहीं, बल्कि मार्क्सवाद के व्यावहारिक प्रयोग में अक्टूबर क्रान्ति द्वारा प्रदान किये गये अनुभव से भी लैस थी।

इस ढंग से, सारे अन्तरविरोधों का पूरा-पूरा फायदा उठाते हुए, पार्टी अपने इर्द-गिर्द आबादी के विशाल बहुसंख्यक किसान समुदाय को, पूंजीपति वर्ग के एक काफी बड़े हिस्से को, और राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग को भूस्वामियों एवं विदेशी साम्राज्यवादियों के खिलाफ लामबन्द कर लेने, मुख्य दुश्मन को अलगाव में डाल देने, और जनता के बीच के अन्तरविरोधों का कुशल संचालन करते हुए एकता को संघर्ष के साथ जोड़ने में समर्थ हो गयी।

इस प्रकार, जैसे-जैसे समाजवादी क्रान्ति दुनिया में फैलती जा रही है, वैसे-वैसे जो देश अभी भी साम्राज्यवाद द्वारा शोषित हैं – उन देशों के सर्वहारा वर्ग के छोटे आकार की भरपायी वर्ग-अन्तरविरोधों की बढ़ती प्रचण्डता और जमा होते क्रान्तिकारी अनुभव से होती जा रही है। इन्हीं सब बातों को मिलाकर ‘माओ त्से-तुङ विचारधारा’ निर्मित हुई है जो अभी तक मुक्ति-संघर्ष में लगे हुए अफ्रीका और लातिनी अमेरिका के लोगों के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण बनी हुई है।

सशस्त्र संघर्ष का सिद्धान्त

ये सारी की सारी उपलब्धियों गतिरोधी धक्कों और गलतियों के बगैर ही नहीं हासिल हुई हैं। 1949 की राष्ट्रव्यापी विजय पूर्ववर्ती वर्षों के सशस्त्र संघर्ष और मुक्त क्षेत्रों को प्रशासित करने के अनुभव के बगैर सम्भव नहीं हो सकती थी। यह पार्टी नेतृत्व के ही अन्तर्गत हुआ कि जन-मुक्ति सेना ने अपना स्वरूप ग्रहण किया और सशस्त्र संघर्ष का एक नया सिद्धान्त विकसित किया, जिसे निरन्तर आजमाया गया, जांचा-परखा गया तथा संघर्ष की बढ़ती कार्यवाहियों में विजयों और पराजयों से गुजरते हुए विकसित किया गया। यह जन-मुक्ति सेना एक ऐसी ताकत थी जो पहले मुक्त क्षेत्रों में और फिर पूरे देश में, शान्तिपूर्ण निर्माण के कामों के लिए भी अनुकूलित थी, जो सिर्फ उत्पादक श्रम में ही नहीं बल्कि अपनी मिसालें कायम करती हुईं समूची जनता के विचारधारात्मक और नैतिक स्तर को उन्नत करने में भी सक्रिय थी।

और फिर, अनुभव की कमी और अति विश्वास के चलते जनता के कम्यूनों के निर्माण में गलतियां भी हुईं, जिनमें वस्तुगत कठिनाइयां भी कारण थीं, लेकिन जन-दिशा (मास लाइन) के इस्तेमाल से इन गलतियों को चिन्हित और ठीक कर लिया गया। ये जन कम्यून ही थे जो 1956-61 के दुर्दिन भरे वर्षों में, अर्थव्यवस्था को बिना किसी जान-माल की क्षति के, खड़े रहने में समर्थ बना सके; लेकिन इसी के साथ उन वर्षों की कठिनाइयों ने कम्यूनों की कमजोरियों को भी उजागर कर दिया, जिसके नाते यह आवश्यक हो गया कि उन्हें दूर किया जाये। इस ढंग से खराब चीज अच्छी चीज में तब्दील कर ली गयी।

विचारधारात्मक संघर्ष को जारी रखना

लेकिन, निश्चय ही इससे यह नहीं मान लेना चाहिए कि चीन में वर्ग-संघर्ष खत्म हो गया है। बेशक अर्थव्यवस्था को एक समाजवादी आधार पर पुनर्गठित कर लिया गया है, फिर भी बुर्जुआ और निम्न-बुर्जुआ और यहां तक कि सामन्ती विचार भी अभी जीवित हैं, और इसीलिए आवश्यक है कि यह संघर्ष विचारधारात्मक और आर्थिक दोनों ही स्तरों पर जारी रहे। समाजवादी व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण और साम्यवाद में संक्रमण एक लम्बी ऐतिहासिक प्रक्रिया है, जो विचारधारात्मक संघर्ष में कोई भी ढील दिये जाने पर अवरुद्ध हो सकती है, या यहां तक कि उलट भी सकती है। यह बात भी माओ त्से-तुङ के अन्तरविरोध के सिद्धान्त के अनुरूप ही है।

आम तौर पर, जैसा कि वह स्पष्ट करते हैं, समाज को गति देने में, विचारधारात्मक अधिरचना के विपरीत, आर्थिक मूलाधार ही अन्तरविरोध का प्रधान पहलू होता है, जबकि विचारधारात्मक अधिरचना उसका गैर-प्रधान पहलू; परन्तु कुछ निश्चित दशाओं में अन्तरविरोध का यह गैर-प्रधान पहलू ठीक वैसे ही उसके प्रधान पहलू में तब्दील हो सकता है, जैसे एक गैर-शत्रुतापूर्ण अन्तरविरोध, गलत ढंग से संचालित होने पर, शत्रुतापूर्ण बन सकता है।

पुराने विचार अपनेआप ही नहीं खत्म होते: इसके विपरीत, वे बरकरार रहते हैं, और अगर उनसे लड़ा न जाये तो वे पुनः आर्थिक मूलाधार को प्रभावित करने के बिन्दु तक भी प्रभावी बन सकते हैं, और इस तरह पुराने वर्ग-विभाजनों को फिर से प्रकट भी कर सकते हैं।

इस मामले में, युवाओं की देख-रेख पर खास तौर पर ध्यान दिया जा रहा है। एक तरफ, युवा लोगों को अपने मां-बाप से अधिक अनुकूल स्थिति तो प्राप्त हुई है कि उनकी परवरिश और शिक्षा-दीक्षा एक समाजवादी वातावरण में हो रही है। लेकिन, दूसरी तरफ, इसी के नाते यह भी है कि उनके पास वर्ग-उत्पीड़न या तकलीफ झेलने का वैसा कोई प्रत्यक्ष अनुभव नहीं है जैसा उनके बाप-दादाओं को समाजवाद के लिए संघर्ष करते हुए झेलना पड़ा था।

स्कूलों में विशेष उपाय यह सुनिश्चित करने के लिए किये जा रहे हैं कि वे उस संघर्ष से पूरी तरह वाकिफ होते हुए पलें-बढ़ें जो उनको सुलभ हुए इन अवसरों को पैदा करने के लिए करना पड़ा था। फैक्टरियों में, ऐसे उम्रदराज मजदूरों को, जिन्होंने ऐसे संघर्षों में भाग लिया था, विशेष ओहदे दिये जाते हैं – मसलन फैक्टरी लाइब्रेरी का काम – और अपने अनुभवों को दूसरों तक पहुंचाने के लिए उन्हें विशेष अवसर भी सुलभ कराये जाते हैं। जनता के कम्यूनों में, जब नये घर बनते हैं तो एक या दो पुरानी मड़इयों को जस का तस रहने दिया जाता है, ताकि बड़े-बूढ़े लोग उनकी ओर देखकर यह कह सकें कि ‘‘यही वह जगह है जहां हम मुक्ति से पहले रहा करते थे।’’ इन सबका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि क्रान्तिकारी भावना नवोदित पीढ़ी में रिसती रहे।

विचारधारात्मक संघर्ष बहस-मुबाहसों के रूप में चलाया जाता है – कामगार समूह के सदस्यों के बीच बहस, फैक्टरी अखबार में बहस, स्थानीय प्रेस में बहस, और राष्ट्रीय प्रेस में बहस। हर जगह बहसें चलती रहती हैं, राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय दोनों ही मुद्दों पर और सिर्फ चालू मुद्दों पर ही नहीं, बल्कि वैसे सैद्धान्तिक सवालों पर भी, जिनकी चर्चा मैं इस व्याख्यान में करता आ रहा हूं। अब आगे मैं इन्हीं सैद्धान्तिक बहसों की चर्चा करूंगा, जो खासतौर से मार्क्सवाद के अध्ययन से सम्बन्धित है।

‘‘सिद्धान्त जनसमुदायों को ओतप्रोत कर देता है’’

मार्क्स ने कहा था कि जब सिद्धान्त जनसमुदायों को ओतप्रोत कर देता है तो वह एक भौतिक शक्ति बन जाता है। आज पूरे चीन में यही हो रहा है।

इसके साथ-साथ इतना और कहा जा सकता है कि जब सिद्धान्त मजदूर वर्ग के समुदायों को ओतप्रोत कर देता है, तब बुद्धिजीवी फिर से व्यवहार के साथ जुड़ने लगते हैं, और इस प्रकार शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम के बीच का विभाजन, जो कि वर्ग-समाज की अभिलाक्षणिक विशिष्टता है, गायब होने लगता है।

दस वर्ष पहले मैंने चीनी भाषा का अध्ययन करने के सिलसिले में छः माह पीकिङ युनिवर्सिटी में गुजारे। मेरे कमरे की देखभाल एक मजदूर किया करता था जो करीब तीस वर्ष का था, जिससे मैं खूब अच्छी तरह परिचित हो गया था कारण कि हम दोनों रोजाना कई-कई बार मिलते रहते थे। वह सायंकालीन कक्षाएं करता था, जिनमें वह पढ़ना और लिखना सीखता था, और हम दोनों लिपि पर पूरा अधिकार कर लेने के अपने संघर्ष में एक दूसरे की मदद भी किया करते थे।

जहां तक मार्क्सवाद की बात है, तो वह यही कहा करता था कि वह मार्क्सवाद में यकीन करता है – भला वह ऐसा क्यों नहीं कहता, वह देख रहा था कि पार्टी इसमें यकीन करती थी, और पार्टी ने ही उसके लिए इतना सब कुछ किया भी था, फिर वह अपने आंखों में आंसू भरकर, पुराने चीन में अपनी जिन्दगी का बयान करता और उन परिवर्तनों की चर्चा करता जो मुक्ति के बाद हो चुके थे, इन सबका श्रेय वह पार्टी को ही देता, लेकिन जहां तक मार्क्सवाद की बात थी, तो वह इसे समझने की आशा नहीं कर सकता था, कारण कि उसने अभी-अभी तो पढ़ना सीखने की शुरुआत की थी। पिछली सितम्बर में मैंने फिर पीकिङ यूनिवर्सिटी का दौरा किया और उससे मुलाकात की। अब वह मार्क्सवाद का अध्ययन कर रहा था।

वर्ग-चेतना और शैक्षिक स्तर

बुद्धिजीवियों की तुलना में वहां के मजदूरों और किसानों की वर्ग-चेतना ऊंची है, परन्तु उनका शैक्षिक स्तर नीचा है। इसके कारण लम्बे समय तक उनके लिए मार्क्सवादी सिद्धान्त का अध्ययन करना कठिन बना रहा, लेकिन अब यह कठिनाई दूर होती जा रही है।

1958 में जहाज के कारखाने में काम करने वाले कुछ मजदूरों ने स्वयं अपनी पहलकदमी पर शंघाई में दर्शन पर एक कक्षा का आयोजन किया, और यह बहुत ही सफल रहा। इसकी रिपोर्ट प्रेस में प्रकाशित हुई, और उनके इस उदाहरण का अनुसरण पूरे देश के मजदूरों और किसानों के समूहों ने किया। वैसे इस अभियान को 1959-61 के वर्षों में एक गतिरोधी धक्का भी लगा, परन्तु उसके बाद इसने अपनी रफ्तार फिर पकड़ ली और अब तो यह पहले हमेशा से कहीं अधिक वेगवान और व्यापक बन चुका है।

पिछले वर्ष के आरम्भ में, पार्टी की केन्द्रीय कमेटी के एक सदस्य याङ सिएन-चेन ने एक अखबार में द्वंद्ववाद पर एक आलेख प्रकाशित किया, जिसको लेकर एक राष्ट्रव्यापी विवाद उठ खड़ा हुआ है। इस आलेख में याङ सिएन-चेन ने क्लासिकीय चीनी दर्शन के एक सूत्र ‘दो एक में शामिल’ को लेकर अपनी बात की शुरुआत करते हुए इसकी ऐसी व्याख्या की थी कि इससे यह नतीजा निकलता था कि द्वंद्ववाद का मुख्य काम अन्तरविरोधों को विरोधों के बीच उभाड़ना नहीं, बल्कि इसके विपरीत उन विशिष्टताओं पर जोर देना है जो उनमें उभयनिष्ठ हैं। दूसरे शब्दों में, उसका दावा यह था कि विरोधों की एकता प्राथमिक है और विरोधों के बीच संघर्ष गौण।

इस दृष्टिकोण को तत्काल चुनौती दी गयी। देश के सभी भागों से सैकड़ों लेख प्रेस में प्रकाशित हुए, जिनमें से ज्यादातर मजदूरों और किसानों के लेख थे। शुरू-शुरू में जो विचार प्रकट हुए वे कमोबेश समान रूप से दो दृष्टिकोणों में बंट गये, और विवाद इस रूप में हो गया कि ‘दो-एक में या एक-दो में,’ परन्तु उसके बाद सन्तुलन बदलने लगा, और पिछले कुछ महीनों से इस विवाद में शिरकत करने वालों का भारी बहुमत दूसरे दृष्टिकोण का समर्थक बन चुका है, जो द्वंद्ववाद पर लेनिन की इस व्याख्या के अनुरूप है कि विरोधों के बीच सम्बन्ध के मामले में संघर्ष निरपेक्ष है और एकता सापेक्षिक।

पहले कभी भी दर्शन के इतिहास में एक सैद्धान्तिक सवाल को लेकर इतने बड़े पैमाने पर जनसमुदायों के बीच बहस नहीं हुई थी।

सैद्धान्तिक ज्ञान को उत्पादन में लगाना

पिछले कुछ वर्षों के दौरान, एक लगातार बढ़ते पैमाने पर, फैक्टरियों में, खेतों में, और जन मुक्ति सेना की यूनिटों में, मजदूर और किसान अपने सैद्धान्तिक ज्ञान को सीधे उत्पादन की समस्याओं के समाधान में लगाने लगे हैं। और यह बार-बार देखने में आ रहा है कि मार्क्सवादी दर्शन पर कक्षाओं का एक सिलसिला चलने के बाद उत्पादन में बढ़ोत्तरी हो जा रही है।

वहां, व्यवहार के बारे में, अन्तरविरोध के बारे में, और जनता के बीच अन्तरविरोधों को सही ढंग से हल करने के बारे में सबसे लोकप्रिय पाठ्यपुस्तकें हैं। मुझे एक ऐसे फैक्टरी मजदूर के बारे में बताया गया जो, अन्तरविरोध के बारे में का अध्ययन कर लेने के बाद वह जिस फैक्टरी में काम करता था उसमें, उत्पादन-प्रक्रिया में प्रधान अन्तरविरोध को पहचानने के काम में लग गया और कुछ ऐसी-ऐसी समस्याओं को हल कर लेने में सफल हो गया जिन्हें पहले वह मशीनों के इंचार्ज तकनीशियनों के जिम्मे छोड़ चुका था। उसने अपने निष्कर्षों पर अपने कामगार साथियों के साथ विचार-विमर्श किया और उसके कामगार समूह ने प्रस्ताव बनाकर तर्कसंगत निरूपण के लिए अग्रसारित कर दिया, जिन्हें प्रबन्धतंत्र ने स्वीकार कर लिया।

मुझे एक किसान औरत के बारे में बताया गया जो पांच बच्चों की मां थी, और खेतों में काम करती थी। अपने काम से फुरसत के समयों में उसने माओ त्से तुङ की सारी रचनाओं और अन्तरराष्ट्रीय विवाद के मुद्दों पर पक्ष-विपक्ष के सारे मुख्य दस्तावेजों का अध्ययन कर डाला। उसके बाद से तो उसे अपने कम्यून के अन्य हिस्सों में तथा दूसरे कम्यूनों में भी खुली बहसों में भाग लेने और यह बताने के लिए आमंत्रित किया जाने लगा है कि कैसे वह सिद्धान्त और व्यवहार को इस ढंग से समेकित करने में सफल हुई कि उत्पादन का स्तर बढ़ सके।

इस तरह लोग अपने सैद्धान्तिक स्तर को उन्नत करके अपने व्यवहार को उन्नत कर रहे हैं, और ऐसा करते हुए अपने उन मजदूर-साथियों के लिए एक मिसाल कायम कर रहे हैं जो इसका अनुसरण करते हुए और भी व्यापक अध्ययन समूहों के नाभि-केन्द्र बनते जा रहे हैं, और उत्पादन में और सुधार करते हुए क्रमशः पूरे समुदाय के विचारधारात्मक और नैतिक स्तर को उन्नत करते जा रहे हैं।

इस प्रकार, माओ ने व्यवहार, ज्ञान, फिर व्यवहार और फिर ज्ञान की जो चक्रीय प्रक्रिया बतायी, वह अब पूरे चीन में फैलती जा रही है। और यह तो अभी शुरुआत भर है।

शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम के बीच की खाई को पाटना

मैंने जिन मजदूरों का जिक्र किया है, उनके अलावा, मेरे सबसे घनिष्ठ मित्र पीकिङ युनिवर्सिटी के शिक्षक समुदाय के सदस्य थे, जिनमें से ज्यादातर युवा थे, और एक को छोड़कर सभी के सभी निम्न बुर्जुआ और बुर्जुआ वर्ग से आये हुए थे, एक अपवाद था जो एक भूतपूर्व भूस्वामी परिवार का था। वे सभी के सभी मार्क्सवाद को खूब अच्छी तरह पढ़े हुए थे, परन्तु मजदूरों से उनका कोई सम्पर्क न था। यह उनके लिए एक भारी समस्या थी। उनके लिए यह प्रस्ताव रखा गया था कि वे मार्क्सवाद पर मजदूरों की कक्षाएं लें, परन्तु जब ऐसी कक्षाओं का प्रयोग आजमाया गया तो सफल नहीं हुआ, कारण कि उनकी समझ में ही नहीं आता था कि मजदूर क्या चाहते थे। हमने भी इस समस्या पर कई बार विचार-विमर्श किया परन्तु कोई हल न निकल सका। लेकिन यह स्थिति भी अब बदल चुकी है। कारण कि विगत कई वर्षों से पार्टी के और सरकार के सभी पदाधिकारियों के लिए यह आवश्यक बना दिया गया है कि वे अपना एक निश्चित समय शारीरिक श्रम करने में लगायें। अब काम की नियमित अवधियों में – जैसे वर्ष में महीने भरकृ फैक्टरी प्रबन्धक फैक्टरी शाप में काम करता है, जन-कम्यून का चेयरमैन खेतों में काम करता है, और फौजी जनरल साधारण सैनिकों की कतारों में काम करता है।

पेशेवर वर्गों के दूसरे तबकों के बीच शारीरिक श्रम स्वैच्छिक है, परन्तु स्वैच्छिक काम करने वालों की भी कोई कमी नहीं है। पीकिङ युनिवर्सिटी के प्रोफेसर और लेक्चरर पश्चिमी पहाड़ियों में एक गरीब ग्रामीण श्रमिक की भांति काम करने जाते हैं, कारण कि वहां की सारी लगभग वयस्क पुरुष आबादी को जापानियों ने मार डाला था। वहां वे काम करते हैं, किसानों के साथ रहते हैं, दिन में उनके साथ खेती के काम में भागीदारी करते हैं और शाम को उनकी कक्षाएं और व्याख्यान आयोजित करते हैं। मजदूरों के साथ इस सम्पर्क की बदौलत उनकी वर्ग-चेतना उन्नत हो गयी है।

यही बात छात्रों की भी है। वे हर साल एक या दो महीने, तीन ‘एक साथ’ – ‘एक साथ रहो, एक साथ खाओ, एक साथ काम करो’ – के सिद्धान्त के अनुसार, फैक्टरियों में या खेतों में मजदूरों और किसानों के साथ काम करते हुए गुजारते हैं।

इस बीच, युनिवर्सिटी में मजदूर वर्ग के छात्रों की संख्या तेजी से बढ़ी है, और हाल ही में एक नये प्रकार के स्कूल के प्रयोग भी चालू किये गये हैं, जिनमें बच्चे उत्पादक श्रम से जोड़ कर अध्ययन करते हैं। इस ढंग से मानसिक श्रम करने वाले शारीरिक श्रम करने वाले बन रहे हैं, और शारीरिक श्रम करने वाले मानसिक श्रम करने वाले बन रहे हैं।

कलाओं पर प्रभाव

युनिवर्सिटी और स्कूलों से बाहर, शारीरिक श्रम में भागीदारी का यह आन्दोलन सारे पेशेवर लोगों के बीच फैलता जा रहा है। इसमें लेखक, चित्रकार, वास्तुकार, अभिनेता, संगीतज्ञ, नर्तक – सभी के सभी शामिल हैं। हालांकि यह अभी कुछ ही वर्ष पहले शुरू हुआ है, फिर भी इसका कला पर प्रभाव अभी से दिखायी पड़ने लगा है।

चीन में चित्रकारी, कविता और संगीत की परम्परा बहुत पुरानी है। चित्रकारी और ओपेरा दोनों में ही परम्परागत शैली को समसामयिक विषयवस्तु के लिए अपनाया जा रहा है। बेशक इस बात को भी समझा जा रहा है कि अन्तर्वस्तु में बदलाव लाना तब तक संभव नहीं है जब तक कि रूप में भी बदलाव न लाया जाये – यहां भी हमें विरोधों की एकता दिखायी देती है; लेकिन इसका उद्देश्य यह है कि अन्तर्वस्तु को विकसित करके उसे ऐसे ढंग से अन्तरविरोध का प्रधान पहलू बना दिया जाये कि जैविक रूप से एक ऐसी नयी एकता विकसित हो जो कलाकारों और जनता के बीच एक नयी एकता के अनुरूप हो।

बेशक इसमें तमाम समस्याएं भी हैं जिनको हल करना जरूरी है, और जब भी कोई नयी चित्र प्रदर्शनी लगती है, जब भी कोई नया ओपेरा प्रस्तुत होता है, इन समस्याओं पर बड़ी शिद्दत से विचार-विमर्श किया जाता है। और समाधान की दिशा में पहला कदम उठाए भी गये हैं। कलाकार अब समझ गया है कि जनता को प्रेरणा देने के लिए उसे स्वयं भी जनता से प्रेरणा लेनी होगी। और इसी प्रक्रिया के तहत, कलाकारों से नजदीकी सम्पर्कों की बदौलत, जनता का कलात्मक स्तर भी उठता जा रहा है।

देश के सभी भागों में लोक-प्रचलित गीतों, कलाओं और शिल्पों को फिर से जिन्दा किया जा रहा है – जिनमें से कुछ तो पचास वर्ष पहले ही लुप्त हो जाने के कगार पर जा पहुंचे थे; पश्चिमी संगीत और बैले को भी शामिल किया जा रहा है, जिनकी अपनी विशेषताएं तो हैं ही, साथ ही यह भी है कि उनमें ऐसे तत्व हैं जिन्हें राष्ट्रीय परम्पराओं को विकसित करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इस ढंग से मजदूरों और किसानों की कलात्मक प्रतिभाएं अपनी अभिव्यक्ति के नये आयाम ग्रहण कर रही हैं। अब कलाएं अधिकाधिक रूप से समूची जनता की सृजनात्मक गतिविधि बनती जा रही हैं।

इसका प्रत्यक्ष सबूत मुझे 1 अक्टूबर के विशाल जुलूस में देखने को मिला। मैं 1952 में इस अवसर पर मौजूद था। वह मुक्ति की तीसरी वर्षगांठ थी। दूसरी बार मैं इसकी पांचवी वर्षगांठ के अवसर पर उपस्थित हुआ। तब तक हालात में जबर्दस्त बदलाव आ चुके थे।

अब स्वर्गिक शांति का दरवाजा एक विशाल प्रांगण में खुलता है, जिसकी बायीं तरफ क्रान्ति का संग्रहालय और दायीं तरफ जन-कांग्रेस का सभागार है, और सामने एकाश्मी स्मारक है जो इस परिदृश्य के आखिरी छोर पर उन शहीदों की याद में बनाया गया है जिन्होंने मुक्ति-युद्ध में अपने प्राणों की आहुति दी थी। जुलूस ठीक दस बजे शुरू हुआ और ठीक बारह बजे खत्म हुआ – जनता के सभी तबकों और राष्ट्रीय जीवन के हरेक क्षेत्र से आये साढ़े सात लाख लोगों का झण्डे लहराते हुए, संगीत की लय-ताल के साथ गुजरना – यह सब एक ऐसा कल्पनाप्रवण दृश्य था कि कभी-कभी तो सांस ही थम जाती थी, और यह सब बेहद खूबसूरत था – एक अति प्राचीन और समृद्ध सभ्यता की ऐसी प्रखर अभिव्यक्ति जो मार्क्सवाद से पुनः ऊर्जस्वित होकर एकबारगी एक नये जीवन के रूप में फूट पड़ी थी।

उसी शाम वह प्रांगण आतिशबाजियों की झड़ी के बीच एक बार फिर दस लाख से भी ज्यादा लोगों से भर उठा, जो लगातार रात भर नाचते रहे, खुशियां मनाते रहे, और बीथोवन की कोरल सिम्फनी की इन्सानी भाइचारे की पैगामभरी स्वरलहरी के उत्कर्ष का साक्षात जीवन्त रूप बनते रहे।

दर्शकों में, राष्ट्रीय नेताओं और दुनिया के सभी भागों से आये विदेशी दर्शकों के साथ, माओ त्से-तुङ भी थे।

मुझे उन्हीं के शब्दों में उपसंहार करने दें:

‘‘यह प्रक्रिया दुनिया को बदलने का यह व्यवहार, जो वैज्ञानिक ज्ञान के अनुसार निर्धारित है, अब इस दुनिया में और चीन में अपनी एक ऐतिहासिक मुकाम पर, यानी मानव इतिहास के एक ऐसे बड़े मुकाम पर आ पहुंचा है जो इस दुनिया से और चीन से अंधकार को पूरी तरह से मिटा देने और दुनिया को एक ऐसे प्रकाश-लोक में तब्दील कर देने का मुकाम है जो पहले कभी नहीं रहा।’’

निजी स्वार्थ से लड़ो

चीन में सांस्कृतिक क्रान्ति के इस खास चरण में पूरे देश की जनता का आह्वान किया जा रहा है कि वह अपने निजी स्वार्थों से लड़े और संशोधनवाद को उखाड़ फेंके। इन दोनों धारणाओं के बीच क्या सम्बन्ध है? इनका एक समाजवादी समाज की रचना के सन्दर्भ में क्या अभिप्राय है?

ब्रिटेन जैसे एक बुर्जुआ समाज में – या ऐसे किसी भी देश में –  मानव-व्यवहार की प्रमुख प्रेरणा निजी स्वार्थ ही है। ऐसे समाज में हरेक आदमी को बाकी के साथ – यहां तक कि अपने कामगार साथियों और पड़ोसियों के साथ भी – प्रतियोगिता करने में अपने निजी स्वार्थ हेतु लड़ना पड़ता है। और इस प्रतियोगिता को स्वाभाविक और प्रगति में सहायक भी माना जाता है। इसका सिद्धान्त यह है कि जब समाज के सभी व्यक्तियों में से हर कोई अपने-अपने निजी स्वार्थ और लाभ के पीछे लगा रहता है तो सबकी कार्यवाहियां मिलकर अपने आप ही कार्यवाहियों का एक ऐसा विराट योगफल बन जाती हैं जो समूचे समाज के लिए लाभदायक होता है।

जैसा कि एडम स्मिथ द वेल्थ आफ नेशन्स में बताते हैं, ‘‘हम कसाई, शराब-भट्टी चलाने वाले और नानबाई की कृपा से अपने डिनर की उम्मीद नहीं करते, बल्कि उनकी अपनी स्वार्थ-सिद्धि के चलते उम्मीद करते हैं। हम उनकी ओर उनकी मानवता के नाते नहीं बल्कि उनके निजी स्वार्थ-प्रेम के नाते मुखातिब होते हैं, और कभी भी अपनी जरूरतों के नाते नहीं, बल्कि उनके लाभों के नाते उनकी चर्चा करते हैं।’’

चूंकि पूंजीवादी समाज का मुख्य उत्तोलक उसका निजी स्वार्थ ही है, इसलिए इसका मतलब यह हुआ कि इसे एक समाजवादी समाज द्वारा विस्थापित करने के लिए बुर्जुआ उपयोगितावादी आचार-शास्त्र वाली स्वार्थ पूजा से कुछ भिन्न प्रेरणा की दरकार होगी। क्या यह मान लेना तर्कसंगत होगा कि पूंजीवादी समाज का चरित्र-निर्धारण करने वाले उत्प्रेरण और प्रोत्साहन समाजवाद को जन्म दे सकते हैं?

परन्तु, ब्रिटेन जैसे देश के जनवादी समाजवादी, फैबियन और लेबर पार्टी के वर्तमान सिद्धान्तकार हरदम यही कहते आ रहे हैं कि ऐसा होना तर्कसंगत है। उनकी पूंजीवादी समाज की आलोचना, उसे संचालित करने वाली प्रेरणाओं को नकारने पर नहीं बल्कि प्रतियोगिता में समान अवसर के अभाव पर आधारित होती है। उनका तरीका स्वयं इस प्रतियोगिता पर ही सवाल उठाने के बजाय, हरदम इस सुधारात्मक कोशिश का ही होता है कि सबके लिए खुले रूप से अपेक्षाकृत अधिक अनुकूल शर्तों का युक्ति-विधान किया जाये।

लेकिन पूंजीवादी समाज की मार्क्सवादी आलोचना इससे गहरे जाती है। सामाजिक प्रेरणा और उसके नतीजों के सामान्य मुद्दे पर मार्क्स ने दो बातें स्पष्ट कही हैं: 1. पूंजीवादी व्यवस्था के अन्तर्गत जिन निजी स्वार्थगत कार्रवाइयों को एक कल्याणकारी सामाजिक-व्यवस्था लाने का हेतु माना जाता है, वे दरहकीकत व्यवस्थित शोषण को ही जन्म देती हैं। इस शोषण के शिकार स्वयं पूंजीवादी देश के मजदूर तो होते ही हैं, इससे भी अधिक शोषण के शिकार औपनिवेशिक क्षेत्रों के मजदूर और किसान होते हैं, क्योंकि उन पर विजय के साथ-साथ पूंजीवाद भी अनिवार्यतः अपना विस्तार करता जाता है; 2. यह शोषण बुर्जुआ वर्ग की प्रभुत्वशाली अवस्थिति पर आधारित है, जो उत्पादन के साधनों पर अपने नियंत्रण के जरिए हमेशा ही अपनी निजी शर्तें थोपने की स्थिति में रहता है – और वह भी सिर्फ अपनी आर्थिक सत्ता के जरिए ही नहीं, बल्कि उस समूचे राज्य-उपकरण के इस्तेमाल के जरिए भी, जिस पर इसी का नियंत्रण है। अतः यह उम्मीद करना एकदम ख्याली पुलाव पकाना है कि शोषण, वर्ग-सम्बन्धों में एक बुनियादी बदलाव लाये बगैर, यों ही खत्म हो सकता है, जब कि इस तरह का बदलाव ही सामाजिक प्रेरणा की एक सर्वथा भिन्न अवधारणा का आधार और आवश्यकता पैदा कर सकता है।

लेकिन तथाकथित मार्क्सवादियों तक में भी ऐसे लोग रहे हैं जो पूंजीवाद से समाजवाद में ठीक वैसे ही विशुद्ध यांत्रिक संक्रमण का विश्वास रखते रहे हैं जैसे पूंजीवाद के समर्थक निजी स्वार्थों के सार्वजनिक हित में विशुद्ध यांत्रिक संक्रमण का विश्वास रखते रहे हैं।

शुरुआती दौर के संशोधनवादी काउत्स्की ने मार्क्स की यह कहकर आलोचना की कि उन्होंने दास कैपिटल में नैतिक गर्मजोशी दिखाई थी, जिसके विरोध में उसकी दलील यह थी कि नीतिशास्त्रीय सोच-विचार का वैज्ञानिक समाजवाद में कोई स्थान नहीं है; कि पूंजीवादी समाज के आर्थिक अन्तरविरोध तो स्वयमेव ही एक ऐसा संकट ला देंगे कि उसका समाधान समाजवाद में ही हो सकेगा। तब तो इस कहने का मतलब यह था कि शोषण के शिकार लोगों को महज चुपचाप बैठे रहने और यह इन्तजार भर करते रहने की जरूरत थी कि कब ऐसा होगा।

क्रान्तिकारी मानवतावाद

लेनिन ने इस प्रकार की चिन्तन-धारा के पूर्णतः गैर-मार्क्सवादी चरित्र को बेनकाब किया और स्पष्ट किया कि क्रान्तिकारी सामाजिक बदलाव को तिलांजलि दे देना वस्तुतः बुर्जुआ वर्ग के हितों की ही सेवा करना होगा। इसके विपरीत, क्रान्तिकारी सिद्धान्त के मार्गदर्शन में और क्रान्तिकारी नैतिकता से अनुप्राणित हो कर चलने वाला क्रान्तिकारी आन्दोलन ही समाज को इस रूप में रूपान्तरित करने में समर्थ हो सकता है कि शोषण का खात्मा हो सके। और यह क्रान्तिकारी नैतिकता सर्वहारा नैतिकता ही हो सकती है (जैसा कि चीन में मौजूद है) क्योंकि केवल मजदूर वर्ग ही ऐसी क्रान्ति कर सकता है।

लेकिन आज भी, स्वयं लेनिन के ही देश में, वर्तमान सोवियत नेतृत्व उसी पुरानी संशोधनवादी गलती की ओर बहक गया है जिसका कारण उसका यह मान लेना ही है कि समाजवादी, अर्थात सर्वहारा नैतिकता के बगैर भी एक समाजवादी समाज बनाया जा सकता है। इसी के चलते वहां का नेतृत्व गैर-बुर्जुआ सामाजिक उपलब्धियां हासिल करने के लिए बुर्जुआ प्रोत्साहन देने की कोशिश कर रहा है, और यह मानकर चल रहा है कि अर्थव्यवस्था की दुरुस्ती तो अपनेआप ही अच्छा समाज पैदा कर सकती है। इसीलिए चीनी नेतृत्व, लेनिन का अनुसरण करते हुए, भौतिक लाभों के जरिए लोगों को घूस देने की इस नीति को ‘अर्थवाद’ कहता है। चीन की सांस्कृतिक क्रान्ति में आलोचना के मुख्य निशानों में से एक निशाना सामाजिक प्रेरणा के लिए की जा रही यह कोशिश ही है।

सोवियत संघ में सामाजिक विकास के इन हाल के अनुभवों ने सिर्फ इतना भर ही प्रदर्शित किया है कि उत्पादन के साधनों पर काबिज निजी स्वामियों का स्वत्वहरण करके समाज के आर्थिक आधार को बदल देने से समाजवाद की सिर्फ बुनियादी संभावना भर पैदा होती है। लेकिन बुर्जुआ विचारों की आदतों, बुर्जुआ प्रेरणा, और समूचे बुर्जुआ दृष्टिकोण से विचारधारात्मक स्तर पर अभी भी लड़ने और उन्हें शिकस्त देने की जरूरत होती है ताकि समाजवादी मनुष्य का प्रादुर्भाव हो सके। अपने निजी स्वार्थ से ही नहीं बल्कि और को प्राथमिकता देने, और अपने निजी भौतिक लाभ के लिए नहीं बल्कि समाज के हित में काम करने के समाजवादी संवेग से प्रेरित समाजवादी मनुष्य के बगैर, समाजवादी व्यवस्था सुदृढ़ नहीं हो सकती।

चीन में सांस्कृतिक क्रान्ति इसी बात को लेकर चल रही है। यह बुर्जुआ सोच और कार्रवाई के पुराने स्वार्थपूर्ण रूपों को बेपर्द करने और खत्म करने तथा उनकी जगह पर सोच और कार्रवाई के सर्वहारा, यानी गैर-निजी रूपों को स्थापित करने के काम में लगी हुई है। यह कोई युटोपियाई, भाववादी या नीतिशास्त्रीय आन्दोलन नहीं है, कारण कि सोच और कार्रवाई के इन नये तौर तरीकों का समाजवादी आर्थिक आधार तो पहले ही तैयार हो चुका है।

सांस्कृतिक क्रान्ति इस प्रतिक्रियावादी बुर्जुआ उक्ति का समाजवादी प्रत्युत्तर है कि ‘आप मानव-स्वभाव को नहीं बदल सकते’। चीन में, माओ त्से-तुङ विचारधारा के मार्गदर्शन में, और साथ ही पूरे देश की तसवीर बदल रहे प्रचण्ड भौतिक परिवर्तनों के चलते, स्वयं मानव-स्वभाव भी बदलता जा रहा है। बेशक ऐसा बदलाव रातोरात नहीं हो सकता। एक निजी स्वार्थ पर आधारित और दूसरी जनता की सेवा पर आधारित, इन दो वर्ग-विचारधाराओं के बीच संघर्ष ‘लम्बे समय तक और पेंचदार ढंग से चलता रहेगा तथा समय-समय पर बहुत तीखा भी होता रहेगा।’

यही माओ के महान अवदानों में से एक है जो दृढ़तापूर्वक किसी भी ऐसी कोशिश को खारिज करता है जो मार्क्सवाद को एक ऐसे यांत्रिक सूत्र में तब्दील करना चाहती है जिसमें मानवीय मूल्यों और आकांक्षाओं की कोई गुंजाइश न हो। अन्तरविरोध के बारे में जैसी कृतियों में आर्थिक मूलाधार और विचारधारात्मक अधिरचना की द्वंद्वात्मक अन्तःक्रिया की बात बताते हुए उन्होंने स्पष्ट दिखा दिया है कि एक ऐसा मुकाम आता ही है जब अधिरचना, जिसमें नीतिशास्त्र और संस्कृति शामिल हैं, समाजवादी आर्थिक मूलाधार के और विकास में बाधा बन जाती है। इसीलिए एक सांस्कृतिक क्रान्ति के जरिए इस बाधा को पार करना अनिवार्य तौर पर समाज का एक प्रमुख सरोकार बन जाता है। उदाहरण के लिए, यदि एक कम्यून में, कोई किसान, पुराने विचारों से चिपके रहकर, सिर्फ यही सोचता रहे कि अपने निजी खेत को कैसे अधिक उपजाऊ बना ले और कैसे एक और सुअर रख ले, तो वह पूरे समुदाय को और अन्ततोगत्वा अपने आपको भी अवरुद्ध ही करता रहेगा।

माओ पूंजीवाद के समर्थकों और मार्क्सवाद के संशोधनकर्ताओं के विरुद्ध, जिस बात की जोरदार ढंग से हिमायत करते हैं वह मानवतावाद की भूमिका ही है जो सामाजिक विकास में अदा की जानी है – लेकिन यह उदार मानवतावाद नहीं है जो यह मानकर चलता है कि हरेक सवाल के दो पक्ष होते हैं, बल्कि यह क्रान्तिकारी मानवतवावाद है जो उत्पीड़ितों के पक्ष में खड़ा होकर, हमारे समय की महान ऐतिहासिक घटनाओं का स्वरूप निर्धारित कर रहा है। जहां कुछ लोग इस भ्रम में हैं कि गरीब देशों के आर्थिक विकास के लिए बाहर से भौतिक सहायता जरूरी है, वहीं माओ हमें बताते हैं कि देश की सम्पदा तो उसकी जनता होती है जो, एक बार साम्राज्यवादी प्रभुत्व के चंगुल से मुक्ति पा लेने के बाद, स्वयं अपनी गरीबी का अन्त कर सकती है। जहां कुछ लोग इस भयादोहन के भी शिकार हो सकते हैं – यह जानकर – कि आज दुनिया में परमाणु बमों की विनाशक शक्ति एक प्रमुख शक्ति बन चुकी है, वहीं माओ यह बताते हैं (और वियतनामी जनता इसे साबित कर रही है) कि मनुष्य हथियारों से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं और कि सबसे अधिक हथियारबन्द हमलावरों के खिलाफ जनता द्वारा छेड़े गये युद्धों में नैतिकता ही निर्णायक कारक बनती है।

आज चीन में, समाजवाद के निर्माण की प्रक्रिया में, एक चरण के रूप में, हम जो कुछ देख रहे हैं वह समाजवादी मनुष्य के विकास का चरण है जो निजी स्वार्थ से नहीं, बल्कि औरों के हित से प्रेरित है, चाहे वे उसी देश के वासी हों या पूरी दुनिया के लाखों-करोड़ों लोग हों, जिन्हें शोषण और उत्पीड़न से मुक्त होना है। यही सच्चा अर्थ है माओ के इन शब्दों का: निजी स्वार्थ से लड़ो और संशोधनवाद को उखाड़ फेंको।

अनुवाद: विश्वनाथ मिश्र

दायित्वबोध, जुलाई-दिसम्‍बर 1998