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‘कम्युनिज़्म’ का विचार या उग्रपरिवर्तनवाद के नाम पर परिवर्तन की हर परियोजना को तिलांजलि देने की सैद्धान्तिकी

कम्युनिज्मका विचार या उग्रपरिवर्तनवाद के नाम पर परिवर्तन की हर परियोजना को तिलांजलि देने की सैद्धान्तिकी
एलेन बेज्यू की पुस्तक द कम्युनिस्ट हाइपोथीसिसपर

  • शिवानी

विचार

जब सिर्फ विचार होते हैं

अस्पष्ट होते हैं

प्रशंसनीय होते हैं।

विचार जब

व्यापकता पाते हैं

योजनाओं में ढलते हैं,

योजनाएँ जब

गतिशील होती हैं

आपत्तियाँ सिर उठाती हैं।

        – ब्रेष्ट

‘‘मार्क्‍सवाद, मजदूर आन्‍दोलन, सामूहिक जनवाद, लेनिनवाद, सर्वहारा वर्ग की पार्टी, समाजवादी राज्य – ये सभी जो बीसवीं शताब्दी के आविष्कार हैं – अब हमारे लिए अपनी उपयोगिता खो चुके हैं। सैद्धान्तिक धरातल पर ये जरूर अध्ययन और समीक्षा की माँग करते हैं – लेकिन व्यावहारिक राजनीति में अब ये किसी काम के नहीं रह गये हैं।’’

  • एलेन बेज्यू, 2008

एलेन बेज्यू की 2010 में प्रकाशित पुस्तक दि कम्युनिस्ट हाइपोथीसिस पिछले कुछ समय से आम बौद्धिक-अकादमिक हलकों में ही नहीं बल्कि वामपन्‍थी दायरों में भी चर्चा का विषय बनी हुई है। कुछ इसे ‘कम्युनिज्म की वापसी’ की उद्घोषणा करने वाली पथ-अन्वेषक रचना कह रहे हैं, तो कुछ बेज्यू को इस दौर का सबसे बड़ा ‘कम्युनिस्ट’ दार्शनिक बता रहे हैं।

वैसे ‘दि कम्युनिस्ट हाइपोथीसिस’ अलग से लिखी गयी कोई किताब नहीं है, बल्कि बेज्यू द्वारा अलग-अलग समय पर लिखे गये लेखों या दिये गये व्याख्यानों का संकलन है। इस किताब का मुख्य स्रोत 2008 में बेज्यू द्वारा न्यू लेफ्ट रिव्यू के लिए इसी नाम से लिखा गया वह निबन्ध है जिसमें बेज्यू 2007 के राष्ट्रपति चुनावों में निकोलस सारकोजी की जीत के ऐतिहासिक महत्व की पड़ताल करते हैं और यह निष्कर्ष निकालते हैं कि सारकोजी की जीत से सम्पूर्ण फ्रांसीसी राजनीतिक जीवन की संरचना को धक्का पहुँचा है और उसकी दशा-दिशा गड़बड़ा गयी है। इसी निबन्ध में वह कम्युनिस्ट हाइपोथीसिस (परिकल्पना) की अपनी अवधारणा को प्रस्तुत करते हैं। इसके अलावा, मार्च 2009 में लन्‍दन में कम्युनिज्म का विचार’ (‘दि आइडिया ऑफ कम्युनिज्म’) नाम से आयोजित एक कांफ्रेंस में बेज्यू द्वारा प्रस्तुत किया गया वक्तव्य भी इस पुस्तक का एक स्रोत है। यहाँ बताते चलें कि इस सम्मेलन में बेज्यू के अलावा स्लावोय जिजेक, जुडित बालसो, ब्रूनो बोस्तील्स, टेरी ईगलटन, पीटर हॉलवर्ड, माइकल हार्ट, एण्टोनियो नेग्री, जाक रैन्शिये, एलेक्सांद्रो रूसो, एल्बर्टो टस्कानो, जियानी वातिमो जैसे तमाम किस्म के मार्क्‍सवादियों, नव-मार्क्‍सवादियों और उत्तर-मार्क्‍सवादियों ने शिरकत की थी।

दार्शनिकों ने

दुनिया की तरह-तरह से व्याख्या की है

पर सवाल उसको बदलने का है।

लेकिन हम खुद सोचेंगे

सभी सवालों पर फिर से,

नये ढंग से।

हर पुरानी चीज पर

सवाल उठाना है हमें

जैसे कि इस कथन पर भी

कि दार्शनिकों ने… …

  • कात्यायनी (दुनिया बदलने के बारे में कतिपय सुधीजनों के विविध विचार-6)

‘दि कम्युनिस्ट हाइपोथीसिस’ की विस्तृत समीक्षा में जाने से पहले यहाँ कुछेक बातें स्पष्ट करना आवश्यक है। पहली बात यह कि बेज्यू का कम्युनिज्म का विचार या सिद्धान्‍त एक गैर-मार्क्‍सवादी कम्युनिज्म की बात करता है और मार्क्‍सवादी विचारधारा को भविष्य की मुक्तिकामी राजनीति (emancipatory politics) के लिए अपर्याप्त, अप्रासंगिक और गैर-जरूरी मानता है। दूसरी बात यह कि बेज्यू का कम्युनिज्म का विचार अनैतिहासिक है। बेज्यू के अनुसार कम्युनिज्म का यह विचार अनादि-अनन्‍त है। यह मानवता के उद्भव के साथ ही जन्म ले चुका था। उनके लिए प्लेटो का दि रिपब्लिक, रूसो का सोशल कॉण्ट्रैक्ट, फ्रांसीसी क्रान्ति और जैकोबिन आतंक-राज्य, पेरिस कम्यून और मार्क्‍सवादी कम्युनिज्म (जो 1917 की बोल्शेविक क्रान्ति के साथ शुरू होता है और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के साथ खत्म होता है) कम्युनिज्म के दिव्य विचार (eternal idea) की यात्रा के अलग-अलग क्षण, पड़ाव या मील के पत्थर हैं। तीसरी बात यह कि बेज्यू के अनुसार बीसवीं सदी के समाजवादी प्रयोग दुर्गति/विपदा में समाप्त हुए। उनका मानना है कि सोवियत संघ और चीन में क्रान्तियों की मुक्तिकामी सम्भावना-सम्पन्नता को पार्टी-राज्य के फ्रेमवर्क, हिरावल पार्टी के संस्थाबद्ध नेतृत्व और समाजवादी राज्यसत्ता ने पहले बाधित किया और फिर पूरी तरह नष्ट कर दिया। और चौथी बात यह कि इस सारे ‘‘विश्लेषण’’ से बेज्यू इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि कम्युनिज्म के विचार और मुक्ति की राजनीति को क्रान्ति के ‘पैराडाइम’ में अवस्थित नहीं किया जा सकता है और न ही पार्टी-राज्य के फ्रेमवर्क का ‘बन्‍दी’ बनाया जा सकता है। और यह भी कि ‘‘क्रान्तियों का युग’’ बीत चुका है। अपनी पुस्तक ‘दि कम्युनिस्ट हाइपोथीसिस’ में बेज्यू इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं। इस पुस्तक की अपनी समीक्षा में हम बेज्यू के राजनीतिक दर्शन से जुड़े सैद्धान्तिकीकरणों की पड़ताल करेंगे। उनकी दार्शनिक समालोचना इस समीक्षा की विषय-वस्तु नहीं है और राजनीतिक-विचारधारात्मक मुद्दों पर बेज्यू की आलोचना के लिए जहाँ हमें उनके दार्शनिक मूलों पर जाना पड़ा, केवल वहीं हम उनके दर्शन का जिक्र करेंगे। वैसे राजनीतिक-विचारधारात्मक समालोचना अपने आप में बेज्यू के दर्शन के बारे में भी काफी कुछ बताती है।

Alain_Badiou‘दि कम्युनिस्ट हाइपोथीसिस’ चार अध्यायों में विभाजित पुस्तक है, लेकिन इन चारों अध्यायों में किसी किस्म की निरन्‍तरता या प्रवाहमयता मौजूद नहीं है। इतना जरूर है कि इन चारों ही अध्यायों में बेज्यू अलग-अलग तरीके से ‘कम्युनिज्म’ के विचार पर ‘‘विचार’’ करते हुए, बीसवीं सदी के समाजवादी प्रयोगों की ‘विफलता’ का ठीकरा पार्टी-राज्य के पूरे फ्रेमवर्क पर फोड़ते नजर आते हैं। पहले तीन अध्यायों में बेज्यू क्रमशः मई 1968 में फ्रांस के छात्र और मजदूर आन्‍दोलनों, चीन की महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति और पेरिस कम्यून की चर्चा करते हैं। चौथा अध्याय 2009 लन्‍दन सम्मेलन में उनके द्वारा दिये गये ‘‘कम्युनिज्म का विचार’’ नामक वक्तव्य का पाठ है। इन चारों अध्यायों के अतिरिक्त इस पुस्तक में एक प्रस्तावना और परिशिष्ट के रूप में बेज्यू द्वारा स्लावोय जिजेक के नाम लिखा गया एक पत्र भी है। अपनी समीक्षा की शुरुआत हम इस पुस्तक की प्रस्तावना से ही करेंगे। प्रस्तावना का नाम है – ‘‘विफलता किसे कहते हैं?’’

बेज्यू अपनी प्रस्तावना की शुरुआत में कहते हैं कि 1970 की ‘लाल दशाब्दी’ के अन्‍त के साथ पश्चिमी पूँजीवादी देशों का कम्युनिज्म-विरोध एक बार फिर जोर-शोर के साथ सामने आया। ‘नये दर्शन’ के हिमायतियों ने समाजवादी राज्यों की ‘निरंकुशता और सर्वसत्तावाद’ पर खूब शोर मचाया और बुर्जुआ संसदवाद और प्रातिनिधिक जनवाद की अच्छाइयों को गिनाना शुरू कर दिया। इस उन्मादी हर्षोल्लास के पीछे जो तर्क काम कर रहा था वह यह था कि समाजवाद, जो कि कम्युनिस्ट विचार का एकमात्र मूर्त रूप था, बीसवीं सदी में पूरी तरह विफल हो गया। इसके बाद बेज्यू कहते हैं कि इसलिए विफलता के विचार पर आज ‘‘विचार’’ करने की आवश्यकता है। बेज्यू पूछते हैं कि जब हम कहते हैं कि कम्युनिस्ट हाइपोथीसिस (प्राक्कल्पना) के अमलीकरण के तौर पर जो समाजवादी प्रयोग हुए, उनका अन्‍त ‘विफलता’ में हुआ, तो हमारा मतलब क्या होता है? क्या वे पूरी तरह से असफल हुए? क्या इसका मतलब है कि हम इस प्राक्‍कल्पना को ही त्याग दें या मुक्ति की पूरी समस्या को ही तिलांजलि दे दें? बेज्यू को यहाँ तक पढ़ने पर पाठक के मन में उम्मीदें जगने लगती हैं, लेकिन ये उम्मीदें ज्यादा देर तक नहीं ठहरतीं। क्योंकि इसके बाद बेज्यू जो स्वर अपनाते हैं, वह वही पुराना राग है – चूँकि बीसवीं सदी की क्रान्तियाँ पार्टी-राज्य के फ्रेमवर्क में कैद थीं, इसलिए वे असफल होने के लिए अभिशप्त थीं। यह प्रश्न बेज्यू यहाँ इस प्रकार उठाते हैं कि बीसवीं सदी के समाजवादी प्रयोगों ने जो रूप अपनाया और जो रास्ता अख्तियार किया, क्या उसी में तो इस ‘विफलता’ के कारण अन्‍तर्निहित नहीं हैं और इसलिए ‘विफलता’ उनकी नियति थी? यहाँ यह बात जोड़नी जरूरी है कि इस पूरी पुस्तक में, या फिर बेज्यू की अन्य सभी कृतियों में भी, बीसवीं सदी में मजदूर वर्ग द्वारा किये गये समाजवाद के प्रयोगों को बिना किसी वैज्ञानिक-ऐतिहासिक विश्लेषण को इस्तेमाल किये ही एक त्रासदीया आपदामान लिया गया है। जिजेक के लेखन की तरह यहाँ भी यह नतीजा आकाशवाणी के समान (axiomatic) है।

दूसरी बात यह कि रूस और चीन में समाजवादी प्रयोगों का पतन या विफलता किस दौर में शुरू होती है, इसकी भी कोई समझदारी बेज्यू के लेखन में आपको नहीं मिलेगी। पश्चिमी साम्राज्यवादी प्रोपगैण्डा मशीनरी की तरह यहाँ पर भी 1990 में सोवियत संघ के विघटन तक समाजवाद का दौर कायम माना जाता है! 1956 के बाद सोवियत संघ की अन्‍तरराष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक साम्राज्यवादी भूमिका और देश के अन्‍दर जनता के खिलाफ एक सामाजिक फासीवादी भूमिका को ही समाजवाद के रूप में चित्रित किया जाता है। हालाँकि बेज्यू के लिए कम्युनिज्म की अपनी परिकल्पना के लिए इस ‘विफलता’ की कालिकता या स्थानिकता (temporality and spatiality) को स्पष्ट करना जरूरी नहीं है क्‍योंकि इस परिकल्पना के अनुसार तो 1917 की बोल्शेविक क्रान्ति के साथ ही समाजवाद की ‘विफलता’ का दौर शुरू हो गया था; आखिर इस क्रान्ति ने ही तो कम्बख्त पार्टी-राज्य के ‘पैराडाइम’ को संस्थाबद्ध और सुव्यवस्थित किया था! इसलिए बेज्यू इस पुस्तक में और अन्यत्र भी, 1917 से 1953 तक के दौर की कभी चर्चा नहीं करते। इस पूरे दौर का समाहार वह यह कह कर देते हैं कि पार्टी-राज्य ने एक नयी किस्म की ‘‘निरंकुशता’’ को जन्म दिया जिसकी मुख्य आभिलाक्षणिकताएँ थीं – ‘पुलिस द्वारा दमन’ और ‘आन्‍तरिक नौकरशाहाना जड़ता’। क्या यह ठीक वही आलोचना नहीं है जो लियॉन त्रात्स्की, रॉय मेदवेदेव, इसाक डॉइशर, मार्क फेरो जैसे लोग करते हैं? हालाँकि इन सबमें काफी मतान्‍तर और विविधता है लेकिन रूसी क्रान्ति और समाजवादी मजदूर सत्ता को और विशेष तौर पर स्तालिन के नेतृत्व में समाजवाद के निर्माण को कोसने में गहरी एकता है?

वापस पुस्तक की प्रस्तावना पर लौटते हैं। बेज्यू आगे कहते हैं कि ‘‘क्रान्ति’’, ‘‘सर्वहारा’’, ‘‘समाजवाद’’ जैसी जातिवाचक संज्ञाएँ (common nouns) मुक्ति की राजनीति के लिए अपना महत्व खो चुकी हैं। इसके बाद बेज्यू अपने उपन्यास दि रेड स्कार्फ और नाटक दि इन्सिडेण्ट इन एण्टियॉक के कुछ हिस्से उद्धृत करते हैं। इन उद्धरणों के जरिये वह दो बातें रेखांकित करना चाहते हैं। पहली बात यह कि कम्युनिज्म एक निरपेक्ष सत्य है जिसकी निरपेक्ष यात्रा शताब्दी दर शताब्दी, प्राचीन काल से ही चली आ रही है। और दूसरी बात यह कि जो क्रान्तियाँ विजयी भी हुईं उन्होंने सत्ता और दमन के नये रूपों को ही जन्म दिया क्योंकि ये क्रान्तियाँ पार्टी-राज्य के फ्रेमवर्क में बँध कर रह गयीं। इसके बाद बेज्यू तीन प्रकार की विफलताओं की बात करते हैं। पहली प्रकार की ‘विफलता’ वह है जिसमें क्रान्तिकारी कुछ समय के लिए किसी देश या किसी विशिष्ट इलाके में सत्ता पर काबिज होते हैं लेकिन हथियारबन्‍द प्रतिक्रान्तिकारी ताकतों के द्वारा कुचल दिये जाते हैं। इस ‘विफलता’ के तौर पर वह पेरिस कम्यून और रोजा लक्जमबर्ग और कार्ल लीबनेख्त के नेतृत्व में प्रथम-विश्वयुद्ध के बाद की स्पार्टकिस्ट बगावत का उदाहरण देते हैं। दूसरे प्रकार की ‘विफलता’ के उपशीर्षक के तहत वे उन व्यापक जनान्‍दोलनों को गिनाते हैं जिनका मकसद सत्ता हथियाना होता ही नहीं है, हालाँकि ये आन्‍दोलन कुछ समय के लिए राज्य की प्रतिक्रियावादी ताकतों को रक्षात्मक मुद्रा में आने के लिए बाध्य करते हैं। इसके उदाहरण के तौर पर वह मई 1968 का आन्‍दोलन गिनाते हैं। फिर बेज्यू तीसरे प्रकार की ‘विफलता’ की चर्चा करते हैं जिसके तहत वे बिना कोई फर्क किये बीसवीं सदी के सभी समाजवादी प्रयोगों को गिनाते हैं जिनमें कम्युनिस्ट परिकल्पना के अमलीकरण के नाम पर ‘‘पार्टी-राज्य का आतंक राज्य कायम हुआ’’ और कम्युनिज्म के विचार को ही त्याग दिया गया! अपनी प्रस्तावना का अन्‍त बेज्यू ‘‘प्वाइण्ट’’ (बिन्‍दु या क्षण) की अपनी अवधारणा से करते हैं। आम तौर पर भी इस पुस्तक में जहाँ-तहाँ बेज्यू उत्तर मार्क्‍सवादियों की पसन्‍दीदा हेगेलीय दर्शन और लकानीय मनोविश्लेषण की श्रेणियों का इस्तेमाल करते नजर आते हैं, उदाहरण के लिए बेज्यू की ‘‘ट्रूथ-प्रोसीजर’’, ‘‘इवेण्ट’’, ‘‘सब्जेक्ट’’ इत्यादि की अवधारणा आदि, मगर फिलहाल हम पहले ‘‘प्वाइण्ट’’ की बेज्यू की अवधारणा पर विचार करते हैं। ‘‘प्‍वाइण्ट’’ की अवधारणा को व्याख्यायित करते हुए बेज्यू कहते हैं कि किसी भी मुक्तिकामी राजनीति के क्रम या श्रृंखला में (यानी कि किसी भी क्रान्ति के दौरान) यह वह क्षण होता है जिसमें विकल्प की ‘बाइनरी’ पर (यानी कि इस प्रश्न पर कि विकल्प ‘क’ अपनाया जाये या विकल्प ‘ख’) उस पूरी प्रक्रिया का भविष्य निर्भर करता है। वे आगे कहते हैं कि हमें यह समझना होगा कि सभी ‘‘विफलताओं’’ का कारण इसी क्षण पर लिये गये फैसलों में अन्‍तर्निहित है। सीधे-साफ शब्दों में कहें तो बेज्यू के कहने का अभिप्राय यह है कि पेरिस कम्यून के अनुभवों के बाद, पहले मार्क्‍स और फिर लेनिन द्वारा, हिरावल पार्टी और सर्वहारा राज्य-सत्ता (सर्वहारा वर्ग का अधिनायकत्व) की प्रस्थापनाओं का प्रतिपादन ही इस क्षण पर लिये गये गलत फैसले थे। यह मूल पापथा; नाजुक मौके पर गलत फैसला! और यहीं से सारी गलती और विफलता की शुरुआत होती है! बेज्यू अपनी इसी थीसिस को इस पुस्तक के बाकी हिस्सों में स्पष्ट करते चलते हैं और हर स्पष्ट अवधारणा को इस प्रक्रिया में अस्पष्ट करते जाते हैं।

इस पुस्तक के पहले अध्याय का नाम है – ‘‘हम अभी भी मई 1968 की समकालीनता में हैं।’’ इस अध्याय के तीन भाग हैं। पहला भाग मई 2008 में 1968 के चालीस वर्ष पूरे होने पर आयोजित एक कार्यक्रम में बेज्यू द्वारा दिया गया व्याख्यान है। बेज्यू कहते हैं कि मई 1968 की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। इसके बाद बेज्यू मई 1968 की विजातीयता और बहुलता की बात करते हुए कहते हैं कि मई 1968 कोई एकाश्मी परिघटना नहीं थी बल्कि चार अलग-अलग परिघटनाओं की जटिलता लिये हुए थी (बेज्यू स्वयं भी इस आन्‍दोलन का हिस्सा थे)। पहला मई 1968 वह था जिसमें विश्वविद्यालय और स्‍कूलों के छात्र-छात्राएँ हिस्सा ले रहे थे, यानी कि जिसका मुख्य तत्व छात्र-आन्‍दोलन था। दूसरा मई 1968 मजदूर आन्‍दोलन के इर्द-गिर्द केन्द्रित था, जिसमें सी.जी.टी. (जनरल कन्‍फेडरेशन ऑफ लेबर – एक संशोधनवादी ट्रेड यूनियन संघ) और अन्य यूनियनों द्वारा आयोजित हड़तालों के साथ ही परम्परागत यूनियन के सांगठनिक ढाँचे के बाहर भी मजदूरों द्वारा आयोजित हड़तालें थीं, जिन्हें ‘‘वाइल्डकैट स्ट्राइक्स’’ की संज्ञा दी जाती थी। इस दौरान फैक्ट्रियों पर कब्जा आम बात थी। तीसरे मई 1968 को स्वच्छन्‍दतावादी (लिबर्टेरियन) मई कहा जा सकता है जिसमें पेटी बुर्जुआ वर्ग की वैयक्तिक स्वतन्त्रता का मुद्दा अहम था। इसकी अभिव्यक्ति उस दौर के कला साहित्य, सिनेमा में भी नजर आती है। इसके बाद बेज्यू चौथे मई 1968 की चर्चा पर आते हैं, जो उनके अनुसार उपरोक्त सभी से कहीं ज्यादा जरूरी था। बेज्यू के अनुसार यह इसलिए सबसे ज्यादा जरूरी है क्योंकि यह राजनीति की पुरानी क्लासिकीय अवधारणाओं पर – जैसे पार्टी, यूनियन आदि पर – सवाल उठा रहा था। इस कथन में आंशिक सच्चाई है। 1960 के दशक से ही फ्रांसीसी कम्युनिस्ट पार्टी (पी.सी.एफ.) संशोधनवाद का रास्ता पकड़ चुकी थी। फ्रांसीसी कम्युनिस्ट पार्टी 1953 में सोवियत संघ में ख्रुश्चेवी संशोधनवाद आने के बाद भी उसका समर्थन कर रही थी और हंगरी, पोलैण्ड, चैकोस्लोवाकिया जैसे पूर्वी यूरोप के तमाम देशों में सोवियत साम्राज्यवाद के कुकृत्यों को लेकर चुप थी और समझौतापरस्त अवस्थिति अपना रही थी। जहाँ तक सी.जी.टी. जैसी संशोधनवादी, अराजकतावादी-संघाधिपत्यवादी यूनियनों का सवाल था, तो उनकी स्थिति और अवस्थिति बहुत कुछ वर्तमान भारत में सीटू, ऐटक जैसी यूनियनों के जैसी ही थी। ऐसे में, पार्टी और यूनियनों का जो मॉडल मौजूद था, उससे मोहभंग होना लाजिमी था और चूँकि उस समय कोई क्रान्तिकारी विकल्प मौजूद नहीं था जो इन स्वतःस्‍फूर्त जनउभार की कार्रवाइयों को संगठित कर सकता इसलिए मई 1968 बस मई 1968 बनकर ही रह गया। केवल विद्रोह की सफलता और असफलता की बात की जाये तो इसका अन्‍त उसी हताशा में हुआ, जिस हताशा में ‘ऑक्युपाई’ आन्‍दोलन और अरब बसन्‍त का हुआ है, हालाँकि मई 1968 का महत्व इस रूप में भी था कि इसके बाद तमाम ऐसी विचार-सरणियाँ पैदा हुईं जिनका अन्‍त ‘उत्तर’-वादी विचार-सरणियों में हो गया; मई 1968 ने जो विचारधारात्मक विभ्रम पैदा किया वह उसे आज के असफल आन्‍दोलनों या विद्रोहों से अलग करता है। मई 1968 में यूरोपीय वाम और यूरोपीय रैडिकल बुद्धिजीवी वर्ग ने सोवियत संशोधनवाद और उसके कुकर्मों और यूरोपीय सामाजिक-जनवादी पार्टियों के सुधारवाद और बुर्जुआ सत्ता से प्रणय पर जो प्रतिक्रिया दी, वह एक पैथोलॉजिकल प्रतिक्रिया थी, क्योंकि उसमें कोई आलोचनात्मक विवेक नहीं था। सोवियत संशोधनवादी पार्टी और सामाजिक साम्राज्यवादी व सामाजिक फासीवादी राज्य के अपराधों को पार्टी, राज्य और वर्ग अधिनायकत्व की अवधारणा पर ही आरोपित कर दिया गया। बेज्यू भी इसी पैथोलॉजिकल प्रतिक्रिया का अंग थे। शायद बेज्यू बिल्‍कुल इन्हीं कारणों से मई 1968 को लेकर इतना नॉस्टैल्जिक हैं, क्योंकि मई 1968 ने पार्टी, राज्य और वर्ग अधिनायकत्व की बुनियादी अवधारणाओं पर प्रश्न उठाना शुरू किया। इस दौर में पुरानी क्लासिकीय अवधारणाओं पर खड़े हो रहे सवालों के तर्क को बेज्यू बढ़ाते हुए मार्क्‍सवाद और क्रान्ति के विज्ञान को खारिज करने तक ले जाते हैं। बेज्यू कहते हैं कि ‘‘धीरे-धीरे यह सत्य उजागर होने लगा था कि जो सामान्य भाषा, जिसका द्योतक लाल झण्डा था, हम सब बोल रहे थे, वह दरअसल मृत्यु को प्राप्त हो रही थी।’’ मई 1968 की असली अहमियत बेज्यू के लिए यहाँ छिपी है।

अब तक कि अपनी समीक्षा में हम देख चुके हैं कि बेज्यू जैसे तमाम उत्तर-मार्क्‍सवादियों का हमला मूलतः मार्क्‍सवाद की क्रान्तिकारी अन्‍तर्वस्तु पर है। इस विषय में बेज्यू की स्पष्टवादिता की दाद देनी पड़ेगी कि वह सीधे-सीधे यह कह भी देते हैं कि मार्क्‍सवाद, पार्टी और सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व की सोच पूरी तरह अप्रासंगिक हो चुकी है। चीन में 1966 में शुरू हुई महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति का भी बेज्यू एक गैर-पार्टीवादी विनियोजन करते हैं। बेज्यू के अनुसार महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के साथ जो नया युग शुरू हुआ उसमें पार्टी-राज्य का फ्रेमवर्क (यानी हिरावल पार्टी और सर्वहारा तानाशाही की मार्क्‍सवादी अवधारणाएँ) अब बेकार हो चुका है। महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति पर बेज्यू के विचारों की चर्चा हम आगे करेंगे। लेकिन यहाँ इस बात को रेखांकित करना जरूरी है कि मार्क्‍सवादी कम्युनिज्म के बरक्स बेज्यू के ‘‘कम्युनिज्म’’ के काण्टीय, हेगेलीय, लकानीय विचार के बावजूद और शायद इसी वजह से भी उनका निशाना एकदम ठीक वे अवधारणाएँ हैं जो मार्क्‍सवाद की क्रान्तिकारी अन्‍तर्वस्तु का निर्माण करती हैं; मिसाल के तौर पर, वर्ग की अवधारणा, सर्वहारा अधिनायकत्व की अवधारणा, वर्ग के हिरावल के रूप में कम्युनिस्ट पार्टी की अवधारणा आदि। साथ ही बेज्यू का यह भी मानना है कि क्रान्तियों का युग अब बीत चुका है।

जैसा कि हमने पहले कहा, दूसरी अहम बात जो हमें समझनी होगी वह यह है कि बेज्यू जैसे तमाम उत्तर-मार्क्‍सवादियों की वर्तमान राजनीतिक अवस्थिति यूरोपीय वामपन्‍थी बुद्धिजीवी वर्ग का संशोधनवाद और सामाजिक फासीवाद के कुकृत्यों से पैदा हुए राजनीतिक ट्रॉमा की ही अभिव्यक्ति है। यह इस वर्ग की एक किस्म की पैथोलॉजिकल प्रतिक्रिया है। यूरोप में और विशेषकर फ्रांस में तमाम ऐसे राजनीतिक और दार्शनिक चिन्‍तक थे, जिनकी विचारधारात्मक शुरुआत एक मार्क्‍सवादी के रूप में हुई थी। (बेज्यू की इसी पुस्तक में मई 1968 पर लिखे गये एक अन्य लेख, जो उसी दौर में लिखा गया था, से यह बात स्पष्ट हो जाती है। उस समय बेज्यू खुद को एक मार्क्‍सवादी-लेनिनवादी ही कहते थे और अभी मार्क्‍सवाद पर वह वे सब ‘‘सवाल’’ नहीं उठा रहे थे जो आज उठा रहे हैं और न ही सर्वहारा, क्रान्तियों को ‘‘आपदा’’’ करार दे रहे थे। हालाँकि उस लेख को अपनी इस पुस्तक में शामिल करने के कारण बेज्यू को लेख से पहले एक लम्‍बी-चौड़ी टिप्पणी भी जोड़नी पड़ी और मानना पड़ा कि उस लेख में पुराने पड़ चुके मार्क्‍सवादी-लेनिनवादी विज्ञान का जिक्र बार-बार आता है; कि उस वक्त मार्क्‍सवादी-लेनिनवादी उसूलों पर गठित पार्टी को ही सभी समस्याओं की कुंजी मान लेने की भूल की गयी है; कि अब यह स्पष्ट हो चुका है कि पार्टी के सांगठनिक स्वरूप को ही त्यागना होगा, इत्यादि। इस टिप्पणी को पढ़ने के बाद लगता है कि बेज्यू उस समय की अपनी राजनीतिक अवस्थिति को लेकर आज तक शर्मिन्‍दा हैं!) लेकिन सोवियत सामाजिक साम्राज्यवाद के पूर्वी यूरोप में किये गये हस्तक्षेप और पूर्वी यूरोप के छद्म समाजवादी देशों में जनता का अनुभव 1960 के दशक में सोवियत समाजवाद के पूरे दौर के प्रति पूर्वाग्रहों का कारण बना जिसके चलते ऐसे तमाम चिन्‍तकों और बुद्धिजीवियों का मोहभंग स्वयं मार्क्‍सवाद से ही हो गया क्योंकि वे क्रान्तिकारी मार्क्‍सवाद और संशोधनवाद के बीच फर्क नहीं कर पाये। साथ ही उसी समय चीन में महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति भी जारी थी, जिसे यूरोप में बहुतों ने ‘पार्टी के विरुद्ध क्रान्ति’ समझा (स्वयं बेज्यू भी इसी समझदारी से ग्रस्त हैं।) कुल मिलाकर नतीजा यह हुआ कि सारी बुराई की जड़ पार्टी और सर्वहारा अधिनायकत्व के सिद्धान्‍त को ही समझा जाने लगा। यही कारण है कि बेज्यू बीसवीं सदी के समाजवादी प्रयोगों की ‘विफलताओं’ को पार्टी-राज्य फ्रेमवर्क के मत्थे मढ़ते नजर आते हैं। उनकी वर्तमान राजनीतिक अवस्थिति के ईंधन का स्रोत दार्शनिक भ्रम-विभ्रम की यही भट्ठी है।

मई 1968 पर केन्द्रित अपने अध्याय के तीसरे खण्ड में बेज्यू वर्तमान पूँजीवादी संकट पर अपने विचार रखते हैं। राजनीतिक अर्थशास्त्र की बेहद अधकचरी और सीमित समझदारी के चलते वह संकट के विषय में कुछ सामान्य-सी बातें करते हैं जो कि कई त्रुटियों और विकृतियों से भरी हैं। मसलन, बेज्यू एक जगह कहते हैं कि वित्तीय पूँजीवाद पिछले 500 सालों से पूँजीवाद का एक केन्‍द्रीय संघटक अवयव रहा है! काश कि बेज्यू ने लेनिन की ‘‘साम्राज्यवाद-पूँजीवाद की चरम अवस्था’’ एक बार ठीक से पढ़ी होती तो इस तरह के मजाकिया सिद्धान्‍त प्रतिपादनों से वह बच सकते थे! लेकिन मार्क्‍सवादी-लेनिनवादी विज्ञान को तो उन्होंने पहले ही इतिहास की कचरा-पेटी के हवाले कर दिया है। हालाँकि कोई गैर-मार्क्‍सवादी भी उपनिवेशवाद के प्राक्-वित्तीय दौर और वित्तीय दौर में फर्क करेगा, लेकिन बेज्‍यू ऐसा नहीं कर पाते। क्योंकि, लकाँ और हेगेल के पोथों के बीच ही वे दब-से गये हैं! वैसे, सभी उत्तर-मार्क्‍सवादी चिन्‍तकों के बारे में एक बात दावे से कही जा सकती है – इन्हें राजनीतिक अर्थशास्त्र का ‘क ख ग’ भी नहीं आता है। इस कमी को इतिहास की सुसंगत जानकारी और एक सन्‍तुलित ऐतिहासिक दृष्टि के अभाव के रूप में भी देखा जा सकता है। और कमी को ये बेज्यू पूरा कैसे करते हैं? फ्रांसीसी फैशनेबल उत्तर-वाम की लच्छेदार शब्दावली में ऐतिहासिक तथ्यों के विकृतीकरण के अद्वितीय हुनर के जरिये! आमतौर पर बेज्यू इतिहास के प्रति अवहेलना का दृष्टिकोण ही अपनाते हैं। लेकिन अपने राजनीतिक-दार्शनिक हित-साधन के लिए वह आत्मगत चयन करते हुए ऐतिहासिक तथ्यों का ब्यौरा देने से बाज नहीं आते हैं। वह इन तथ्यों को इस तरह तोड़-मरोड़ कर और मनमाने ढंग से पेश करते हैं कि उनकी अन्‍तर्वस्तु ही बदल जाती है। मसलन, महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति पर अपने विचार रखते हुए वे जमकर तथ्यों का ब्यौरा देते हैं, लेकिन यह आत्मगत पूर्वाग्रहों के साथ किया गया इतिहास का एक पाठ है, जिसमें नतीजे पहले ही तय कर लिये गये हैं और उनके आधार पर तथ्यों का चयन बाद में किया गया है।

बहरहाल, अभी हम पूँजीवादी आर्थिक संकट पर बेज्यू के विचारों पर वापस आते हैं। बेज्यू अपने चिर-परिचित लकानीय अन्‍दाज में बताते हैं कि मौजूदा आर्थिक संकट तो महज ‘स्पेक्टेकल’ (तमाशा या कौतुक-स्वाँग) है जो पूँजीवाद के यथार्थ (Real) पर पर्दा डालने का काम कर रहा है। इसके बाद बेज्यू एक टुटपुँजिया स्वच्छन्‍दतावादी की तरह (जो कि वह हैं!) रूमानीपन का प्रदर्शन करते हैं और छद्म आशावाद से ग्रस्त होकर कहते हैं कि आज सबसे अहम है विचारों और एक सामान्य परिकल्पना के प्रति अपने जुनून को एक बार फिर तलाशना (!), इस विश्वास के साथ की एक दूसरी दुनिया सम्‍भव है! ‘‘हमें पूँजीवाद के घृणित तमाशे के बरक्स लोगों का, लोगों के जीवन का और विचारों के आन्‍दोलन का यथार्थ खड़ा करना होगा।’’ यह कैसे खड़ा होगा यह बताना बेज्यू जरूरी नहीं समझते लेकिन अपनी पुरानी थीम पर वह जरूर एक बार फिर लौटते हैं (ऐसा करना वह कभी नहीं भूलते!)। वे कहते हैं कि हालाँकि ‘कम्युनिज्म’ शब्द को ‘‘सस्ता और वेश्या बना दिया गया है’’ लेकिन हम इसे लुप्त नहीं होने देंगे। क्योंकि बेज्यू ‘‘कम्युनिज्म’’ के इस विचार के तारणहार हैं, इसलिए वह ‘‘कम्युनिज्म’’ को बचायेंगे! एलेन बेज्यू उसे अतीत के सारे अनुभवों से, क्रान्ति के सिद्धान्‍त से, समाजवादी राज्य से और हिरावल पार्टी के भारी-भरकम बोझ से इस ‘‘दिव्य’’ विचार को भारमुक्त करेंगे और ‘‘मुक्ति की नयी राजनीति’’ गढ़ेंगे! जो क्या होगी यह बेज्यू नहीं बताएँगे क्योंकि वह खुद भी इससे अपरिचित हैं!

इस पुस्तक का अगला अध्याय महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति पर केन्द्रित है। इसका नाम है सांस्कृतिक क्रान्ति : अन्तिम क्रान्ति?’। इस अध्याय की शुरुआत में बेज्यू बताते हैं कि 1967 से 1976 तक सांस्कृतिक क्रान्ति पूरी दुनिया में और विशेषकर फ्रांस में जुझारू क्रान्तिकारी गतिविधियों के लिए एक सन्‍दर्भ-बिन्‍दु बनी। इसके बाद बेज्यू माओ का, माओवाद का और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति का निकृष्ट किस्म का हस्तगतीकरण (appropriation) और विकृतिकरण (distortion) करते हैं। वह कहते हैं कि सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति पार्टी-राज्य के स्वरूप के सन्‍तृप्तिकरण (saturation) का प्रारूपिक उदाहरण है। इसके बाद वे जोड़ते हैं कि हालाँकि यह स्वयं (सांस्कृतिक क्रान्ति) पार्टी-राज्य के फ्रेमवर्क के भीतर ही काम कर रही थी और इसीलिए ‘‘विफल’’ हुई, लेकिन इसने आने वाले दिनों के लिए कुछ जरूरी सबक दिये। बेज्यू के अनुसार यह जरूरी सबक थे – सर्वहारा वर्ग की हिरावल पार्टी और सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व के मार्क्‍सवादी सिद्धान्‍त को तिलांजलि देने का वांछितता। अपने इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए बेज्यू सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के दौर की कई घटनाओं का ब्यौरा टुकड़ों-टुकड़ों में देते हैं, मनमाने ढंग से उन घटनाक्रमों की व्याख्या करते हैं और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति की क्रान्तिकारी अन्‍तर्वस्तु का विकृतिकरण करते हैं। बेज्यू द्वारा माओ और सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के विनियोजन की पड़ताल से पहले यह जानना यहाँ प्रासंगिक होगा कि माओ का महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति का युगान्‍तरकारी सिद्धान्‍त था क्या? यह जानना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि हाल तक बेज्यू खुद को माओवादी कहते रहे हैं। साथ ही, इस चर्चा के बाद हमें बेज्यू के एक-एक तर्क और विकृतिकरण को अलग से खारिज करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

माओ का महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति का युगान्‍तरकारी सिद्धान्‍त समाजवादी संक्रमण के दौरान पूँजीवादी पुनर्स्‍थापना को रोकने और कम्युनिज्म की दिशा में अग्रसर होने का पथ-प्रदर्शक सिद्धान्‍त है। माओ ने बताया कि समाजवादी संक्रमण एक सुदीर्घ ऐतिहासिक अवधि है जिसके दौरान वर्ग संघर्ष ही सर्वहारा क्रान्तिकारियों के लिए कुंजीभूत कड़ी है। लेनिन ने ही बताया था कि समाजवादी समाज में सर्वहारा वर्ग सत्ता में आ चुकी होती है, लेकिन बुर्जुआ वर्ग समाज में मौजूद रहेगा और अपने खोये हुए स्वर्ग को प्राप्त करने की कोशिश जारी रखता है और वर्ग संघर्ष नये रूपों में और भी सघन रूप में जारी रहता है। माओ ने बताया कि उत्पादन सम्‍बन्‍धों के क्रान्तिकारी रूपान्‍तरण का काम निजी सम्पत्ति के कानूनी खात्मे के साथ शुरू होता है, खत्म नहीं, क्योंकि निजी सम्पत्ति का कानूनी खात्मा महज मालिकाने के सवाल को हल करता है। यह न तो वितरण के सवाल को पूरी तरह से हल करता है और न ही उत्पादन और वितरण की पूरी प्रक्रिया में मौजूद तीन अन्‍तरवैयक्तिक असमानताओं को, यानी कि, मानसिक श्रम और शारीरिक श्रम के बीच का अन्‍तरविरोध; शहर और गाँव के बीच का अन्‍तरविरोध; और, उद्योग और कृषि के बीच का अन्‍तरविरोध। जब तक ये असमानताएँ मौजूद रहती हैं तब तक पूँजीवादी विशेषाधिकार मौजूद रहते हैं; वस्तुओं का विनिमय मौजूद रहता है और इस प्रकार वस्तुओं का अस्तित्व महज उपयोग मूल्य के रूप में (यानी कि केवल उपयोग हेतु) नहीं बल्कि माल के रूप में होता है; और बुर्जुआ अधिकारों की मौजूदगी में वितरण के सम्‍बन्‍धों में असमानता बनी रहती है; पूँजीवादी विशेषाधिकार से सम्पन्न पार्टी कमिसारों और संगठनकर्ताओं का वर्ग पार्टी के भीतर एक नये किस्म के पूँजीपति वर्ग का सृजन करता है और पार्टी के भीतर बुर्जुआ हेडक्वार्टर स्थापित करता है; विशेषज्ञों, प्रबन्धकों, पर्यवेक्षकों का वर्ग समाज के भीतर एक विशेषाधिकार-सम्पन्न तबका बनता है और पार्टी के भीतर मौजूद बुर्जुआ वर्ग के साथ साँठ-गाँठ कर एक ऐसी शक्ति का सृजन करता है जिसका समाजवाद और सर्वहारा वर्ग से अन्‍तरविरोध होता है। ये तत्व अपनी वर्ग प्रकृति और स्वभाव से हर समाजवादी प्रयोग के रास्ते में बाधा पैदा करते हैं, षड्यन्त्र करते हैं और सर्वहारा सत्ता का तख्ता-पलट करने की फिराक में रहते हैं। यदि इन वर्गों के खिलाफ सर्वतोमुखी सर्वहारा अधिनायकत्व को नहीं लागू किया गया तो ये वर्ग अन्‍ततोगत्वा सर्वहारा सत्ता को पलटकर एक पूँजीवादी सत्ता में तब्दील कर देंगे। माओ ने बताया कि पूँजीवादी पुनर्स्‍थापना को रोकने के लिए क्रान्ति को सतत् जारी रखना होगा। समाज मे मानसिक श्रम और शारीरिक श्रम के बीच, शहर और गाँव के बीच और उद्योग और कृषि के बीच के विभेद समाजवादी समाज में मौजूद रहते हैं; पूँजीवादी विशेषाधिकार मौजूद रहते हैं; इन सबके खिलाफ सर्वहारा वर्ग की लड़ाई महज पूँजीवाद के खिलाफ लड़ाई नहीं है। इनके खिलाफ सर्वहारा वर्ग की लड़ाई वर्ग समाज के चार हजार वर्षों के पूरे इतिहास के खिलाफ एक महान युगान्‍तरकारी संघर्ष है। इसके लिए महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति की जरूरत है। अधिरचना के क्षेत्र में, यानी कि संस्कृति, शिक्षा, कला, मनोविज्ञान, राजनीति, आदतों, मूल्यों, मान्यताओं आदि सभी क्षेत्रों में सर्वहारा क्रान्ति को जारी रखने की जरूरत है; यानी कि इन सभी क्षेत्रों में उपरोक्त तीन अन्‍तरवैयक्तिक असमानताओं के विरुद्ध सतत् प्रचार, संघर्ष और प्रचार के जरिये क्रमिक खात्मा और साथ ही उत्पादक शक्तियों का भी साथ में विकास करते जाना; बुर्जुआ वर्ग के ऊपर सर्वहारा वर्ग का सर्वतोमुखी अधिनायकत्व लागू करना; पार्टी के भीतर आलोचना-आत्मालोचना, शुद्धीकरण आदि के अभियानों के जरिये बुर्जुआ कचरे की समय-समय पर सफाई करना; मार्क्‍सवाद-लेनिनवाद के उसूलों को जनता के बीच लगातार प्राधिकार बनाना; टुटपुँजिया उत्पादन पद्धतियों का क्रमिक खात्मा करना; उत्पादन को बढ़ाने पर जोर देना, लेकिन इस तरह से नहीं कि मानसिक और शारीरिक श्रम, शहर और गाँव, उद्योग और कृषि के बीच का अन्‍तरविरोध और अधिक बढ़े। इसीलिए माओ ने नारा दिया था, क्रान्ति पर पकड़ बनाये रखो और उत्पादन को बढ़ाओ। उत्पादन सम्‍बन्‍धों और उत्पादक शक्तियों के बीच की द्वन्‍द्वात्मकता को सही ढंग से समझे बिना समाजवादी निर्माण और संक्रमण की एक सुसंगत समझदारी नहीं हासिल की जा सकती। माओ ने चीन में महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के शुरू होने के बाद ही कहा था कि इसके बाद भी इस बात का फैसला होने में अभी लम्‍बा समय लगेगा कि चीन में पहले चक्र में पूँजीवाद जीतेगा या समाजवाद। समाजवाद की अन्तिम विजय को सुनिश्चित करने के लिए कई सांस्कृतिक क्रान्तियों की आवश्यकता पड़ेगी। यहाँ यह भी रेखांकित करने की जरूरत है कि अपनी अपूर्णताओं और असफलताओं के बावजूद महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति का पहला प्रयोग समाजवाद की समस्याओं और उनके समाधान के बारे में सर्वहारा वर्ग की समझदारी में युगान्‍तरकारी छलाँग लगा गया।

महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति की इस संक्षिप्त चर्चा के बाद इतना तो स्पष्ट है कि न तो यह पार्टी के विरुद्ध क्रान्तिथी और न ही पार्टी-राज्य पैराडाइम का सन्‍तृप्तिकरण, जिस रूप में बेज्यू इसे चित्रित करने पर तुले हैं। बेज्यू माओ की जनदिशा को सिर के बल खड़ा करने की पुरजोर कोशिश करते नजर आते हैं। उस दौर के तमाम तथ्यों और उदाहरणों (जैसे शंघाई कम्यून, वूहान की घटना आदि) का प्रयोग वह यह सिद्ध करने में करते हैं कि माओ स्वतःस्फूर्ततावाद के पूजक थे और पार्टी एवं सर्वहारा राज्य के प्राधिकार के विरुद्ध खड़े थे। बेज्यू माओ का पेटी बुर्जुआ लोकरंजकतावादी विनियोजन करके उन्हें हिरावल पार्टी की अवधारणा के विरुद्ध खड़ा करने का प्रयास करते हैं। हालाँकि यह दीगर बात है कि इस उपक्रम में वह कोई विशेष सफलता हासिल नहीं कर पाते हैं। महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति की क्रान्तिकारी अन्‍तर्वस्तु को समझने की उम्मीद हम बेज्यू जैसे उत्तर-मार्क्‍सवादी और उत्तर-माओवादी (क्योंकि बकौल बेज्यू पार्टी-राज्य फ्रेमवर्क की कैद से कम्युनिज्म के विचार को मुक्त कराने में वे माओ से भी आगे निकल गये हैं!) से कर भी नहीं सकते हैं। इस अध्याय के अन्‍त में वे कहते हैं, ‘‘आज हम जानते हैं कि हर किस्म की मुक्तिकामी राजनीति को पार्टी के मॉडल के आगे सोचना होगा और पार्टी-राज्य के फ्रेमवर्क के अध्याय को अन्तिम और निर्णायक तौर पर बन्‍द कर देना होगा। भविष्य की राजनीति पार्टी के बिना होगी…’’ लेकिन, भविष्य की यह राजनीति क्या होगी, बेज्यू एक बार फिर इस प्रश्न पर चुप्पी साधे हुए हैं।

अगले अध्याय में बेज्यू पेरिस कम्यून की चर्चा पर आते हैं। यहाँ पर एक बार फिर बेज्यू ऐतिहासिक विवरणों और तथ्यों का खूब प्रयोग करते हैं। पेरिस कम्यून से जुड़े तमाम तथ्यों को बेज्यू दर्शन और मनोविश्लेषण की श्रेणियों के जरिये पेश करते हैं। ‘‘सिंग्युलैरिटी’’, ‘‘साइट’’, ‘‘ऑण्टोलॉजी’’, ‘‘लॉजिग’’ जैसी श्रेणियों का इस अध्याय में खूब इस्तेमाल किया गया है। इन ऐतिहासिक तथ्यों के ब्यौरे में हम नहीं जायेंगे। हमारा मकसद यहाँ इस बात की पड़ताल करना है कि आखिर क्यों बेज्यू पेरिस कम्यून के मॉडल का इतना समर्थन करते हैं? कारण स्पष्ट है – क्योंकि पेरिस कम्यून के वक्त हिरावल पार्टी और सर्वहारा राज्य की अवधारणा उतनी सुस्पष्ट नहीं थी जितना कि मजदूर वर्ग के राजनीतिक सत्ता पर काबिज होने के इस पहले प्रयोग के समाहार के बाद वह हुई। बेज्यू के शब्दों में कहें तो कम्यून पार्टी-राज्य फ्रेमवर्क का बन्‍दी नहीं था। मार्क्‍स ने कम्यून की परिस्थितियों, कारणों और अनुभवों का निचोड़ निकालते हुए जो निष्कर्ष निकाला, उसे भी याद करना यहाँ जरूरी है। मार्क्‍स ने कहा था, ‘‘मजदूर वर्ग बनी-बनायी राज्य मशीनरी को ज्यों का त्यों हाथ में नहीं ले सकता और उसे अपना मकसद पूरा करने के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकता।’’ उन्होंने बताया कि सर्वहारा वर्ग को पुरानी राज्य मशीनरी को ‘‘तोड़ने’’ और ‘‘चकनाचूर करने के लिए’’ क्रान्तिकारी हिंसा का इस्तेमाल करना चाहिए तथा ‘‘सर्वहारा अधिनायकत्व’’ को लागू करना चाहिए। बेज्यू का कहना कि मार्क्‍स कम्यून के अपने आकलन में सुस्पष्ट नहीं थे, कोरी लफ्फाजी है। उपर्युक्त उद्धरण से स्पष्ट है कि सर्वहारा राज्यसत्ता के विषय में मार्क्‍स के विचार वास्तव में क्या थे। यह बेज्यू का स्वतःस्फूर्ततावाद और पार्टी-राज्य फ्रेमवर्क से उनकी ‘एलर्जी’ है जो उन्हें इस निष्कर्ष पर पहुँचाती है। बेज्यू के अनुसार एक दूसरी दुनिया का भ्रूण कम्यून के मॉडल में ही आकार ले रहा है क्योंकि यह मॉडल पार्टी-राज्य के स्वरूप से मुक्त है। यह इतिहास के चक्के को पीछे धकेलना नहीं तो और क्या है? पेरिस कम्यून का प्रयोग ठीक यही दिखलाता था कि सर्वहारा वर्ग को क्रान्तिकारी विचारधारा और क्रान्तिकारी संगठन की आवश्यकता है और उनके जरिये ही वह बुर्जुआ राज्यसत्ता का ध्वंस कर सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व को कायम कर सकता है। मजदूर वर्ग व अन्य मेहनतकश वर्गों के विरुद्ध हिंसा के संगठित उपकरण का ध्वंस संगठित क्रान्तिकारी हिंसा के जरिये ही किया जा सकता है। लेकिन बेज्यू के लिए पेरिस कम्यून का मॉडल राज्य, पार्टी आदि की अशुद्धताओं से मुक्त था! यह तथ्यतः भी गलत है। दस सप्ताह से कुछ ज्यादा समय तक पेरिस में मजदूरों की सत्ता ने जो कुछ किया वह क्रान्तिकारी हिंसा और सर्वहारा वर्ग का अधिनायकत्व ही था! बल्कि, मार्क्‍स के शब्दों को उधार लेते हुए कहा जा सकता है कि भ्रूण रूप में सर्वहारा सत्ता और शासन का एक नमूना पेश करने के बावजूद, पेरिस कम्यून की सबसे बड़ी गलती यही रही कि उसने क्रान्तिकारी हिंसा और सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व को पर्याप्त हद तक लागू नहीं किया। लेकिन बेज्यू हर ऐतिहासिक घटना की तरह पेरिस कम्यून का जिक्र करते हुए भी मनमाने ढंग से तथ्यों का चयन और व्याख्या करते हैं ताकि अपने पैथोलॉजिकल प्रतिक्रिया को और राजनीतिक सदमे को अभिव्यक्ति दे सकें। बेज्यू का काम आसान है : नतीजे पहले से तय हैं, बस तथ्यों को उसमें फिट करना है।

दार्शनिकों ने

दुनिया की तरह-तरह से व्याख्या की है

पर सवाल उसको बदलने का है,

मानता हूँ।

लेकिन फिलहाल मैं असन्‍तुष्ट हूँ

दुनिया की व्याख्याओं से

और मानता हूँ कि

नये बदलावों की हो रही व्याख्याएँ

या तो नाकाफी या फिर गलत हैं

और यह कि

रुका हुआ है आज

दुनिया को बदलने का काम भी।

इसलिए अभी तो मैं

दुनिया की एक और व्याख्या कर रहा हूँ।

  • कात्यायनी (दुनिया बदलने के बारे में कतिपय सुधीजनों के विविध विचार-1)

अन्तिम अध्याय में आखिरकार बेज्यू ‘‘कम्युनिज्म’’ के अपने विचार पर आते हैं। बेज्यू के ‘‘कम्युनिज्म’’ का विचार क्या है, इसकी चर्चा हम पहले कर आये हैं। अपने ‘‘कम्युनिज्म’’ के विचार को परिभाषित करने के लिए बेज्यू यथार्थ (the Real), काल्पनिक (the Imaginary) और प्रतीकात्मक (the Symbolic) की लकानियन त्रयी को लागू करते हैं। उनके अनुसार इतिहास ‘प्रतीक’ का क्षेत्र है, भविष्य की परियोजना (उनके लिए कम्युनिज्म का विचार) ‘काल्पनिक’ का क्षेत्र है और राजनीति ‘यथार्थ’ का क्षेत्र है! आप इस बँटवारे के पीछे बेज्यू की पूरी हेगेलीय-लकानीय समझदारी को देख सकते हैं। यदि कम्युनिज्म की परियोजना ‘काल्पनिक’ का क्षेत्र है तो कम्युनिज्म की पूरी परियोजना एक आत्मगत कारक बन जाती है। इसके अलावा बेज्यू का कम्युनिज्म एक काण्टीय नियामक विचार (Regulative Idea) है जिसके लिए यथार्थ के अनुरूप होना या उसका प्रतिनिधित्व करना अनिवार्य नहीं है। यह एक लोकोत्तर विचार (transcendental Idea) है। इसलिए बेज्यू के कम्युनिज्म का विचार महज एक विचार है, यह किसी किस्म के अमलीकरण या मूर्तीकरण का मोहताज नहीं है! ऐसा क्यों है इसे हम आगे स्पष्ट करेंगे।

बेज्यू के दो अन्य सैद्धान्तिकरणों पर भी यहाँ चर्चा करना आवश्यक है। ठीक उसी प्रकार इतिहास को ‘प्रतीकात्मक’ के रूप में और राजनीतिक को ‘यथार्थ’ के रूप में चित्रित करने के पीछे भी जो सोच काम कर रही है, वह वही हेगेलीय-लकानियन समझदारी है। इसके अनुसार, इतिहास प्रतीकात्मक का प्रतिनिधित्व करता है। लकानीय त्रयी में अगर हम यथार्थ, प्रतीकात्मक और काल्पनिक के सम्‍बन्‍ध को समझ लें तो बेज्यू का हेगेलीय भाववाद खुलकर सामने आ जाता है। लकाँ के मुताबिक ‘यथार्थ’ (the Real) ‘वास्तविकता’ (the Reality) से अलग वस्तु है। यथार्थ वह स्थिति है जिससे हम उस क्षण हमेशा के लिए काट दिये जाते हैं, जिस दिन हम भाषा के जगत में प्रवेश करते हैं। यानी कि अपनी छवि के प्रति सचेत होने के पहले (लकाँ का ‘मिरर स्टेज’ का सिद्धान्‍त जिसमें कि एक बच्चा पहली बार अपनी एक छवि को देखता है, जो कि वास्तव में बच्चे की असल छवि नहीं होती है, बल्कि एक काल्पनिक छवि होती है, और यह बच्चे की इस फन्‍तासीनुमा छवि को भरने का कार्य कोई ऐसी छवि करती है, जो बच्चा अपने लिए गढ़ता है, जिसका आधार कोई ऐसा व्यक्ति होता है जो कि वह बच्चा बन जाना चाहता है) एक नवजात शिशु ‘यथार्थ’ के जगत में होता है। इस मंजिल में बच्चा सिर्फ आवश्यकता और उसकी पूर्ति को पहचानता है। वह अभी अपने, अपनी माँ या बाह्य जगत में अन्‍तर नहीं जानता है। लकाँ के लिए यह मंजिल पूर्णता (completeness या fullness) की मंजिल है। यह बोध भाषा में बच्चे के प्रवेश के साथ खो जाता है। भाषा के जगत में प्रवेश करते ही आवश्यकता माँग बन जाती है। यथार्थ से यह अलगाव स्थायी होता है और इसीलिए लकाँ का कहना था कि मनुष्यों के लिए यथार्थ असम्भव है, क्योंकि इसे भाषा में अभिव्यक्त ही नहीं किया जा सकता है। लेकिन लकाँ के मुताबिक यथार्थ हमेशा एक भूमिका अदा करता रहता है और ‘काल्पनिक’ और ‘प्रतीकात्मक’ ‘यथार्थ’ के पत्थर से बार-बार टकराते हैं और असफल होते रहते हैं। ‘काल्पनिक’ की अवस्था ‘मिरर स्टेज’ की अवस्था है जिसमें सब्जेक्ट आदिम आवश्यकता से ‘‘माँग’’ की मंजिल में प्रवेश करता है। आवश्यकता पूरी हो सकती है, लेकिन ‘‘माँग’’ कभी पूरी नहीं हो सकती है। इसकी वजह से एक ‘अभाव/कमी’ का बोध जन्म लेता है। जैसे ही किसी को अपने अस्तित्व के दुनिया से अलग होने का पता चलता है वैसे ही एक अकुलाहट की भावना जन्म लेती है, जिसके पीछे कुछ ‘खो’ जाने का बोध काम करता है। बच्चा जैसे ही इस मंजिल में पहुँचता है, उसकी ‘‘माँग’’ होती है इस अन्यता के घेरे में आ चुकी दुनिया को अपना अंग बनाना, जैसा कि बच्चे के नवजात अवस्था में हुआ करता था, जब बच्चा भाषा में प्रवेश के साथ अपने आपको दुनिया से अलग नहीं देखता था। यह ‘‘माँग’’ अपूरणीय होती है, क्योंकि यह उस छवि (image) पर आधारित है जो बच्चे ने अपने मन में बनायी है, यह छवि सुसंगत है, पूर्ण है, और स्थिरतापूर्ण है, लेकिन यह छवि उस वास्तविक बच्चे जैसी नहीं है। यह छवि एक कल्पना है जो बच्चे ने अपनी माँग के आधार पर बनायी है और इस रूप में अपूरणीय है। यह छवि किसी भी ऐसे व्यक्ति की हो सकती है जो कि बच्चा बनना चाहता हो; और इस रूप में अपनी ‘काल्पनिक’ छवि से उसका सम्‍बन्‍ध नारसिसिस्टिक है। अब आते हैं लकाँ के ‘प्रतीकात्मक’ के सिद्धान्‍त पर। प्रतीकात्मक का सिद्धान्‍त वास्तव में ‘यथार्थ’ की ‘काल्पनिक’ की सहायता से भाषा के माध्यम के जरिये की गयी एक श्रेणीबद्ध प्रस्तुति है। मिसाल के तौर पर, ‘काल्पनिक’ के विश्व में हम अच्छे-बुरे, दुख-आनन्‍द, आदि के बारे में आदर्शीकृत धारणाएँ रखते हैं और अच्छा बुरे का, दुख आनन्‍द का बहिष्कार करता है; उनमें से एक ही स्वीकार्य होता है; यह वह धरातल होता है जहाँ हम चयन करते हैं। लेकिन ‘प्रतीकात्मक’ के जगत में इन दोनों का अस्तित्व सम्भव होता है; हालाँकि उनके बीच हम भेद करते हैं, मगर हम उन दोनों के अस्तित्वों को स्वीकार करते हैं। ‘यथार्थ’ में ऐसी श्रेणियाँ होती ही नहीं हैं; चूँकि ‘यथार्थ’ उस दौर का प्रतिनिधित्व करता है जब/जहाँ भाषा नहीं थी और इसलिए विचारधारा भी नहीं थी। बाद में, भाषा के प्रवेश के साथ और अपनी ‘कल्पनाओं’ की श्रेणियों की सहायता से हम ‘यथार्थ’ का ‘वास्तविकता’ के रूप में पुनरुत्पादन करते हैं। यह सारा झमेला दरअसल यह कह रहा है कि ‘काल्पनिक’ मानसिक निर्मिति है, जो कि भाषा के जगत में प्रवेश के समय ‘स्व’ और ‘अन्य’ में भेद के साथ पैदा होती है; इस दौर के पहले ‘स्व’ और ‘अन्य’ एक व पूर्ण होते हैं और यह ‘यथार्थ’ की मंजिल होती है; इसके बाद, भाषा (विचारधारा) के माध्यम से हम ‘यथार्थ’ को समझने के प्रयास में उसे श्रेणीबद्ध करते हैं, उसे समझने के लिए विभेदीकृत करते हैं (जो कि ‘यथार्थ’ दरअसल होता ही नहीं है!) और इस प्रक्रिया में अपने लिए एक ‘वास्तविकता’ का निर्माण करते हैं जो कि एक निर्मिति ही होती है और यह ‘प्रतीकात्मक’ का आधार है! यथार्थ अज्ञेय है! और इसीलिए जैसे ही हमारा ‘काल्पनिक’ और ‘प्रतीकात्मक’ इस ‘यथार्थ’ से टकराते हैं, वैसे ही वे छिन्न-भिन्न हो जाते हैं, और इसके साथ ही नये ‘काल्पनिक’ और नये ‘प्रतीकात्मक’ की रचना होती है, जो एक नयी ‘वास्तविकता’ के रूप में एक नयी निर्मिति का निर्माण करते हैं, जो कि और कुछ नहीं बल्कि ‘यथार्थ’ की एक छद्म प्रस्तुति ही होती है।

अब जरा याद करें कि बेज्यू ने इस लकानियन त्रयी में किसे क्या कहा है – इतिहास ‘प्रतीकात्मक’ का प्रतिनिधित्व करता है; कम्युनिज्म का विचार ‘काल्पनिक’ का प्रतिनिधित्व करता है; और राजनीति ‘यथार्थ’ का प्रतिनिधित्व करती है! यानी कि इतिहास भाषा और पाठ का क्षेत्र है, वास्तव में इतिहास (‘ऐसा हुआ था’) का कोई अस्तित्व नहीं है, यह आपकी कल्पनाओं की मदद से इतिहास की भाषाई निर्मिति है! कम्युनिज्म का विचार कल्पनाओं का क्षेत्र है जिसमें मानवता अपनी वह ‘‘माँग’’ रखती है, जो कि एक आदर्श मनोगत छवि और यथार्थ के टकराव या विरोध से पैदा हुई है, और जो ठीक इसीलिए पूर्ण नहीं हो सकती; नतीजतन, इस ‘‘माँग’’ को अनन्‍त रूप से (eternally) यथार्थ से टकराते रहना है, भंग होते रहना है और पुनर्निर्मित होते रहना है! कम्युनिज्म के विचार की यह अनन्‍त यात्रा है, जिसमें अब पुरानी ‘‘माँगें’’ (पार्टी, राज्य, वर्ग आदि) यथार्थ से टकराकर भंग हो चुकी हैं और अब नयी ‘‘माँगें’’ यथार्थ के साथ नये द्वन्‍द्व में निर्मित हो रही हैं और ‘‘इच्छाओं’’ के रूप में अपने आपको भाषा/विचारधारा में अभिव्यक्त कर रही हैं। और यथार्थ क्या है? वह समकालीन राजनीति है जिसकी संरचना को भाषा या विचारधारा में नहीं बाँधा जा सकता है; यह ‘यथार्थ’ भाषा-पूर्व युग की वस्तु है और भाषा में कल्पना के सहारे इसकी निर्मिति उसकी छद्म प्रस्तुति ही होगी, एक ‘वास्तविकता’ का निर्माण होगा! तो फिर आप राजनीति सचेतन तौर पर और योजनाबद्ध रूप में करें क्या? बेज्यू का जवाब सीधा है – कुछ नहीं! यह यथार्थ स्वायत्त रूप से विकसित होना है और इसमें जो बदलाव होंगे उनके बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता है, और यहीं से हम बेज्यू के कुछ अन्य निष्क्रिय उग्रपरिवर्तनवादी प्रतिपादनों पर आ सकते हैं, जिसमें सबसे अहम है ‘‘इवेण्ट’’ की अवधारणा। बेज्यू के ‘‘इवेण्ट’’ (घटना/संयोग) की अवधारणा के अनुसार समाज में होनेवाले सभी बदलाव आकस्मिक होते हैं और उनका सैद्धान्तिकीकरण नहीं किया जा सकता। अब आप इस बात को बेज्यू की ‘यथार्थ’ की अवधारणा से जोड़ सकते हैं। चूँकि यथार्थ सैद्धान्तिकीकरण से परे है (क्योंकि सैद्धान्तिकीकरण का माध्यम भाषा और पाठ है) इसलिए यथार्थ में होने वाले परिवर्तनों के बारे में भी कुछ पहले से नहीं कहा जा सकता, उनका सैद्धान्तिकीकरण नहीं किया जा सकता और इन्हीं परिवर्तनों को व्याख्यायित करने के लिए ‘‘इवेण्ट’’ की अवधारणा बेज्यू द्वारा रची गयी है। यह ‘‘इवेण्ट’’ ही नयी सम्भावनाओं को जन्म देता है, लेकिन ‘‘इवेण्ट’’ का होना संयोग या इत्तेफाक की बात है, इसलिए आमूलगामी सामाजिक परिवर्तन की पूरी परियोजना ही बेज्यू द्वारा संयोग के क्षेत्र में धकेल दी गयी है। इसमें सचेतन योजना और राजनीति का स्थान नहीं है या अगर है तो वह एक निष्प्रभावी स्वतःस्फूर्ततावादी उपस्थिति है। और इस तरह से क्रान्ति या कहें कि परिवर्तन से हर प्रकार का अभिकरण छीन लिया गया है। क्योंकि किसी सचेतन अभिकर्ता की आवश्यकता ही नहीं है! इसी निष्क्रिय उग्रपरिवर्तनवाद की मदद के लिए एक अन्य सैद्धान्तिकीकरण जो बेज्यू यहाँ प्रस्तुत करते हैं वह है उनका ‘‘सबट्रैक्शन’’ (व्यवकलन) का सिद्धान्‍त। इसके अनुसार आज कम्युनिज्म का लक्ष्य राज्य का विलोपीकरण नहीं है (क्योंकि यह एक असीमित, अपरिमित प्रक्रिया है!), बल्कि ‘‘राज्य से दूरी बनाये रखने की राजनीति’’ है – जो किसी भी राज्य में किसी भी रूप में सम्मिलित होने को नकारती है। ‘‘सबट्रैक्शन’’ के अपने सैद्धान्तिकीकरण के जरिये एक बार फिर बेज्यू सर्वहारा अधिनायकत्व की अवधारणा पर हमला करते हैं और दरअसल क्रान्ति करने के सिद्धान्‍त पर ही हमला बोलते हैं। बेज्यू का असली मकसद है अति-आमूलगामी शब्दावली में आमूलगामिता की हर सम्भावना या समझदारी पर चोट की जाये और इसीलिए उनके हर सिद्धान्‍त का असल निशाना मार्क्‍सवाद की क्रान्तिकारी कोर अन्‍तर्वस्तु यानी कि वर्ग, राज्य, और पार्टी का सिद्धान्‍त है।

अन्‍त में हम सारांश के रूप में इतना ही कहना चाहेंगे कि ‘‘कम्युनिज्म’’ की अपनी प्राक्कल्‍पना और विचार के नाम पर बेज्यू मार्क्‍सवाद की बुनियादी प्रस्थापनाओं और क्रान्तिकारी अन्‍तर्वस्तु को खारिज करने का काम करते हैं। वह अतीत के सभी समाजवादी प्रयोगों पर ‘‘विफलता’’, ‘‘त्रासदी’’ और ‘‘आपदा’’ का लेबल तो चस्पाँ कर देते हैं, जो कि बेज्यू के लिए आकाशवाणी-समान सत्य है, लेकिन न तो उन प्रयोगों का कोई आलोचनात्मक मूल्यांकन पेश करते हैं और न ही सामाजिक परिवर्तन का अपना कोई सकारात्मक मॉडल पेश करते हैं। वह एक ऐसे कम्युनिज्म की बात करते हैं जो मार्क्‍सवादी नहीं होगा। लेकिन, अकेले बेज्यू इस अनैतिहासिक, गैर-द्वन्‍द्वात्मक, प्रत्ययवादी सैद्धान्तिकीकरण का शिकार नहीं हैं, बल्कि उत्तर-मार्क्‍सवादी ‘‘रैडिकल’’ दार्शनिकों की पूरी धारा है जो मार्क्‍सवाद पर हमला बोल रही है। अकर्मण्यता और निष्क्रियता के इन सिद्धान्‍तकारों को हम दुनिया की ‘‘नयी व्याख्या’’ करनेवाले उनके ‘‘विचारों’’ के बीच ही छोड़ देते हैं, क्योंकि दुनिया को बदलने का काम अभी भी बाकी है।

दिशा सन्धान – अंक 2  (जुलाई-सितम्बर 2013) में प्रकाशित

अफज़ल गुरू को फाँसीः बुर्जुआ “राष्ट्र” के सामूहिक अन्तःकरण की तुष्टि के लिए न्याय को तिलांजलि

अफज़ल गुरू की फाँसी बुर्जुआ चुनावी राजनीति के सरोकारों के तहत लिया गया एक राजनीतिक फैसला है। और बुर्जुआ राज्यसत्ता का पतनशील चरित्र अब इस हद तक गिर चुका है, कि वह अपने चुनावी फायदों के लिए फाँसी की राजनीति कर रही है, ताकि फ़ासीवादी तरीके से भारतीय मध्यवर्गीय जनमानस, या “राष्ट्रीय” जनमानस, को अपने पक्ष में तैयार किया जा सके। इसके ज़रिये एक तीर से कई निशाने लगाये जा रहे हैं। ज़िस समय देश भर में आम मेहनतकश जनता में महँगाई, ग़रीबी, भ्रष्टाचार आदि के ख़िलाफ़ और भारतीय शासक वर्गों के ख़िलाफ़ गुस्सा भड़क रहा है, उस समय अन्धराष्ट्रवाद, साम्प्रदायिक फ़ासीवाद और देशभक्ति के मसलों को उठाकर असली मुद्दों को ही विस्थापित कर दिया जाय यही भारतीय शासक वर्ग की रणनीति है। यही काम भाजपा राम मन्दिर और हिन्दुत्व का मसला भड़का कर अपने तरीके से कर रही है, और कांग्रेस फाँसी की राजनीति करते हुए अपने तरीके से कर रही है। अफज़ल गुरू की फाँसी इसी बात की एक बानगी थी। read more