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कैसे पहुंची पेरिस कम्यून की चिंगारी चियापास की पहाड़ियों में

कैसे पहुंची पेरिस कम्यून की चिंगारी चियापास की पहाड़ियों में

  • सत्यप्रकाश

मुक्ति के स्वप्न, मुक्ति के विचार, अमर होते हैं। उन्हें दबाया जा सकता है, धूल और राख की सात परतों के नीचे दफ़न किया जा सकता है, स्मृतियों से ओझल किया जा सकता है, निर्वासित किया जा सकता है। पर उन्हें कभी मिटाया नहीं जा सकता। लहरों में बहकर या हवाओं में उड़कर किसी कठोर चट्टान की नन्हीं सी दरार में जा गिरे बीज की तरह वे फि़र अंखुवाते हैं, छनकर पहुंची सूरज की जरा सी रोशनी और थोड़ी सी नमी से भी वे पोषण लेकर बढ़ते रहते हैं और फि़र एक दिन चट्टान का सीना फ़ाड़कर बाहर आ जाते हैं।

सवा सौ साल पहले 1871 के पेरिस कम्यून की चिंगारी आज मेक्सिको के चियापास की पहाड़ियों में लड़ रहे गुरिल्ला योद्धाओं तक कैसे पहुंची, यह एक बेहद रोमांचक, हैरतअंगेज और साथ ही आशा से भर देने वाली कहानी है।

अमेरिकी इजारेदार पूंजीपतियों द्वारा “खुली (बाजार) डकैती” को और तेज करने के लिए थोपे गये ‘उत्तरी अमेरिका मुक्त व्यापार समझौते’ (नाफ्टा) के लागू होने वाले दिन ही मेक्सिको में भड़के सशस्त्र किसान उभार ने सारे विश्व को चौंका दिया था। चियापास की पहाड़ियों में लड़ रहे विद्रोहियों में शामिल स्त्री योद्धएं स्त्रियों में नई जागृति का संकेत दे रही थीं।

यहां हम इतिहास की एक अनोखी घटना की चर्चा करेंगे जो हमें पेरिस के बैरिकेड्स से चियापास के घने जंगलों से ढंकी पहाड़ियों तक ले जाती है-एक लाल झण्डे और एक “लाल दिल”वाली महिला के पदचिह्नों के सहारे।

पेरिस कम्यून की स्त्रियाँ

18 मार्च, 1871। शहर के मजदूरों और आम जनता के सशस्त्र दस्ते पेरिस नेशनल गार्ड का पेरिस पर अधिकार हो गया। थियेर के नेतृत्व में राष्ट्रीय सरकार भागकर वर्साई के महलों में जा छुपी। दस दिन बाद पेरिस कम्यून की स्थापना की घोषणा कर दी गयी। इतिहास में पहली बार सर्वहारा अधिनायकत्व कायम हुआ। यह एक अभूतपूर्व घटना थी।

यूरोप की पूर्ववर्ती क्रान्तियों में, खासकर 1848 की क्रान्ति में सर्वहारा ने भाग लिया था और प्रायः मुख्य लड़ाकू शक्ति वही था लेकिन पहली बार उसने खुद अपने लिए सत्ता पर कब्जा किया था। कम्यून सिर्फ़ दो महीने टिका रहा, लेकिन बुर्जुआ समाज के ताने-बाने को तोड़कर एक नये प्रकार की क्रान्ति जन्म ले चुकी थी।

इस नयी क्रान्ति के सभी क्षेत्रों में स्त्रियां अग्रिम मोर्चों पर थीं। उन्होंने कम्यून के नेतृत्व में मौजूद प्रूधों जैसे रूढ़िवादियों को चुनौती दी जो स्त्रियों को दबाकर रखने की वकालत करते थे। उन्होंने चर्च की खुली मुखालफ़त की। और राजनीति में तथा रणभूमि में उनके दुस्साहसिक कारनामों से पेरिस के बुर्जुआ जेंटिलमैनों और उनके जनरलों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई।

कम्यून के लाल झण्डे की तरह लाल कमरबन्द और लाल स्कार्फ़ पहने कम्यून की स्त्रियां बुर्जुआ हलकों में कुख्यात थीं। दुश्मन सैनिकों की बढ़त रोकने के लिए केरोसिन से लैस उनके दस्ते जगह-जगह आग लगा देते थे। जब वर्साय की सेनाओं ने पेरिस पर फि़र कब्जा कर लिया तो बड़ी तादाद में स्त्रियों को फ़ायरिंग स्क्वाड के सामने भेजा गया। शहरी गरीब वर्ग की कोई भी स्त्री टोकरी या बोतल लिए हुए दिख गयी तो उसे ‘फ़ूंक-ताप दस्ते’ की सदस्य मानकर फ़ौरन गोली मार दी जाती थी।

हमले की पहली रात। अंधेरे का फ़ायदा उठाकर फ्रांसीसी सरकार के सैनिक चुपचाप पेरिस में घुस आये थे। वे उन तोपों को वापस ले जाने की फि़राक में थे जिन्हें जनता ने छीन लिया था। लेकिन उन्हें देख लिया गया और थोड़ी ही देर में वहां स्त्री-पुरुषों की भीड़ उमड़ पड़ी। स्त्रियों ने तोपों को अपने शरीर से ढंक दिया। सिपाहियों ने अफ़सरों का गोली चलाने का आदेश मानने से इंकार कर दिया। सैनिक वापस लौट गये, पर अनेक कम्युनार्डों से आ मिले।

पेरिस कम्यून की इन वीरांगनाओं में एक थीं लुइस मिशेल। 1830 में जन्मी लुइस की मां एक किसान स्त्री थी और पिता एक बिगड़ा हुआ जागीरदार जिसने उसे अपनी पुत्री मानने से इंकार कर दिया था। कम्यून के समय वह 41 वर्ष की थी।

पढ़-लिखकर शिक्षिका बनी लुइस 1851 में मां के साथ पेरिस आ गई जहां उन्होंने ‘सोसायटी फ़ार दि रिक्लेमेशन ऑफ़ विमेन्स राइट्स’ और ‘स्त्री अधिकार’ नामक अखबार की शुरुआत में अहम भूमिका निभाई। प्रशा की सेना द्वारा पेरिस की घेरेबन्दी के दौरान उन्होंने मोंतमार्त्रे में “सतर्कता समिति” गठित की और ‘बीस अरांदिस्मेंट्स की केन्द्रीय कमेटी’ में डेलीगेट चुनी गईं जिसने ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशन तथा कार्लमार्क्स के इंटरनेशनल की पेरिस शाखा के साथ मिलकर “… बुर्जुआ वर्ग के विशेषाधिकारों के खात्मे, एक शासक जाति के रूप में इसकी समाप्ति और राजनीतिक सत्ता मजदूरों को सौंपे जाने”की मांग उठाई थी।

कम्यून के दौरान मिशेल चारों तरफ़ दिखाई देती थीं। कभी वह स्त्रियों को नर्सों और योद्धाओं के रूप में संगठित करती नजर आतीं, कभी राजनीतिक बैठकों में भाषण करतीं तो कभी सैनिक लड़ाइयों की अग्रिम पंक्ति में मोर्चा लेती दिखतीं।

कम्यून की घोषणा के बाद लुइस मिशेल वर्साई जाकर प्रतिक्रियावादी सरकार के नेता थियेर को खत्म कर देना चाहती थीं। इसे नामंजूर करने के पीछे एक तर्क यह दिया गया कि ऐसा कर पाना व्यावहारिक नहीं था। लुइस भेष बदलकर दुश्मन सेनाओं के बीच से होती हुई वर्साई पहुंच गईं, सैनिकों के बीच राजनीतिक प्रचार किया, अपना वर्साई पहुंचना साबित करने के लिए वहां के कुछ अखबार खरीदे और सुरक्षित लौट आईं। एक बार जब घेरेबन्दी से भयभीत हो गया कम्यून का एक पदाधिकारी क्लैमार्त स्टेशन को दुश्मन के सुपुर्द कर देना चाहता था, तो लुइस मिशेल जलती मोमबत्ती लेकर गोला-बारूद से भरे कमरे के दरवाजे पर बैठ गईं और धमकी दी कि यदि उसने समर्पण किया तो वह पूरे स्टेशन को उड़ा देंगी।

कम्यून के अन्तिम सप्ताह में वह मोंतमार्त्रे की कब्रगाह के बैरिकेड पर तबतक लड़ती रहीं जब तक 50 में से सिर्फ़ 15 योद्धा बचे रह गये। मोंतमार्त्रे को बचाने की असफ़ल कोशिश के बाद मिशेल बचे हुए साथियों को लेकर दूसरे बैरिकेड पर आ गईं और वहां भी दुश्मन सैनिकों का कब्जा हो जाने पर वह भेस बदलकर अपनी बूढ़ी मां को देखने घर पहुंचीं पर वर्साई पुलिस ने लुइस के बदले उनकी मां को गिरफ्तार कर लिया था। लुइस ने अपनी मां की रिहाई के बदले खुद को गिरफ्तार करा दिया।

उन पर मुकदमा चलाकर दूसरे कम्युनार्डों के साथ उन्हें ऑस्ट्रेलिया के पास फ्रांसीसी उपनिवेश न्यू कैलिडोनिया के टापू पर निर्वासित कर दिया गया। 1878 में जब वहां पोलिनेशियाई लोगों की बगावत फ़ूट पड़ी तो कुछ कम्युनार्डों ने उसे दबाने में फ्रांसीसी सेना का साथ दिया। लेकिन सच्ची अन्तरराष्ट्रीयतावादी लुइस मिशेल ने पोलिनेशियाई मूल निवासियों का पक्ष लिया और गुप्त रूप: “कनक लोगों (पोलिनेशियाई मूल निवासी) के दिलों में मुक्ति और रोटी की वही आशा थी। मुक्ति और सम्मान की चाह में उन्होंने 1878 में विद्रोह कर दिया। मेरे दूसरे कामरेड उस शिद्दत से इसका समर्थन नहीं करते थे जिस तरह मैं करती थी।…  कनक लोग उसी स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे थे जो हम कम्यून के जरिये लाना चाहते थे। एक रात मुझे अपने लाल स्कार्फ को दो टुकड़ों में बांटना पड़ा जिसे मैं हर तलाशी से छुपाकर बचाती आई थी। गोरों के विरुद्ध लड़ने के लिए विद्रोहियों से मिलने जा रहे दो कनक मुझसे विदा लेने आये थे।

वे तूफानी समुद्र में उतर गये। हो सकता है वे खाड़ी पार ही नहीं कर पाये हों, या शायद लड़ते हुए मारे गये हों। मैंने उन्हें फि़र नहीं देखा।”

लेकिन कम्यून का लाल स्कार्फ और उसके साथ मुक्ति और समानता के कम्यून के विचार जीवित रहे और हजारों मील का सफ़र करके दुनिया के दूसरे छोर पर पहुंच गये।

पकड़े गये कनक विद्रोहियों को गुलामों के रूप में बेच दिया गया जिनमें से कुछ खेतों पर काम करने के लिए मेक्सिको ले जाये गये। मेक्सिको के लेखक अन्तोनिया गार्सिया डि लियोन की पुस्तक ‘रेजिस्टेंसिया यूटोपिया’ इस अद्भुत कहानी के आगे के सूत्र ढूंढ़ती है:

“मेक्सिको में 1888 में बस गई हेलेन सार्जेंट नामक अमेरिकी महिला ने अपनी डायरी में लिखा:… अपने “आदिम कृषि कम्युनिज्म” और चियापास के (रेड) इण्डियंस से मिलते-जुलते ऐतिहासिक अनुभवों के साथ कनक लोग पेरिस कम्यून की धुंधली स्मृतियां भी लाये थे। यह एक ऐसी विचित्र घटना थी जिसे विश्व पूंजीवाद के बर्बर विस्तार के सन्दर्भों में ही समझा जा सकता है। पेरिस कम्यून के ये स्मृति-चिह्न सोनोकुस्को (दक्षिण चियापास का क्षेत्र) में अराजकतावादी आन्दोलन और सामाजिक संघर्ष का यूटोपियाई प्रतीक बन गये। कनक विद्रोह के समय न्यू कैलिडोनिया फ्रांसीसियों के कब्जे में था जहां सजायाफ्ता लोगों को निर्वासित कर दिया जाता था। बन्दी कम्युनार्डों की पहली टोली सितम्बर 1872 में वहां पहुंची थी। छह वर्ष बाद जब वहां के मूल निवासियों ने विद्रोह कर दिया तो कुछ निर्वासितों ने मूल निवासियों के आक्रोश का दमन करने में मदद की। लेकिन बहुतों ने, जिनमें अविस्मरणीय लुइस मिशेल भी थीं, विद्रोहियों का पक्ष लिया। कनक लोगों के “कम्यून” की हार के पहले मिशेल ने उन्हें “पेरिस कम्यून का लाल झण्डा” थमाया था। कुचल दिये जाने के बाद जब उन्हें गुलामों के रूप में बेचा गया तो वे उस झण्डे को पहने हुए थे। जब उन्हें प्रशान्त महासागर पारकर दक्षिण अमेरिका के तट पर उतार गया तो वे उस झण्डे को और इसके साथ जुड़ी कम्यून की स्मृतियों और मुक्ति के स्वप्नों को भी ले आये। सोनोकुस्को में यह बीज फि़र अंखुवाया और लाल कमरबन्द चामुला मूल निवासियों की लड़ाई का अंग बन गया।

दायित्वबोध, मार्च-जून 1998