नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती दशक : एक सिंहावलोकन (पाँचवी किस्त)

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती दशक : एक सिंहावलोकन (पाँचवी किस्त)

  • दीपायन बोस

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चारु मजुमदार की लाइन की आलोचना और मतभेदों का बढ़ता सिलसिला

भाकपा (मा-ले) के भीतर के बढ़ते मतभेदों की चर्चा आगे बढ़ाने से पहले यह बताते चलें कि चीन की पार्टी के अतिरिक्त दुनिया की कई अन्य बिरादर पार्टियों ने भी चारु मजुमदार की “वामपन्थी” दुस्साहसवादी लाइन की आलोचना की थी। ग्रेट ब्रिटेन और न्यूज़ीलैंड की मा-ले पार्टियों द्वारा प्रस्तुत आलोचना की चर्चा हम पहले कर चुके हैं। जून 1971 की आसपास सीलोन की कम्युनिस्ट पार्टी (मा-ले) (श्रीलंका को तब इसी नाम से जाना जाता था) के नेता सन्मुग्थासन ने भाकपा (मा-ले) की केन्द्रीय कमेटी के सदस्य अप्पू (तमिलनाडु) के ज़रिये अपनी बिरादराना आलोचना पार्टी को भिजवायी। सन्मुग्थासन दुनिया के मा-ले आन्दोलन का एक सुपरिचित नाम था। माओ और चीन की पार्टी के शीर्ष नेताओं से उनका निकट सम्पर्क रहता था। उनकी आलोचना के तीन प्रमुख बिन्दु थे। पहला बिन्दु संघर्ष के सभी रूपों को ख़ारिज किये जाने से जुड़ा हुआ था। सन्मुग्थासन का स्पष्ट मत था कि जनसंगठनों और जनान्दोलनों की भूमिका किसी भी क्रान्तिकारी संघर्ष में अपरिहार्य होती है। उनकी दूसरी आलोचना जो इसी से जुड़ी हुई थी, यह थी कि ‘राजनीतिक सत्ता पर क़ब्ज़ा करने के लिए संघर्ष करो’ का नारा ग़लत है क्योंकि यह आर्थिक माँगों को लेकर संघर्ष की बुनियादी ज़रूरत की उपेक्षा करता है। आलोचना का तीसरा बिन्दु चारु मजुमदार के लेख ‘क्या तेलंगाना भारत का येनान बनेगा?’ के शीर्षक से जुड़ा हुआ था। श्रीलंका के कामरेडों का मत था कि ऐसे अनावश्यक नारे शत्रु को सावधान करते हैं और उसे उन जगहों की शिनाख़्त करने में मदद करते हैं जहाँ उसे अपने हमलों को केन्द्रित करना होता है। आलोचना के इन तीन बिन्दुओं में से तीसरा बिन्दु गौण है और यह देश-विशेष के वर्ग-संघर्ष की ठोस परिस्थितियों पर निर्भर करता है कि वह अपने संघर्ष के क्षेत्रों के बारे में इस तरह लिखे या नहीं और पार्टी मुखपत्रों में ऐसे आकलन प्रस्तुत करे या नहीं। लेकिन जो पहले दो मुद्दे थे उनका सारतत्व वही था जो चीनी सुझावों का था और डीवी-नागी ग्रुप, हरभजनसिंह सोही ग्रुप, असित सेन, प्रमोद सेनगुप्त, परिमल दासगुप्त, सुशीतल रॉयचौधुरी आदि द्वारा प्रस्तुत चारु मजुमदार की “वामपन्थी” दुस्साहसवादी लाइन की आलोचना का था।

“वामपन्थी” दुस्साहसवादी लाइन की एक महत्वपूर्ण आलोचना ‘पश्चिम बंगाल-बिहार सीमा क्षेत्रीय कमेटी’ ने प्रस्तुत की जिसे आम तौर पर बीरभूम कमेटी नाम से जाना जाता था। इस कमेटी के कार्यक्षेत्र के अन्तर्गत प. बंगाल के मुर्शिदाबाद और बीरभूम ज़िलों के अतिरिक्त तत्कालीन बिहार (आज के झारखण्ड) का संथाल परगना भी आता था। बीरभूम कमेटी ने अपनी यह आलोचना प. बंगाल की राज्य कमेटी को, और उसके ज़रिये केन्द्रीय कमेटी को भेजी लेकिन उसे पहले राज्य कमेटी ने (जिसपर दीपक विश्ववास और दिलीप बोस आदि का चारुभक्त गुट उस समय पूरी तरह क़ाबिज़ था) और फिर चारु मजुमदार ने दबा लिया और सुनीति कुमार घोष को छोड़कर केन्द्रीय कमेटी के किसी सदस्य तक को इसकी भनक तक नहीं लगने दी। यह सब कैसे हुआ, इसका थोड़ा सा उल्लेख हम आगे करेंगे जब सुनीति कुमार घोष के साथ चारु के मतभेदों के घटना-क्रम-विकास की चर्चा करेंगे। नक्सलबाड़ी और मा-ले आन्दोलन पर लिखी गयी अधिकांश पुस्तकों और लेखों में इसीलिए इस दस्तावेज़ का उल्लेख तक नहीं मिलता। बाद में जब केन्द्रीय सांगठनिक कमेटी, भाकपा (मा-ले) का गठन हुआ तो उसके नेतृत्व के अन्य सदस्यों को सुनीति कुमार घोष ने इसके बारे में बताया। आगे चलकर 1978 में जब भारत की कम्युनिस्ट लीग (मा-ले) का गठन हुआ तो उसके प्रथम सम्मलेन में प्रस्तुत मा-ले आन्दोलन के इतिहास-विषयक दस्तावेज़ में इस दस्तावेज़ की और इसे दबा दिये जाने की चर्चा देखने को मिलती है। इन सबकी चर्चा यथास्थान की जायेगी। सुनीति कुमार घोष ने अपने निधन से कुछ वर्षों पूर्व नक्सलबाड़ी और मा-ले आन्दोलन पर जो संस्मरणात्मक पुस्तक ‘नक्सलबाड़ी : बिफोर एण्ड आफ़्टर’ नामसे लिखी उसमें इस दस्तावेज़ की और इसे दबा दिये जाने की चर्चा देखने को मिलती है।

बीरभूम कमेटी की यह रिपोर्ट विशेष महत्व इसलिए रखती है क्योंकि तेलंगाना के बाद चारु की “वाम” अवसरवादी लाइन सबसे बड़े पैमाने पर इसी इलाक़े में लागू हुई थी। बीरभूम में पार्टी की गतिविधियों की शुरुआत 1971 के साल में शुरू में हुई। बोलपुर के श्रीनिकेतन कृषि कॉलेज पर मा-ले राजनीति से प्रभावित छात्रों का एक तरह से वर्चस्व स्थापित हो चुका था। कलकत्ता से भी इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में छात्र-युवा आकर काम करने लगे थे। बेहद ग़रीब इस इलाक़े में भूस्वामियों और सूदख़ोरों का ग़रीब किसानों पर भीषण आतंक क़ायम था। इस नाते कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों की आतंकवादी कार्रवाइयों को भी शुरू-शुरू में आम ग़रीब आबादी का जमकर साथ मिला। बड़े पैमाने पर पूरे इलाक़े में दस से लेकर बीस लोगों तक के छापामार दस्ते गठित किये गये जिनमें दो या तीन मध्य वर्ग के लोग और शेष भूमिहीन किसान होते थे। क़रीब 255 राइफ़लें और पिस्तौलें भूस्वामियों और पुलिस से छीनकर भूमिहीनों के बीच बाँट दी गयीं। जून के अन्त तक 175 लोगों का सफ़ाया किया जा चुका था जिनमें 5 पुलिस वाले, 17 बड़े, 32 मँझोले और 26 छोटे भूस्वामी, 12 सूदख़ोर, 11 डकैत तथा 7 पुलिस एजेण्ट थे। भूस्वामियों तथा कांग्रेस और माकपा के स्थानीय नेताओं की गुण्डा-वाहिनियों और स्थानीय पुलिस के पूरी तरह असहाय हो जाने के बाद सीआरपीएफ़ भी बुलायी गयी लेकिन हालात फिर भी क़ाबू में न आ सके। छापामार दस्ते गाँवों में ही नहीं, बल्कि इलाक़े के क़स्बों तक में खुलेआम मार्च करते थे। भूस्वामियों के घरों पर संथाल किसान छापामार दस्तों की अगुवाई में हमले करते थे और जन-अदालतों में उनके अपराध पढ़कर सज़ाएँ सुनायी जाती थीं। कुछ छोड़ दिये जाते थे तो कुछ को मृत्युदण्ड भी दिया जाता था। पूरे इलाक़े में सूदख़ोरी पूरी तरह से बन्द हो चुकी थी। उल्लेखनीय है कि मागुरजान भी बीरभूम कमेटी के कार्यक्षेत्र में ही आता था जहाँ ग़रीब किसानों के एक दस्ते ने रेलवे इमरजेंसी फ़ोर्स के एक कैम्प पर हमला करके छह राइफ़लें और गोलियाँ छीन ली थीं जिसके बाद चारु मजुमदार ने आनन-फ़ानन में बिना कमेटी से राय-मशविरा किये जन-मुक्ति सेना के गठन की घोषणा कर दी थी। उनकी इस घोषणा की हम पहले चर्चा कर चुके हैं। 1971 का मध्यावधि चुनाव निकट था और ख़तरा इस बात का था कि प. बंगाल में नक्सली सक्रियता के कारण चुनाव हो ही न सकें। तब केन्द्र सरकार की ओर से बंगाल के इन्चार्ज सिद्धार्थशंकर रॉय ने सेना के इस्तेमाल का निर्णय लिया। बांग्लादेश युद्ध से ख़ाली हुई लेफ्टिनेण्‍ट जनरल जगजीतसिंह अरोड़ा के नेतृत्व वाली ईस्टर्न कमाण्ड की रेजिमेण्ट्स को बंगाल में रोक लिया गया और पुलिस के सभी सशस्त्र बलों को भी सन्नद्ध कर दिया गया। इसके बाद उस ऐतिहासिक दमन-चक्र की शुरुआत हुई जिसकी चर्चा सुमन्त बनर्जी, सुनीति कुमार घोष, अमित भट्टाचार्य आदि ने अपनी पुस्तकों में विस्तार से की है। उस विस्तार में जाने के पहले हम बीरभूम कमेटी की रिपोर्ट और उत्तरवर्ती घटनाओं की चर्चा करेंगे।

सघन दमन-चक्र की शुरुआत के बाद बीरभूम के इलाक़े में जारी संघर्ष बिखर गया। बीरभूम कमेटी ने अपनी पहली रिपोर्ट नेतृत्व को उस समय भेजी थी जब वहाँ छापामार दस्तों की कार्रवाइयाँ ज़ोरशोर से जारी थीं। इस पहली रिपोर्ट में पार्टी की नीति और सफ़ाये की लाइन का समर्थन करते हुए चारु मजुमदार के अवदानों का विशेष उल्लेख किया गया था। दूसरी रिपोर्ट कमेटी ने उस समय भेजी जब बीरभूम का संघर्ष बिखर रहा था और ठहराव की स्थिति पैदा हो चुकी थी। इसमें बीरभूम कमेटी ने अपने अनुभवों के समाहार के आधार पर चारु मजुमदार की ‘सफ़ाये की लाइन’ की प्रखर और स्पष्ट आलोचना रखी थी। रिपोर्ट के अनुसार, वर्गशत्रुओं के सफ़ाये से व्यापक किसान आबादी के लामबन्द हो जाने की सोच ग़लत साबित हुई। इससे सिर्फ़ ग़रीब किसानों की दस प्रतिशत युवा आबादी ही संघर्षों में सक्रिय हो सकी। इस रणकौशल के कारण, शत्रु के आक्रमण के समय छापामार दस्ते किसान समुदाय से अलग-थलग पड़ गये। सिर्फ़ उन इलाक़ों में ही किसानों को एक हद तक गोलबन्द किया जा सका जहाँ सफ़ाये के बाद ज़मीन बन्धक रखने के कागज़ात जलाये गये और जोतदारों की चल सम्पत्ति को ज़ब्त करके उसे किसानों में बाँट दिया गया। कमेटी का स्पष्ट शब्दों में कहना था कि सफ़ाये की लाइन न केवल वर्ग संघर्ष का उच्चतर रूप नहीं है, बल्कि यह अपने-आप में वर्ग संघर्ष है ही नहीं। आलोचना का दूसरा बिन्दु यह था कि शत्रु के सशस्त्र बलों के संगठित हमले की स्थिति में हमें क्या करना होगा और मुक़ाबले के साथ-साथ संघर्ष को आगे कैसे ले जाना होगा, इसके बारे में कोई पार्टी नीति थी ही नहीं। यह ग़लती भीषण विनाशकारी सिद्ध हुई। इन केन्द्रीय बिन्दुओं के साथ ही रिपोर्ट में पार्टी के मज़दूर वर्ग के संघर्षों में भागीदारी न करने की भी आलोचना की गयी थी।

बीरभूम कमेटी के एक सदस्य भारतज्योति रॉयचौधुरी से प्राप्त जानकारी के अनुसार साठ छपे हुए पृष्ठों की यह रिपोर्ट 1972 के मार्च या अप्रैल महीने में प. बंगाल राज्य कमेटी को सौंपी गयी थी। इसे हुगली ज़िले के सोराफुल्ली स्थित ‘बंगाल प्रिण्टर्स’ से भारतज्योति के पिता प्रद्युत रॉयचौधुरी ने मुद्रित और प्रकाशित किया था जो ब्रिटिश राज के दौरान ‘बीरभूम षड्यन्त्र मुक़दमों’ के अभियुक्त रह चुके थे और अण्डमान के सेल्युलर जेल में काला पानी की सज़ा भी काट चुके थे। यह रिपोर्ट जब बंगाल कमेटी को सौंपी गयी, उससमय तक कमेटी पर छल-नियोजन और जोड़तोड़ के ज़रिये दीपक बिश्वास, दिलीप बनर्जी, महादेव मुखर्जी का अन्ध-चारुभक्त गुट क़ाबिज हो चुका था जो चारु को ‘क्रान्तिकारी प्राधिकार’ और ‘भारत का माओ’ मानता था और सफ़ाये की लाइन हर क़ीमत पर जारी रखना चाहता था।

 सुशीतल रॉयचौधुरी की मौत और सौरेन बोस की गिरफ़्तारी मार्च, 1971 में हो चुकी थी और अगस्त में सरोज दत्त की हत्‍या की जा चुकी थी। सरोज दत्त की शहादत के बाद दीपक बिश्वास और दिलीप बनर्जी को बंगाल राज्य कमेटी में सहयोजित कर लिया गया था और पार्टी के बंगला मुखपत्र ‘देशब्रती’ के सम्पादन की ज़िम्मेदारी जो पहले सरोज दत्त के पास थी, उसे सुनीति कुमार घोष को सौंप दिया गया था। दत्त की शहादत के तुरन्त बाद दीपक ने एक पत्र के साथ एक संक्षिप्त नोट सुनीति कुमार घोष को ‘देशब्रती’ में प्रकाशन के लिए भेजा जिसके बारे में उसका दावा था कि यह उत्तर बंगाल-बिहार क्षेत्रीय कमेटी के समक्ष दिये गये सरोज दत्त के भाषण का सार-संक्षेप था। सुनीति कुमार घोष ने कुछ अंशों को सम्पादित करके जो नोट अपनी पुस्तक में दिया है, वह इसप्रकार है : “हर पार्टी मार्क्सवाद-लेनिनवाद माओ त्से-तुङ विचारधारा को अपने देश की ठोस परिस्थितियों के आकलन के बाद लागू करती है। हमारा सम्बन्ध दूसरी (कम्युनिस्ट) पार्टियों के साथ हमेशा बिरादराना होगा। अपने देश में क्रान्ति को नेतृत्व देते हुए, अगर हमारे विचार अन्तरराष्ट्रीय नेतृत्व से भिन्न होंगे तो हमें अपने मूल्यांकन को लागू करना होगा। अध्यक्ष माओ हमारे अन्तरराष्ट्रीय नेता हैं; लेकिन चीनी पार्टी कभी भी अन्तरराष्ट्रीय प्राधिकार नहीं हो सकती। दूसरी (कम्युनिस्ट) पार्टियों के साथ इसके सम्बन्ध बिरादराना होंगे। अतः चीनी कम्युनिस्ट पार्टी और अध्यक्ष माओ एक नहीं हैं। जो लोग सिर्फ़ बाहर से सुनी गयी बातों पर निर्भर रहते हैं और आन्तरिक विकास को देखने से इनकार करते हैं, वे द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद को कभी नहीं समझ सकते। लेनिन ने बोल्शेविक पार्टी का निर्माण किया; माओ ने चीनी पार्टी का निर्माण किया। भारत के इतिहास ने इस देश में पार्टी-निर्माण के ऐतिहासिक कार्यभार को पूरा करने की ज़िम्मेदारी कामरेड चारु मजुमदार को सौंपी है। यही कारण है कि भारत की वर्तमान परिस्थितियों में का. चारु मजुमदार ही भाकपा (मा-ले) की केन्द्रीय कमेटी हैं। चारु मजुमदार की लाइन को स्थापित करने का मतलब है प्रतिक्रान्तिकारी संशोधनवादी लाइन को ध्वस्त करना।”

इस टिप्पणी की प्रामाणिकता के बारे में सुनीति कुमार घोष को भी कुछ सन्देह था, लेकिन यह सम्भव भी हो सकता है कि सरोज दत्त ने ऐसी टिप्पणी की हो क्योंकि वह स्वयं एक कठोर “वाम” दुस्साहसवादी और चारु-भक्त थे। निम्न-बुर्जुआ भावुकतावाद के चलते व्यक्ति-पूजा की प्रवृत्ति उनमें कूट-कूटकर भरी हुई थी। वे ऐसी बातें कर सकते थे, इसकी सम्भावना पिछली कुछ घटनाओं के आधार पर भी प्रकट की जा सकती है। पहले हम बता चुके हैं कि चीनी सुझाव मिलने के बाद चारु किस तरह से हिल और टूट गये थे, लेकिन सरोज दत्त और सौरेन बसु उन्हें पुरी से जब कलकत्ता लाये तो अपनी अतिवामपन्थी लाइन के इन उत्कट समर्थकों से बातचीत के बाद किस तरह उनका खोया हुआ आत्मविश्वास वापस लौट आया था। सम्भावना यह भी हो सकती है कि दीपक विश्वास ने कुछ नमक-मिर्च मिलाकर सरोज दत्त की बातों का सार-संक्षेप तैयार हो किया हो और इस बात की भी कि वह नोट पूरी तरह से उसकी जालसाज़ी हो! जो भी हो, इस नोट को ‘देशब्रती’ में छपने के लिए भेजा जाना ही बताता है कि उस समय तक अतिवामपन्थी लाइन के दुष्प्रभाव में किस तरह पार्टी में बोल्शेविक कार्य-संस्कृति का पतन हो चुका था और कमेटी-व्यवस्था का कोई मतलब ही नहीं रह गया था। चारु मजुमदार एक ओर तो स्वयं को प्राधिकार घोषित किये जाने की चिरवांछित आकांक्षा को साकार करने के लिए आतुर थे, दूसरी ओर लाइन को धीरे-धीरे बदलते हुए चीनी सुझाव के निकटतम अनुरूप बना देना चाहते थे। यह दोहरा उद्देश्य उनके निर्णयों और आचरण में बार-बार द्वन्द्व-दुविधा पैदा कर रहा था। दीपक का भेजा हुआ नोट जब सुनीति कुमार घोष को मिला, तब उस समय वह देवघर में चारु के साथ ही थे। उन्होंने वह नोट पढ़कर चारु मजुमदार को सुनाया तो उन्होंने भी शुरू में यही कहा कि इसे प्रकाशित करने की ज़रूरत नहीं है। दिसम्बर, 1971 में दिलीप बनर्जी, साधन सरकार और कुछ अन्य की उपस्थिति में, घोष के साथ हुई एक बैठक में दीपक विश्वास ने जब सरोज दत्त के भाषण के संक्षिप्त नोट को ‘देशब्रती’ में न छापने का मुद्दा उठाया तो घोष ने इसका कारण यह बताया कि उसमें चीनी पार्टी के बारे में कुछ आपत्तिजनक टिप्पणियाँ थीं। दीपक का कहना था कि उन अंशों को सम्पादित करके उस नोट को छापा जाना चाहिए। सुनीति कुमार घोष ने फिर चारु से मिलने पर कहा कि उस नोट को उसी सूरत में नहीं छापा जा सकता है, जब वह स्वयं उसे न छापने के लिए पत्र लिखें, क्योंकि राज्य कमेटी के अधिकांश लोग उसे छापने के पक्ष में हैं। शुरू में तो चारु मजुमदार इस आशय का पत्र लिखने को तैयार हो गये, लेकिन फिर आधे घण्टे बाद ही विचार बदल दिया और कहा कि उस नोट को छपने दीजिए। घोष के पूछने पर उन्होंने टिप्पणी का यह शीर्षक भी सुझाया : ‘क्रान्तिकारी नेतृत्व के बिना कोई क्रान्ति सम्भव नहीं!’ इसी शीर्षक से वह टिप्पणी ‘देशब्रती’ में प्रकाशित हुई। कुछ ही समय बाद जब घोष ने सभी पार्टी ज़िम्मेदारियाँ छोड़ दीं, तो यह टिप्पणी ‘क्रान्तिकारी प्राधिकार के बिना कोई कोई क्रान्ति सम्भव नहीं’ शीर्षक से पुनर्प्रकाशित हुई।

जनवरी,1972 में साधन सरकार भी गिरफ़्तार हो गये। इसके बाद राज्य कमेटी की मीटिंग बड़े ही सन्दिग्ध तरीक़े से बुलायी गयी, जैसे मीटिंग की सूचना सभी सदस्यों को बहुत देर से दी गयी और जगह की भी जानकारी समय से नहीं दी गयी। उस मीटिंग में दिलीप और महादेव मुखर्जी की मदद से छल-नियोजन करके दीपक ने बंगाल राज्य कमेटी के सेक्रेटरी के पद पर स्वयं का चुनाव करवा लिया। फ़रवरी,1972 में दिलीप और दीपक के अनुरोध पर सुनीति घोष जब उनसे मिले तो उन लोगों ने यह सवाल उठाया कि अपने लेखन में वह (यानी सुनीति घोष) ‘क्रान्तिकारी प्राधिकार’ शब्दों का इस्तेमाल क्यों नहीं करते हैं? सुनीति घोष ने जब पूछा कि ‘क्रान्तिकारी नेतृत्व’ और ‘क्रान्तिकारी प्राधिकार’ में क्या अन्तर होता है, तो दीपक और दिलीप का कहना था कि ‘क्रान्तिकारी प्राधिकार’ की बातों को बिना सवाल उठाये मानना होता है। इस पर घोष ने कहा कि कम्युनिस्टों को हमेशा अपने दिमाग़ का इस्तेमाल करना चाहिए और आँख मूँदकर मानने की जगह सावधानीपूर्वक सोचते हुए यह देखना चाहिए कि कोई भी बात ठोस यथार्थ से मेल खाती है या नहीं, तथा, उन्हें दासता की मनोवृत्ति को कभी प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए। दीपक और दिलीप ने जब यह कहा कि सरोज दा ‘क्रान्तिकारी प्राधिकार’ में विश्वास करते थे, तो सुनीति कुमार घोष ने कहा कि वह करते होंगे, तो भी उन लोगों को तर्कों से इसे सही सिद्ध करना होगा। इसपर दीपक और दिलीप ने ‘आदरणीय नेता’ (चारु) से मिलने की इच्छा ज़ाहिर की। सुनीति घोष ने उन्हें चारु के कटक स्थित तत्कालीन शेल्टर का पता दे दिया और तत्काल वे उनसे मिलने के लिए रवाना हो गये। चारु मजुमदार को इधर लगातार ख़बरें मिल ही रही थीं कि सुनीति कुमार घोष उनके ‘राजनीतिक प्राधिकार’ को नहीं मानते हैं और पार्टी लाइन से भी उनकी असहमतियाँ हैं। इसके मद्देनज़र उन्होंने एक टिप्पणी 9 मार्च,1972 को लिखवायी जो 22 अप्रैल-1 मई 1972 के ‘देशब्रती’ में प्रकाशित हुई। ‘देशब्रती’ अब दीपक और दिलीप के नियन्त्रण में था। टिप्पणी इस प्रकार थी :

जिनके साथ मतभेद उठ खड़े हों उनके साथ हम काम कर सकते हैं, लेकिन कोई समझौता हरगिज़ नहीं किया जा सकता … हम सिर्फ़ ‘लाल किताब’ (माओ त्से-तुङ के चुने हुए उद्धरण) के आधार पर उनके साथ बहस चला सकते हैं जिन्होंने बहुत सारी किताबें पढ़ रखी हैं।

बुर्जुआ व्यक्ति ‘क्यों और किसलिए’ का हवाला देते हुए बहुत चीख-पुकार मचाते हैं। उनका उद्देश्य सर्वहारा ‘प्राधिकार’ के बारे में सन्देह पैदा करना और स्वयं अपना प्राधिकार स्थापित करना होता है। लेकिन हम, कम्युनिस्ट, जब ‘क्यों और किसलिए’ का सवाल उठाते हैं तो ठीक इसके उलटा करते हैं। हम सर्वहारा प्राधिकार को सुदृढ़ बनाते हैं, पार्टी लाइन को जीवन्त ढंग से लागू करते हैं और बुर्जुआ प्राधिकार पर सवाल उठाते हैं …

पार्टी में बुर्जुआ प्रभाव मौजूद है और कुछ समय से बना हुआ है। उद्धरणों की बुर्जुआ ढंग से व्याख्या करने की शक्ल में यह प्रतिबिम्बित होता है। अध्यक्ष माओ ने कहा है कि ‘कुछ भी आँख मूँदकर नहीं किया जाना चाहिए।’ – लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर चीज़ पर सन्देह किया जाये। हमें पार्टी निर्देशों पर सवाल क्यों उठाना चाहिए? हमें ऐसा इसलिए करना चाहिए ताकि हम उत्कटता और महत्व को समझ सकें, उन्हें सबसे अच्छे तरीक़े से अमल में ला सकें…

ज़ाहिर है कि इस टिप्पणी में हमले का निशाना सुनीति कुमार घोष को बनाया गया था और उन्हें भी यह समझने में देर नहीं लगी। अगली बार 11 अप्रैल को चारु मजुमदार से जब सुनीति कुमार घोष मिले तो उन्होंने कहा कि नक्सलबाड़ी किसान संघर्ष के बाद पाँच वर्षों का समय बीत चुका है, अतः अपनी ग़लतियों को ठीक करने के लिए इन पाँच वर्षों के अनुभवों का समाहार किया जाना चाहिए और यह काम चारु ही कर सकते हैं। चारु ने तल्ख़ लहजे में कहा कि यह काम तो ख़ुद सुनीति घोष भी कर सकते हैं! चारु का स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण उस समय सुनीति घोष ने बात को आगे नहीं बढ़ाया और कहा कि वह अपने विचार लिखित रूप में दे देंगे। दो दिन बाद जब चारु के शेल्टर से वह चौदुआर के लिए रवाना होने वाले ही थे कि दीपक वहाँ चारु को देने के लिए बीरभूम कमेटी की दूसरी रिपोर्ट लेकर आये। रिपोर्ट सुनने के लिए सुनीति घोष वहाँ रुकना चाहते थे लेकिन चारु ने कहा कि वह अपना कार्यक्रम न बदलें। बाद में वह रिपोर्ट न तो सुनीति कुमार घोष को देखने को मिली, न ही अपने अन्तिम दिनों में मिलने वाले नेतृत्व के किसी साथी से चारु ने उसकी चर्चा ही की। सुनीति कुमार घोष ने वह रिपोर्ट अपने स्रोतों से प्राप्त कर ली। इसके बाद ‘सौम्य’ पार्टी नाम से चारु को लिखे एक पत्र में सुनीति कुमार घोष ने चारु से नक्सलबाड़ी से लेकर तबतक के समय के समाहार के साथ ही यह भी माँग रखी कि चीनी पार्टी के सुझावों की रोशनी में पार्टी लाइन पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए और उन सुझावों का गहराई से अध्ययन करने के लिए पार्टी के ज़िम्मेदार लोगों के बीच वितरित किया जाना चाहिए। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

 23 अप्रैल को सुनीति घोष नक्सलबाड़ी के बाद के वर्षों के कालखण्ड के अपने लिखित समाहार के साथ चारु से मिले और चारु के आग्रह पर उसे उनको पढ़कर सुनाया। वह दस्तावेज़ तो आज उपलब्ध नहीं है, लेकिन कुछ ही समय बाद अपने निष्कर्षों को उन्होंने एक निबन्ध के रूप में लिखा जो ‘प्रभात जाना’ छद्म नाम से ‘नक्सलबाड़ी एण्ड आफ़्टर : ऐन अप्रेज़ल’ शीर्षक से ‘फ़्रण्टियर’ साप्ताहिक के 12-19 मई 1973 के अंक में प्रकाशित हुआ। इस निबन्ध के मुख्य निष्कर्ष इस प्रकार थे :
(i) नक्सलबाड़ी संघर्ष की राजनीतिक लाइन सही थी, लेकिन संघर्ष के क्षेत्र के सीमित होने, उसके नेताओं की अनुभवहीनता और उसके कारण संघर्ष के क्षेत्र का विस्तार न कर पाने के फलस्वरूप, तथा सही सामरिक लाइन के अभाव में उसे आगे नहीं ले जाया जा सका; (ii) 1968 के बाद “वाम” अवसरवादी लाइन ने आन्दोलन में धीरे-धीरे घुसपैठ की जिसकी मुख्य अभिव्यक्ति यह थी कि अर्थवाद से संघर्ष करने के नाम पर पार्टी ने जनदिशा को ही छोड़ दिया, किसान संघों, ट्रेड यूनियनों, छात्र-युवा संगठनों सहित सभी जन संगठनों और और सभी जनान्दोलनों से स्वयं को अलग कर लिया;
(iii) षड्यन्त्रकारी ढंग से गठित छोटे-छोटे गुप्त दस्तों द्वारा गुप्त ढंग से वर्ग शत्रुओं के सफ़ाये को ही वर्ग-संघर्ष के समतुल्य बना दिया गया और इन्हें छापामार युद्ध का नाम दे दिया गया जबकि माओवादी उसूलों के अनुसार छापामार युद्ध जन-समुदाय पर निर्भर रहते हुए ही छेड़ा जाता है; (iv) वे ग्रुप जो सशस्त्र भूमि क्रान्ति में विश्वास रखते थे और माओ विचारधारा को मानते थे लेकिन सफ़ाये की लाइन का विरोध करते थे, उन्हें नितान्त अन्यायपूर्ण ढंग से साम्राज्यवाद और अन्तरराष्ट्रीय संशोधनवाद का एजेण्ट क़रार दे दिया गया जोकि अतिवामपन्थी संकीर्णतावाद की अभिव्यक्ति था; (v) मार्क्सवादी क्लासिक्स के अध्ययन तक को निरुत्साहित किया जाता था और मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओ विचारधारा को एक नेता के प्राधिकार के प्रति अप्रश्नेय अन्धभक्ति में तब्दील कर दिया गया।

मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि चारु की “वाम” अवसरवादी, “वाम” संकीर्णतावादी, “वाम” दुस्साहसवादी  लाइन की आलोचना के ये बिन्दु सही थे और समाहारमूलक थे। लेकिन प्रश्न फिर वही आ खड़ा होता है कि जब डी.वी.राव-नागी रेड्डी ग्रुप इससे भी अधिक सांगोपांग आलोचना रख रहा था, या मूलतः इसी अवस्थिति से अलग-अलग समयों में असित सेन, परिमल दासगुप्त, सुशीतल रॉयचौधुरी आदि चारु की लाइन पर सवाल उठा रहे थे, तब सुनीति घोष जोकि मार्क्सवादी क्लासिक्स का अधिक अध्ययन किये हुए थे, उनके दिमाग़ में ये सवाल क्यों नहीं आये और आख़‍िर कैसे वह चारु के सबसे निकटवर्ती लोगों में से एक बने रहे! आख़‍िर यह समझ एक बहुत छोटी सी अवधि में तभी क्यों प्रस्फुटित हुई जब चीनी सुझावों से वह परिचित हो चुके थे और आन्दोलन तेज़ी से विघटन और विनाश की ढलान पर लुढ़कने लगा था! अपने अन्तिम दिनों तक सुनीति घोष का यही मानना रहा कि ग़लती अकेले चारु मजुमदार की ही नहीं, उस पूरे नेतृत्व की सामूहिक तौर पर थी जो राजनीतिक समझ की दृष्टि से काफ़ी कमज़ोर था, जिसने सामूहिक नेतृत्व पर ज़ोर नहीं दिया और एक व्यक्ति की अन्धभक्ति का शिकार हो गया। यह बात एक हद तक सही है लेकिन फिर भी “वाम” दुस्साहसवादी लाइन के प्रवर्तक और नेता के तौर पर चारु की ग़लती ही सर्वोपरि मानी जानी चाहिए, जो ऐतिहासिक तौर पर विनाशकारी सिद्ध हुई। जिन्होंने किसी न किसी रूप में, अंशतः या सांगोपांग रूप में, चारु की लाइन को प्रश्नांकित किया, इतिहास उनकी भूमिका का अधिक सकारात्मक मूल्यांकन करेगा और उनमें भी वे सर्वोपरि होंगे जिन्होंने लहर के विरुद्ध खड़े होकर, अलगाव झेलते हुए, सवाल उठाये! पद-सोपान-क्रम में वे सबसे नीचे आयेंगे जिन्होंने चीनी सुझाव से परिचित होने के बाद सवाल उठाने शुरू किये और उनमें सुनीति कुमार घोष का भी नाम आता है। इस इतिहास-चर्चा में जब हम आगे के वर्षों पर आयेंगे तो हमें सुनीति कुमार घोष की पद्धतिशास्त्रीय ग़लती भी और स्पष्ट रूप में दीखेगी और यह स्पष्ट हो जायेगा कि समीक्षा-समाहार की उनकी पद्धति भी काफ़ी हद तक अनुभववादी, जड़सूत्रवादी और विखण्डित क़िस्म की थी। वह चर्चा हम यथास्थान करें, यही बेहतर होगा। यहाँ हम फिर मार्च-अप्रैल 1972 के दिनों की ओर वापस लौटते हैं!

अपना समीक्षा-समाहारमूलक नोट चारु को सुनाने के बाद सुनीति कुमार घोष ने उनसे अनुरोध किया कि ‘लिबरेशन’ के सम्पादन और चारु के गुप्त शेल्टर की व्यवस्था और प्रबन्धन की ज़िम्मेदारी से उन्हें मुक्त कर दिया जाये और बस ‘लिबरेशन’ से वह एक वर्कर की तरह जुड़े रहेंगे (हालाँकि केन्द्रीय कमेटी या पोलित ब्यूरो से हटने का प्रस्ताव उन्होंने नहीं रखा)। चारु चाहते थे कि कम से कम उनके शेल्टर का काम वही देखते रहें, क्योंकि ऐसे गुप्त ढाँचे सम्बन्धी कामों के वे निर्विवाद सबसे अधिक कुशल निर्वाहक माने जाते थे। लेकिन सुनीति घोष का कहना था कि इतने अविश्वास के माहौल में इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी उठाना न तो सम्भव होगा, न उचित! उन्होंने यह भी बताया कि दीपक और दिलीप यह ज़िम्मेदारी उठाने के लिए तैयार हैं! दरअसल, इसके पहले ही सुनीति घोष दीपक, दिलीप और महादेव के साथ दिसम्बर,1971 और मार्च 1972 में दो मीटिंगों में शेल्टर वाली ज़िम्मेदारी से ख़ुद को मुक्त करने का आग्रह कर चुके थे जिसे सुनकर वे तीनों चुप रहे थे, लेकिन कुछ ही दिनों बाद दिलीप ने उन्हें सूचित किया कि पुलिस पहले उन्हें (यानी घोष को) गिरफ़्तार करके चारु तक पहुँचने की योजना बना रही है। इसमें यह सन्देह निहित था कि पकड़े जाने पर सुनीति घोष चारु का पता बता देंगे। इसपर सुनीति घोष ने कहा कि वह यह ज़िम्मेदारी अगर छोड़ देंगे तो पुलिस उन्हें गिरफ़्तार करके भी चारु तक नहीं पहुँच पायेगी। दिलीप ने कहा कि वे लोग यह ज़िम्मेदारी उठाने के लिए तैयार हैं। बहरहाल, उनलोगों ने अप्रैल के अन्त तक सुनीति घोष द्वारा निर्मित व्यवस्था को यथावत चलने दिया।

सुनीति कुमार घोष ने चारु मजुमदार से 23 अप्रैल की अपनी अन्तिम मुलाक़ात में अनुरोध किया कि सरोज दत्त की जो कथित टिप्पणी और सुनीति कुमार घोष की परोक्ष आलोचना करने वाली चारु की जो टिप्पणी ‘देशब्रती’ में छप चुकी थीं, उन्हें पार्टी के केन्द्रीय मुखपत्र ‘लिबरेशन’ में भी प्रकाशित कर दिया जाना चाहिए, लेकिन चारु मजुमदार ने अनावश्यक बताते हुए इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। फिर सुनीति घोष अपने समाहार-विषयक दस्तावेज़ को चारु को सौंपकर जब चलने को हुए तो चारु ने पार्टी में उठ खड़ी हुई समस्याओं को हल करने के लिए उनसे एक मीटिंग बुलाने के लिए कहा। सुनीति घोष ने कहा कि बतौर जनरल सेक्रेटरी, ऐसी मीटिंग चारु ही बुला सकते हैं। यह उन दोनों की अन्तिम मुलाक़ात थी।

कलकत्ता लौटते ही 25 अप्रैल की सुबह सुनीति कुमार घोष को यह भयंकर ख़बर मिली कि कुछ पार्टी सदस्यों और हमदर्दों ने दक्षिण कलकत्ता अंचल कमेटी के सेक्रेटरी कमल सान्याल और बालीगंज-तिलजला क्षेत्र कमेटी के सेक्रेटरी अग्नि रॉय को बातचीत के लिए बुलाकर उनकी हत्या कर दी। हत्या के बाद बाँटे गये पर्चे में उन्हें पुलिस का एजेण्ट बताया गया था। पर्चे में यह भी कहा गया था कि भविष्य में ऐसी कुछ और हत्याएँ की जायेंगी। ये दोनों पार्टी के विश्वसनीय और क़तारों में लोकप्रिय संगठनकर्ता थे और अतीत में कई महत्वपूर्ण पार्टी ज़िम्मेदारियों का निर्वहन कर चुके थे। उनका गुनाह सिर्फ़ यह था कि वे सफ़ाये की लाइन और ‘क्रान्तिकारी प्राधिकार’ पर हाल के दिनों में सवाल उठाने लगे थे। ज़ाहिर है कि “वामपन्थी” दुस्साहसवादी लाइन अब उन विनाशकारी और विकृत तार्किक परिणतियों तक जा पहुँची थी कि कामरेडों के हाथ कामरेडों के ख़ून से रंगने लगे थे। उपरोक्त पर्चे के जवाब में दक्षिण कलकत्ता अंचल कमेटी के एक सदस्य सतीश बनर्जी और कुछ अन्य ने भी एक पर्चा निकाला था जिसमें हत्‍या के लिए ज़िम्मेदार लोगों को पुलिस एजेण्ट क़रार दिया गया था। इन नृशंस हत्याओं के लिए दीपक और दिलीप को ही ज़िम्मेदार मानने के पर्याप्त कारण मौजूद थे जो चारु की लाइन पर सवाल तक उठाने वाले को पार्टी-विरोधी और स्टेट एजेण्ट तक क़रार देने लगे थे और इस तरह की बातें करते थे कि चारु बाबू की लाइन की विरोधी लाइनों के विरुद्ध संघर्ष हथियारों के ज़रिये चलाया जायेगा। इस घटना की सूचना मिलते ही सुनीति घोष ने चारु मजुमदार को लिखा कि उनके ‘राजनीतिक प्राधिकार’ होने-न होने का सवाल एक राजनीतिक सवाल है जो इस तरीक़े से हल नहीं किया जा सकता। इन हत्याओं के लिए ज़िम्मेदार लोग पार्टी को विनाश की ओर ले जा रहे हैं और ऐसी हालत में चारु मजुमदार को तत्क्षण हस्तक्षेप करके पार्टी को बचाने की कोशिश करनी चाहिए और इस आपराधिक कृत्य के लिए ज़िम्मेदार लोगों की सार्वजनिक भर्त्सना करनी चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने फिर इस माँग को उठाया कि चीनी पार्टी से सौरेन बोस के ज़रिये प्राप्त सुझावों को यथाशीघ्र पार्टी के ज़िम्मेदार कामरेडों के बीच सर्कुलेट किया जाना चाहिए और पार्टी लाइन की समीक्षा की जानी चाहिए।

इसी दौरान की एक और घटना की चर्चा भी यहाँ कर देनी चाहिए। उपरोक्त घटनाओं के बीच ही बिहार के दो कामरेड सुनीति कुमार घोष से मिले। उनमें से एक जौहर थे जिन्होंने आगे चलकर भोजपुर में “वाम” दुस्साहसवादी लाइन पर संघर्ष खड़ा करने में नेतृत्वकारी भूमिका निभायी, भाकपा (मा-ले),लिबरेशन के पहले सेक्रेटरी रहे और शहीद हुए। यह चर्चा आगे आयेगी। सत्यनारायण सिंह के अलग होने के बाद बिहार में नारायण सान्याल (जो जल्दी ही गिरफ़्तार हो गये थे) के नेतृत्व में पार्टी को पुनस्संगठित करने की ज़िम्मेदारी जिस लीडिंग टीम को दी गयी थी, उसके जौहर भी एक सदस्य थे। इस टीम के मार्गदर्शन और नेतृत्व की ज़िम्मेदारी केन्द्रीय कमेटी में सुनीति घोष की थी। घोष ने इन कामरेडों को बताया कि पार्टी द्वारा दी गयी सभी सांगठनिक ज़िम्मेदारियों को फ़िलहाल उन्होंने छोड़ दिया है। दीपक और दिलीप की मनमानी और स्वेच्छाचारी कार्यशैली को लेकर बिहार के कामरेड सशंकित थे और वे चाहते थे कि यह ज़िम्मेदारी सुनीति घोष ही उठायें, लेकिन उन्होंने उनके इस आग्रह को स्वीकार नहीं किया।

सुनीति घोष को 27 मई को दिलीप का एक पत्र मिला जिसमें उसने लिखा था कि चारु उनसे मिलना चाहते हैं, लेकिन साथ ही उसने यह भी लिखा था कि घोष उसके पहले उनसे, यानी दीपक और दिलीप से एक मुलाक़ात करें। उसने यह भी लिखा कि चारु ने उन दोनों की कठोर आलोचना की है। सुनीति घोष ने उत्तर दिया कि उनकी मुलाक़ात इस बात पर निर्भर है कि उनके (यानी सुनीति घोष के) कुछ सवालों के उत्तर मिलते हैं कि नहीं! उनका पहला सवाल यही था कि क्या वे कमल और अग्नि की हत्‍या की ज़िम्मेदारी स्वीकार करते हैं और अपनी आत्मालोचना के लिए तैयार हैं? साथ ही उन्होंने चारु को पुनः एक पत्र लिखकर अपनी माँगें दुहरायीं। जून के उत्तरार्द्ध में सुनीति घोष को दीपक और दिलीप की आत्मालोचना की हस्तलिखित प्रति प्राप्त हुई जो बेहद औपचारिक थी। मूल मुद्दे से उनके इस तरह क़तराकर निकल जाने और गोलमाल आत्मालोचना करने पर सुनीति घोष ने फिर आपत्ति ज़ाहिर करते हुए उन्हें पत्र लिखा और उत्तर की प्रतीक्षा करने लगे। इसी बीच अचानक उन्हें यह सूचना मिली कि 16 जुलाई, 1972 को कलकत्ता के एक शेल्टर से चारु मजुमदार को पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया। दीपक-दिलीप आदि के गुट ने चारु के शेल्टर की ज़िम्मेदारी का काम व्यवहारतः मई के पहले सप्ताह में अपने हाथ में लिया और उसके ढाई माह बाद ही चारु गिरफ़्तार हो गये। दीपक का भेजा हुआ एक कूरियर पुलिस के हत्थे चढ़ गया जिसने भयानक यातना देने के बाद उस शेल्टर का पता बता दिया जहाँ दीपक आदि मौजूद थे। उसका यही अनुमान था कि इतना समय बीत जाने के बाद दीपक आदि उस शेल्टर से निकल चुके होंगे, लेकिन पुलिस ने जब छापा मारा तो दीपक वहीं सोते हुए पकड़े गये। फिर क्रान्तिकारी बड़बोलेपन में माहिर यह चारु-पूजक बिना किसी प्रकार की पुलिस-यन्त्रणा के ही आतंकित होकर टूट गया और चारु के शेल्टर का पता बता दिया। दमा और दिल के गम्भीर बीमार चारु मजुमदार से लाल बाज़ार के सेण्ट्रल लॉकअप में बारह दिनों तक लगातार पूछताछ की गयी। इसबीच कोई चिकित्सा-सुविधा तो दूर, उनके द्वारा नियमित ली जाने वाली दवाइयाँ और पैथेड्रिन के इंजेक्शन तक उन्हें उपलब्ध नहीं कराये गये। 12 दिनों बाद, 28 जुलाई 1972 को चारु मजुमदार ने अपनी अन्तिम साँस ली। पुलिस ने बाद में चारु मजुमदार का एक असामान्य रूप से लम्बा बयान जारी किया गया। इस बयान पर हस्ताक्षर करने से चारु ने मना कर दिया था। क्रान्तिकारी वाम आन्दोलन के भीतर अधिकांश ज़िम्मेदार पुराने साथियों का यही मानना है कि उक्त स्टेटमेण्ट का बड़ा हिस्सा पुलिस अधिकारियों का गढ़ा हुआ है।

अपने अन्तिम दिनों मेंवामपन्थीदुस्साहसवादी लाइन को धीरेधीरे, क़दमक़दम बदलने और चीनी सुझावों के अनुरूप बनाने की चारु मजुमदार की कोशिशें

गिरफ़्तारी से कुछ ही दिनों पहले, 13 जुलाई 1972 को चारु की मुलाक़ात बिहार के कुछ नेतृत्वकारी कामरेडों से हुई थी। मीटिंग का लक्ष्य बिहार राज्य कमेटी के पुनर्गठन की कोशिशों को आगे बढ़ाना था, जो उस समय बस नाममात्र को ही अस्तित्व में थी। उनमें से एक व्यक्ति सूरज (स्वाधीन रॉय) थे। सूरज मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि के उन कामरेडों में से एक थे जो जौहर के भी पहले बिहार में सशस्त्र संघर्ष को नेतृत्व देने के लिए भेजे गये थे। बाद में उन्होंने पुलिस के सामने समर्पण कर दिया था। 1975-76 में कभी उन्हें कुछ महीनों के लिए जब प्रेसीडेंसी जेल स्थानान्तरित किया गया था तो साथ के राजनीतिक व्यक्तियों को उन्होंने चारु से अपनी इस मुलाक़ात और बातचीत के बारे में बताया था। सूरज से पटना ज़िले के पुनपुन इलाक़े के दलितों के जनान्दोलन के बारे में रिपोर्ट मिलने पर चारु ने उन्हें उस इलाक़े पर केन्द्रित करने और उसे भविष्य के संघर्ष का केन्द्र-बिन्दु बनाने का सुझाव दिया था। इस बातचीत के नोट्स भी चारु मजुमदार की संग्रहीत रचनाओं में मौजूद हैं। उल्लेखनीय है कि इस वार्ता में चारु ने छापामार दस्तों और वर्ग-शत्रुओं के सफ़ाये का कोई उल्लेख तक नहीं किया। इसमें उन्होंने ग़रीब किसानों की क्रान्तिकारी कमेटियाँ बनाने, इस काम में निम्न-बुर्जुआ कामरेडों द्वारा पहलक़दमी लेने तथा मध्यम किसानों को क्रान्तिकारी वर्ग बताते हुए ग़रीब किसानों और उनके बीच एकता मज़बूत करने की बात की। साथ ही उन्होंने आसनसोल से मध्यप्रदेश तक फैले विशाल कोलियरी इलाक़े़ के मज़दूरों के बीच काम फैलाने की सम्भावनाओं पर भी विचार करने के लिए कहा।

इससे पहले ही उनकी मुलाक़ात पंजाब के केन्द्रीय कमेटी सदस्य शर्माजी (जगजीत सिंह सोहल) के साथ हो चुकी थी। उस समय तक चीनी सुझावों के बारे में जानने वाले सरोज दत्त की हत्या हो चुकी थी और सौरेन बसु गिरफ़्तार हो चुके थे। सौरेन बसु द्वारा यहाँ-वहाँ चीनी सुझावों के बारे में इशारा छोड़ते जाने की चर्चा हम पहले कर चुके हैं। चीनी सुझावों की जानकारी रखने वाले तीसरे व्यक्ति सुनीति कुमार घोष के साथ भी मतभेदों की शुरुआत हो चुकी थी। चारु के सामने अब यह स्पष्ट हो चुका था कि चीनी सुझावों को पार्टी में बहुत दिनों तक दबाये रख पाना सम्भव नहीं होगा। इन हालात में शर्माजी से भी चारु ने केन्द्रीय कमेटी के बाहर बचे हुए सदस्यों की मीटिंग बुलाने और नयी परिस्थितियों एवं चीनी सुझावों पर विचार-विमर्श की इच्छा ज़ाहिर की थी, हालाँकि इस बारे में कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया। चारु की तीसरी ऐसी मुलाक़ात गिरफ़्तारी से ठीक पहले आन्ध्र प्रदेश स्टेट कमेटी के सेक्रेटरी के.जी. सत्यमूर्ति और एक अन्य सदस्य रऊफ़ के साथ जून या जुलाई के महीने में हुई थी। रऊफ़ के अनुसार, इस बैठक में भविष्य में केन्द्रीय कमेटी के पुनर्गठन के सिलसिले में भी बातचीत हुई थी। चारु मजुमदार उस दिन ‘आत्मालोचना’ के मूड में थे। उन्होंने दोनों मुलाक़ाती कामरेडों से भाकपा (मा-ले) की नीतियों के बारे में चीनी पार्टी की आलोचना और सुझावों के बारे में बातचीत की और कहा कि चूँकि चीनी पार्टी ‘चीन के चेयरमैन हमारे चेयरमैन’ नारे को मान्यता नहीं देती, इसलिए वह इस नारे को वापस लेना चाहते हैं। सफ़ाये के सवाल को छोड़कर चीनी पार्टी के सभी सुझावों से चारु ने आम तौर पर सहमति ज़ाहिर की। सफ़ाये के सवाल पर उनका कहना था कि उनका तात्पर्य कभी भी व्यक्तिगत सफ़ाये से नहीं था और इस बिन्दु पर चीनी पार्टी के साथ ग़लतफ़हमी हुई है। हालाँकि इस प्रश्न पर अगर चारु के लेखन को देखा जाये तो उनकी यह सफ़ाई सत्य से सर्वथा परे लगती है। रऊफ़ ने ये बातें 1977 में प्रेसीडेंसी जेल में अपने साथ के राजनीतिक बन्दियों को बतायी थीं। इसी दौर में भवानी रॉय चौधुरी की भी चारु से मुलाक़ात हुई थी। यह चारु से उनकी पहली और आख़िरी मुलाक़ात थी। भवानी रॉयचौधुरी बाद के वर्षों में गठित होने वाली भाकपा (मा-ले) पार्टी यूनिटी के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। रॉयचौधुरी ने प्रेसीडेंसी जेल में साथ के राजनीतिक बन्दियों को बताया कि जब उन्होंने चारु से ‘चीन का चेयरमैन हमारा चेयरमैन’ नारा वापस लेने के कारणों के बारे में एक वक्तव्य जारी करने का अनुरोध किया तो उन्होंने कहा कि हम किसी अन्तरराष्ट्रीय विज्ञप्ति को उद्धृत नहीं कर सकते। प्रेसीडेंसी जेल में ही बन्द गौतम बनर्जी ने भी, जो सरोज दत्त और चारु के बीच सन्देशवाहक का काम करते थे, साथ के राजनीतिक बन्दियों को चारु द्वारा उपरोक्त नारा वापस लेने के निर्णय बारे में बताया था।

अन्तिम दिनों की इन मीटिंगों और वार्ताओं से स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि चीनी पार्टी से प्राप्त जिन आलोचनाओं और सुझावों को लगभग डेढ़ वर्षों तक चारु ने दबाये रखा था, उनकी रोशनी में वह धीरे-धीरे अपनी “वाम” दुस्साहसवादी लाइन को बदलने की कोशिश कर रहे थे, ताकि जब इन सुझावों को नेतृत्व और क़तारों के किसी संस्तर तक सर्कुलेट किया जाये तो आलोचना के बिन्दु बहुत कम और हलके हो जायें और उनके पास यह कहने का अवसर रहे कि कुछ ग़लतियाँ हुईं जिन्हें समय रहते ठीक कर लिया गया। इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण चारु के अन्तिम दौर के लेखन से मिलता है जिसमें अतीत का बिना कोई समीक्षा-समाहार किये वह धीरे-धीरे लाइन को बदलने की और “वाम” दुस्साहसवाद के बेहद भोंड़े संस्करण के प्रेत से पीछा छुडाने की कोशिश करते दिखायी देते हैं। मागुरजान की घटना के बाद सुनीति घोष की देखरेख वाले पुरी शेल्टर से कलकत्ता रवाना होते समय चारु ने उन्हें एक नोट ‘लिबरेशन’ में प्रकाशन के लिए दिया था जिसमें प. बंगाल में जन मुक्ति सेना के गठन की घोषणा की गयी थी और पूरे राज्य में बिखरे ‘एक्शन स्क्वाडों’ को उनका ‘कण्टिन्जेण्ट’ बताया गया था। इस नोट में सफ़ाये की कोई चर्चा नहीं की गयी थी। इस घटना की चर्चा हम पहले कर चुके हैं। यहाँ से एक क़दम और आगे बढ़ाते हुए ‘लिबरेशन’ (जनवरी-मार्च, 1971) में ‘बिल्ड अप द पीपल्स लिबरेशन आर्मी एण्ड मार्च फ़ॉरवर्ड’ में चारु मजुमदार लिखते हैं : “अतः शत्रु के सशस्त्र बलों पर हमले अवश्य किये जाने चाहिए। सिर्फ़ वर्ग-शत्रुओं पर हमले करना भी अब एक क़िस्म का अर्थवाद ही होगा। वर्ग-शत्रुओं पर हमलों के साथ-साथ अगर हम शत्रु के सशस्त्र बलों पर हमले नहीं करेंगे तो एक ख़ास क़िस्म के अर्थवाद के दलदल में जा गिरेंगे।” ज़ाहिर है कि वर्ग-संघर्ष की स्थिति और पार्टी की तैयारी को देखते हुए, चारु मजुमदार जो कह रहे थे वह भी विशुद्ध सैन्यवादी “वाम” दुस्साहसवाद ही था। जन-संघर्षों, जन-आन्दोलनों, आर्थिक संघर्षों या जन-संगठनों की वह अभी भी कोई बात नहीं कर रहे थे, लेकिन उनका तात्कालिक उद्देश्य उस समय सफ़ाये की लाइन से पीछा छुड़ाना था। इसके बाद के उनके ‘वन इयर सिन्स द पार्टी कांग्रेस’, ‘टु द कॉमरेड्स ऑफ़ पंजाब’ जैसे लेखनों और वक्तव्यों में शायद ही कहीं संघर्ष के एक फ़ॉर्म के तौर पर वर्ग-शत्रु के सफ़ाये की चर्चा देखने को मिलती है। गिरफ़्तारी से दो दिन पहले पत्नी के नाम अपने एक पत्र में उन्होंने लिखा था : “साम्राज्यवादियों के विरुद्ध संघर्ष हम बहुत कम ही चलाते रहे हैं क्योंकि सफ़ाये को बहुत अधिक महत्व दिया जाता रहा है। यह एक भटकाव है और इससे हम उबर रहे हैं।”

लाइन को धीरे-धीरे बदलने की प्रक्रिया को ही आगे बढ़ाते हुए चारु ने अपनी टिप्पणी ‘ए नोट ऑन पार्टीज़ वर्क इन रूरल एरियाज़’ में लिखा, “फसल-ज़ब्ती का आन्दोलन एक जनान्दोलन है। सशस्त्र संघर्ष शुरू करने के बाद पहली बार हम एक जनान्दोलन को नेतृत्व दे रहे हैं। जनान्दोलन चलाये बिना हम अपने लक्ष्य को — प्रत्येक किसान को एक योद्धा बना देने के लक्ष्य को क़तई नहीं हासिल कर पायेंगे।” स्मरणीय है कि यह चारु ही थे जिन्होंने दिसम्बर, 1969 के ‘लिबरेशन’ में प्रकाशित अपने लेख में लिखा था : “क्रान्तिकारी किसानों ने अपने संघर्ष के द्वारा यह दिखला दिया है कि जनान्दोलन या जन-संगठन छापामार संघर्ष छेड़ने के लिए कदापि अपरिहार्य नहीं हैं। जन-संगठन और जनान्दोलन खुले और अर्थवादी रुझान को बढ़ावा देते हैं और क्रान्तिकारी कार्यकर्ताओं को दुश्मन के सामने ‘एक्सपोज़’ कर देते हैं। अतः, खुले जनान्दोलन और जन-संगठन छापामार युद्ध के विकास और विस्तार की राह में बाधा होते हैं।” ज़ाहिर है कि अतीत का बिना समाहार किये, चुपचाप अपनी लाइन बदलकर चारु अब एकदम उल्टी बात करने लगे थे। लेकिन सबसे नाटकीय पैंतरा-पलट उस लेख में दिखाई देता है जो चारु ने अपनी गिरफ़्तारी से पाँच सप्ताह पहले लिखा था। ‘इट इज़ द पीपल्स इण्टरेस्ट दैट इज़ द पार्टीज़ इण्टरेस्ट’ में चारू इस बात को स्वीकार करते हैं कि आन्दोलन को एक धक्का लगा है। वह कहते हैं कि हमारी पार्टी के नेतृत्व में संघर्ष जिस तरह आगे बढ़ रहा है, उस तरह से हिसाब लगाने पर ’75 तो क्या 2001 में भी हमारा देश मुक्त नहीं होगा। इस लेख में चारु ने मज़दूरों-किसानों की व्यापक आबादी के बीच पार्टी-निर्माण की ज़रूरत पर बल दिया और लिखा कि संघर्ष को केवल तभी उन्नत धरातल पर ले जाया जा सकता है। उनके अनुसार, अमेरिकी साम्राज्यवाद और सोवियत सामाजिक साम्राज्यवाद बुरी तरह संकटग्रस्त हैं और इस कारण से वे तीसरा विश्वयुद्ध छेड़ सकते हैं। ऐसी स्थिति में व्यापक जन-असन्तोष देशव्यापी उभार को जन्म दे सकता है। ऐसी स्थिति में अगर कुछ इलाक़ों में भी क्रान्तिकारी भूमि-सुधार हुए रहेंगे तो वे स्वतः दूसरे इलाक़ों में भी फैल जायेंगे। सिर्फ़ इतना ही नहीं, चारु कांग्रेस के दमनकारी शासन के विरुद्ध एक ऐसे व्यापक संयुक्त मोर्चे की भी बात करते हैं जिसमें ‘वामपन्थी’ दलों के साथ उन्हें भी साथ लिया जा सकता है जो कल तक कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन के शत्रु थे। ज़ाहिर है कि “वाम” दुस्साहसवाद के प्रेत से पीछा छुडाने की हड़बड़ी में चारु मजुमदार इस मुक़ाम तक पहुँचकर पुरानी विनाशकारी ग़लतियों पर लीपापोती करते हुए अन्तरविरोधों के जंगल में उलझ-से गये थे। गुप्त दस्तों की जगह अब वह व्यापक जन-समुदाय के बीच पार्टी-निर्माण की बात करते दीखते हैं, सफ़ाये और कथित छापामार संघर्ष के ज़रिये भूमि-क्रान्ति को आगे बढ़ाने की जगह ऐसी स्वतःस्फूर्तता पर भरोसा करते दीखते हैं जो देशव्यापी जन-उभार को जन्म देगी और कहते हैं कि उस स्थिति का लाभ तभी मिल सकेगा जब कुछ इलाक़ों में पार्टी क्रान्तिकारी भूमि-सुधार को लागू करने में सफल हो चुकी हो। यानी, अब भूमि-क्रान्ति के सन्दर्भ में वह एक जनदिशा के अमल की ओर इंगित कर रहे हैं। हालाँकि यह जनदिशा किस रूप में लागू होगी, इसकी वह कोई चर्चा नहीं करते। लेकिन बात यहीं नहीं रुकती। चारु एक ऐसे व्यापक संयुक्त मोर्चे की बात करते हैं, जिसके स्वरूप और नीति के बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं होता और जिसकी एक संशोधनवादी व्याख्या भी आसानी से की जा सकती है! ऐसी ही व्याख्या को विस्तार देते हुए और उसकी आड़ लेते हुए, तथा चारु की विरासत का परचम थामे हुए विनोद मिश्र और दीपंकर भट्टाचार्य के नेतृत्व-काल में भाकपा (मा-ले) लिबरेशन अगर निकृष्टतम-घृणिततम संसदीय वामपन्थ के मल-कुण्ड में धँसती चली गयी तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं।

चारु मजुमदार के निधन के साथ ही भारत के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन के एक महत्वपूर्ण अध्याय का समापन हो गया। चारु के बारे में कुछ मूल्यांकनपरक टिप्पणियाँ हमने इस निबन्ध के पूर्ववर्ती हिस्सों में भी की है और उनके “वामपन्थी” अवसरवादी लाइन की अन्तर्वस्तु, अभिलाक्षिकताओं, विकास-प्रक्रिया और ग़ैर-जनवादी, नौकरशाहाना सांगठनिक कार्य-पद्धति की चर्चा भी यथास्थान होती रही है। अब हम यहाँ क्रान्तिकारी आन्दोलन में उनकी भूमिका का एक सामग्रिक समाहार प्रस्तुत करेंगे।

चारु मजुमदार : अन्तिम निष्कर्ष के तौर पर एक मूल्यांकन

एक कम्युनिस्ट संगठनकर्ता के रूप में चारु मजुमदार ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1930 के दशक में की थी। किसानों के अधियार आन्दोलन और तेभागा किसान संघर्ष में भागीदारी के साथ ही उन्होंने रेल मज़दूरों और दुआर के चाय बागान मज़दूरों में भी एक संगठनकर्ता के रूप में काम किया था। तेभागा किसान संघर्ष का इलाक़ाई नेतृत्व जब सत्ता के बर्बर दमन का मुक़ाबला करने के लिए किसानों की सशस्त्र प्रतिरक्षा संगठित करने के बारे में विचार कर रहा था तभी तत्कालीन बंगाल की मुस्लिम लीग सरकार के कोरे आश्वासनों पर भरोसा करके प्रादेशिक नेतृत्व ने आन्दोलन वापस ले लिया था। इस फै़सले की तीखी आलोचना करने वालों में चारु भी एक थे। रणदिवे की “वामपन्थी” अवसरवादी लाइन के विरुद्ध जब पार्टी की आन्ध्र कमेटी दो लाइनों का संघर्ष चला रही थी, तब चारु ने ‘आन्ध्र थीसिस’ का पक्ष लिया था और जेल में उन्हें माओ और चीन की पार्टी के समर्थक के रूप में जाना जाता था।

यूँ तो भारत की कम्युनिस्ट पार्टी 1951 में ही संशोधनवाद की राह पर आगे क़दम बढ़ा चुकी थी, लेकिन 1956 में पालघाट की पार्टी कांग्रेस में डाँगे गिरोह के नेतृत्व वाला धड़ा नेहरू की “प्रगतिशील सरकार” का सहयोग करने और सरकार में शामिल होने की खुलकर पैरवी करने लगा था। चारु तब इस धड़े के विरोधियों के साथ थे। 1956 में अमृतसर में हुई पार्टी की पाँचवी (विशेष) कांग्रेस में पार्टी ने ख्रुश्चेवी संशोधनवाद की लाइन को स्वीकार कर लिया, लेकिन पार्टी के भीतर ऊपर से नीचे तक ‘संयुक्त जनवादी मोर्चा’ (यू.डी.एफ.) और राष्ट्रीय जनवादी मोर्चा (एन.डी.एफ.) की दो विरोधी लाइनों के आधार पर बँटवारा हो गया था। पहली लाइन मज़दूर-किसान एकता के आधार पर साम्राज्यवाद-सामन्तवाद विरोधी संघर्ष को आगे बढ़ाने की बात कर रही थी, जबकि दूसरी लाइन “प्रगतिशील” बुर्जुआ वर्ग के साथ संयुक्त मोर्चा बनाकर समाजवाद में शान्तिपूर्ण संक्रमण की बात कर रही थी। हालाँकि पहली लाइन भी अपने रैडिकल तेवर के बावजूद सारवस्तु की दृष्टि से संशोधनवादी ही थी लेकिन क्रान्तिकारी स्पिरिट वाली पार्टी क़तारें उसे ही क्रान्तिकारी समझकर उसके साथ थीं। चारु भी उन्हीं में से एक थे। जुलाई 1959 में नेहरू ने केरल की नम्बूदिरिपाद सरकार को जब बरख़ास्त किया तो उस समय देश के विभिन्न हिस्सों सहित पूरे बंगाल में इसके विरुद्ध व्यापक आन्दोलन उठ खड़ा हुआ था। चारु के नेतृत्व वाली सिलीगुड़ी कमेटी इसमें विशेष सक्रिय थी। सिलीगुड़ी के तराई अंचल में उस समय किसान आन्दोलन तीव्र हो उठा, लेकिन राज्य सरकार के थोथे आश्वासन के बाद प्रादेशिक नेतृत्व ने जब आन्दोलन को वापस ले लिया तो इससे चारु और कानू सहित तराई के सभी संगठनकर्ताओं में विक्षोभ की लहर फैल गयी। पार्टी के संशोधनवादी विपथगमन के चलते चारु इसके बाद निराशा की मानसिकता में थे। 1961 में जब पार्टी की छठी कांग्रेस विजयवाड़ा में हुई तो चारु उसे निरर्थक मानकर उसमें शामिल भी नहीं हुए। 1962 के भारत-चीन युद्ध के समय पूरे देश में जब चीन-विरोधी अन्धराष्ट्रवाद की आँधी चल रही थी तो चारु के नेतृत्व में सिलीगुड़ी की पार्टी क़तारें धारा के विरुद्ध खड़ी होकर उसके विरुद्ध संघर्ष कर रही थीं, जिसकी चर्चा हम पहले कर चुके हैं। भाकपा का विभाजन तो वास्तव में 1962 में भारत-चीन युद्ध के समय ही हो चुका था, जब डाँगे की निशानदेही के आधार पर विरोधी धड़े के अधिकांश नेता और कार्यकर्ता गिरफ़्तार करके जेलों में ठूँसे जा चुके थे। चारु भी उस समय गिरफ़्तार थे। उस समय जेल में बन्द नेताओं में ज्योति बसु, नम्बूदिरिपाद आदि नेता जब संशोधनवाद के विरुद्ध नरम रुख़ अपनाते थे तो चारु और सरोज दत्त इसके विरोध में होते थे।

1964 में माकपा की स्थापना हुई और उसी वर्ष भारत की कम्युनिस्ट क़तारों तक ‘महान बहस’ के दस्तावेज़ पहुँचे। इन ऐतिहासिक दस्तावेज़ों से भारतीय कम्युनिस्ट क़तारों को न केवल ख्रुश्चेवी संशोधनवाद, बल्कि भाकपा के संशोधनवाद और माकपा के नव-संशोधनवाद की सैद्धान्तिक समझ बनाने में भी विशेष मदद मिली। नयी पार्टी के कार्यक्रम के दो मसविदों में से एक सुन्दरय्या, वासवपुनय्या, प्रमोद दासगुप्त और हरेकृष्ण कोनार का था, जिसमें सोवियत संशोधनवाद की आलोचना करते हुए चीनी पार्टी की अवस्थिति का समर्थन किया गया था, जबकि नम्बूदिरिपाद, हरकिशन सिंह सुरजीत और ज्योति बसु द्वारा प्रस्तुत मसविदे में बीच-बीच की अवस्थिति अपनायी गयी थी। चारु और सिलीगुड़ी कमेटी ने पहले मसविदे का पक्ष लिया लेकिन इस नयी पार्टी के बारे में चारु के शुरू से ही काफ़ी रिज़र्वेशन्स थे। फिर भी उन्हें उम्मीद थी कि इस पार्टी के भीतर विचारधारात्मक संघर्ष चलाकर इसका क्रान्तिकारीकरण किया जा सकता है। इन उम्मीदों के टूटते अधिक देर न लगी। इसमें कोई सन्देह नहीं कि माकपा के नव-संशोधनवाद से निर्णायक विच्छेद करने में चारु के आठ दस्तावेज़ों की महत्वपूर्ण भूमिका थी, लेकिन यह श्रेय अकेले चारु को नहीं दिया जा सकता। चिन्ता/दक्षिणदेश ग्रुप के नेता कन्हाई चटर्जी, अमूल्य सेन और चन्द्रशेखर दास ने भी माकपा के संशोधनवाद के विरुद्ध संघर्ष का बिगुल ठीक उसी समय फूँका था। मुख्य बात यह है कि इन सभी को संशोधनवाद की सुसंगत समझ बनाने में ‘महान बहस’ के चीनी पार्टी के दस्तावेज़ों से ही मुख्यतः दिशा मिली थी। 1965 में चीन में पार्टी के भीतर पूँजीवादी पथगामियों के विरुद्ध दो लाइनों का संघर्ष तीखा हो गया था और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति की पूर्वपीठिका के तौर पर महान समाजवादी शिक्षा आन्दोलन की शुरुआत हो चुकी थी। 1966 में चीन में सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति की शुरुआत हुई। इन ऐतिहासिक क्रान्तियों के दस्तावेज़ों ने संशोधनवाद की समझ बनाने और संशोधनवादी नेतृत्व के विरुद्ध बग़ावत करके नयी क्रान्तिकारी पार्टी के निर्माण एवं गठन की दिशा में आगे बढ़ने में चारु सहित भारत के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन के सभी नेताओं की बुनियादी मदद की। अगर हम चारु की ही बात करें तो यह स्पष्ट है कि उनकी अपनी विचारधारात्मक समझ निहायत कमज़ोर थी और चीन की पार्टी की अवस्थितियों के आधार पर ही उन्होंने निर्णायक अवस्थिति अपनायी और निर्णायक क़दम उठाये।

निस्सन्देह, चारु की क्रान्तिकारी स्पिरिट और संशोधनवादियों से उनकी घृणा पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता, लेकिन उनकी क्रान्तिकारी भावना में निम्न-बुर्जुआ उतावलेपन की प्रवृत्ति की निरन्तरता देखने को मिलती है जिसके चलते वह मनोगत क़िस्म के अतिउत्साह और निराशा के बीच झूलते रहते थे। जिस विचारधारात्मक कमज़ोरी के कारण ऐसा होता था, उसीके कारण वह दो लाइनों के संघर्ष को धैर्यपूर्वक लम्बा चलाने की जगह आनन-फ़ानन में फै़सला लेने का रास्ता चुनते थे। चारु के आठ दस्तावेज़ों की नवसंशोधनवादी माकपा से निर्णायक विच्छेद करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका थी, लेकिन, जैसाकि पहले भी उल्लेख किया जा चुका है, इन दस्तावेज़ों में ही चारु की “वाम” दुस्साहसवादी लाइन के संकेत मौजूद हैं। नक्सलबाड़ी किसान-उभार में जन दिशा जब प्रभावी ढंग से लागू हो रही थी तो चारु ने कुछ समय के लिए अपने पैर पीछे खींच लिये, लेकिन जैसे ही नक्सलबाड़ी में ठहराव और बिखराव का दौर आया, चारु फिर अपनी लाइन को लेकर आक्रामक ढंग से आगे बढ़े। नक्सलबाड़ी किसान संघर्ष चारु की लाइन को परास्त करके आगे बढ़ा था और चतरहाट इस्लामपुरा में चारु की लाइन का पहला प्रयोग बहुत कम समय में पिट गया था, लेकिन सिलीगुड़ी कमेटी का नेता होने के नाते पूरे देश में (और बाहर भी) उन्हें ही नक्सलबाड़ी संघर्ष के निर्माता और नेता के रूप में प्रसिद्धि मिली और इस साख का पूरा लाभ चारु ने अपनी लाइन को आगे बढ़ाने के लिए उठाया। निस्सन्देह नक्सलबाड़ी संघर्ष के स्थानीय संगठनकर्ताओं, और मुख्यतः कानू सान्याल की विचारधारात्मक-राजनीतिक समझ के दिवालियेपन, उसके चलते चारु की लाइन के आगे उनके आत्मसमर्पण और चीन की पार्टी से नक्सलबाड़ी संघर्ष को मिलनेवाली अतिरंजनापूर्ण मान्यता और प्रशंसा ने चारु की “वाम” दुस्साहसवादी लाइन के वर्चस्वशाली होने में काफ़ी मदद पहुँचायी। ग़लत लाइन के सुदृढ़ीकरण की दिशा में पहला महत्वपूर्ण क़दम तब उठाया गया, जब तालमेल कमेटी के सारे जनवादी तौर-तरीक़ों को ताक पर रखकर ‘कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों की अखिल भारतीय तालमेल कमेटी’ से डीवी-नागी के नेतृत्व वाली ‘आन्ध्र प्रदेश की कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों की तालमेल कमेटी’ को एकतरफ़ा ढंग से  निकाल बाहर किया गया। इसी तरह से चारु की “वाम” अवसरवादी लाइन पर सवाल उठाने वाले परिमल दासगुप्त, प्रमोद सेनगुप्त, असित सेन आदि को ‘संशोधनवादी’ और ‘ग़द्दार’ कहते हुए, बिना कोई बहस चलाये हुए बाहर कर दिया गया। वस्तुतः एआईसीसीआर के दौर में ही चारु की लाइन पूरी तरह से हावी हो चुकी थी। चारु ने तालमेल कमेटी को पार्टी के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था और अपनी स्थिति उसके एकछत्र नेता की बना ली थी। सारे विरोधियों को बाहर करने के बाद, उन्होंने अपनी पूर्व-अवस्थिति को बदलते हुए आनन-फ़ानन में सर्व भारतीय पार्टी गठन की घोषणा कर दी। एआईसीसीआर के ग़लत और ग़ैर-जनवादी तौर-तरीक़ों के ही कारण एम.सी.सी. और डब्ल्यू. बी.सी.सी.आर. जैसे कई संगठन, ग्रुप और व्यक्ति उसमें शामिल ही नहीं हुए और फ़रवरी, 1970 में चारु की अतिवामपन्थी लाइन की आलोचना करते हुए पंजाब के कुछ कामरेडों (बठिण्डा-फ़ीरोज़पुर कमेटी) ने भी हरभजनसिंह सोही के नेतृत्व में भाकपा (मा-ले) की गठन की प्रक्रिया से ख़ुद को अलग कर लिया। चारु ने सबसे विनाशकारी काम यह किया कि तालमेल कमेटी के लिए निर्धारित चार कार्यभारों को उठाकर ताक पर रख दिया। मज़दूर वर्ग और सभी मेहनतकश वर्गों के जुझारू जन-संघर्षों के विकास के  को तिलांजलि देते हुए जनान्दोलन और जन संगठन बनाने को ही संशोधनवाद और आर्थिक संघर्ष चलाने को ही अर्थवाद बता दिया गया। चारु के अनुसार ग़रीब और भूमिहीन किसानों के छोटे-छोटे ‘एक्शन ग्रुप’ बनाकर छापामार संघर्ष को आगे बढ़ाना था और यह “छापामार संघर्ष” था वर्ग-शत्रुओं का सफ़ाया! तालमेल कमेटी को संशोधनवाद के विरुद्ध सुदीर्घ विचारधारात्मक संघर्ष चलाकर माओ त्से-तुङ विचारधारा को वर्तमान युग के मार्क्सवाद-लेनिनवाद के रूप में स्थापित करना था और इस आधार पर सभी कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी पाँतों को ऐक्यबद्ध करना था। लेकिन चारु के अपने एजेण्डा में क़तारों की विचारधारात्मक-राजनीतिक शिक्षा, विचारधारात्मक-राजनीतिक मुद्दों पर बहसों के द्वारा ग़लत लाइन के एक्सपोज़र और क़तारों के विचारधारात्मक-राजनीतिक स्तरोन्नयन का कोई स्थान नहीं था। सिर्फ़ माओ के तीन लेख, चारु के आठ दस्तावेज़ और ‘रेड बुक’ पढ़ना ही पर्याप्त माना जाता था और मार्क्सवादी क्लासिक्स का अध्ययन करने वाले तक पर  “बुर्जुआ बुद्धिजीवी” का लेबल चस्पाँ कर दिया जाता था। इस तरह भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में शुरू से ही जड़ जमाये विचारधारात्मक कमज़ोरियों को चारु ने नयी ऊँचाइयों तक पहुँचा दिया। तालमेल कमेटी का एक महत्वपूर्ण कार्यभार भारत की ठोस परिस्थितियों का अध्ययन करके भारतीय क्रान्ति का कार्यक्रम, रणनीति और आम रणकौशल तय करना था। यह एक बुनियादी ऐतिहासिक महत्व का कार्यभार था। अगर तालमेल कमेटी क्रान्तिकारी जनदिशा को लागू करती और भारतीय समाज के चरित्र, उत्पादन-सम्बन्धों की प्रकृति, क्रान्ति की मंज़िल और कार्यक्रम तय करने की दिशा में अध्ययन, बहस और प्रयोगों की दिशा में कुछ शुरुआत भी कर पाती तो आज भारत के कम्युनिस्ट आन्दोलन का इतिहास ही शायद कुछ और होता। लेकिन चारु ने इस प्रक्रिया को शुरू ही नहीं होने दिया। ‘चीन का रास्ता हमारा रास्ता’ का नारा देकर और चीनी नव-जनवादी क्रान्ति के कार्यक्रम की कार्बन कॉपी करते हुए चारु ने सबसे बुनियादी सवालों में से एक को चुटकी बजाते “हल” कर दिया। चारु ने अपनी लाइन को निर्बाध-निर्द्वन्द्व रूप से लागू करने के लिए न केवल तालमेल कमेटी के मंच का पार्टी की तरह इस्तेमाल किया बल्कि अपने अन्धभक्तों का एक छोटा-सा गुट बनाकर ख़ुद को एकछत्र नेता के रूप में स्थापित किया। अपने इस लक्ष्य की पूर्ति में निस्सन्देह उन्हें कानू सान्याल जैसे उन संगठनकर्ताओं से भी विशेष मदद मिली जिन्होंने कभी जनदिशा को लागू किया लेकिन बाद में अपनी बेहद कमज़ोर विचारधारात्मक-राजनीतिक समझ के कारण “वाम” आतंकवादी लाइन के सामने घुटने टेक दिये। इन तथ्यों के आधार पर यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि चारु मजुमदार के नेतृत्व में 1970 में गठित पार्टी एक सर्वभारतीय मार्क्सवादी-लेनिनवादी पार्टी नहीं थी, बल्कि उस समय मौजूद कई मार्क्सवादी-लेनिनवादी संगठनों और ग्रुपों में से एक थी  और यह एक ऐसा संगठन था जो “वाम” अवसरवादी लाइन पर सर्वाधिक दृढ़ और सर्वाधिक सुसंगत था। तालमेल कमेटी के जीवनकाल में ही चारु की लाइन एक के बाद एक, जहाँ कहीं भी लागू हुई, पिटती चली गयी, लेकिन उनकी समीक्षा और समाहार की जगह, होता यह था कि एक जगह लाइन पिटने के बाद दूसरी जगह ज़ोर-शोर से उसे लागू किया जाने लगता था। इस सिलसिले की चर्चा पीछे हम विस्तार से कर चुके हैं। पार्टी बनाने के पहले ही श्रीकाकुलम के संघर्ष का बिखराव शुरू हो चुका था जो पार्टी बनाने के चन्द महीनों बाद अपने अन्तिम मुक़ाम तक जा पहुँचा था। छात्र-युवा आन्दोलन की जो जनदिशा तालमेल कमेटी के दौर में असित सेन की रहनुमाई में तय हुई थी उसे त्यागकर इस मोर्चे पर लागू की गयी चारु की लाइन का चरम-बिन्दु कलकत्ता का छात्र-युवा आन्दोलन (‘भंजन-दहन-हनन समारोह’) था जिसके दुस्साहसवाद का फ़ायदा उठाकर भारतीय राज्यसत्ता ने उसे ख़ून के दलदल में डुबो दिया। लेकिन इसका समाहार करने की जगह चारु गुट ने इसपर सवाल उठाने वाले और “वाम” अवसरवाद की आलोचना करने वाले सुशीतल रॉयचौधुरी को ही किनारे लगा दिया। देबरा गोपीबल्लभपुर के संघर्ष के बिखराव और उसके नेतृत्व द्वारा प्रस्तुत आलोचना और समाहार पर विचार ही नहीं किया गया और बीरभूम कमेटी की आलोचनात्मक रिपोर्ट के निहायत साज़िशाना तरीक़े से दबा दिए जाने की चर्चा हम पहले कर ही चुके हैं।

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के सुझावों और आलोचनाओं को चारु ने लगभग डेढ़ वर्षों तक दबाये रखा और केवल तभी जाकर मिलने वालों को उसके बारे में बताना शुरू किया जब यह स्पष्ट हो चुका था कि उसे दबाया नहीं जा सकता। इसी बीच उन्होंने बीरभूम कमेटी की दूसरी रिपोर्ट को भी दबाने का काम किया। यही वह दौर था जब दीपक, दिलीप, महादेव की तिकड़ी चारु के ‘क्रान्तिकारी प्राधिकार’ की बात ज़ोर-शोर से कर रही थी और उन्हें “भारत का माओ” बतलाने की कोशिश कर रही थी (स्मरणीय है कि कांग्रेस के तुरन्त बाद हुई केन्द्रीय कमेटी की पहली और आख़िरी बैठक में ही चारु को ‘क्रान्तिकारी प्राधिकार’ घोषित करने का प्रस्ताव ख़ारिज किया जा चुका था)। चारु के जीवन का यह अन्तिम दौर वह महत्वपूर्ण दौर था जब उनका “वामपन्थी” अवसरवाद राजनीतिक अवसरवाद से व्यक्तिगत अवसरवाद में रूपान्तरित हो चुका था। पहले किसी भी प्रतिबद्ध “वाम” दुस्साहसवादी की तरह चारु आत्मधर्माभिमानिता के शिकार थे, उनकी सांगठनिक लाइन नौकरशाही और फ़रमानशाही से ग्रस्त थी, वह स्वयं को ही कमेटी समझते थे, लेकिन अन्तिम डेढ़ वर्षों के दौरान वह किसी भी तरह से अपनी व्यक्तिगत साख और प्रतिष्ठा को बचाने के लिए प्रयत्नशील थे और धीरे-धीरे अपनी लाइन इस तरह से बदल रहे थे कि वह चीनी सुझावों के ज़्यादा से ज़्यादा अनुरूप हो जाए और उन्हें कम से कम आलोचना का शिकार होना पड़े और उनके नेतृत्व पर कोई ख़तरा न आये। इसे राजनीतिक बेईमानी ही कहा जा सकता है।

कुल मिलाकर, पश्चदृष्टि से समूचे घटना-क्रम-विकास को देखते हुए कहा जा सकता है कि चारु 1965 से ही “वाम” दुस्साहसवादी भटकाव के शिकार थे और यह भटकाव नेतृत्व के अन्य लोगों की राजनीतिक अपरिपक्वता और बेहद कमज़ोर वैचारिक समझदारी से बल पाकर विनाशकारी शक़्ल अख़्तियार करता चला गया। चारु का क्रान्तिकारी अधैर्य वास्तव में एक निम्न-बुर्जुआ अधैर्य था। यह अधैर्य संशोधनवाद के लम्बे दौर की एक प्रतिक्रया भी था और चारु के चिन्तन में माकपा से निर्णायक विच्छेद के समय से ही मौजूद था। एक नयी क्रान्तिकारी शुरुआत का गला घोंट देने का काम तो वस्तुतः तभी हो चुका था जब चारु ने तालमेल कमेटी के निर्धारित लक्ष्यों को तिलांजलि दे दी, मज़दूरों और किसानों के क्रान्तिकारी जन-संघर्षों के प्रयोगों के विकास के काम को हाथ में ही नहीं लिया गया और भारतीय क्रान्ति के कार्यक्रम के नये सिरे से निर्धारण के लिए शोध-अध्ययन के लक्ष्य को ताक पर रखकर चीनी क्रान्ति के कार्यक्रम की कार्बन कॉपी को भारतीय क्रान्ति का कार्यक्रम बना दिया गया।

अगर चारु के समस्त लेखन का सर्वेक्षण किया जाए तो यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि उनकी मार्क्सवाद-लेनिनवाद की सैद्धान्तिक समझ निहायत कमज़ोर थी। मार्क्सवादी क्लासिक्स का उन्होंने शायद ही अध्ययन किया हो। उनकी बौद्धिक क्षमता तो किसी सर्वभारतीय क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट पार्टी को नेतृत्व देने लायक़ थी ही नहीं। वह ज़्यादा से ज़्यादा, ऐसी किसी पार्टी में क्षेत्रीय स्तर के नेता हो सकते थे। लेकिन हर “वाम” दुस्साहसवादी की तरह वह अपनी लाइन पर दृढ़ और निर्णायक थे और उन्हें अपनी लाइन को निर्द्वन्द्व रूप में लागू करने में नेतृत्व के उन लोगों के घुटनाटेकू रवैये से, उनकी कमज़ोर समझ से और उदारतावादी राजनीतिक-सांगठनिक व्यवहार से काफ़ी मदद मिली जो स्वयं राजनीतिक समझ की दृष्टि से कमज़ोर थे। “वाम” दुस्साहसवादी लाइन लम्बे समय के संशोधनवादी पार्टी व्यवहार की एक विद्रोही प्रतिक्रया थी जिसके अभिकर्ता चारु मजुमदार बने क्योंकि उनमें नेतृत्व की निर्णायकता का गुण मौजूद था। भारतीय कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन में “वाम” अवसरवाद के इस विनाशकारी दौर के लिए भाकपा (मा-ले) के उन नेताओं की भी ज़िम्मेदारी अवश्य बनाती है जो अपनी कमज़ोर राजनीतिक समझ के कारण लम्बे समय तक दब्बू और घुटनाटेकू रवैया अपनाते रहे, समय पर सवालों को नहीं उठाया और काफ़ी हद तक व्यक्ति पूजा की प्रवृत्ति के भी शिकार बने रहे। इनमें से अधिकांश के ज्ञान-चक्षु तो तभी खुले जब उन्हें चीनी सुझावों के बारे में पता चला। लेकिन इस भटकाव के नेता चारु ही थे और इतिहास इसके विनाशकारी परिणामों के लिए मुख्यतः उन्हीं को कठघरे में खड़ा करेगा। संशोधनवाद से निर्णायक विच्छेद में अपनी भूमिका के चलते उनका जितना सकारात्मक योगदान था, उससे कहीं अधिक उनकी भूमिका नकारात्मक सिद्ध हुई क्योंकि “वामपन्थी” दुस्साहसवादी बचकानेपन ने एक ऐतिहासिक नयी शुरुआत को जन्म लेते ही विनाशकारी ढंग से विसर्जित कर दिया।

 

दिशा सन्धान – अंक 6  (अक्‍टूबर-दिसम्‍बर 2024) में प्रकाशित

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