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भावुकतावादी क्रान्तिवाद बनाम मार्क्सवादी-लेनिनवादी अप्रोच एवं पद्धति

भावुकतावादी क्रान्तिवाद बनाम मार्क्सवादी-लेनिनवादी अप्रोच एवं पद्धति

  • कात्यायनी

अनुभववादी भावुकतावादी क्रान्तिवादियों और मार्क्सवादियों में एक बुनियादी फर्क होता है। भावुकतावादी क्रान्तिवादी विचारधारा को मार्गदर्शक नहीं बनाते, इसलिए किसी क्रान्तिकारी संघर्ष से वे अति-आशावादी होकर उम्मीदें पाल लेते हैं, उसकी दिशा और विकास की गतिकी को नहीं समझ पाते और उस प्रयोग का विचारधारात्मक विचलन जब विफलता के नतीजे के रूप में सामने आ जाता है, तो फिर वे निराशा में डूब जाते हैं या मिथ्या आशा के किसी और स्रोत की तलाश में जुट जाते हैं।

जिन लोगों ने 1956 में सोवियत पार्टी के विचारधारात्मक विपथगमन को नहीं समझा और उसके बाह्य स्वरूप को देखकर उसके समाजवादी मानते रहे, वे उस समय मायूस हो गये जब सोवियत समाज का राजकीय पूँजीवादी चरित्र नंगा हो गया। कुछ फिर भी उसे समाजवादी मानते रहे, पर जब सोवियत संघ अपनी स्वाभाविक आंतरिक गति से विघटित हो गया और पूरे सोवियत ब्लॉक में “समाजवादी” मुखौटे वाला राजकीय पूँजीवाद नवउदारवादी निजी पूँजीवाद में बदल गया तब वे निराश हो गये। जो लोग 1976 में चीन में पूँजीवादी पुनर्स्थापना को मार्क्सवादी विज्ञान के आधार पर नहीं समझ सके, वे “बाजार समाजवाद” का नंगा चेहरा सामने आने के बाद पस्तहिम्मत हैं। ऐसे ही कुछ लोग समाजवादी संक्रमण की प्रकृति और समस्याओं को समझे बिना, सोवियत संघ और चीन के अनुभवों से निराश होकर इक्कीसवीं सदी के नये समाजवाद के मॉडल की तलाश में निकल पड़े और वेनेजुएला के “यूगो शावेज में उन्हें समाजवाद का नया मसीहा दीखने लगा। सच्चाई यह है कि वेनेजुएला में ज़्यादा से ज़्यादा एक साम्राज्यवाद-विरोधी, लोकप्रिय, कल्याणकारी बुर्जुआ राज्य है जो पेट्रो डॉलर (तेल-राजस्व) से पोषित बहुत सारे जनकल्याणकारी कदम उठा रहा है (ऐसा तो एक हद तक लीबिया और इराक में भी हुआ था)। वहाँ अमेरिकी साम्राज्यवाद और उसकी कठपुतली संस्थाओं से लम्बे संघर्ष के अनुभव ने स्वतःस्फूर्त ढंग से आम जनता के बहुत सारे संगठनों, मंचों और संस्थाओं को जन्म दिया है, जिनका दबाव ‘बोलिवारियन क्रान्ति’ के जनपरक, रैडिकल चरित्र को बनाये रखने में फिलहाल एक भूमिका निभा रहा है। लेकिन यह इतिहास की एक अल्पजीवी परिघटना है। ‘बोलिवारियन क्रान्ति’ समाजवादी संक्रमण की आगे की मंजिलों में न तो कदम बढ़ा रही है, न ही बढ़ा सकती है। आर्थिक-सामाजिक गतिकी के सामान्य नियमों से इस प्रयोग को कालान्तर में ठहराव और विघटन का शिकार होना ही है। फिर भावुक क्रान्तिवादियों के लिए आशाओं का एक और स्रोत सूख जायेगा।

क्यूबा कुछ लोगों के लिए अभी भी आशाओं का स्रोत बना हुआ है। बेशक क्यूबाई क्रान्ति एक महान क्रान्ति थी और चे और फिदेल का क्रान्तिकारी नायकत्व निर्विवाद है। क्यूबा ने अमेरिकी साम्राज्यवाद की घेरेबन्दी और साज़िशों का शौयपूर्वक सामना करते हुए जनशक्ति की लामबंदी करके उत्पादन के साधनों के स्वामित्व के समाजीकरण, अर्थतंत्र के समाजवादी नियोजन तथा शिक्षा-स्वास्थ्य आदि के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण कदम उठाये। अमेरिका और पश्चिमी ब्लॉक के साथ अन्तरसाम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा में सोवियत साम्राज्यवाद ने क्यूबा को अपना संश्रयकारी बनाया, अफ्रीका महाद्वीप में उसका इस्तेमाल भी किया और बदले में उसे तकनोलॉजी, औद्योगिक उपकरणों, अनाज आदि (क्यूबा की चीनी के बदले) देकर काफ़ी मदद की। इस निर्भरता का नकारात्मक प्रभाव यह पड़ा कि क्यूबा में उत्पादन के सभी क्षेत्रों में संतुलित-सर्वांगसम विकास नहीं हो सका और वहाँ का अर्थतंत्र मुख्यतः कृषि (गन्ना-तम्बाकू आदि) आधारित बना रहा तथा चीनी और खनिजों को सोवियत संघ निर्यात करने पर टिका रहा। सोवियत संघ के विघटन के बाद, इसी वजह से एक दशक से भी अधिक समय तक क्यूबा की गम्भीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। यह मानना पड़ेगा कि जनता में व्याप्त समाजवादी स्पिरिट और अमेरिकी साम्राज्यवाद-विरोधी घृणा के चलते व्यापक जन-लामबन्दी करके क्यूबा की सरकार उस संकट से उबरने में सफल रही और एक हद तक स्वावलंबिता भी हासिल की। वेनेजुएला से तेल की मदद और अमेरिका-विरोधी अन्य लातिन अमेरिकी देशों से व्यापार सम्बन्धों ने भी उसकी समस्या को हल करने में एक भूमिका निभायी। लेकिन बेहद पिछड़ी उत्पादक शक्तियों और उत्पादन-सम्बन्धों के समाजवादी रूपान्तरण के आगे न बढ़ पाने की मूल समस्या क्यूबा में अभी भी बनी हुई है। बुनियादी बात यह है कि क्यूबाई क्रान्ति का नेतृत्व कभी भी इस बात को नहीं समझ सका कि समाजवाद के अन्तर्गत उत्पादक शक्तियों के विकास के साथ-साथ समाजवादी उत्पादन-सम्बन्धों का निरन्तर उच्चतर रूप क़ायम करना होता है, मानसिक श्रम और शारीरिक श्रम के अन्तर, कृषि और उद्योग के अन्तर, गाँव और शहर के अन्तर – इन तीनों को क्रमशः कम करते हुए इनके आधार पर क़ायम बुर्जुआ अधिकारों को कम करते जाना होता है, और साथ ही साथ अधिरचना का निरन्तर क्रान्तिकारीकरण करते जाना होता है। यानी समाजवादी संक्रमण के दौरान, उत्पादक शक्तियों के विकास पर वर्ग संघर्ष को प्राथमिकता देकर, सर्वहारा वर्ग के सर्वतोमुखी अधिनायकत्व के अन्तर्गत सतत् क्रान्ति और अधिरचना में सतत् क्रान्ति चलाकर ही समाजवाद को आगे ले जाया जा सकता है तथा पूँजीवादी पुनर्स्थापना को रोका जा सकता है। चीन की सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति की यही शिक्षा थी, जो वहाँ की पार्टी ने सोवियत संघ के सकारात्मक-नकारात्मक अनुभवों से और अपने देश के वर्ग संघर्ष से हासिल की थी। हालाँकि इस नतीजे तक पहुँचने तक चीन में भी नये बुर्जुआ तत्व पार्टी, राज्य और समाज में अपनी जड़ें इतनी मज़बूत कर चुके थे और वर्ग-शक्ति सन्तुलन इस हद तक बदल चुका था कि पहली सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति (1966-76) के बाद ही, वहाँ भी प्रतिक्रान्तिकारी तख़्तापलट के बाद पूँजीवादी पुनर्स्थापना की शुरुआत हो गयी। पर सांस्कृतिक क्रान्ति की जो सैद्धान्तिक निष्पत्ति थी, उसका सार्वभौमिक महत्व लगातार बना रहेगा। क्यूबा की पार्टी ने चीनी सांस्कृतिक क्रान्ति से कुछ भी नहीं सीखा और यह ज़रा भी आश्चर्यजनक नहीं है। यह क्यूबा की पार्टी की विचारधारात्मक कमज़ोरी ही थी कि उसने ख्रुश्चेवी संशोधनवाद के विरुद्ध चीनी पार्टी के विचारधारात्मक संघर्ष में तटस्थता की अवस्थिति अपनाई थी और बाद में तो उसने सोवियत संघ के इशारे पर खुला चीन-विरोधी रुख़ भी अपनाया था। इसका एक पहलू यह भी था कि विचारधारात्मक प्रश्नों और अन्तरराष्ट्रीयतावाद से हटकर इस पूरे विवाद में क्यूबा ने अपने संकीर्ण राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी थी, जो अपने आपमें मार्क्सवाद-लेनिनवाद से एक विचलन है। 2012 में हुई क्यूबा की पार्टी की कांग्रेस ने साफ़ कर दिया कि अपने समाज के गतिरोध को तोड़ने के लिए क्यूबा की पार्टी समाजवादी संक्रमण की अग्रवर्ती मंज़िलों की ओर बढ़ने का साहस जुटाने और आंतरिक वर्ग संघर्ष के तूफ़ानों में उतरने के बजाय कुछ-कुछ उसी तरह “नियंत्रित खुले दरवाज़े की नीति” या “बाज़ार समाजवाद” की नीति अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है, जैसे माओ की मृत्यु के बाद चीन की पार्टी बढ़ी थी। क्यूबा की पार्टी की पिछली कांग्रेस की तुलना कई मायनों में चीन की पार्टी की ग्यारहवीं कांग्रेस से की जा सकती है। क्यूबाई समाज में इन परिवर्तनों के प्रभाव अभी से ही दीखने लगे हैं। वहाँ की मुद्रा की अर्थव्यवस्था के अतिरिक्त दो और समानान्तर अर्थव्यवस्थाएँ चल रही हैं: वैध डॉलर की सीमित अर्थव्यवस्था और अवैध डॉलर की समान्तर अर्थव्यवस्था। कालाबाज़ारी, बाहर से डॉलर लाने वाले पर्यटकों द्वारा लायी जा रही अपसंस्कृति, वेश्यावृत्ति और अपराध बढ़ रहे हैं। निजी स्वामित्व और निजी व्यापार के लिए दी गयी “नियंत्रित” छूटें अपना रंग दिखा रही हैं। जो मार्क्सवादी विज्ञान के आधार पर समाज की गतिकी को समझता है, वह बता सकता है कि देर-सबेर क्यूबा का भविष्य भी चीन और वियतनाम के “बाज़ार समाजवाद” जैसा ही होगा। या पूर्वी यूरोपीय देशों (प्रतिक्रान्तिकारी तख़्तापलट के बाद बुर्जुआ जनवाद का आना) जैसा भी हो सकता है। पर ऐसा कहने पर भावुक क्रान्तिवादी निराश हो जाते हैं, उन्हें लगता है कि समाजवाद की अनिष्टता की भविष्यवाणी करके उसे श्राप दिया जा रहा है और कोई पाप किया जा रहा है।

1990 के बाद कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी दुनिया में बेकली से आसन्न विजयोन्मुख क्रान्तिकारी संघर्ष का कोई प्रकाश स्तम्भ तलाश रहे थे और उनका ध्यान पेरू की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) द्वारा चलाये जा रहे उस लोकयुद्ध की ओर बरबस गया जिसने पहले अलेन गार्सिया और फिर फूजीमोरी की सरकारों की नाक में दम कर दिया था। लेकिन उस पार्टी के कुछ विचारधारात्मक विचलन शुरू से ही स्पष्ट थे। पार्टी का ज़ोर शुरू से ही विचारधारा और राजनीति से अधिक हथियार पर था। थोड़ी सफलताओं के बाद पार्टी ने चेयरमैन गोंजालो के नाम पर ‘गोंजालो चिन्तन’ जोड़कर ‘मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद-गोंजालो चिन्तन’ कहना शुरू कर दिया जबकि ‘गोंजालो चिन्तन’ में ऐसी कोई भी मौलिक और सार्वभौमिक महत्व की बात नहीं थी जिसे विचारधारा में कोई आंशिक गुणात्मक इज़ाफ़ा भी माना जा सके। पेरू का ग्रामीण क्षेत्र विशाल है, लेकिन आबादी का बहुलांश शहरी है। देश की 48 प्रतिशत आबादी अकेले राजधानी लीमा और उसके उपनगरीय इलाकों में रहती है। ऐसे देश में पेरू की पार्टी नवजनवादी क्रान्ति की बात कर रही थी। वहाँ सुदूरवर्ती क्षेत्रों में छापामार युद्ध तो लम्बे समय से चलाया जा सकता था, लेकिन भारी शहरी आबादी को छोड़कर राज्यसत्ता कब्ज़ा करने की बात सोची भी नहीं जा सकती थी। पेरू की पार्टी की क्रान्ति की मंज़िल की पूरी समझ ही ग़लत थी। नतीजा सामने है। गोंजालो की गिरफ़्तारी के बाद संघर्ष जल्दी ही बिखर गया और उस मॉडल से अतिशय उम्मीद पाल बैठे भावुकतावादी कम्युनिस्ट निराश हो गये।

फिर जल्दी ही उम्मीदों का नया केन्द्र नेपाल में उभरा। 1996 में प्रचण्ड के नेतृत्व में नेकपा (माओवादी) ने जनयुद्ध की शुरुआत की तो बहुतों को लगा कि जल्दी ही सगरमाथा पर लाल झण्डा फहरा जायेगा। पर वह झण्डा लेकर नेपाल की माओवादी पार्टी संसद में घुसी तो फिर उसी खेल में लग गयी। सच यह है कि पार्टी में शुरू से ही विचारधारात्मक विचलन मौजूद थे, जिनकी निरन्तरता में पेण्डुलम “वाम” से दक्षिण की ओर गया, प्रचण्ड इक्कीसवीं शताब्दी में सर्वहारा अधिनायकत्व-विषयक लेनिन की स्थापना में इजाफ़ा करते हुए बहुदलीय संसदीय जनवाद की समझदारी लेकर आये, फिर संविधान सभा चुनावों में भागीदारी ‘टैक्टिक्स’ से ‘स्ट्रैटेजी’ बन गयी, सरकार चलाना और संविधान बनाना ही परम पुनीत लक्ष्य बन गया, जन सेना को शासक वर्ग की सेना में मिला दिया गया, आधारक्षेत्र में विकसित लोक संस्थाओं को भंग कर दिया गया, भूस्वामियों से छीनी गयी ज़मीनें वापस कर दी गयीं, तरह-तरह के शब्दजालों के बावजूद, शान्तिपूर्ण संक्रमण का नया रास्ता सामने आ ही गया और “प्रचण्ड पथ” संसद पथ में रूपान्तरित हो गया। प्रचण्ड-भट्टराई के नवसंशोधनवाद की आलोचना करते हुए किरण वैद्य आदि ने विद्रोह करके नयी पार्टी बनायी जिसने नयी संविधान सभा का बॉयकाट करते हुए जनविद्रोह की धमकियाँ भी दी, लेकिन ग़ौरतलब है कि किरण वैद्य ने अपनी पूर्व पार्टी की मूल विचारधारात्मक अवस्थिति के संशोधनवादी चरित्र और उसके विकास की प्रक्रिया की, “प्रचण्ड पथ” की (यह नाम उन्होंने ही दिया था) कभी बुनियादी स्तर की आलोचना नहीं की, केवल लक्षणों और अभिव्यक्तियों की ही आलोचना की। अब यह पार्टी भी कहने लगी है कि सशस्त्र लोकयुद्ध के रास्ते की बजाय वह जनता की शिक्षा, स्वास्थ्य आदि प्रश्नों पर आन्दोलन करते हुए आगे बढ़ेगी क्योंकि आज की बहुध्रुवीय दुनिया में शान्तिपूर्ण संघर्ष की सम्भावनाएँ प्रचुर हैं। यह पार्टी भी यही कह रही है कि फिलहाल बाहर से दबाव बनाया जायेगा कि संविधान सभा ज़्यादा से ज़्यादा जनपरक संविधान बनाये। तय है कि यह नयी पार्टी भी, चाहे जितना भी रैडिकल तेवर अपनाये, अपने जन्मकाल से ही विचारधारात्मक रूप से कमज़ोर और संशोधनवादी विचलन की शिकार है। इससे अधिक उम्मीद पालने वाले भावुकतावादी क्रान्तिवादियों को भी भविष्य में फिर सदमा लगने वाला है। बार-बार ऐसे सदमों से दिल का दौरा पड़ने और कोमा में चले जाने की प्रचुर सम्भावना रहती है।

1980 में दुनिया के कई मार्क्सवादी-लेनिनवादी संगठनों और पार्टियों को लेकर एक ‘क्रान्तिकारी अन्तरराष्ट्रीयतावादी आन्दोलन’ (रिम) नामक मंच गठित करने की कोशिश शुरू हुई और 1984 में उसका घोषणापत्र जारी हुआ। इस मंच का विचारधारात्मक आधार शुरू से ही कमज़ोर था और कुछ को छोड़कर अधिकांश की अपने देश में न कोई ताक़त थी, न कोई आधार, न संघर्षों का कोई अनुभव। फिर भी कुछ लोगों को इस मंच से अधिक ही उम्मीदें पैदा हो गयीं थीं और वे ‘रिम’ की कोई भी विचारधारात्मक-राजनीतिक आलोचना सुनने को तैयार नहीं होते थे। इस मंच के घटक माओ विचारधारा (जिसे पेरू की पार्टी और आर.सी.पी., यू.एस.ए. की पहल पर बाद में माओवाद कहा जाने लगा) में नया इज़ाफ़ा करने की बेहद जल्दबाज़ी में थे। सबसे पहले रिम के एक भारतीय घटक सी.आर.सी., सी.पी.आई. (एम.एल.) के सचिव के. वेणु सर्वहारा अधिनायकत्व की लेनिनवादी अवधारणा को ज़्यादा “जनवादी” बनाने के लिए बहुदलीय संसदीय जनवाद के रंग-गंध वाली सोच लेकर आये और ‘रिम’ से बाहर कर दिये गये। फिर उनका संगठन भी विसर्जित हो गया। फिर माओ त्से-तुङ बनाम माओ विचारधारा के सवाल पर मोहन विक्रम सिंह के नेतृत्व वाली पार्टी रिम का घटक बनी और संसदमार्गी होने के बाद उसे भी बाहर कर दिया। इस बीच रिम के कई घटक टूटते या विलुप्त होते रहे। कुछ क्रान्तिकारी संघर्षों में तो लगे थे, पर चीनी क्रान्ति के कार्यक्रम के जड़सूत्रवादी अंधानुकरण के चलते वे लम्बे समय से या तो एक ही जगह खड़े हैं या छीजते जा रहे हैं। ‘रिम’ लगभग एक दशक से सुषुप्त ही रहा है। इधर रिम के गठन में पहल लेने वाली प्रमुख पार्टी आर.सी.पी., यू.एस.ए. के चेयरमैन बॉब अवाकिएन विचारधारा में इज़ाफ़ा करते हुए माओ से भी काफ़ी आगे निकल गये हैं, उनकी पार्टी इक्कीसवीं शताब्दी की विश्व सर्वहारा क्रान्ति के लिए अवाकिएन के ‘नये संश्लेषण’ के सिद्धान्त को मार्गदर्शक मानती है, जिसने माओवाद की तमाम कमियों का “समाहार” करके विचारधारा को एक “नयी ऊँचाई” प्रदान कर दी है। ‘नया संश्लेषण’ (न्यू सिन्थेसिस) राजनीति और दर्शन का भोंड़ा प्रहसन है, पर उसमें इतनी लफ्फाज़ी है कि उसकी चर्चा अलग से विस्तार की माँग करती है। उसमें कुछ बातें तो माओ की हैं, जिन्हें चुराकर नयी भाषा में रख दिया गया है। दूसरे ‘निरपेक्ष सत्य’ की नयी घोर अमार्क्सवादी अवधारणा प्रस्तुत की गयी है। तीसरे, मार्क्सवाद और माओवाद को जोड़ने वाली कड़ी लेनिनवाद को बताते हुए मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद की अब तक की अवधारणा को विचित्र सारसंग्रहवादी खिचड़ी बना दिया गया है। मूल बात है कि यह सारी सोच वर्ग संघर्ष के किसी अनुभव का नतीजा नहीं, बॉब अवाकिएन के दिमाग़ की उपज है। यह पार्टी घोर हरावलपन्थी (वैंगार्डिस्ट) पार्टी है, जिसका कोई अपना जनसंगठन या मज़दूर संगठन नहीं है। इसके लोग अश्वेत लोगों के और अन्य जनउभारों एवं आन्दोलनों में हिस्सा लेते रहते हैं। पार्टी बस विचारधारात्मक-राजनीतिक प्रचार-प्रसार, लेखन-चिन्तन-विमर्श का काम करती रही है। इतिहास ने एक जोकर के इर्दगिर्द ‘कल्ट-बिल्डिंग’ का इतना फूहड़ प्रहसन शायद कभी नहीं देखा होगा।

अब “बॉब अवॉकिएनवाद” के आलोचक ‘रिम’ के कई घटक और अन्य मार्क्सवादी-लेनिनवादी ग्रुप कोई अन्तरराष्ट्रीय संगठन नये सिरे से बनाने की कोशिश कर रहे हैं। समस्या यह है कि (1) ये ग्रुप, संगठन या पार्टी, स्वयं अपने देश के ही कई संगठनों में से एक (या दो) हैं, (2) अपने देश में ही मा-ले शिविर के दीर्घकालिक बिखराव और ठहराव को हल करने की दिशा में ये दो क़दम भी आगे नहीं बढ़ सके हैं, (3) इनमें से अधिकांश का कोई संघर्ष-निर्मित जनाधार नहीं है और कुछ “वाम” तथा कुछ दक्षिणपन्थी विचलन के शिकार हैं, (4) माओवाद/माओ विचारधारा की हिफ़ाजत ये स्वयं ही बेहद कठमुल्लावादी अवस्थिति से करते हैं, माओ के प्राधिकार को स्वीकारने का मतलब यह मानते हैं कि माओकालीन समाजवादी संक्रमण के किसी प्रयोग की भी (लाख तर्क होने के बावजूद) आलोचना वर्जनीय है, (5) ये संगठन प्रायः माओवाद/माओ विचारधारा की हिफ़ाजत कठमुल्लावादी अवस्थिति से करते हैं, विचारधारा और कार्यक्रम के अन्तर को ही नहीं समझते और तीसरी दुनिया के हर देश में (कुछ तो आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड और तुर्की तक में) नवजनवादी क्रान्ति की मंज़िल मानना माओ के प्राधिकार को मानने की शर्त मानते हैं, नवउदारवाद के दौर को उपनिवेशवाद/नवउपनिवेशवाद की वापसी मानते हैं, तीसरी दुनिया के अधिकांश देशों में पूँजीवादी विकास और “प्रशियाई मार्ग” से हुए क्रमिक पूँजीवादी विकास को मानना तो दूर, उस पर सोचने और बहस करने तक करने को तैयार नहीं होते। यदि ऐसा एक अन्तरराष्ट्रीय संगठन बनेगा, तो इसके घटक संगठनों के देशों के ही अन्य मा-ले संगठन मिलकर अन्य (सम्भवतः एकाधिक) अन्तरराष्ट्रीय संगठन बनायेंगे जो परस्पर प्रतिस्पर्द्धी होंगे। हम समझते हैं कि माओवादी संगठनों का जो भी अन्तरराष्ट्रीय संगठन आज की स्थिति में बनेगा, वह अपना उद्देश्य पूरा करने की जगह ग़ैर मुद्दों पर कठहुज्जती वाली बहसों को जन्म देगा और कालान्तर में बिखर जायेगा। लेकिन भावुकतावादी क्रान्तिवादियों का क्या, वे तो फिर उम्मीद पाल लेंगे, बहुत ही जल्दी फिर मायूस हो जाने के लिए। थोड़ी चिन्ता तो हमें उनकी है ही, क्योंकि थोड़ी-बहुत दुनियादारी में लिथड़ी होने के बावजूद प्रायः वे निर्मल आत्माएँ होती हैं।

हमारी तो यह स्पष्ट और दृढ़ सोच है कि आज की परिस्थिति में कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी संगठनों को विचारधारा और कार्यक्रम (रणनीति एवं आम रणकौशल) के अन्तर को तो समझना होगा! बात बहुत सीधी-सपाट है। जो भी कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी संगठन वर्ग संघर्ष और सर्वहारा अधिनायकत्व को मानता है, शान्तिपूर्ण संक्रमण का विरोधी है, समाजवादी समाज में वर्ग और वर्ग संघर्ष की मौजूदगी तथा सर्वहारा वर्ग के सर्वतोमुखी अधिनायकत्व के अन्तर्गत सतत् क्रान्ति एवं अधिरचना में क्रान्ति के सिद्धान्त को मानता है, जो भी चुनाव को रणनीति नहीं बल्कि रणकौशल मानता है, जो भी पार्टी की लेनिनवादी ढाँचे और कार्यप्रणाली को लागू करता है और जो भी अपनी ताक़त और योजना के हिसाब से जनता के बीच काम कर रहा है, उसे विचारधारात्मक रूप से हमसफ़र तो मानना ही होगा। पर कार्यक्रम का सवाल तो किसी भी काल विशेष की दुनिया में देश विशेष में मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र के हिसाब से उत्पादन-सम्बन्धों के अध्ययन से, तदनुरूप वर्ग-सम्बन्धों के (क्रान्ति के मित्र व शत्रु वर्गों के निर्धारण) निर्धारण से तय होता है। कार्यक्रम निर्धारण के उपकरण हमें विचारधारा से मिलते हैं, लेकिन कार्यक्रम विचारधारा का संघटक अवयव कदापि नहीं हो सकता। आज की दुनिया न तो 1949 की दुनिया है, न ही 1963 की दुनिया है। कार्यक्रम चीनी पार्टी द्वारा 1963 में प्रस्तुत विश्व सर्वहारा क्रान्ति की आम दिशा के दस्तावेज़ से नहीं तय होगा, बल्कि देश विशेष के उत्पादन-सम्बन्धों और फिर अधिरचना के ठोस अध्ययन से तय होगा। पहली पद्धति निगमनात्मक (डिडक्टिव) होगी, जबकि दूसरी आगमनात्मक (इण्डक्टिव) होगी। मार्क्सवादी दर्शन तर्क की मूल गतिकी को आगमनात्मक मानता है और निगमनात्मक को उसका सहायक मानता है। बहरहाल, यह अलग से एक विस्तृत चर्चा का विषय है। हमारा कहना यह है कि आज ज़्यादा से ज़्यादा, दुनिया के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी संगठन विचारधारात्मक साझा उद्देश्य से मंच बना सकते हैं, बशर्ते कि वे विचारधारा और कार्यक्रम के बीच का अन्तर समझते हों, वे सच्चे बोल्शेविक संगठन के समान जनता के बीच काम करते हों, उनके पास विचारधारात्मक परिपक्वता के साथ ही एक हद तक वर्ग संघर्ष का व्यावहारिक अनुभव भी हो और वे अपने देश में भी पार्टी निर्माण एवं पार्टी गठन के लिए मज़दूर वर्ग की सच्ची जुझारू एकजुटता बनाते जाने के आधार पर प्रयत्नशील हों। (1) सर्वहारा वर्ग एक अन्तरराष्ट्रीयतावादी वर्ग होता है, मात्र इसी आधार पर मनोगत ढंग से कोई नया इण्टरनेशनल या अन्तरराष्ट्रीय संगठन वस्तुगत स्थितियों और घटक संगठनों/पार्टियों की मनोगत स्थिति को दरकिनार करके नहीं बन सकता। (2) पहले, दूसरे और तीसरे इण्टरनेशनल के विश्व रंगमंच अलग-अलग थे। तीसरा इण्टरनेशनल जनवादी केन्द्रीयता पर आधारित एक विश्व पार्टी की सोच पर आधारित था। शुरू में उसकी भूमिका पूरी दुनिया में कम्युनिस्ट आन्दोलन के प्रसारक, पथ-प्रदर्शक और शिक्षक के रूप में सकारात्मक थी, पर जब पिछड़े देशों में कम्युनिस्ट पार्टियाँ वर्ग संघर्ष की भट्ठी में तप-मँजकर तैयार हो गयीं तो विश्व क्रान्ति के केन्द्र का पूर्ववर्ती ढाँचा पार्टियों के स्वतंत्र अध्ययन और सोच को प्रतिकूल रूप में प्रभावित करने लगा। (चीन का उदाहरण सर्वाधिक प्रातिनिधिक है और अन्तरराष्ट्रीय लाइन से राष्ट्रीय लाइन निगमित कर लेने की अन्धानुकरणवादी प्रवृत्ति ने तो भारत सहित कई देशों में काफ़ी नुक़सान पहुँचाया)। होना यह चाहिए था कि कोमिण्टर्न के सांगठनिक ढाँचे को बदल दिया जाता, उसे विश्व-पार्टी के बजाय मुख्यतः संघात्मक आधार पर पुनर्गठित किया जाता, यानी, विचारधारा की बुनियादी एकता के आधार पर वह एक संगठन होता जिसमें अलग-अलग देशों की पार्टियों की यह ज़िम्मेदारी स्वतंत्र और सुपरिभाषित होती कि वे अपने देशों में क्रान्ति का कार्यक्रम और रास्ता तय करें। पर ढाँचे के पुनर्गठन के बजाय कोमिण्टर्न को ही भंग कर दिया गया। इससे भविष्य में अन्तरराष्ट्रीय विचारधारात्मक संघर्ष में संशोधनवाद को लाभ मिला। अब आज की परिस्थितियों में यदि कुछ लोग सभी उत्तर-औपनिवेशिक देशों में नवजनवादी क्रान्ति के कार्यक्रम को मानने की शर्त रखते हुए मंच के बजाय कोई विश्व संगठन बनाना चाहते हैं तो वे दो-चार अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन करके ज़रूर बना लेंगे, पर वह किसी काम का नहीं होगा और कालान्तर में विसर्जित हो जायेगा। दूसरी ओर, विज्ञान के बजाय “ठोस उपलब्धियों” से उम्मीद पाल बैठने वाले भावुकतावादी क्रान्तिकारी बौद्धिक और पिछड़ी चेतना वाले कम्युनिस्ट कार्यकर्ता फिर कुछ दिनों के लिए झूठी उम्मीद पाल बैठेंगे ताकि जल्दी ही फिर और अधिक निराशा में डूब सकें।

हमारे देश में भी कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन के बौद्धिक हमदर्दों और युवा रंगरूटों में यह विज्ञान-विरोधी संकीर्ण अनुभववादी प्रवृत्ति आम है कि ‘अरे छोड़ो ये सैद्धान्तिक बातें, देखो, फलाँ संगठन कितना लड़ रहा है, कितनी कुर्बानी दे रहा है, क्या गज़ब चुनौती उपस्थित किया है सत्ता के सामने, वही सही होगा!’ यही संकीर्ण अनुभववाद है। यह मार्क्सवादी पद्धति की ऐसी-तैसी करना है! अपने समय के मज़दूर आन्दोलन में कई बार अलग-थलग पड़कर भी मार्क्स-एंगेल्स और उनके पक्षधर अपने विश्लेषण के आधार पर धारा के विरुद्ध खड़े रहे और इतिहास ने उन्हें सही साबित किया। रूस के तत्कालीन क्रान्तिकारी सामाजिक जनवादी आन्दोलन में लेनिन हमेशा विज्ञान के सहारे खड़े रहे और धारा के विरुद्ध तैरते रहे। माओ और चीन की पार्टी ने भी यदि पहले वाली लीक नहीं छोड़ी होती और केवल द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी पद्धति की पतवार से धारा के विरुद्ध नाव नहीं खेयी होती तो न 1949 की नवजनवादी क्रान्ति हो पाती, न ही 1966-76 की महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति।

पिछले एक लम्बे समय से भाकपा (माओवादी) के नेतृत्व में जारी सशस्त्र संघर्ष को क्रान्तिकारी वाम बौद्धिक हलकों में आशा के एक नये स्रोत के रूप में प्रक्षेपित किया जाता रहा है और इस हद तक महिमामण्डित किया जाता रहा है विचारधारात्मक-राजनीतिक लाइन पर कोई बहस ही सम्भव न हो सके। किसी समर्थक बुद्धिजीवी या निचले स्तर कैडर से सवाल कीजिए तो वे बस यही कहेंगे कि ‘हमारे साथी इतने वर्षों से लड़ रहे हैं, टिके हैं, अपार कुर्बानियाँ दी हैं और दण्डकारण्य में जनताना सरकार का एक मॉडल खड़ा किया है, लाइन पर और क्या बात करनी है? गौतम नवलखा, अरुंधति राय और जॉन मिर्डल भी हमारे मुक्त क्षेत्रों को देख आये और अभिभूत होकर आये? – यही है वह भावुकतावादी क्रान्तिवाद, जो अन्ततोगत्वा गहरी निराशा के दलदल में घसीट ले जाता है। हमारे स्पष्ट सवाल मार्क्सवादी-लेनिनवादी मानकों पर आधारित हैं। जिस नवजनवादी क्रान्ति और दीर्घकालिक लोकयुद्ध के फ्रेमवर्क में यह सशस्त्र संघर्ष चल रहा है, क्या वह पूरे भारत के उत्पादन सम्बन्धों (और क्रान्ति की मंज़िल) के ठोस अध्ययन पर आधारित है, क्या यह दण्डकारण्य के बाहर पूरे देश के ग्रामीण क्षेत्रों में लागू हो सकता है, देश के शहरों और गाँवों के 75 करोड़ सर्वहारा-अर्द्धसर्वहारा आबादी के बीच काम की पार्टी की क्या योजना है, नवजनवादी क्रान्ति के ‘लैण्ड टु द टिलर’ के रणनीतिक नारे को पार्टी ग्रामीण क्षेत्रों में कैसे लागू करेगी, ‘चार वर्गों के रणनीतिक संश्रय’ में खुशहाल मालिक किसानों के साथ ग्रामीण सर्वहारा को कैसे लायेगी, शहरों के मुख्यतः असंगठित 25-27 करोड़ (मुख्यतः असंगठित) सर्वहारा वर्ग को छोड़कर पिछड़ी उत्पादन प्रणाली से जुड़े पिछड़ी चेतना की उत्पीड़ित आबादी के “मुक्त द्वीप” बना लेने से भी क्या सर्वहारा क्रान्ति हो जायेगी? – भावुकतावादी क्रान्तिवादी कहता है, ‘छोड़िये इन बातों को, वे लड़ रहे हैं, उन्होंने दिखा दिया।’ अनुभववाद वैज्ञानिक तर्कणा को हमेशा से ही यही उत्तर देता आया है! हमारी यह स्पष्ट सोच है कि क्रान्ति की रणनीति एवं आम रणकौशल का निर्धारण सर्वोपरितः उत्पादन सम्बन्धों के मूलाधार और फिर अधिरचना के अध्ययन के आधार पर होता है, किसी एक इलाका-विशेष में खड़े सफल संघर्ष के मॉडल के आधार पर नहीं। पूरे देश की भू-राजनीतिक परिस्थितियों से वाक़िफ़ लोग जानते हैं कि जो अधिकतम लगभग 7-8 प्रतिशत दुर्गम पर्वतीय वन्य और दुर्गम क्षेत्र हैं, उनमें भी दण्डकारण्य जैसे इलाके विरले ही मिलेंगे। छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़-महाराष्ट्र सीमान्त क्षेत्र और झारखण्ड के एक हिस्से में छापामार कार्रवाइयाँ सम्भव हो सकती हैं, दण्डकारण्य के एक दुर्गम क्षेत्र में आधार इलाका लम्बे समय तक चलाया जा सकता है, पर विशाल भारत की विस्तीर्ण ग्रामीण क्षेत्रों के पूँजीवादी विकास और पिछड़ी किसानी अर्थव्यवस्था के क्षेत्रों में दीर्घकालिक लोकयुद्ध की सामरिक रणनीति सम्भव ही नहीं है, स्वयं भाकपा (माओवादी) का अनुभव भी यही बताता है, लेकिन वह उससे सीख लेने को तैयार नहीं है। वह अपने पुराने दुर्गम क्षेत्रों में टिके रहने और प्रतिरोध के पहलू को देखती है, लेकिन मैदानी क्षेत्रों की घोर विफलता और शहरी सर्वहारा के बीच लगभग पूर्ण विफलता या अनुपस्थिति के पहलू की अनदेखी करती है। भावुकतावादी क्रान्तिवादियों को हम समझाना चाहते हैं कि असमान विकास वाले पिछड़े पूँजीवादी देशों में आबादी के बहुलांश को पूँजीवादी देशों में आबादी के बहुलांश को पूँजीवादी उत्पादन एवं विनिमय की प्रणाली में समेट लेने के बावजूद कुछ पूँजीवाद-सहयोजित प्राक् पूँजीवादी अवस्थाओं के ऐसे दूरवर्ती द्वीप बचे रह जाते हैं, जहाँ की उत्पीड़ित जनता लम्बे समय तक सशस्त्र संघर्ष चलाती रहती है, लेकिन राज्यसत्ता के सामने अस्तित्व का संकट नहीं उपस्थित कर पाती। लातिन अमेरिका के कई देशों में छापामार संघर्ष चालीस और पचास वर्षों से जारी हैं। फिलिप्पींस की कम्युनिस्ट पार्टी पूँजीवादी विकास के केन्द्रों से दूर, सुदूरवर्ती दुर्गम ग्रामीण क्षेत्रों को आधार बनाकर लगभग आधी सदी से लड़ रही है, पर फिलिप्पींस की राज्यसत्ता के लिए वह कोई चुनौती नहीं है, क़ानून-व्यवस्था की एक ग़म्भीर समस्या है। सीमित अति उत्पीड़ित आबादी को लेकर हथियारबंद संघर्ष लम्बे समय तक जारी रखना और मुक्त क्षेत्र तक बना लेना एक बात है और पूरे देश की राज्यसत्ता को ध्वस्त करके नयी राज्यसत्ता स्थापित करने का मामला इससे सर्वथा अलग मामला है। सर्वहारा क्रान्ति हमेशा वैज्ञानिक दृष्टि और प्रणाली विज्ञान आधारित होगी, भावुकतावादी क्रान्तिवादी इसी बात को कभी नहीं समझ पाते।

भावुकतावादी क्रान्तिवादी, विशेषकर इस नस्ल के बुद्धिजीवी, पवित्रत्मा होते हैं पर वे इस बात को समझ ही नहीं पाते हैं कि संघर्ष के किसी कथित मॉडल की फिलहाली क़ामयाबी-नाक़ामयाबी से किसी क्रान्तिकारी संगठन के सही-ग़लत होने का फैसला नहीं किया जाना चाहिए। क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट का पैमाना हर हाल में मार्क्सवादी विज्ञान का प्रणाली-विज्ञान होना चाहिए। भावुकतावादी क्रान्तिवादियों को चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की ऐतिहासिक दसवीं कांग्रेस (1973) की रिपोर्ट का यह अंश बार-बार पढ़ना चाहिए, “यदि किसी की लाइन ग़लत है तो उसका पतन अवश्यम्भावी है, भले ही केन्द्रीय, स्थानीय स्तर पर और सेना के नेतृत्व पर उसका नियंत्रण हो, उसका पतन अवश्यम्भावी है। यदि किसी की लाइन सही है तो भले ही शुरू में उसके पास एक भी सैनिक न हो, बाद में सैनिक जुट जायेंगे, और भले ही (उसके पास) राजनीतिक सत्ता न हो, (बाद में) राजनीतिक सत्ता भी आ जायेगी। यह हमारी पार्टी के अनुभवों का और मार्क्स के समय से लेकर अब तक के अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट अनुभवों का नतीजा है।”

हमें माओ त्से-तुङ की यह शिक्षा कभी नहीं भूलनी चाहिए कि, “विचारधारात्मक और राजनीतिक लाइन का सही या ग़लत होना ही सब कुछ तय करता है।”

लेनिन की इस उक्ति के मर्म को समझा जाना ज़रूरी है, “ठोस परिस्थिति का ठोस विश्लेषण मार्क्सवाद की आत्मा है।”

एक कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी तर्कणा के सतत् विकास और ठोस परिस्थितियों के विश्लेषण के आधार पर निर्णय लेने और ज़िम्मेदारी तय करने की चुनौतीपूर्ण ज़िम्मेदारी से बने-बनाये फार्मूलों और अतीत के गौरवशाली इतिहास की आड़ लेकर बच नहीं सकता, उसे यह काम तो ख़ुद करना ही होगा। पूर्वजों के अनुभव आपको आम दिशा दिखाते हैं, पर पूर्वज आकर आपका काम नहीं कर जाते, न ही पूर्वजों की चली राह पर हूबहू चला जा सकता है। मार्क्सवाद विज्ञान है, धर्मशास्त्र नहीं। लेनिन के इस उद्धरण को रट लेना आसान है, पर व्यवहार में उतारना बेहद मुश्किल, “मार्क्सवाद एक निष्प्राण जड़सूत्र नहीं है, न ही यह सम्पूर्ण बना दिया गया, बना-बनाया, अपरिवर्तनीय मत है, बल्कि कार्रवाई का जीवन्त मार्गदर्शक है।”

सर्वहारा वर्ग का क्रान्तिकारी आशावाद विज्ञान पर आशावाद विज्ञान पर आधारित व्यावहारिक चीज़ होता है। वह मिथ्या आशाओं और सदिच्छाओं पर आधारित नहीं होता। क्रान्ति के विज्ञान की समझ, उस पर आधारित अपने देश के वर्ग-सम्बन्धों की समझ और उस पर आधारित सही कार्यक्रम एवं मार्ग की समझ के बिना कोई भी पार्टी क्रान्ति को अंजाम तक नहीं पहुँचा सकती। इनके अभाव में क्रान्तिकारी संघर्ष आगे बढ़कर भी ठहरावग्रस्त हो जाते हैं और टूट-बिखर जाते हैं। क्रान्ति अधैर्य और मात्र क्रान्तिकारी स्पिरिट से सम्भव नहीं। क्रान्ति मॉडलों का अनुकरण करके आगे नहीं बढ़ती, मार्क्सवाद-लेनिनवाद के आलोक में वह अपना पथसंधान स्वयं करती है। वैज्ञानिक समझ से रिक्त भावुकतावादी क्रान्तिवाद एक निम्न पूँजीवादी प्रवृत्ति है जो किसी भी देश में ठोस परिस्थितियों के ठोस अध्ययन, पूर्वाग्रह मुक्त सोच-विचार एवं बहस तथा क्रान्तिकारी सामाजिक प्रयोगों को बाधित करती है, उन्हें नुक़सान पहुँचाती है।

दिशा सन्धान – अंक 3  (अक्टूबर-दिसम्बर 2015) में प्रकाशित

फ़ासीवाद की बुनियादी समझ नुक्तेवार कुछ बातें

‘फ़ासीवाद सड़ता हुआ पूँजीवाद है’ (लेनिन)। यह एक परिघटना है जो साम्राज्यवाद के दौर में पूँजीवाद के आम संकट के गहराने के साथ जन्मी थी। अब विश्व पूँजीवाद के असाध्य ढाँचागत संकट और उससे निजात पाने के ‘नवउदारवादी’ नुस्खों के दौर में फ़ासीवादी राजनीति सभी पूँजीवादी देशों में विविध रूपों में सिर उठा रही है और विशेषकर भारत जैसे पिछड़े पूँजीवादी देशों में धार्मिक कटटरपंथी फ़ासीवाद एक शक्तिशाली उभार के रूप में सामने आ रहा है read more

दिल्ली सामूहिक बलात्कार काण्ड, जस्टिस वर्मा समिति की रिपोर्ट और सरकार का अपराध कानून (संशोधन) अध्यादेश, 2013

यह पूरा अध्यादेश स्त्री-विरोधी अपराधों के प्रश्न पर किसी संवेदनशीलता या राजनीतिक ईमानदारी से बना ही नहीं है, इसलिए इससे यह उम्मीद करना भी व्यर्थ है कि यह समस्याओं का कोई समाधान प्रस्तुत करेगा। वास्तव में, यह पूरी व्यवस्था ही स्त्री-प्रश्न का कोई समाधान पेश नहीं कर सकती है। स्त्री-प्रश्न के समाधान के लिए इस समूची पूँजीवादी पितृसत्तात्मक व्यवस्था की सीमा का अतिक्रमण करते हुए सोचने की आवश्यकता है। अधिकारों के विमर्श में कैद और सीमित रहने की बजाय इस सीमा का तोड़ कर मुक्ति की परियोजना के बारे में गम्भीरता से सोचने की ज़रूरत है। read more

कहां गईं स्त्रियां? – खट रही हैं भूमण्डलीय असेम्बली लाइन पर

भारत जैसे गरीब देशों की मेहनतकश स्त्रियां रोजमर्रें के आम जीवन से अनुपस्थित होती जा रही हैं। उन्हें देखना हो तो वहां चलना होगा जहां वे छोटे-छोटे कमरों में माइक्रोस्कोप पर  निगाहें गड़ाये सोने के सूक्ष्म तारों को सिलिकॉन चिप्स से जोड़ रही हैं, निर्यात के लिए सिले-सिलाए वस्त्र तैयार करने वाली फैक्टरियों में कटाई-सिलाई कर रही हैं, खिलौने तैयार कर रही हैं या फूड प्रोसेसिंग के काम में लगी हुई हैं। इसके अलावा वे बहुत कम पैसे पर स्कूलों में पढ़ा रही हैं, टाइपिंग कर रही हैं, करघे पर काम कर रही हैं, सूत कात रही हैं और पहले की तरह बदस्तूर खेतों में भी खट रही हैं। महानगरों में वे दाई-नौकरानी का भी काम कर रही हैं और ‘बार मेड’ का भी। अनुपस्थित और मौन होकर भी वे हमारे आसपास ही हैं। भूमण्डलीकरण की संजीवनी पी रहे वृद्ध पूंजीवाद के लिए शव-परिधान बुन रही हों शायद! क्या पता!

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