‘दिशा सन्धान’ क्यों?

‘दिशा सन्धान’ क्यों?

  • सम्‍पादक मण्‍डल 

हम ‘दिशा सन्धान’ के पहले अंक के साथ आपके बीच हैं। जैसा कि हमने पत्रिका से पहले जारी किये गये परिपत्र में बताया था, ‘दिशा सन्धान’ कई मायनों में उसी परियोजना की निरन्तरता में है, जो हमने करीब दो दशक पहले ‘दायित्वबोध’ के साथ शुरू की थी। कुछ वर्ष पहले कुछ बाध्यताओं के कारण ‘दायित्वबोध’ का प्रकाशन रुक गया था। उसके बाद से ही हम गम्भीर सैद्धान्तिक मुद्दों पर केन्द्रित एक नयी पत्रिका के प्रकाशन की आवश्यकता महसूस कर रहे थे और कुछ देर से सही लेकिन हम इस नयी पत्रिका के पहले अंक के साथ प्रस्तुत हैं।
निरन्तरता के बावजूद कुछ अर्थों में ‘दिशा सन्धान’ का स्वरूप और उद्देश्य थोड़े ज़्यादा व्यापक, ज़्यादा गम्भीर और ज़्यादा बहुआयामी हैं। इसका एक प्रमुख कारण पिछले दशक के दौरान दुनिया में हो रहे बदलाव हैं। 1990 में सोवियत संघ में नकली लाल झण्डे के गिरने के साथ शुरू हुआ पूँजीवादी विजयवाद समाप्त हो चुका है। विश्व पूँजीवादी व्यवस्था का संकट नयी सहस्राब्दि के शुरू होने से पहले ही गम्भीर रूप लेना शुरू कर चुका था और 2007 में अमेरिका में शुरू हुए सबप्राइम संकट के साथ इसने 1930 के दशक की महामन्दी के बाद सबसे बड़ी मन्दी का रूप ग्रहण कर लिया है। आज अधिकांश प्रेक्षक इस बात पर एकमत हैं कि ‘दूसरी महामन्दी’ कई मायनों में पहली महामन्दी से ज़्यादा संरचनागत है और इसके बाद किसी तेज़ी (बूम) का दौर नहीं आने वाला है। ज़्यादा से ज़्यादा कुछ समय के लिए मन्दी के प्रभावों को कुछ कम किया जा सकता है, जो कि अगले चक्र में और ज़्यादा भयंकर होकर उभरते हैं। हमेशा की तरह पूँजीपति वर्ग अपने मुनाफ़े की हवस से पैदा होने वाली मन्दी का बोझ आम मेहनतकश जनता के कन्धों पर डाल रहा है। आम मेहनतकश जनता भी इस ज़्यादती के ख़िलाफ़ दुनिया भर में सड़कों पर उतर रही है। जनान्दोलनों में छाया हुआ सन्नाटा भी टूट रहा है। अरब विश्व से लेकर, यूनान, स्पेन, इटली, अमेरिका और बंगलादेश तक में जनता सड़कों पर स्वतःस्फूर्त रूप से उतर रही है। आज की स्थिति का एक पहलू विश्व पूँजीवादी व्यवस्था का गहराता संकट और जनता के स्वतःस्फूर्त पूँजीवाद-विरोधी प्रतिरोध आन्दोलनों का फूटना है।
लेकिन एक दूसरा पहलू भी है, जो कि मौजूदा स्थिति को विशिष्ट बनाता है। जनता दुनिया भर में स्वयंस्फूर्त रूप से सड़कों पर उतर रही है क्योंकि उसके सब्र का प्याला छलक रहा है, लेकिन यह भी सच है कि इन स्वतःस्फूर्त जनउभारों को एक सही क्रान्तिकारी दिशा देने वाली हिरावल ताक़त आज किसी देश में मौजूद नहीं है। क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट आन्दोलन दुनिया भर में बिखरा हुआ है। पूँजीवाद अपने ढाँचागत संकटों के बावजूद मार्क्सवाद पर अपने वैचारिक-सांस्कृतिक हमले जारी रखे हुए है। दुनिया और देश के पैमाने पर अधिकांश कम्युनिस्ट ताक़तों के बीच या तो कठमुल्लावाद की प्रवृत्ति गहरायी से जड़ जमाये हुए है, या फिर धुरीविहीन “मुक्त-चिन्तन” और सारसंग्रहवाद की रुझान हावी है। कुछ लोग पुरानी क्रान्तियों से आलोचनात्मक सम्बन्ध स्थापित करते हुए नयी सदी के क्रान्तिकारी प्रयोग के विभिन्न आयामों को समझने की बजाय, उनका अन्धानुकरण करने पर आमादा हैं, तो कुछ अन्य लोग पुरानी क्रान्तियों के आलोचनात्मक विवेचन के बिना ही उन्हें ख़ारिज कर देने, और शून्य से नयी शुरुआत करने के मंसूबे बाँधे हुए हैं। इन दोनों रुझानों में साझा बात यह है कि दोनों ही बीसवीं सदी के महान समाजवादी प्रयोगों से किसी भी किस्म का आलोचनात्मक रिश्ता कायम नहीं करना चाहते हैं। ऐसे में, कम्युनिस्ट आन्दोलन दुनिया भर में विचारधारात्मक, राजनीतिक और कार्यक्रम-सम्बन्धी मसलों पर बौद्धिक तौर पर विभ्रम का शिकार है। यही कारण है कि अधिकांश हालिया जनान्दोलनों में क्रान्तिकारी कम्युनिस्टों का प्रभाव पर्याप्त नहीं रहा। उनकी बजाय अराजकतावाद, संघाधिपत्यवाद और ग़ैर-पार्टी क्रान्तिवादी धाराओं का प्रभाव इन आन्दोलनों पर ज़्यादा था। यही इन आन्दोलनों की असफलता का कारण भी बना। मिस्र में जनता के शानदार आन्दोलन के बाद इस्लामी कट्टरपन्थी ताक़तों का सत्ता में आना, ‘ऑक्युपाई वॉल स्ट्रीट’ आन्दोलन का विसर्जित हो जाना इसी को सिद्ध करता है। हर संकट हमेशा की तरह क्रान्तिकारी और प्रतिक्रियावादी सम्भावनाओं को जन्म देता है और अगर क्रान्तिकारी हिरावल क्रान्तिकारी सम्भावना को यथार्थ में बदलने के लिए मौजूद नहीं है, तो प्रतिक्रियावादी, फासीवादी ताक़तें प्रतिक्रियावादी सम्भावना को हक़ीकत में तब्दील कर देती हैं।
आज कम्युनिस्ट आन्दोलन में जो वैचारिक विभ्रम की स्थिति बनी हुई है, उसके केन्द्र में मार्क्सवाद के कोर सिद्धान्त हैं जैसे वर्ग, पार्टी, राज्यसत्ता, सर्वहारा वर्ग का अधिनायकत्व की अवधारणाएँ। सोवियत समाजवादी प्रयोग और चीन में समाजवादी प्रयोगों के पतन के बाद जो संशयवाद कम्युनिस्ट आन्दोलन में फैला, उसका असर आज भी मौजूद हैं। इन समाजवादी प्रयोगों की कोई सुसंगत आलोचनात्मक समझदारी न होने के कारण ही अन्धानुकरणवाद और ख़ारिज कर देने के दो अतिवादी छोर कम्युनिस्ट आन्दोलन में मौजूद हैं। जो संशयवाद की लहर में बह गये हैं वे पार्टी और वर्ग अधिनायकत्व की ही अवधारणा पर प्रश्न खड़े करने लगे हैं, और अराजकतावादी-संघाधिपत्यवाद के सिद्धान्तों को ही नये शब्दों में पेश कर रहे हैं, तो कुछ ऐसे भी हैं जो संशयवाद की लहर पर अतिरेकी प्रतिक्रिया देते हुए या नये का सन्धान करने की ज़हमत से बचने के लिए सोवियत समाजवाद और चीन के समाजवादी प्रयोगों के किसी भी आलोचनात्मक विवेचन के ख़िलाफ़ हैं। इस स्थिति के कारण ही आज कम्युनिस्ट आन्दोलन में एक वैचारिक विभ्रम और बिखराव की स्थिति बनी हुई है। इस स्थिति को दूर करने के लिए ज़रूरी है कि बीसवीं सदी के समाजवादी प्रयोगों का गम्भीर आलोचनात्मक विवेचन किया जाय, नयी क्रान्तियों में नये का सन्धान किया जाय और इस बात की भी निशानदेही की जाय कि बीसवीं सदी की महान और मौलिक क्रान्तियों से आज भी क्या सीखा जा सकता है; ज़रूरी है कि मार्क्सवादी सिद्धान्त के कोर तत्वों की हिफ़ाज़त की जाय और इस बात को मज़बूती के साथ स्थापित किया जाय कि नये के सन्धान का अर्थ नयी सदी की क्रान्तियों की रणनीति और आम रणकौशल में नये का सन्धान है, न कि मार्क्सवादी सिद्धान्त के मूलभूत और बुनियादी तत्वों को तिलांजलि दे देना; विश्व का कम्युनिस्ट आन्दोलन पहले भी ऐसे “मुक्त-चिन्तन” की पर्याप्त कीमत अदा कर चुका है और अब इस बाबत एक विचारधारात्मक संजीदगी की ज़रूरत है। इसके लिए इन सभी मुद्दों को सभी पूर्वाग्रहों को छोड़कर, खुले दिमाग़ के साथ बहस-मुबाहसे की ज़रूरत है और ‘दिशा सन्धान’ का एक लक्ष्य होगा कि वह ऐसी गम्भीर सैद्धान्तिक बहसों का मंच बने और कम्युनिस्ट आन्दोलन में मौजूद वैचारिक विभ्रम और अस्पष्टता को दूर करने में योगदान करे।
इसके अतिरिक्त, मार्क्सवाद पर विचारधारात्मक हमलों का सिलसिला थमा नहीं है। यह सच है कि पूँजीवाद स्वयं अपने ढाँचागत अन्तकारी संकट से बुरी तरह से ग्रस्त है; यह भी सच है कि नब्बे के दशक के पूर्वार्द्ध का पूँजीवादी विजयवादी उन्माद शान्त हो चुका है; लेकिन यदि पूँजीवाद आज संकट का शिकार है तो कम्युनिस्ट आन्दोलन भी आज बिखराव और वैचारिक विभ्रम का शिकार है। ऐसे में, पूँजीवाद के प्रचार तन्त्र ने हिरावल को संगठित होने से रोकने के लिए अपने विचारधारात्मक और सैद्धान्तिक हमले जारी रखे हैं। अपने सांस्कृतिक माध्यमों और भाड़े के बुद्धिजीवियों का वह इसमें कुशलतापूर्ण इस्तेमाल कर रहा है। ऐसे में, आज का एक अहम कार्यभार यह भी बन जाता है कि ऐसे विचारधारात्मक हमलों के बरक्स न सिर्फ मार्क्सवाद की दृढ़ता से हिफ़ाज़त की जाय, बल्कि इन हमलों का मुँहतोड़ जवाब भी दिया जाय और दिखलाया जाय कि एक बार फिर से, इन नये हमलों में कुछ भी नया नहीं है और दरअसल पुराने बुर्जुआ सिद्धान्तों को ही नयी चाशनी में परोस दिया गया है। यह भी ‘दिशा सन्धान’ के लक्ष्यों में से एक होगा।
ज़िन्दा लोग ज़िन्दा सवालों पर सोचते हैं। लिहाज़ा, हमारा एक मकसद होगा पूँजीवादी समाज और व्यवस्था से जुड़ी रोज़मर्रा की घटनाओं, विशेष घटनाओं और प्रतीक घटनाओं के गम्भीर वैचारिक विश्लेषण के ज़रिये आज की मानवद्रोही व्यवस्था और समाज की सच्चाई को बेपर्द करना। ‘दिशा सन्धान’ में हम नियमित तौर पर समसामयिक घटनाओं पर संजीदा विश्लेषात्मक टिप्पणियाँ देंगे।
हम उम्मीद करते हैं कि हम जो लक्ष्य अपने लिए तय कर रहे हैं, उस पर अनुशासन और नियमितता के साथ और अपने द्वारा तय मानकों और पैमानों के साथ वफ़ादार बने रहते हुए अमल करने में सफल होंगे और हमें यह भी उम्मीद है कि हमारे इस प्रयास में सभी सरोकार रखने वाले पाठक, जनता का पक्ष चुनने वाले बुद्धिजीवी और राजनीतिक कार्यकर्ता भी हमारा साथ देंगे। इन उम्मीदों के साथ ही हम ‘दिशा सन्धान’ का प्रवेशांक आपके हाथों में थमा रहे हैं।

दिशा सन्धान – अंक 1  (अप्रैल-जून 2013) में प्रकाशित

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