सोवियत समाजवादी प्रयोगों के अनुभव : इतिहास और सिद्धान्त की समस्याएँ (पाँचवीं किस्त)

सोवियत समाजवादी प्रयोगों के अनुभव : इतिहास और सिद्धान्त की समस्याएँ (पाँचवीं किस्त)

  • अभिनव सिन्हा

अध्याय V
परिशिष्ट

अलेक्ज़ैण्डर रैबिनोविच का इतिहास-लेखन : अन्तर्दृष्टि की दृष्टिहीनता

बोल्शेविक क्रान्ति और सोवियत समाजवादी प्रयोगों के बारे में इतिहास-लेखन को कई श्रेणियों में बाँटा जा सकता है। एक श्रेणी सोवियत समाजवादी प्रयोगों के जारी रहने के दौरान लिखे गये बोल्शेविक क्रान्ति और सोवियत समाजवाद के प्रयोगों के तत्कालीन विवरणों की है, जिसमें स्तुलोव जैसे इतिहासकारों द्वारा लिखे गये इतिहास-लेखन से लेकर बोल्शेविक क्रान्ति के साक्षी या उसमें हिस्सेदारी करने वाले बोल्शेविकों द्वारा लिखे गये इतिहास व संस्मरण आदि शामिल हैं। दूसरी श्रेणी उन तत्कालीन ग़ैर-बोल्शेविक प्रेक्षकों के इतिहास-लेखन, रिपोर्ताज व संस्मरणों की है, जिनमें मेंशेविकों से लेकर समाजवादी-क्रान्तिकारियों और अराजकतावादियों द्वारा लिखे गये इतिहास-लेखन व संस्मरणों को शामिल किया जा सकता है, जैसे कि सुखानोव, मिल्युकोव आदि द्वारा लिखित विवरण। तीसरी श्रेणी तमाम ऐसे मार्क्सवादी अध्येताओं की है जो कि सोवियत संघ से बाहर थे और जो वहाँ पूँजीवादी पुनर्स्थापना के पहले और बाद के दौर के साक्षी रहे, जिनमें मॉरिस डॉब, चार्ल्स बेतेलहाइम, पॉल स्वीज़ी आदि को शामिल किया जा सकता है। और चौथी श्रेणी उन इतिहासकारों की है जो कि सोवियत संघ से बाहर थे और ग़ैर-मार्क्सवादी थे, जिसमें कि चैम्बरलेन, ई.एच. कार, इज़ाक डॉइशर, मार्क फेरो व अलेक्ज़ैण्डर रैबिनोविच जैसे अध्येताओं को शामिल किया जा सकता है।

इस चौथी श्रेणी में कुछ ऐसे हैं जो बोल्शेविकों के प्रति सहानुभूति रखते हैं, हालाँकि बोल्शेविक क्रान्ति और सोवियत समाजवाद के प्रति उनका नज़रिया बुर्जुआ प्रत्यक्षवाद और अनुभववाद का नज़रिया है, जैसे कि कार व रैबिनोविच। कुछ ऐसे हैं जो कि बोल्शेविक पार्टी, ले‍निनवाद और सोवियत समाजवाद के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया रखते हैं, जिनमें मोटे तौर पर मार्क फेरो को भी शामिल किया जा सकता है। इनमें से कुछ त्रात्स्की के प्रति हमदर्दी रखने वाले लोग भी हैं, हालाँकि उन्हें सीधे तौर पर त्रात्स्कीपन्थी नहीं कहा जा सकता है।

एक पाँचवीं श्रेणी भी बनायी जा सकती है, जिसमें कि त्रात्स्की और उनके अनुयायियों के लेखन को शामिल किया जा सकता है। यह एक व्यापक श्रेणी है जिसमें आन्तरिक तौर पर काफ़ी वैविध्य है। इसमें स्वयं त्रात्स्की द्वारा किया गया इतिहास-लेखन ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, जिस पर हम अन्यत्र लिखेंगे। इन सारी श्रेणियों में हमने संशोधनवाद के दौर में सोवियत संघ में हुए इतिहास-लेखन को शामिल नहीं किया है, क्योंकि इसमें बेहद चालाकी के साथ तथ्यों का विकृतीकरण किया गया है और स्तालिन को संशो‍धनवादी तक बना देने का प्रयत्न किया गया है। सही मायने में इसे इतिहास-लेखन कहना ही मुश्किल है, यह प्रोपगैण्डा लेखन की श्रेणी में ज़्यादा फिट बैठेगा। इसलिए उसका हमने जि़क्र नहीं किया है। यह सच है कि स्तालिन के दौर में लिखे गये पार्टी इतिहास-लेखन की भी अपनी समस्याएँ हैं। मिसाल के तौर पर, विपक्ष में आने वाले सभी वामपन्थी या दक्षिणपन्थी धड़ों के विषय में, त्रात्स्की के विषय में और त्रात्स्की से चली बहसों के विषय में इन इतिहास-लेखनों में विस्तृत जानकारी नहीं मिलती, विशेष तौर पर, 1930 के बाद के दौर में। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि 1930 के दशक में विशेष तौर पर त्रात्स्की ने सोवियत संघ के बरक्स ए‍क प्रतिक्रान्तिकारी भूमिका निभायी थी। इसलिए इस दौर के सोवियत इतिहास-लेखन में एक निश्चित रूप में त्रात्स्की का चित्रण किया गया है। हमने प्रवृत्ति पर पहले टिप्पणी कर चु‍के हैं और अभी हम इस पर ध्यान केन्द्रित नहीं करेंगे।

फि़लहाल, हमारी दिलचस्पी चौथी श्रेणी में आने वाले एक अग्रणी इतिहासकार अलेक्ज़ैण्डर रैबिनोविच के लेखन में है जिनकी तीन पुस्तकें आज विश्व भर में बोल्शेविक क्रान्ति पर पिछले चार-पाँच दशकों में हुए सबसे अच्छे शोध-कार्यों में मानी जाती है : ‘प्रिल्यूड टू रिवोल्यूशन’, ‘दि बोल्शेविक्स कम टू पावर’ और ‘दि बोल्शेविक्स इन पावर’। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती है कि ये बहुमूल्य शोधकार्य हैं और हर मार्क्सवादी-लेनिनवादी को इनका अध्ययन कर लेना चाहिए। लेकिन जिस प्रकार ई.एच. कार का लेखन मूल दस्तावेज़ों के अध्ययन के आधार पर किया गया एक बहुमूल्य शोध होने के बावजूद अपने विशिष्ट विचारधारात्मक व राजनीतिक दृष्टिकोण के कारण अक्सर ग़लत नतीजों तक पहुँच जाता है, उसी प्रकार रैबिनोविच के शोध में भी तथ्यपरकता के बावजूद एक प्रकार की विचारधारा-अन्धता है (जो कि स्वयं एक विचारधारात्मक अवस्थिति ही है)। बल्कि कहना चाहिए कि रैबिनोविच का इतिहास-लेखन इस मायने में कार के इतिहास-लेखन से कमज़ोर ठहरता है। इसके निश्चित कारण हैं।

ई.एच. कार ब्रिटिश अनुभववाद व प्रत्यक्षवाद की धारा से आने वाले इतिहासकार हैं और साथ ही उन पर मार्क्सवादी विचारों के प्रभाव और विशेष तौर पर त्रात्स्की और त्रात्स्कीपन्थी विद्वानों (जैसे कि इज़ाक डॉइशर) के विचारों के प्रभाव से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। लेकिन रैबिनोविच प्रत्यक्षवाद की अमेरिकी धारा से आते हैं जिसके कारण उनके इतिहास-लेखन में तथ्यपरकता तो है, लेकिन साथ ही व्यक्तिवादी विश्लेषण का काफ़ी प्रभाव है। इसलिए जहाँ कार व्यक्तियों के प्रभावों का विश्लेषण करते हुए भी ढाँचागत कारकों को प्रधानता देते हैं, वहीं रैबिनोविच के लेखन में व्यक्तियों की विशिष्ट भूमिकाओं पर अतिरेकपूर्ण ज़ोर है और कई बार तमाम ऐतिहासिक परिवर्तनों के लिए भी व्यक्तियों की भूमिका को ढाँचागत कारकों के साथ द्वन्द्वात्मक अन्तर्क्रिया में नहीं बल्कि स्वतन्त्र रूप से जि़म्मेदार ठहराया गया है।

साथ ही, रैबिनोविच का इतिहास-लेखन मूलत: उस दौर में हुआ जिस दौर में सोवियत संघ संशोधनवादी नेतृत्व में पूँजीवादी पुनर्स्थापना के रास्ते पर काफ़ी आगे बढ़ चुका था। वहीं कार के 14 खण्डों के शुरुआती और सम्भवत: सबसे महत्वपूर्ण खण्ड 1950 से 1953 के बीच आ गये थे। सोवियत संघ उस समय द्वितीय विश्वयुद्ध के भयावह विनाश और बलिदानों से उबर कर समाजवादी निर्माण की दिशा में आगे बढ़ रहा था और दुनिया के नवस्वाधीन और राष्ट्रीय मुक्ति के लिए संघर्षरत देशों के लिए एक प्रेरणास्रोत था। यही कारण है कि अपनी तमाम आलोचनाओं के बावजूद कार सोवियत संघ को विश्व राजनीति में एक प्रगतिशील शक्ति मानते थे। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि संशयवाद के चरम पर पहुँचने की अवधि में हुआ रैबिनोविच का इतिहास-लेखन इस कारण से भी कार के इतिहास-लेखन से काफ़ी अलग है। लेकिन रैबिनोविच के इतिहास-लेखन का विश्लेषण इस आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। वह उनके इतिहास-लेखन के ठोस नमूनों के आधार पर किया जाना चाहिए और यहाँ हम यही करेंगे।

हम यहाँ मुख्य रूप से उनकी पुस्तक ‘प्रिल्यूड टू रिवोल्यूशन’ का विश्लेषण करेंगे। उनकी दूसरी पुस्तक ‘दि बोल्शेविक्स कम टू पावर’ के बारे में संक्षेप में कुछ प्रेक्षण हम अध्याय के मुख्य हिस्से में कर चुके हैं। रैबिनोविच की पहली पुस्तक का विश्लेषण उनके इतिहास-लेखन को समझने के लिए पर्याप्त है क्योंकि रैबिनोविच की मूल थीसिस उनकी पहली पुस्तक में ही आ गयी है। आगे की दोनों पुस्तकों में केवल उस थीसिस को पुष्ट किया गया है। इसका यह अर्थ नहीं कि उनकी बाद की दोनों पुस्तकों को नहीं पढ़ा जाना चाहिए। कारण यह है कि ये तीनों ही पुस्तकें क्रान्तिकारी रूस में दिन-प्रतिदिन क्या हो रहा था, कैसे हो रहा था, इसका एक जीवन्त चित्र पेश करती हैं। यदि पाठक रैबिनोविच के इतिहास-लेखन की कमज़ोरियों से परिचित है तो उसके लिए ये पुस्तकें उपयोगी साबित हो सकती हैं।

रैबिनोविच की मूल थीसिस है एक ‘विभाजित पार्टी’ की थीसिस। इसके अनुसार बोल्शेविक पार्टी कोई एकाश्मी पार्टी नहीं थी जो किसी भी प्रश्न के बिना लेनिन के नेतृत्व के मातहत काम करती थी। रैबिनोविच का यह दावा है कि अधिकांश आधिकारिक सोवियत इतिहास-लेखन में ऐसी तस्वीर पेश की गयी है जिसके अनुसार बोल्शेविक पार्टी लेनिन की इच्छा के अन्तर्गत लौह-अनुशासन व चट्टान जैसी मज़बूती के साथ काम करने वाली पार्टी थी, जिसमें लेनिन प्रश्नों से इतर थे। हालाँकि जब आप यह देखते हैं कि रैबिनोविच के अनुसार ये ‘आधिकारिक सोवियत इतिहास-लेखन’ क्या हैं, तो आप पाते हैं कि वे सभी संशोधनवाद के दौर में लिखी गयी पुस्तकें हैं। 1956 के पहले की जिस इतिहास की पुस्तक को रैबिनोविच बार-बार उद्धृत करते हैं वह है स्तुलोव की पुस्तक जो कि 1930 में छपी थी और इस पुस्तक को रैबिनोविच अपना दावा सिद्ध करने के लिए उद्धृत करते हैं कि बोल्शेविक पार्टी एक ‘विभाजित पार्टी’ थी। ‘बोल्शेविक पार्टी का इतिहास’ को रैबिनोविच उद्धृत नहीं करते हैं। न ही रैबिनोविच लेनिन और स्तालिन के मूल लेखन से उन्हें उद्धृत करते हैं। अगर वे लेनिन और स्तालिन को उद्धृत करते भी हैं तो अधिकांशत: अन्य लोगों द्वारा लिखे गये संस्मरणों से करते हैं, जिसमें कि संस्मरण लेखकों ने स्मृति के आधार पर बताया है कि अमुक अवसर पर लेनिन या स्तालिन ने क्या कहा। कहीं-कहीं प्राव्दा व अन्य पत्र-पत्रिकाओं से लेनिन व स्तालिन को उद्धृत किया गया है, लेकिन बेहद कम। स्तालिन को तो कई जगह इरादतन ग़लत उद्धृत किया गया है और उनकी अवस्थितियों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है। साथ ही, जिन लोगों के संस्मरणों को सबसे ज़्यादा उद्धृत किया गया है, उनमें से अधिकांश मेंशेविक हैं। त्रात्स्की को ज़रूर उद्धृत किया गया है, विशेष तौर पर उनकी रचनाओं ‘रूसी क्रान्ति का इतिहास’ और ‘स्तालिन्स स्कूल ऑफ़ फ़ॉल्सीफ़ि‍केशन’ को। लेकिन त्रात्स्की को भी केवल तभी उद्धृत किया गया है, जब रैबिनोविच ‘विभाजित पार्टी’ के अपने सिद्धान्त को सिद्ध करने में त्रात्स्की को मददगार पाते हैं। जहाँ-जहाँ त्रात्स्की का इतिहास-लेखन ‘विभाजित पार्टी’ के रैबिनोविच के सिद्धान्त के विपरीत खड़ा है, वहाँ-वहाँ त्रात्स्की के लेखन की भी उपेक्षा कर दी गयी है।

सच्चाई यह है कि न तो लेनिन के लेखन में, न ही स्तालिन के लेखन में और न ही किसी अन्य बोल्शेविक नेता के लेखन में बोल्शेविक पार्टी की ऐसी तस्वीर मिलती है जिसमें लेनिन का नेतृत्व प्रश्नेतर हो और उनकी इच्छा के मातहत पूरी पार्टी एकाश्मी रूप से एकजुट हो। यहाँ तक कि ‘बोल्शेविक पार्टी का इतिहास’ में भी ऐसी तस्वीर नहीं पेश की गयी है, जिसे बुर्जुआ इतिहासकार व विद्वान सबसे ज़्यादा शक की निगाह से देखते हैं। साथ ही, 1956 से पहले लिखे गये सोवियत इतिहास लेखन में भी ऐसी कोई तस्वीर नहीं मिलती। कारण यह कि ऐसी तस्वीर पेश करने की सोवियत इतिहासकारों को कोई आवश्यकता नहीं थी। ऐसी आवश्यकता संशोधनवादियों और सामाजिक-फ़ासीवादियों की थी जो कि पार्टी के प्रति एकनिष्ठा के नाम पर पूँजीवादी पथगामियों के विरुद्ध हर प्रतिरोध को ”प्रतिक्रान्तिकारी” क़रार देना चाहते थे। यही कारण है कि 1956 के पहले और विशेष तौर पर 1930 के दशक के पहले सोवियत इतिहास-लेखन की किस पुस्तक में ऐसी एकाश्मी पार्टी का मॉडल पेश किया जा रहा था, अलेक्ज़ैण्डर रैबिनोविच नहीं बता पाते हैं। ग़ौरतलब है कि 1930 के दशक के मध्य से सोवियत संघ आन्तरिक और और बाह्य, दोनों ही तौर पर एक आपात स्थिति से गुज़र रहा था। फ़ासीवाद का ख़तरा सिर पर मँडरा रहा था; पार्टी में आन्तरिक कलह, षड्यन्त्र और दुरभिसन्धियों का माहौल ‘महान शुद्धीकरण’ के बाद भी समाप्त नहीं हुआ था और समाजवादी संक्रमण की समस्याओं की समुचित समझदारी न होने के कारण राज्यसत्ता में नौकरशाहाना विकृतियाँ बढ़ती जा रही थीं। इस दौर में जो इतिहास-लेखन हुआ, उसकी अपनी समस्याएँ हैं। मगर फिर भी उनकी तुलना संशोधनवाद के दौर में हुए इतिहास-लेखन से नहीं की जा सकती है।

अब हम उनकी पहली पुस्तक ‘प्रिल्यूड टू रिवोल्यूशन’ के विश्लेषण के आधार पर दिखलायेंगे कि रैबिनोविच का लेखन दस्तावेज़ी शोध और तथ्यों में समृद्ध होने के बावजूद अपने विचारधारात्मक व राजनीतिक पूर्वाग्रहों के कारण बोल्शेविक क्रान्ति के इतिहास की एक असन्तुलित और कहीं-कहीं विकृत तस्वीर पेश करता है।

फ़रवरी से जुलाई के दौर के विषय में रैबिनोविच : ‘विभाजित पार्टी’ की अवधारणा को सिद्ध करने का व्यर्थ प्रयास

‘प्रिल्यूड टू रिवोल्यूशन’ के 1991 में प्रकाशित हुए मिडलैण्ड संस्करण की प्रस्तावना के प्रारम्भ में ही रैबिनोविच अपने उद्देश्य को स्पष्ट कर देते हैं। वह लिखते हैं कि 1964 में ख्रुश्चेव के सत्ताच्युत होने के बाद ”स्तालिनवादी ऑर्थोडॉक्सी” पुन: सशक्त हो गयी है और फिर सोवियत इतिहास के बारे में सभी पाश्चात्य अध्येताओं की रचनाओं को हमले का निशाना बनाना शुरू कर दिया गया है। पाश्चात्य प्रेक्षकों के लिए ख्रुश्चेव प्यारा था और ब्रेझनेव उतना प्यारा नहीं था, तो यह सहज ही समझा जा सकता है। ब्रेझनेव का दौर अमेरिका के साथ सामाजिक-साम्राज्यवाद की प्रतिस्पर्द्धा के अभूतपूर्व उभार का दौर था, जबकि ख्रुश्चेव को निश्चय ही पूँजीवादी पुनर्स्थापना के अगुवा के रूप में पश्चिमी विश्व में प्रतिष्ठा प्राप्त थी। रैबिनोविच के अनुसार ब्रेझनेव के दौर के सोवियत इतिहासकारों के द्वारा उनकी रचनाओं को विशेष तौर पर निशाना बनाया गया क्योंकि उनके शोध ने ठोस प्रमाणों के आधार पर दिखलाया था कि लेनिन के नेतृत्व के अन्तर्गत एकजुट एकाश्मी पार्टी की स्तालिनवादी अवधारणा झूठ है और साथ ही यह भी दिखलाया कि सोवियत इतिहास-लेखन के विपरीत जुलाई में पेत्रोग्राद में हुआ मज़दूरों व सैनिकों का प्रदर्शन कोई शान्तिपूर्ण प्रदर्शन नहीं था, बल्कि एक बग़ावत थी।

यह स्वाभाविक ही है कि एक बुर्जुआ इतिहासकार होने के नाते रैबिनोविच 1953-56 के पहले और बाद के दौर के बीच फ़र्क़ नहीं करते। उनके लिए संशोधनवादी दौर और संशोधनवाद के पहले के दौर के बीच कोई अन्तर नहीं है। उल्टे ख्रुश्चेव उनके लिए एक सुधारक था जबकि ख्रुश्चेव के जाने के बाद ब्रेझनेव के दौर में स्तालिनवाद की वापसी हो गयी थी। शीतयुद्ध के दौर में सारे अमेरिकी इतिहास-लेखन की यह एक साझा थीम है और इसके बारे में हमें ज़्यादा कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन असल मुद्दा यहाँ यह है कि रैबिनोविच के लिए ‘सोवियत इतिहास-लेखन’ का क्या अर्थ है? चूँकि वे संशोधनवाद और क्रान्तिकारी मार्क्सवाद-लेनिनवाद में कोई फ़र्क़ नहीं करते इसलिए लाज़ि‍मी है कि वे 1953-56 के पहले के सोवियत इतिहास-लेखन और 1960 के दशक से हुए सोवियत इतिहास-लेखन में कोई अन्तर नहीं करेंगे। लेकिन अगर वे फ़र्क़ न करते और सोवियत इतिहास-लेखन में 1953-56 से पहले हुए इतिहास-लेखन को भी शामिल करते तो बेहतर होता। वे अपने ”सोवियत इतिहास-लेखन” में केवल 1956 के बाद की रचनाओं का जि़क्र करते हैं। वे 1930 में छपी स्तुलोव की पुस्तक का जि़क्र करते हैं, लेकिन यह साबित करने के लिए कि उनकी ‘विभाजित पार्टी’ की अवधारणा सही है। यानी कि स्तुलोव की पुस्तक को वे सोवियत इतिहास-लेखन का प्रातिनिधिक उदाहरण नहीं मानते हैं क्योंकि उनके अनुसार वह किसी एकाश्मी बोल्शेविक पार्टी का चित्र नहीं पेश करती है। स्तुलोव के अतिरिक्त, वे 1956 के पहले के किसी इतिहास-लेखन का जि़क्र नहीं करते, हालाँकि वे 1956 के पहले लिखे गये तमाम रिपोर्ताजों व संस्मरणों का जि़क्र ज़रूर करते हैं। लेकिन केवल इसी आधार पर उनका यह दावा रद्द हो जाता है कि सोवियत इतिहास-लेखन में लेनिन के नेतृत्व में एकाश्मी तौर पर एकजुट बोल्शेविक पार्टी की तस्वीर पेश की गयी है, कि न तो 1956 के पहले की किसी भी इतिहास की रचना में ऐसी कोई तस्वीर मिलती है और न ही लेनिन या स्तालिन या किसी अन्य बोल्शेविक के लेखन में ऐसी कोई तस्वीर मिलती है। यहाँ तक कि ‘बोल्शेविक पार्टी का इतिहास’ में भी ऐसी कोई तस्वीर नहीं मिलती है। इन सभी स्रोतों में जो तस्वीर मिलती है वह एक ऐसी पार्टी की तस्वीर है जिसमें दो लाइनों का तीखा और जीवन्त संघर्ष लगातार जारी था और जो जनवादी केन्द्रीयता के बुनियादी उसूलों पर काम कर रही थी। यह सम्भव है कि स्तालिन के दौर में हुए पार्टी इतिहास-लेखन की कुछ अपनी समस्याएँ हों। लेकिन पार्टी के भीतर शुरू से ही जारी तीखे दो लाइनों के संघर्ष की तस्वीर उसमें भी मिल जाती है।

रैबिनोविच पार्टी के भीतर जारी दो लाइनों के संघर्ष, लेनिन से विभिन्न नेताओं के अलग-अलग समय पर मौजूद विचारधारात्मक व राजनीतिक मतभेदों व बहसों, व अलग-अलग बोल्शेविकों द्वारा कुछ मौक़ों पर पार्टी अनुशासन की अवहेलना की घटनाओं का इस्तेमाल यह सिद्ध करने में करते हैं कि बोल्शेविक पार्टी विभिन्न प्रकार के समूहों का एक समुच्चय थी। इसमें विभिन्न लक्ष्य व विभिन्न हित रखने वाले अलग-अलग गुट थे जो आपस में संघर्षरत रहते थे। रैबिनोविच यहाँ तक दावा करते हैं कि जुलाई 1917 के ”विद्रोह” के समय तक पार्टी के भीतर सत्ता के तीन केन्द्र काम कर रहे थे: केन्द्रीय कमेटी, बोल्शेविक सैन्य संगठन और पीटर्सबर्ग पार्टी कमेटी। उनके अनुसार, इन तीनों केन्द्रों के अलग-अलग हित थे और अलग-अलग लक्ष्य थे। सैन्य संगठन और पीटर्सबर्ग कमेटी अपनी स्वायत्तता को बढ़ाने के लिए लगातार संघर्ष करते रहते थे और केन्द्रीय कमेटी उन पर अपने वर्चस्व को स्थापित करने के लिए लगातार प्रयत्न करती रहती थी। इस दावे को साबित करने के लिए दो प्रकार के वाकयों का सहारा लिया जाता है : पहला, पार्टी की केन्द्रीय कमेटी, पीटर्सबर्ग कमेटी और सैन्य संगठन में और इन तीनों के बीच जारी राजनीतिक बहसों की घटनाएँ और साथ ही पार्टी अनुशासन व पार्टी द्वारा तय कार्यदिशा की अवहेलना की व्यक्तिगत घटनाओं का (जिनमें से कई इस वजह से हुई थीं क्योंकि पार्टी की केन्द्रीय कमेटी अपने फ़ैसलों को निम्नतर इकाइयों या जि़म्मेदार व्यक्तियों तक समय पर सम्प्रेषित नहीं कर पायी थी)। बहसों का कारण कई बार ठोस परिस्थितियों के ठोस विश्लेषणों में मौजूद फ़र्क़ था तो कई बार निम्नतर इकाइयों की जनदबाव में आकर विश्लेषण व कार्रवाई करने की प्रवृत्ति। उपरोक्त आधार पर रैबिनोविच बाकी पुस्तक में यह सिद्ध करने का प्रयास करते हैं कि बोल्शेविक पार्टी एक ‘विभाजित पार्टी’ थी और एक ‘विभाजित पार्टी’ होने के कारण ही उसमें यह क्षमता थी कि वह आगे चलकर सत्ता पर क़ब्ज़ा कर पायी। यह सिद्ध करने के प्रयास में कई मौक़ों पर वे तथ्यों में ही हेर-फेर करते हैं, जिन पर हम आगे आयेंगे।

कहने की आवश्यकता नहीं कि यहाँ पर रैबिनोविच के उदारवादी बुर्जुआ पूर्वाग्रह स्पष्ट रूप से प्रकट हो गये हैं। बोल्शेविक पार्टी जब तक (रैबिनोविच के अनुसार) किसी लौह-अनुशासन में नहीं काम कर रही थी और उसका ढाँचा भी किसी भी पश्चिमी बुर्जुआ पार्टी के समान असंगत और वैविध्यपूर्ण समूहों व गुटों के एक ढीले-ढाले समुच्चय जैसा था, तब तक वह प्रगतिशील और कामयाब थी। इस ढीले-ढालेपन को ”आन्तरिक जनवाद” का पर्याय माना गया है! इसलिए ‘विभाजित पार्टी’ होना रैबिनोविच के लिए कोई नकारात्मक बात नहीं थी, बल्कि बोल्शेविक पार्टी की शक्ति का परिचायक थी। समझा जा सकता है कि त्रात्स्कीपन्थियों को रैबिनोविच का इतिहास-लेखन क्यों काफ़ी पसन्द आया है। त्रात्स्की जब भी अल्पसंख्या में होते थे जो वे गुटों के अस्तित्व की हिमायत करने लगते थे और जब बहुसंख्या में होते थे तो नौकरशाह होने की हद तक ”अनुशासन” की हिमायत करने लगते थे। चूँकि ऐतिहासिक तौर पर बोल्शेविक पार्टी के भीतर चली बहस में वे अन्त तक अल्पसंख्या में रहे इ‍सलिए उनका और उनके अनुयायियों का गुटवाद और ”विभाजित पार्टी” की अवधारणा का समर्थक होना स्वाभाविक ही है। यही कारण है कि तमाम त्रात्स्कीपन्थी वेबसाइटों ने रैबिनोविच की पुस्तक की मूलत: प्रशंसामूलक समीक्षाएँ प्रस्तुत की हैं।

‘विभाजित पार्टी’ की अपनी अवधारणा को सिद्ध करने के लिए पहली पुस्तक में रैबिनोविच ने 10 जून 1917 के रद्द कर दिये गये विरोध प्रदर्शन और 3-5 जुलाई के दौरान हुए जनउभार की घटनाओं का अपना विश्लेषण पेश किया है। तथ्यों व दस्तावेज़ों के अध्ययन के मामले में यह विश्लेषण समृद्ध है और आलोचनात्मक तौर पर पढ़े जाने पर यह विवरण किसी मार्क्सवादी-लेनिनवादी के लिए भी उपयोगी हो सकता है। लेकिन जहाँ तक तथ्यों के वैज्ञानिक व तार्किक विश्लेषण का प्रश्न है, यह विश्लेषण अमेरिकी समाजशास्त्रीय प्रत्यक्षवादी और व्यक्तिवादी विश्लेषण की सीमाओं का अतिक्रमण नहीं कर पाता है।

3-5 जुलाई की घटनाओं का विवरण पेश करके रैबिनोविच दो बातें सिद्ध करना चाहते हैं: पहला, कि ये घटनाएँ शान्तिपूर्ण नहीं थीं और इस दौरान हिंसा हुई थी; दूसरा यह कि तृणमूल धरातल पर काम करने वाले बोल्शेविक सैनिकों और मज़दूरों को सशस्त्र विद्रोह के लिए तैयार कर रहे थे। यानी कि रैबिनोविच के अनुसार सोवियत विवरणों के विपरीत, 3-5 जुलाई को कोई शान्तिपूर्ण विरोध प्रदर्शन नहीं बल्कि एक विद्रोह हुआ था और साथ ही यह कि बोल्शेविक पार्टी के लोग इस विद्रोह की तैयारियों में शामिल थे। आइये देखते हैं कि इन दावों के आधारभूत आग्रह क्या हैं और इनमें कितनी सच्चाई है।

जैसा कि हमने पहले बताया रैबिनोविच के लिए सोवियत विवरणों में लेनिन, स्तालिन और यहाँ तक त्रात्स्की का लेखन नहीं शामिल है; उनके लिए सोवियत स्रोतों का अर्थ है केवल संशोधनवादी इतिहासकारों की रचनाएँ। वे ‘बोल्शेविक पार्टी का इतिहास’ तक को उद्धृत नहीं करते, जो कि रैबिनोविच के मानकों के अनुसार सर्वाधिक असुधारणीय रूप से ”स्तालिनवादी” पुस्तक है! इसलिए हम लेनिन, स्तालिन और यहाँ तक कि त्रात्स्की के विवरणों में जाकर देखेंगे कि उन्होंने 3-5 जुलाई के प्रदर्शन के बारे में क्या लिखा है और रैबिनोविच के दावे सही हैं या नहीं।

लेनिन ने मध्य-जुलाई से लेकर जुलाई के अन्त के दौर में कई ऐसे लेख लिखे जिनमें 3-5 जुलाई की घटनाओं का एक विश्लेषण पेश किया गया है। इनमें प्रमुख हैं : ‘नारों के बारे में’, ‘तीन संकट’, ‘एक उत्तर’। इन तीनों लेखों में लेनिन ने जुलाई के जनउभार के बारे में कुछ बातें स्पष्ट कर दी हैं : पहला, 3-5 जुलाई का प्रदर्शन शान्तिपूर्ण नहीं था, हालाँकि हिंसा की शुरुआत प्रतिक्रान्तिकारी गिरोहों और सरकार के दस्तों द्वारा की गयी थी; दूसरा, यह महज़़ प्रदर्शन नहीं था, बल्कि उससे कुछ ज़्यादा था, हालाँकि इसे क्रान्तिकारी विद्रोह की संज्ञा भी नहीं दी जा सकती है; तीसरा, बोल्शेविक पार्टी ने इस जनउभार को पहले रोकने का प्रयास किया था क्योंकि यह अपरिपक्व सशस्त्र बग़ावत में तब्दील हो सकता था और जब उसे रोकना सम्भव नहीं रहा तो पार्टी ने उसे अधिकतम सम्भव ‘शान्तिपूर्ण और संगठित’ बनाने का प्रयास किया।

आइये देखते हैं कि लेनिन इसके बारे में क्या लिखते हैं। ‘तीन संकट’ नामक लेख में लेनिन लिखते हैं कि रूसी क्रान्ति के विकास में फ़रवरी क्रान्ति के बाद तीन क्रान्तिकारी संकट उत्पन्न हुए हैं : पहला, 20-21 अप्रैल का संकट, दूसरा, 10-18 जून का संकट और तीसरा, 3-5 जुलाई का संकट। ये तीनों ही संकट प्रदर्शनों के रूप में प्रकट हुए लेकिन वे महज़़ प्रदर्शन नहीं रहे बल्कि जनता की क्रान्तिकारी भावना की अभिव्यक्ति बनते हुए प्रदर्शन से आगे की मंजि़ल में पहुँच गये, हालाँकि उन्हें क्रान्ति का प्रयास नहीं क़रार दिया जा सकता है। लेनिन लिखते हैं :

”तीसरा संकट 2 जुलाई को बोल्शेविकों द्वारा इसे रोकने के प्रयासों के बावजूद 3 जुलाई को फूट पड़ा। 4 जुलाई को यह अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचने के साथ ही 5 और 6 जुलाई को इसने प्रतिक्रान्ति के तीव्र विस्फोट को जन्म दिया। समाजवादी-क्रान्तिकारियों और मेंशेविकों के ढुलमुलपन ने अपने आपको स्पिरिदिनोवा व अन्य कई समाजवादी-क्रान्तिकारियों की इस घोषणा में अभिव्यक्त किया कि सारी सत्ता सोवियतों को स्थानान्तरित कर दी जानी चाहिए, और साथ ही मेंशेविक अ‍न्तरराष्ट्रीयतावादियों के ढुलमुलपन ने भी इसी विचार को अभिव्यक्त करने में अपने आपको प्रकट किया, जो कि पहले इस विचार का विरोध कर रहे थे।

”इन सभी घटनाओं को उनके अन्तर्सम्बन्धों में देखा जाये तो अन्तिम और सम्भवत: सबसे अनुदेशात्मक निर्णय जो कि हमारे सामने आता है वह यह है कि इन तीनों संकटों ने अपने आपको किसी न किसी प्रकार के प्रदर्शन में प्रकट किया जो कि हमारी क्रान्ति के इतिहास में नया है, ऐसे प्रदर्शन में जो अधिक जटिल प्रकार हैं जिसमें आन्दोलन लहरों में आगे बढ़ता है, जिसके दौरान आकस्मिक गिरावट के बाद तीव्र उभार आता है, जिसमें क्रान्ति और प्रतिक्रान्ति अधिक विकट हो जाते हैं, और मध्यमार्गी तत्व कमोबेश व्यापक दौर के लिए समाप्त हो जाते हैं।

”इन तीनों ही संकटों में, आन्दोलन ने एक प्रदर्शन का रूप लिया। एक सरकार-विरोधी प्रदर्शन – जो कि घटनाओं का सर्वाधिक सटीक, औपचारिक विवरण होगा। लेकिन वास्तव में ये कोई साधारण प्रदर्शन नहीं थे; यह किसी प्रदर्शन से कहीं ज़्यादा थे, लेकिन किसी क्रान्ति से कम थे। यह क्रान्ति और प्रतिक्रान्ति का एक साथ होने वाला विस्फोट थे, मध्यमार्गी तत्वों का तीव्र और कई बार लगभग अचानक होने वाला ख़ात्मा थे, जब सर्वहारा और बुर्जुआ तत्व तूफ़ानी रूप में प्रकट हुए।” (वी.आई. लेनिन, 1974, तीन संकट, कलेक्टेड वर्क्स, खण्ड – 25, प्रोग्रेस पब्लिशर्स, मॉस्को, पृ. 172-73)

इस उद्धरण से स्पष्ट है कि लेनिन 3-5 जुलाई के प्रदर्शन को महज़़ साधारण शान्तिपूर्ण प्रदर्शन नहीं मानते थे। ऐसे में प्रश्न उठता है कि रैबिनोविच लेनिन को उद्धृत क्यों नहीं करते? वे महज़़ संशोधनवादी इतिहासकारों के विवरणों को लेकर यह दावा क्यों करते हैं कि सभी आधिकारिक सोवियत विवरणों में 3-5 जुलाई के प्रदर्शनों को साधारण शान्तिपूर्ण प्रदर्शन क़रार दिया गया है? क्या लेनिन के लेखन को सोवियत स्रोत नहीं माना जाना चाहिए? आइये देखते हैं कि इन प्रदर्शनों में हुई हिंसा के विषय में लेनिन का क्या कहना है :

”यह ग़ौर करना किसी भी मानक से महत्वपूर्ण बात है कि 4 जुलाई को गोलियाँ चलने के बारे में रिपोर्ट छापने वाला पहला बुर्जुआ विक्षिप्त रूप से बोल्शेविक-विरोधी अख़बार था उसी दिन का सांयकालीन बिर्जेव्स्का। और इसी रपट में यह बताया जाता है कि गोली चलना प्रदर्शनकारियों की ओर से नहीं शुरू किया गया था, और जो पहली गोलियाँ चलीं थीं वे उनके ख़ि‍लाफ़ चलायी गयी थीं!! ज़ाहिर है कि ”समाजवादी” कैबिनेट के ”रिपब्लिकन” अधिवक्ता ने बिर्जेव्स्का की गवाही के बारे में खामोश रहना पसन्द किया है!! और फिर भी इस पूर्ण रूप से बोल्शेविक-विरोधी बिर्जेव्स्का की गवाही जो कुछ हुआ था और हमारी पार्टी जिस रूप में इसे देखती है, उस सामान्य तस्वीर से पूरी तरह से मेल खाता है। अगर यह कोई सशस्त्र विद्रोह होता, तो, ज़ाहिर है, विद्रोहियों ने प्रदर्शन का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों पर गोलियाँ नहीं चलायी होतीं बल्कि कुछ निश्चित बैरकों और कुछ निश्चित इमारतों को घेर लिया होता; उन्होंने कुछ निश्चित सैन्य इकाइयों का सफ़ाया कर दिया होता, आदि। वहीं दूसरी ओर, अगर यह सरकार के ख़ि‍लाफ़ एक प्रदर्शन था, जिसके बरक्स सरकार के समर्थकों का जवाबी प्रदर्शन हो रहा था, तो यह बिल्कुल स्वाभाविक था कि प्रतिक्रान्तिकारी पहले गोलियाँ चलायें, आंशिक तौर पर इसलिए कि वे प्रदर्शनकारियों की इतनी बड़ी संख्या देखकर क्रुद्ध थे, और आंशिक तौर पर इसलिए कि उनका इरादा प्रदर्शनकारियों को उकसाना था। और यह भी उतना ही स्वाभाविक था कि प्रदर्शनकारी गोलियों का जवाब गोलियों से दें।

”वास्तव में, (मृत लोगों) की प्रकाशित सूचियों पर एक सरसरी निगाह डालने से भी यह साफ़ हो जाता है कि उसमें दो प्रमुख समूह थे, कज़्ज़ाक और नाविक, और उन दोनों के ही लोग बराबर संख्या में मारे गये थे। अगर वास्तव में कोई सशस्त्र विद्रोह करना सशस्त्र नाविकों का इरादा होता जो कि दस हज़ार की संख्या में मज़दूरों और सैनिकों, विशेष तौर पर, मशीनगनर्स के साथ शामिल होने के लिए 4 जुलाई को पेत्रोग्राद में पहुँचे थे, तो क्या ऐसा होना सम्भव होता?

”निश्चित तौर पर, कज़्ज़ाकों और सशस्त्र विद्रोह का विरोध करने वाले अन्य लोगों में मृतकों की संख्या उस सूरत में दस गुना ज़्यादा होती, क्योंकि इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता है कि पेत्रोग्राद की सड़कों पर 4 जुलाई के दिन सशस्त्र आबादी के भीतर बोल्शेविकों का वर्चस्व स्थापित था…

”अगर मृतकों की संख्या दोनों पक्षों में कमोबेश समान है, तो यह सिद्ध करता है कि गोलियाँ चलाने की शुरुआत प्रतिक्रान्तिकारियों की तरफ से की गयी थी और प्रदर्शनकारियों ने बस गोलियों से इसका जवाब दिया था…

”अन्त में, प्रेस में आयी निम्न सूचना बेहद महत्वपूर्ण है : 4 जुलाई को प्रदर्शनकारियों और प्रति-प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़प में कज़्ज़ाकों की मौत होने की सूचना है। ऐसी झड़पें ग़ैर-क्रान्तिकारी काल में भी होती हैं, अगर आबादी उद्वेलित है; मिसाल के लिए, लातिनी देशों में, विशेषकर दक्षिण में, तो ऐसी घटनाएँ आम हैं। 4 जुलाई के बाद बोल्शेविकों के भी मारे जाने की ख़बरें हैं, जब कि उत्तेजित प्रदर्शनकारियों और प्रति-प्रदर्शनकारियों के बीच कोई टकराव नहीं हो रहा था, और इसलिए एक निःशस्त्र व्यक्ति की एक सशस्त्र व्यक्ति द्वारा हत्या एक निर्मम हत्या के अलावा कुछ नहीं था। श्पालेर्नाया मार्ग पर 6 जुलाई को बोल्शेविक वॉइनोव की हत्या ऐसी ही हरक़त था।” (वी.आई. लेनिन, 1974, एक उत्तर, कलेक्टेड वर्क्स, खण्ड-25, प्रोग्रेस पब्लिशर्स, मॉस्को, पृ. 216-217)

लेनिन के इस उद्धरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि लेनिन इस बात से अनभिज्ञ नहीं थे कि 3-5 जुलाई के प्रदर्शनों के दौरान हिंसा हुई थी और यह महज़़ कोई शान्तिपूर्ण जुलूस या प्रदर्शन नहीं रह गया था। लेनिन यह भी स्पष्ट करते हैं कि हिंसा की शुरुआत प्रतिक्रान्तिकारी ताक़तों की ओर से की गयी थी। मज़ेदार बात यह है कि रैबिनोविच भी अपनी पुस्तक में एक पश्चटिप्पणी में इस बात को स्वीकार करते हैं कि हिंसा की शुरुआत दक्षिणपन्थी बुर्जुआ गिरोहों द्वारा की गयी थी और प्रदर्शनकारियों ने उसके जवाब में गोलियाँ चलायी थीं। ऐसे में, रैबिनोविच का यह दावा औंधे मुँह गिर जाता है कि सोवियत स्रोतों में (हम यहाँ संशोधनवादी स्रोतों की बात नहीं कर रहे) 3-5 जुलाई के प्रदर्शन को एक साधारण व शान्तिपूर्ण प्रदर्शन बताया गया था। अगर हम इस दौर में स्तालिन द्वारा लिखे गये लेखों ‘क्लोज़ दि रैंक्स’, ‘व्हाट हैज़ हैपेण्ड’ आदि को देखें तो रैबिनोविच का यह दावा और भी हास्यास्पद लगता है। हम केवल एक लेख ‘क्लोज़ दि रैंक्स’ से एक उद्धरण पेश करेंगे जिससे कि इस दौर के बारे में स्तालिन का मूल्यांकन स्पष्ट हो जाये। स्तालिन लिखते हैं :

”न तो बोल्शेविकों न और न ही किसी अन्य पार्टी ने 3 जुलाई के प्रदर्शन का आह्वान किया था। और तो और, 3 जुलाई तक भी बोल्शेविक पार्टी जो कि पेत्रोग्राद में सर्वाधिक प्रभावशाली थी, मज़दूरों और सैनिकों से प्रदर्शन न करने का आह्वान ही कर रही थी। लेकिन जब इन सारे प्रयासों के बावजूद आन्दोलन फूट पड़ा, तो हमारी पार्टी ने यह मानते हुए कि उसे इस मामले से हाथ झाड़ लेने का कोई अधिकार नहीं है, इस बात का हर सम्भव प्रयास किया कि आन्दोलन को एक शान्तिपूर्ण और संगठित चरित्र दिया जाये।

”लेकिन प्रति-क्रान्तिकारी ऊँघ नहीं रहे थे। उन्होंने उकसाने के लिए गोलियाँ चलवायी थीं; उन्होंने प्रदर्शन के दिनों को ख़ून से लाल कर दिया और, मोर्चे की कुछ विशेष इकाइयों के बूते उन्होंने क्रान्ति के ख़ि‍लाफ़ आक्रमण की शुरुआत कर दी।” (जोसेफ़ स्तालिन, 1953, क्लोज़ दि रैंक्स, कलेक्टेड वर्क्स, खण्ड-3, फ़ॉरेन लैंग्वेजेज़ पब्लिशिंग हाउस, मॉस्को, पृ. 110-111)

इस उद्धरण से स्पष्ट है कि बोल्शेविक पार्टी के नेतृत्व ने 3-5 जुलाई के प्रदर्शन को रोकने का हर सम्भव प्रयास किया था। 3 जुलाई की देर रात तक ये प्रयास जारी थे। लेकिन जब ये प्रयास सफल नहीं हुए और पार्टी के समक्ष यह स्पष्ट हो गया कि अब प्रदर्शन को रोका नहीं जा सकता है, तो पार्टी ने उसमें हिस्सेदारी करके उसे अधिकतम सम्भव शान्तिपूर्ण और संगठित रूप देने का प्रयास किया। लेनिन के भी ऊपर उल्लिखित तीन लेखों में बार-बार इस बात का जि़क्र किया गया है। साथ ही, स्तालिन के उपरोक्त उद्धरण से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि तत्कालीन सोवियत स्रोतों में, बोल्शेविक नेताओं के लेखन से लेकर इतिहास-लेखन तक में 3-5 जुलाई के प्रदर्शन को किसी शान्तिपूर्ण प्रदर्शन के रूप में चित्रित नहीं किया गया था। लेकिन अपने बुर्जुआ पूर्वाग्रहों के कारण रैबिनोविच का लेनिन और स्तालिन के लेखन के प्रति संशय की भावना हो सकती है। इसलिए आइये उनके प्रिय स्रोत त्रात्स्की पर चलते हैं और देखते हैं कि उन्होंने जुलाई 1917 में ही जुलाई की घटनाओं के बारे में क्या लिखा था। वे लिखते हैं :

”बोल्शेविकों समेत सभी पार्टियों ने 16 जुलाई (3 जुलाई) के प्रदर्शन से जनसमुदायों को रोकने का हर सम्भव प्रयास किया लेकिन जनता ने प्रदर्शन किया और वह भी अपने हाथों में हथियार लेकर। 16 जुलाई की शाम को ही सभी आन्दोलनकारियों ने एेलान किया कि चूँकि सत्ता का प्रश्न हल नहीं हुआ है, इसलिए 17 जुलाई (4 जुलाई) का प्रदर्शन होना अपरिहार्य है, और कोई भी क़दम जनता को इससे रोक नहीं सकता है। यह एकमात्र कारण था कि बोल्शेविक पार्टी, और उसके साथ ही हमारे संगठन (उस समय त्रात्स्की मेज़राओन्त्सी नामक ग्रुप में थे – लेखक) ने तय किया कि वह इससे अलग-थलग नहीं रह सकते और इसके परिणामों से हाथ नहीं झाड़ सकते, बल्कि उन्हें 17 जुलाई के मामले को एक शान्तिपूर्ण जनप्रदर्शन में तब्दील करने के लिए हर सम्भव प्रयास करना चाहिए। 17 जुलाई की अपील का और कोई अर्थ नहीं था। ज़ाहिर है कि यह स्पष्ट था कि प्रतिक्रान्तिकारी गिरोहों के लगभग तय हस्तक्षेप के मद्देनज़र ख़ूनी टकराव की स्थितियाँ पैदा होंगी। यह सच है कि जन समुदायों को बिना किसी राजनीतिक मार्गदर्शन के छोड़ा जा सकता है, उन्हें राजनीतिक तौर पर छिन्न-भिन्न किया जा सकता है, और उन्हें निर्देशित करने से इंकार करके उन्हें उनके भाग्य पर छोड़ा जा सकता था। लेकिन हम मज़दूर पार्टी होने के नाते पाइलेट के रणकौशल का अनुसरण नहीं कर सकते थे (पाइलेट वह रोमन अधिकारी था जिसने न चाहते हुए भी ईसा को सूली पर चढ़ाये जाने के लिए सौंप दिया था – लेखक) : इसलिए हमने जन समुदायों के साथ शामिल होने और उनके साथ डटे रहने का निर्णय लिया, ताकि उनकी तात्विक उथल-पुथल में हम अधिकतम सम्भव संगठन ला सकें, जितना कि दी गयी परिस्थितियों में सम्भव था, और सम्भावित हताहतों की संख्या को न्यूनतम सीमा तक रख सकें। तथ्य सभी को अच्छी तरह से पता हैं। ख़ून बहाया गया है। और अब बुर्जुआ वर्ग का ”प्रभावी प्रेस” और बुर्जुआ वर्ग की सेवा करने वाले अन्य अख़बार इन परिणामों की सारी जि़म्मेदारी हमारे कन्धों पर रखने का प्रयास कर रहे हैं – जनसमुदायों की ग़रीबी, श्रान्ति, असन्तोष और विद्रोही भावना की जि़म्मेदारी हम पर डालने का प्रयास कर रहे हैं।” (लियॉन त्रात्स्की, 1918, दि जुलाई अपराइजि़ंग, दि प्रोलेतारिन रिवोल्यूशन इन रशिया, सं. लुइस सी फ्रायना, दि कम्युनिस्ट प्रेस, न्यूयॉर्क)

स्पष्ट है कि त्रात्स्की 1917 में भी जुलाई की घटनाओं को शान्तिपूर्ण प्रदर्शन नहीं मानते थे। उनका भी मानना था कि बोल्शेविक पार्टी की मंशा यही थी कि इस प्रदर्शन को रोका जाये क्योंकि इसके अपरिपक्व सशस्त्र बग़ावत में तब्दील होने का ख़तरा था, लेकिन जब इसे रोका नहीं जा सका तो बोल्शेविक पार्टी ने इसमें शामिल होकर इसे अधिकतम सम्भव संगठित और शान्तिपूर्ण रूप देने का प्रयास किया। लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि इस प्रश्न पर रैबिनोविच त्रात्स्की को भी उद्धृत नहीं करते हैं।

हमने यहाँ लेनिन, स्तालिन और त्रात्स्की को विस्तार से इसलिए उद्धृत किया ताकि रैबिनोविच के इस दावे की सच्चाई की पड़ताल की जा सके कि सभी सोवियत स्रोतों में 3-5 जुलाई की घटनाओं को शान्तिपूर्ण प्रदर्शन के रूप में चित्रित किया गया है, जो कि आधिकारिक सोवियत दृष्टिकोण था और चूँकि सोवियत रूस में इतिहास-लेखन सोवियत सरकार की राजनीतिक ज़रूरतों से निर्धारित होता था इसलिए सोवियत इतिहास-लेखन में 3-5 जुलाई की घटनाओं का सही चित्रण नहीं मिलता है। हम लेनिन, स्तालिन और यहाँ तक कि त्रात्स्की के उपरोक्त उद्धरणों में देख सकते हैं कि प्रदर्शन को बोल्शेविकों ने शान्तिपूर्ण और संगठित रूप देने का प्रयास किया लेकिन प्रतिक्रान्तिकारी गिरोहों द्वारा किये गये हमले के कारण प्रदर्शनकारियों ने भी जवाबी हमला किया और हिंसा हुई। इसलिए आप अन्त में ताज्जुब करते हैं कि रैबिनोविच के ”सोवियत स्रोत” कौन-से हैं। जब आप ग्रन्थ सूची देखते हैं तो आपको पता चलता है कि ये तथाकथित सोवियत स्रोत 1953-56 के बाद किया गया संशोधनवादी इतिहास-लेखन है या फिर उन मेंशेविकों का जिन्होंने उस समय स्पष्ट तौर पर प्रतिक्रान्ति का पक्ष चुन लिया था और बोल्शेविक पार्टी के दमन का माहौल बनाने के लिए उस पर सशस्त्र विद्रोह की तैयारी का आरोप लगा रहे थे।

अपनी पुस्तक के ‘प्राक्कथन’ में रैबिनोविच लिखते हैं कि इस पुस्तक में उनका प्रमुख लक्ष्य यह दिखलाना है कि जून और जुलाई के घटनाक्रम से यह साफ़ हो जाता है कि बोल्शेविक पार्टी लेनिन के नेतृत्व में काम करने वाली कोई एकाश्मी संरचना नहीं थी जो बिना प्रश्न उठाये लेनिन की इच्छाओं का पालन करे। वह दिखलाने का प्रयास करते हैं कि बोल्शेविक पार्टी एक ‘विभाजित पार्टी’ थी जिसमें सत्ता के तीन केन्द्र काम कर रहे थे और इन तीनों ही केन्द्रों के लक्ष्य और हित अलग-अलग थे। ये तीन केन्द्र थे केन्द्रीय कमेटी, बोल्शेविक सैन्य संगठन और पीटर्सबर्ग कमेटी। साथ ही, रैबिनोविच यह सिद्ध करने का दावा करते हैं कि अप्रैल 1917 में चुनी गयी केन्द्रीय कमेटी कोई सजातीय निकाय नहीं थी। उसमें एक ओर लेनिन और उनका अनुसरण करने वाले लोग थे तो दूसरी ओर दक्षिण रुझान रखने वाला एक धड़ा था जिसकी अगुवाई कामेनेव कर रहे थे। यह दावा करते हुए रैबिनोविच यह नहीं बताते कि किस बोल्शेविक नेता के लेखन में या 1953-56 तक के सोवियत इतिहास-लेखन में ऐसा दावा किया गया है कि बोल्शेविक पार्टी एक ”मोनोलिथ” थी, या कि केन्द्रीय कमेटी के भीतर दो लाइनों का संघर्ष मौजूद नहीं था। रैबिनोविच की बोल्शेविक सांगठनिक उसूलों के बारे में कोई समझदारी नहीं है। उनका मानना है कि लेनिन में एक छोटी, गुप्त, षड्यन्त्रकारी और लौह-अनुशासित पार्टी खड़ी करने का एक पागलपन भरा जुनून था जिसमें कि केन्द्रीय कमेटी के फ़रमानों के अनुसार सारे कार्य-कलाप होंगे; जिसमें केन्द्रीय कमेटी लेनिन की एकल इच्छाशक्ति के मातहत एकजुट होगी और लेनिन की कार्यदिशा प्रश्नों से इतर होगी। आइये देखें कि रैबिनोविच की लेनिनवादी सांगठनिक उसूलों के बारे में क्या समझदारी है :

”1903 में लेनिन ने इस बात पर अपने जुनूनी ज़ोर के साथ रूसी मज़दूर आन्दोलन की एकता को स्थायी रूप से छिन्न-भिन्न कर दिया था कि केवल एक छोटा, पेशेवर और बेहद केन्द्रीकृत क्रान्तिकारी संगठन ही समाजवादी क्रान्ति में रूसी सर्वहारा वर्ग को नेतृत्व देने में सक्षम होगा, वह भी उस समय जबकि रूसी सामाजिक-जनवादी एक ज़्यादा जनवादी रूप से संगठित, मोटे तौर पर सहिष्णु, एक जन पार्टी चाहते थे।” (अलेक्ज़ैण्डर रैबिनोविच, 1991, प्रिल्यूड टू रिवोल्यूशन, मिडलैण्ड संस्करण, इण्डियाना यूनीवर्सिटी प्रेस, पृ. 16)

इस उद्धरण से ही स्पष्ट हो जाता है कि रैबिनोविच ने पार्टी के लेनिनवादी उसूलों के बारे में लेनिन की कोई भी मूल रचना नहीं पढ़ी है और इस बाबत उनका ज्ञान बुर्जुआ पाठ्यपुस्तकों और बुर्जुआ कक्षाओं के दिये जाने वाले ज्ञान तक सीमित है। बहरहाल, रैबिनोविच का दावा है कि लेनिन के इन विचारों के कारण बोल्शेविक पार्टी का एक विशिष्ट दृष्टिकोण ”आधिकारिक सोवियत इतिहास-लेखन” में हावी रहा है, जिसके अनुसार यह पार्टी एक ”मोनोलिथ” के समान थी, हालाँकि रैबिनोविच के अनुसार वास्तविकता इससे भिन्न थी। यह बता देना ज़रूरी होगा कि बोल्शेविक पार्टी के बारे में न तो लेनिन, स्तालिन, स्वेर्दलोव, बुखारिन या प्रतिक्रान्ति का पक्ष चुनने से पहले के दौर में त्रात्स्की की ऐसी कोई समझदारी थी और न ही 1953-56 के पहले के सोवियत इतिहास ले‍खन में ऐसी कोई तस्वीर पेश की गयी है। लेकिन रैबिनोविच संशोधनवाद के दौर के कुछ स्रोत ले‍कर यह दावा कर देते हैं कि सभी सोवियत स्रोतों में यह भ्रामक तस्वीर पेश की गयी है। जब एक बार ”आधिकारिक सोवियत दृष्टिकोण” का एक पुतला खड़ा कर दिया जाता है, तो फिर उसका ध्वंस करने में भी रैबिनोविच को ज़्यादा दिक़्क़त नहीं पेश आती है।

रैबिनोविच दावा करते हैं कि बोल्शेविक सैन्य संगठन केन्द्रीय कमेटी के मुक़ाबले ज़्यादा वाम अवस्थिति अपनाता था क्योंकि इसका नेतृत्व अधिक रैडिकल था और इसके ऊपर जनता की रैडिकल भावनाओं का सतत् दबाव रहता था। यह सैन्य संगठन वैसे तो सीधे केन्द्रीय कमेटी के मातहत था लेकिन यह काफ़ी हद तक स्वायत्त था। उसी प्रकार पीटर्सबर्ग कमेटी भी केन्द्रीय कमेटी से अलग अवस्थितियाँ अपनाती थी और केन्द्रीय कमेटी से इसका अक्सर टकराव होता रहता था क्योंकि ये दोनों ही कमेटियाँ मुख्य रूप से एक शहर में सक्रिय रहती थीं, यानी पेत्रोग्राद। इन सारे कारकों के चलते केन्द्रीय कमेटी, सैन्य संगठन और पीटर्सबर्ग कमेटी के बीच एक त्रिकोणीय तनाव बना रहता था और सैन्य संगठन और पीटर्सबर्ग कमेटी हमेशा अधिक स्वतन्त्रता और स्वायत्तता के लिए संघर्ष करते रहते थे, जबकि केन्द्रीय कमेटी सतत् इन पर अपना कठोर नियन्त्रण स्थापित करने के प्रयास में संलग्न रहती थी। रैबिनोविच का दावा है कि लेनिन के क्रान्ति के पूरे सिद्धान्त को इन तीनों निकायों ने अलग-अलग तरीक़े से व्याख्यायित किया। इन सारे दावों के बाद रैबिनोविच अपना एक ‘पलायन मार्ग’ भी ‘प्राक्कथन’ में ही तैयार कर लेते हैं क्योंकि सम्भवत: वे भी समझते हैं कि इन सारे दावों को सही ठहरा पाना मुश्किल होगा। रैबिनोविच लिखते हैं :

”इस बिन्दु पर मैं बस आपको सावधान करना चाहूँगा कि मेरे शोध के नतीजे ग़ैर-दस्तावेज़ी स्रोतों पर अति-निर्भरता के कारण हर प्रकार चूक की सम्भावना रखते हैं, वे अनिवार्य रूप से आरज़ी हैं और इसमें एक निश्चित मात्रा में शिक्षित अटकलबाजि़याँ हैं।” (अलेक्ज़ैण्डर रैबिनोविच, 1991, पृ. 7)

‘प्रस्तावना’ और ‘प्राक्कथन’ में पेश विचारों पर एक सरसरी निगाह डालने के बाद हम रैबिनोविच द्वारा फ़रवरी क्रान्ति के बाद पैदा हुई परिस्थितियों के विश्लेषण की ओर आगे बढ़ सकते हैं।

रैबिनोविच का प्रच्छन्न रुदन : रूस को कोई सक्षम बुर्जुआ प्रशासक क्यों नहीं मिला?

पहले अध्याय में रैबिनोविच प्रथम विश्वयुद्ध की शुरुआत के बारे में अलग-अलग लोगों के विचार पेश करते हैं जिसमें ज़ार के मन्त्रियों के विचारों से लेकर लेनिन तक के विचार शामिल हैं। रैबिनोविच बताते हैं कि प्रथम विश्वयुद्ध के दौर में रूस एक संक्रमण से गुज़र रहा था। इस संक्रमण का बयान करते हुए रैबिनोविच बताते हैं कि पूँजीवाद के रास्ते पर रूस का विकास अभी अधूरा था, और इसी वजह से वहाँ पर क्रान्तिकारी परिस्थितियाँ पैदा हुईं। रैबिनोविच लिखते हैं :

”स्तोलिपिन की कल्पना के जैसा स्वतन्त्र किसानों का एक स्थायी वर्ग अभी गाँवों में स्थापित नहीं हुआ था, और तेजी से बढ़ रहे रूसी सर्वहारा वर्ग ने अभी उन महत्वपूर्ण आर्थिक लाभों को हासिल नहीं किया था जिन्होंने उन्नीसवीं सदी और बीसवीं सदी की शुरुआत में ही पश्चिमी यूरोपीय मज़दूर की क्रान्तिकारी सरगर्मी को ठण्डा कर दिया था।” (रैबिनोविच, 1991, वही,
पृ. 10)

जैसा कि हम देख सकते हैं ई.एच. कार के समान ही रैबिनोविच पर भी इस उदार बुर्जुआ तर्क का प्रभाव है जिसके अनुसार रूस में क्रान्ति होने का कारण यह था कि यहाँ पर पूँजीवाद का समुचित विकास नहीं हुआ, बुर्जुआ जनवाद ज़्यादा विकसित नहीं हुआ, उदार बुर्जुआ जनवाद के अभाव में मज़दूरों को तमाम आर्थिक अधिकार हासिल नहीं हुए, स्वतन्त्र किसानों का एक स्थायी वर्ग नहीं पैदा हुआ और एक सर्वसत्तावादी शासन के ख़ि‍लाफ़ जनसमुदायों में विद्रोह की भावनाएँ पनपती रहीं। यदि रूस के हुक्मरानों ने पूँजीवाद का समुचित विकास किया होता, यदि उन्होंने एक पश्चिमी शैली वाला उदार बुर्जुआ जनवाद मुहैया कराया होता तो रूस में समाजवादी क्रान्ति की स्थितियाँ ही पैदा नहीं होतीं। इस प्रकार रूसी क्रान्ति के होने की कारणात्मक व्याख्या पूँजीवाद और उदार बुर्जुआ जनवाद के अपूर्ण विकास पर निर्भर हो जाती है। इस प्रकार की विचारधारात्मक अन्धता वाली व्याख्या पेश करने की प्रक्रिया में साम्राज्यवाद की भूमिका, पश्चिमी यूरोप में मज़दूर आन्दोलन के सुधारवाद के गर्त में जाने और फिर पतन की और रूसी क्रान्ति में बोल्शेविक पार्टी की भूमिका के बारे में रैबिनोविच कोई समझदारी नहीं पेश करते हैं। लुब्बेलुबाब यह कि रूस की क्रान्ति पूँजीपति वर्ग की ग़लती के कारण हुई थी और अगर रूसी पूँजीपति वर्ग ने पश्चिमी यूरोप से सीखा होता तो उसे क्रान्ति की वि‍भीषिका से नहीं गुज़रना पड़ता।          ई. एच. कार का मूल्यांकन करते हुए हमने इस तर्क की अर्थहीनता के बारे में लिखा था। यह तर्क रैबिनोविच के उदार बुर्जुआ पूर्वाग्रहों को स्पष्ट कर देता है। इन्हीं पूर्वाग्रहों के कारण रैबिनोविच रूसी क्रान्ति के घटित होने, उसके पीछे काम कर रहे ढाँचागत कारकों की कोई सुसंगत समझदारी नहीं पेश कर पाते। इसी तर्क का विस्तार आप रैबिनोविच के निम्न व्यक्तिवादी विश्लेषण में भी देख सकते हैं :

”रूस की राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं के समाधानों को ढूँढ़़ने और बीसवीं सदी में रूसी साम्राज्य के प्रवेश को सही तरीक़े से अधीक्षित करने के भारी अपरिमित लक्ष्य की पूर्ति के लिए किसी पीटर महान की अग्रणी भावना और असीम ऊर्जा या कम-से-कम अलेक्ज़ैण्डर द्वितीय के राजनीतिक यथार्थवाद और अनुकूलन की क्षमता की आवश्यकता थी। लेकिन इसके विपरीत, रूस का भविष्य एक ज़ि‍द्दी और अदूरदर्शी राजा के हाथों में था जो अन्त तक रूस के लिए निरंकुश राजतन्त्र के मूल्य में भरोसा रखता था और अपने समय की विशालकाय समस्याओं का हल करना तो दूर उन्हें समझने की क्षमता भी नहीं रखता था।” (वही, पृ 12-13)

एक बार फिर आप देख सकते हैं कि रैबिनोविच के अनुसार रूस में क्रान्ति की त्रासदी इसलिए घटित हुई क्योंकि उसके पास कोई सक्षम शासक नहीं था। अगर उसके पास कोई पीटर महान या अलेक्ज़ैण्डर द्वितीय जैसा काबिल हुक़्मरान होता तो शायद रूस में क्रान्ति की त्रासदी घटित नहीं होती! रैबिनोविच के अनुसार इसी अक्षम शासक यानी निकोलस द्वितीय की अक्षमता और अकर्मण्यता थी जिसके कारण रूसी क्रान्ति की स्थितियाँ तैयार हुईं। दूसरे शब्दों में, कोई आधुनिकतावादी और सक्षम शासक क्रान्ति की विभीषिका से रूस को बचा सकता था। अमेरिकी इतिहास-लेखन में इस प्रकार के व्यक्तिवादी विश्लेषण के प्रभाव को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

इसी अध्याय में प्रथम विश्वयुद्ध के शुरू होने के बाद दुनिया भर के मज़दूर आन्दोलन में शुरू हुई बहस का रैबिनोविच हवाला देते हैं और बताते हैं कि इस बाबत लेनिन ने किस प्रकार क्रान्तिकारी पराजयवाद की एक अतिवादी अवस्थिति अपनायी। लेकिन जैसे ही वे लेनिन की इस अवस्थिति के बारे में बताते हैं तो आप पाते हैं कि इस बारे में भी रैबिनोविच की जानकारी लेनिन के मूल लेखन और उस दौर में इस मुद्दे पर चली बहस में हुए मूल योगदानों पर आधारित नहीं है। सही कहा जाये तो रैबिनोविच ने लेनिन की अवस्थिति को समझा ही नहीं है। मिसाल के तौर पर, रैबिनोविच लिखते हैं :

”…उन्होंने (लेनिन ने) अपने आपको यह तर्क देकर अन्य सभी रूसी अन्तरराष्ट्रीयतावादी समूहों से अलग कर लिया कि जर्मनी के हाथों रूस की हार राजतन्त्र को कमज़ोर करने के एक ज़रिये के रूप में वांछनीय है। द्वितीय इण्टरनेशनल के एक कठोर खण्डन में, शान्ति के बजाय गृहयुद्ध पर ज़ोर में और रूस के लिए पराजयवाद की हिमायत में, लेनिन का कार्यक्रम चौंका देने की हद तक अतिवादी था। रक्षावादियों और मेंशेविक तथा समाजवादी-क्रान्तिकारियों द्वारा समान बल के साथ इसकी आलोचना की गयी। वास्तव में, कई बाद में महत्वपूर्ण बन गये बोल्शेविकों की अवस्थिति भी मार्तोव के अधिक मध्यमार्गी अन्तरराष्ट्रीयतावाद के क़रीब थी, बजाय लेनिन के अ‍सहिष्णु क़ि‍स्म के रैडिकलिज़्म के।” (वही, पृ. 17)

स्पष्ट है कि रैबिनोविच या तो लेनिन की युद्ध पर अवस्थिति को समझ नहीं पाये हैं या फिर उसे जानबूझकर विकृत कर रहे हैं। ग़ौरतलब है कि लेनिन ने क्रान्तिकारी पराजयवाद की रणनीति 1914 में अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के लिए पेश की थी, न कि सिर्फ़ रूस के सामाजिक-जनवादी आन्दोलन के लिए। इस रणनीति का मक़सद केवल रूस की हार और जर्मनी की विजय नहीं था; यह रणनीति सभी युद्धरत देशों के मज़दूर वर्ग और सामाजिक-जनवादी आन्दोलन का आह्वान कर रही थी कि वे अपनी देश के सरकार के विरुद्ध क्रान्तिकारी गृहयुद्ध की शुरुआत करें। यह रणनीति सभी देशों के मज़दूर वर्ग का आह्वान करती थी कि वे साम्राज्यवादी युद्ध में पूँजीपतियों के मुनाफ़े के लिए अन्य देशों के अपने वर्ग भाइयों के ख़ि‍लाफ़ नहीं, बल्कि अपने असली दुश्मन, यानी कि अपने देश के पूँजीपति वर्ग के ख़ि‍लाफ़ लड़ें, उसे उखाड़ फेंकें और सर्वहारा सत्ता स्थापित करें। लेकिन रैबिनोविच लेनिन की इस कार्यदिशा को ऐसे व्याख्यायित करते हैं, मानो लेनिन केवल जर्मनी के हाथों रूस की हार की हिमायत कर रहे हों। लेनिन आम तौर पर साम्राज्यवादी युद्ध को क्रान्तिकारी गृहयुद्ध में परिवर्तित करने की बात कर रहे थे और सभी युद्धरत देशों के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों के लिए यह नीति पेश कर रहे थे, न कि सिर्फ़ रूस के लिए।

जैसा कि हमने ऊपर कहा है, रैबिनोविच में अमेरिकी इतिहास-लेखन में हावी व्यक्तिवादी विश्लेषण की प्रवृत्ति को स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है। विशेष तौर पर अगर हम ज़ारकालीन रूस में प्रथम विश्वयुद्ध के बाद हावी आर्थिक विघटन और राजनीतिक अराजकता के बारे में रैबिनोविच के विचारों को देखें तो यह रुझान अपने प्रातिनिधिक रूप में देखा जा सकता है। रैबिनोविच लिखते हैं : ”वेर्दुन में और सोमने नदी पर हुए व्यर्थ रक्तपात से ब्रिटिश और फ़्रांसीसी सेनाओं का मनोबल भी उतना ही टूटा हुआ था। रूसी स्थिति को जिस चीज़ ने ज़्यादा त्रासद बना दिया था वह यह थी कि मोर्चे पर गिरते मनोबल के साथ देश के भीतर राजनीतिक पक्षाघात और आर्थिक विघटन का पहलू मिश्रित हो गया था। रूस में कोई लॉयड जॉर्ज या क्लेमेंशो नहीं पैदा हुए जो कि पराजयवाद की बढ़ती भावना का गला घोंट पाते और जनता को एक निर्णायक राष्ट्रीय प्रयास के लिए तैयार कर पाते। याद किया जा सकता है कि 1914 में युद्ध के शुरुआत के समय रूसी जन भावना के बडे हिस्से ने राजनीतिक विरोध का निषेध किया था और सरकार का वफ़ादारी से समर्थन किया था…अगर ऐसा ही था तो यह एक अवसर था जिसकी शुरू से उपेक्षा की गयी। हर जन पहलक़दमी की अभिव्यक्ति को विद्रोह के रूप में देखने की प्रवृत्ति के साथ निर्बल और अत्यधिक सठियाये हुए आई.एल. गोरेमाइकिन के तहत रूसी सरकार ने कई बेशक़ीमती प्रयासों को कुचलने में कोई कसर नहीं छोड़ी जैसे कि अखिल रूसी जे़म्स्त्वो यूनियन और अखिल रूसी नगर यूनियन जिनका लक्ष्य था उद्योगों, शरणार्थी राहत कार्य, और चिकित्सीय सेवाओं के पुनर्संगठन के ज़रिये युद्ध प्रयास को आगे बढ़ाना।” (वही, पृ. 20-21)

जैसा कि इस उद्धरण से स्पष्ट है, रैबिनोविच के अनुसार रूस में क्रान्तिकारी स्थिति पैदा होने का कारण यह था कि रूस में ब्रिटेन के समान लॉयड जॉर्ज या फ़्रांस के समान कोई क्लेमेंशो नहीं था जो कि इस आर्थिक विघटन, राजनीतिक बिखराव और युद्धजनित संकट को सम्भाल पाता। रूस के वर्ग संघर्ष, अन्तरराष्ट्रीय साम्राज्यवादी श्रृंखला में रूस की अवस्थिति और रूस में बोल्शेविक पार्टी के संगठन और नेतृत्व की इसमें कोई भूमिका नहीं थी। इस प्रकार रूस में क्रान्तिकारी स्थिति का पैदा होना और फिर क्रान्ति का सम्पन्न होना वास्तव में रूसी बुर्जुआ वर्ग और उसके प्रतिनिधियों की अकर्मण्यता का नतीजा था; अगर उसके पास भी ब्रिटिश या फ़्रांसीसी बुर्जुआ वर्ग जैसी इच्छाशक्ति और सक्षम नेतृत्व होता तो युद्ध का संकट रूस में क्रान्तिकारी स्थिति की तरफ़ न गया होता। देखा जा सकता है कि इतिहास के विश्लेषण में रैबिनोविच व्यक्तियों की भूमिका को निर्धारक तत्व के रूप में पेश कर रहे हैं, न कि वर्ग संघर्ष के ढाँचागत कारक को। यह अमेरिकी इतिहास-लेखन की बुनियादी अभिलाक्षणिकताओं में से एक है : व्यक्तिवादी व आकस्मिकतावादी विश्लेषण।

विचारधारा के प्रति ऐसी ही अन्धता रैबिनोविच तब भी दिखलाते हैं जब वे पहले ही अध्याय में यह दावा करते हैं कि मेंशेविक जो कि पेत्रोग्राद सोवियत की कार्यकारी समिति में बहुमत में थे इस कट्टर मार्क्सवादी विचार को मानते थे कि जनवादी क्रान्ति के बाद उदार बुर्जुआ शासन का एक अनियतकालीन दौर चलेगा (वही, पृ. 29)। रैबिनोविच यह नहीं बताते कि उन्हें इस ”कट्टर मार्क्सवादी विचार” के बारे में किस क्लासिकीय मार्क्सवादी रचना से पता चला। न तो मार्क्स में ऐसा कोई विचार मिलता है, न ही लेनिन में। वे निश्चित तौर पर जनवादी और समाजवादी क्रान्ति के चरणों के बीच फ़र्क़ करते थे, क्योंकि दोनों चरणों में क्रान्ति के मित्र वर्गों और शत्रु वर्गों के समीकरणों में अन्तर आ जाता है। लेकिन उनके बीच की अवधि लम्बी होगी या छोटी, यह कभी भी विचारधारा का मुद्दा नहीं था, न तो मार्क्स के लिए और न ही लेनिन के लिए। यह अवधि दिये गये राजनीतिक व ऐतिहासिक सन्धि-बिन्दु में छोटी या बड़ी हो सकती है। लेकिन रैबिनोविच इन विचारधारात्मक-राजनीतिक प्रश्नों से अनभिज्ञ हैं और मेंशेविकों और बोल्शेविकों के बीच के विचारधारात्मक-राजनीतिक अन्तर के बारे में उनका ज्ञान बुर्जुआ कक्षाओं के ज्ञान तक सीमित है। लेकिन मार्क्सवाद-लेनिनवाद के बुनियादी सिद्धान्तों के बारे में रैबिनोविच की जानकारी मूल स्रोतों पर नहीं बल्कि बुर्जुआ व्याख्याकारों द्वारा प्रस्तुत ज्ञान पर आधारित है, जैसा कि हम पहले ही जि़क्र कर चुके हैं।

स्तालिन : रैबिनोविच समेत सभी बुर्जुआ इतिहासकारों का
प्रमुख निशाना

रैबिनोविच फ़रवरी क्रान्ति के बाद के दौर में और विशेष तौर पर लेनिन के अप्रैल में रूस लौटने तक के दौर में बोल्शेविक पार्टी के भीतर हावी भ्रम की स्थिति और साथ ही दो लाइनों के संघर्ष के बारे में विवरण पेश करते हुए तथ्यों की कई ग़लतियाँ करते हैं। विशेष तौर पर, स्तालिन की अवस्थितियों को जानबूझकर तोड़ते-मरोड़ते हैं, सन्दर्भ से काटकर उन्हें पेश करते हैं।

फ़रवरी क्रान्ति के तुरन्त बाद बोल्शेविक पार्टी में एक हद तक युद्ध को लेकर और विशेष तौर पर आरज़ी सरकार के बारे में रवैये को लेकर काफ़ी भ्रम की स्थिति थी। रूस में फ़रवरी क्रान्ति के पहले से ही पार्टी गतिविधियों को संचालित करने की जि़म्मेदारी केन्द्रीय कमेटी के रूसी ब्यूरो ने सम्भाल रखी थी। इसके सदस्य थे श्ल्याप्निकोव, मोलोतोव और ज़ालुत्स्की। इस रूसी ब्यूरो ने फ़रवरी क्रान्ति के ठीक बाद एक घोषणापत्र जारी किया और लेनिन की अवस्थिति को काफ़ी हद तक सही ढंग से इसमें पेश किया। इस घोषणापत्र में युद्ध का बिना शर्त विरोध किया गया और साथ ही आरज़ी सरकार को बड़े पूँजीपति वर्ग और भूस्वामी वर्ग की सरकार बताया गया। मोलोतोव ने लेनिन के सबसे क़रीब की अवस्थिति अपनायी थी। पीटर्सबर्ग कमेटी के पुनर्गठन के बाद उन्होंने इस अवस्थिति पर उसे सहमत करने की कोशिश भी की थी। युद्ध के प्रश्न पर तो पीटर्सबर्ग कमेटी ने लगभग लेनिन की अवस्थिति को ही अपनाया था, लेकिन आरज़ी सरकार के प्रश्न पर उसने अलग अवस्थिति अपनायी जो कि मेंशेविक अन्तरराष्ट्रीयतावादियों के नज़दीक पड़ती थी: यह अवस्थिति थी बाशर्त समर्थन की अवस्थिति, दूसरे शब्दों में आरज़ी सरकार को उस हद तक समर्थन देने की घोषणा की गयी जिस हद तक वह जनता के पक्ष में निर्णय लेती है, लेकिन साथ ही उस पर चौकसी बरतने की बात भी कही गयी। कुछ समय बाद ही साईबेरिया से स्तालिन, कामेनेव और मुरानोव लौट आये। रैबिनोविच यहाँ पर भी शब्दों के खेल से ऐसा जताने की कोशिश करते हैं कि इन तीनों ने रूसी ब्यूरो से नेतृत्व ”हथिया” लिया। हालाँकि, यह स्वाभाविक ही था कि वरिष्ठ नेतृत्व के वापस लौटने के बाद प्राव्दा के सम्पादन और पार्टी कार्यों के कुल संचालन की प्रमुख जि़म्मेदारी वही उठायेगा। लेकिन रैबिनोविच जैसे इतिहासकार इसे ”नेतृत्व हड़पे जाने” के तौर पर पेश करते हैं। इसमें कोई अचरज की बात भी नहीं है, क्योंकि यह रैबिनोविच के ‘विभाजित पार्टी’ के विचार को ही बल देने का काम करता है।

बहरहाल, स्तालिन भी लेनिन के आगमन से पूर्व लेनिन की अवस्थिति का पूर्वानुमान नहीं कर सके थे और उसे अपना नहीं सके थे। उनकी अवस्थिति युद्ध के प्रश्न पर तो लेनिन के ही समान थी, लेकिन आरज़ी सरकार के प्रश्न पर बिना शर्त विरोध की अवस्थिति वे अभी नहीं अपना सके थे। वे अस्पष्ट शब्दों में क्रान्तिकारी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की बात कर रहे थे और साथ ही आरज़ी सरकार पर क्रान्तिकारी नियन्त्रण क़ायम करने की बात कर रहे थे। एक दक्षिणपन्थी अवस्थिति कामेनेव व ओल्मिंस्की जैसे लोगों ने अपना रखी थी, जो मेंशेविकों की क्रान्तिकारी रक्षावाद की प्रतिक्रियावादी अवस्थिति से ज़्यादा भिन्न नहीं थी। स्तालिन की अवस्थिति लेनिन की अवस्थिति और कामेनेव की दक्षिणपन्थी अवस्थिति के बीच में पड़ती थी, बल्कि लेनिन की अवस्थिति की ओर सापेक्षत: ज़्यादा झुकाव रखती थी। लेकिन रैबिनोविच स्तालिन की पूरी अवस्थिति को बुरी तरह से विकृत करके पेश करते हैं, ताकि बाद में वे दिखा पायें कि लेनिन के आने के बाद स्तालिन धीरे-धीरे दक्षिणपन्थी अवस्थिति से दूर गये।

सच्चाई यह है कि स्तालिन ने कामेनेव के रुख़ का कड़ाई से विरोध किया और साथ ही जि़म्मरवॉल्ड के बहुमत के बरक्स लेनिन के वामपन्थी जि़म्मरवाल्डियन रुख़ का समर्थन किया। लेकिन तमाम अकादमिक लेखकों की तरह, जो कि स्तालिन के प्रति पूर्वाग्रहित होते हैं और कई बार जानबूझकर तथ्यों के साथ दुराचार करते हैं, अलेक्ज़ैण्डर रैबिनोविच ने भी स्तालिन की अवस्थिति को जानबूझकर ग़लत रूप में पेश किया है। रैबिनोविच दावा करते हैं कि स्तालिन की अवस्थिति युद्ध पर वही थी जो कि कामेनेव की थी और उन्होंने कामेनेव के लेख के एक दिन बाद यानी 16 मार्च को प्राव्दा में एक लेख लिखा जिसमें उन्होंने लिखा कि ”युद्ध मुर्दाबाद का नारा बेकार है।” हम पहले रैबिनोविच को उद्धृत करेंगे और फिर स्तालिन के उस लेख से उद्धरण पेश करके दिखलायेंगे कि किस तरह रैबिनोविच ने (निश्चित तौर पर) जानबूझकर स्तालिन के कथन को सन्दर्भ से काटकर पेश किया ताकि स्तालिन को मेंशेविक और कामेनेव की अवस्थिति पर खड़ा हुआ दिखलाया जा सके। रैबिनोविच लिखते हैं :

”इस तरह इसके बाद कामेनेव और स्तालिन के लेखों ने आरज़ी सरकार के लिए सीमित समर्थन की वकालत की, ”युद्ध मुर्दाबाद” के नारे को ठुकराया और मोर्चे पर विसंगठनकारी गतिविधियों को समाप्त करने की वकालत की। कामेनेव ने प्राव्दा में 15 मार्च को लिखा, ”जब शान्ति नहीं है तो लोगों को अपने पदों पर बने रहना चाहिए, और तोप के गोलों का तोप के गोलों से और गोलियों का गोलियों से जवाब देना चाहिए।” अगले दिन स्तालिन ने इसी को दुहराया, ‘ ‘युद्ध मुर्दाबाद’ एक बेकार नारा है।’ ” (वही, पृ. 36)

यह तथ्यों का कितना भयंकर और आपराधिक विकृतीकरण है इसको प्रदर्शित करने के लिए हम स्तालिन के 16 मार्च के प्राव्दा में छपे लेख का उद्धरण पेश करेंगे। स्तालिन लिखते हैं :

”मौजूदा युद्ध एक साम्राज्यवादी युद्ध है। इसका मुख्य लक्ष्य है पूँजीवादी रूप से उन्नत राज्यों द्वारा विदेशी, मुख्य रूप से कृषि, क्षेत्रों को हड़पना (क़ब्ज़ा करना)। उन्हें नये बाज़ार, इन बाज़ारों से सुविधाजनक संचार, कच्चे माल और खनिज भण्डार चाहिए और वे हर जगह उसे हासिल करने के लिए प्रयास करते हैं…और यही कारण है कि रूस में मौजूदा स्थिति इस बात का शोर मचाने और घोषणा करने का कोई कारण नहीं देती कि, ”स्वतन्त्रता ख़तरे में है! युद्ध जि़न्दाबाद!”

”और जिस तरह उस समय (1914 में) फ़्रांस में कई समाजवादियों (गुएस्दे, सेम्बात, आदि) के बीच यह खलबली मच गयी थी, उसी तरह रूस में भी कई समाजवादी ”क्रान्तिकारी रक्षावाद” की घण्टी बजाने वाले बुर्जुआ कारिन्दों के पदचिन्हों पर चल रहे हैं।

”फ़्रांस में आगे के घटनाक्रम ने दिखलाया कि इस बात को लेकर ख़तरे की घण्टी बजाना एक झूठ है और स्वतन्त्रता और गणराज्य के बारे में चीख़-पुकार वास्तव में इस तथ्य को छिपाने का एक आवरण था कि फ़्रांसीसी साम्राज्यवादी आल्सेस-लॉरेन और वेस्टफ़ेलिया के लिए ललचाये हुए हैं।

”हम पूरी तरह विश्वस्त हैं कि रूस में मौजूदा घटनाक्रम अन्तत: दिखलायेगा कि ”स्वतन्त्रता ख़तरे में है” की उन्मादी चीख़ें किस क़दर झूठी हैं : ”देशभक्तिपूर्ण” धूम्रावरण छँट जायेगा और लोग ख़ुद ही देखेंगे कि रूसी साम्राज्यवादी आख़ि‍र किसी चीज़ के पीछे भाग रहे थे – जलडमरूमध्य और ईरान।

”गुएस्दे, सेम्बात और उस जैसों का जि़म्मरवॉल्ड और कियेंथॉल समाजवादी कांग्रेसों में सही ही मूल्यांकन किया गया था।

”आगे की घटनाओं ने जि़म्मरवॉल्ड और कियेंथाल की थीसीज़ के सहीपन और उपयोगीपन को पूरी तरह सिद्ध किया है।…

हमारा, एक पार्टी के तौर पर मौजूदा युद्ध पर क्या रुख़ होना चाहिए?…

पहली बात तो यह, कि यह प्रश्नेतर है कि यह कोरा नारा, ”युद्ध मुर्दाबाद!” व्यावहारिक कार्यों के लिए एकदम अनुपयुक्त है, क्योंकि, यह शान्ति के विचार के आम तौर पर प्रचार से आगे नहीं जाता, यह युद्धरत शक्तियों पर युद्ध को रोकने के लिए बाध्य करने के लिए व्यावहारिक दबाव बनाने के लिए कुछ भी मुहैया कराने में सक्षम नहीं है और न ही हो सकता है।” (स्तालिन, 1954, ‘युद्ध’, (16 मार्च 1917), वर्क्स, खण्ड-3, फ़ॉरेन लैंग्वेजेज़ पब्लिशिंग हाउस, मॉस्को)

आगे स्तालिन बताते हैं कि युद्ध ख़त्म करने का एक ही रास्ता हो सकता है और वह यह है कि तमाम युद्धरत देशों का मज़दूर वर्ग अपने शासक वर्गों पर युद्ध ख़त्म करने के लिए क्रान्तिकारी दबाव बनाये। साफ़ है कि स्तालिन अभी लेनिन की ”क्रान्तिकारी पराजयवाद” की कार्यदिशा तक नहीं पहुँचे थे। लेकिन रूस में लेनिन की इस रैडिकल कार्यदिशा के मोलोतोव के बाद सबसे क़रीब स्तालिन ही थे। हमने स्तालिन का यह लम्बा उद्धरण इसलिए पेश किया ताकि अलेक्ज़ैण्डर रैबिनोविच जैसे अमेरिकी (वैसे रैबिनोविच मूलत: रूसी हैं। रैबिनोविच के पिता 1918 में क्रान्ति के बाद रूस से भाग गये थे)  इतिहासकारों द्वारा स्तालिन के विषय में फैलाये जाने वाले झूठ के स्तर को समझ सकें। इसके अलावा लेनिन के आने से पहले ही स्तालिन पुख़्ता तरीक़े से युद्ध का विरोध कर रहे थे (हालाँकि, वे जि़म्मरवॉल्ड-कियेंथाल लाइन पर सभी युद्ध विरोधियों की एकता स्थापित करने का प्रयास कर रहे थे, जिस लाइन पर मेंशेविक प्रभाव से इंकार नहीं किया जा सकता है), इसे जानने के लिए स्तालिन के कुछ अहम लेख देखे जा सकते हैं, जैसे कि 18 मार्च 1917 का लेख ‘रूसी क्रान्ति के विजय की शर्तें’ और 16 मार्च 1917 का लेख ‘बिडिंग फॉर मिनिस्टीरियल पोर्टफोलियोज़’। इन लेखों को देखने से भी रैबिनोविच जैसे इतिहासकारों का यह आरोप निराधार सिद्ध हो जाता है कि स्तालिन ने युद्ध में भागीदारी का समर्थन किया था। ध्यान देने योग्य बात है कि त्रात्स्की ने भी स्तालिन पर यही आरोप लगाया है। हमने थोड़ा विस्तार से इस आरोप का खण्डन करना ज़रूरी समझा क्योंकि यद्यपि स्तालिन लेनिन की अवस्थिति पर नहीं पहुँचे थे, मगर वे कामेनेव की अवस्थिति पर भी नहीं थे। ग़ौरतलब है, ई.एच. कार के बाद अगर पश्चिमी अकादमिक जगत में किसी इतिहासकार के काम की सबसे ज़्यादा चर्चा हुई है तो वह रैबिनोविच हैं और यह ताज्जुब की बात है कि उनके काम का यह स्तर है कि वे स्तालिन के बारे में ऐसी आधारहीन टिप्पणी करते हैं। यहाँ यह भी बताना ज़रूरी है कि आरज़ी सरकार के बारे में भी स्तालिन का ठीक वही रुख़ नहीं था जो कि पेत्रोग्राद पार्टी कमेटी का था। स्तालिन का रुख़ अगर मोलोतोव के समान आरज़ी सरकार की सीधी मुख़ालफ़त का नहीं था, तो स्पष्ट समर्थन का भी नहीं था। स्तालिन का रुख़ मूलत: और मुख्यत: आरजी सरकार के प्रति अविश्वास का था। इसे भी रैबिनोविच ग़लत तरीक़े से पेश करते हैं।

यहाँ यह भी ग़ौरतलब है कि रैबिनोविच दो पेज बाद ही स्तालिन के बारे में धीरे से अपनी अवस्थिति को बदल लेते हैं! यहाँ रैबिनोविच लिखते हैं कि लेनिन के बोल्शेविक बैठकों में आने के पहले स्तालिन आरज़ी सरकार पर ”चौकसीपूर्ण नियन्त्रण” और पेत्रोग्राद सोवियत को क्रान्तिकारी सत्ता का आरम्भ मानने की बात कर चुके थे। लेकिन यदि स्तालिन पेत्रोग्राद सोवियत को क्रान्तिकारी सत्ता का केन्द्र मानते थे, तो फिर वह आरज़ी सरकार को समर्थन किस प्रकार दे रहे थे? स्पष्ट है कि स्तालिन की कार्यदिशा कामेनेव के साथ नहीं खड़ी थी, हालाँकि वे लेनिन की अवस्थिति तक भी नहीं पहुँच पाये थे। युद्ध पर उनकी अवस्थिति लेनिन के क़रीब बनती थी, जैसा कि हमने ऊपर दिखलाया है। लेकिन चूँकि आरज़ी सरकार के प्रति रवैये को लेकर स्तालिन का रुख़ ढुलमुल और भ्रमित था इसलिए युद्ध के प्रश्न पर भी वे खुलकर क्रान्तिकारी पराजयवाद की हिमायत नहीं कर सके थे। लेकिन स्पष्टत: उनकी अवस्थिति कामेनेव से भिन्न थी। यहाँ तक कि कामेनेव की युद्ध पर अवस्थिति को जब पीटर्सबर्ग कमेटी की एक बैठक में नकारा गया तो स्तालिन भी कामेनेव की आलोचना रखने वालों में से एक थे।

इसके बाद रैबिनोविच तथ्यों की कुछ गम्भीर ग़लतियाँ भी करते हैं। मिसाल के तौर पर, रैबिनोविच यह दावा करते हैं कि लेनिन 3 अप्रैल को रूस वापस लौटने के बाद 4 अप्रैल को अखिल रूसी सोवियत सम्मेलन में जाने वाले बोल्शेविक प्रतिनिधियों की एक बैठक को सम्बोधित करते हैं और पहली बार अपनी प्रसिद्ध ‘अप्रैल थीसीज़’ को पढ़ते हैं। यह तथ्यात्मक तौर पर ग़लत है। लेनिन ने 4 अप्रैल को दोपहर में जिस बैठक में पहली बार अपनी थीसीज़ औपचारिक तौर पर पेश की वह केवल बोल्शेविक प्रतिनिधियों की बैठक नहीं थी, बल्कि सभी सामाजिक-जनवादियों (जिसमें मेंशेविक व स्वतन्त्र सामाजिक-जनवादी भी शामिल थे) की साझा बैठक थी। दूसरी ग़लती रैबिनोविच यह करते हैं कि वह दावा करते हैं कि बोल्शेविकों की इस बैठक के बाद ये बोल्शेविक मेंशेविकों से एकीकरण की बात करने जा रहे थे। यह भी भ्रामक दावा है। यहाँ बोल्शेविक पार्टी और मेंशेविक पार्टी के एकीकरण का कोई प्रश्न नहीं था; अखिल रूसी सोवियत सम्मेलन में बोल्शेविक प्रतिनिधि (जो कि लेनिन के आने से पहले आरज़ी सरकार पर एक ऐसी कार्यदिशा अपना रहे थे, जो कि मेंशेविक अन्तरराष्ट्रीयतावादियों के क़रीब पड़ती थी) और मेंशेविक प्रतिनिधि युद्ध के प्रश्न पर एक एकजुट अवस्थिति पेश करने को लेकर बातचीत करने जाने वाले थे। रैबिनोविच के अनुसार, इसके पहले ही बोल्शेविक प्रतिनिधियों के सामने लेनिन ने अपनी थीसीज़ पेश कर दी जिसके कारण एकीकरण की वार्ता खटाई में पड़ गयी। जैसा कि हमने ऊपर जि़क्र किया, अव्वलन तो लेनिन ने थीसीज़ बोल्शेविक प्रतिनिधियों की अलग बैठक में नहीं बल्कि मेंशेविकों और बोल्शेविकों की एक साझा बैठक में पेश की थी और दूसरी बात यह कि पार्टियों के बीच एकीकरण कभी बोल्शेविकों और मेंशेविकों के बीच एजेण्डे पर था ही नहीं। लेकिन इसे रैबिनोविच बोल्शेविकों और मेंशेविकों के बीच आम तौर पर एकीकरण की वार्ता के तौर पर पेश करने का प्रयास करते हैं, जो सच्चाई से परे है।

यह भी ग़ौरतलब है कि इस दौर के ब्यौरे के लिए रैबिनोविच किसी बोल्शेविक नेता के लेखन पर निर्भर नहीं करते हैं। मज़ेदार बात यह है कि पहले तो रैबिनोविच इस बैठक को बोल्शेविक प्रतिनिधियों की बैठक क़रार देते हैं, जिसके बाद इन प्रतिनिधियों को मेंशेविकों के साथ एकीकरण की बैठक के लिए जाना था, लेकिन उसके कुछ ही आगे रैबिनोविच मेंशेविक नेताओं द्वारा लेनिन की थीसीज़ पर प्रतिक्रियाओं का भी जि़क्र करते हैं; प्रश्न यह उठता है कि यदि उस बैठक में मेंशेविक थे ही नहीं तो उन्होंने लेनिन द्वारा उनकी थीसीज़ की प्रस्तुति पर वे प्रतिक्रियाएँ कैसे दीं? (देखें, वही, पृ. 40)

इसके बाद रैबिनोविच फिर से स्तालिन को अपना निशाना बनाते हैं। उनका दावा है कि 6 अप्रैल को केन्द्रीय कमेटी के रूसी ब्यूरो की एक बैठक में कामेनेव ने लेनिन की ‘अप्रैल थीसीज़’ पर हमला करते हुए कहा कि अगर इन्हें स्वीकार किया गया तो फिर पार्टी महज़़ प्रचारकों के एक समूह में तब्दील हो जायेगी। जब कामेनेव ने यह बात रखी, तो रैबिनोविच के अनुसार, स्तालिन ने कामेनेव का समर्थन किया। आगे भी रैबिनोविच दावा करते हैं कि स्तालिन ने सातवें अखिल रूसी पार्टी सम्मेलन (अप्रैल सम्मेलन) में ही कामेनेव की लगभग मेंशेविक अवस्थिति से अपना रिश्ता तोड़ा। इन सभी सूचनाओं का स्रोत स्तालिन-विरोधी इतिहासकार बर्दज़ालोव या कुछ अन्य मेंशेविक संस्मरण हैं। इनके अलावा, रैबिनोविच ने किसी को भी उद्धृत करने की आवश्यकता अनुभव नहीं की है। लेकिन यदि आप इस सूचना को किसी अन्य स्रोत में तलाशना चाहेंगे तो आपको मुश्किल होगी, क्योंकि यह सूचना किसी भी अन्य स्रोत में आपको नहीं मिलेगी, न तो ई. एच. कार में, न क्रुप्सकाया के संस्मरणों में, न लेनिन के लेखन में, न स्तालिन के लेखन में और न ही पार्टी दस्तावेज़ों में। ज़ाहिर है, रैबिनोविच यह सिद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं कि स्तालिन की शुरुआती अवस्थिति हूबहू वही थी जो कि कामेनेव की है। इस दावे की असत्यता को हम ऊपर दर्शा चुके हैं।

आगे भी जहाँ 10 जून के प्रदर्शन की चर्चा की जाती है, वहाँ स्तालिन को चलते-चलते एक बार फिर से निशाना बनाया जाता है। यहाँ 6 जून की पीटर्सबर्ग कमेटी की एक बैठक का ब्यौरा दिया गया है, जिसमें स्तालिन आते हैं। रैबिनोविच बताते हैं कि स्तालिन यहाँ पुरज़ोर तरीक़े से 10 जून को प्रदर्शन करने के पक्ष में तर्क देते हैं, जो कि लेनिन की कार्यदिशा थी और इससे पता चलता है कि स्तालिन किस हद तक वामपन्थी हो गये थे! रैबिनोविच लिखते हैं, ”अपनी टिप्पणियों में स्तालिन ने प्रदर्शित किया कि मार्च में राजधानी में आने के बाद उन्होंने वाम दिशा में कितनी लम्बी यात्रा तय कर ली थी।” (वही, पृ. 60) ग़ौरतलब है, स्तालिन कभी भी कामेनेव की दक्षिणपन्थी अवस्थिति पर नहीं थे; वे आरज़ी सरकार को लेकर क्या अवस्थिति अपनायी जाये, इस सवाल पर भ्रमित ज़रूर थे, लेकिन वे कामेनेव के समान युद्ध में भागीदारी की हिमायत की अवस्थिति की ओर नहीं थे। लेनिन के आने के बाद निश्चित तौर पर स्तालिन के लिए यह भ्रम की स्थिति साफ़ हुई थी और उन्होंने रैबिनोविच के अनुसार ”वाम दिशा में” कुछ यात्रा की थी। दूसरी बात यह है कि रैबिनोविच कहीं भी यह नहीं बताते कि कई वर्षों बाद त्रात्स्की से बहस के दौरान स्तालिन ने अपनी इस ग़लती को स्वीकार भी किया था। यह बौद्धिक बेईमानी नहीं तो और क्या है, कि रैबिनोविच इसका जि़क्र तक नहीं करते हैं? 1924 में स्तालिन ने अपनी ग़लती को स्वीकार करते हुए लिखा था :

”पार्टी (इसका बहुमत) इस नयी दिशा की ओर अँधेरेे में अपना रास्ता तलाश रही थी। इसने शान्ति के प्रश्न पर सोवियतों के ज़रिये आरज़ी सरकार पर दबाव की नीति अपनायी और तत्काल सर्वहारा वर्ग और किसानों की तानाशाही से सारी सत्ता सोवियतों को हस्तान्तरित करने के नारे को नहीं अपनाया। इस आधी-अधूरी नीति का लक्ष्य था शान्ति के ठोस प्रश्नों पर सोवियतों को आरज़ी सरकार के वास्तविक साम्राज्यवादी स्वभाव को समझने में सक्षम बनाना और इस प्रकार आरज़ी सरकार का सोवियतों पर से नियन्त्रण हथिया लेना। लेकिन यह बुरी तरह से ग़लत अवस्थिति थी, क्योंकि यह शान्तिवादी भ्रमों को जन्म देती थी, रक्षावाद को बल देती थी और इस प्रकार जनसमुदायों की क्रान्तिकारी शिक्षा में बाधा डालती थी। उस समय मैंने भी अन्य पार्टी कॉमरेडों के साथ यही अवस्थिति अपनायी थी और अप्रैल के मध्य में मैंने इसे पूरी तरह से छोड़ दिया जब मैंने लेनिन की थीसीज़ को अपना लिया। एक नयी दिशा की आवश्यकता थी। यह नयी दिशा पार्टी को लेनिन ने अपनी प्रसिद्ध अप्रैल थीसीज़ में दी थी।” (जे. वी. स्तालिन, 1953, ट्रॉट्स्कीज़्म ऑर लेनिनिज़्म, कलेक्टेड वर्क्स, खण्ड – 6, अंग्रेज़ी संस्करण, फ़ॉरेन लैंगुएजेज़ पब्लिशिंग हाउस, मॉस्को, पृ. 348)

लेकिन स्तालिन की इस आत्मालोचना को रैबिनोविच पूरी तरह से गोल कर जाते हैं, जिससे स्तालिन के बारे में एक भ्रामक तस्वीर पेश होती है। स्पष्ट है, हर उदार और यहाँ तक कि बोल्शेविकों से सहानुभूति रखने वाले बुर्जुआ इतिहासकार के लिए भी स्तालिन आँख की किरकिरी के समान हैं।

लेनिन के राजनीतिक नेतृत्व व प्रभाव के आकस्मिक कारण,
बकौल रैबिनोविच!

रैबिनोविच का मानना है कि अन्तत: लेनिन की कार्यदिशा (अप्रैल थीसीज़ में प्रस्तुत) को पार्टी में स्वीकार किया गया तो इसके दो कारण थे: एक तो यह कि लेनिन का बौद्धिक प्रभाव पार्टी के ऊपर काफ़ी ज़्यादा था और दूसरा यह कि फ़रवरी क्रान्ति के बाद से ही पार्टी सदस्यता का ढाँचा बदलता जा रहा था और उसमें बहुत से ऐसे तत्व प्रवेश कर गये थे जिनमें एक प्रकार का क्रान्तिकारी अधैर्य था। ऐसे अधैर्यवान सदस्यों को समाजवादी क्रान्ति की मंजि़ल में प्रवेश की बात करने वाली लेनिन की रैडिकल कार्यदिशा रुच रही थी और यही वजह थी की अन्तत: लेनिन की कार्यदिशा पार्टी में हावी हो गयी। रैबिनोविच लिखते हैं :

”फ़रवरी क्रान्ति के समय से ही पार्टी सदस्यता की शर्तों को लगभग रद्द कर दिया गया था, और अब बोल्शेविक क़तारें जल्दबाज़ नये रंगरूटों से भर गयी थीं जो कि मार्क्सवाद के बारे में लगभग कुछ नहीं जानते थे और जिन्हें क्रान्तिकारी कार्रवाई के लिए भयंकर अधैर्य एकजुट करता था। इसके अलावा, राजधानी में कारावास, निर्वासन और प्रवासन से लौटने वालों में तमाम पुराने पार्टी सदस्य थे, जो कि उन बोल्शेविकों से ज़्यादा रैडिकल होने का रुझान रखते थे जो कि युद्ध के दौरान पेत्रोग्राद में ही थे।” (रैबिनोविच, 1991, पृ. 41)

दूसरे शब्दों में, यदि पेत्रोग्राद में पहले की ही तरह पार्टी के भीतर सूझबूझ वाले, विवेकवान और मध्यमार्गी बोल्शेविकों का बोलबाला रहा होता (जैसे कि कामेनेव!) तो फिर लेनिन की जल्दबाज़ कार्यदिशा लागू नहीं हुई होती। हम देख सकते हैं कि रूसी क्रान्ति के बारे में तमाम बुर्जुआ व उदारवादी बुर्जुआ इतिहासकारों का दर्द आज तक भी शान्त नहीं हो पाया है। मसलन, वे तमाम क़ि‍स्म की आकस्मिकताओं या अलग-अलग विशिष्ट व्यक्तियों की कुछ ख़ास अभिलाक्षणिकताओं का हवाला देकर ऐसी बातें करते रहते हैं : ”अगर रूस में भी कोई लॉयड जॉर्ज होता तो…”, ”अगर पार्टी में अधैर्यवान रंगरूट न भर गये होते तो लेनिन की रैडिकल कार्यदिशा की बजाय कामेनेव की नर्म कार्यदिशा लागू होती…” वग़ैरह।

पहली बात तो यह है कि बोल्शेविक पार्टी में सदस्यता की शर्तों में कभी छूट नहीं दी गयी थी; यह सच है कि ऐसे दौर आये थे जब कि खुले काम की परिस्थितियों के कारण सदस्यता देने में ज़्यादा उदारता बरती गयी। लेकिन ऐसा दौर महज़़ फ़रवरी क्रान्ति के बाद ही नहीं आया था, बल्कि कई बार आया था। और पार्टी ने बार-बार शुद्धीकरण अभियान चलाकर ग़ैर-संजीदा तत्वों की छँटनी भी की थी। ग़ौरतलब बात यह है कि लेनिन की कार्यदिशा को स्वीकार करने के पीछे पार्टी के आम बौद्धिक स्तर का नीचे जाना और अदूरदर्शी नये रंगरूटों का भरना नहीं था। 6 अप्रैल से 24 अप्रैल तक ही (जब कि प्रसिद्ध अप्रैल सम्मेलन हुआ था) रूस में बदलती परिस्थितियाँ लगातार लेनिन की कार्यदिशा के सहीपन को साबित कर रही थीं। युद्ध में मिल रही लगातार पराजयों, मन्त्रि‍मण्डलीय संकट, भूख, मोर्चे से पलायन, सेना व मज़दूरों में विद्रोह की बढ़ती भावना – ये सभी बोल्शेविक पार्टी के सामने लेनिन की कार्यदिशा के सहीपन को सिद्ध कर रहे थे। इसलिए लेनिन की कार्यदिशा पहले 14 अप्रैल के पार्टी के पेत्रोग्राद नगर सम्मेलन में विजयी हुई और उसके बाद 24 अप्रैल के अखिल रूसी पार्टी सम्मेलन में विजयी हुई। ई.एच. कार का ब्यौरा इस विषय में कहीं ज़्यादा सन्तुलित है और अमेरिकी इतिहास-लेखन के टिपिकल विकृतीकरण से मुक्त है :

”ये कार्यवाहियाँ एक बार फिर से पार्टी पर लेनिन की अपरिमित प्रभाव को दिखला रही थीं, जो प्रभाव जुमलों पर नहीं, बल्कि परिस्थितियों की अद्वितीय और गहरी समझदारी के अत्यंत सम्मोहक प्रभाव को सम्प्रेषित करने वाली साफ़ नज़र और तीक्ष्ण तर्कों पर आधारित था। ”लेनिन के आने से पहले सभी कामरेड अँधेरे में भटक रहे थे”, जैसा कि पेत्रोग्राद सम्मेलन में आये एक प्रतिनिधि ने बताया।” (ई.एच. कार, 1978, दि बोल्शेविक रिवोल्यूशन, खण्ड 1, डब्ल्यू. डब्ल्यू. नॉर्टन एण्ड कं., न्यूयॉर्क, पृ. 82)

लेनिन की अवस्थितियों का विकृतीकरण या उसे समझने में अक्षमता का प्रदर्शन जारी रखते हुए रैबिनोविच दावा करते हैं कि लेनिन का अप्रैल में रूस आते ही शुरुआती मूल्यांकन यह था कि आरज़ी सरकार को तत्काल उखाड़ फेंका जाना चाहिए। 20-21 अप्रैल को पीटर्सबर्ग कमेटी द्वारा वामपन्थी कार्यदिशा पर अमल के कारण एक जन प्रदर्शन हुआ जो कि पार्टी के पूर्ण नियन्त्रण में नहीं रह सका। बोग्दातियेव की अगुवाई में एक वामपन्थी धड़ा काफ़ी हद तक इसका जि़म्मेदार था। लेनिन ने इसे बड़ी भूल बताया और कहा कि कार्रवाई के मौक़ों पर ऐसी भूलें कई बार काफ़ी बड़ी क़ीमत वसूल लेती हैं, लेकिन साथ ही लेनिन ने यह भी कहा कि जो सक्रिय होते हैं और क़दम उठाते हैं उनसे ग़लतियाँ हो सकती हैं। रैबिनोविच यहाँ यह जोड़ देते हैं :

”इस मौक़े पर उनकी (लेनिन की) टिप्पणियाँ यह दिखलाती हैं कि आरज़ी सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए जनसमुदायों को तैयार करने का कार्यभार अब उन्हें उन दिनों की अपेक्षा काफ़ी जटिल लग रहा था जब वे अभी रूस लौटे थे…” (रैबिनोविच, 1991, पृ 45)

यह लेनिन की अवस्थिति का भयंकर विकृतीकरण है और उन्हें वामपन्थी भटकाव का शिकार बनाने का प्रयास है। रैबिनोविच यह इसलिए भी करते हैं क्योंकि इससे उनकी ‘विभाजित पार्टी’ की थीसिस को बल मिलता है। सच्चाई यह है कि लेनिन ने अपने रूस में आने साथ ही जो ‘अप्रैल थीसीज़’ पेश की थी उसमें तत्काल आरज़ी सरकार को उखाड़ फेंकने की कोई बात नहीं की थी। लेनिन का यह मानना था कि जब तक कि बोल्शेविक पार्टी पीटर्सबर्ग सोवियत और अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस में बहुमत में नहीं आ जाती और जब तक वह प्रान्तों में बेहतर स्थिति में नहीं आ जाती तब तक बोल्शेविक अगर आरज़ी सरकार के ख़ि‍लाफ़ क्रान्ति कर सत्ता स्थापित कर भी लें तो भी वे उस पर टिके नहीं रह पायेंगे। और यह अवस्थिति लेनिन की शुरू से ही थी न कि बाद में बनी। लेनिन ने शुरुआत में महज़़ यह दावा किया था कि अब क्रान्ति की जनवादी मंजि़ल से समाजवादी मंजि़ल में संक्रमण शुरू हो चुका है और अब किसी प्रकार के संसदीय जनवाद की ओर लौटने की बात पीछे की ओर उठाया जाने वाला क़दम होगा। अब सारी सत्ता सोवियतों को सौंपने का नारा ही प्रासंगिक है। ”दोहरी सत्ता” की विशिष्ट और अस्थायी स्थिति में कुछ समय के लिए राज्यसत्ता के सोवियतों के हाथों में शान्तिपूर्ण रूप से हस्तान्तरण की सम्भावना बनी हुई थी, लेकिन जुलाई के बाद ही यह सम्भावना समाप्त हुई जब राज्यसत्ता पूरी तरह बुर्जुआ वर्ग के हाथों में सुदृढ़ीकृत हो गयी और सोवियतों की भूमिका बुर्जुआ वर्ग के पिछलग्गू की बन गयी। लेकिन लेनिन की पूरी अवस्थिति को रैबिनोविच तोड़-मरोड़ कर पेश करते हैं। अप्रैल सम्मेलन के बारे में ही रैबिनोविच एक ऐसी तस्वीर पेश करते हैं जो कि ‘विभाजित पार्टी’ के उनके विचार का समर्थन करे। वे कहते हैं कि सम्मेलन में लेनिन को बिना शर्त नहीं बल्कि बाशर्त समर्थन मिला; दूसरे इण्टरनेशनल से नाता तोड़ने के उनके आह्वान को ज़्यादा समर्थन नहीं मिला और ”वर्तमान स्थिति” पर लेनिन की अवस्थि‍ति को बहुमत तो मिला लेकिन केवल 24 वोटों के अन्तर से विजय मिली। अव्वलन तो ये तथ्य ही सटीक नहीं है, और दूसरे किसी भी पार्टी सम्मेलन में तीखी बहस होना एक संक्रमणकालीन स्थिति में सामान्य था। तथ्यत: यह ग़लती है कि ”वर्तमान स्थिति” पर लेनिन की अवस्थिति के समर्थन में 73 वोट पड़े जबकि उसके विरोध में 39 वोट पड़े, जबकि 8 प्रतिनिधियों ने वोट डालने से इंकार कर दिया। यानी लेनिन की अवस्थिति की 24 नहीं बल्कि 34 वोटों से जीत हुई थी और उसके पक्ष में कुल वोटों के दो-तिहाई वोट पड़े थे। बोल्शेविक पार्टी का सिद्धान्त ही यही है कि कार्यदिशा तय होने से पहले पूर्ण स्वतन्त्रता और बहस की पूरी आज़ादी और बहुमत द्वारा कार्यदिशा निर्धारित हो जाने पर पूर्ण केन्द्रीयता और पूर्ण अनुशासन। सातवें पार्टी सम्मेलन में लेनिन की अप्रैल थीसीज़ को इतने अन्तर से भी बहुमत प्राप्त हुआ तो वह लेनिन की कार्यदिशा की एक बड़ी विजय थी क्योंकि दस दिन पहले ही लेनिन की अवस्थिति अल्पमत में थी। लेकिन रैबिनोविच के लिए सम्मेलन में यह वोटिंग पैटर्न एक ‘विभाजित पार्टी’ को दिखलाता है।

साथ ही, रैबिनोविच दावा करते हैं कि सम्मेलन में लेनिन के विरोध में एक कामेनेव गुट था जिसमें नोगिन, मिल्युतिन और फेदोरोव थे, जबकि उसके विपरीत लेनिन का पक्ष लेने वाला धड़ा था जिसमें लेनिन के अलावा, ज़ि‍नोवियेव, स्तालिन, स्वेर्दलोव और स्मिल्गा शामिल थे। इन नौ लोगों को ही केन्द्रीय कमेटी में भी चुना गया जिससे पता चलता है कि पार्टी में कामेनेव धड़े का भी काफ़ी प्रभाव था और इसी मध्यमार्गी धड़े को इसी वजह से नेतृत्व में इतना स्थान मिला था। यहाँ भी देख सकते हैं कि एक बुर्जुआ अनुभववादी इतिहासकार यदि बोल्शेविक पार्टी के भीतर चलने वाले दो लाइनों के संघर्ष का इतिहास लिखेगा तो किस नज़रिये से लिखेगा। वह उसमें दो लाइनों के संघर्ष और उसके कारण बनने वाली व्यापक अवस्थितियों को गुटों के रूप में देखेगा और साथ ही हर वोटिंग या चुनाव को प्रभावी गुटों के बीच एक समझौते के रूप में पेश करेगा। इसलिए रैबिनोविच के अनुसार सातवें सम्मेलन में लेनिन की अवस्थिति की कोई भारी विजय नहीं हुई बल्कि एक सन्तु‍लन स्थापित करने वाला समझौता किया गया! ज़ाहिर है, रैबिनोविच जनवादी केन्द्रीयता के सिद्धान्त को ही नहीं समझते हैं और हर पार्टी फ़ोरम पर सत्ता के लिए गुटों के बीच संघर्ष की तलाश करते नज़र आते हैं। पार्टी के भीतर जारी विचारधारात्मक और राजनीतिक संघर्ष का इस्तेमाल वे बोल्शेविक पार्टी को एक ‘विभाजित पार्टी’ के रूप में प्रदर्शित करने के लिए करते हैं और यह दावा करते हैं कि सोवियत स्रोतों में कहीं भी इस संघर्ष की तस्वीर नहीं मिलती है और अगर कहीं जि़क्र आता भी है तो लेनिन की कार्यदिशा से विपथगमन करने वाले को वाम या दक्षिण भटकाव का शिकार बता दिया जाता है। यह एक विचित्र आपत्ति है।

निश्चित तौर पर, बोल्शेविक पार्टी जिस कार्यदिशा को तमाम बहस-मुबाहसे के बाद सही कार्यदिशा के रूप में स्वीकार करेगी उससे विचलन को निश्चित तौर पर वह सही द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी अवस्थिति से वाम या दक्षिण विचलन के तौर पर ही देखेगी। इस बात पर दुखी होने का रै‍बिनोविच के पास कोई वैध कारण नहीं है। दूसरी बात जो स्पष्ट तौर पर सामने आती है वह यह है कि एक कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर जारी राजनीतिक व विचारधारात्मक उथल-पुथल, बहस और विमर्श के बीच तथा उस पार्टी की सांगठनिक एकता और अनुशासन के बीच रैबिनोविच व तमाम बुर्जुआ इतिहासकार फ़र्क़ नहीं कर पाते हैं। इसका कारण यही है कि वे जनवादी केन्द्रीयता के सिद्धान्त को नहीं समझ पाते हैं। अगर हम रैबिनोविच द्वारा लिखे गये इतिहास को ही देखें तो हम पाते हैं कि पार्टी में जो तमाम बहसें चल रही थीं, उसके बावजूद, अगर हम अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा पार्टी की तय कार्यदिशा से किये गये विचलनों को छोड़ दें, तो सांगठनिक अनुशासन के मामले में कमोबेश एकता मौजूद थी। पार्टी की कमेटियाँ केवल उन सूरतों में अपने से ऊपर की कमेटियों या केन्द्रीय कमेटी के निर्देशों को लागू करने में असफल दिखती हैं, जबकि उनके बीच सम्पर्क टूट चुका होता है, या फिर जब कुछ विशिष्ट व्यक्ति अनुशासन का उल्लंघन करते हैं। इसके अतिरिक्त, सभी मौक़ों पर हर कमेटी सदस्य अपनी कमेटी के बहुमत द्वारा तय कार्यदिशा और केन्द्रीय कमेटी के निर्देशों का पालन करता है और हर कमेटी अपने से ऊपर की कमेटी और केन्द्रीय कमेटी के निर्देशों का पालन करती नज़र आती है। इसलिए विचारों और कार्यदिशाओं के घमासान के बावजूद, अपवादस्वरूप स्थितियों, जैसे कि सम्पर्क का टूट जाना, के अलावा, कार्रवाई की एकता बोल्शेविक पार्टी की ख़ासियत के तौर पर सामने आती है। और चूँकि रैबिनोविच भी एक अनुभववादी और प्रत्यक्षवादी इतिहासकार हैं, इसलिए वे भी तथ्यों की प्रस्तुति में इतना हेर-फेर नहीं कर पाते कि कोई और तस्वीर पेश कर पायें। उनका इतिहास-लेखन भी ग़ैर-इरादतन ही सही मगर इस तथ्य को सही सिद्ध करता है। मिसाल के तौर पर, रैबिनोविच का पूरा ब्यौरा दिखलाता है कि किस प्रकार सैन्य संगठन के पोदवॉइस्की और नेव्स्की केन्द्रीय कमेटी के निर्णयों को सैन्य संगठन के सम्मेलन में लागू करवाने का प्रयास करते हैं और साथ ही व्यापक सैनिक आबादी में बोल्शेविक कार्यदिशा को लागू करवाने के लिए अथक प्रयास करते हैं, लेकिन अलग से रैबिनोविच एक स्थान पर यह दावा करते हैं कि पोदवॉइस्की और नेव्स्की स्वतन्त्र व्यक्तित्व के स्वामी थे और वे अक्सर केन्द्रीय कमेटी के निर्णयों को लागू नहीं करते थे। इस दावे को सही सिद्ध करने के लिए रैबिनोविच संशोधनवाद के दौर के स्रोत का हवाला देते हैं। इस प्रकार के अन्तरविरोध रैबिनोविच के इतिहास-लेखन में हमें पर्याप्त संख्या में मिलते हैं।

बोल्शेविक सैन्य संगठन और उसके नेतृत्व के बारे में रैबिनोविच के अन्तरविरोधी विचार

बोल्शेविक सैन्य संगठन के बारे में रैबिनोविच के विचारों की पड़ताल विशेष तौर पर उपयोगी है क्योंकि फ़रवरी से जुलाई के बीच जो कुछ हो रहा था उसमें सैन्य संगठन और सेना की भूमिका पर रैबिनोविच का अतिशय ज़ोर है, और राजनीतिक पहलू पर ज़ोर कम है। यह अलग से आलोचना का विषय है, लेकिन अभी हम सैन्य संगठन और उसके नेतृत्व के विषय में रैबिनोविच के विचारों पर ध्यान केन्द्रित करेंगे।

जैसा कि हमने ऊपर जि़क्र किया है, ‘विभाजित पार्टी’ की अपनी अवधारणा को पुष्ट करने के लिए रैबिनोविच सैन्य संगठन के बोल्शेविक संगठनकर्ताओं की स्वायत्तता और राजनीतिक स्वतन्त्रता पर ज़्यादा बल देते हैं। लेकिन उसके बाद 10 जून के प्रदर्शन की तैयारी के विषय में हम उनके ही ब्यौरे को देखें तो हम पाते हैं कि चाहे इन नेताओं के विचार केन्द्रीय कमेटी के निर्णय से मेल खाते हों या नहीं, अन्तत: ये केन्द्रीय कमेटी के निर्णयों को ही लागू करने का प्रयास करते थे। इनमें दो नेता प्रमुख थे – पोदवॉइस्की और नेव्स्की। निश्चित तौर पर, आकस्मिक परिस्थितियों के उत्पन्न होने पर सैन्य संगठन के ये नेता अपने स्वतन्त्र निर्णय का उपयोग करते थे और इसके अलावा उनसे और कोई उम्मीद भी नहीं की जा सकती है। लेकिन बेहद प्रतिकूल परिस्थितियों में भी इन नेताओं ने विलक्षण अनुशासन का प्रदर्शन किया।

रैबिनोविच बताते हैं कि 10 जून के प्रदर्शन की योजना मूलत: बोल्शेविक सैन्य संगठन ने बनायी थी। लेकिन केन्द्रीय कमेटी मई माह के मध्य तक इस पर कोई ठोस निर्णय नहीं ले पा रही थी। वास्तव में केन्द्रीय कमेटी इस बात को लेकर सशंकित थी कि ऐसे किसी प्रदर्शन में सैनिकों के अतिरिक्त मज़दूरों की भागीदारी किस हद तक सुनिश्चित की जा सकती है। केन्द्रीय कमेटी का स्पष्ट मानना था कि यदि प्रदर्शन में व्यापक जन भागीदारी सुनिश्चित नहीं की जा सकती, तो महज़़ सैनिकों के भारी असन्तोष के आधार पर ऐसे प्रदर्शन के भारी नकारात्मक नतीजे सामने आ सकते हैं। यही कारण था कि केन्द्रीय कमेटी तत्काल सैन्य संगठन की इस योजना को स्वीकृति नहीं दे रही थी। वहीं दूसरी ओर बोल्शेविक सैन्य संगठन की स्थिति भी नाज़ुक थी क्योंकि पेत्रोग्राद के सैनिकों में असन्तोष बढ़ता जा रहा था और उसके आक्रोश को फूट पड़ने से रोक पाना मुश्किल हो रहा था। यही कारण था कि सैन्य संगठन के बोल्शेविक संगठनकर्ताओं के लिए एक मुश्किल हालत थी। केन्द्रीय कमेटी के निर्देश के बिना वे प्रदर्शन का आह्वान नहीं कर सकते थे और सैनिकों का दबाव नीचे से बहुत ज़्यादा था क्योंकि उनके लिए अब और इन्तज़ार करना बेहद मुश्किल था। अगर हम रैबिनोविच के ही ब्यौरे को देखें तो हम पाते हैं कि इसी दौरान पीटर्सबर्ग कमेटी की बैठक के दौरान नेव्स्की ने स्वयं कहा था कि केन्द्रीय कमेटी के निर्णय के बिना इस दिशा में कोई क़दम न उठाये जायें। 23 मई की सैन्य संगठन की एक बैठक में भी सैन्य संगठन के एक अन्य नेता दाश्केविच और नेव्स्की दोनों ने ही प्रदर्शन की योजना को बाशर्त समर्थन देते हुए यह कहा कि जनसमर्थन के बिना किसी प्रदर्शन का आयोजन करना एक रणकौशलात्मक भूल होगी लेकिन अगर व्यापक जनसमर्थन और भागीदारी को सुनिश्चित किया जा सकता हो, तो निश्चित तौर पर प्रदर्शन किया जाना चाहिए। रैबिनोविच की किताब में ही इस बैठक का और इसमें नेव्स्की द्वारा किये गये हस्तक्षेप का जि़क्र आता है (पृ. 55)। यहाँ नेव्स्की और कुछ नहीं बल्कि केन्द्रीय कमेटी की राय को ही पेश कर रहे थे। इसके बावजूद, आगे रैबिनोविच नेव्स्की को उन लोगों में से एक व्यक्ति के तौर पर पेश करते हैं जो कि बोल्शेविक सैन्य संगठन में थे और केन्द्रीय कमेटी की इच्छाओं के विपरीत एक अपरिपक्व प्रदर्शन करने की हिमायत कर रहे थे।

रैबिनोविच का यह कहना बिल्कुल सही है कि पेत्रोग्राद में अलग-अलग गैरीसनों में प्रदर्शन करने को लेकर भारी माँग थी और इसका बोल्शेविक सैन्य संगठन पर काफ़ी दबाव पड़ रहा था। साथ ही, रैबिनोविच स्वयं ही दिखलाते हैं कि दुस्साहसवादी अवस्थिति अपनाने वाले अराजकतावादियों और अराजकतावादी-कम्युनिस्टों के कारण भी सैनिकों के बीच में बोल्शेविकों का राजनीतिक कार्य काफ़ी मुश्किल हो जाता था। कई बार अधैर्य और असन्तोष से भरे हुए सैनिक अराजकतावादियों और अराजकतावादी-कम्युनिस्टों के वाम दुस्साहसवाद की ओर आकृष्ट होने लगते थे। ऐसे में, बोल्शेविक सैन्य संगठन के संगठनकर्ताओं को रैडिकल रेटरिक का इस्तेमाल करते हुए, विस्फोट की स्थिति को रोकना पड़ता था। इस रैडिकल रेटरिक के कारण ही कई बार रैबिनोविच भ्रमित हो जाते हैं और उन्हें लगता है कि बोल्शेविक संगठनकर्ता भी अपरिपक्व प्रदर्शन का आह्वान कर रहे थे। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं था, क्योंकि बोल्शेविक संगठनकर्ताओं के लिए रैडिकल जुमलों और मुहावरों का इस्तेमाल करना एक मजबूरी बन गया था, अन्यथा तमाम गैरीसनों पर उनका राजनीतिक प्रभाव ख़तरे में पड़ जाता। अगर हम स्वयं रैबिनोविच के ही पूरे ब्यौरे को पढ़ें तो स्पष्ट हो जाता है कि बोल्शेविक सैन्य संगठन के ये नेता किसी भी तरह से जनआक्रोश के विस्फोट को तब तक टालने का प्रयास कर रहे थे, जब‍ तक कि केन्द्रीय कमेटी इस प्रश्न पर एक ठोस निर्णय न ले ले। पोदवॉइस्की और नेव्स्की इस प्रक्रिया में केन्द्रीय कमेटी को यह भी सम्प्रेषित कर रहे थे कि इस विस्फोट को बहुत लम्बे समय तक नहीं टाला जा सकता है क्योंकि अगर बोल्शेविक इसमें नहीं भी हिस्सा लेते हैं, तो सैनिक देर-सबेर सब्र खो बैठेंगे और प्रदर्शन करेंगे। उस सूरत में गैरीसनों में बोल्शेविकों के प्रभाव में ह्रास आयेगा और अराजकतावादियों का प्रभाव बढ़ सकता है। इसी पूरे सन्दर्भ में केन्द्रीय कमेटी और पीटर्सबर्ग समिति में तीखी बहस और नोक-झोंक हुई। लेकिन रै‍बिनोविच द्वारा इससे यह नतीजा निकाला जाना कि यह बोल्शेविक पार्टी के विभाजित चरित्र को दिखलाता है, क़तई ग़लत है। यह भी सही हो सकता है कि कई बार बोल्शेविक पार्टी के सैन्य संगठन में काम कर रहा नेतृत्व आम सैनिकों के भारी दबाव के प्रभाव में आकर काम कर रहा हो; तब भी इससे यह नतीजा निकालना अनुचित होगा कि बोल्शेविक सैन्य संगठनकर्ता या बोल्शेविक सैन्य संगठन पार्टी के भीतर सत्ता का एक अलग केन्द्र था जिसके अपने हित और अपने लक्ष्य थे और जो लगातार अपने प्रभाव और स्वायत्तता को बढ़ाने के लिए प्रयासरत रहता था। नेव्स्की और पॉड्वाइस्की लगातार यह प्रयास करते थे कि सैनिकों के बीच केन्द्रीय कमेटी द्वारा तय कार्यदिशा पर सहमति बनायी जा सके। बताने की आवश्यकता नहीं है कि हमेशा ऐसा कर पाना सम्भव नहीं होता था, विशेष तौर पर उन परिस्थितियों में जिनसे उस समय रूस गुज़र रहा था।

आगे रैबिनोविच बताते हैं कि किस तरह पहले 6 जून को केन्द्रीय कमेटी के साथ संयुक्त बैठक में पोदवॉइस्की ने केन्द्रीय कमेटी से इस प्रश्न पर तत्काल निर्णय लेने की अपील की, किस प्रकार केन्द्रीय कमेटी में इसे लेकर तीखी बहस हुई जिसमें लेनिन, स्तालिन, स्वेर्दलोव और फेदोरोव ने इसका समर्थन किया जबकि कामेनेव, नोगिन और ज़ि‍नोवियेव ने इसका विरोध किया। यहाँ तक कि क्रुप्सकाया भी इस प्रश्न पर पूरी तरह से लेनिन के साथ नहीं थीं और उनके भी इस विषय पर कुछ संशय थे। इसके बाद यह मसला पीटर्सबर्ग कमेटी में भी उठा वहाँ भी व्यापक बहस के बाद लेनिन की अवस्थिति को स्वीकार किया गया, लेकिन टॉम्स्की के आग्रह पर अन्तिम निर्णय को 9 जून की पीटर्सबर्ग कमेटी की विस्तारित बैठक तक के लिए टाल दिया गया। बाद में इस बैठक में भी प्रदर्शन करने के फ़ैसले पर मुहर लगी। इन बहसों का विवरण देते हुए रैबिनोविच वास्तव में ‘विभाजित पार्टी’ की थीसिस को ही सही ठहराने का निरन्तर प्रयास करते नज़र आते हैं, जिसके अनुसार सोवियत स्रोतों में (रैबिनोविच के लिए 1953-56 के बाद के सोवियत स्रोत) में लेनिन के प्रश्नेतर नेतृत्व की तस्वीर पेश करने के लिए इन बहसों के ब्यौरों को दबा दिया गया। लेकिन जो वास्तविक सोवियत स्रोत हैं, यानी 1953-56 से पहले के सोवियत स्रोतों में, जिसमें कि ‘बोल्शेविक पार्टी का इतिहास’ भी शामिल है, इस बहसों को छिपाया नहीं गया है और इनका एक ब्यौरा दिया गया है। दूसरी बात यह है कि इन बहसों से क़तई यह साबित नहीं होता कि बोल्शेविक पार्टी एक ‘विभाजित पार्टी’ थी; उल्टे ‘कार्रवाई में पूर्ण एकता’ इन्हीं तीखी बहसों से पैदा होती थी और ये सांगठनिक कार्रवाई का धरातल है जहाँ यह देखा जाना चाहिए कि पार्टी एकजुट थी या नहीं। लेकिन रैबिनोविच लेनिन-कालीन और स्तालिन-काल से पहले की बोल्शेविक पार्टी को उदार बुर्जुआ चौखटे में फिट करने के प्रयास में बोल्शेविक पार्टी में लगातार ‘विभाजित पार्टी’ की अपनी अवधारणा को थोपने का प्रयास करते रहते हैं।

10 जून के प्रस्तावित और बाद में रद्द कर दिये गये प्रदर्शन के ठीक पहले और ठीक बाद की स्थितियों और इस दौरान सैन्य संगठन की गतिविधियों की चर्चा करते हुए एक स्थान पर रैबिनोविच बोल्शेविकों और अराजकतावादियों व अराजकतावादी-कम्युनिस्टों के बीच मौजूद कुछ समानताओं की बात करते हैं। हालाँकि, बाद में वे उनके बीच मौजूद विचारधारात्मक मतभेदों की चर्चा भी करते हैं, लेकिन समानताओं और असमानताओं, दोनों की ही चर्चा में यह स्पष्ट हो जाता है कि इस मुद्दे पर रैबिनोविच की स्पष्ट समझदारी नहीं है। साथ ही, जिस रूप में रैबिनोविच कम्युनिस्टों व अराजकतावादियों के अन्तिम लक्ष्य का जि़क्र करते हैं, उससे ही स्पष्ट हो जाता है कि वे इस लक्ष्य को ही आदर्शवादी यूटोपिया समझते हैं, हालाँकि वे ऐसा खुलकर नहीं कहते। रैबिनोविच लिखते हैं :

”अराजकतावादी-कम्युनिस्टों और बोल्शेविकों द्वारा कल्पित भावी आदर्श समाजों के बीच कई समानताएँ थीं। इसके अलावा ऐसे तात्कालिक मुद्दों पर भी उनकी अवस्थितियाँ एक थीं जैसे कि युद्ध को जारी रखना, सेना में अनुशासन की पुनर्स्थापना, उद्योगों पर मज़दूरों का नियन्त्रण, और आरज़ी सरकार के प्रति दृष्टिकोण।” (वही, पृ. 62)

स्पष्ट है कि रैबिनोविच जो दिखता है उसी को सच समझ बैठे हैं। यह सच है कि अन्तिम लक्ष्य के तौर पर एक राज्यविहीन समाज अराजकतावादियों और कम्युनिस्टों दोनों का ही लक्ष्य होता है, लेकिन कम्युनिस्ट इस बात को समझते हैं कि एक वर्गविहीन समाज के बिना एक राज्य विहीन समाज नहीं हो सकता है और सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व के बिना एक वर्गविहीन समाज में संक्रमण सम्भव नहीं है। अगले ही पृष्ठ पर रैबिनोविच इस बात को मानते हैं। लेकिन तात्कालिक तौर पर भी आरज़ी सरकार के विरोध के प्रति बोल्शेविकों का रवैया अलग था और अराजकतावादियों का अलग। बोल्शेविक आरज़ी सरकार को बुर्जुआ सरकार मानते हुए, उसका ध्वंस कर सर्वहारा सत्ता क़ायम करना चाहते थे, जबकि अराजकतावादी हर प्रकार की सत्ता के ख़ात्मे की बात कर रहे थे। उद्योगों पर नियन्त्रण के प्रश्न पर भी बोल्शेविकों की समझदारी समूचे राष्ट्रीय उद्योगों पर मज़दूर वर्ग के नियन्त्रण की थी, न कि एक-एक कारख़ाने पर मज़दूरों के नियन्त्रण की। हालाँकि बोल्शेविक पार्टी ने कुछ ही माह बाद क्रान्ति की तात्विक शक्ति के तौर पर कारख़ाना समितियों द्वारा कारख़ानों पर क़ब्ज़े के आन्दोलन का समर्थन किया था, लेकिन इसके समर्थन के साथ ही पार्टी इस अनिवार्यता के प्रति सचेत थी कि आगे इसे अलग-अलग कारख़ानों पर मज़दूरों के नियन्त्रण से राष्ट्रीय उद्योग पर मज़दूर वर्ग के नियन्त्रण में तब्दील करना होगा। इसलिए तात्कालिक तौर पर भी बोल्शेविकों और अराजकतावादी-कम्युनिस्टों के बीच कई अन्तर थे, जिन्हें कई बार आम रूसी मज़दूर और सैनिक नहीं समझ पाते थे, जैसा कि रैबिनोविच ने भी लिखा है। लेकिन निश्चित तौर पर रैबिनोविच आम रूसी मज़दूर या सैनिक नहीं हैं!

10 जून, 18 जून और 3-5 जुलाई की घटनाएँ : बोल्शेविक पार्टी के बदलते मूल्यांकन और निर्णय और रैबिनोविच का ‘विभाजित पार्टी’
का सिद्धान्त

रैबिनोविच कहीं भी ”आधिकारिक सोवियत व्याख्या” का पुतला खड़ा करना नहीं भूलते ताकि बाद में उसे ध्वस्त कर सकें। 10 जून के प्रदर्शन के लाटि़सस पहले के दौर के बारे में लिखते हुए रैबिनोविच दावा करते हैं कि वाईबोर्ग ज़ि‍ला कमेटी के सदस्य लाटसिस ने अपनी डायरी में दर्ज किया है कि 8 जून को हुई बोल्शेविकों की बैठक में सैनिक समर्थन को लेकर तो कोई सन्देह नहीं था, लेकिन मज़दूरों की भागीदारी को लेकर अभी भी कुछ सन्देह बना हुआ था। छठी कांग्रेस में स्तालिन की रिपोर्ट में भी बताया गया था कि मज़दूरों की भागीदारी किस हद तक होगी, इसे लेकर कुछ प्रश्न चिन्ह बने हुए थे। लेकिन 11 जून के ही प्राव्दा  में यह दावा किया गया था कि 10 जून के प्रदर्शन को मज़दूरों और सैनिकों, दोनों का ही समर्थन प्राप्त था, जो कि रैबिनोविच के मुताबिक़ आगे चलकर आधिकारिक सोवियत व्याख्या बन गयी। यहाँ सोचने की बात यह है कि छठी कांग्रेस में स्तालिन की रिपोर्ट से ज़्यादा आधिकारिक व्याख्या बोल्शेविकों के अख़बार प्राव्दा के एक लेख को क्यों माना जाना चाहिए? एक केन्द्रीय कमेटी सदस्य और एक वाईबोर्ग ज़ि‍ला कमेटी जैसी अहम कमेटी के सदस्य की व्याख्या को आधिकारिक क्यों नहीं माना जायेगा? इसी प्रकार के अन्तरविरोधों से रैबिनोविच का ब्यौरा भरा हुआ है।

यह भी एक ग़ौरतलब बात है कि रैबिनोविच हर उपलब्ध तथ्य को पेश ज़रूर करते हैं लेकिन जहाँ कहीं भी कोई तथ्य उनके ‘विभाजित पार्टी’ के सिद्धान्त के विपरीत जाता है, वहाँ वे शान्त रहते हैं और कोई टिप्पणी नहीं करते। मिसाल के तौर पर, रैबिनोविच यह तथ्य हमारे सामने पेश करते हैं 10 जून के प्रदर्शन के पक्ष में निर्णय लिये जाने की सूचना सोवियत के बोल्शेविक प्रतिनिधियों को नहीं दी गयी थी (जिसका कारण एक भ्रम प्रतीत होता है; केन्द्रीय कमेटी के सदस्यों ने सोच लिया था कि यह कार्य पीटर्सबर्ग कमेटी करेगी और पीटर्सबर्ग कमेटी के सदस्यों ने यह सोच लिया था कि यह कार्य केन्द्रीय कमेटी करेगी)। सोवियत के बोल्शेविक प्रतिनिधियों ने केन्द्रीय कमेटी व पीटर्सबर्ग कमेटी के समक्ष इसका कड़ा विरोध किया और कहा कि 10 जून के प्रदर्शन का आयोजन नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन साथ ही 9 जून की आधी रात साढ़े बारह बजे जब पहली अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस ने इस प्रदर्शन पर प्रतिबन्ध लगाते हुए सैनिकों व मज़दूरों को अपनी वैकल्पिक समानान्तर अपील जारी की और प्रदर्शन में हिस्सेदारी न करने को कहा तो इस प्रस्ताव पर बोल्शेविक प्रतिनिधियों ने वोट देने से इंकार कर दिया। यह घटना बोल्शेविक पार्टी में अनुशासन के उच्च स्तर को दिखलाने वाली एक प्रातिनिधिक घटना है। यह दिखलाती है कि पार्टी के भीतर राजनीतिक असहमति और संघर्ष जितना भी तीखा हो, जि़म्मेदार बोल्शेविक निकायों ने हमेशा और जि़म्मेदार बोल्शेविक संगठनकर्ताओं ने लगभग हमेशा पार्टी अनुशासन का पालन किया। लेकिन इस घटना के बाबत सभी तथ्य पेश करते हुए भी रैबिनोविच इस पर कोई टिप्पणी नहीं करते, क्योंकि यह घटना उनके ‘विभाजित पार्टी’ के सिद्धान्त का खण्डन करती है।

ठीक ऐसी ही एक घटना थी 10 जून की भोर में 2 बजे केन्द्रीय कमेटी द्वारा प्रदर्शन को रद्द करने का फ़ैसला। रैबिनोविच स्वयं बताते हैं कि पीटर्सबर्ग कमेटी, जो पहले से भी केन्द्रीय कमेटी के कुछ निर्णयों को लेकर आलोचनात्मक रही थी, केन्द्रीय कमेटी के आख़ि‍री मौक़े पर लिये गये इस निर्णय से क़तई सहमत नहीं थी। लेकिन इसके बावजूद पीटर्सबर्ग कमेटी ने बेहद कम समय में 10 जून के प्रदर्शन को रोकने के लिए हर सम्भव प्रयास किया और काफ़ी हद तक उसे रोकने में कामयाब भी रही। यह दीगर बात है कि बाद में पीटर्सबर्ग कमेटी के अधिकांश सदस्यों ने केन्द्रीय कमेटी द्वारा आख़ि‍री समय पर प्रदर्शन रद्द किये जाने को लेकर काफ़ी कड़ी आलोचना रखी और इस आलोचना पर लेनिन को स्वयं केन्द्रीय कमेटी का दृष्टिकोण रखना पड़ा। लेकिन यहाँ ग़ौरतलब बात यह है कि पीटर्सबर्ग कमेटी ने केन्द्रीय कमेटी से गम्भीर असहमति रखते हुए भी उसके निर्णय को लागू किया और बाद में उचित मंच पर इस बहस को उठाया। लेकिन रैबिनोविच इस पर कुछ भी नहीं कहते और बाद में हुई बैठक का हवाला देकर यह चित्र प्रस्तुत करते हैं कि उसमें पीटर्सबर्ग कमेटी और केन्द्रीय कमेटी के बीच एक बेहद तीखी बहस हुई और इस तस्वीर के आधार पर वे फिर से ‘विभाजित पार्टी’ की ही अपनी अवधारणा को पुष्ट करते हैं। जैसा कि हम देख सकते हैं चुन-चुनकर तथ्य लिये जाते हैं और फिर अपनी थीसीज़ को पुष्ट करने का प्रयास किया जाता है, हालाँकि रैबिनोविच अपने अनुभववादी और प्रत्यक्षवादी पूर्वाग्रहों के कारण वे तथ्य भी पेश करते हैं, जो उनकी थीसीज़ का खण्डन करते हैं। इतिहास-लेखन हमेशा ही एक विचारधारात्मक और राजनीतिक उपक्रम होता है और रैबिनोविच का इतिहास-लेखन इस बात को बिना शक सिद्ध कर देता है।

रैबिनोविच जो विवरण पेश करते हैं, उससे एक और बात सिद्ध हो जाती है। स्वयं त्रात्स्की के हवाले से रैबिनोविच बताते हैं कि 10 जून के प्रदर्शन को कुछेक अतिवामपन्थी बोल्शेविक ही सत्ता पर क़ब्ज़े के प्रयास के तौर पर व्याख्यायित कर रहे थे और ऐसी योजनाएँ भी बना रहे थे। लेकिन ये कुछ व्यक्तियों की व्यक्तिगत सोच थी और बोल्शेविक पार्टी के किसी भी जि़म्मेदार निकाय या संगठनकर्ता की ऐसी सोच नहीं थी। इसलिए 10 जून के प्रदर्शन के सन्दर्भ में भी बोल्शेविक पार्टी में तीन सत्ता केन्द्र (केन्द्रीय कमेटी, पीटर्सबर्ग कमेटी व बोल्शेविक सैन्य संगठन) नहीं थे जिनके ”अलग-अलग लक्ष्य और अलग-अलग हित” थे, जैसा कि रैबिनोविच ने किताब की शुरुआत में दावा किया था। निश्चित तौर पर, ऐसे मौक़े आये थे (और इसमें कोई ताज्जुब की बात भी नहीं है) जब इन तीन निकायों के बीच भी और उनके भीतर भी मत-भिन्नता मौजूद थी। लेकिन इन तीनों ही निकायों के काम करने में हम कठोर सांगठनिक अनुशासन देख सकते हैं। यही बात हम एक अन्य घटना में भी देख सकते हैं। जब 10 जून के प्रदर्शन को केन्द्रीय कमेटी ने वापस ले लिया तो स्मिल्गा और स्तालिन उससे विशेष तौर पर नाराज़ थे और उन्होंने केन्द्रीय कमेटी से इस्तीफ़ा देने तक की पेशकश की थी, जिसे कि ख़ारिज कर दिया गया था। स्मिल्गा का मानना था कि केन्द्रीय कमेटी ने सोवियत के बोल्शेविक प्रतिनिधियों की यह बात मानकर ग़लती की है कि प्रदर्शन रद्द कर दिया जाये और लेनिन समेत केन्द्रीय कमेटी का गैरीसन व कारख़ानों में हावी माहौल का मूल्यांकन ग़लत है। लेकिन फिर भी स्मिल्गा ने क्रोंस्टाट में सैनिकों को क्या कहा, वह बोल्शेविक पार्टी के अनुशासन को ही दिखलाता है। स्वयं रैबिनोविच ने स्मिल्गा के भाषण को उद्धृत किया है : ”यह प्रश्न हरेक मज़दूर और सैनिक के सामने खड़ा है; यह शब्दों नहीं बल्कि कार्रवाई की माँग करता है…क्रोंस्टाट में हम सभी के लिए यह कड़वी और दुख भरी बात है कि प्रदर्शन को रद्द कर दिया गया, लेकिन हमें गर्व होना चाहिए कि अपनी शक्ति के प्रति हम सचेत हैं, हम क्रान्तिकारी अनुशासन की ज़रूरत को समझते हैं और जिससे कि क्रोंस्टाट ने अपने से ही प्रदर्शन नहीं किया।” (रैबिनोविच, 1991, में उद्धृत, पृ. 85-86)

जैसा कि हम देख सकते हैं कि तमाम वैचारिक व राजनीतिक संघर्षों के बावजूद बोल्शेविक पार्टी कार्रवाई के मामले में अद्भुत अनुशासन का पालन करती थी। यही बोल्शेविक पार्टी की असली शक्ति थी, न कि इसका ‘विभाजित पार्टी’ होना, जैसा कि रैबिनोविच दावा करते हैं। रैबिनोविच का विवरण कुछ और कहता है, लेकिन वे जहाँ कहीं भी कोई मूल्यगत निर्णय देते हैं, वे कुछ और ही कहते हैं। मिसाल के तौर पर, रैबिनोविच के विवरण से ही स्पष्ट हो जाता है कि कोई भी पार्टी निकाय 10 जून के प्रदर्शन को (यदि वह होता तो भी) सत्ता पर क़ब्ज़े के प्रयास के तौर पर नहीं देख रहा था। इस मायने में केन्द्रीय कमेटी और पीटर्सबर्ग कमेटी का मूल्यांकन भी समान था। जिस एक बोल्शेविक बोग्दातियेव ने (और उससे सहमत कुछ वामपन्थी बोल्शेविकों ने) ऐसे सपने पाल रखे थे, उसे आगे कमेटी से निष्कासित कर दिया गया था, हालाँकि उसकी पार्टी सदस्यता बरक़रार रखी गयी थी। लेकिन इसके बावजूद रैबिनोविच लिखते हैं :

”ये मतभेद 11 जून की पीटर्सबर्ग कमेटी की एक आपात बैठक में उभरकर सामने आ गये जो कि विशेष तौर पर केन्द्रीय कमेटी की व्याख्या सुनने के लिए आयोजित की गयी थी। इस बैठक के विस्तृत प्रकाशित प्रोटोकॉल से त्सेरेतली के कांग्रेस भाषण के प्रति बोल्शेविकों की आरंभिक प्रतिक्रिया, पीटर्सबर्ग कमेटी की कड़वाहट और स्वतन्त्रता की भावना, और 10 जून के प्रदर्शन के बारे में केन्द्रीय कमेटी और पीटर्सबर्ग कमेटी की आश्चर्यजनक रूप से भिन्न अवधारणाएँ सामने आती हैं।” (वही, पृ. 86)

रैबिनोविच यह नहीं बताते कि 10 जून के प्रदर्शन की केन्द्रीय कमेटी और पीटर्सबर्ग कमेटी की अवधारणाओं में क्या भिन्नताएँ थीं? क्या पीटर्सबर्ग कमेटी इसे एक शान्तिपूर्ण प्रदर्शन से ज़्यादा मानती थी? नहीं! फिर दोनों की अवधारणाओं में फ़र्क़ क्या था? जब आप 11 जून की बैठक के बारे में रैबिनोविच के ही ब्यौरे को पढ़ते हैं तो आप पाते हैं कि अन्तर 10 जून के प्रदर्शन की अवधारणाओं में नहीं था, बल्कि इस बात के आकलन और मूल्यांकन में था कि सोवियत कांग्रेस द्वारा इस प्रदर्शन के ख़ि‍लाफ़ प्रस्ताव पारित करने के बाद और इस बात की स्पष्ट सूचना मिलने के बाद कि दक्षिणपन्थी गिरोह, जैसे कि ब्लैक हण्ड्रेड्स, इस प्रदर्शन में घुसपैठ कर इसे हिंसात्मक बना सकते हैं और फिर बोल्शेविकों के दमन का और उनके ख़ि‍लाफ़ एक माहौल तैयार हो सकता है, प्रदर्शन को करना उचित होगा या नहीं। साथ ही, इस बात के आकलन में भी अन्तर मौजूद थे कि मज़दूरों की भागीदारी किस हद तक होगी, क्योंकि इसके बारे में पीटर्सबर्ग कमेटी के भीतर भी कोई एक राय नहीं थी। तीसरा कारण था सोवियत कांग्रेस में बोल्शेविक प्रतिनिधियों को सूचना न होना, जिसके कारण वे सोवियत की भावी कार्रवाइयों में पार्टी की ओर से सही तरीक़े से कोई अवस्थिति पेश नहीं कर पाते। रैबिनोविच ने लेनिन द्वारा दी गयी सफ़ाई का एक बेहद छोटा हिस्सा पेश किया है। यदि लेनिन के भाषण को पढ़ा जाये तो स्पष्ट हो जाता है कि प्रदर्शन से जुड़े ठोस मसलों के बारे में केन्द्रीय कमेटी और पीटर्सबर्ग कमेटी का मूल्यांकन और आकलन अलग था, न कि प्रदर्शन की अवधारणाओं में कोई फ़र्क़ था। लेनिन समझ रहे थे कि जब तक सोवियतें सत्ता की अर्द्धनिकाय बनी हुई हैं और उन्होंने स्पष्ट रूप से प्रतिक्रान्तिकारी अवस्थिति नहीं अपनायी है और वे केवल ढुलमुलपन दिखला रही हैं, तब तक सोवियतों के सीधे तौर पर ख़ि‍लाफ़ जाने से बोल्शेविक जनसमुदायों में अलग-थलग पड़ सकते हैं; सोवियतों में बोल्शेविक अभी अल्पमत में थे और पार्टी अभी प्रान्तों में हावी माहौल को लेकर भी सुनिश्चित नहीं थी। ऐसे में, यदि 10 जून के प्रदर्शन के हिंस्र होने और अराजकता फैलने का ख़तरा स्पष्ट हो गया था, तो इसे रद्द कर लेनिन व केन्द्रीय कमेटी ने प्रशंसनीय लचीलापन दिखलाया था।

रैबिनोविच का पीटर्सबर्ग कमेटी द्वारा केन्द्रीय कमेटी के प्रति गुस्से के इज़हार को पीटर्सबर्ग कमेटी की ”स्वतन्त्रता की भावना” के तौर पर पेश किया जाना भी तथ्यों का विकृतीकरण है। यदि ऐसा होता तो पीटर्सबर्ग कमेटी प्रदर्शन के रद्द किये जाने के फ़ैसले को ही मानने से इंकार कर देती। लेकिन उसने असहमत होने के बाद भी इस फ़ैसले को लागू किया। चूँकि इस प्रदर्शन को संगठित और सही तरीक़े से आयोजित करने की पूरी जि़म्मेदारी पीटर्सबर्ग कमेटी ही मुख्य रूप से उठा रही थी, इसलिए आख़ि‍री समय पर प्रदर्शन का रद्द किया जाना उसके लिए एक शर्मनाक स्थिति पैदा करता था क्योंकि अब उन्हीं जनसमुदायों को प्रदर्शन करने से मना करना, जिन्हें पिछले दो दिनों से वे प्रदर्शन के लिए तैयार कर रहे थे, उनके लिए एक अजीब हालत पैदा करता था। पीटर्सबर्ग कमेटी ने जिस कड़वाहट के साथ केन्द्रीय कमेटी की इस मसले पर आलोचना रखी, उसका मुख्य कारण यह था। लेकिन इसे अलगाववाद या स्वतन्त्रता की भावना के तौर पर पेश करना किसी भी तरीक़े से तार्किक नहीं है। बहरहाल, इसके बाद रैबिनोविच 18 जून को हुए प्रदर्शन का एक अच्छा ब्यौरा पेश करते हैं, जो कि अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस के आह्वान पर हुआ था, मगर जिसमें बोल्शेविक नारे व बैनर पूरी तरह हावी हो गये थे। एक प्रकार से 10 जून का रद्द प्रदर्शन ही 18 जून को आयोजित हो गया और यह स्पष्ट हो गया कि बोल्शेविकों की मान्यता मज़दूरों व सैनिकों में बढ़ती जा रही है।

चौथे अध्याय में रैबिनोविच 16 जून से 23 जून तक बोल्शेविक सैन्य संगठन के अखिल रूसी सम्मेलन का विवरण पेश करते हैं। इसमें रैबिनोविच कई महत्वपूर्ण प्रेक्षण पेश करते हैं, जोकि रूसी क्रान्ति के इतिहास के अध्ययन के लिए मूल्यवान हैं। लेकिन यहाँ भी ‘विभाजित पार्टी’ की अवधारणा को बल प्रदान करने के लिए रैबिनोविच कुछ ऐसी टिप्पणियाँ करते हैं, जिनका कोई आधार नहीं है। मिसाल के तौर पर, रैबिनोविच दावा करते हैं कि इस सम्मेलन को कई बोल्शेविक संगठनकर्ता सत्ता पर क़ब्ज़ा करने के उपकरण के रूप में देख रहे थे। यह प्रेक्षण केवल बेतुका दिख ही नहीं रहा है, बल्कि बेतुका है भी। बोल्शेविकों के सैन्य संगठन के सम्मेलन को ही कोई जि़म्मेदार बोल्शेविक संगठनकर्ता सत्ता पर क़ब्ज़े के उपकरण के रूप में देख रहा हो, इसकी सम्भावना नगण्य है। यह ज़रूर सच है कि सैन्य संगठन के आम बोल्शेविक काडर में यह भावना बढ़ती जा रही थी कि सत्ता पर क़ब्ज़े को लम्बे समय तक टाला नहीं जा सकता है, और पार्टी को जल्द से जल्द उस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए और पेत्रोग्राद गैरीसन से आये कुछ प्रतिनिधि 18 जून को कार्यक्रम समाप्त होने के ठीक पहले मंच पर आकर इस बात की माँग कर रहे थे कि सम्मेलन के एजेण्डा में बदलाव किया जाये और सम्मेलन को ही सशस्त्र बग़ावत के प्रचालन स्टाफ़ में तब्दील कर दिया जाये। लेकिन सैन्य संगठन के आम काडरों में ऐसी भावना होना लाजि़मी है क्योंकि राज्यसत्ता के ध्वंस में बल प्रयोग का पहलू ही प्रधान होता है और जो निकाय क्रान्तिकारी बल प्रयोग के लिए विशिष्ट तौर पर निर्मित, शिक्षित, प्रशिक्षित हो, उसके आम काडर में यह भावना आना सहज है। दूसरी बात यह है कि इसी सम्मेलन के बीच 18 जून का प्रदर्शन हुआ जिसके लिए 18 जून के पहले सत्र को रद्द कर दिया गया था। इस प्रदर्शन से लौटने पर बोल्शेविकों के लिए व्यापक जनसमर्थन होने की भावना बोल्शेविक सैन्य संगठन में वैसे भी उभार पर थी और सशस्त्र बग़ावत के लिए आम काडर में अधैर्य बढ़ता जा रहा था, जिसे लेनिन को स्वयं सम्मेलन में आकर नियन्त्रित करना पड़ा। लेकिन इसकी इस रूप में व्याख्या करना कि कुछ बोल्शेविक इस सम्मेलन में हुए जुटान को ही सशस्त्र विद्रोह और क्रान्ति का उपकरण मान रहे थे, निहायत बेतुका है और रैबिनोविच यह उपक्रम सम्भवत: इसलिए करते हैं, ताकि बोल्शेविक पार्टी के भीतर विचारों की बहुलता और ‘विभाजित पार्टी’ के अपने सिद्धान्त को बल दे सकें।

साथ ही, रैबिनोविच इस प्रक्रिया में यह भी बताते हैं कि सम्मेलन में इस अधैर्य के माहौल पर पोदवॉइस्की ने स्वयं लेनिन से चर्चा की और लेनिन ने उन्हें स्पष्ट शब्दों में बताया कि अभी कोई भी सशस्त्र विद्रोह अपरिपक्व होगा और अगर वह सफल भी हो गया तो बोल्शेविक सत्ता में टिके नहीं रह पायेंगे। लेनिन ने इस माहौल को नियन्त्रित करने का निर्देश दिया और स्पष्ट कर दिया कि कोई भी दुस्साहसवाद पार्टी और क्रान्ति से भारी क़ीमत वसूल करेगा। इस निर्देश के अनुसार ही काम करते हुए पोदवॉइस्की और नेव्स्की दोनों ने ही जि़म्मेदार बोल्शेविक संगठनकर्ता और नेता की भूमिका निभाते हुए सम्मेलन के प्रतिनिधियों के मन में यह बात बिठाने का अथक प्रयास किया कि अभी सशस्त्र विद्रोह के लिए वक़्त पका नहीं है। लेकिन अन्यत्र रैबिनोविच यह भी दावा करते हैं कि पोदवॉइस्की और नेव्स्की विशेष तौर पर स्वतन्त्रता और स्वायत्तता की भावना से भरे हुए थे और अनुशासन के प्रति उनका प्रतिरोध होता था। लेकिन जब वास्तविक तथ्यों का विवरण यह प्रदर्शित करता है कि बोल्शेविक सैन्य संगठन के ये दोनों ही शीर्ष नेता केन्द्रीय कमेटी और लेनिन के निर्देशों पर सख्‍़ती से अमल कर रहे थे, तो उस पर रैबिनोविच कोई भी टिप्पणी नहीं करते हैं। चूँकि यह घटनाक्रम स्वयं रैबिनोविच की व्याख्याओं के विपरीत जाता है, इसलिए उसे रैबिनोविच ”केन्द्रीय कमेटी के दबाव” के रूप में व्याख्यायित करते हैं, क्योंकि बोल्शेविक सांगठनिक अनुशासन को समझ पाना उनके उदार बुर्जुआ विचारों के कारण उनके लिए सम्भव नहीं है। रैबिनोविच लिखते हैं :

”पेत्रोग्राद सैन्य संगठन के विकास का विवरण देते हुए नेव्स्की ने बेहतर संगठन और ज़्यादा पार्टी अनुशासन के बारे में कुछ विशिष्ट बिन्दु पेश किये। उन्होंने माना, ”फि़लहाल, पीटर्सबर्ग संगठन अपने संगठन के बारे में ज़्यादा शेखी नहीं बघार सकता है…ऐसी रेजीमेण्टें हैं जहाँ हमारा काफ़ी प्रभाव है लेकिन वहाँ कोई औपचारिक संगठन नहीं है।” शायद केन्द्रीय कमेटी के दबाव में नेव्स्की ने सैन्य संगठन की गतिविधियों और केन्द्रीय कमेटी के बीच तालमेल की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि हालाँकि ”सैन्य संगठन का एक विशेष चरित्र है”…और हालाँकि ”सैनिक विशेष परिस्थितियों में रहते हैं…मगर फिर भी सैन्य संगठन को नियमित पार्टी संगठन का संघटक अंग होना चाहिए।” ” (वही, पृ. 115-116)

रैबिनोविच यह अटकल लगाते हैं कि जून में यह तय किये जाने का, कि छठी कांग्रेस जुलाई में की जायेगी, एक कारण यह भी था कि परिस्थितियाँ बेहद तेज़ी से बदल रही थीं, जनसमुदायों में असन्तोष बढ़ रहा था और इसके मद्देनज़र भी जुलाई में छठी कांग्रेस करने का निर्णय लिया गया। वैसे तो इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिलता है, लेकिन फिर भी इस अटकल को पूरी तरह से ख़ारिज नहीं किया जा सकता है। लेकिन इसके आगे रैबिनोविच कहते हैं कि यह कांग्रेस मध्यमार्गी लेनिनवादी धड़े, वामपन्थी स्तालिन और स्मिल्गा तथा दक्षिणपन्थी कामेनेव व नोगिन के धड़े के बीच भी बहस का मंच होने वाली थी। लेकिन अगर हम छठी कांग्रेस के ब्यौरों को देखें तो हम पाते हैं कि स्तालिन और बुखारिन ने इसमें प्रमुख रिपोर्टें पेश कीं। लेनिन उस समय छिपे हुए थे और त्रात्स्की गिरफ़्तार थे। लेनिन ने नारों के बारे में नामक लेख के ज़रिये स्पष्ट किया था कि पार्टी को इस समय कौन-सी कार्यदिशा अपनानी चाहिए। ऐसे में स्तालिन को सीधे वामपन्थी धड़े का अंग बताना उचित नहीं प्रतीत होता है, हालाँकि 10 जून के प्रदर्शन के रद्द किये जाने के समय उन‍की अवस्थिति वाम अवस्थिति के नज़दीक पड़ती थी। ई.एच. कार ने छठी कांग्रेस का ब्यौरा देते हुए बताया है कि इस कांग्रेस को स्तालिन ने सक्षम नेतृत्व दिया, लेनिन की सशस्त्र विद्रोह की कार्यदिशा का समर्थन किया और साथ ही कांग्रेस में आये प्रतिनिधियों को अपरिपक्व कार्रवाई के विरुद्ध विशेष तौर पर आगाह किया। ऐसे में, कोई ऐसा संकेत नहीं मिलता कि स्तालिन उस समय वाम धड़े का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, उल्टे इसके स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि स्तालिन लेनिन द्वारा प्रस्तुत कार्यदिशा पर पूरी कांग्रेस को संचालित कर रहे थे।

रैबिनोविच छठी कांग्रेस के पहले पीटर्सबर्ग कमेटी में सशस्त्र विद्रोह के प्रश्न पर जारी बहस का ब्यौरा देते हैं। इसके ठीक पहले रैबिनोविच बताते हैं कि किस प्रकार लेनिन ने सैन्य संगठन की अखिल रूसी कांग्रेस में अपरिपक्व सशस्त्र विद्रोह के ख़ि‍लाफ़ बात रखी थी, हालाँकि रैबिनोविच के अनुसार लेनिन, पोदवॉइस्की व नेव्स्की की दलीलों के बावजूद तत्काल सशस्त्र विद्रोह के प्रति आकर्षण आम बोल्शेविक काडर में कम नहीं हुआ था और यह मसला अभी हल नहीं हुआ था, हालाँकि तात्कालिक तौर पर सम्मेलन में लेनिन की कार्यदिशा से मिलती-जुलती कार्यदिशा ही पारित हुई थी। इसके ठीक बाद वे पीटर्सबर्ग कमेटी में बहस का विवरण देते हैं और बताते हैं :

”इस चर्चा के समापन पर पीटर्सबर्ग कमेटी ने 2 के मुक़ाबले 19 वोटों से वोलोदार्स्की और टॉम्स्की द्वारा प्रायोजित एक प्रस्ताव पारित किया जो कि सैन्य संगठन और केन्द्रीय कमेटी के साथ मिलकर (पीटर्सबर्ग कमेटी के) कार्यकारी आयोग को सर्वहारा वर्ग के प्रति एक अपील का मसौदा तैयार करने का अधिकार देता था, जो कि सर्वहारा वर्ग को अलग-थलग क्रान्तिकारी कार्रवाइयों में शिरकत न करने के लिए कहती और आबादी के अन्य वर्गों के बीच प्रभाव जीतने के लिए सभी प्रयास करने को कहती। यह केन्द्रीय कमेटी द्वारा किये गये विरोध के बिल्कुल अनुरूप उठाया गया क़दम था। लाटसिस द्वारा पेश एक संशोधन 9 के मुक़ाबले 12 वोटों से पारित हुआ और वह केन्द्रीय कमेटी की कार्यदिशा के अनुरूप नहीं था; यह कहता था कि ”अगर जनसमुदायों को रोकना असम्भव हुआ तो पार्टी को आन्दोलन को अपने हाथों में ले लेना चाहिए और इसका इस्तेमाल सोवियत और सोवियतों की कांग्रेस पर दबाव डालने के लिए करना चाहिए।” देखने में लगता है कि इस संशोधन का मक़सद यह सुनिश्चित करना था कि वोलोदार्स्की व टॉम्स्की का प्रस्ताव पीटर्सबर्ग कमेटी और विशेष तौर पर वाईबोर्ग कमेटी को प्रदर्शन आन्दोलन का नियन्त्रण लेने से नहीं रोकेगा, अगर इसे नियन्त्रित नहीं किया जा सके। लेकिन इसका प्रभाव था लाटसिस, नाउमोव, डाइल और स्तुकोव जैसे रैडिकल नेताओं और ज़ि‍ला स्तर पर तमाम आम पार्टी सदस्यों की हरकतों को वैध ठहराना और उन्हें प्रोत्साहित करना, जो कि पहले से ही एक जल्दी होने वाले विद्रोह को अवश्यम्भावी और वांछनीय मानते थे।” (वही, पृ. 127-128)

स्पष्ट रूप में देखा जा सकता है कि रैबिनोविच विभिन्न पार्टी निकायों के बीच दीवार खींचने का कोई भी अवसर गँवाना नहीं चाहते। यहाँ उन्होंने बेवजह पार्टी की केन्द्रीय कमेटी और पीटर्सबर्ग कमेटी के बीच एक खाई बनाने का प्रयास किया है। रैबिनोविच दावा करते हैं कि पीटर्सबर्ग कमेटी ने भारी बहुमत से ऐसा प्रस्ताव पारित किया जो कि लेनिन की कार्यदिशा के अनुरूप था लेकिन एक वामपन्थी लाटसिस के प्रस्ताव पर उसमें एक ऐसा संशोधन भी जोड़ दिया जो कि लेनिन की कार्यदिशा के अनुरूप नहीं था। लेकिन हम स्तालिन और लेनिन दोनों के ही लेखन में देखते हैं कि केन्द्रीय कमेटी का भी यही मानना था कि अगर पार्टी अपने तमाम प्रयासों के बावजूद जनता को जुलाई के प्रस्तावित प्रदर्शन में शामिल होने से नहीं रोक पाती है, तो फिर पार्टी को उसमें शामिल होकर उसे अपने नियन्त्रण में ले लेना चाहिए। मिसाल के तौर पर, छठी कांग्रेस में स्तालिन ने जो रिपोर्ट पेश की उसमें बताया गया है कि जब स्वत:स्फूर्त प्रदर्शनों के फूट पड़ने की ख़बर पार्टी तक पहुँची तो उस समय बोल्शेविक पार्टी का पेत्रोग्राद नगर सम्मेलन जारी था। इस दिन का पूरा घटनाक्रम पेश करते हुए स्तालिन बताते हैं कि अन्त में तौरीदा महल में केन्द्रीय कमेटी और पीटर्सबर्ग कमेटी की एक बैठक हुई। आगे स्तालिन कहते हैं :

”बैठक ने फ़ैसला लिया कि जब क्रान्तिकारी मज़दूर और सैनिक जनता ”सारी सत्ता सोवियतों को!” के नारे के तहत प्रदर्शन कर रही है, तो सर्वहारा वर्ग की पार्टी को इससे हाथ झाड़ लेने और आन्दोलन से अलग-थलग खड़े रहने की कोई इजाज़त नहीं है; यह जनता को भाग्य के उतार-चढ़ाव पर नहीं छोड़ सकती है; इसे इस स्वत:स्फूर्त आन्दोलन को एक सचेत और संगठित चरित्र देने के लिए जनता के साथ बने रहना होगा।” (स्तालिन, 1953, वही, पृ. 174)

लेनिन ने भी इस दौर के अपने लेखों नारों के बारे में, तीन संकट, एक जवाब आदि में यही बात दुहराई है। ऐसे में, रैबिनोविच का यह दावा कि आन्दोलन को रोक पाने में असफल होने पर उसे अपने नेतृत्व में ले लेने का लाटसिस का प्रस्ताव केन्द्रीय कमेटी के विपरीत था, बिल्कुल ग़लत है। तथ्यों के प्रति वफ़ादारी रखने के बावजूद रैबिनोविच ऐसी ग़लती क्यों कर बैठते हैं? क्योंकि रैबिनोविच हर मौक़े पर केन्द्रीय कमेटी और पीटर्सबर्ग कमेटी के बीच एक दीवार खड़ी करना चाहते हैं और पीटर्सबर्ग कमेटी को ज़्यादा वामपन्थी दिखलाना चाहते हैं। जहाँ तक इन तमाम निकायों के बीच या उनके भीतर चल रही बहसों का प्रश्न है, अलग-अलग बोल्शेविक नेताओं ने कई बार वामपन्थी या दक्षिणपन्थी अवस्थिति अपनायी हो सकती है। लेकिन यह तो स्वाभाविक ही है। ‘विभाजित पार्टी’ की अवधारणा तभी सही ठहर सकती है जबकि इस कमेटियों के भीतर बहुमत द्वारा लिये गये निर्णयों को और ऊपर की कमेटियों द्वारा या केन्द्रीय कमेटी द्वारा लिये गये निर्णयों की नीचे की कमेटियों ने अवहेलना की हो। ऐसा कोई वाकया स्वयं रैबिनोविच नहीं बता पाते हैं।

ऐसा ही एक प्रयास रैबिनोविच तब करते हैं जब वे 22 जून की एक बैठक की बात करते हैं। यह बैठक सैन्य संगठन द्वारा प्रस्तावित की गयी थी और इसमें केन्द्रीय कमेटी और पीटर्सबर्ग कमेटी के सदस्यों को भी हिस्सेदारी करनी थी। लेकिन इन तीनों ही निकायों के नेतृत्वकारी और प्रमुख सदस्यों की ग़ैर-मौजूदगी के कारण इस बैठक को रद्द करना पड़ा। मौक़े पर जुटे तृणमूल बोल्शेविक सदस्यों और इकाई स्तर के नेतृत्व के लोगों ने एक अनौपचारिक बातचीत की। जैसा कि उम्मीद की जा सकती है कि आम सैन्य काडर और सैन्य इकाई स्तर के कुछ तृणमूल नेताओं के एकत्र होने पर सशस्त्र विद्रोह के प्रति अधैर्य का ही प्रदर्शन होना था। इस अनौपचारिक बातचीत में भी इस अधैर्य का पहलू हावी था। लेकिन इस बैठक का पूरी पार्टी की रणनीति को निर्धारित करने में या पार्टी के औपचारिक निकायों के बीच कार्यदिशा के अन्तर को दर्शाने में कोई महत्व नहीं है। देखा जाये तो यह ऐसी अनौपचारिक चर्चा थी नहीं जिसे बहुत महत्व दिया जाये क्योंकि ऐसी चर्चाएँ उस समय पेत्रोग्राद की कई छावनियों में चल रही थीं। इससे केवल आम बोल्शेविक काडरों के एक हिस्से और जनसमुदायों के बीच हावी माहौल का पता चलता है। यह माहौल किस तरफ झुका था यह पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को भी पता था और वह इसी को नियन्त्रित करने का प्रयास कर रहा था। लेकिन इस अनौपचारिक चर्चा को रैबिनोविच काफ़ी महत्व देते हैं, क्योंकि इससे उन्हें यह साबित करने में मदद मिलती है कि पूरी पार्टी एकमत होकर कभी लेनिन के मातहत नहीं थी, जो कि रैबिनोविच के अनुसार ”सोवियत स्रोतों की औपचारिक व्याख्या” है। हम पहले ही बता चुके हैं कि रैबिनोविच के ”सोवियत स्रोत” क्या हैं।

जब बोल्शेविक पार्टी जुलाई के प्रदर्शन को रोकने का प्रयास कर रही थी, यानी 3 जुलाई की सुबह तक, तब तक के दौर के बारे में रैबिनोविच कहते हैं कि इस दौर में रणकौशलात्मक रूप में लेनिन की अवस्थिति लगभग वही हो गयी थी जो कि कामेनेव की अवस्थिति थी। यह भी जो दिख रहा है, उसे सच मान लेने की रैबिनोविच की प्रत्यक्षवादी और अनुभववादी प्रवृत्ति को ही दिखलाता है। रैबिनोविच लिखते हैं, ”दिलचस्प बात है कि इस दौर के प्राव्दा में इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि लेनिन की रणकौशलात्मक अवस्थिति कुछ समय के लिए पार्टी के दक्षिणपन्थी धड़े की अवस्थिति से मिलने लगी थी। वास्तव में, पार्टी के वामपन्थी धड़े पर 22 जून के प्राव्दा में कामेनेव द्वारा हमला करने के लिए लिखा गया (जिसका शीर्षक था ”यह इतना सरल नहीं, कॉमरेडो”) लेख इस समय लेनिन द्वारा भी लिखा जा सकता था।” (रैबिनोविच, 1991, पृ. 132) आगे रैबिनोविच कामेनेव के लेख से जो उद्धरण पेश करते हैं उसी से पता चला जाता है कि लेनिन की अवस्थिति और कामेनेव की अवस्थिति क़तई एक जैसी नहीं थी, उस वक़्त भी एक जैसी नहीं थी जबकि पार्टी 3-5 जुलाई की घटनाओं को घटित होने से रोकने के प्रयासों में संलग्न थीं।

कामेनेव ने लिखा था कि रूसी जनवाद को अभी विश्व सर्वहारा और विश्व सर्वहारा क्रान्ति में भरोसा नहीं है और तब तक सत्ता पर क़ब्ज़ा करने का कोई अर्थ नहीं होगा क्योंकि रूसी क्रान्ति टिक नहीं पायेगी। इसका अर्थ यह था कि उन्नत पश्चिमी यूरोपीय देशों के सर्वहारा क्रान्ति के पहले रूस में क्रान्ति के बुर्जुआ जनवादी चरण को ही जारी रखना होगा। यह लेनिन की कार्यदिशा कभी नहीं थी, न तो रणकौशलात्मक दृष्टि से और न ही रणनीतिक दृष्टि से। लेनिन के अनुसार जुलाई सशस्त्र विद्रोह का समय इसलिए नहीं था क्योंकि सोवियतों में अभी बोल्शेविक बहुमत में नहीं थे और साथ ही प्रान्तों की स्थिति अभी पेत्रोग्राद की स्थिति से काफ़ी पीछे थी और बोल्शेविकों की वहाँ पकड़ भी कमज़ोर थी। लेनिन स्पष्ट तौर पर समझ रहे थे कि रूस इस समय साम्राज्यवादी विश्व के अन्तरविरोधों का सन्धि-बिन्दु बन रहा है और ऐसे में सर्वहारा क्रान्ति यहाँ सम्पन्न हो सकती है और इस रूप में रूस दुनिया में पहली समाजवादी क्रान्ति और सर्वहारा सत्ता की ज़मीन बन सकता है। इसलिए रणकौशलात्मक तौर पर भी लेनिन और कामेनेव के तर्क एकदम अलग थे। लेकिन चूँकि 2 जुलाई तक समूचा पार्टी नेतृत्व एकमत होकर जुलाई के प्रदर्शन को रोकने का प्रयास कर रहा था, इसलिए हर कोई प्राव्दा व अन्य बोल्शेविक पत्रों व पर्चों में प्रदर्शन रोकने के लिए ही दलीलें पेश कर रहा था। नतीजतन, इससे रैबिनोविच भ्रमित हो गये हैं कि लेनिन की अवस्थिति इस समय रणकौशलात्मक तौर पर कामेनेव से मिलने लगी थी। प्रत्यक्षवाद और अनुभववाद की अन्तर्दृष्टि में इस प्रकार की दृष्टिहीनता को रैबिनोविच की पुस्तक पढ़ते हुए बार-बार देखा जा सकता है।

चौथे अध्याय में ही रैबिनोविच प्राव्दा और सोल्दात्स्काइया प्राव्दा के बीच अन्तर निकालते हैं। उनका दावा है कि जून के आख़ि‍री दिनों में जबकि बोल्शेविक पार्टी एक अपरिपक्व विद्रोह को रोकने के लिए जूझ रही थी उस समय प्राव्दा और सोल्दात्स्काइया प्राव्दा में छप रही सामग्री में फ़र्क़ दिख रहा था क्योंकि प्राव्दा लेनिन के कठोर नियन्त्रण में काम कर रहा था जबकि सोल्दात्स्काइया प्राव्दा सैन्य संगठन का मुखपत्र होने के कारण काफ़ी स्वायत्त था और वह पोदवॉइस्की, नेव्स्की और झेनेव्स्की (सैन्य संगठन के एक अन्य बोल्शेविक नेता) की देख-रेख में निकल रहा था। रैबिनोविच का मक़सद यहाँ यह दिखलाना है कि बोल्शेविक सैन्य संगठन में अलगाववाद और स्वायत्तता की प्रवृत्तियाँ थीं, जिन्हें बाद में केन्द्रीय कमेटी ने नियन्त्रित किया। यह सिद्ध करने के लिए कि इन दोनों मुखपत्रों में अन्तर था, रैबिनोविच इन दोनों मुखपत्रों में छपे कई लेखों का उदाहरण देते हैं। मज़ेदार बात यह है कि अगर हम इन लेखों की ही विषय-वस्तु और प्रस्तुति को देखें तो पाते हैं कि दोनों मुखपत्रों में शैली और विषय की प्रस्तुति के फ़र्क़ के अलावा और कोई फ़र्क़ नहीं था। अन्तर्वस्तु में कोई अन्तर नहीं था।

यदि शैली और प्रस्तुति में अन्तर था तो यह अन्तर होना लाजि़मी था क्योंकि सोल्दात्स्काइया प्राव्दा सैनिकों के लिए निकलता था और उसमें उसी शैली और अन्दाज़ में बातें रखी जाती थीं जिस अन्दाज़ में सैनिकों को सम्प्रेषित करने के लिए आवश्यक था। चूँकि दोनों मुखपत्रों को पढ़ने वाले पाठक वर्ग का दायरा अलग था, इसलिए कहीं-कहीं ज़ोर में कुछ फ़र्क़ था। लेकिन इस फ़र्क़ को यूँ पेश किया जाना कि सैनिकों के लिए निकलने वाले मुखपत्र में बोल्शेविक सैन्य संगठन अपनी स्वतन्त्रता की भावना और स्वायत्तता दिखलाते हुए केन्द्रीय कमेटी से अलग कोई कार्यदिशा पेश कर रहा था, तथ्यत: ग़लत है। मिसाल के तौर पर, प्राव्दा में लेनिन ने 21 जून के अंक में एक लेख लिखा जिसमें उन्होंने लिखा कि सत्ता पर क़ब्ज़ा करने के लिए सशस्त्र विद्रोह का कोई भी अपरिपक्व प्रयास आगे भारी नुक़सान की ओर ले जा सकता है और इसके लिए इन्तज़ार करना होगा। लेनिन ने यह भी जोड़ा कि यह इन्तज़ार ज़्यादा लम्बा नहीं होगा। रैबिनोविच स्वयं कहते हैं : ”इस समय से लेकर जुलाई के दिनों तक प्राव्दा की कार्यदिशा आम तौर पर लेनिन की अवस्थिति से मेल खाती थी।” (वही, पृ. 132) रैबिनोविच यह सूचना भी बिल्कुल दुरुस्त देते हैं कि बोल्शेविक पार्टी इस समय पेत्रोग्राद सोवियत में बहुमत जीतने और अन्य वर्गों और विशेषकर प्रान्तों में किसानों के बीच अपने राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाने के लिए मोहलत चाहती थी। लेनिन जानते थे कि इससे पहले सशस्त्र विद्रोह कामयाब हो भी गया तो बोल्शेविक सत्ता में बने नहीं रह पायेंगे और एक नये रूप में पेरिस कम्यून की कहानी दुहराई जायेगी।

लेकिन इसके आगे रैबिनोविच का ब्यौरा तथ्यात्मक ग़लतियों और मनमानीपूर्ण व्याख्याओं के गड्ढे में गिर गया है। मिसाल के तौर पर, पहले वे स्वीकार करते हैं कि 21 जून को सोल्दात्स्काइया प्राव्दा में भी एक लेख छपा जिसमें कि असंगठित प्रदर्शन न करने की अपील की गयी है। लेकिन चूँकि इस घोषणा में निम्न बात भी जोड़ दी गयी इसलिए रैबिनोविच के अनुसार पूरी बात प्राव्दा में छपी बात से अलग हो गयी: ”आवश्यकता पड़ने पर, सैन्य संगठन केन्द्रीय और पीटर्सबर्ग कमेटियों से सहमति लेकर एक प्रदर्शन का आह्वान करेगा।” पाठक स्वयं देख सकते हैं कि इस टिप्पणी से पूरी बात की अन्तर्वस्तु में कोई अन्तर नहीं पड़ता है। यह भूलना नहीं चाहिए कि प्राव्दा में भी लेनिन ने लिखा था कि निर्णायक घड़ी का इन्तज़ार बहुत लम्बा नहीं होगा। साथ ही यह भी याद रखना होगा कि आबादी के जिस हिस्से में इस समय सबसे विस्फोटक स्थिति थी वह था सैनिकों का हिस्सा। सैनिकों के बीच निकलने वाला मुखपत्र यदि सीधे प्रदर्शनों को अनियतकालीन तौर पर रोक देने की बात करता तो निश्चित तौर पर बोल्शेविकों का प्रभाव आम सैनिक जनसमुदायों में घटता। ऐसा इसलिए भी होता क्योंकि इस आबादी में अपने प्रभाव को बरक़रार रखने के लिए बोल्शेविकों को बेहद प्रतिकूल परिस्थितियों में अराजकतावादियों से प्रतिस्पर्द्धा करनी पड़ रही थी। ऐसे में, सोल्दात्स्काइया प्राव्दा में शैली का इतना फ़र्क़ होना लाजि़मी था।

रैबिनोविच की दलील है कि जिस प्रकार प्राव्दा में स्पष्ट रूप में से कहा गया था कि क्रान्ति के अगले चरण में जाने से पहले ”टटपुँजिया भ्रमों” के दौर पर विजय पानी होगी और बोल्शेविकों को अपनी बुनियादी कमज़ोरियों को दूर करना (यानी सोवियत में बहुमत प्राप्त करना और प्रान्तों में अपनी स्थिति को सुदृढ़ करना) होगा, उसी प्रकार सोल्दात्स्का‍इया प्राव्दा में इस भाषा में कभी कुछ नहीं लिखा गया था; ज़्यादा से ज़्यादा सोल्दात्स्काइया प्राव्दा ने 23 जून को लिखा था, ”सबसे पहले संगठन”, लेकिन इसमें भी ज़्यादा ज़ोर अनियोजित और असंगठित प्रदर्शनों को रोकने पर था। ज़ाहिर है, रैबिनोविच एक अनुभववादी अकादमिक दृष्टिकोण से दोनों बेहद भिन्न प्रकार के मुखपत्रों में तुलना करने का प्रयास कर रहे हैं। वास्तव में, अपनी पुस्तक में ही रैबिनोविच ने कुछ बोल्शेविक नेताओं को उद्धृत किया है जो यह कह रहे हैं कि सैनिक और सेना में काम करने वाले बोल्शेविक बहुत ही अलग और विशिष्ट परिस्थितियों में रहते हैं। यह बात आज के दौर में भी लागू होती है। सशस्त्र बलों और सेना में काम करने वाली आबादी के बीच राजनीतिक चेतना का स्तर और उनके मुद्दे बिल्कुल भिन्न होते हैं। रैबिनोविच ने प्राव्दा और सोल्दात्स्काइया प्राव्दा में जो भी फ़र्क़ बताये हैं, वे सारे फ़र्क़ वही हैं जो कि दो भिन्न प्रकार के पाठक समुदाय को सम्बोधित करने वाले मुखपत्रों में होता है। आगे भी, रैबिनोविच कुछ इसी प्रकार के अन्य अन्तर बताते हैं जो कि किसी भी प्रकार से अन्तर्वस्तु का फ़र्क़ नहीं है, बल्कि शैली और प्रस्तुति का अन्तर है।

जुलाई के प्रदर्शन के बारे में रैबिनोविच विस्तृत ब्यौरा देते हैं। सही कहा जाये तो उनकी पुस्तक ‘प्रिल्यूड टू रिवोल्यूशन’ विशेष तौर पर जुलाई की घटनाओं के बारे में ही है। जहाँ तक 20-21 जून से लेकर 6-7 जुलाई की घटनाओं के विवरण का प्रश्न है, रैबिनोविच लगभग हरेक घण्टे का विवरण देते हैं और अलग-अलग निकायों में, अलग-अलग जगहों पर और जनता के अलग-अलग हिस्सों में क्या हो रहा था, इसका विस्तृत चित्र प्रस्तुत करते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि यह पूरा विवरण हरेक कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी के लिए बेहद उपयोगी है। क्योंकि क्रान्तिकारी सिद्धान्तों पर गहरी पकड़ बनाने के साथ ही क्रान्तिकारी प्रक्रिया और वर्ग संघर्ष के विभिन्न रूपों में ठोस तौर पर घटित होने को समझना भी बेहद ज़रूरी है। इस मायने में रूसी क्रान्ति का पूरा घटनाक्रम और उसके साथ ही बोल्शेविक पार्टी द्वारा इस घटनाक्रम में किये गये हस्तक्षेपों के बारे में पढ़ना आज किसी भी अन्य क्रान्तिकारी घटना के ऐतिहासिक ब्यौरों से कुछ मायनों में ज़्यादा महत्वपूर्ण है। विशेष तौर पर, लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविक पार्टी द्वारा अन्तरविरोधों के सन्धि-बिन्दुओं की पहचान करने के कौशल का अध्ययन करना और उसे समझना आज बेहद महत्वपूर्ण है। इसके लिए रैबिनोविच की यह पुस्तक और साथ ही इस श्रृंखला की उनकी अगली पुस्तक ‘दि बोल्शेविक्स कम टू पावर’, दोनों ही बेहद अहम हैं। इसके अलावा, जनता के विभिन्न वर्ग, विभिन्न तबके बोल्शेविक पार्टी के इन क्रान्ति‍कारी हस्तक्षेपों को किस प्रकार देख रहे थे और उन पर किस तरह से प्रतिक्रिया दे रहे थे, यह समझना भी बेहद आवश्यक है क्योंकि यह दिखलाता है कि कुशल से कुशल क्रान्तिकारी पार्टी भी जनसमुदायों की सभी प्रतिक्रियाओं को पहले से पूर्वानुमानित व नियन्त्रित नहीं कर सकती है। उसे लगातार इन प्रतिक्रियाओं को समझना होता है, उनके साथ अन्तर्क्रिया करनी होती है और सतत् जनदिशा लागू करके पार्टी की कार्यदिशा को सही तरीक़े से सूत्रबद्ध करना होता है। तभी वह बदलते समय और हालात के मुताबिक़ लचीलापन और दाँव-पेच की क्षमता अर्जित कर सकती है, जो कि पार्टी के लिए हमेशा ही ज़रूरी होती है, लेकिन एक क्रान्तिकारी परि‍स्थिति में अपरिहार्य हो जाती है, जबकि लेनिन के शब्दों में, सदियों में घटित होने वाली घटनाएँ दशकों में, वर्षों में, महीनों में या कई बार तो कुछ ही दिनों में घट जाती हैं। इन सारे पहलुओं को समझने के लिए भी रैबिनोविच का ब्यौरा काफ़ी उपयोगी है।

लेकिन इन ब्यौरों में भी, जो कि तथ्यों के मामले में काफ़ी समृद्ध हैं, रैबिनोविच वही विचारधारा-अन्धता प्रकट करते हैं, जिसका हम पहले जि़क्र कर चुके हैं। हालाँकि उनके विवरण उपयोगी हैं, लेकिन उनकी व्याख्याएँ अन्तर्दृष्टि की उस दृष्टिहीनता का ही प्रदर्शन करती हैं, जो कि सभी प्रत्यक्षवादी व अनुभववादी विवरणों व इतिहास-लेखन की ख़ासियत होती है।

पहली बात जो कि जुलाई के घटनाक्रम के बारे में सबसे पहले एक मार्क्सवादी-लेनिनवादी के तौर पर हमारा ध्यान खींचती है, वह यह कि रैबिनोविच किसी भी हथियारबन्द विद्रोह और एक सुनियोजित क्रान्तिकारी सशस्त्र विद्रोह या आम बग़ावत (insurrection) में कोई अन्तर नहीं करते हैं। जहाँ तक सशस्त्र विद्रोह की मार्क्सवादी-लेनिनवादी अवधारणा का प्रश्न है वह कोई अनियोजित, स्वत:स्फूर्त और बेतरतीब हथियारबन्द बग़ावत नहीं होती। यह एक क्रान्तिकारी पार्टी के नेतृत्व में वर्ग शक्तियों के सन्तुलन के बारीक अध्ययन और आकलन, सही समय और सही मौक़े के सटीक निर्धारण पर आधारित एक योजनाबद्ध कार्रवाई होती है जिसका एक निश्चित लक्ष्य होता है : बुर्जुआ राज्यसत्ता का ध्वंस और क्रान्तिकारी सर्वहारा सत्ता की स्थापना। लेकिन इस बुनियादी अन्तर को न समझ पाने के कारण और साथ ही कुछ अलग-अलग बोल्शेविक सदस्यों की ”वामपन्थी” कार्रवाइयों और गैरीसन में व्याप्त भयंकर असन्तोष के कारण 3-5 जुलाई की घटनाओं को एक सशस्त्र विद्रोह के प्रयास के तौर पर देखते हैं। हालाँकि, रैबिनोविच मानते हैं कि बोल्शेविक पार्टी का केन्द्रीय नेतृत्व इसे सशस्त्र विद्रोह नहीं मानता था और न ही उस समय सशस्त्र विद्रोह करने का उसका कोई इरादा था, लेकिन फिर भी कुछ बोल्शेविकों और यहाँ तक कि मेंशेविकों के संस्मरणों और रिपोर्ताजों के आधार पर रैबिनोविच यह अटकल भी लगाते हैं कि लेनिन तथा सैन्य संगठन के नेतृत्व के कई लोगों ने सशस्त्र विद्रोह के विकल्प को पूरी तरह से छोड़ा नहीं था। हालाँकि इन अटकलों को वे सिद्ध नहीं कर पाते हैं। कई बार तो जुलाई की घटनाओं के बाद आरज़ी सरकार ने बोल्शेविकों के ख़ि‍लाफ़ जो जाँच की और मुक़दमे चलाये, उनके आधार पर भी रैबिनोविच ऐसे दावे करते प्रतीत होते हैं कि 3-5 जुलाई के दौरान बोल्शेविकों ने सत्ता पर क़ब्ज़ा करने का विकल्प खुला रखा था। ज़ाहिर है, 5 जुलाई के बाद जब प्रतिक्रान्तिकारी ताक़तें विजयी हो गयी थीं, तो आरज़ी सरकार का पहला लक्ष्य यही था कि बोल्शेविक नेताओं की गिरफ़्तारियाँ की जायें, बोल्शेविक पार्टी का दमन किया जाये और उन्हें षड्यन्त्रकारी घोषित करके प्रतिबन्धित कर दिया जाये। ऐसे में, आरज़ी सरकार द्वारा की गयी जाँच और मुक़दमे को सही सूचना का आधार मानना ही एक बड़ी भूल होगी।

यदि हम रैबिनोविच के ही ब्यौरे को ग़ौर से पढ़ें तो एक बात स्पष्ट हो जाती है कि इस बात के पर्याप्त प्रमाण मौजूद हैं कि पार्टी 2 जुलाई की देर रात तक जुलाई के प्रदर्शन को रोकने का ही प्रयास कर रही थी, हालाँकि तृणमूल बोल्शेविक इकाइयों के आम सदस्यों व बोल्शेविकों के समर्थकों से ही प्रदर्शन आयोजित करने का पर्याप्त दबाव मौजूद था। केरेंस्की सरकार द्वारा गैलीशियन हमले की शुरुआत, तमाम रेजीमेण्टों को मोर्चे पर भेजने के निर्णय और प्रथम विश्वयुद्ध में रूसी सैनिकों के क़त्ले-आम के ख़ि‍लाफ़ जो ज़बरदस्त असन्तोष था, उसे फटने से रोक पाना अब बहुत मुश्किल था। वास्तव में, बोल्शेविक पार्टी जून माह से ही कई बार गुस्से के ज्वालामुखी को फटने से रोक चुकी थी और जनता का सब्र अब जवाब दे रहा था। केन्द्रीय कमेटी, पीटर्सबर्ग कमेटी और साथ ही बोल्शेविक सैन्य संगठन तीनों ही जुलाई के प्रदर्शनों को रोकने के प्रयास में लगे हुए थे। इसमें कोई दो राय नहीं है कि इन तीनों ही निकायों में कुछ ऐसे नेता भी थे जिनका मानना था कि प्रदर्शन किया जाना चाहिए। लेकिन इस बात पर मोटे तौर पर सभी सहमत थे कि प्रदर्शन को अगर नहीं भी रोका जा सका, तो उसे शान्तिपूर्ण बनाये रखने के लिए हर सम्भव प्रयास किया जाना चाहिए। लेनिन का स्पष्ट तौर पर मानना था कि अभी संकट पका नहीं है और जब तक बोल्शेविक सोवियतों में और साथ ही प्रान्तों में, विशेष तौर पर किसानों के बीच, अपनी स्थिति सुदृढ़ नहीं करते, तब तक वे पेत्रोग्राद में सत्ता पर काबिज़ हो भी गये तो वे सत्ता पर क़ायम नहीं रह पायेंगे। लेनिन की इस बात को अब इन तीनों ही निकायों, यानी कि केन्द्रीय कमेटी, पीटर्सबर्ग कमेटी और बोल्शेविक सैन्य संगठन के बहुमत ने स्वीकार कर लिया था, हालाँकि लेनिन को इसके लिए काफ़ी प्रयास करना पड़ा था। लेकिन जब 3 जुलाई को यह स्पष्ट हो गया कि अब प्रदर्शन फूट पड़ा है और उसे नहीं रोका जा सकता है, तो बोल्शेविक पार्टी उसमें शामिल हुई।

अगर हम छठी कांग्रेस में पेश राजनीतिक रिपोर्ट को पढ़ें तो साफ़ हो जाता है कि जब पार्टी का पीटर्सबर्ग नगर सम्मेलन जारी था उसी समय फ़र्स्ट मशीनगन रेजीमेण्ट ने प्रदर्शन की शुरुआत कर दी थी। यह प्रदर्शन सशस्त्र सैनिक कर रहे थे। तेज़ी से अन्य रेजीमेण्टों व गैरीसनों के सैनिक इसमें शामिल हो रहे थे। कारख़ानों के मज़दूर प्रतिनिधि इसी बीच पीटर्सबर्ग कमेटी के दफ़्तर पर पहुँचे और इस प्रदर्शन की कमान अपने हाथों में लेने के लिए पार्टी से अपील करने लगे क्योंकि अगर पार्टी ऐसा नहीं करती है तो भारी रक्तपात होगा और क्रान्ति को हानि होगी। इस समय पार्टी ने प्रदर्शन की कमान अपने हाथों में लेने का निर्णय किया। इस बीच एक और बात जो ग़ौरतलब है वह यह कि पार्टी के नेतृत्व और ग्रासरूट धरातल के बोल्शेविक संगठनकर्ताओं में सम्पर्क सुचारू रूप से नहीं चल रहा था। ऊपर से सैनिकों का प्रदर्शन ठीक उन्हीं नारों के तले हो रहा था जो कि उस समय के बोल्शेविक नारे थे, विशेष तौर पर, ”सारी सत्ता सोवियतों को”। इसने एक भ्रम की स्थिति भी पैदा कर रखी थी। कई आम बोल्शेविक भी इस नारे और तत्काल सशस्त्र विद्रोह के नारे के बीच अन्तर नहीं कर पा रहे थे। यह क्रान्ति की उस मंजि़ल के लिए दिया गया आम रणनीतिक नारा था, न कि एक ‘एक्शन स्लोगन’। लेकिन इन विभ्रमों के कारण भी सारी चीज़ें पार्टी नेतृत्व के नियन्त्रण से बाहर थी। नतीजतन, जब प्रदर्शन स्वत:स्फूर्त रूप से शुरू हो गये तो पार्टी ने उसकी कमान अपने हाथों में लेने का निर्णय किया, जैसा कि पहले से तय था। 4 जुलाई को लेनिन वापस आये। उन्होंने अपने बेहद संक्षिप्त भाषण में चौकसी और धैर्य बनाये रखने और उकसावे में न आने का आह्वान किया। वे जानते थे कि अब प्रदर्शन को रोका नहीं जा सकता है, इसलिए इसे अधिकतम सम्भव संगठित और शान्तिपूर्ण स्वरूप देना होगा। लेनिन के लिए यह क्रान्ति को बचाने के लिए अपरिहार्य था। प्रदर्शनों को न रोक पाने का एक कारण अराजकतावादी-कम्युनिस्टों का गैरीसन व सैनिकों के बीच प्रभाव भी था।

इसलिए अब बोल्शेविकों के पास एक ही विकल्प था: प्रदर्शन को संगठित और शान्तिपूर्ण बनाये रखना और उचित अवसर आते ही कम-से-कम नुक़सान के साथ क़दम पीछे हटाना। इसमें समूची बोल्शेविक पार्टी का नेतृत्व एकजुट होकर काम कर रहा था। जैसा कि लेनिन ने अपने लेख ‘एक जवाब’ में लिखा है, अगर बोल्शेविकों का मक़सद 3-5 जुलाई के बीच सत्ता पर क़ब्ज़ा करना होता तो ऐसा करने से उन्हें कोई ताक़त रोक नहीं सकती थी क्योंकि इन दिनों पेत्रोग्राद एक प्रकार से बोल्शेविक समर्थक बलों के ही क़ब्ज़े में था। बोल्शेविकों का मक़सद था इस प्रदर्शन को एक अपरिपक्व सशस्त्र विद्रोह बनने से रोकना और इसमें अन्तत: वे सफल रहे, हालाँकि तात्कालिक तौर पर उन्हें काफ़ी नुक़सान उठाना पड़ा, कई बोल्शेविक संगठनकर्ता मारे गये, जेल गये; प्राव्दा प्रतिबन्धित हो गया, पार्टी दफ़्तरों पर छापे पड़े, त्रात्स्की व कामेनेव गिरफ़्तार हो गये, लेनिन और ज़ि‍नोवियेव को भूमिगत होना पड़ा। तात्कालिक तौर पर, लेनिन व बोल्शेविकों के जर्मन एजेण्ट होने की अफवाह के आधार पर एक प्रतिक्रान्तिकारी लहर भी हावी हो गयी। इस पूरी प्रक्रिया का विवरण भी रैबिनोविच ने विस्तार से दिया है। लेकिन यहाँ भी दिक़्क़त उनकी व्याख्या के साथ है। मिसाल के तौर पर, रै‍बिनोविच कुछ आम बोल्शेविकों व ग्रासरूस सैनिक नेताओं की अनुशासनहीनता को और जनदबाव में प्रदर्शन की तैयारियों में शामिल होने को बोल्शेविक पार्टी के ‘विभाजित पार्टी’ होने के प्रमाण के तौर पर पेश करते हैं। इससे यह क़तई नहीं साबित होता कि बोल्शेविक पार्टी कई (रैबिनोविच के अनुसार, तीन) सत्ता केन्द्रों वाली एक विभाजित पार्टी थी जिसमें सभी सत्ता केन्द्रों के ”अलग-अलग लक्ष्य और हित” थे। इससे केवल यह साबित होता है कि 3-5 जुलाई जैसे अपवादस्वरूप दौरों में तृणमूल धरातल पर काम करने वाले कुछ आम पार्टी सदस्य स्वत:स्फूर्त जन लहर के प्रभाव में आ सकते हैं। लेकिन यह भी सच है कि पार्टी के नेतृत्व द्वारा नियन्त्रित किये जाने पर वे पार्टी अनुशासन को बहाल भी करते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो 3 व 4 जुलाई को आरज़ी सरकार का तख़्ता पलट करने  के प्रयास हुए होते।

यह भी सही है कि केन्द्रीय कमेटी व अन्य नगर कमेटियों, प्रान्तीय कमेटियों आदि के निर्णयों व चिन्तन में एक अन्तर मौजूद होता है क्योंकि ये अलग-अलग कमेटियाँ लगातार अलग-अलग क़ि‍स्म के सवालों और स्थितियों से रूबरू हो रही होती हैं। ऐसे में, इन निम्नतर कमेटियों का या सैन्य संगठन का कई सवालों पर केन्द्रीय कमेटी के फ़ैसलों से मतभेद होना भी लाजि़मी है। लेकिन अन्त में निर्णायक तथ्य यह होगा कि केन्द्रीय कमेटी के बहुमत के अन्तिम निर्णयों को असहमति रखने के बावजूद ये निकाय लागू करते हैं या नहीं। जून से लेकर जुलाई तक के घटनाक्रम में हमें इन विभिन्न पार्टी निकायों के बीच सतत् बहस के बहुत से उदाहरण मिलते हैं और इन बहसों को 1953-56 के पहले के सोवियत स्रोतों में छिपाया भी नहीं गया है, जैसा कि रैबिनोविच दावा करते हैं।

बुर्जुआ व मेंशेविक स्रोतों के प्रति रैबिनोविच का रुख़ सहज विश्वास का है। जहाँ कहीं बोल्शेविक स्रोतों की बात आती है, वहाँ वे व्यक्तिगत संस्मरणों से निकाले गये उद्धरणों के आधार पर कोई अन्तरविरोध तलाशने में लग जाते हैं। और व्यक्तिगत संस्मरणों के आधार पर अन्तरविरोध निकालना बेहद आसान है, जैसा कि कोई भी इतिहासकार या इतिहास का छात्र जानता है। लेकिन रैबिनोविच जब त्सेरेतली या सुखानोव जैसे मेंशेविकों के इतिहास, संस्मरण या रिपोर्ताज को उद्धृत करते हैं, या त्रात्स्की के बाद के लेखन जैसे कि हिस्ट्री ऑफ़ दि रशियन रिवोल्यूशन और स्तालिन्स स्कूल ऑफ़ फ़ॉल्सिफ़ि‍केशन जैसी पुस्तकों को उद्धृत करते हैं, तो उन्हें आकाशवाणी के समान सत्य माना जाता है।

यहाँ तक तो हम रैबिनोविच के उदार बुर्जुआ पूर्वाग्रहों को ही देखते हैं, लेकिन जब वे रिचर्ड पाइप्स जैसे अमेरिकी साम्राज्यवादी सत्ता के एजेण्ट के इतिहास-लेखन को भरोसेमन्द स्रोत के तौर पर देखते हैं, तो वाक़ई आश्चर्य होता है। मिसाल के तौर पर, 1917 की जुलाई में ही आरज़ी सरकार के समक्ष पैदा हुए यूक्रेन संकट के विषय में वे पूरी तरह से रिचर्ड पाइप्स और त्सेरेतली के लेखन पर निर्भर करते हैं। न सिर्फ़ जानकारी के मामले में, बल्कि रिचर्ड पाइप्स के मूल्य-आधारित निर्णयों को भी रैबिनोविच ने अनालोचनात्मक तौर पर लिया है। मिसाल के लिए पाइप्स के इस प्रेक्षण को रैबिनोविच अनुमोदन के साथ उद्धृत करते हैं : ”यह रवैया नैतिक और संवैधानिक दृष्टिकोण से तो सही था, मगर राजनीतिक व्यवहार के नज़रिये से यह घातक सिद्ध हुआ।” (वही, पृ. 141) यहाँ बता दें कि पाइप्स राष्ट्रों के आत्मनिर्णय के प्रति आरज़ी सरकार के रवैये की बात कर रहे हैं; दमित राष्ट्रीयताएँ फ़रवरी क्रान्ति के बाद तत्काल राष्ट्रीय मुक्ति व स्वायत्तता की माँग कर रही थीं, जबकि आरज़ी सरकार उन्हें संविधान सभा के बुलाये जाने तक टाल रही थी, ठीक उसी प्रकार जैसे कि भूमि प्रश्न के समाधान को मेंशेविक व समाजवादी-क्रान्तिकारी और साथ ही आरज़ी सरकार भी संविधान सभा बुलाये जाने तक टाल रहे थे और किसानों द्वारा भूमि क़ब्ज़े का विरोध कर रहे थे। पाइप्स आरज़ी सरकार के रवैये को नैतिक तौर पर सही मानते हैं। यह एक क्लासिकीय बुर्जुआ प्रतिक्रियावादी दृष्टिकोण है जो कि परिवर्तन को वैधिकता (legality) का परिणाम मानता है और जनविरोधी है; प्रगतिशील दृष्टिकोण हमेशा क्रान्ति को वैधिकता के ऊपर वरीयता देता है। अगर यह दृष्टिकोण नैतिक तौर पर सही है तो फ़्रांसीसी बुर्जुआ क्रान्ति को भी इन बुर्जुआ इतिहासकारों को ग़लत ठहराना चाहिए क्योंकि उस क्रान्ति ने भी वैधिकता की परवाह नहीं की थी। रैडिकल परिवर्तन, रूपान्तरण और क्रान्तियाँ हमेशा ग़ैर-क़ानूनी ही हुआ करती हैं। क्रान्तिकारी व प्रगतिशील नैतिकता के अनुसार वे नैतिक होती हैं, हालाँकि पाइप्स जैसे असुधारणीय कम्युनिस्ट-विरोधियों और साथ ही प्रतिक्रियावादियों के लिए वे अनैतिक और असंवैधानिक होती हैं। इस प्रकार के प्रतिक्रियावादी दृष्टिकोण को भी रैबिनोविच अनालोचनात्मक तौर पर लेते हैं।

इसके बाद रैबिनोविच 3 जुलाई को ज़मीनी स्तर पर चल रही कार्रवाइयों का एक ब्यौरा देते हैं जिसमें वे दिखलाते हैं कि बोल्शेविक सैन्य संगठन के कई सैनिक सदस्य इस समय तत्काल सशस्त्र विद्रोह और सरकार को गिराने के लिए छटपटा रहे थे और उनके भाषणों और अराजकतावादियों के भाषणों में कोई ज़्यादा अन्तर नहीं था। सेमाश्को, गोलोविन आदि जैसे बोल्शेविक स्वयं गैरीसनों का समर्थन जीतने, क्रोंस्टाट का समर्थन लेने के लिए जि़म्मेदारियाँ ले रहे थे। फ़र्स्ट मशीनगन रेजीमेण्ट के सैनिकों ने बोल्शेविक काडर व अराजकतावादी-संघाधिपत्यवादियों की पहल पर एक आरज़ी क्रान्तिकारी समिति भी बनायी जिसकी अगुवाई बोल्शेविक सेमाश्को कर रहे थे। इस समिति को रैबिनोविच एक प्रकार से सशस्त्र विद्रोह के संचालन की जि़म्मेदारी सम्भालने वाली समिति के तौर पर पेश करते हैं। लेकिन आगे बताया जाता है कि 4 जुलाई को यह समिति स्वयं अपने नेतृत्व को बोल्शेविक केन्द्रीय कमेटी व पीटर्सबर्ग कमेटी को सौंप देती है! अगर इस समिति को सशस्त्र विद्रोह ही करना था, तो इसने स्वेच्छा से अपना नेतृत्व बोल्शेविक पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व को क्यों सौंप दिया जो कि प्रदर्शन को संगठित, शान्तिपूर्ण और अनुशासित रखने की बात कर रहा था और कह रहा था कि फि़लहाल हमें सोवियत कांग्रेस के समक्ष अपनी मांगों को ज़ोरदार तरीक़े से रखने को ही लक्ष्य बनाना चाहिए? इस सवाल का जवाब देना रैबिनोविच आवश्यक नहीं समझते हैं।

यह सिद्ध करने के लिए कि बोल्शेविक तृणमूल संगठनकर्ताओं ने आरज़ी सरकार के विरुद्ध तख़्तापलट की पूरी योजना बना ली थी, रैबिनोविच किस स्रोत पर निर्भर करते हैं, यह जानकर आपको ताज्जुब होगा। वे आरज़ी सरकार द्वारा 3-5 जुलाई के बाद बोल्शेविकों के ख़ि‍लाफ़ बिठायी गयी जाँच समिति की रिपोर्ट और उसमें पेश की गयी गवाहियों और प्रमाणों को अपना स्रोत बनाते हैं! यह ताज्जुब की बात इसलिए है कि बोल्शेविक क्रान्ति के विषय में हुए इतिहास-लेखन में अधिकांश बेहतर इतिहासकारों की इस बात पर सहमति है कि जुलाई की घटनाओं के बाद सोवियतें दक्षिणपन्थी अवस्थिति पर चली गयीं और पूरी तरह आरज़ी सरकार के साथ खड़ी हो गयीं थीं, और साथ ही बुर्जुआ सत्ता सुदृढ़ हो गयी थी; इसके सुदृढ़ होते ही मेंशेविक और समाजवादी-क्रान्तिकारियों ने बोल्शेविकों के दमन को अपना लक्ष्य बनाया। उन्होंने बोल्शेविकों और लेनिन के जर्मन एजेण्ट होने का आरोप लगाने, मोर्चे पर हो रही हार के लिए बोल्शेविकों को दोषी ठहराने, सोवियत सत्ता के विरुद्ध षड्यन्त्र करने से लेकर चरित्र-हनन तक, हर प्रकार की चाल का सहारा लिया; जाँच करवाना तो सिर्फ़ एक बहाना था, जाँच के नतीजे तय थे और इसका मक़सद था जनता का बोल्शेविकों में भरोसा और जनता के समर्थन को तोड़ देना। ऐसी जाँच में पेश गवाहियों के आधार पर रैबिनोविच यह सिद्ध करने का प्रयास करते हैं कि बोल्शेविक पार्टी इस समय खण्ड-खण्ड में विभाजित थी, उसके अलग-अलग खण्ड अलग-अलग हितों और लक्ष्यों के साथ काम कर रहे थे, और इनमें से कई 3-5 जुलाई के बीच सशस्त्र विद्रोह करने के प्रयासों में ही लगे हुए थे। लेकिन रैबिनोविच का अपना ब्यौरा ही इसे ग़लत साबित कर देता है।

हमारे पास आज इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं कि सैन्य संगठन के नेता पोदवॉइस्की व नेव्स्की लगातार सशस्त्र विद्रोह को रोकने के प्रयासों में लगे हुए थे; वे लगातार तमाम गैरीसनों व रेजीमेण्टों में संगठनकर्ताओं को भेज रहे थे ताकि सैनिकों को प्रदर्शन में भाग लेने से रोका जा सके। यह ज़रूर है कि बहुत से गैरीसनों व रेजीमेण्टों में ये अपीलें सुनीं नहीं जा रही थीं और कई जगह तो ऐसा माहौल था कि ये संगठनकर्ता कुछ बोलने की हिम्मत भी नहीं कर पाये; पीटर्सबर्ग कमेटी के टॉम्सकी ने बोल्शेविक पार्टी के पेत्रोग्राद नगर सम्मेलन में केन्द्रीय कमेटी के निर्णयों को पढ़कर सुनाया जिसमें यह कहा गया था कि प्रदर्शनों को रोकने का प्रयास किया जाना चाहिए। यह सच है कि टॉम्स्की ने इसके अन्त में यह जोड़ दिया कि हम इस आग को बुझा नहीं पायेंगे क्योंकि हमने यह आग जलाई नहीं है। लेकिन साथ में टॉम्स्की ने यह भी कहा कि हमें केन्द्रीय कमेटी के निर्णय को किसी भी तरह लागू करना होगा। चूँकि पीटर्सबर्ग कमेटी और सैन्य संगठन ज़मीनी स्तर पर हो रहे परिवर्तनों के ज़्यादा क़रीब थे, इसलिए वे केन्द्रीय कमेटी के मुक़ाबले ज़्यादा बेहतर तरीक़े से यह समझ पा रहे थे कि इन प्रदर्शनों का एक अपरि‍पक्व सशस्त्र विद्रोह में परिवर्तित होना ख़तरनाक होगा, लेकिन वे यह भी समझ रहे थे कि अब इन प्रदर्शनों को रोक पाना मुश्किल होगा। इसलिए पार्टी को इसमें शामिल होकर इसे नेतृत्व देना चाहिए और इसे अपरिपक्व सशस्त्र विद्रोह में तब्दील होने से रोकना चाहिए। रैबिनोविच यह भी सिद्ध करने का प्रयास करते हैं कि प्रदर्शनों को न रोके जा सकने की सूरत में इसमें शामिल होने की कार्यदिशा केन्द्रीय कमेटी की नहीं थी और वह उसके ख़ि‍लाफ़ थी। हम पहले ही दिखला चुके हैं कि ऐसा नहीं है। स्वयं लेनिन और स्तालिन के तत्कालीन लेखन को देखने से साफ़ हो जाता है कि केन्द्रीय कमेटी इस विचार पर सहमत थी, भले ही यह विचार मूलत: पीटर्सबर्ग कमेटी द्वारा पेश किया गया हो।

आगे रैबिनोविच लिखते हैं :

”सोवियत इतिहासकार जुलाई ”प्रदर्शनों” को एक शान्तिपूर्ण विरोध आन्दोलन के रूप में पेश करते हैं, जो कि सोवियतों को सत्ता के हस्तान्तरण के लिए संघर्ष के ”शान्तिपूर्ण दौर” की अन्तिम घटना थी। लेकिन ग़ौरतलब है कि 3 जुलाई की जनसभाओं पर स्रोत सामग्री दिखलाती है कि जुलाई आन्दोलन का प्रतीतिगत लक्ष्य, जिस रूप में अराजकतावादी-संघाधिपत्यवादियों और फ़र्स्ट मशीलगन रेजीमेण्ट ने उसे सूत्रबद्ध किया था, आरज़ी सरकार को सशस्त्र शक्ति द्वारा उखाड़ फेंकना था।” (वही, पृ 152)

जैसा कि हम ऊपर दिखला चुके हैं कि लेनिन और स्तालिन के लेखन में कहीं यह नहीं लिखा गया है कि जुलाई का प्रदर्शन शान्तिपूर्ण प्रदर्शन था; हम यह भी दिखला चुके हैं कि बुर्जुआ इतिहासकारों के लिए सबसे सन्देहास्पद स्रोत, यानी ‘बोल्शेविक पार्टी का इतिहास’ में भी यह कहीं नहीं लिखा है कि ये प्रदर्शन शान्तिपूर्ण थे; यहाँ तक कि त्रात्स्की के लेखन में भी इसे शान्तिपूर्ण प्रदर्शन नहीं माना गया है। त्रात्स्की ने तो अराजकतावादी-कम्युनिस्टों के प्रभाव की भी बात की है। ऐसे में, रैबिनोविच के सोवियत स्रोतों का अर्थ केवल एक ही रह जाता है : संशोधनवादी दौर की इतिहास की पुस्तकें, जब सामाजिक फ़ासीवादी सत्ता की यह आवश्यकता थी कि बोल्शेविक पार्टी की एक एकाश्मी छवि पेश की जाये क्योंकि जनता से एक ऐसी एकाश्मी पार्टी के प्रति ही अनालोचनात्मक एकनिष्ठा की माँग की जा सकती है! लेकिन रैबिनोविच यह दिखलाने में असफल रहते हैं कि स्वयं बोल्शेविक नेताओं के लेखन में, त्रात्स्की के लेखन में, पार्टी के आधिकारिक इतिहास लेखन में और 1953 से पहले के सोवियत इतिहासकारों के लेखन में कहाँ इस प्रदर्शन को शान्तिपूर्ण कहा गया है। उल्टा उस दौर के जिन एक-दो इतिहासकारों को, जैसे कि स्तुलोव को, वे उद्धृत करते हैं, उन्होंने इस प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा का जि़क्र किया है। इस हिंसा के आधार पर ही रैबिनोविच इसे सशस्त्र विद्रोह (insurrection) की संज्ञा दे देते हैं। जैसा कि हमने ऊपर उल्लेख किया है, रैबिनोविच सशस्त्र विद्रोह के अर्थ को नहीं समझते और उसे बेपरवाह तरीक़े से इस्तेमाल करते हैं। यह उनके इस उद्धरण से ही पता चल जाता है :

”वास्तव में, जुलाई सशस्त्र विद्रोह की शुरुआत का अध्ययन करते हुए आपको ऐसा प्रतीत होता है कि जिन अराजकतावादियों और अर्द्ध-अराजकतावादियों ने इसका शुरुआत की थी, विशेष तौर पर वे जो कि गैरीसन में थे, स्वयं उनके दिमाग़ में ही इन प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर मौजूद नहीं थे।” (वही, पृ. 152)

ये प्रश्न थे कि आरज़ी सरकार को उखाड़कर कैसे फेंका जायेगा और उसकी जगह क्या लाया जायेगा? सत्ता बोल्शेविकों को दी जायेगी या फिर सोवियतों को? यानी इन प्रश्नों का रैबिनोविच के ”सशस्त्र विद्रोहियों” के पास कोई जवाब नहीं था! लेकिन फिर भी यह सशस्त्र विद्रोह (insurrection) था! इसी से पता चल जाता है कि रैबिनोविच ने यहाँ सारी चीज़ें गड्ड-मड्ड कर दी हैं। मिसाल के तौर पर, आगे रैबिनोविच लिखते हैं कि इस ”सशस्त्र विद्रोह” के विस्तार का कारण यह था कि तमाम सैन्य रेजीमेण्टों व गैरीसनों में सैनिकों के ढेर सारे तात्कालिक असन्तोष व शिकायतें इकट्ठा हो गयीं थीं। इनमें मोर्चे पर स्थानान्तरण किया जाना प्रमुख कारण था। इस‍ प्रकार रैबिनोविच ख़ुद मानते हैं कि स्वत:स्फूर्त उभार का कारण आम तौर पर तात्कालिक शिकायतें और असन्तोष था। यह भी किसी सशस्त्र विद्रोह का विवरण नहीं बल्कि असन्तोष और गुस्से के एक स्वत:स्फूर्त विस्फोट का विवरण ज़्यादा लगता है।

पीटर्सबर्ग कमेटी और केन्द्रीय कमेटी को अन्तरविरोधी दिखाने के रैबिनोविच के प्रयास

पीटर्सबर्ग कमेटी और केन्द्रीय कमेटी के बीच एक खाई दिखाने का प्रयास करने का कोई भी अवसर रैबिनोविच छोड़ते नहीं हैं। पीटर्सबर्ग पार्टी कमेटी के दूसरे नगर सम्मेलन का जि़क्र करते हुए रैबिनोविच बताते हैं कि एक जुलाई को इस सम्मेलन का आरम्भ हुआ और उस समय सम्मेलन इस बात पर चर्चा कर रहा था कि लेनिन द्वारा पीटर्सबर्ग कमेटी के अलग मुखपत्र न निकालने की राय को माना जाये या उसे रद्द कर दिया जाये। केवल शब्दों के थोड़े से हेर-फेर से पूरा अर्थ बदला जा सकता है। यह सच है कि पीटर्सबर्ग कमेटी अपना एक अलग मुखपत्र चाहती थी क्योंकि उसे लगता था कि उसकी राजनीतिक उद्वेलनात्मक आवश्यकताओं को प्राव्दा पूरा नहीं कर पाता है। लेकिन अन्तत: इस कमेटी ने लेनिन व केन्द्रीय कमेटी के निर्देश का ही पालन किया। इसके बदले में केन्द्रीय कमेटी ने यह तय किया था कि मुखपत्रों के सम्पादक मण्डल में पीटर्सबर्ग कमेटी के प्रतिनिधि को परामर्शदाता की स्थिति में शामिल किया जाये। लेकिन रैबिनोविच पूरी पुस्तक में यह ब्यौरा कहीं नहीं देते। पीटर्सबर्ग कमेटी को इतना स्वायत्त दिखाने का प्रयास किया गया है कि वह किसी पार्टी सम्मेलन या पार्टी कांग्रेस के मंच पर बहस करने और अपने प्रस्ताव पर बहुमत प्राप्त करने के पहले ही केन्द्रीय कमेटी के किसी निर्देश की अवहेलना करने के बारे में विचार कर रही थी। इस स्वायत्तता की छवि को और बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने के लिए रैबिनोविच लिखते हैं कि ”कई सदस्य एक अलग मुखपत्र की स्थापना को ज़्यादा रूढि़वादी केन्द्रीय कमेटी की शक्ति की क़ीमत पर पीटर्सबर्ग कमेटी की शक्ति और लचीलेपन को बढ़ाने के एक ज़रिये के तौर पर देखते थे।” (वही, पृ. 155) इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस प्रश्न पर लेनिन और पीटर्सबर्ग कमेटी के बीच बहस चली थी, लेकिन इस बहस की चर्चा करना एक अलग बात है और केन्द्रीय कमेटी के निर्णय की अवहेलना करने की बात करना एक अलग बात है। एक संगठन के भीतर जीवन्त बहस-मुबाहसे की बात करना है और दूसरा है सांगठनिक अनुशासन की बात करना। रैबिनोविच जाने-अनजाने दोनों बातों में अक्सर कोई फ़र्क़ नहीं करते और इस फ़र्क़ को सामने न रखा जाये, जो कि जनवादी केन्द्रीयता के लेनिनवादी उसूलों का सार है, तो फिर दो कार्यदिशाओं के बीच के संघर्ष को भी ‘विभाजित पार्टी’ की छवि पेश करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। और रैबिनोविच अक्सर ऐसा ही करते हैं।

नगर सम्मेलन के बारे में ही बात करते हुए रैबिनोविच कहते हैं कि इसमें फिर से 20 जून को पीटर्सबर्ग कमेटी द्वारा तय की गयी कार्यदिशा पर मुहर लगायी गयी, जिसके अनुसार यदि प्रदर्शनों को रोका न जा सका तो पार्टी उसके नेतृत्व को अपने हाथ में लेने में हिचकिचायेगी नहीं। रैबिनोविच का दावा है कि यह कार्यदिशा केन्द्रीय कमेटी की कार्यदिशा से अलग थी। हम ऊपर दिखला चुके हैं कि स्वयं लेनिन व स्तालिन के तत्कालीन लेखों से यह सिद्ध किया जा सकता है कि केन्द्रीय कमेटी इस कार्यदिशा से सहमत थी।

केन्द्रीय कमेटी के भीतर भी उस समय जो संघर्ष चल रहा था, रैबिनोविच अपने दृष्टिकोण और व्याख्या की पुष्टि के लिए उसका एक चयनबद्ध ब्यौरा देते हैं। लेकिन अगर उस ब्यौरे को ही पढ़ें तो स्पष्ट हो जाता है कि केन्द्रीय कमेटी का क्या निर्णय था। रैबिनोविच 3 जुलाई को तौरीदा महल में केन्द्रीय कमेटी की जारी बैठक का हवाला देते हैं और बताते हैं कि इस बैठक में प्रदर्शन को रोकने का प्रयास करने का निर्देश पेत्रोग्राद नगर सम्मेलन को भिजवाया गया। लेकिन साथ में वे जोड़ते हैं, ”यह सन्देह के दायरे में है कि इस सावधानीपूर्ण रणनीति को सर्वसम्मति से समर्थन मिला। जैसी परिस्थितियाँ थीं, उसमें कम-से-कम स्मिल्गा ने इस पर ज़रूर आपत्ति की होगी। चाहे जो भी हो, केन्द्रीय कमेटी ने दो दिनों में दूसरी बार किसी प्रदर्शन में हिस्सेदारी करने के विरोध में वोट किया…” (वही, पृ 157, ज़ोर हमारा) हम देख सकते हैं कि स्मिल्गा द्वारा आपत्ति की रैबिनोविच ने अटकल लगायी है। इसका स्रोत क्या है? यदि आप पश्चटिप्पणी को देखें तो रैबिनोविच इस अटकल का स्रोत स्तालिनकालीन इतिहास लेखन को बताते हैं, जिसमें स्मिल्गा को लाटसिस के साथ इस बात का हामी बताया गया था कि वह सशस्त्र विद्रोह के लिए फ़र्स्ट मशीनगन रेजीमेण्ट पर निर्भर रहने की लाइन को मानते थे। यानी, जो स्रोत आम तौर पर रैबिनोविच के लिए प्रोपगैण्डा लेखन है, वह अचानक विश्वसनीय बन जाता है। क्यों? क्योंकि रैबिनोविच इस बात को कैसे स्वीकार करें कि केन्द्रीय कमेटी ने कभी सर्वसम्मति से कोई निर्णय लिया होगा या फिर किसी अन्य कमेटी ने उस निर्णय की अवहेलना नहीं की? अगर रैबिनोविच ऐसा मानते हैं, तो ‘विभाजित पार्टी’ का उनका उदार बुर्जुआ मॉडल ढह जाता है। इसलिए जहाँ कहीं रैबिनोविच को कोई भी प्रमाण नहीं मिलता वहाँ वे अपनी सुविधा के अनुसार अटकलबाज़ी के विकल्प को अपनाते हैं।

यहीं आगे रैबिनोविच टॉम्स्की के भाषण को उद्धृत करके यह सिद्ध करने का प्रयास करते हैं कि अन्तत: पीटर्सबर्ग कमेटी ने 3 जुलाई को केन्द्रीय कमेटी द्वारा भेजे गये निर्देश को स्वीकार तो किया लेकिन केवल औपचारिक तौर पर। हम इस बात का ऊपर खण्डन कर चुके हैं। इस सम्मेलन द्वारा केन्द्रीय कमेटी के निर्देशों की उपेक्षा के दावे के बाद अन्त में रैबिनोविच चलते-चलते स्वीकार कर लेते हैं कि इस सम्मेलन ने अन्तत: केन्द्रीय कमेटी की कार्यदिशा का ही अनुमोदन किया। रैबिनोविच लिखते हैं :

”राखिया ने अधैर्य के साथ टिप्पणी की कि सम्मेलन पेरिस कम्यून के समान दिख रहा है जो कि शत्रुतापूर्ण शक्तियों से घिरे होने के बावजूद केवल बात ही कर रहा है। उन्होंने सुझाव दिया कि केन्द्रीय कमेटी के निर्देशों को स्वीकार करते हुए पीटर्सबर्ग कमेटी को केन्द्रीय कमेटी के साथ कारख़ाना प्रतिनिधियों व सैन्य प्रतिनिधियों की बैठक का इन्तज़ाम करना चाहिए, ताकि परिवर्तित होती स्थिति का सही आकलन बनाया जा सके…बैठक जब अन्त की ओर बढ़ रही थी, तो कैक्टिन, ओग्रेत्सा और सालना ने विद्रोही रेजीमेण्टों का समर्थन करने का प्रस्ताव रखा जो कि पराजित हो गया। उल्टे इस बात पर सहमति बनी कि (सोवियत की) केन्द्रीय कार्यकारी समिति को एक प्रतिनिधि मण्डल द्वारा अल्टीमेटम भेजा जाये कि अभी सत्ता अपने हाथ में लें, अथवा एक सशस्त्र जनउभार के लिए तैयार हो जायें। इसी के साथ सम्मेलन समाप्त हो गया।” (वही, पृ. 159)

एक बात इस उद्धरण से ही स्पष्ट है कि सम्मेलन किसी भी रूप में विद्रोह करने वाली रेजीमेण्टों के साथ नहीं था हालाँकि उसे यह ज़रूर लग रहा था कि केन्द्रीय कमेटी निर्णय लेने में देरी कर रही है। साथ ही वह सोवियत पर सत्ता अपने हाथों में लेने का दबाव डालने के लिए इस जनउभार के भय का इस्तेमाल करने को लेकर सहमत था। ऐसे में, यह किस प्रकार साबित हुआ कि पीटर्सबर्ग कमेटी या उसका द्वितीय नगर सम्मेलन केन्द्रीय कमेटी के निर्णय से सहमत नहीं था या उसकी अवहेलना कर रहा था? पाठक को इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिलता मगर फिर भी उससे उम्मीद की जाती है कि रैबिनोविच के ‘विभाजित पार्टी’ के सिद्धान्त को वह स्वीकार कर ले।

अराजकतावादियों और अराजकतावादी-कम्युनिस्टों द्वारा शुरू किया गया सशस्त्र विद्रोह?

हम ऊपर देख चुके हैं कि 3-5 जुलाई के प्रदर्शनों को रैबिनोविच अराजकतावादियों और अराजकतावादी-कम्युनिस्टों द्वारा, विशेषकर जो गैरीसनों में थे, शुरू किया गया सशस्त्र विद्रोह मानते हैं। लेकिन कुछ ही पृष्ठ बाद वे 3 जुलाई की शाम का पूरा ब्यौरा देते हैं, जिसमें कि बोल्शेविक संगठनकर्ता गैरीसनों से प्रदर्शन के लिए सैनिकों और कारख़ानों से निकले मज़दूरों को बोल्शेविक मुख्यालय की तरफ़ लाते हैं और सारे प्रदर्शनकारी क्शेसिंस्काया महल के बाहर एकत्र होने लगते हैं, जहाँ कि बोल्शेविक मुख्यालय स्थित था। अब प्रश्न यह उठता है कि अगर यह अराजकतावादियों व अराजकतावादी-कम्युनिस्टों द्वारा शुरू किया गया सशस्त्र विद्रोह (insurrection) था तो इन सशस्त्र विद्रोहियों ने सीधे सरकारी इमारतों, संस्थानों, रेलवे स्टेशनों, टेलीग्राफ़ कार्यालयों पर क़ब्ज़ा क्यों नहीं किया? दूसरी बात, अगर बोल्शेविक पार्टी सशस्त्र विद्रोह के विकल्प को एक खुला विकल्प मानती थी तो उसने प्रदर्शन का नेतृत्व अपने हाथ में आते ही ये सारे काम क्यों नहीं किये? ऐसी ख़तरनाक और फ़ैसलाकुन घड़ी में लाखों सशस्त्र प्रदर्शनकारियों को सड़क पर लेकर बोल्शेविक नेतृत्व क्या कर रहा था? उस समय के अख़बारी स्रोत तक मानते हैं कि उस दिन यदि बोल्शेविक सत्ता पर क़ब्ज़ा करना चाहते तो यह उनके लिए ज़्यादा मुश्किल नहीं होता। तो फिर बोल्शेविकों ने ऐसा क्यों नहीं किया? लेनिन ने हूबहू यही प्रश्न अपने लेख ‘एक जवाब’ में आरज़ी सरकार के षड्यन्त्रकारियों से पूछा था। और यही प्रश्न रैबिनोविच जैसे इतिहासकारों से भी पूछा जा सकता है। रैबिनोविच का दावा है कि केन्द्रीय कमेटी का बहुमत चाहे जो चाहता हो लेकिन पीटर्सबर्ग कमेटी और सैन्य संगठन में विद्रोह का विचार पनप रहा था और ज़्यादा प्रभावी था। ऐसे में भी यह प्रश्न उठता है कि इन दोनों निकायों के बोल्शेविक संगठनकर्ताओं ने सत्ता पर क़ब्ज़े का आह्वान क्यों नहीं किया? केन्द्रीय कमेटी की तो वे सुन नहीं रहे थे, बकौल रैबिनोविच। और प्रदर्शन का सीधा नेतृत्व भी तमाम अतिवादी बोल्शेविक नेताओं जैसे कि सेमाश्को, गोलोविन आदि के हाथों में था। तो फिर उन्हें किस चीज़ ने सशस्त्र विद्रोह करने और सत्ता पर क़ब्ज़ा करने से रोका?

3 जुलाई की देर रात का ब्यौरा देते हुए रैबिनोविच बताते हैं कि पेत्रोग्राद सोवियत के मुख्यालय तौरीदा महल के बाहर हज़ारों सैनिकों व मज़दूरों ने डेरा डाल दिया था। वे अपने नेताओं के भाषण सुन रहे थे, जिनमें से अधिकांश यह कह रहे थे कि अब समय आ गया है कि सोवियत बुर्जुआ वर्ग की आरज़ी सरकार से सत्ता अपने हाथों में ले ले। इन भाषण देने वालों में ज़ि‍नोवियेव और त्रात्स्की भी शामिल थे। यहाँ पर रैबिनोविच स्वयं स्वीकार करते हैं, ”सभी समाजवादी नेताओं के लिए सौभाग्य की बात थी कि फ़र्स्ट मशीनगन रेजीमेण्ट और अराजकतावादी-कम्युनिस्ट अब मज़दूरों और सैनिकों को नियन्त्रित नहीं कर रहे थे,” लेकिन आगे रैबिनोविच यह भी जोड़ देते हैं, ”और बोल्शेविकों को अभी आपस में इस प्रश्न पर सहमति बनानी थी कि वे एक प्रदर्शन के साक्षी बन रहे हैं या फिर क्रान्ति के।” (वही, पृ. 172) लेकिन इसके बाद रैबिनोविच यह भी कहते हैं कि जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा था, सैनिक बिना किसी लक्ष्य के इधर-उधर टहलने लगे, लोग थकावट महसूस करने लगे, वग़ैरह। लेकिन आपके दिमाग़ में तुरन्त ही यह प्रश्न आता है कि पिछले 170 पृष्ठों में रैबिनोविच आपको यह क्यों यकीन दिलाते हैं कि प्रदर्शनकारी स्वत:स्फूर्त रूप से विद्रोह करना चाहते थे; अराजकतावादी और अराजकतावादी-कम्युनिस्ट भी यही चाहते थे और बोल्शेविक फ़ैसला नहीं कर पा रहे थे? क्योंकि अगर ऐसा ही था तो 3 जुलाई की रात को कौन-सी चीज़ इन हज़ारों-लाखों सैनिकों और मज़दूरों को रोके हुए थी? उन्होंने तत्काल आरज़ी सरकार का तख़्तापलट क्यों नहीं कर दिया? ये सारे सवाल अनुत्तरित ही रह जाते हैं।

इन प्रश्नों का उत्तर आपको रैबिनोविच की पुस्तक में नहीं मिलेगा। इसका उत्तर आपको वास्तविक बोल्शेविक स्रोतों में मिलेगा। इसका उत्तर यह है कि यह बोल्शेविक पार्टी का अनुशासन था जिसने 3 से 5 जुलाई के बीच बोल्शेविक संगठनकर्ताओं को इस प्रदर्शन को एक संगठित और शान्तिपूर्ण रूप देने के लिए प्रेरित किया, चाहे वे व्यक्तिगत तौर पर केन्द्रीय कमेटी के धीरज बरतने और सही मौक़े का इन्तज़ार करने और उसके लिए तैयारी करने की कार्यदिशा से सहमत हों या नहीं हों; चाहे उन्होंने बाद में पार्टी मंचों पर इसके लिए केन्द्रीय कमेटी के सदस्यों से बहस की हो; चाहे उन्होंने बाद में भी सहमत होने के बजाय अपनी असहमति ही दर्ज करायी हो; तब भी उन्होंने दो सम्मेलनों या कांग्रेसों के बीच केन्द्रीय कमेटी के निर्णय को सर्वोच्च निर्णय मानने के बोल्शेविक उसूलों का पालन किया। अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया होता तो 3-5 जुलाई 1917 के दिनों का इतिहास किसी और ही प्रकार लिखा जाता। बल्कि कहा जा सकता है कि बोल्शेविक क्रान्ति का ही इतिहास कुछ और होता। यह ज़रूर है कि बोल्शेविक पार्टी के सैन्य संगठन ने इस सम्भावना के लिए भी तैयारी कर रखी थी कि यदि प्रदर्शन का नेतृत्व उनके हाथों से निकलता है और सशस्त्र प्रदर्शनकारी उनके अनुमोदन के बिना सत्ता पर क़ब्ज़ा करने और आरज़ी सरकार को अपदस्थ करने का प्रयास करते हैं, तो वे क्या करेंगे। लेकिन इसे सशस्त्र विद्रोह करने की तैयारी की संज्ञा देना मूर्खता होगी। निश्चित तौर पर, यह पूरा प्रदर्शन जनसमुदायों के बोल्शेविकीकरण का ही नतीजा था; यह दिखला रहा था कि जनता के बीच बोल्शेविक पार्टी की कार्यदिशा का वर्चस्व बढ़ता जा रहा था। लेकिन इस प्रदर्शन का समय-निर्धारण अकेले बोल्शेविक पार्टी मनोगत तरीक़े से नहीं कर सकती थी। ज़ाहिर है, इसके समय-निर्धारण के पीछे बहुत से वस्तुगत कारक और बहुत-सी अन्य मनोगत शक्तियाँ काम कर रही थीं। लेकिन चूँकि यह जनउभार बोल्शेविक नारों और कार्यदिशा के समर्थन में और उसके अन्तर्गत ही हो रहा था इसलिए बोल्शेविक पार्टी एक जि़म्मेदार क्रान्तिकारी पार्टी के समान हर प्रकार की सम्भावना के लिए तैयारी कर रही थी : इस सम्भावना के लिए भी जबकि नेतृत्व पूरी तरह उनके हाथों में रहता और प्रदर्शन पूरी तरह शान्तिपूर्ण और संगठित रहता और इस सम्भावना के लिए भी जबकि यह प्रदर्शन लेनिन के शब्दों में ”महज़़ एक प्रदर्शन” नहीं रह जाता, जैसा कि हुआ और जैसा कि लेनिन ने बाद में ‘तीन संकट’ नामक अपने लेख में लिखा भी था। लेकिन बोल्शेविक फिर भी एक अपरिपक्व सशस्त्र विद्रोह रोकने में कामयाब रहे; हालाँकि इस प्रक्रिया में तात्कालिक तौर पर उन्हें काफ़ी नुक़सान उठाना पड़ा था।

इस दौरान, किसी भी मौक़े पर किसी जि़म्मेदार पार्टी के निकाय का इरादा सशस्त्र विद्रोह का नहीं था। रैबिनोविच ही द्वितीय पीटर्सबर्ग नगर सम्मेलन में पारित प्रस्ताव को उद्धृत करते हैं जिसमें स्पष्ट तौर पर पार्टी की पीटर्सबर्ग कमेटी ने यह निर्णय लिया था कि मज़दूर एवं सैनिक सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन करें और सोवियत के समक्ष अपनी यह इच्छा पुरज़ोर तरीक़े से पेश करें कि वह सत्ता पूर्ण रूप से अपने हाथों में ले ले (देखें, वही, पृ. 164)। इससे ज़्यादा का लक्ष्य न तो केन्द्रीय कमेटी ने तय किया था और न ही किसी अन्य पार्टी निकाय ने।

वास्तव में, 4 जुलाई की सुबह प्रदर्शन पूरी तरह से बोल्शेविक पार्टी के हाथों में था। यही कारण था कि जब 4 जुलाई को प्रदर्शन की शुरुआत हुई तो बोल्शेविक संगठनकर्ताओं के आह्वान पर पहले प्रदर्शनकारियों की समूची भीड़ लेनिन को सुनने के लिए क्शेसिंस्काया महल पहुँची, जो कि उसी सुबह, फिनलैण्ड में अपनी छुट्टियाँ पूरी किये बिना ही बीच में ही वापस लौट आये थे। लेनिन ने अपने छोटे से भाषण में जनता को धैर्य, चौकसी और मज़बूती बनाये रखने का सन्देश दिया। लेकिन सारे प्रदर्शनकारियों को क्शेसिंस्काया महल की ओर ले जाने पर प्रदर्शन में शामिल अराजकतावादियों, अराजकतावादी-कम्युनिस्टों और मारिया स्पिरिदोनोवा जैसे वामपन्थी समाजवादी-क्रान्तिकारियों ने यह कहकर आपत्ति जतायी कि पूरे प्रदर्शन को एक बोल्शेविक प्रदर्शन में तब्दील किया जा रहा है। जनता ने उनकी बातें नहीं सुनीं और सारे प्रदर्शनकारी क्शेसिंस्काया महल की ओर चल पड़े, जहाँ पर लेनिन मौजूद थे क्योंकि यह प्रदर्शन 3 जुलाई की देर रात से एक बोल्शेविक प्रदर्शन ही बन चुका था। बोल्शेविक पार्टी ने अब इस प्रदर्शन की बागडोर अपने हाथों में ले ली थी ताकि उसे एक संगठित और शान्तिपूर्ण चरित्र प्रदान कर सकें।

इसी बीच पेत्रोग्राद सोवियत के मज़दूर सेक्शन में पहली बार बोल्शेविक बहुमत में आ गये। इसके बाद वहाँ बोल्शेविक संगठनकर्ताओं ज़ि‍नोवियेव, कामेनेव और उस समय तक मेज़रायोन्त्सी ग्रुप के सदस्य त्रात्स्की ने हूबहू और शब्दश: वह प्रस्ताव पारित किया जो कि बोल्शेविक पार्टी की केन्द्रीय कमेटी ने पारित किया था। स्वयं रैबिनोविच ने इस प्रस्ताव को उद्धृत किया है :

”इस बैठक के सभी भागीदार जि़लों में जायेंगे ताकि इस निर्णय के बारे में मज़दूरों और सैनिकों को सूचित कर सकें और इस आयोग से निरन्तर सम्पर्क में रहकर आन्दोलन को एक शान्तिपूर्ण और संगठित चरित्र देने का प्रयास करेंगे।” (वही, पृ. 170)

जैसा कि हम देख सकते हैं, यह हूबहू वही बात है जो‍कि केन्द्रीय कमेटी और पीटर्सबर्ग कमेटी के प्रस्तावों में कही गयी थी। रैबिनोविच यह ब्योरा देना भी भूल जाते हैं कि जब 3 जुलाई को तौरीदा महल में केन्द्रीय कमेटी की बैठक चल रही थी तो शाम के वक़्त विभिन्न कारख़ानों के मज़दूर प्रतिनिधि उसके पास आ रहे थे और शुरू हो चुके प्रदर्शन की सूचना देते हुए इस प्रदर्शन को शान्तिपूर्ण बनाये रखने के लिए बोल्शेविक पार्टी से कमान अपने हाथ में लेने का आग्रह कर रहे थे। ग़ौरतलब है, मज़दूरों की व्यापक बहुसंख्या प्रदर्शन में हिस्सेदारी करने को तो इच्छुक थी, लेकिन वह चाहती थी कि पार्टी प्रदर्शन की कमान अपने हाथों में ले अन्यथा सैनिकों का अधैर्य एक अपरि‍पक्व बग़ावत की ओर जा सकता था। यह पूरा ब्यौरा भी रैबिनोविच की पुस्तक से अनुपस्थि‍त है।

लेनिन की पेत्रोग्राद वापसी और लेनिन के अनिर्णय का रैबिनोविच
का मिथक

रैबिनोविच बताते हैं कि किस प्रकार 3 जुलाई की रात में अन्तत: बोल्शेविक नेतृत्व ने तय किया कि वे प्रदर्शन को रोक नहीं सकते और उन्हें इसे नेतृत्व देकर एक संगठित और शान्तिपूर्ण प्रदर्शन में तब्दील करना चाहिए। इसी के साथ वे तत्काल किसी को लेनिन को बुलाने के लिए भेजने का निर्णय लेते हैं। रैबिनोविच इस सूचना की पुष्टि के लिए ज़ि‍नोवियेव को उद्धृत करते हैं, ”ज़ि‍नोवियेव ने पुष्ट किया कि तौरीदा महल पर तीस हज़ार पुतिलोव मज़दूरों के आने और क्रोंस्टाट से रैस्कॉलनिकोव (एक अन्य बोल्शेविक नेता) का फोन आने के साथ, जिन्होंने स्पष्ट तौर पर बताया कि कोई चीज़ या कोई व्यक्ति क्रोंस्टाट के नाविकों को अगली सुबह पेत्रोग्राद जाने से नहीं रोक सकता है, अन्तत: यह तय किया गया कि केन्द्रीय कमेटी अगले दिन (यानी 4 जुलाई) को मज़दूरों और सैनिकों के ”सशस्त्र लेकिन शान्तिपूर्ण” प्रदर्शन की आज्ञा देगी और उसका नेतृत्व करेगी।” (वही, पृ. 174) हालाँकि रैबिनोविच पश्चटिप्पणी में रैस्कॉलनिकोव द्वारा दी गयी सूचना पर सन्देह करते हैं, लेकिन उनके द्वारा दिया गया ब्यौरा ही रैस्कॉलनिकोव के दावे को पुष्ट करता है। इसके बाद ही केन्द्रीय कमेटी ने लेनिन के लिए बुलावा भेजा। अगली सुबह लेनिन क्शेसिंस्काया महल पहुँचे और सारे प्रदर्शनकारी लेनिन को सुनने के लिए 4 जुलाई की सुबह वहाँ पहुँचे। यहाँ क्या हुआ था, यह हम पहले ही बता चुके हैं।

रैबिनोविच सही दावा करते हैं कि लेनिन पहले लोगों को सम्बोधित नहीं करना चाहते थे लेकिन फिर कई बोल्शेविक नेताओं के कहने पर उन्होंने सम्बोधित करने का आग्रह स्वीकार किया। लेनिन ने अपने भाषण में सब्र बरतने और चौकसी बनाये रखने की अपील की। इस बारे में रैबिनोविच का कहना है कि लेनिन ने प्रदर्शन की शुरुआत के बाद आरज़ी सरकार का तख़्तापलट करने की सम्भावना से इंकार नहीं किया था। इसके समर्थन में वे एक अन्य नेता कालिनिन को उद्धृत करते हैं, जिन्होंने इस मौक़े पर लेनिन से पूछा था कि यह क्या यह सिर्फ़ एक प्रदर्शन हो रहा है या फिर सत्ता क़ब्ज़ा करने की शुरुआत। इसके जवाब में लेनिन ने कहा कि यह वक़्त आने पर ही पता चलेगा। निश्चित तौर पर, लेनिन उस समय यही जवाब दे सकते थे क्योंकि अभी बोल्शेविक भी नहीं जानते थे कि प्रदर्शनकारी किस हद तक उनके नेतृत्व और नियन्त्रण में रहेंगे। लेकिन इसे रैबिनोविच मंशा का प्रश्न बना देते हैं। उनके अनुसार, इरादे के स्तर पर भी लेनिन अभी अनिश्चय की स्थिति में थे और उन्होंने तख़्तापलट करने का विचार त्यागा नहीं था। लेकिन अन्य सभी स्रोतों से सिद्ध किया जा सकता है कि जहाँ तक लेनिन के आकलन, इच्छा और इरादे का प्रश्न था, आरज़ी सरकार का तख़्तापलट करना किसी भी रूप में अभी उनके एजेण्डा पर नहीं था। वह स्पष्ट तौर पर मानते थे कि अभी संकट पका नहीं है और पेत्रोग्राद की स्थिति पूरे रूस की स्थिति नहीं है। लेकिन रैबिनोविच यह अनिश्चय की स्थिति लेनिन पर एक प्रकार से थोप देते हैं। तत्काल क्या सम्भावनाएँ थीं और लेनिन के अनुसार क्या वांछनीय था, इसमें रैबिनोविच फ़र्क़ नहीं करते ताकि 3-5 जुलाई के प्रदर्शनों को वे एक बाधित सशस्त्र विद्रोह (aborted insurrection) के रूप में पेश कर सकें। अगर लेनिन वाक़ई किसी अनिश्चय में थे, तो 4 जुलाई के पूरे घटनाक्रम में ऐसा कुछ नहीं था जो कि उन्हें सत्ता पर क़ब्ज़ा कर लेने का अनुमोदन करने और इसके लिए निर्देश देने से रोकता। लेकिन लेनिन ने ऐसा नहीं किया; क्योंकि जब यह स्पष्ट हो गया था कि प्रदर्शनकारी मुश्किल से ही सही, मगर बोल्शेविक पार्टी के नियन्त्रण में हैं, तो लेनिन की रणनीति कम-से-कम नुक़सान उठाकर पीछे हटने की थी। इस बात को रैबिनोविच आगे स्वयं भी स्वीकार करते हैं।

रैबिनोविच स्वयं कम-से-कम दो स्थानों पर स्वीकार करते हैं कि 4 जुलाई को जो हिंसा की घटनाएँ हुईं उसके लिए बोल्शेविक नेतृत्व जि़म्मेदार नहीं था। हालाँकि वे दक्षिणपन्थी गिरोहों (जैसे कि ‘ब्लैक हण्ड्रेड्स’) को बचाने का पूरा प्रयास करते हैं और कहते हैं कि हिंसा के लिए पूरा माहौल जि़म्मेदार था। वे लिखते हैं :

”उस समय यह प्रश्न काफ़ी महत्वपूर्ण था कि पहली गोली किसने चलायी। पचास वर्षों बाद, अख़बारी ब्यौरों, दस्तावेज़ों और संस्मरणों के भ्रमित कर देने वाले समुच्चय को देखने से यह प्रभाव छूटता है कि काफ़ी सम्भावना थी कि गोली चलाने को तैयार प्रदर्शनकारी, उकसाने वाले तत्व, दक्षिणपन्थी तत्व और कई बार शुद्ध रूप से भ्रम का माहौल और भय का माहौल बराबर जि़म्मेदार थे।” (वही, 171)

लेकिन आगे वह सच्चाई छिपा नहीं पाते और लिखते हैं :

”जब बीच दोपहर में क़रीब साठ हज़ार लोगों का जुलूस सादोवाइया और अप्राक्सिना मार्गों के कोने पर एक चर्च के पास से गुज़रा, तो एक बार फिर, मानो चर्च की घण्टी के संकेत पर, ऊपरी खिड़कियों और छतों से प्रदर्शनकारियों पर गोलियों की बौछार हुई। बाद में बोग्दातियेव ने आरज़ी सरकार के जाँच आयोग के सामने गर्व से गवाही थी कि पुतिलोव के मज़दूरों ने इन निशानेबाज़ों का इलाज कर दिया।” (वही, पृ. 185)

उस समय के कई बोल्शेविक स्रोतों और अख़बारों से स्पष्ट तौर पर साबित किया जा सकता है कि पहले हमला करने का काम दक्षिणपन्थी गिरोहों ने किया था ताकि प्रदर्शन हिंस्र हो जायेगा और फिर बोल्शेविक पार्टी का दमन करने और उसके ख़ि‍लाफ़ माहौल बनाने में प्रतिक्रान्तिकारी शक्तियों को कोई दिक़्क़त न पेश आये। सही मायने में प्रदर्शनकारियों ने इन हमलों का बेहद सीमित जवाब दिया और इसीलिए मारे गये और हताहत हुए लोगों में दोनों पक्षों की संख्या लगभग बराबर थी। अन्यथा, अगर वे खुलकर इन हमलों का जवाब देते तो उस दिन पेत्रोग्राद से इन दक्षिणपन्थी गिरोहों का सफ़ाया हो गया होता। लेनिन ने अपने लेख ‘एक जवाब’ में इसका साक्ष्यों और प्रमाणों के साथ पूरा ब्यौरा दिया है। लेकिन रैबिनोविच इस लेख को एक बार भी उद्धृत नहीं करते क्योंकि इससे एक ‘बाधित सशस्त्र विद्रोह’ की उनकी थीसिस कूड़े की पेटी के हवाले हो जायेगी। इसलिए वे जानबूझकर चयन करके तथ्यों को पेश करते हैं। सच्चाई यह थी कि बोल्शेविकों ने अपने नेतृत्व में इस प्रदर्शन को अराजकतापूर्ण हिंसा या सशस्त्र विद्रोह के अपरिपक्व प्रयास में तब्दील होने से रोका था।

लेकिन बोल्शेविकों और लेनिन के अनिर्णय और अनिश्चय की बात को रैबिनोविच लगातार पेश करने की कोशिश करते हैं। एक स्थान पर वे लिखते हैं :

”अन्त में, बीच में अनिर्णय के साथ दोलन कर रहे थे क्रोंस्टाट के बोल्शेविक नेता, जो कि आम तौर पर बेहद प्रभावी हुआ करते थे। वे भी अराजकतावादियों के ही समान अधैर्यवान थे कि आरज़ी सरकार का निपटारा कर दिया जाये और निश्चित तौर पर यही धारणा सम्प्रेषित करना चाहते थे कि इस आन्दोलन का शुरू से मक़सद ही यही था, लेकिन पार्टी की केन्द्रीय कमेटी के अनिर्णय के कारण उनके पंख कट गये थे, ठीक उसी प्रकार जैसे कि पिछली रात गैरीसन के सैन्य संगठन के पर कट गये थे।” (वही, पृ. 187)

इस सूचना का स्रोत कौन है? मेंशेविक सुखानोव! उपरोक्त उद्धरण की पश्चटिप्पणी में रैबिनोविच सुखानोव का हवाला देते हैं। लेकिन उसके ठीक आगे प्रत्यक्षवादी ईमानदारी से मजबूर होकर उन्हें सैन्य संगठन के नेता नेव्स्की का भी उद्धरण देना पड़ा है जिसमें नेव्स्की ने स्पष्ट किया है कि इस अनिर्णय की स्थिति का क्या अर्थ था। बोल्शेविक नेतृत्व तौरीदा महल के बाहर एकत्र लोगों को किसी कार्रवाई का निर्देश नहीं दे रहा था क्योंकि उसे किसी कार्रवाई का निर्देश देना ही नहीं था! उसका लक्ष्य ही यही था कि इसे जनसमुदायों की इच्छा को सोवियत के समक्ष पेश करने वाले एक प्रदर्शन के रूप में समाप्त किया जाये। इसलिए प्रदर्शन में भाषण हो रहे थे, बीच-बीच में कुछ प्रतिनिधि मण्डल सोवियत के पास भेजे जा रहे थे। लेकिन किसी कार्रवाई का निर्देश नहीं दिया जा रहा था। आम जनता की निगाह में, जो कि कार्रवाई के लिए उतावली हो रही थी, यह अनिर्णय जैसा ही दिखलायी देगा। बीच में जनता का सब्र थोड़ा टूट भी गया और एक अराजकतावादी नाविक की गिरफ़्तारी पर सफ़ाई देने आये समाजवादी-क्रान्तिकारी मन्त्री विक्तोर चेर्नोव को प्रदर्शनकारियों ने हिरासत में भी ले लिया था, जिसे त्रात्स्की और रैस्कॉलनिकोव छुड़ाकर ले गये। (हालाँकि इसके बाद डरे हुए चेर्नोव ने बोल्शेविकों के ख़ि‍लाफ़ काफ़ी विषवमन किया और उनके ख़ि‍लाफ़ कड़ी कार्रवाई की वकालत की क्योंकि इस गिरफ़्तारी के सदमे से वे काफ़ी समय तक उबर नहीं पाये थे!) लेकिन इस अलग-थलग अकेली घटना को छोड़ दिया जाये तो प्रदर्शनकारियों ने बोल्शेविकों द्वारा कोई निर्देश नहीं दिये जाने पर कोई कार्रवाई नहीं की। लेकिन कोई निर्देश नहीं दिया जाना प्रदर्शनकारियों के बीच मौजूद अतिवादी तत्वों के लिए अनिर्णय और अनिश्चय जैसा दिख रहा था। लेकिन स्पष्ट तौर पर यह बोल्शेविक यो‍जना का हिस्सा था। वास्तव में, लेनिन समेत बोल्शेविक नेतृत्व किसी अनिर्णय की स्थिति में नहीं था।

जब बोल्शेविक पार्टी प्रदर्शन को वापस लेने की सार्वजनिक घोषणा लागू कर देती है, रैबिनोविच के अनुसार लगभग उस समय तक भी सत्ता पर क़ब्ज़ा करने का विकल्प उसने खुला रखा था और इसीलिए यह सार्वजनिक घोषणा प्राव्दा के पिछले पेज पर 5 जुलाई को प्रकाशित हुई थी। यह विचित्र बात है क्योंकि 4 जुलाई की शाम से ही यह स्पष्ट हो गया था कि प्रदर्शन की लहर अब ढलान पर है और रैबिनोविच स्वयं इसके कई कारण बताते हैं। 4 जुलाई की रात तक यह स्पष्ट हो गया था कि अगले दिन 3 और 4 जुलाई के घटनाक्रम की पुनरावृत्ति नहीं होने वाली है। ऐसे में, यह स्वाभाविक था कि प्राव्दा ने यह सूचना पिछले पेज पर प्रकाशित की। इसके आधार पर यह अटकल लगाना कि बोल्शेविक अभी भी सशस्त्र विद्रोह के लिए माकूल मौक़े के इन्तज़ार में थे, हास्यास्पद है। एक स्थान पर रैबिनोविच अपनी पूरी विचित्र अवस्थिति को थोड़ा सन्तुलित करने के लिए एक और भी विचित्र बात कहते हैं। वह कहते हैं कि सुखानोव के पूरे ब्यौरे पर पूरी तरह निर्भर रहते हुए यह नहीं कहा जा सकता है कि लेनिन किसी असफल विद्रोह का नेतृत्व कर रहे थे क्योंकि लेनिन इसे एक सशस्त्र विद्रोह के रूप में नहीं देखते थे; लेकिन फिर भी लेनिन ने 4 और 5 जुलाई को सत्ता पर क़ब्ज़ा करने के विकल्प को त्यागा नहीं था! इसका क्या अर्थ है? ज़ाहिर है, रैबिनोविच तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे सीधे लेनिन को एक सशस्त्र विद्रोह के योजनाकार के रूप में दिखायें या नहीं। तथ्य क़तई इस पक्ष में नहीं हैं, लेकिन रैबिनोविच की थीसिस उन्हें द्रविड़ प्राणायाम करने को मजबूर करती है।

छठे अध्याय के अन्त में एक बार फिर से रैबिनोविच केन्द्रीय कमेटी और प्राव्दा की अवस्थिति और सोल्दात्स्काइया प्राव्दा की अवस्थिति में अन्तर पैदा करने का प्रयास करते हैं। 5 जुलाई को सोल्दात्स्काइया प्राव्दा में एक सम्पादकीय अग्रलेख छपा जिसका शीर्षक था ”सड़कों पर क्या हो रहा है”। इस लेख में यह कहा गया था कि जो प्रदर्शन हुआ है सर्वहारा वर्ग की पार्टी ने उसके नेतृत्व को स्वीकार किया है और आगे भी वह सोवियतों को सत्ता स्थानान्तरित करने के संघर्ष में सर्वहारा वर्ग को नेतृत्व प्रदान करती रहेगी, तब तक जब तक कि यह संघर्ष जीत नहीं लिया जाता। रैबिनोविच इसे बोल्शेविक संगठन के वामपन्थी भटकाव का नमूना मानते हैं, जिससे केन्द्रीय कमेटी को देर में यह समझ आया कि आम बग़ावत के लिए अभी समय उपयुक्त नहीं है। एक बार फिर हम देख सकते हैं कि इस लेख की रैबिनोविच द्वारा मनमानी व्याख्या की गयी है। इसमें कुछ भी ऐसा नहीं है जो कि बोल्शेविक सैन्य संगठन के वामपन्थ को दिखलाये। निश्चित तौर पर, आबादी का जो हिस्सा सबसे ज़्यादा सुलग रहा था उसके बीच प्रदर्शन को फि़लहाल रोक लेने के लिए जो अपील जारी होती, उसके शब्द कुछ ऐसे ही हो सकते थे। लेकिन चूँकि रैबिनोविच हर मौक़े पर केन्द्रीय कमेटी, पीटर्सबर्ग कमेटी और बोल्शेविक सैन्य संगठन के बीच दीवारें खड़ी करना चाहते हैं, इसलिए सोल्दात्स्काइया प्राव्दा के इस सम्पादकीय की भी वे मनमानी व्याख्या करते हैं।

जुलाई प्रदर्शन का दमन और प्रतिक्रिया का दौर : रैबिनोविच की अटकलें

आख़ि‍री दो अध्यायों में रैबिनोविच अपनी विभाजित पार्टी की थीसिस के समर्थन में कुछ अन्तिम व्याख्याएँ पेश करते हुए उसे मुकाम तक पहुँचाते हैं। 3-5 जुलाई के प्रदर्शनों के वापस लिए जाने के फ़ैसले के साथ बोल्शेविक पार्टी ने रैस्कॉ‍लनिकोव को यह जि़म्मेदारी दी कि सशस्त्र प्रदर्शनकारियों को वापस ले जायें और इस प्रक्रिया में प्रदर्शनकारियों पर दक्षिणपन्थियों के हमलों से भी निपटें। यही कारण था कि रैस्कॉलनिकोव ने क्रोंस्टाट के नाविकों को एक अतिरिक्त दिन राजधानी में रहने की आज्ञा दी। रैबिनोविच लगातार इस बात पर शक करते हैं कि ये सारे इन्तज़ामात किस हद तक आत्मरक्षा के लिए किये जा रहे थे और किस हद तक अपनी ओर से हमला करने के लिए, यह बता पाना मुश्किल है। यहाँ भी रैबिनोविच यह छवि पेश करना चाहते हैं कि पार्टी द्वारा प्रदर्शन की वापसी के एलान के बाद भी सैन्य संगठन स्वायत्तता के साथ काम कर रहा था। लेकिन रैबिनोविच स्वयं बताते हैं कि रैस्कॉ‍लनिकोव ने अपने संस्मरणों में लिखा कि प्राव्दा के कार्यालय के ध्वंस की ख़बर आ चुकी थी और यह स्पष्ट था कि क़दम पीछे हटाते हुए भी आत्मरक्षा के पूरे इन्तज़ामात करने होंगे। इसीलिए रैस्कॉलनिकोव ने सैनिकों को भी सावधान कर दिया था। बैरकों में पहुँच चुके सैनिकों को भी सावधान कर दिया गया था कि ज़रूरत पड़ने पर उन्हें भी आना पड़ सकता है। लेकिन रैस्कॉलनिकोव ने स्पष्ट शब्दों में बतलाया था कि ये सारे क़दम केवल और केवल आत्मरक्षा के लिए उठाये जा रहे थे। जबकि रैबिनोविच आगे लिदाक द्वारा लिखी गयी और 1932 में छपी बोल्शेविक क्रान्ति के इतिहास पर लिखे एक निबन्ध का हवाला देते हुए बताते हैं कि इसमें लिदाक ने बताया है कि यह बता पाना मुश्किल था कि सैन्य संगठन ने 5 जुलाई को जो-जो क़दम उठाये थे, वे सभी आत्मरक्षा के लिए ही थे या नहीं। लेकिन रैबिनोविच यह खुलासा इस निबन्ध की चर्चा के साथ नहीं करते, बल्कि पश्च टिप्पणी में करते हैं कि इस निबन्ध पर सम्पादक ने एक टिप्पणी लगायी थी जिसमें लिखा था कि लिदाक की इस सूचना को प्रमाणों से पुष्ट नहीं किया जा सका। यह ज़रूर है कि पीछे हटते हुए आत्मरक्षा के लिए कहीं-कहीं कुछ बोल्शेविक सैनिकों ने हमलावर क़दम भी उठाये थे, लेकिन यह आम रुझान नहीं था और अलग-थलग कुछ घटनाएँ थीं। ज़ाहिर है, जिन स्थितियों में प्रदर्शन को वापस लिया गया था और जिस प्रकार सैनिकों को वापस बैरकों में ले जाना था, उसमें इस प्रकार की छिटपुट घटनाएँ होना लाज़ि‍मी था। क़दम पीछे हटाना और वह भी कम-से-कम नुक़सान उठाकर हमेशा ही कठिन होता है, और दी गयी स्थितियों में तो यह और भी कठिन था। लेकिन इसे सैन्य संगठन की स्वायत्ततावादी हरकत क़रार देना रैबिनोविच की ग़लती है।

जिस उपशीर्षक के मातहत सातवें अध्याय में रैबिनोविच बोल्शेविकों द्वारा प्रदर्शन को वापस लिये जाने और क़दम पीछे हटाने की बात कर रहे हैं, उसका नाम है ‘पेत्रोग्राद बोल्शेविकों का आत्मसमर्पण’। यह उपशीर्षक कुछ दुरुस्त नहीं है। निश्चित तौर पर, शहर के जिन हिस्सों पर प्रदर्शनकारियों का क़ब्ज़ा था, या जिन इमारतों पर उनका प्रभाव या क़ब्ज़ा था, पार्टी ने उनका समर्पण करने का निर्देश दे दिया था। सैनिकों को एक प्रक्रिया में उनकी गैरीसनों में वापस भेजा गया। लेकिन बोल्शेविक नेता जिसमें लेनिन, पोदवाॅइस्की आदि शामिल थे, वक़्त रहते पलायन कर गये थे और भूमिगत हो गये थे। इस बात का ब्यौरा रैबिनोविच ख़ुद ही देते हैं। प्रमुख नेताओं में त्रात्स्की व ज़ि‍नोवियेव गिरफ़्तार कर लिये गये थे। लेनिन के आत्मसमर्पण का अर्थ होता उनकी जान को प्रतिक्रान्तिकारियेां के हाथों में सौंपना। प्रतिक्रान्तिकारियेां के लिए पहला निशाना लेनिन ही थे। लेकिन किसी भी रूप में बोल्शेविकों ने क़दम पीछे हटाये थे, आत्मसमर्पण नहीं किया था। इस ग़लती के बावजूद रैबिनोविच ने प्रदर्शन वापस लिये जाने के बाद बोल्शेविक पार्टी के क्रिया-कलाप का जो जीवन्त चित्र पेश किया है वह पठनीय है। इसमें बोल्शेविक पार्टी का अनुशासन, अपने नेताओं और पार्टी के मस्तिष्क यानी केन्द्रीय कमेटी को बचाने के लिए इसके आम सदस्यों में क़ुर्बानी की भावना शानदार थी। ग़ौरतलब है, जब क्शेसिंस्काया महल पर प्रतिक्रान्तिकारी ताक़तें क़ब्ज़ा करने वाली थीं, उस समय सात बोल्शेविक जल्दी-जल्दी पार्टी की सभी फ़ाइलों को समेट रहे थे; प्रमुख नेताओं जैसे कि लेनिन व पोदवॉइस्की को पहले ही वहाँ से निकाल दिया गया था। बोल्शेविकों के काम करने के तौर-तरीक़ों के बारे में रैबिनोविच का ब्यौरा बहुमूल्य है।

रैबिनोविच बताते हैं कि प्रदर्शन को वापस लिये जाने के बाद प्रतिक्रिया का एक दौर चला जिसमें पेत्रोग्राद में बोल्शेविक पार्टी की लोकप्रियता कुछ समय के लिए घट गयी थी। पार्टी कार्यों का काफ़ी नुक़सान हुआ था जैसा कि प्रदर्शन के वापस लिये जाने के तत्काल बाद की बैठक में लेनिन ने पूर्वानुमान किया था। लेनिन के जर्मन एजेण्ट होने की अफवाह को पूँजीवादी मीडिया और सरकार ने खूब हवा दी और मोर्चों पर हो रही हार की जि़म्मेदारी बोल्शेविकों व लेनिन के सिर डालने का प्रयास किया। लेकिन यह प्रतिक्रिया का माहौल ज़्यादा लम्बा नहीं चल सका और कुछ ही समय में बोल्शेविकों का सितारा फिर से बुलन्दी पर जाने लगा। रूस में भूख, ग़रीबी और युद्ध के कारण भयंकर असन्तोष का माहौल एक बार फिर व्यापक आबादी को अपने प्रभाव में लेने लगा। रैबिनोविच का यह मूल्यांकन भी बिल्कुल दुरुस्त है कि अपनी बेहद चुस्त-दुरुस्त पार्टी सांगठनिक मशीनरी के कारण दमन के दौर में भी बोल्शेविक पार्टी को ज़्यादा नुक़सान नहीं उठाना पड़ा। समूचे पार्टी ढाँचे को, इसके प्रमुख नेताओं को और इसके बुनियादी ज़रूरी सम्पर्कों को कुशलतापूर्वक बचा लिया गया। प्राव्दा व अन्य बोल्शेविक मुखपत्रों को दबाये जाने के कुछ ही दिनों के भीतर बदले हुए नामों के साथ नये बोल्शेविक मुखपत्र निकलने लगे। संक्षेप में कहें तो बोल्शेविकों ने अपना सामाजिक आधार और अपनी सांगठनिक मशीनरी को फिर से हासिल करने और रवां करने में ज़्यादा वक़्त नहीं गंवाया।

लेकिन रैबिनोविच पूरा श्रेय बोल्शेविकों को नहीं देते और एक बार फिर रूसी बुर्जुआ वर्ग को एक मौक़ा चूकने के लिए कोसते हुए प्रतीत होते हैं। रैबिनोविच दावा करते हैं कि आरज़ी सरकार का सरकारी मशीनरी और नौकरशाही पर कोई नियन्त्रण नहीं था। नतीजा यह हुआ कि आरज़ी सरकार के आदेश के बावजूद 3-5 जुलाई के बीच सर्वाधिक सक्रिय रही रेजीमेण्टों व गैरीसनों को निशस्त्र करने का कार्य भी ढंग से नहीं किया जा सका। बस इन रेजीमेण्टों को तोड़ दिया गया ताकि उनके बीच की एकजुटता को तोड़ा जा सके और फिर उन्हें अलग-अलग हिस्सों में मोर्चे पर भेज दिया गया। लेकिन यह करने के अलावा आरज़ी सरकार और क्या कर सकती थी? ज़ाहिर है कि मोर्चे पर उसे सैनिकों की आवश्यकता थी। इसलिए वह सबसे विद्रोही तेवर रखने वाली रेजीमेण्टों को तोड़कर मोर्चे पर ही भेज सकती थी; सभी को निशस्त्र करने का अर्थ होता समूची रिज़र्व ताक़त को समाप्त करना। जिस स्थिति में उस समय आरज़ी सरकार थी, उसमें उसने वह सबकुछ किया जो वह कर सकती थी। यह सरकारी अधिकारियों की अकर्मण्यता का या फिर उनके आधे-अधूरे मन से किये गये प्रयासों का प्रश्न नहीं था। यदि इस तर्क को माना जाये तो इसका यह नतीजा निकलता है कि अगर आरज़ी सरकार ने प्रतिक्रिया के माहौल का पूरी कुशलता और समझदारी से फ़ायदा उठाया होता तो फिर से बोल्शेविकों के उभार को रोका जा सकता था। हालाँकि, रैबिनोविच सीधे यह बात कहीं नहीं कहते और अलग से वे एक स्थान पर स्वीकार भी करते हैं कि यह बदलती परिस्थिति और बोल्शेविकों की कुशलता थी, जिसे इसका श्रेय दिया जाना चाहिए। रैबिनोविच बताते हैं कि मज़दूर अपने हथियार छिपाने में कामयाब हुए और जिनसे हथियार ले लिये गये थे, उन्हें कोर्निलोव के तख़्तापलट के प्रयास के दौरान पेत्रोग्राद सोवियत ने ख़ुद ही फिर से हथियारबन्द कर दिया था। कुल मिलाकर, नतीजा यह था कि बोल्शेविक पार्टी बेहद कम नुक़सान उठाकर और प्रतिक्रिया के छोटे-से दौर के बाद फिर से बेहद लोकप्रिय हो गयी और क्रान्ति को नेतृत्व देने की स्थिति में आ गयी।

रैबिनोविच जुलाई की घटनाओं को लेकर छठी पार्टी कांग्रेस में हुई बहस का ब्यौरा देते हैं। 1905 की असफल क्रान्ति के समय सैन्य संगठन ने अतिरेकपूर्ण स्वायत्तता का प्रदर्शन किया था और इसके लिए उसकी आलोचना की गयी थी। छठी कांग्रेस में भी कुछ लोगों ने सैन्य संगठन पर अति-स्वायत्तता प्रदर्शित करने और केन्द्रीय कमेटी के निर्देशों को शब्दश: न लागू करने और साथ ही सैनिकों में विद्रोह की भावना पर नियन्त्रण करने के लिए पर्याप्त क़दम न उठाने का आरोप लगाया। इनमें से त्रात्स्की और कामेनेव ने तो यहाँ तक प्रस्ताव रखा कि एक अलग सैन्य संगठन की ज़रूरत पार्टी को नहीं है। लेकिन कांग्रेस ने उनके इस प्रस्ताव को रद्द कर दिया और स्पष्ट किया कि क्रान्ति की सैन्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सैन्य संगठन का अस्तित्व अपरिहार्य है, लेकिन इसे केन्द्रीय कमेटी की कमान के मातहत रहना चाहिए। ऐसा नहीं था कि इसके पहले सैन्य संगठन केन्द्रीय कमेटी की कमान में नहीं था। जैसा कि हमने उपरोक्त ब्यौरे में देखा, सैन्य संगठन का नेतृत्व हमेशा केन्द्रीय कमेटी के निर्णयों को लागू करने के लिए संघर्ष और प्रयास करता रहता था। जुलाई के शुरुआती दिनों में यह काम ही बेहद मुश्किल था। स्थितियाँ विस्फोटक थीं और अराजकतावादी ताक़तें आग में घी डालने का काम कर रही थीं; ऐसी स्थितियों में सैन्य संगठन का नेतृत्व जो कर सकता था वह उसने किया था। साथ ही, यह भी ध्यान देने वाली बात है कि सैन्य संगठन के अधिकांश लोग सेना में थे और बहुत अलग क़ि‍स्म की परिस्थितियों में रहते थे; इस बात को पार्टी भी समझती थी। ऐसे में, बोल्शेविक सैन्य संगठन ने बेहद प्रतिकूल परिस्थितियों में काफ़ी अच्छा काम किया था। बाद में, स्वयं लेनिन ने कहा था कि सैन्य संगठन के लोगों से अगर ग़लतियाँ भी हुईं हों तो उनकी मदद की जानी चाहिए क्योंकि जो लोग पहलक़दमी लेना नहीं जानते, वे कभी जीतने की उम्मीद नहीं कर सकते हैं और जो पहलक़दमी लेते हैं, उनसे ग़लतियाँ हो सकती हैं। रैबिनोविच आगे लिखते हैं कि सैन्य संगठन और पीटर्सबर्ग कमेटी के मुखपत्रों को केन्द्रीय कमेटी ने अपने मातहत ले लिया और यह तय हुआ कि ये मुखपत्र पूरी तरह से  केन्द्रीय कमेटी के नियन्त्रण में रहेंगे। रैबिनोविच को यह लगता है कि यह पीटर्सबर्ग कमेटी व सैन्य संगठन की स्वायत्तता को दबाने के लिए उठाया गया क़दम है। वास्तव में, बोल्शेविक पार्टी के बुनियादी उसूलों के मद्देनज़र यह क़दम बिल्कुल सही था और इसे पहले ही उठा लिया जाना चाहिए था।

लेकिन रैबिनोविच इस घटनाक्रम को अपने ‘विभाजित पार्टी’ के सिद्धान्त के अनुसार व्याख्यायित करते हैं। अगर यह सिद्धान्त सही है तो सैन्य संगठन और पीटर्सबर्ग कमेटी को ये निर्णय स्वीकार नहीं करने चाहिए थे। लेकिन उन्होंने ये निर्णय स्वीकार किये। साथ ही, रैबिनोविच इस क़दम को केन्द्रीय कमेटी द्वारा क़दम पीछे हटाना मानते हैं कि केन्द्रीय कमेटी ने बाद में सैन्य संगठन को एक केन्द्रीय कमेटी सदस्य की निगरानी में सोल्दात का प्रकाशन जारी रखने की इजाज़त दी। ज़ाहिर है, सैन्य संगठन अपना अलग मुखपत्र सैनिकों के लिए निकाले इस पर केन्द्रीय कमेटी की आपत्ति नहीं थी। केन्द्रीय कमेटी का मूल तर्क यह था कि यह मुखपत्र केन्द्रीय कमेटी की कार्यदिशा के अनुरूप निकलना चाहिए।  इस प्रकार की बहस केन्द्रीय कमेटी के भीतर और केन्द्रीय कमेटी और पीटर्सबर्ग कमेटी व सैन्य संगठन के बीच होना स्वाभाविक था। पीटर्सबर्ग कमेटी की यह माँग भी स्वाभाविक थी कि प्राव्दा को पीटर्सबर्ग में पीटर्सबर्ग कमेटी की प्रचारात्मक और उद्वेलनात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति करना चाहिए। इसीलिए लेनिन ने प्राव्दा के सम्पादक मण्डल में परामर्श की शक्ति के साथ पीटर्सबर्ग कमेटी के प्रतिनिधियों को जगह देने की हिमायत की। लेकिन निश्चित तौर पर, अलग-अलग कमेटियों के पूर्ण रूप से स्वायत्त मुखपत्र नहीं हो सकते और यह बात बोल्शेविक पार्टी का नेतृत्व भी व्यवहार के ज़रिये ही समझ सकता था। इस पूरे प्रकरण को ‘विभाजित पार्टी’ की अपनी अवधारणा को पुष्ट करने के लिए रैबिनोविच इस्तेमाल करते हैं। लेकिन उनके ही अनुसार ‘विभाजित पार्टी’ से उनका अर्थ था कि पार्टी के भीतर तीन सत्ता केन्द्र यानी केन्द्रीय कमेटी, पीटर्सबर्ग कमेटी और बोल्शेविक सैन्य संगठन मौजूद थे जिनके अलग-अलग लक्ष्य और अलग-अलग हित थे। हमने रैबिनोविच की लगभग पूरी पुस्तक का सार इस आलोचना के ज़रिये यहाँ पेश किया है। सच्चाई यह है कि रैबिनोविच के ही इतिहास-लेखन से ‘विभाजित पार्टी’ की उनकी अवधारणा को पुष्ट नहीं किया जा सकता है। चूँकि पूरी पुस्तक कई तथ्यों की ग़लत प्रस्तुति और व्याख्या के बावजूद रैबिनोविच के मूल तर्क से अलग कुछ कह रही है, इ‍सलिए रैबिनोविच एक अन्तिम अध्याय लिखने की आवश्यकता महसूस करते हैं : ‘परिणाम : विभाजित पार्टी’, मानो बाकी पुस्तक में वे कुछ और कहने का प्रयास कर रहे हों!

अन्तिम अध्याय में एक सच्चे उदार बुर्जुआ इतिहासकार के समान रैबिनोविच एक आदर्श शुरुआत करते हैं और कहते हैं कि सोवियत रूस में शुरू से ही पार्टी लेखन को पार्टी की राजनीतिक आवश्यकताओं के अनुसार नियन्त्रित किया जाता था। हम देख सकते हैं कि इस बात को रैबिनोविच ज़्यादातर 1956 के बाद के इतिहास-लेखन पर लागू कर रहे हैं क्योंकि उसके पहले के जो स्रोत रैबिनोविच उद्धृत करते हैं, उन्हें वे अनुमोदन के साथ और अपनी थीसीज़ को सिद्ध करने के लिए उद्धृत करते हैं।

रैबिनोविच इस बात से दुखी हैं कि सोवियत स्रोतों और इतिहास-लेखन में जो भी लेनिन की कार्यदिशा से विचलन करता है उसे दक्षिणपन्थी कहकर, जैसे कि कामेनेव को कहा गया, फिर वामपन्थी कहकर, जैसे कि सेमाश्को को कहा गया, ख़ारिज कर दिया जाता है। निश्चित तौर पर जब मार्क्सवादी-लेनिनवादी इतिहासकार इतिहास लिखेंगे तो अपने अप्रोच और पद्धति के अनुसार ही लिखेंगे; ठीक उसी प्रकार जैसे रैबिनोविच ने अपने दृष्टिकोण और पद्धति के अनुसार अपना इतिहास-लेखन किया है। यह उम्मीद करना कि किसी इतिहास-लेखन में इतिहासकार के विचारधारात्मक और राजनीतिक पूर्वाग्रह नहीं होंगे, एक पूर्ण रूप में वस्तुपरक इतिहास की कोरी कल्पना है। यह ‘वस्तु अपने आप में’ और उस वस्तु के प्रेक्षण के बीच फ़र्क़ नहीं करता जिन पर हर-हमेशा किसी न किसी वर्गीय दृष्टिकोण की छाप होती है। इस प्रकार की सोच प्रत्यक्षवाद की ख़ासियत होती है, जिसकी स्पष्ट छाप रैबिनोविच के इतिहास-लेखन पर है।

परिणाम के तौर पर रैबिनोविच अपने इस दावे को दुहराते हैं कि सोवियत इतिहास-लेखन में हमें पार्टी में जारी वास्तविक बहसों और मतभेदों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती है। हमने ऊपर ही बताया है कि 1953 के पहले के सोवियत स्रोतों के बारे में और विशेष तौर पर 1930 के दशक के पूर्वार्द्ध तक के सोवियत स्रोतों के बारे में यह दावा सही नहीं ठहरता है। साथ ही, यह भी अजीब बात है कि रैबिनोविच प्रमुख बोल्शेविक नेताओं में से त्रात्स्की को छोड़कर किसी अन्य को उद्धृत नहीं करते हैं।

रैबिनोविच अप्रैल सम्मेलन (सातवें अखिल रूसी पार्टी सम्मेलन) के बारे में कहते हैं कि कुछ सोवियत इतिहासकार अब (यानी 1961 के बाद, जबकि यह पुस्तक लिखी गयी थी) यह मानते हैं कि अप्रैल में लेनिन के आने के पहले पार्टी में मतभेद थे लेकिन लेनिन के आगमन के बाद सारे मतभेद समाप्त हो गये। इसके बारे में यह कहा जा सकता है कि कम-से-कम लेनिन और स्तालिन के लेखन से ऐसी तस्वीर क़तई नहीं मिलती। यहाँ तक कि ‘बोल्शेविक पार्टी का इतिहास’ में भी अप्रैल के बाद जारी मतभेदों की एक तस्वीर मिल जाती है। यह एक दीगर बात है कि यह तस्वीर कई बार सटीक नहीं भी हो सकती है। रैबिनोविच शिकायत करते हैं कि अप्रैल सम्मेलन में लेनिन ने जो कार्यदिशा पेश की वह काफ़ी ढीली-ढाली थी और जो प्रस्ताव उसके आधार पर स्वीकार किया गया उसे दक्षिणपन्थी कामेनेव अपनी तरह से व्याख्यायित कर सकते थे, और जल्दबाज़ वामपन्थी धड़ा अपनी तरह से व्याख्यायित कर सकता था। इसका कारण रैबिनोविच के अनुसार यह था कि लेनिन ने यह तो बताया था कि बुर्जुआ जनवादी चरण से क्रान्ति समाजवादी चरण में जा रही है लेकिन यह नहीं बताया था कि सत्ता पर क़ब्ज़ा करने के लिए आम बग़ावत कब की जानी है। पार्टी के एक सम्मेलन में पेश प्रस्ताव से यह उम्मीद करना कि वह आम बग़ावत का समय और तिथि बताये क्या मूर्खतापूर्ण नहीं माना जायेगा? और इस आधार पर कि आम बग़ावत का समय नहीं बताया गया, यह कहना कि यह प्रस्ताव बहुत ढीला-ढाला था जिसके आधार पर दक्षिणपन्थी धड़े और वामपन्थी धड़े को अपनी-अपनी कार्यदिशा लागू करने का ‘स्पेस’ मिल जाता था, किस हद तक समझदारी की बात मानी जायेगी? स्पष्ट है, रैबिनोविच ‘विभाजित पार्टी’ के अपने तर्क को सही सिद्ध करने के लिए विरोधाभासों के गड्ढे में गिर जाते हैं।

नतीजे के तौर पर…

जैसा कि हमने पहले भी कहा है कि रूसी क्रान्ति के इतिहास के सभी विद्यार्थियों को और विशेष तौर पर मार्कसवादियों-लेनिनवादियों को रैबिनोविच की यह पुस्तक और उनकी बाकी दो पुस्तकें अवश्य पढ़नी चाहिए। कारण यह है कि ये पुस्तकें उस दौरान हो रहे घटनाक्रम के लगभग एक-एक दिन का ब्यौरा देती हैं। तथ्यों का चयन करने में कई बार रैबिनोविच चयनपूर्ण रवैया अपनाते हैं, कुछ सीमित मौक़ों पर वे ग़लत तथ्यों पर या तथ्यों की ग़लत प्रस्तुति पर भी निर्भर करते हैं। लेकिन इसके बावजूद अधिकांश जगहों पर रैबिनोविच सही तथ्यों को ही पेश करते हैं, भले ही उनकी व्याख्या वह ग़लत करते हों। इसलिए उनकी पुस्तक क्रान्ति के दौरान की, विशेष तौर पर पेत्रोग्राद की और उस दौरान बोल्शेविक पार्टी और उसके नेतृत्व द्वारा किये जा रहे हस्तक्षेपों की, एक जीवन्त तस्वीर पेश करती है। इस रूप में उनकी तीनों ही पुस्तकें महत्वपूर्ण हैं। हमने यहाँ केवल पहली पुस्तक की आलोचनात्मक समीक्षा रखी है। पिछले अध्याय में हमने उनकी दूसरी पुस्तक की कुछ ख़ामियों की ओर भी इशारा किया है। लेकिन यहाँ तीनों पुस्तकों की आलोचनात्मक समीक्षा रखने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि रैबिनोविच अपनी बुनियादी थीम पर क़ायम रहते हैं। इन तीनों ही रचनाओं में वे ‘विभाजित पार्टी’ के अपने सिद्धान्त को वैध ठहराने का प्रयास करते हैं।

जैसा कि हमने इस आलोचना में देखा है, स्वयं रैबिनोविच का ही इतिहास-लेखन इस निर्णय को या इस मूल्यांकन को पुष्ट नहीं करता है। जब वे एक प्रत्यक्षवादी और अनुभववादी इतिहासकार के रूप में तथ्यों को दर्ज और व्यवस्थित कर रहे होते हैं तो वहाँ वे चयनपूर्ण तरीक़े से तथ्यों का चयन करने के अलावा ज़्यादा फेर-बदल नहीं कर सकते हैं। यही कारण है कि उन्हें अपनी व्याख्याओं को अलग से जोड़ना पड़ता है। यानी कि ये व्याख्याएँ और ये नतीजे विचारधारात्मक होते हैं। यदि पाठक रैबिनोविच के इतिहास-लेखन की इन समस्याओं से वाक़िफ़ हो तो उनकी पुस्तक उपयोगी साबित हो सकती है।

(अगले अंक में जारी)

 

दिशा सन्धान – अंक 5  (जनवरी-मार्च 2018) में प्रकाशित

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