पाठकों के पत्र : दिशा सन्धान-2, जुलाई-सितम्बर 2013

आपकी बात

साथी, क्रान्तिकारी अभिवादन

मुझे ‘नान्दीपाठ और ‘दिशा सन्धान’ के प्रवेशांक समय पर मिल गये हैं। दोनों ही पत्रिकाओं के कवर पेज, छपार्इ और कागज़ बहुत ही अच्छी किस्म के हैं। इनमें प्रकाशित सामग्री मैंने अभी पूरी तो नहीं पढ़ी है, उसमें वक़्त लगेगा। लेकिन अंक मिलते ही मैंने दोनों के सम्पादकीय और काफ़ी कुछ पढ़ लिया है जिससे यह तो समझ में आता ही है कि पत्रिकाओं ने अपने मकसद की ओर बहुत सधा और वैचारिक दृषिट से समृद्ध पहला क़दम बढ़ाया है। उम्मीद ही नहीं भरोसा भी है कि ये क़दम-दर-क़दम ऐसे ही बढ़ती चलेगी। ये ‘दायित्वबोध’ की तरह शायद न रुकेंगी…!

लघु पत्रिकाओं को कभी एक आन्दोलन की तरह सम्मान की दृषिट से देखा जाता था। लेकिन आज कर्इ पत्रिकाओं को हम देख रहे हैं कि वे सिर्फ़ परिवार चलाने का एकमात्रा जरिया बन कर रह गयी हैं। वे कैसी-कैसी फन्डिग एजन्सियों से सहायता ले रही हैं..? देशी-विदेशी पूँजीपति कम्पनियों के विज्ञापन छाप रही हैं और किन-किन जल, जंगल और भूमि माफ़ियाओं तक से धन बटोर रही हैं। यहाँ जैक लंडन की कृति ‘आयरन हील’ की याद आ रही है।…

लेकिन ‘नान्दीपाठ और ‘दिशा सन्धान’ जैसी पत्रिकाएँ अभी कोर्इ नहीं निकल रही है।…मुझे लगता है कि  ‘नान्दीपाठ’ और ‘दिशा सन्धान’ कर्इ पत्रिकाओं के सम्पादकों और उनमें लिखने वाले लेखकों की वैचारिक समझ को और समृद्ध करने का काम करेगी। जैसे कि ‘दायित्वबोध’ की भी कुछ ऐसी ही भूमिका थी। पर मैं आपको एक बात बताऊँ.. जब मैं ‘दायित्वबोध’ पढ़ता था, वह मुझे बहुत ही कम समझ में आती थी। मुझे उसे पढ़ते हुए खीज भी होती थी कि यह कैसी हिन्दी है, जो मुझे समझ नहीं आ रही है। तब हिन्दी मेरे लिए दूसरी भाषा थी। मेरी पहली भाषा-बोली तो ‘मालवी’ थी, जिसका मेरी कहनियाँ में भी भरपूर प्रयोग हुआ है। लेकिन तब मुझे हिन्दी की दूसरी पत्रिकाएँ पहल, हँस आदि समझ में आती थीं। और मैं ‘दायित्वबोध’ के सम्पादक और प्रकाशक को कोसता था कि यह पत्रिका किसके लिए निकालते हैं..? मुझे लगता है कि आज भी हिन्दी पढ़ने वाला ज़्यादतर पाठक वर्ग वैसा ही है, जिसकी पहली बोली-भाषा अपनी क्षेत्रा में बोली जाने वाली है और दूसरी हिन्दी है। मैं यहाँ निवेदन करना चाहता हूँ कि आप ‘नान्दीपाठ’ और ‘दिशा सन्धान’ को ‘दायित्वबोध’ जैसी जटिल बनाने का प्रयास मत करना।

मैं इस तर्क को स्वीकार करता हूँ कि आपको पारिभाषिक शब्दों को और जटिल विचार को बहुत सहज और सरल भाषा में प्रस्तुत करने में बहुत मुश्किल आती होगी और आती रहेगी। लेकिन इस विचार के प्रचार-प्रसार करने वालों को यह चुनौती भी स्वीकार करनी पड़ेगी..! अगर मैं ठीक हूँ तो मुझे याद आ रहा है, भाषा पर आपके ही प्रकाशन से एक अच्छी किताब प्रकाशित हुर्इ थी। भाषा का मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्रा या ऐसा ही कुछ मिलता-जुलता उसका नाम था। वह मैंने अपने एक मित्र को दी थी, जो फ़िर कभी लौटी नहीं। मित्र के साथ स्थानांतरण पर चली गयी और फ़िर आउट आफ़ रीच हो गयी। भाषा पर लेनिन, स्तालिन और न्गुगी ने भी काम किया है। हमारे यहाँ रामविलास शर्मा जी का भी काम है। मैंने इनका जितना जो कुछ पढ़ा है, उससे भी और अपनी देहाती समझ से भी लगता है कि कितना ही कठिन विचार और मुद्धा हो… वह जितनी सहज, सरल भाषा और शिल्प में पाठकों के बीच जायेगा उतनी ही उसे स्वीकारोकित मिलेगी। उसको जानने, मानने और उस पर बहसियाने वाले बढ़ेंगे। मैं यहाँ कहना चाहता हूँ कि दायित्वबोध की तुलना में इन दोनों पत्रिकाओं की भाषा बहुत पठनीय और समझ में आने वाली है। थियोडोर अडोर्नो के लेख का अनुवाद ‘ख़ाली समय’ की भाषा भी ताज़गी भरी है। वरना कुछ मित्रों के अनुवाद इतने कठिन होते हैं, कि उससे सरल अँग्रेज़ी में पढ़ना होता है। ‘ख़ाली समय’ के लिए शिवानी का शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ।

आज कुकुरमुत्तों की तरह अँग्रेज़ी स्कूल और कालेज खुलने के बावजूद हिन्दी और क्षेत्रीय बोलियाँ बोलने वाले लोग ज़्यादा हैं। उन्हीं लोगों में देश के अलग-अलग हिस्सों में हिंसक/अहिंसक जनांदोलन भी चल रहे हैं। लेकिन उनके नेतृत्त्व और कार्यकर्ताओं की जनपक्षीय राजनीतिक दृष्टि पूर्ण रूप से विकसित न होने और समय पर मार्गदर्शन देने वाला और समझ में आने वाला राजनीतिक साहित्य उन तक न पहुँचने की वजह से शायद उनका संघर्ष अधबीच में दम तोड़ देता है या रास्ते से भटक जाता है या फ़िर धनपशुओं की ग़ुलाम सत्ताओं के आगे समर्पण कर देता है। हालाँकि जन संगठनों को भटकाने और ठिकाने लगवाने में एन.जी.ओ. ने अपनी बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है और निभा रहा है। न सिर्फ़ जन संगठन, बलिक कुछ लाल झण्डे वाली राजनीतिक पार्टियाँ जो थोड़ी-बहुत वामपंथी भी थीं, मार्क्स, लेनिन की माला भी जपती थीं, उनके भी न सिर्फ़ झण्डे का रंग धो-पोंछ दिया है, बलिक अब उनमें और दूसरी साम्राज्यवादी पार्टियों में नाम के अलावा थोड़ा-बहुत ही फ़र्क रह गया है, जो भविष्य में जल्दी ही मिटने की सम्भावना है। उनकी पसली से निकले सांस्कृतिक और लेखक संगठन अपने पतन की ओर तेज़ी से बढ़ रहे हैं। उन पर एन.जी.ओ. कर्मियों और छदम प्रगतिशीलों ने कब्ज़ा कर लिया है। वहाँ र्इमानदार और जनपक्षीय रचनाकारों को धीरे-धीरे बाहर धकेला जा रहा है। उनके साथ उपेक्षित और द्वेषतापूर्ण बरताव किया जा रहा है।… आज भी छदम तरक्कीपसंद संगठनों और संस्थाओं की स्थिति में कोर्इ सुधार नहीं आया है, बल्कि वे और ज़्यादा भ्रष्ट और दक्षिणपंथी होते जा रहे हैं। ऐसे परिदृश्य में ‘नान्दीपाठ’ और ‘दिशा सन्धान’ से अपेक्षाएँ और ज़्यादा बढ़ जाती हैं। और अब जबकि ‘दायित्वबोध’ को बन्द हुए एक लम्बा अर्सा हो गया है, उसके शुरू होने और बन्द होने के अनुभवों ने आपको काफ़ी समृद्ध भी किया ही होगा। ऐसी सिथति में जब यह पत्रिकाएँ आपने शुरू की हैं, तो गहरी सूझ-बूझ और एक व्यवसिथत ढाँचा बनाकर ही शुरू की होंगी, ऐसा मैं समझ रहा हूँ। और यह कोशिश लम्बे समय तक हिन्दी के लेखक, पाठक और सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक कार्यकर्ताओं को दृष्टि प्रदान करती रहेगी।

मैं अंग्रेज़ी का पाठक नहीं और वह मुझे आती भी नहीं है। मैंने अंग्रेज़ी का जो कुछ पढ़ा, अनुवाद ही पढ़ा है। हावर्ड फ़ास्ट, टी.एस. इलियट, क्रिस्टोफ़र काडवेल और ग्यार्गी लुकाच जैसे जिस किसी का भी लिखा पढ़ा, वह हिन्दी अनुवाद ही पढ़ा है। मुझे हिन्दी में एक कमी अच्छी आलोचना की लगातार खलती रही है, हालाँकि सुरेन्द्र चौधरी, नामवर सिंह, शिव कुमार मिश्र, डा. राम विलास शर्मा और अरुण प्रकाश जी हुए हैं। हिन्दी आलोचना की नयी पीढ़ी में रोहिणी अग्रवाल, पल्लव और वैभव सिंह के काम में भी मेहनत नज़र आती है। फ़िर भी मुझे अपने समय, समाज और देश में चल रहे सांस्कृतिक और जनान्दोलनों की मार्क्सवादी आलोचना-समालोचना की बड़ी कमी खलती रही है। आलोचना में पिछले दस-पन्द्रह सालों में उभरे आलोचकों-समीक्षकों में कुछ तो चारण भाट और हरबोलों की परम्परा के लगते हैं। पिछले बीस सालों के कथा, उपन्यास और कविता जैसे साहित्य की आलोचना-समालोचना प्रायोजित लगती है। वह हमारे नये रचनाकारों को तराशकर नयी दिशा और दृषिट प्रदान करने में बुरी तरह से असफ़ल रही है। बलिक असफ़ल तो वह होता है, जो सही दिशा में सफ़ल होने के लिए संघर्ष करता है। यहाँ तो ऐसा कुछ है ही नहीं। ऐसा कोर्इ नज़र ही नहीं आता, जो हमारे समय, समाज और समाज में होने वाले हिंसक/अहिंसक आन्दोलनों की ऐसी व्याख्या, आलोचना-समालोचना करे कि हम जैसे नवोदित किस्सा-कहानी कहने वालों को रोशनी मिले। भले ही गोर्की, लू शुन, लाओ शु, ब्रेष्ट आदि की टक्कर के नहीं…पर अपने काल के किस्से-कहानी ठीक-ठाक कह सकने की समझ तो हासिल कर सकें…!

मुझे लगता है कि एक रचनाकार की अच्छी गुरू तो अच्छी आलोचना ही हो सकती है। ‘नान्दीपाठ में जब मैंने टेलीविज़न समीक्षा, फ़िल्म समीक्षा देखी और पढ़ी। ‘दिशा सन्धान’ में पुस्तक समीक्षा: ‘खतरनाक ढंग से सपने देखने और निषिक्रय, नुकसानदेह और नामुराद सैद्धानितकीकरण का वर्ष (अभिनव सिन्हा), आधुनिक यूनानी त्रासदी के त्रासद नायक के विरोधाभास (सत्यम), दिल्ली सामूहिक बलात्कार काण्ड, जसिटस वर्मा समिति की रिपोर्ट और सरकार का अपराध कानून संशोधन अध्यादेश (कात्यायनी), अफ़ज़ल गुरू को फ़ाँसी, खाध सुरक्षा, तो ये जो मुद्धे और घटनाएँ आपने शामिल किये हैं, मुझे लगता है कि यह कोशिश एक लम्बे समय से खलती ख़ामी को भरने की दिशा में उठा क़दम साबित होगी। मुझे लगता है कि यह एक बेहद ज़रूरी और सही काम है, इससे मुझ जैसे अनेक नवोदित लेखकों को अपनी दृषिट को लगातार माँजने और पैनी करने में निशिचत ही मदद मिलेगी। जैसे ‘फ़िलहाल’ ‘समयांतर’, और ‘नागरिक’ भी अपने सीमित संसाधनों में लगतार और नियमित अच्छा काम कर ही रही हैं।

अंग्रेज़ी में र्इ.पी.डब्ल्यू और मंथली रिव्यू जैसी कुछ पत्रिकाएँ हैं, पर उनका लाभ मेरे जैसे गावदी और हिन्दी भाषी नहीं ले पा रहे हैं। मुझे लगता है कि ‘नान्दीपाठ और ‘दिशा सन्धान’ हम हिन्दी भाषियों को र्इ.पी.डब्लू और मंथली रिव्यू जैसी पत्रिकाओं की कमी महसूस नहीं होने देगी, बलिक अपने पाठकों से आगे ले जायेगी। उन्हें एक बेहतर व्यवस्था के निर्माण के लिए न सिर्फ़ उकसाने का काम करेंगी, बलिक नेतृत्व भी प्रदान करेंगी। मैं खुले हृदय और युवा जोश से इन दोनों पत्रिकाओं का स्वागत करता हूँ।

मैं ‘नान्दीपाठ और ‘दिशा सन्धान’ के सिर्फ़ उन साथियों को ही नहीं, जिनके नाम पत्रिका में किसी न किसी रूप में छपे हैं, बलिक उन सभी को शुक्रिया और सलाम कहना चाहता हूँ, जिन्होंने दोनों पत्रिकाओं को पाठकों तक इस ख़ूबसूरती से पहुँचाया है।

सत्यनारायण पटेल, इन्दौर

लाल सलाम,

‘दिशा सन्धान’ का पहला ही आलेख ऐतिहासिक आवश्यकता का प्रमाण है। यधपि बहुत सारे बिन्दु बहस के अपेक्षित मुददे हैं। बधार्इ। पत्रिका भेजने के लिए मित्रों के पते भेज रहा हूँ।

डा. रमेशचन्द्र, आगरा

‘दिशा सन्धान’ और ‘नान्दीपाठ के प्रवेशांक मिल गये हैं। सदस्यता शुल्क भेज रहा हूँ। दोनों ही पत्रिकाओं की सामग्री प्रथमदृष्टया गम्भीर और वैचारिक है। आप और आपकी टीम लगातार काम कर रही है, जो अत्यन्त सुखद है। पत्रिकाएँ पढ़कर विस्तार से राय दूँगा।

बसन्त त्रिपाठी, नागपुर

क्रानितकारी अभिवादन,

‘दिशा सन्धान’ व ‘नान्दीपाठ’ के ब्रोशर मिले। हिन्दी समाज में ऐसी गम्भीर पत्राकारिता निश्चय ही ज़रूरी कार्यभार है। इधर तो लोग सैद्धान्तिकी और चिन्तन से विरत होते जा रहे हैं। आप ही यह काम कर सकते हैं। लगता है देश आगे की बजाय पीछे की ओर जा रहा है। आने वाला समय हमारे लिए और मुशिकलों भरा हो सकता है। बहरहाल, हमसे जो सहयोग बन पड़ेगा, करेंगे।

राजाराम भादू, जयपुर

प्रियवर,

‘दिशा संधान’ और ‘नांदीपाठ’ पत्रिकाओं के प्रवेशांक काफ़ी लम्बी प्रतीक्षा व कठिनार्इ के बाद प्राप्त हुए। दोनों को पढ़ लिया है। पत्रिकाएँ निशिचत ही काफ़ी श्रम और गहरी अन्तरदृष्टि के साथ निकाली गयी हैं। इसलिए इनमें वह सामग्री संकलित है जो अन्यत्रा नहीं मिलती। आजकल साहित्य (वैचारिक और रचनात्मक) विभिन्न पत्रिकाओं में इस तरह परोसा जा रहा है गोया वह गम्भीर सोच-विचार की सामग्री नहीं चटपटी चाट हो। स्वाद लेकर खाइये और थोड़ी देर में भूल जाइये। साहित्य का वह उददेश्य ही ग़ायब हो गया है जो कभी अन्यायी सत्ताओं के प्रति लोगों को खड़ा करने की भूमिका निभाया करता था। ऐसे में इन दोनों पत्रिकाओं का कैसा और कितना स्वागत होता है मैं कयास नहीं लगा पा रहा हूँ। बहरहाल मुझे ये पसन्द हैं, यधपि लेखों का बहुत अधिक अकादमिक होना व जगह-जगह अनुवाद सही न होना खटकता भी है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि इन्हीं विषयों पर मौलिक लिखने के लिए लेखकों को प्रोत्साहित किया जाये। हो सकता है आप की भी कुछ कठिनाइयाँ हों फ़िर भी मैं चाहूँगा कि इस सुझाव पर विचार किया जाये।

सुरेश पण्डित, अलवर

पहले ‘दायित्वबोध’ के रूप में प्रकाशित होती रही पत्रिका को फ़िर से आगे बढ़ाने के आपके प्रयास का मैं दिल से स्वागत करता हूँ। मैं मार्क्सवाद-लेनिनवाद की हिफाज़त और विचारधारा के अहम सवालों पर पोलेमिक में इसके ज़बर्दस्त योगदान को भूल नहीं सकता। आज सर्वहारा अधिनायकत्व और अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के मूलभूत सिद्धान्तों की हिफाज़त और इस प्रकार मार्क्स, लेनिन और माओ की शिक्षाओं की जीजान से रक्षा करने के लिए ऐसी पत्रिका की अत्यन्त आवश्यकता है। आज आर.सी.पी.,यू.एस.ए., कसामा प्रोजेक्ट से लेकर लीडिंग लाइट कम्युनिस्ट आर्गनाइज़ेशन तक अनेक शकितयों की एक धारा मार्क्स, लेनिन, स्तालिन और माओ के बुनियादी उसूलों को तोड़-मरोड़ रही है। माइक एली के नेतृत्व में कसामा प्रोजेक्ट माओवाद को अपनेआप में स्वतंत्र, लेनिनवाद से अलग इकार्इ के रूप में पेश करता है। वे एक मार्क्सवादी सिद्धान्तकार के रूप में स्तालिन के योगदान की शायद ही कभी हिफाज़त करते हैं और माओवाद को लगभग स्तालिनवाद की एण्टी-थीसिस मानते हैं। दूसरी ओर, लीडिंग लाइट जैसी शकितयाँ प्रथम विश्व के सर्वहारा की भूमिका को ही ख़ारिज करती हैं और केवल तृतीय विश्व के सर्वहारा को मान्यता देती हैं। ये दोनों ही रुझानें आर.सी.पी., यू.एस.ए. की तीव्र आलोचक हैं।

आर.सी.पी., यू.एस.ए. के नेता बाब अवाकियन ने शुरू में काफ़ी योगदान किया था, लेकिन आगे चलकर उन्होंने क्रानितकारी अन्तरराष्ट्रीयतावादी आन्दोलन ;रिमद्ध में अपनी पार्टी की नीतियाँ थोपकर विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन को काफ़ी धक्का पहुँचाया। का. अवाकियन ने समाजवादी समाज में विरोध और बहस के सवाल पर कुछ महत्वपूर्ण बातें उठायीं। यह कहा जा सकता है कि स्तालिन काल में मत-विरोध को दबाया गया और हालाँकि सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान स्तालिन की चूकों को ठीक करने के महती प्रयास किये गये लेकिन बहस-मुबाहसे या मत-विरोध के लिए पर्याप्त स्थान नहीं दिया गया। कलाकारों, संगीतकारों, लेखकों और बुद्धिजीवियों के मामले में ऐसा रवैया बहुत प्रकट था। लेकिन अवाकियन माओ के नेतृत्व में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी पर तीन दुनियाओं का सिद्धान्त पेश करने का ग़लत आरोप लगाते हैं। वह अपनी ‘न्यू सिन्थेसिस को भी मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद की उच्चतर अवस्था मानते हैं, जो बिल्कुल आधारहीन है। अवाकियन ने अध्यक्ष माओ की तरह, समाजवादी समाज में क्रान्ति तो दूर, किसी भी क्रान्ति का नेतृत्व नहीं किया है। वास्तव में, उनका लेखन कुल मिलाकर कामरेड माओ की क्रानितकारी लाइन की हिफाज़त करने में विफ़ल रहता है। हमें ‘इम्मार्टल कंट्रीब्यूशन्स आफ़ माओ त्से-तुंग : द ग्रेटेस्ट रिवोल्यूशनरी आफ़ अवर टाइम में पार्टी की हिरावल भूमिका और माओ के अवदानों की रक्षा करने में उनके योगदान की सराहना करनी चाहिए, लेकिन बाद में आर.सी.पी. ने स्तालिन की उपलब्धियों की शायद ही कभी हिफाज़त की और यहाँ तक कि अन्तरराष्ट्रीय लाइन की हिफाज़त में का. माओ के अवदान का मज़ाक भी उड़ाया। इस सन्दर्भ में हमें देङपंथी चीनी कम्युनिस्ट पार्टी और अनवर होजा के ग़लत विचारों का खण्डन करने में का. हरभजन सिंह सोही के अवदान को याद करना चाहिए।

कसामा प्रोजेक्ट जैसी शकितयाँ अमेरिका और शेष विश्व में साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्षों के समर्थन और एकजुटता के लिए अच्छा काम कर रही हैं। वे वाद-विवाद और मत-विरोध की सिपरिट को भी बढ़ावा देती हैं जिसकी आज कम्युनिस्ट आन्दोलन में बहुत ज़रूरत है। लेकिन उनमें लेनिनवाद के सवाल पर बहुत वैचारिक ढीलापन है और हिरावल की पार्टी की भूमिका, और लेनिनवाद के अन्य बुनियादी उसूलों, ख़ासकर सर्वहारा अधिनायकत्व पर सवाल उठाये जाते हैं। एलेन बेज्यू के विचारों जैसी नव वाम की रुझानों को बढ़ावा दिया जाता है।

भारत में बर्नार्ड डिमेलो जैसे लेखक और बुद्धिजीवी भी हैं जो मार्क्स, लेनिन और माओ को क्रान्तिकारी नहीं बलिक रैडिकल डेमोक्रेट के रूप में देखते हैं। अपने लेखों में वह माओवाद को कुछ ऐसी चीज़ के बतौर पेश करते हैं जिसे स्तालिनवाद के चंगुल से मुक्त होने की ज़रूरत है, और बुर्ज़ुआ बहुदलीय जनवाद की वव़फालत करते हैं।

ऐसे में हमें आज मार्क्स, लेनिन, स्तालिन और माओ के अवदानों की जीजान से हिप़फाज़त करनी है। यह 1963 की अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन की आम कार्यदिशा का 50वाँ वर्ष है और आपकी पत्रिका को एक बड़ी भूमिका निभानी है। साथ ही, मैं आशा करता हूँ कि समाजवाद के भविष्य के लिए मत-विरोध और वाद-विवाद की स्परिट को काफ़ी प्रोत्साहित किया जायेगा।

आपके प्रयासों को लाल सलाम।

हर्ष ठाकोर, मुम्बर्इ

दिशा सन्धान – अंक 2  (जुलाई-सितम्बर 2013) में प्रकाशित

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