पाठकों के पत्र : दिशा सन्धान-3, अक्टूबर-दिसम्बर 2015

आपकी बात 

दिशा सन्धान के दोनों अंक मैंने पढ़े। अभिनव सिन्हा का धारावाही लेख ‘सोवियत संघ में समाजवादी प्रयोगों के अनुभव: इतिहास और सिद्धान्त की समस्याएँ’ बेहद महत्वपूर्ण है। आज विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन के सामने जो गम्भीर राजनीतिक सवाल मौजूद हैं, उनके हल के लिए ज़रूरी है कि इतिहास का गहराई और गम्भीरता के साथ और पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर अध्ययन किया जाये। ख़ास तौर पर समाजवादी निर्माण के महान प्रयोगों के सकारात्मक और नकारात्मक अनुभवों को नये सिरे से जानने-समझने की ज़रूरत है। हमारे यहाँ यह काम प्रायः बहुत सतही ढंग से होता रहा है। आधे-अधूरे ऐतिहासिक तथ्यों को लेकर मनचाहे नतीजे भी निकाले जाते रहे हैं। आपने जिस विस्तार में जाकर चीज़ों को उठाया है और जितने ब्यौरेवार तथ्यों के साथ विश्लेषण प्रस्तुत किया है वह बहुत ज़रूरी है। बहुत से तथ्यों से भी कम से कम भारत में ज़्यादातर लोग वाकिफ़ नहीं हैं। रूस में क्रान्तिकारी आन्दोलन के भीतर दो कार्यदिशाओं के संघर्ष का विस्तृत ब्यौरा बहुत उपयोगी है। “कानूनी” मार्क्सवादियों और अर्थवाद, अराजकतावाद और अराजकतावादी- संघाधिपत्यवाद के साथ चले वैचारिक संघर्ष को जानने की महत्ता आज इसलिए भी बढ़ गयी है क्योंकि ये पिटी हुई प्रवृत्तियाँ आज कम्युनिस्ट आन्दोलन के भीतर फिर से सिर उठाने लगी हैं। त्रात्स्कीपंथ से लेनिन के नेतृत्व में चले बोल्शेविकों के संघर्ष का ब्यौरा और उनके बारे में लेखक की ‘इनसाइट्स’ भी बहुत शिक्षाप्रद हैं। आगामी अंक में चार्ल्स बेतेलहाइम के विचारों की आलोचना के प्रति उत्सुकता बनी हुई है क्योंकि इस विषय पर हिन्दी में तो मेरी जानकारी में नगण्य सामग्री है।

जाति प्रश्न और मार्क्सवाद पर लम्बा आलेख मैं अन्यत्र पढ़ चुका था लेकिन एलेन बेज्यू की पुस्तक की समीक्षा, फासीवाद, नेपाल की राजनीतिक स्थिति और आम आदमी पार्टी की चुनावी जीत पर टिप्पणियाँ भी काफी विचारोत्तेजक लगीं। आशा है, पत्रिका की वैचारिक गहराई और तीक्ष्णता का स्तर ऐसा ही बना रहेगा।

शरदेन्दु चौधरी, नई दिल्ली

‘दिशा सन्धान’ का दूसरा अंक प्रवेशांक द्वारा जगायी उम्मीदों पर खरा उतरा है। सोवियत संघ में समाजवादी प्रयोगों के अनुभवों पर लेख की दूसरी किस्त उस दौर के अहम सवालों और घटनाओं का जैसा प्रखर विश्लेषण तथ्यों के साथ करती है वैसा मैंने पहले कहीं नहीं पढ़ा है। इसमें सोचने के लिए काफी मसाला है और बहुत से मुद्दे बहसतलब भी हैं, इन पर बहस चले तो अच्छा होगा। मुश्किल सवालों पर चुप रहने या कन्नी काटने से काम नहीं चलेगा। दागिस्तानी कवि अबू तालिब कह गये हैं कि अगर तुम अतीत पर पिस्तौल से गोली दागोगे तो भविष्य तुम पर तोप से गोले बरसायेगा। लेकिन अगर हम अतीत के सवालों से आँख चुरायेंगे तो भी हमारा हश्र कोई बेहतर नहीं होने वाला! नक्सलबाड़ी पर आलोकरंजन के लेख की दूसरी किस्त नहीं मिल पाना दुर्भाग्यपूर्ण रहा। उस लेख की विशेषता भी मुझे यही लगी कि विस्तृत तथ्यों के साथ ही भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के इतिहास का विश्लेषण भी दिया गया है। आगामी अंक में इसकी अगली कड़ी की प्रतीक्षा रहेगी।

संजय कुमार, लखनऊ

हम लोग कई वर्षों से आपकी पत्रिका ‘दायित्वबोध’ के पाठक रहे हैं। नेपाल के कम्युनिस्ट आन्दोलन से जुड़े बहुत से लोगों के लिए यह वैचारिक सामग्री का महत्वपूर्ण स्रोत रही है। साथी अरविन्द जी के निधन के बाद से इसका प्रकाशन बन्द रहा लेकिन ‘दिशा सन्धान’ के द्वारा आप लोगों ने इस सिलसिले को आगे बढ़ाया है। यह नयी पत्रिका ज़्यादा गम्भीर है और कुछ लोगों के लिए गरिष्ठ भी हो सकती है। मगर मुझे लगता है कि आज हमारे देश में और आपके भी मुल्क में कम्युनिस्ट आन्दोलन की जो हालत हुई है उसके लिए वैचारिक कमज़ोरी सबसे बड़ा कारण है। इसे दूर करने के लिए पढ़ाई-लिखाई, बहस-मुबाहसे और गहराई में उतरकर चिन्तन की संस्कृति फिर से बहाल करनी होगी।

आपका एक पाठक, नेपाल

दिशा सन्धान – अंक 3  (अक्टूबर-दिसम्बर 2015) में प्रकाशित

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