दायित्वबोध, अक्टूबर-दिसम्बर 2003
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‘‘स्तालिन बीसवीं शताब्दी के महानतम व्यक्तित्व थे, एक महानतम राजनीतिक प्रतिभा’’ ऐसा कहा था भूतपूर्व सोवियत विरोधी अलेक्सांद्र जिनोविएव ने। उसके शब्दों में, ‘‘मैं सत्रह वर्ष की आयु में ही पक्का स्तालिन विरोधी बन चुका था – स्तालिन की हत्या का विचार मेरी सोच और भावनाओं में घर कर चुका था…हमने हमले की तकनीकी संभावनाओं का अध्ययन किया और यहां तक कि उसका अभ्यास भी किया। यदि उन्होंने 1939 में ही मुझे मृत्युदण्ड दे दिया होता तो उनका निर्णय न्यायसंगत होता। जब स्तालिन जीवित थे तो मैं चीजों को भिन्न नजरिए से देखता था, परन्तु अब, जबकि मैं इस सदी को पीछे मुड़कर देखता हूं, मैं यह कह सकता हूं कि स्तालिन इस सदी के महानतम व्यक्तित्व थे, महानतम राजनीतिक प्रतिभा।’’
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“Stalin was the greatest individual of the Twentieth century, the greatest political genius” So spoke the ex-Soviet dissident, Alexander Zinoviev in 1993: “I was already a confirmed anti-Stalinist at the age of seventeen… The idea of killing Stalin filled my thoughts and feelings… We studied the ‘technical’ possibilities of an attack… We even practised. If they had condemned me to death in 1939, their decision would have been just…When Stalin was alive, I saw things differently, but as I look back over this century, I can state that Stalin was the greatest individual of this century, the greatest political genius.”
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अपनी स्थिति की सफाई देने के लिए एनजीओ डायरेक्टरों द्वारा किये जाने वाले औपचारिक दावे-कि वे गरीबी, विषमता आदि से लड़ रहे हैं-स्वार्थपूर्ण और छद्मपूर्ण हैं। एनजीओ की बढ़त और आम जीवन–स्तरों की गिरावट में सीधा सम्बन्ध है : एनजीओ की संख्या में बढ़ोत्तरी ने ढांचागत बेरोजगारी अथवा किसानों के भारी पैमाने पर विस्थापन को कम नहीं किया है, और न ही असंगठित मेहनतकशों की बढ़ती हुई फौज के लिए जीवन–यापन योग्य मजदूरी–स्तर ही प्रदान किया है। एनजीओ ने जो किया है वह यह कि उसने प्रोफेशनलों का एक छोटा सा तबका तैयार किया जो विदेशी मुद्रा में आमदनी के बूते नव–उदारवादी अर्थव्यवस्था की उन तबाहियों से बच निकलते हैं जो उनके देश और आम लोगों को प्रभावित करती हैं, तथा वर्तमान सामाजिक वर्गीय ढांचे में ऊपर चढ़ने की सीढ़ी पा जाते हैं।
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यह ऐसी स्वेच्छाचारिता है, जिसके साथ जीना आसान है, क्योंकि वह एक ही कीमत मांगती है – आत्मसम्मान और विवेक को दूसरों के चरणों में समर्पित कर देना और ऐसा लग रहा है कि हम तेजी से उस जगह पहुंच रहे हैं, जहां विवेक के प्रति केवल घृणा-तिरस्कार का भाव होगा और आत्म-गौरव के बारे में बाबा आदम के जमाने की समझ होगी। यह मैं विनम्र स्वर से कह रहा हूं, क्योंकि चंद हफ्ते पहले तक मैं उन लोगों में से था, जो कठोरतापूर्वक इस बात से इंकार करते थे कि इस देश में स्वेच्छाचारिता विद्यमान है, कि मैं भी अपनी उसी शिक्षा की प्रक्रिया का अंग हूं, जिसे आप सब, सच तो यह है कि पूरी दुनिया अब तक जान गयी है और जो हमारे लिए चुल्लू भर पानी में डूब मरने की बात है। read more
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